(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)
मुंशी प्रेमचंद
☆ आलेख – समाज के शुभचिंतक प्रेमचंद: सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
(प्रेमचंद जयंती – 31, जुलाई)
प्रेमचंद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ युगप्रवर्तक एवं समाज के शुभचिंतक कथाकार थे। उन्होंने विपुल संख्या में कहानियाँ, उपन्यासों, निबंधों आदि का प्रणयन किया, पत्र-पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया। आपका लेखन पूर्ण सोद्देश्य था। समाज की विकृतियों एवं समस्याओं का चित्रण कर उसे विशिष्ट आदर्श की ओर ले जाने के हेतु अपने विचारों में वे कहा करते थे कि‐- ‘ मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल, प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है। ‘ इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद साहित्य के माध्यम से कुशलता से, कलात्मक रीति से समाज के शुभचिंतक व सुधारक थे। शुभचिंतक वही होता है, जो आलोचना भी करे और रास्ता भी दिखाए। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से यही कार्य किया। उनकी आलोचना में सहानुभूति निहित थी। वे गरीब का मज़ाक नहीं उड़ाते थे। गोदान उपन्यास का होरी हारता है पर उसकी मेहनत और इज्जत को लेखक सलाम करता है। वे महाजन, पंडित की निंदा करते हैं, पर नफ़रत नहीं फैलाते।
प्रेमचंद समाज को राजा- महाराजाओं की दृष्टि से नहीं अपितु गाँव की चौपाल, किसान के खेत, विधवा की रसोई और महाजन के बहीखाते से देखा। गोदान का किसान होरी, कफ़न के माधव की गरीबी सिर्फ दया का विषय नहीं, शोषण की व्यवस्था का परिणाम है। बूढ़ी काकी, ठाकुर का कुआं आदि अनेक कहानियों में दहेज, पर्दाप्रथा, विधवा विवाह व घरेलू हिंसा को सवाल बनाया। वे किसी विशेष वर्ग के लेखक नहीं थे। उन्होंने किसान, मजदूर,स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बेरोजगार युवा, वृद्ध, अनाथ, वंचित आदि सभी को साहित्य का नायक बनाया। आपने उन लोगों को आवाज़ दी, जिनकी पीड़ा समाज सुनना नहीं चाहता था। वे भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव से व्यथित थे अत: उनकी कहानियाँ सामाजिक अन्याय का प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने बताया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसका चरित्र और कर्म है।
प्रेमचंद का अधिकांश जीवन गाँव में व्यतीत हुआ था, अत: उनको गँवई गाँव का चितेरा कहा जाता है। ग्राम्य जीवन के हर पहलू का उनको व्यक्तिगत अनुभव था लेकिन शहरी जीवन व वातावरण से भी वे अछूते नहीं थे। शहरी झलकियाँ आपके गोदान व गबन उपन्यास में देखी जा सकती हैं। गबन उपन्यास में शहरी निम्न मध्यवर्ग का चित्रण है तो गोदान में उच्च वर्ग के जमींदार, मिल-मालिक, शिक्षित प्रोफेसर पार्टियाँ देते-लेते रहते हैं, शराब- कबाब आम चलता है, खुला खर्चीला जीवन बिताते हैं, कारों में घूमते हैं। उन्मुक्त भोग और स्वच्छंद विहार शिक्षित नारियों और पुरुषों का जीवन-सिद्धांत बनता जा रहा है। शिक्षित नारी पाश्चात्य रंग में रँगी फैशन की पुतली बन रही है, जीवन में स्वार्थ अधिक मात्रा में घुसता जा रहा है। इस प्रकार वे शहरी जीवन की अनेक झाँकियाँ प्रस्तुत करके सामयिक समाज और वातावरण का सच्चा चित्रण करते हैं,जिससे इनके साहित्य में युगधर्म की पूरी रक्षा होती है।
सारत: प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य का लक्ष्य मनुष्य को ही माना और उसके समस्त भावों-विचारों, उत्कर्षों व अपकर्षों को चित्रित किया। आपका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता पूर्व था। उनकी कहानियाँ पुरानी नहीं लगतीं क्योंकि मुद्दे वही हैं– कर्ज, बेरोजगारी, नारी, धर्म की राजनीति, अंतर सिर्फ इतना है कि स्वरूप बदल गया है। जमींदार के स्थान पर काॅर्पोरेट आ गया है। अत: प्रेमचंद का शुभचिंतक होना यही था कि वे समाज को कोसते नहीं थे, समझते थे और समझदार उसमें मनुष्यता बचाने का प्रयास किया करते थे।
☆ आलेख ☆ ~ पाँच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
आज मेरे पांच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें है। इनमें श्री रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि’, जयशंकर प्रसाद का ‘कंकाल’, रामदेव धुरंधर का पथरीला सोना एवं विनोद कुमार शुक्ला की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी है।
एक पाठक के रूप में मैं जब मैंने इन चारों साहित्यकारों की इन पुस्तकों के कुछ अंशों को पढ़कर उनकी लेखन शैली, भाव प्रवर्षण पर एक तुलनात्मक दृष्टि डालने की कोशिश किया तो मेरे पाठक मन में जो चित्र अंकित हुए, वे कुछ निम्नवत थे ।
रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ की रश्मिरथी तृतीय सर्ग से
*
” हो गया पूरा अज्ञातवास, पाण्डव लौटे वन में सहास,
पावन में कनक सदृश्य तप कर, विरत्व लिए कुछ और प्रखर,
नस-नस में तेज प्रवाह लिए, कुछ और नया उत्साह लिए।”
*
” सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काटों मे राह बनाते हैं।”
*
विशेष: राष्ट्रकवि की राष्ट्र भावना और भारतीय शौर्य उनकी लेखनी से, बारंबार उमड़ता है। विरत्व का प्रवाह काव्य की पंक्तियों में, योद्धा यह शौर्य का वंदन करता है। विषम परिस्थितियों में भारतीय जन मानस कैसे मार्ग प्रशांत करता है राष्ट्रकवि की कविताएं बोल पड़ती हैं।
मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि से (भाग – ३ खंड- २)
“अमरकांत का पत्र लिए हुए नैना अंदर आई, तो सुखदा ने पूछा -किसका पत्र है?
नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था।बोली- भैया का।
सुखदा ने पूछा -अच्छा उनका खत है ? कहां हैं?
‘हरिद्वार के पास किसी गांव में है।’
आज पाँच महीना से दोनों में अमरकांत के कभी चर्चा नहीं हुई थी मानो वह कोई घाव था, जिसको छूते ही दोनों के ही दिल काँपते थे ।
विशेष – संवाद ऐसे मनमोहन, मानो आंखों के सामने सब कुछ चल रहा हूँ। शैली ऐसी की कोई भी समझ ले। यही तो मुंशी प्रेमचंद का कथा लिखने का शिल्प है ।
जयशंकर प्रसाद की कृति कंकाल -७ से
किशोरी और उसकी सहेलियां स्नान करके लौट आई अब यमुना अपनी धोती लेकर बजरे से उतरी और बालू की एक ऊंची टेकरी के कोने में चली गई।
यह कौन ए काम था यमुना गंगा के जाल में पर डालकर कुछ देर तक चुपचाप बैठी हुई विस्तृत जलधारा के ऊपर सूर्य की उज्जवल करने का प्रतिबिंब देखने लगी जैसे रात के तारों की फूल -अंजलि जाह्नवी के शीतल वृक्ष पर किसी ने बिखेर दी हो ।
विशेष: सब कुछ विशेष ही विशेष संवाद मधुर । कथानक प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता को लेखक की कलम से निकलकर अपने ऊपर बिखरते हुए देखत है, शब्द पुष्प लगातार मुस्कुराते है। यह है श्री जयशंकर प्रसाद का लेखन शिल्प।
रामदेव धुरंधर की कृति पथरीला सोना से
भारतीय तीर तलवार के साथ ना जाकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ जाते थे और वहां रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे भारतीय धरती ने कैसे इस तरह से संस्कार स्वयं में पल्लवित उपस्थित किए हो और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो “मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ जहाँ इसे ऐसे रोप दो कि उगे तो स्वयं भारत उगे”.
