हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ – नई दिशा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा नई दिशा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆

🌻लघु कथा🌻 नई दिशा 👩‍🍼

मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।

मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।

हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।

सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८८ – देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।

दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।

होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।

व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।

प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।

फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।

आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।

अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।

यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२८ – बोनस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆ चुभते तीर # १२८ – व्यंग्य – बोनस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास की कंपनी ‘ग्लोबल सॉल्यूशंस’ में दिवाली का बोनस सिर्फ़ एक आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि कर्मचारियों की योग्यता मापने का सबसे बड़ा पैमाना थी। दफ़्तर में यह फुसफुसाहट थी कि इस बार कंपनी का मुनाफ़ा दोगुना हुआ है, इसलिए सीनियर मैनेजर वर्मा जी सब कर्मचारियों को भारी-भरकम बोनस का लिफ़ाफ़ा थमाने वाले हैं। लेकिन एक पेंच था, लिफ़ाफ़ा देने का तरीका हमेशा की तरह बहुत ही गुप्त रखा गया था।

विकास पिछले तीन महीनों से जी तोड़ मेहनत कर रहा था। रात-रात भर जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करना, चाय की चुस्कियों के साथ बॉस के बेतुके चुटकुलों पर सबसे तेज़ हंसना और हर मीटिंग में सबसे आगे खड़े रहना, उसने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसके सहकर्मी अमित का मानना था कि काम से ज़्यादा बॉस का मूड मायने रखता है। अमित दिन भर अपनी मेज़ पर बैठा सोशल मीडिया स्क्रॉल करता रहता था, लेकिन जब भी बॉस पास से गुजरते, वह स्क्रीन पर किसी गंभीर एक्सेल शीट को खोलकर मुंह ऐसा बना लेता जैसे देश की आर्थिक नीति वही तय कर रहा हो।

बोनस वितरण का दिन आया। कॉन्फ्रेंस रूम का दरवाज़ा बंद था। बाहर लंबी कतार लगी थी। कर्मचारी एक-एक करके अंदर जाते और बाहर निकलते समय चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान या गहरी खामोशी होती। कोई किसी को यह बताने को तैयार नहीं था कि अंदर क्या मिला। जब विकास की बारी आई, तो उसके दिल की धड़कन किसी पुराने इंजन की तरह तेज़ चलने लगी।

कमरे के अंदर वर्मा जी एक बड़ी सी लकड़ी की मेज़ के पीछे बैठे थे। मेज़ पर दो अलग-अलग रंगों के लिफ़ाफ़े रखे थे, एक चमकीला सुनहरे रंग का और दूसरा साधारण सफ़ेद। सुनहरे लिफ़ाफ़े का आकार सफ़ेद वाले से दुगना था। वर्मा जी ने विकास की तरफ देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “विकास, तुमने इस साल काम तो बहुत किया, लेकिन हमारी नीति के अनुसार तुम्हें इन दो लिफ़ाफ़ों में से किसी एक का चुनाव करना होगा। एक में नकद बोनस है और दूसरे में कंपनी के शेयर के साथ एक विशेष सम्मान पत्र।”

विकास धर्मसंकट में पड़ गया। सुनहरे लिफ़ाफ़े में ज़रूर भारी नकद राशि होगी, जबकि सफ़ेद लिफ़ाफ़ा साधारण लग रहा था। अमित ने बाहर निकलते समय सफ़ेद लिफ़ाफ़ा ही पकड़ा हुआ था और उसकी आंखों में चमक थी। विकास ने जोखिम लेने का फ़ैसला किया और भारी लगने वाले सुनहरे लिफ़ाफ़े पर उंगली रख दी।

वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए सुनहरा लिफ़ाफ़ा विकास को सौंप दिया। विकास ने उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर नकद पैसों की जगह ‘सर्वश्रेष्ठ धैर्यवान कर्मचारी’ का एक प्लास्टिक का मेडल और एक कूपन निकला, जिस पर लिखा था ‘अगले तीन महीने तक मुफ़्त ओवरटाइम चाय’।

विकास की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत पूछा, “सर, और सफ़ेद लिफ़ाफ़े में क्या था?”