तब तो हिमालय ऐसे ही खेल-खेल में वयोवृद्ध नहीं हुआ। गंगा ऐसे ही जननियों की महाजननी मनहीं हुई। इसके पीछे स्वर्ण अक्षरों में अंकित विराट अतीत है। हिमालय ने अपनी अटलता से संदेश दिया जहां रहो अपनी पहचान से रहो और गंगा ने बह कर कहा,सतत गतिशील बने रहने की शर्त रखो।
विशेष: भारतीय संस्कृति को सात समुंदर पार की धरती मॉरीशस से जोड़ता पथरीला सोना के कथानक का यह अंश देखिए न कैसे सब कुछ कह देता है। लेखक के दिल में भारत बसता है, यह मैं नहीं कह रहा उनकी कलम कहती है। यह है श्री रामदेव धुरंधर के लेखन शैली का शिल्प।
विनोद कुमार शुक्ल की कृति दीवार में एक खिड़की रहती थी से
खिड़की की चौखट पर एक साँवली लड़की खड़ी थी। वह दोनों हाथों में चौखट पकड़े हुए खड़ी थी। वह तैयार होकर आई थी। चौखट पर उसके दोनों हाथों की एक-एक छोटी उंगलियों में नेल पॉलिश लगी हुई थी। सोनसी उसके पास आई।
“अंदर आओगी?”
“नहीं।उसने शरमाकर कहा।
“अच्छा रुकना । सोनसी ने कहा।
विशेष: हिंदी लेखक विनोद कुमार शुक्ल के लिखे उपरोक्त पुस्तक के कथानक के इस अंश में पात्रों का संवाद एवं लेखक द्वारा शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत दृश्य आपस में मिलकर कथानक को जीवंत करते हुए प्रतीत होते हैं। लेखक के भाव और लेखन शैली दोनों में ही जीवंतता है।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४३ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
घुग़री से गरारू घाट 11नवम्बर2019
घुग़री से आगे बढ़ने के पहले लोगों से आगे के रास्ते के बारे में जानकारी लेने नीचे घाट पर उतरे तो पता चला कि नर्मदा किनारे का रास्ता ख़राब है। बहुत ऊबड़-खाबड़ या कीचड़ मिलेगी इसलिए नहर के किनारे चलने लगे। सुबह जब चलना शुरू करते हैं तब स्फूर्ति से लंबा रास्ता तय करने का प्रयास रहता है लेकिन एकाध किलोमीटर चलने पर माँस पेशियाँ तैयार होतीं हैं परंतु साँस को आराम देने के लिए थोड़ा आराम ज़रूरी रहता है। कोई दो किलोमीटर दूर एक गौड़ परिवार का खुला घर दिखा, नर्मदे हर उद्घोष के बाद रुके। उनका नाम मुन्ना ठाकुर राजगौड़ था, उनके तीन मुस्कुराते निश्छल चेहरे वाले बच्चों से बच्चा बनकर बतियाया, एक बच्चे ने सीताफल खाने को दिया और भैंस का ताजा दूध बासी रोटी के साथ पिया। उसकी बीबी चतुर थी उसने वहाँ 30 रुपए लीटर मिलने वाला दूध का भाव हमसे 40 रुपए लीटर तय करके ठग लिया। हमें कबीर की उलटवासी याद आ गई।
कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय
आप ठगाए सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।
वैसे हम भी ठगाए नहीं थे क्योंकि शहरों में 50 रुपए मिलने वाले नक़ली दूध की जगह सामने भैंस से दुहता असली दूध 40 रुपए लिया था। अरुण भाई ने ख़ुश होकर उसे 100 रुपए दिए। इस मामले में अरुण भाई काइयाँ गुज़ारती न होकर ठेठ बुंदेलखंडी हैं, दिल ख़ुश-तिजोरी फुक्क। मुन्ना ठाकुर राजगौड़ की पत्नी तीन बच्चों की माँ होने के बाद भी स्वाभाविक सुंदर, फ़ुर्तीली व चपल थी, वह मेहनतकश नारी देह की मालकिन थी। उसने शायद ही कभी ब्यूटी पार्लर का मुँह देखा हो जहाँ शहरी औरतें शरीर में क़ैद माँस पिंडों को क्रीम से थ्रेडिंग करवा कर सौंदर्य का आभास ख़रीदती रहती हैं। उनके भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों हैं। उन्हें बटेर, खरगोश और मछली भोजन हेतु आसानी से मिल जाते हैं। उन्होंने खुलकर हमसे बातें कीं। असल में इंसान प्यार और बातचीत का भूखा होता है, लोगबाग अहंकारी चित्त होने के कारण खुलना नहीं चाहते।
रहीमन पैडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल
बिलछत पैर पीपिलि को लोग लदावत बैल।
प्रेम व्यवहार की गली अत्यंत चिकनी फिसलन भरी है, लोग उस पर भी कंधों पर अहंकारी बैल को लादकर चलना चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है।
हमारे एक साथी की बवासीर भड़क गई बहुत सारा ख़ून बह जाने से कमज़ोरी स्वाभाविक थी, अविनाश भाई ने उन्हे ग्लूकोज़ का घोल पिलाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यात्रा करना जारी रखा। रास्ते में एक स्थान पर चढ़ाई करते हुए उन्हें चक्कर आ गया। पुनः खजूर और गुड खिलाया, वे दस मिनट में दुरुस्त होकर चलने लगे। उन्हें समझाया कि ज़्यादा तेज़ चलना ठीक नहीं है। उन्होंने सामान्य गति से चलते हुए नियत यात्रा पूरी की लेकिन आख़िरी दिन सतधारा में नहाते हुए मुँह के बल गिरे, उनकी नाक पर गहरी चोट आई। उन्हें तैरना नहीं आता था। ग़नीमत है कि वे नर्मदा की गहराई में नहीं गिरे वरना बड़ा हादसा हो सकता था।