वर्मा जी ने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खोलकर दिखाया, उसमें पचास हज़ार रुपये नकद और एक हफ्ते की सशुल्क छुट्टी का पत्र था। वर्मा जी बोले, “कंपनी ने इस बार चालाकी की परीक्षा ली थी। जो इंसान सिर्फ चमक-धमक देखकर फैसला लेता है, वह बोनस नहीं, सिर्फ मेडल का हकदार होता है।”

तभी कॉन्फ्रेंस रूम का पर्दा हटा और पूरी टीम ने ज़ोरदार तालियां बजाना शुरू कर दिया। विकास ने अपना प्लास्टिक का मेडल गले में डाला और मुस्कुराते हुए कहा, “सर, कम से कम तीन महीने चाय के पैसे तो बचेंगे!” पूरा कमरा फिर से ठहाकों और तालियों से गूंज उठा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३७ ☆ भावनेचा कोपरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३७ ?

☆ भावनेचा कोपरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

चंद्र होता सोबतीला लाजरा

साथ त्याला धुंद देतो मोगरा

*

तार होती वादकाने छेडली

स्पर्श होता देह झाला बावरा

*

पावसाची वाजता ही पावले

मी मनाचा मोर पाही नाचरा

*

शांत का ही होत नाही वादळे

ती म्हणाली या मनाला सावरा

*

ओठ व्हावे का तिचेही तांबडे

मी विड्याचा चावताना तोबरा

*

तृप्त झालो एवढा होतो तरी

एक कोरा भावनेचा कोपरा

*

चंद्र आहे रात्र सारी जागतो

ही सकाळी झोप येते पामरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ बरसात… ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ बरसात ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

क्षितिजकरांनी शिंपित जीवन, गगन धरेवर झुकले रे

किती दिसांनी आभाळाला, फुटला ऐसा पाझर रे! ..

*

लोट धुळीचे आले उडवित, घोंघावत वादळवारे

बघता बघता होय नभांगण, काजळकाळे सारे रे

 वीजशलाका अजस्र कडकड, लखलख उजळत अंबर रे!

*

गगनघोष तो कृष्णघनांचा, दुमदुमतो दाहि दिशांना

पुण्यात्म्याच्या कंठामधली, दिव्यभव्यचि जणु प्रार्थना

 जीवनगाणे जयनादाचे, चराचरातुन झंकृत रे!

*

मुकुट धुक्याचे लेवुन सजली, उन्नत पर्वत शिखरे ती

दरीदरीतुन तुषार उडवित, निर्झर सारे झुळझुळती

 रुजला अंकुर नवसृजनाचा, उरी धरेच्या गंधित रे!

*

तुडुंब ओहळ, तुडुंब शेते, तुडुंब भरली तळी तळी

भरुन दूथडी नद्या वाहती, दिशान्त बुडले सर्व जळी

 येत दर्पणी जलाशयाच्या, इंद्रधनू सतरंगी रे!

*

सुदुर हासती प्रसन्न हिरवी, चिंब भिजूनी वने वने

प्राशून अमृत धारांमधले, झाली हिरवी रणे रणे

 अभिषेकामधि मम प्राणांचे, गोकुळ अवघे न्हाले रे!

 *

 (वृत्त : हरिभगिनी)

 (माझ्या ‘ऐलपैल’या कवितासंग्रहातून)

© श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ ‘अलक आणि अलका’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

🌸 विविधा 🌸

☆ ‘अलक आणि अलका’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे

स्पष्टिकरण:

अलकम्हणजे अति लघु कथा (Terribly Tiny Tale)

अलकाम्हणजे अति लघु काव्य (Terribly Tiny Poetry)

**

सध्या ‘अलक’ या नावाचा एक अति लघु कथा प्रकार मराठी भाषेत तुरळकपणे दिसू लागलाय खरा, पण या वाङमय प्रकाराला कोणाचीही, कुठलीही अधिकृत मान्यता नाही. रसिक वाचकांकडूनही त्याला फारशी दाद मिळाल्याचे पाहण्यात नाही.

‘अलक’ किंवा ‘अति लघु कथा’ हा एक गद्य कथाप्रकार आहे. यात थोडक्या शब्दात एखादी, घटना, प्रसंग, विचार कथारूपात सांगण्याचा प्रयत्न केलेला असतो. या कथेचा जीवच मुळी लहान असतो. अलक हा क्षुद्र कथाप्रकार सामान्यतः समाज माध्यमांवर आढळून येतो. तो अधिक जागा व्यापत नाही.

यात पुन्हा दोन उपप्रकार आहेत, सकारात्मक व नकारात्मक. सकारात्मक अलक मध्ये वाचकावर सकारात्मक परिणाम साधण्याचा प्रयत्न असतो तर, नकारात्मक अलकमधे त्याउलट प्रयत्न दिसतो.

सध्या काही नवे हौशी लेखक काही तरी ‘हटके’ करायचे म्हणून आवर्जून, प्रयत्नपूर्वक अलक लिहून विविध समाजमाध्यमांवर प्रसारित करीत असतात. आतपुढ म्हणजे ‘आले तसे पुढे ढकलले’ ही तर माध्यमांची संस्कृती. त्यामुळे ह्या अलक विविध समूहांवर फिरत असतात हे सत्य आहे.

मराठी कथा, लघुकथा, दीर्घकथा ह्या कथा प्रकारांना प्रदीर्घ, प्राचीन परंपरा आहेत. त्या सर्वश्रुत व सर्वपरिचित आहेत. त्यांना समाजानेही मानले आहे, स्विकारले आहे. थोडक्यात हे कथाप्रकार मराठी जनमानसात ‘सुप्रतिष्ठित’ झाले आहेत.

लघु आणि दीर्घ कथा

लघुकथा ही आकाराने, लांबीने लहान असली तरी ती एक पूर्ण कथा असते. दीर्घ कथा सुद्धा एक परिपू्र्ण कथा असून ती आकाराने काहीशी विस्तृत असते. त्यातील व्यक्तिमत्वे, प्रसंग, तपशील, कालमर्यादा इ. बाबतीत तिचा आवाका मोठा असतो.

सध्याच्या अलक

अलक हे कथेचे लघुकथेपेक्षाही अधिक लघुरूप असते असे गृहित धरले तरी ती एक पूर्ण कथा असावी येवढी अपेक्षा आहे. त्यातील कथानकात काही नाट्य, एखादी व्यथा, एखादा संदेश असे काहीतरी असायला हवे. प्रत्यक्षात मात्र पूर्ण कथानक सामावणारी, वरील सर्व किंवा काही लक्षणे असणारी अलक आजपर्यंत तरी माझ्या वाचनात आलेली नाही.

वाचनात आलेल्या तथाकथित अलक या पूर्ण कथा कधीच वाटल्या नाहीत. एखादे वाक्य, दोन-चार वाक्यात मांडलेला एखादा विचार, एखादा प्रसंग येवढाच त्यांचा जीव असतो. त्याला कथा असे म्हणताच येत नाही.

काही तरी नवीन करण्याच्या हेतूने काही उत्साही मंडळींनी अलिकडे हा उथळ कथाबंध हाताळायला सुरुवात केली आहे. पण त्यात चमकदार, विस्मयकारी कल्पना, हळुवार अनुभूती, एखादा कलापूर्ण प्रतिभाविष्कार आहे असे काहीही अजून तरी वाचनात आलेले नाही.

अलका – चारोळी

गेल्या तीन-चार दशकापूर्वी अस्तित्वात आलेला हा एक उथळ काव्यप्रकार असला तरी बऱ्यापैकी लोकप्रिय होत आहे. विशेषतः यात तत्कालिक राजकीय व्यंगे मांडलेली असल्याने, काही चिमटे, कोपरखळ्या, टपला, चपेटे असल्यामुळे त्या त्वरित दाद घेऊन जातात. याअति लघु काव्याला आपण ‘अलका’ म्हणूया. अशा चारोळीत अगदी लहान कथाबीज, विचारबीज असते. त्या अगदी अल्पजीवी असतात.