नरसिंहपुर जिले का पूरा इलाक़ा लोधियों से आबाद है। लोधी एक बहुत मेहनतकश और जूझारू क़ौम है। खेतों में बेतहाशा मेहनत करते दिखते हैं। चारों तरफ़ गन्ने की दस-बारह फ़ुट ऊँची और पीले फूल से सजी तुअर दाल की फ़सल लहरा रही थी। एक खेत में एक लोधी किसान उसकी पत्नी और दो पुत्र सहित आलू की बौनी कर रहे थे। उन्होंने बताया छोटे अंकुरित आलुओं की ख़रीद नरसिंघपुर से करके लाए हैं। चार भैंसों का गोबर इकट्ठा करके खाद बनाकर क्यारियों में पहले खाद बिछाते हैं फिर अंकुरित आलू रखकर मिट्टी से पूर देते हैं। एक आलू से दस-बारह आलू उपजते हैं। आलुओं की बातों में हमने धीरे से बात ऊठाई कि यार आलू चिप्स के साथ चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता। कहने भर की देर थी, किसान की पत्नी चाय बना लाई। किसान ने बताया कि किसानी से घर का ख़र्च मुश्किल से निकलता है। किसान की क़िस्मत छलनी में दूध छानने जैसी है। अच्छी फ़सल आए तो दाम गिर जाते हैं और फ़सल ख़राब हो जाए तो लागत नहीं निकलती है। आदर्शवादियों ने “किसान को अन्नदाता बताकर” उसकी आशान्वित समृद्ध सम्भावनाओं को निरस्त कर दिया। व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों किसान दोहरे शोषण के शिकार हैं, वे एक तरफ़ खाद, बीज, कीटनाशक और उपकरणों की क़ीमत बढ़ाकर भारी मुनाफ़ा कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ़ किसान के उत्पाद अनाज मंडी, फल मंडी, सब्ज़ी मंडी में औने-पौने में ख़रीद कर तिजोरी भरते हैं। इस शोषण तंत्र को किसान-नेता और कारोबारियों का नेतृत्व राजनैतिक दबंगई से किसान हितैषी बनकर बड़ी कुशलता पूर्वक चलाते हैं, वे किसानों की ऋण माफ़ी का आंदोलन करके उन पर अहसान का बोझ डालकर वोट-बैंक पक्का कर सत्ता के भागीदार हो शोषण तंत्र अनवरत चलाते रहने में सफल हैं। किसान अब सिर्फ़ किसान नहीं बना रहना चाहता वह यूरोप और अमेरिकी किसानों की तर्ज़ पर यथार्थवादी कारोबारी बनना चाहता है, लेकिन कारोबारी शोषण तंत्र का शिकंजा उसे साँस नहीं लेने देता उसका दम घुटते रहता है किसानों की मानसिक प्रताड़ना की भयावहता आए दिन उनकी आत्महत्या की घटनाओं से समझी जा सकती है। स्वार्थी और कलुषित मनुष्यों का षड़यंत्रकारी तंत्र देखिए किसान को अन्नदाता कहकर भिखारी और क़र्ज़ न चुकाने वाला बेईमान बना दिया और महिलाओं को देवी बताकर उनकी इज़्ज़त लूट साक्ष्य मिटाने हेतु जलाने लगे।
गरारू घाट के एक आश्रम में पहुँचने पर एक अद्भुत स्वामी जी के दर्शन हुए। वे बंगाली स्वामी पहुँचते से ही बोले यहाँ जगह नहीं है, आप लोग चाय पीजिए और आगे मंदिर पर रुकने का इंतज़ाम कीजिए। हमने कहा “स्वामी जी यहाँ रुकते तो आपसे वेदांत ज्ञान लेते।” उन्होंने डाँटते हुए कहा वेदांत जानने के लिए एक-दो साल भी कम है फिर तुरंत पैंतरा बदल कर बोले “ब्रह्म क्या है, हम, तुम सबमे यहाँ तक कण-कण में ब्रह्म है, आपको जानकारी मिल गई न, अब आप स्वयं पढ़ो और जानो, आप आगे जाओ।” हमने कहा “स्वामी जी ज्ञान हेतु गुरु का माध्यम ज़रूरी है।” वे फुफकारते हुए बोले बाबा “लो चाय पीओ आगे बढ़ो।” बाद में अगले दिन उनके एक सेवक ने बताया कि बंगाली बाबा अपने व्यवहार के लिए दुखी हो रहे थे।
तक़रीबन एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर ऊपर पहुँचे वहाँ एक कथा वाचक का पंडाल लगा था उनके सेवक नरेश लोधी ने स्वागत किया और खुले में टेंट में सोने की जगह दे दी। रात में एक भद्र महिला द्वारा भेजे दूध में अविनाश भाई का पोहा शक्कर मिलाकर खाकर सोने की कोशिश की तब नर्मदा के बहाव की ध्वनि सुनाई दी, पूरे खिले चाँद की चटक चाँदनी में दूर से आती कलकल मद्धिम ध्वनि लोरी सी लग रही थी। सोने के पूर्व प्रयास भाई ने कविताएँ सुनाईं। दो-चार जुगलबंदी हमने भी बांचीं।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता जरा इतिहास को पढ़ लो !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १३ ☆
☆ जरा इतिहास को पढ़ लो !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काली टोपी लाल रूमाल…“।)
अभी अभी # १०६० ⇒ आलेख – काली टोपी लाल रूमाल श्री प्रदीप शर्मा
सन् १९५९ में एक फिल्म आई थी, काली टोपी लाल रूमाल, वैसे वह समय भी टोपी और रूमाल का ही था। महिलाएं तो ठीक, पुरुष भी खुले सिर नहीं घूमते थे। टोपी कहें या पगड़ी, असली इज्जत वही थी।
गांधीजी ने कभी टोपी नहीं पहनी, लेकिन गांधीवादी लोग सफेद टोपी पहनने लगे। नेहरू आधुनिक विचारों के होते हुए भी, टोपी पहनते थे। राजनीति में टोपी पहनी भी गई, जनता को पहनाई भी गई, और दूसरों की टोपी उछाली भी गई।।
वह समय था जब हर सज्जन और सभ्रांत पुरुष काली टोपी पहनता था। ग्रामीण अंचल में किसान पगड़ी बांधते थे, और पसीना पोंछने के लिए रूमाल नहीं, लाल गमछा रखते थे, कहीं कहीं यह अंगोछे की शक्ल का भी होता था।
हमारा विद्यालय तब एक तरह से सरस्वती का मंदिर ही था, बस उसका नाम गणेश विद्या मंदिर था। शहर की महाराष्ट्र साहित्य सभा उसका संचालन करती थी, और अधिकांश वरिष्ठ शिक्षकों का परिधान धोती, कुर्ता, कुर्ते पर खुले गले का कोट, काली टोपी और आंखों पर चश्मा ही होता था। वे तब के शिक्षा, संस्कार और नैतिकता के ब्रांड एम्बेसडर थे। उनका आचरण छात्रों के लिए अनुकरणीय होता था।।
वह समय था, जब घरों में, मोटी मोटी दीवारों में खूटियां हुआ करती थीं, जिन पर छाता, कुर्ता और टोपी टांगी जाती थी।
हम आज भले ही वाहन चलाते वक्त सुरक्षा हेतु हेलमेट ना पहनें, लोग घर से बाहर जाते समय सर पर टोपी लगाना और हाथ में छाता ले जाना नहीं भूलते थे।
जब परिवेश बदलता है तो परिधान भी बदलता है। सर की टोपी और पगड़ी आजकल गायब हो चुकी है, विदेशी परिवेश में धोती कुर्ते की जगह सूट बूट ने ले ली है और गले के रूमाल का स्थान टाई ने ले लिया है। पहले कैप आई और पश्चात् मंकी कैप।।