अलका – हायकू

‘हायकू’ हा तीन ओळींचा काव्यप्रकार म्हणून हा ही ‘अलका’. हा जपानी भाषेत लोकमान्य झाला असला तरी प्रयत्न करूनही मराठीत तो कधीच रुजला नाही. शिरीष पै यांनी या काव्यप्रकारात काही लेखन केले आहे पण त्यांच्याखेरीज इतर साहित्यिकांनी त्याकडे दुर्लक्ष केल्याचे दिसते. प्रतिभावान कवियत्री शांता शेळके यांनी काही जपानी हायकूंचा मराठीत अनुवाद करून त्याचे ‘पाण्यावरील पाकळ्या’ नावाचे एक पुस्तक प्रकाशित केले आहे. पण असे काही तुरळक प्रयत्न सोडले तर हायकू मराठी मनाला आकर्षित करू शकले नाही हे वास्तव मान्य करावे लागेल.

अलका – सुभाषित

या पार्श्वभूमीवर संस्कृत वाङमयातील अत्यंत प्रभावी लोकप्रिय ‘सुभाषित’ ह्या लघुकाव्य – ‘अलका’ प्रकाराचा उल्लेख अटलनीय आहे.

जगातील भाषांमधील सर्वोत्कृष्ट भाषा ‘संस्कृत. ‘ त्यातील काव्य सर्वोत्तम आणि काव्यातही सर्वोत्कृष्ट प्रकार म्हणजे सुभाषित!

भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाण-भारती।

तस्माद्धि काव्यम् मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥

सुभाषिताची व्याख्या

मिताक्षरं हितं सभ्यं वैश्विकं सार्वकालिकम् ।

सालंकृतं स्वयंपूर्णं सुबोधं तत् सुभाषितम् ।।

कमीतकमी शब्दयुक्त, हितकारक, सभेत शोभून दिसेल असे, विश्वात सर्वत्र आणि सर्वकाळी लागू पडणारे, अलंकार-युक्त, अर्थाने परिपूर्ण आणि हे सर्व असुनही जे समजण्यास सोपे असते, त्याला ‘सुभाषित’ असे म्हणतात.

अलका – शायरी

उर्दू भाषेतील ‘शेरोशायरी’ हा ही असाच एक अति लघु काव्यप्रकार- अलका विलक्षण लोकप्रिय आहे. अँड. भाऊसाहेब पाटणकरांनी सिद्ध केलेला, बोली भाषेत लिहिलेला ‘मराठी शायरी’ हा काव्यप्रकार विलक्षण प्रभावी, परिणामकारक आहे. त्याची भाऊसाहेबांनी दार्शनिक पद्धतीने केलेली व्याख्या अशी…

भावोन्मादोत्थित कल्पनाचमत्काराविष्कार विशेषः शायरी। कल्पना चमत्कृतित्वंतु विस्मय सहकृत सदभिव्यंजकत्वम्।

उत्कट भावनेतून निर्माण झालेल्या सद्भिव्यंजक अशा विस्मयकारक कल्पनेच्या अविष्काराचे एक तंत्र असा मी वरील व्याखेचा सामान्यतः अर्थ लावतो.

दुर्दैवाने भाऊसाहेबांच्या या मराठी शायरीचा वारसा पुढे चालवणारा कोणी शायर लाभल्याचे आढळात नाही. परिणामी पूर्णतः सप्रमाण, सप्रात्यक्षिक सिद्ध करून सुद्धा भाऊसाहेबांच्या पश्चात मराठी शायरी अंकुरली, फोफावली नाही. तिची परंपरा निर्माण झाली नाही.

वरील वाङमय प्रकारांचा विचार करता सध्याच्या ‘अलक’ अगदीच पुचाट, बेंगरूळ, रसहीन, अर्थहीन वाटतात.

ज्यांना ‘अलक’ हा कथाप्रकार सोईचा वाटतो, प्रभावी वाटतो, आवडतो त्यांनी लिहावे. वाचकांनी आपापल्या क्षमतेप्रमाणे त्याचे रसग्रहण, मूल्यमापन करावे आणि ठरवावीत आपापली मते. अलकविषयी मी माझी ही व्यक्तिगत मते या निमित्ताने मांडतोय येवढेच.

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अध्यात्म…- भाग १ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर ☆

श्री प्रदीप केळुस्कर 

?जीवनरंग ?

☆ अध्यात्म… – भाग १ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर 

मी नेहेमीप्रमाणे ग्यालरीत बसले होते. सचिन सारिका कामावर गेली की मी मोकळी. या ग्यालरीत बसले की माझा वेळ छान जातो. समोर नवीन बिल्डिंग उभी राहिली होती, त्यात नवीन फ्लॅटधारक राहायला येत होते. त्या मंडळींचे टेम्पो, ट्रक आवारात येत होते, सामान उतरविले जात होते.. हमाल सामान वर नेत होते.. मग त्या फ्लॅटमधील मंडळी गाडीतून येत होती. फार्निचर लावत होती.. सुतारांचे ठोकणे.. त्त्यांचे ठोक ठोक आवाज अनेक फ्लॅटमधून बाहेर पडत होते.

नवीन नवीन चेहेरे समोर दिसत होते… काही मराठी बोलणारे, काही गुजराथी, काही हिंदी भाषिक… छोटी छोटी लहान गोजिरवाणी मुले, त्यांच्या सुंदर आया, देखणे बाबा, तरुण मुली, मुलगे, म्हातारे आजीआजोबा…

माझा वेळ मजेत जात होता. सात वर्षांपूर्वी आम्ही या जागेत आलो, तेंव्हापासून ही ग्यालारी मला प्रिय झाली. आम्ही येथे रहायला आलो तेंव्हा आमच्या बिल्डिंगच्या बाजूला मोकळी जागा होती. गुलमोहरची दोन झाडें सतत जाग करत असत, एक जुना आंबा होता.. किती वर्षाचा कोण जाणे? सकाळी सकाळी त्यावर पाखरे जमा होत आणि किलबिलाट करत. सायंकाळी तीच पाखरे घरट्याच्या ओढीने परत येत.

पण या माझ्या सुखाला दृष्ट लागलीच. एका दिवशी भराभर झाडें तोडणारे, जमीन साफ करणारे आलेच. विटा, दगड, लोखंड येऊन पडू लागले आणि भराभर बिल्डिंग उभी राहिली.

तीन वर्षात बिल्डिंग उभी राहिली. नवीन नवीन मंडळी राहायला आली. माझ्या ग्यालारीसमोरच्या फ्लॅटमध्ये नवराबायको जोडी आणि त्त्यांची सातआठ वर्षांची मुलगी राहायला आली.. त्या चुणचुणीत मुलीमुळे माझे दिवस आंनदात जाऊ लागले… मला ती हळूच हात दाखवू लागली, जीभ बाहेर काढून वेडावू लागली. तिची आई कवचितच दिसायची.. बहुतेक ती आतल्या खोलीत कॉम्पुटरवर काम करत असावी. तिचे बाबा कधी सकाळी दिसत, कधी दुपारी दिसत किंवा चारचार दिवस दिसत नसतं.

त्या छोटया परीला मी तिचे नाव विचारले..

मुग्धा..

आणि तूझ्या आईचे नाव?

आई.. पण बाबा तिला संध्या म्हणतात..

आई घरात काम करत असते काय? बाहेर जात नाही आणि ग्यालरीत फारशी येत नाही..

आई कॉम्प्युटरवर टायपिंग करते..

बर.. बर.. मी हसत म्हणाले.

मुग्धाने बहुतेक आपल्या आईला मी तिची चौकशी करत असल्याचे सांगितले असणारं, दुसऱ्या दिवशी मुग्धाची आई ग्यालरीत आली आणि माझ्याशी बोलायला लागली..

तुम्ही काल माझी चौकशी करत होतात असे मुग्धा म्हणाली..

होय.. तुम्ही बाहेर जाताना दिसत नाही पण घरात पण दिसत नाहीत म्हणूंन चौकशी केली..

मी घरातच असते पण मी DTP ची कामे करते एका प्रकाशकाची, त्यामुळे पुरा दिवस कॉम्प्युटरसमोर जातो आणि माझा नवरा सेल्सलाईनला आहे, त्यामुळे त्याच्या टूर असतात..

हो का.. बर बर..

पण आजी उदया सकाळी आमच्याकडे याल का.. मुग्धाचा वाढदिवस आहे उदया आणि तिचे बाबा बाहेरगावी गेलेत.. उदया दुपारी जेवायलाच या.. थोडया लवकर आलात तर गप्पा मारू..