सर पर टोपी अथवा पगड़ी अनुशासन और अस्मिता का प्रतीक है। पुलिस, और फौज में आज भी वर्दी और कैप अनिवार्य है। पब्लिक स्कूलों में आज भी यूनिफॉर्म अनिवार्य है। बेचारा रूमाल तो आजकल शर्म के मारे छोटा होकर पर्स का नैपकिन हो गया है।
हमारे परिवार में पिताजी की आज एक ही तस्वीर उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने काली टोपी लगा रखी है।
क्या समय था, जब मांगलिक अवसरों पर की जाने वाली पुरुषों की कपड़ा रस्म में धोती कुर्ता, रूमाल अथवा अंगोछे के साथ टोपी भी रखी जाती थी।।
महिलाएं आज भी धार्मिक स्थलों में जाते वक्त सर पर पल्लू ले लेती हैं, कई पूजा स्थलों में पुरुष को भी सर ढंकना होता है, जेब का रूमाल तब बहुत काम आता है। लोग तो रूमाल रखकर, बस की सीट तक रोक लेते हैं। सर कहें अथवा मस्तक, यह अगर सदके में झुकता है तो गर्व से उठता भी है।
आज भले ही टोपी हमारे सर से गायब हो गई हो, रूमाल ने आज भी हमारा साथ नहीं छोड़ा। हमारी साख ही हमारी पगड़ी है। दूल्हा आज भी जीवन में एक बार ही सही, पगड़ी जरूर पहनता है। जो आज भी अपनी अस्मिता और गौरव को बनाए रख रहे हैं, उनके लिए टोपी और पगड़ी आभूषण है, सम्मान, सादगी और अभिमान का प्रतीक है।।
मनुष्य हा जिवंत प्राणी असला, तरी केवळ जैविक प्रक्रिया आणि प्रेरणांनी चालणारे यंत्र नाही. भूक लागली की अन्न घेणे, तहान लागली की पाणी पिणे, किंवा लैंगिक प्रेरणेने प्रेमसंबंध निर्माण करणे हे सर्व नैसर्गिक आहे, पण या कृतींमध्ये केवळ शारीरिक क्रिया असेल तर त्यात ‘मानवता’ नसते. आपण या कृती करतो, पण एकवेळ अशी येते की आपल्या मनात “का?” हा प्रश्न उभा राहतो. आपण का जगतो, का खातो, का पितो, का प्रेम करतो, का द्वेष करतो, हे प्रश्नच आपल्या माणूसपणाची सुरूवात असते. यंत्राला “का?” विचारता येत नाही; ते फक्त ‘कार्य’ करते. पण मानव विचार करतो. विचारच त्याला जैविकतेच्या पलीकडे घेऊन जातो. ‘का?’ हा प्रश्न म्हणजे सज्ञानतेचा प्रारंभ. एकदा हा प्रश्न पडला की सर्व अनुभवांवर एक नवा प्रकाश पडतो. भूक लागली म्हणून खाणे आणि पोषणासाठी खाणे यात फरक जाणवतो. प्रेम हे केवळ शारीरिक नसून भावनिक आणि बौद्धिकही आहे, हे कळते. प्राण्यात दोन लिंग का आहेत? हा प्रश्न जेव्हा पडतो, तेव्हा जैविक रचनेपलीकडे जाऊन प्रजोत्पादन, समाजरचना, आणि लैंगिकतेच्या नैतिक-मानसिक अर्थाचा शोध सुरू होतो. अशा वेळी आपण यंत्र नसतो, तर चेतन प्राणी बनतो.
मानवाचा विकास हा या ‘का?’ च्या शोधातच झाला आहे. आदिमानवाने आकाशातील वीज, पाऊस, आग, तारे, मृत्यू, जन्म या सगळ्यांविषयी स्वतःशीच का आणि कसे, असे प्रश्न विचारले आणि त्यातून वैज्ञानिक पद्धत जन्माला आली. विज्ञान म्हणजे प्रश्न विचारण्याची पद्धत. धर्म, परंपरा, आणि समाजरचना अनेकदा उत्तरं देतात, पण तिथे प्रश्न विचारायला, शंका घ्यायला, चिकित्सा करायला वाव नसतोच. त्या उलट विज्ञान प्रश्न विचारतं, शंका घेतं चिकित्सा करतं. कारण का? विचारण्यातच प्रगती आहे. आपण जेव्हा भौतिकतेच्या पलीकडे विचार करतो, तेव्हा आपल्याला मानवतेची खरी किल्ली सापडते. विज्ञान आपल्याला मानवतेकडे नेणारा मार्ग आहे. ते केवळ यंत्रे निर्माण करत नाही, तर आपल्या विचारांना सज्ञान बनवतं. विज्ञानामुळे आपण शरीर, मन आणि निसर्ग यांच्या परस्परसंबंधाचा अर्थ शोधतो. यंत्र म्हणून शरीराचं महत्त्व नाकारायचं नाही; शरीर म्हणजे आपल्या अनुभवांचं माध्यम आहे. पण शरीराच्या मर्यादेपलीकडे जाणारा विचार म्हणजेच माणूसपण. शरीराला भूक लागते, पण मेंदूला अर्थाची भूक असते. शरीर तहानेने पाणी मागतं, पण मन म्हणजे मेंदू ज्ञानाची तहान बाळगतं. शरीर लैंगिकतेने प्रेम व्यक्त करतं, पण विचारांच्या उंचीवर ते सर्जनशीलतेत आणि करुणेत रुपांतरित होतं.
यंत्राला आदेश दिले की ते चालतं; पण माणूस विचार करून स्वतःचे आदेश घडवतो आणि इतराने दिलेले आदेश पाळायचे की नाही हे तारतम्याने ठरवतो. हीच त्याची ओळख आहे. जर आपण विचार थांबवले, प्रश्न विचारणे थांबवले, तर आपण पुन्हा यंत्र होतो — समाज, धर्म, बाजार किंवा राजकारण यांच्या नियंत्रणाखाली चालणारे यंत्र. पण ‘का?’ विचारणारा माणूस मुक्त असतो. तो कोणत्याही धर्माचा अंधानुयायी राहत नाही, कोणत्याही जात-लिंग-धर्माविषयी द्वेष बाळगत नाही, कारण त्याला समजतं की द्वेषाचं मूळ अज्ञानात आहे. मला परधर्मीयांचा राग का येतो? असा प्रश्न पडतो, तेव्हा आपण आपल्यातील भीती, संस्कार, आणि इतिहासाकडे पाहू लागतो. त्या प्रक्रियेतून जेव्हा आपण बाहेर पडतो तेव्हा आपला मानवतेकडे प्रवास सुरू होतो. म्हणूनच ‘का?’ हा प्रश्न म्हणजेच आत्मजागृती. तो प्रश्न आपल्याला स्वार्थातून परमार्थाकडे, अंधश्रद्धेतून विवेकाकडे, आणि यंत्रमानवतेतून खऱ्या मानवतेकडे नेतो. विज्ञान म्हणजे या प्रवासाची दिशा दाखवणारा दीपस्तंभ आहे. विज्ञान सांगतं की निसर्गात घडणाऱ्या सर्व गोष्टींच्या मागे काही कारण असतं, प्रत्येक क्रियेला परिणाम असतो, आणि सर्व विश्व एकमेकांशी जोडलेलं आहे. म्हणूनच विज्ञान आपल्याला अंधानुकरणापासून वाचवतं, आणि प्रश्न विचारायला शिकवतं.