हो हो.. येते.. तुम्हाला थोडी मदत पण होईल माझी.

दुसऱ्या दिवशी मी मुग्धाच्या घरी गेले. मुग्धा आणि तिची आई संध्या वाट पहात होती. संध्या वालाची उसळ करणार होती, त्या करिता काल रात्री पाण्यात भिजत ठेवलेले वाल ती सोलत होती, मी पण तिच्या शेजारी बसले आणि वाल सोलायला बसले.

या आधी तुम्ही कुठे राहत होतात संध्याताई..

या आधी आम्ही दोन जागा बदलल्या.. माझे लग्न झाले आणि मी मुंबईत आले, हे एका औषधंकंपनीत सेल्स लाईनमध्ये नोकरी करत होते, मी ग्रॅज्युएट होऊन DTP चा कोर्स केलेला, यांची कळव्याला चाळीत खोली होती. त्या खोलीत पाण्याचा प्रॉब्लेम, कधी पाणी येई कधी चारचार दिवस नाही. कॉमन संडास. मी कंटाळले.. यांना दुसरी जागा शोधायला सांगत होते पण पैसे नव्हते, म्हणूंन मी काम शोधू लागले, डोंबिवलीतील एका पुस्तक प्रकाशकाने मला काम दिले. माझे टायपिंग बिनचूक त्यामुळे मला भरपूर काम मिळाले. रात्रंदिवस काम करत होते आणि पैसे जमवत होते. पण माझी तब्येत बिघडली. मग आम्ही ती जागा सोडली आणि डोंबिवलीत एका भाड्याच्या फ्लॅटमध्ये राहू लागलो. तेथेच मुग्धाचा जन्म झाला. मी परत काम करू लागले, आता प्रकाशन व्यवसायात माझ्या कामाची चर्चा होऊ लागली, मला पुण्याच्या प्रकाशकांची कामे मिळू लागली, दोन पैसे बँकेत जमू लागले आणि माझ्या नवऱ्याला हार्टअटॅक आला. सतत दौरे, त्यात सिगरेटचे व्यसन आणि अधूनमधून पार्टीच्या नावाखाली दारू पिणे. त्यातून त्याला बाहेर काढले तर जागामालक जागा खाली करायला मागे लागला… आता मी ठरवले आता स्वतःच्या मालकीची जागा विकत घ्यायची, भाडे देणे बस झाले. मग मी माझ्या सर्व प्रकाशकाकडे ऍडव्हान्स पैसे मागितले आणि यांनी पण कंपनीतून कर्ज घेतले आणि ही जागा घेतली. त्या आजारानंतर यांनी व्यसने सोडली, दौरे कमी केले आणि एकएक पैसा वाचवून माझ्याकडे देऊ लागले. आता या जागेत आमचा संसार सुरु आहे, मुग्धाला पण इथे चांगली शाळा मिळाली आहे, तुमच्यासारखे चांगले शेजारी आहेत.. पण जागा पण लाभावी लागते म्हणतात.. तशी ही जागा लाभावी.. आमचा संसार सुखाचा व्हावा हे मी देवाकडे मागते.

वाल सोलून झाले होते, ते घेऊन संध्या किचनमध्ये गेली आणि तिने वाटणं मिक्सरमध्ये लावल.

मी संध्याचे बोलणे ऐकत होते.. जागा लाभावी लागते.. तशी ही जागा आम्हाला लाभावी… खरे आहे तिचे, वास्तू पण तुमचे नशीब ठरवते, तुमचे सुख किंवा दुःख ठरवते..

संध्याने बहुतेक श्रीखंडपुरीचा बेत ठरविला होता. ती पुऱ्या करण्यासाठी पीठ मळू लागली. तिचे मघाचे बोलणे माझ्या मनातून जात नव्हते..

तिने तेल तापवायला घेतले. मी तिला म्हंटले..

संध्या.. मी पुऱ्या लाटून देते. तू तळून घे.

मी पुऱ्या लाटता लाटता तिच्याशी बोलू लागले..

– क्रमश: भाग १

© श्री प्रदीप रामदास केळुस्कर

मोबा. ९४२२३८१२९९ / ९३०७५२११५२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ कापणे – एक इव्हेंट! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? मनमंजुषेतून ?

☆ कापणे – एक इव्हेंट! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

माझ्या समवयस्क पिढीतील लोकांना लहानपणी हातात पडलेल्या पहिल्या “शिस पेन्सिलीच” त्याकाळी, त्या वयात काय अप्रूप होतं ते नक्कीच आठवत असेल! मला आज बहात्तरीत आठवतंय त्याप्रमाणे तेंव्हा मराठी चौथीपर्यंत काळीशार दगडी पाटी आणि चुन्याची पांढरी षटकोनी किंवा चौकोनी पेन्सिल, यावरच ‘लिहित्या हाताच्या’ बोटांना आम्हां मुलांना समाधान मानावं लागत असे! या वाक्यातील ‘लिहित्या हाताच्या’ या माझ्या शब्दप्रयोगावर आपली वाचनाची गाडी अडखळली असेल, तर त्याबद्दल आपलं समाधान होईल असा खुलासा आधी करतो, म्हणजे मग तुम्ही पुढचा लेख वाचायला आणि मी पुढे लिहायला मोकळा!

आपण म्हणालं आता हे काय तुमच नवीनच? “लिहिता हात” म्हणजे काय? तर त्याच कसं आहे मंडळी, जसं काही काही लोकं बोलतांना “खाता हात” आणि “धुता हात” असे शब्दप्रयोग करतात, तसा मी “लिहिता हात” असा शब्दप्रयोग केला तर कुठे बिघडलं? कारण आपल्यापैकी बरेच जण डावरे (का डावखुरे? ) असण्याची शक्यता गृहीत धरूनच मी या नवीन हाताचा “शोध” सॉरी, नवीन शब्दप्रयोगाचा शोध लावलाय! दुसरं असं की समस्त डावऱ्यां मंडळींकडून, मी माझ्या सारख्या उजव्यांना उजवं माप देतोय, असा बिनबुडाचा आरोप कशाला ऐकून घेवू? काय बरोबर ना मंडळी?

हां, तर काय सांगत होतो मंडळी, हातात आलेल्या पहिल्या शिस पेन्सिलीच अप्रूप! तर अशी ही शिस पेन्सिल आपल्या स्वतःच्या मालकीची म्हणून पाचवीत हाती येई पर्यंत, जर आपण कुतूहलापोटी आपल्या ताई किंवा दादाच्या शिस पेन्सिलीला नुसता हात जरी लावला असेल, तरी आपण तिचा किंवा त्याचा ओरडा त्याकाळी नक्कीच खाल्ला असेल. शिवाय एखाद्याचा दादा किंवा ताई जास्तच रागीष्ट असेल तर? त्या ओरडयाबरोबर त्याची किंवा तिच्या हातची चापटपोळी. आपण म्हणालं, हे सगळं जरी काही प्रमाणात खरं असलं, तरी या सगळ्याचा आणि आजच्या लेखाच्या शीर्षकाचा संबंध काय? सांगतो, सांगतो मंडळी, जरा सबुरीन घ्या!

तर पाचवीत पहिल्यांदाच हाती आलेल्या नव्या कोऱ्या “शिस पेन्सिलीला” टोक काढायला, त्याकाळी आजची “शार्प” लहान मुलांची पिढी जे “शार्पनर” वापरते, त्याचा शोध बहुतेक लागायचा होता म्हणा किंवा माझ्या सारख्या मध्यमवर्गातल्या मुलांना त्याकाळी ते विकत घेणं परवडत नव्हतं म्हणा, पण तेव्हा आम्ही मुलं शिस पेन्सिलीला टोक काढण्यासाठी एखाद जुनं अर्ध “भारत ब्लेड” वापरत असू. पण मंडळी, त्या शिस पेन्सिलीला अर्ध्या ब्लेडने टोक काढता काढता, पेन्सिलीतून तीच टोक बाहेर येण्या आधीच हाताच्या एखाद्या बोटातून हमखास लाल भडक रक्त बाहेर येई. मग काय, अशावेळी माझी जी काय रडारड सुरु व्हायची त्याला तोड नसायची! कारण त्या वयात असं एखाद “कठीण” काम, स्वतःच स्वतः अभिमानाने करतांना, आपल्याच हातून आपल्याच चुकीमुळे बोटातून रक्त आलेला, बहुदा तो आयुष्यातला पहिलाच प्रसंग असायचा. मग हे सगळं आईला कळताच तिची बोलणी खात खात, कधी कधी त्या सोबत तिच्या हातचे धपाटे तोंडीलावण्यासारखे खाता खाता, तिने आठवणीने बरोबर आणलेला मातकट रंगाचा “रामबाण कापूस” ती मला बोटावर झालेल्या माझ्या जखमेवर लावी. तो लावता लावता तोंडाने, “साधी एका शिस पेन्सिलला टोक काढता येत नाही आणि म्हणे मला पेन्सिलचा अख्खा नवीन बॉक्स हवाय! टोक काढतांना गाढवासारखं (? ) स्वतःच बोट कापून घेतलंस, तरी त्या नावाखाली आज तुझी अभ्यासातून मुळीच सुटका नाही, कळलं? बस अभ्यासाला! “