मानवाचा उत्क्रांती प्रवास हा फक्त शरीराच्याच नव्हे तर विचारांच्याही उत्क्रांतीचा प्रवास आहे. एकेकाळी आपण फक्त अन्नासाठी जगत होतो, पण आज आपण अर्थासाठी जगतो. या प्रवासात ‘का?’ हा प्रश्नच आपल्याला जगण्याची चालना देतो. शरीर मर्यादित आहे, पण विचार अमर्याद आहेत. शरीर मरण पावते, पण विचार जिवंत राहतात. म्हणूनच विचारविश्वात रममाण होण्यात खरी मजा आहे. तिथे आनंद भौतिक सुखांपेक्षा गहिरा असतो, कारण तो ज्ञानातून, सत्याच्या शोधातून मिळतो. विज्ञानसाक्षरता म्हणजे केवळ प्रयोगशाळेतील प्रयोग नव्हे, तर जीवनाकडे विवेकाने पाहण्याची वृत्ती. ‘का?’ विचारणं म्हणजेच विज्ञानसाक्षरतेचा पाया आहे. प्रत्येक प्रश्न आपल्याला नव्या उत्तराकडे, नव्या शोधाकडे घेऊन जातो. आणि या नव्या शोधातून पुन्हा नवे प्रश्न निर्माण होतात आणि पुन्हा नव्या शोधाचा शोध आपण घेऊ लागतो. अशाप्रकारे सततच्या शोधक वृत्तीमुळे आपण यंत्रापेक्षा श्रेष्ठ ठरतो. कारण आपण फक्त जगत नाही, तर जगण्याचा अर्थ शोधतो असतो. माणूस म्हणून आपली खरी ओळख विचार करणारा प्राणी अशीच आहे. आपण खाणं, पिणं, प्रजनन करणं या क्रिया केवळ शरीर सुखासाठी करतो; पण विचार करणे, जाण येणे, प्रश्न विचारणे, हे मानव प्रजातीच्या उन्नतीसाठी करतो. शरीर जगण्यासाठी आहे, पण विचार हे जीवनाचं कारण आहेत. म्हणूनच ‘का?’ हा प्रश्न पडणं म्हणजे प्राण्यापासून मानवाकडे मारलेली उंच उडी आहे. विज्ञान हा त्या उडीचा धागा आहे; जो आपल्याला ज्ञान, करुणा, आणि मानवतेकडे नेतो. शरीर, यंत्र, जग ही सर्व साधनं आहेत; पण विचार हेच अंतिम साध्य आहे. त्या विचारविश्वात रममाण झाल्यावरच आपण खऱ्या अर्थाने ‘माणूस’ होतो.
थोडक्यात, माणसाचं शरीर जैविक यंत्र आहे. भूक लागली की खातो, तहान लागली की पाणी पितो, लैंगिक प्रेरणा आली प्रेम करतो. सगळं आयुष्य असेच गेलं तरी आपल्याला काही चुकीचे वाटत नाही. पण जर तुम्हाला ‘का?’ हा प्रश्न पडत असेल तर हे सर्व काही काळाने मिळमिळीत वाटायला लागते. आपण का खातो, का पितो, आपल्याला लैंगिक भूक का लागते? हे प्रश्न पडले तर आपण प्राणी राहात नाही; आपण माणूस होतो. तसेच परधर्मीय, पारलिंगी माणसांविषयी आपल्याला राग का? येतो हे कळल्यावर आपण माणूस होतो. कारण ‘का?’ हा प्रश्न पडल्यावर आपण प्राण्यापलीकडे जातो. माणसाला माणूसपण देणारा वैज्ञानिक दृष्टिकोन हा आपल्याला मानवतेची किल्ली उघडून देणारा मंत्र आहे. प्राणी वाईट नाहीत, शारीरिक भूक भागवणे वाईट नाही; पण विज्ञानामुळे सज्ञान झाल्यावर, विज्ञानसाक्षर झाल्यावर प्राणी अवस्थेपलीकडे, शारीरिक भुकांच्या पलीकडे जात विचारविश्वात रममाण होण्यातच खरी मजा आहे… खरे माणूसपण आहे.
तुम्हाला माहीत नाहीये बहुतेक. रोहन त्यांचा एकुलता एक. नूमवी, एस. पी. आणि सोओईपी. आता तिकडे असतो. सातासमुद्रापार.
इंजिनीअरिंगचं शेवटचं वर्ष. घरात आनंदी आनंद. कॅम्पसमधनं सिलेक्ट झालेला. एका मोठ्या MNC कंपनीत. बर्याचदा त्याच्या मित्रमैत्रिणींचा घोळका यायचा घरी. त्यात तीही असायची म्हणे. तेव्हा, असं काही असेल…? वाटलंच नव्हतं.
काॅलेज संपलं. एक वर्ष दिल्लीत जाॅब. तिथं सुद्धा ती होतीच त्याच्याबरोबर.
एक दिवस अचानक. दोघं इथं. पुण्यात. आपल्या घरी. “मला हिच्याशी लग्न करायचंय… ” दारातूनच रोहननं बाॅम्ब टाकला.
नीट निरखून बघितली दोघांनी तिला. काळी सावळीच. हुश्शार.. असेल कदाचित. अखंड बडबड. आल्या आल्या स्वतःची जुजबी ओळख. घरभर हुंदडून आली. मोकळी ढाकळी. अल्लडच वाटत होती अजून. थोडीशी टाॅमीश. मराठी सुद्धा धड येत नव्हतं तिला. दुसऱ्या राज्यातली.
गॅलरीत गेली. खाली बिल्डींगमधली पोरं क्रिकेट खेळत होती. सहावी सातवीतली असतील. “यार रोहन, बहोत दिन हुऐ क्रिकट खेले हुऐ. तुम लगे रहो.. मै आती हूँ एक सेंच्युरी मार के.. ” जाता जाता तिनं, रोहनच्या पाठीत दणकन् धपाटा घातला. गुऽऽल. धाडधाड जिना ऊतरून खाली.
महेश -लीनानं, रोहनकडे आख्खा क्वेश्चनपेपर दिला. रोहननं नुसतेच खांदे उडवले. अर्ध्या तासानं ती घामाघूम होवून परत. “रोहन, मजा आया. ”
हात पाय धुवून हाॅलमधे. फतकल मारून लीनाशेजारी बसली. “आंटी, आप वो फेवरीट मराठी डिश खिलाओ ना! पोहा… बहोत बहोत भूख लगी है. “
लीना जीवावर आल्यासारखी उठली.
तिचा मोर्चा महेशकडे. “पाॅप्स, निकालो आप का व्हायोलीन. बजावो कुछ गजल वजल. रोहन ने मुझे बोला है. आप बहोत अच्छा बजा लेते हो. “
महेशनं कपाटातून व्हायोलीन काढलं. पण आज सूर लागलाच नाही. काहीतरी बिनसलेलं. नाही जमायचं.
हे प्रकरण घराला जड जाईल. ती अजूनही गॅलरीत. गल्ली क्रिकेटमधे हरवलेली. आतल्या खोलीत तिघांच्या वाटाघाटी. रोहन काकुळतीला आलेला. फिस्कटल्या… तासाभराच्या फ्लाईटनं दोघं दिल्ली.
नंतर…? काही नाही. दोघांनी रजिस्टर्ड मॅरेज केलं. आता तिकडे असतात म्हणे. फ्लोरीडाला. तिच्या घरीही पसंत नव्हतं म्हणे. दोन घरं तोडली. लग्नानं दोन घरं जोडली जातात म्हणे? काहीही..
महेश आणि लीना. दोघंच दोघं पुण्यात. ललित मात्र आठ पंधरा दिवसातून, चक्कर मारतोच मारतो. त्याची बायकोही साधीच. पियू… त्याची लेक. नातवंडी प्रेमाचा आठवडी बाजार. महेश आणि लीना. तिच्यावरच उधळतात आपला.. आजोळी प्रेमाचा न संपलेला स्टाॅक.
ललित खूप मागे लागलेला. म्हणून ही दोघं इथं आलेली. आसूद बागेत. दाबक्यांच्या घरी. होम स्टे.
‘गारंबीचा बापू’ महेशचा फेवरीट. रोज सकाळी लक्ष्मी केशवाचं दर्शन. सुपारीच्या बागा. पळतं नागमोडी पाणी. तोच साकव. विठोबा शोधणारी महेशची नजर. संध्याकाळी मुरूडच्या देवीचं दर्शन. अन् मावळतीला समुद्र दर्शन. दोन दिवस मजेत गेले. राहूयात, अजून चार दिवस इथेच. लीनाही खूष.
आजची प्रसन्न सकाळ. समोरच्या खोलीत हालचाल. एक पंजाबी कपल. महेश आणि लीनाच्याच वयाचे. गुडमाॅर्नींगचे सोपस्कार झाले. बोलका स्वभाव. पंजाबी माणसं, जरा जास्तच मोकळीढाकळी. सहज मैत्र जुळलं.
ती दोघंही आली. डोंगर चढून चौघं मंदिरात. लक्ष्मी केशव प्रसन्न. अखंड गप्पा. ती दोघं पहिल्यांदाच कोकणात आलेली. इथला नजारा पाहून, वेड लागलेलं. जेवायला खाली परत. बिरड्याची उसळ. उकडीचे मोदक. साजूक तुपाच्या बरसत्या धारा. दाबक्यांचा पाहुणचार जबराटच. चौघं जण खूष.
सरदारजी जालंधरचे होते म्हणे. रिटायर्ड पुलिस अफसर. पोलीस लाईफमधले किस्से, रंगवून सांगायचे. मजा यायची ऐकायला. पंजाबी काकूही तेवढ्याच बोलक्या. त्या दोघांशी बोलताना महेश लीनाची फेफे. जीवघेणं पुणेरी हिंदी. भाषेवाचून फारसं काही अडायचं नाही.
दुपारची वेळ. पडवीतल्या झोपाळ्यावर गप्पा रंगलेल्या. अचानक सरदारजी ईमोशनल. एकुलत्या एका लेकीची आठवण. तो जावई म्हणून पसंत नव्हताच त्यांना. तिनं पळून जावून केलेलं लग्न. निघालेल्या खपल्या. अश्रूंची साथ.
महेशनं सरदारजींच्या खांद्यावर हलकेच थोपटलं. ‘ट्रॅव्हलींग इन सेम बोट. ऑल ऑफ अस… ‘
दुःख हलकं झालेलं. मनं मोकळी झालेली. तरीही वाटून गेलंच. एवढं ताणायला नको होतं… एका भेटीत माणूस जोखायचा नसतो कधी. जान दो.
संध्याकाळी चौघं जणं मुरूडच्या बीचवर निघालेली. एकदम दाबक्यांच्या घरी किलबिलाट. दोन गोड पऱ्या. मोठी दहा वर्षाची. धाकटी सहाची. जस्सी आणि सुमी.
“माझ्या नाती. मोठ्या मुलाच्या. तो तिकडे अमेरिकेत असतो. मुलगा सून अजून मुंबईलाच थांबलेत. त्यांचा काका घेवून आलाय दोघींना. “
एल्डर्स क्लब खुश. पुणे जालंदर एक्सप्रेस सुसाट. बीचवर यायला पऱ्या एका पायावर तयार. दोघींना इंग्लिश बोलता यायचं. मोडकं तोडकं हिंदी अन् मराठी समजायचं. पण बोलता यायचं नाही.
सहा जणांची टीम समुद्रावर. पिकली पाने आणि कोवळी मने. वाळूत किल्ले बांधून झाले. पकडापकडी खेळून झाली. पोएम्स म्हणून झाल्या. बनाना बोट रायडींग झालं. मज्जा आ गया.
दिवेलागणीला घरी परत. पत्ते कुटले. घोस्ट स्टोरीज सेशन झालं. दोन पोरी, या नव्या आजीआजोबावर जाम खूष. एक एक पोर वाटून घेतली. आजी आजोबांच्या कुशीत स्वप्नाळू झोप. दुसऱ्या दिवशी एक्सेंज.
महेश लीना. मिस्टर अँन्ड मिसेस कौर. नातवंडांची भूक संपवण्याचा दुबळा प्रयत्न. चौघांचा मुक्काम अजून दोन दिवस लांबला. जस्सी आणि सुमी, दाबकेआजोंबांना विसरलेल्या.
शेवटी जायचा दिवस उगवला. चौघं जण निघाले. एकाच गाडीतून चिपळूणपर्यंत जाणार होते. जड बॅगा. जड मनं. पोरींचा आसूभरा सेंडऑफ. गाडीच्या खिडकीतून मागे बघवेना.
.. सरप्राईज. गाडी जागेवरच थांबलेली. पुढं जाईचना. पोरींनी चौघांना खेचून बाहेर काढलं. गाडीबाहेर रोहन आणि निहारिका उभे.
दाबक्यांचा गौप्यस्फोट. “गले लग जाओ. तुमच्याच नाती आहेत त्या. “
यकीन नही होता. झाले मोकळे आकाश. सगळ्या भिंती जमीनदोस्त. बस प्यार ही प्यार… रोहन, निहारिका, जसविंदर आणि सुस्मिता. चौघांचं चौघांना पायलागो.
एकदम मुरूडच्या समुद्राच्या पाण्याची लेवल वाढलेली. खारं पाणी गोड झालेलं.
… अचानक ललितची एन्ट्री. हा सगळा ललितचा प्लॅन. रोहन आणि निहारिका कायमचे परत येतायेत भारतात. सगळ्यांनी एकत्र रहायचं. मिस्टर आणि मिसेस कौर. तेही लवकरच पुण्यात सेटल होतील. मधेच तुटलेली ती सिरीयल. या गोजिरवाण्या घरात… आज पुन्हा सुरू झालेली… न संपण्यासाठी.
आषाढ मास सुरू झाला, की वातावरणात एक वेगळाच ओलसरपणा आणि आल्हाददायक गारवा पसरायचा. आभाळ भरून यायचं आणि त्या ढगांच्या गडगडाटात पंढरीच्या वाटेवर चालणाऱ्या माऊलींच्या टाळ-मृदंगाचा नाद ऐकू येतोय असा भास व्हायचा. आमचं कुटुंब मध्यमवर्गीय, त्यामुळे दरवर्षी आषाढीला पंढरपूरला जाणं काही शक्य नसायचं. पण पंढरपूरचं ते अथांग पावित्र्य, तो विठ्ठलमय आनंद दरवर्षी आमच्या घराच्या अगदी लहानशा स्वयंपाकघरात आणि देवघरात अलगद उतरून यायचा.
आमच्यासाठी आषाढी एकादशी म्हणजे केवळ एक उपवास नव्हता, तो तर आनंदाचा एक कौटुंबिक ‘चंगल’ असायचा. त्या एका दिवसात आईच्या हाताची चव, आजीच्या शब्दांतली निस्सीम भक्ती आणि संपूर्ण घरभर पसरलेला विठोबाचा अदृश्य पण जाणवणारा वास… हे सगळं असं काही एकवटायचं, की घरचंच पंढरपूर व्हायचं.
“उद्या कोण कोण उपवास करणार रे? “
एकादशीच्या आदल्या संध्याकाळी स्वयंपाकघरातून आईचा हा नेहमीचा प्रश्न यायचा. आणि आम्ही सर्व भावंडं खेळता खेळता, अभ्यासाच्या वह्या मिटता मिटता एका सुरात ओरडायचो— “मी! “, “मी करणार! “, “मी पण! “
कोणीही नाही म्हणायचा प्रश्नच नसायचा. कारण आमच्या बालमनाला माहीत होतं, उपवास म्हणजे उपाशी राहणं किंवा काहीतरी सोडून देणं नव्हतं; तर उपवास म्हणजे वर्षातून एकदा मिळणारे काहीतरी अत्यंत स्वादिष्ट, खमंग आणि जिभेवर रेंगाळणारे पदार्थ खाण्याची हक्काची पर्वणी!
त्यानंतर स्वयंपाकघरात आई आणि आजीची एक सुरेल, लयबद्ध जुगलबंदी सुरू व्हायची. एकादशीच्या मेजवानीची यादी ठरवली जायची. वरीचे तांदूळ, साबुदाणा, शिंगाड्याचं पीठ, राजगिरा, लाल माती लागलेले रताळे, बटाटे, सैंधव मीठ… आई एकेक नाव घ्यायची आणि आजी तिच्या अनुभवाच्या पोतडीतून त्यात भर घालायची. यादी लांबत जायची, पण दोघींच्याही चेहऱ्यावर थकव्याचा एकही ओरखडा नसायचा. उलट एक वेगळाच उत्साह दिसायचा.
तेव्हा आजच्यासारखे मिक्सर किंवा फूड प्रोसेसर नव्हते. त्यामुळे भाजलेल्या शेंगदाण्यांची टरफलं काढणं आणि ते हाताने फिरवायच्या लोखंडी मशीनमध्ये बारीक करणं हे एक मोठं काम असायचं. आई शेगडीवर शेंगदाणे भाजायला लागली, की संपूर्ण घरात त्याचा खमंग वास सुटायचा. आमचं मुख्य काम काय? तर आईची नजर चुकवून त्या गरम-गरम, खरपूस भाजलेल्या शेंगदाण्यांची मूठभर चोरी करायची आणि तोंडात टाकायची! आईला सगळं समजायचं, ती तिरप्या नजरेने बघून गोड हसायची, पण कधी रागवायची नाही.
कोपऱ्यात ठेवलेल्या पितळेच्या कढईत साजूक तूप वितळत असायचं. आईने तूप कढवून बरणी काठोकाठ भरून ठेवलेली असायची. रात्री झोपण्यापूर्वी आई एका मोठ्या पातेल्यात साबुदाणा भिजत घालायची. कितीही कामं असली, तरी साबुदाणा भिजवायला ती कधीच विसरली नाही. आम्हाला वाटायचं ती आमच्यासाठी हे करतेय, पण खरं तर ती तिच्या त्या सावळ्या “विठोबासाठी” करत असायची.
एकादशीची सकाळ उजाडायची तीच मुळी एका वेगळ्या चैतन्याने. घरात रेडिओवर भीमसेन जोशी किंवा प्रल्हाद शिंदे यांचे अभंग वाजत असायचे. स्वयंपाकघर आणि देवघर यांची विभागणी करणारी एक विटांची भिंत होती, पण मनातील ती सीमारेषा केव्हाच मिटून गेलेली असायची.
एकिकडे देवघरात आजीने अंघोळ करून, सुती साडी नेसून पूजेची तयारी सुरू केलेली असायची. ताजी फुलं, सुवासिक उदबत्ती, कापूर, चंदनाचा गंध आणि बेलपान विठ्ठलाच्या फोटोसमोर वाहिली जायची. आजी डोळे मिटून, अगदी संथ आणि तृप्त स्वरात “पुंडलीक वरदा हरी विठ्ठल, श्री ज्ञानदेव तुकाराम, पंढरीनाथ महाराज की जय… ” अशी साद घालायची.
ठीक त्याच वेळी, भिंतीच्या पलीकडे स्वयंपाकघरात आईच्या हातातून लोखंडी कढईत जिरे आणि हिरव्या मिरचीची तडतडणारी खमंग फोडणी पडायची! तो फोडणीचा पहिला तवंग आणि त्याचा तिखट-गोड सुवास जेव्हा घरभर पसरायचा, तेव्हा वाटायचं की भक्तीचा पहिला नैवेद्य विठ्ठलाला पोहोचला आहे.
सकाळचा बेत ठरलेला असायचा— मऊसुत, मोकळी-सळसळीत झालेली दाण्याचे कूट लावलेली साबुदाणा खिचडी, सोबत यायची आंबट-तिखट हिरवी चटणी, आणि तोंडाची चव वाढवणारा शिंगाड्याचा मऊ शिजलेला शिरा. त्या शिऱ्यामध्ये वाहणारं साजूक तूप आणि आईच्या मायेचा सुवास दोन्ही इतके एकजीव झालेले असायचे, की पहला घास तोंडात टाकताच स्वर्गीय सुखाचा अनुभव यायचा.
सकाळची नहारी झाली की दुपारी पुन्हा स्वयंपाकघराची चाकं फिरू लागायची. दुपारचा बेत म्हणजे साक्षात अन्नपूर्णा अवतरल्यासारखा असायचा. मऊ शिजलेली भगर, त्यावर ओतण्यासाठी चिंच, गूळ आणि शेंगदाण्याचा रस्सा घालून उकळलेली आंबट-गोड आमटी. सोबतीला लालसर रताळ्याच्या साखरेत घोळवलेल्या मऊ फोडी, घरचं उपवासाचे लिंबाचे लोणचं आणि उन्हाळ्यात वाळवून ठेवलेले साबुदाणा-बटाट्याचे पापड.
त्या काळात बाजारातून रेडीमेड आणायची पद्धत नव्हती. कोणतीही वस्तू विकतची नसायची; जे काही ताटात यायचं ते आईने स्वतःच्या हाताने, घामाच्या थेंबांनी आणि प्रेमाने तयार केलेलं असायचं. आणि जे घरचं असतं, तेच खऱ्या अर्थाने देवाचं असतं, हा आजीचा नियम होता.
दुपारच्या जेवणाची पंगत बसायची. आम्ही मुलं पोटभर जेवायचो. दिवसभरात घरच्या वातावरणात एक शांत, सात्विक भक्ती न्हाऊन निघालेली दिसायची. जेवणं आटोपल्यावर, सगळी भांडी घासून आई जेव्हा स्वयंपाकघराच्या उंबरठ्यावर थकून बसायची, तेव्हा तिच्या कपाळावर घामाचे थेंब असायचे. ती आजीकडे किंवा आमच्याकडे पाहून हळूच विचारायची— “जेवण कसं झालं? आपला विठोबा खूश झाला असेल ना गं आज? “
तिचा तो निष्पाप, भाविक चेहरा पाहून मला आतून सांगावसं वाटायचं— “आई, विठ्ठलाचं माहित नाही, पण तुझं हे अथांग कष्ट आणि प्रेम पाहून साक्षात विठोबा देवघरातून बाहेर येऊन तुझ्यासमोर हात जोडून उभा राहिला असेल गं! “
संध्याकाल झाली की दिवेलागणीची वेळ व्हायची. तुळशीसमोर आणि देवघरात दिवा लावला जायचा. त्या काळात आमच्याकडे टीव्ही नव्हता, हातात स्क्रीन बिलगलेले मोबाईल नव्हते. पण तरीही घरात अजिबात कंटाळा नसायचा. कारण विठोबा आणि रुक्मिणीचं अस्तित्व घरातल्या प्रत्येक कोपऱ्यात, प्रत्येक नात्यात जाणवत होतं.
आजी संध्याकाळी तिचा उपवास सोडताना किंवा रात्रीच्या वेळी फक्त एकच ठराविक जिन्नस घ्यायची— राजगिऱ्याच्या पांढऱ्याशुभ्र लाह्या, एक केळ किंवा सफरचंद आणि वाटीभर दूध. ती नेहमी एक मोलाची गोष्ट सांगायची, “बाळांनो, आपल्या या धावपळीच्या, चपळ आयुष्यात थोडा संयम, थोडी शांतता हवीच. विठ्ठलाला अवाजवी नैवेद्य नको असतो, त्याला मनाचा साधेपणा हवा असतो. “
पण आई रात्री पुन्हा स्वयंपाकघरात हजर व्हायची. रात्रीच्या वेळी आम्हा मुलांसाठी ती उपवासाची खमंग थालीपीठे भाजायला घ्यायची. शेगडीच्या उष्णतेने तिचा चेहरा लाल बुंद व्हायचा. डाव्या हाताने कपाळावरचा घाम पुसत, उजव्या हाताने थालीपीठावर तूप सोडणं तिचं थांबायचं नाही.
आम्हा सगळ्यांना पाटावर बसवून ते गरमागरम, खरपूस भाजलेलं थालीपीठ, त्यावर घरात साठवलेल्या दुधाच्या सायीचं काढलेलं पांढरंशुभ्र लोणी आणि बाजूला आंबट-तिखट लोणचं… बास! त्या जेवणात जे समाधान असायचं, ते जगातल्या कुठल्याही मोठ्या हॉटेलच्या पक्वान्नात नसेल. ते समाधान फक्त चवीमुळे नव्हतं, तर त्या चवीमागे असलेल्या आईच्या अखंड, निरपेक्ष श्रमांमुळे होतं.
दुसऱ्या दिवशी द्वादशीला आमचा उपवास सुटायचा, आम्ही पुन्हा नेहमीच्या जेवणावर यायचो. आमची एकादशी संपायची, पण मला वाटतं आईची एकादशी कधीच संपायची नाही. तिचा विठोबा फक्त भिंतीवरच्या चौकटीतल्या फोटोत नसायचा; तो तिच्या प्रत्येक हालचालीत, मुलांसाठी केलेल्या प्रत्येक कामात, आणि तिच्या सोशिकतेत असायचा. आई म्हणजे माझ्या घराची साक्षात रुक्माई, तिच्या हातात असतो विठोबाचा पवित्र नैवेद्य, तिच्या काळजात असतो अखंड भक्तीचा गाभा, आणि तिच्याच पायाशी असतो माझा पंढरपूरचा राया!
आता खूप वर्षं उलटून गेली. काळाचं चाक वेगाने फिरलं. घरात आधुनिकता आली. हाताने शेंगदाणे कुटायची गरज उरली नाही, कारण मिक्सर आले. रेशनच्या दुकानाची किंवा साहित्याची चिंता नाही, सुपरमार्केट्स आली. उपवासाचे पदार्थ बनवायचे कष्ट नको म्हणून बाजारात विकतचे पापड, रेडीमेड थालीपीठ भाजणी आणि थेट घरपोच मिळणारे डबे आले. सगळं काही अगदी सोपं, सुटसुटीत आणि वेळेची बचत करणारं झालं.
पण… पण त्या आषाढी एकादशीचा तो जुना, मनाला तृप्त करणारा स्वाद मात्र पुन्हा कधीच नाही आला. त्या पदार्थांमध्ये सगळं काही योग्य प्रमाणात असतं, पण आईच्या हाताची ती जादू आणि आजीच्या प्रार्थनेची ती उब त्यात नसते.
म्हणूनच, आजही जेव्हा आषाढी एकादशी जवळ येते, मी भूतकाळाच्या आठवणींमधून बाहेर पडते आणि मेरे स्वयंपाकघरात आईसारखीच खंबीरपणे उभी राहते. माझ्या मुलांना जवळ बोलावून त्याच मायेने विचारते— “उद्या कोण उपवास करणार रे? ” ते मुलं आपापल्या मोबाईलवरून मान वर करत नाहीत, कदाचित त्यांना त्याचं महत्त्व नसेल, पण तरीही मी न हार मानता आईसारखीच तयारी करायला घेते. मी आज आईची जागा घेतली आहे खरी, संसार सांभाळतेय, पण तिच्यासारखं विशाल, निखळ प्रेम आणि ती भक्ती मी कुठून आणू? हा प्रश्न मला नेहमी सतावतो.
कधी कधी डोळे मिटले की असं वाटतं, पंढरपूरच्या विठ्ठल मंदिरात लाखो वारकऱ्यांची माऊली उभी आहे, विठोबा कटेवर हात ठेवून रांगेत उभ्या असलेल्या भक्तांची वाट पाहतोय… पण मी त्या रांगेत नसून, खूप दूर एका कोपऱ्यात, माझ्या आईच्या आठवणींच्या पंक्तीच्या शेवटी बसलेली आहे, तिच्या आठवणीत पूर्णपणे न्हाऊन निघालेली आहे.
तेव्हा मला मनोमन जाणवतं की, माझा विठोबा फक्त दगडी मंदिरात किंवा गर्दीत नाही; तर तो माझ्या आईच्या कष्ट उपसणाऱ्या हातांमध्ये, तिने दिलेल्या पांढऱ्याशुभ्र लाह्या आणि लोण्यामध्ये, आणि उपवासाच्या दिवशी तिच्या चेहऱ्यावर दिसणाऱ्या त्या शांत, तृप्त हसण्यामध्येच विसावलेला आहे. “जिथे भाव, तिथे देव. ” आषाढी एकादशी साजरी करणं म्हणजे केवळ उपवास करणं किंवा कष्टाची वारी करून पंढरपूर गाठणं नव्हे— तर आपल्याच घरात वर्षानुवर्षे आपल्यासाठी झटणाऱ्या विठोबाला आणि रुक्मिणीला ओळखणं होय. त्या माऊली म्हणजेच आपली “आई” आणि “आजी”— ज्यांनी पिढ्यानपिढ्या आपल्या संस्कृतीचं, प्रेमाचं हे चैतन्य जपलं, आणि आपल्या मनामनात भक्तीची आषाढी कायमची रुजवली.