मंडळी, तेंव्हा जरी साने गुरुजींची “श्यामची आई” त्याकाळच्या आयांच्या कितीही आवडीची असली, तरी सगळ्याच मुलांच्या आया काही “श्यामच्या आईसारख्या” आपापल्या मुलांशी वागत नव्हत्या नां! त्यामुळे माझ्या आईच्या तोंडातल्या वरच्या डायलॉगचा शेवट, माझ्या शरीराचा कुठला तरी अवयव त्यातल्या त्यात तिच्या उजव्या हाताच्या जवळच्या टप्प्यात असेल, त्यावर त्याच हाताची एक सणसणीत बसूनच होत असे!

मंडळी, त्या औषधी “रामबाण कापसाची” एक खासियत होती. तो नुसता जखमेवर दाबून धरताच एका क्षणात जखमेतून येणार रक्त, रेड सिग्नल मिळाल्यावर पूर्वी जशा गाड्या थांबत तसं थांबत असे! हल्ली रेड सिग्नल आणि त्याच्या जोडीला पोलिसाचा आडवा हात व त्याच्या जोडीला त्याच्या तोंडातली शिट्टी, याला सुद्धा कोणी जुमानत नाही हा भाग निराळा. दुसरं असं की आजच्या सारखा तो काही “वॉटरप्रूफ बँडेडचा” जमाना नव्हता. त्यामुळे औषधी “रामबाण कापसाच्या” फर्स्टएडवरच अशा जखमांची तेंव्हा बोळवण केली जायची. अशी “रामबाण कापसाची” त्या काळातली फर्स्टएड मलमपट्टी आपण सुद्धा कधीतरी अनुभवली असेल! आजकाल कशातच “राम” उरला नाही, मग हा “रामबाण कापूस” तरी कसा उरेल, खरं की नाही? असो! कालाय तस्मै नमः!

तेंव्हा आजच्या सारखी गल्ली बोळात उगवलेली, वेगवेगळ्या हेअर स्टाईल करणारी महागडी एसी “सलोन” तर सोडाच, पण साधी “शंकर केश कर्तनालय” सारखी “सलून” सुद्धा शहरातल्या ठराविक उच्चभ्रू वस्तीत हाताच्या बोटावर मोजण्या इतकी सुद्धा नव्हती! आणि त्यावेळेस ती असली काय किंवा नसली काय, तेंव्हा त्याची पायरी चढून स्वतःच डोकं भादरण चाळीतल्या कोणालाच त्या वेळेस तरी परवडण्यासारखं नव्हतं! किंबहुना त्या सलूनमधे जाऊन एका वेळच्या डोकं भादरायच्या खर्चात, “भावजा” नामक आमच्या आठ चाळीच्या संकुलचा एकच नाभिक असलेल्या नाभिकपुढे पुढे अख्खी दोन वर्ष नतमस्तक होता आलं असतं, असा साधा सरळसोट मध्यमवर्गीय हिशेब त्यात होता, हे ही तितकंच खरं! त्यामुळे “भावजाच्या” सकाळच्या सातच्या अपॉइंटमेंटसाठी चाळकऱ्यांना दहा दहा वाजेपर्यंत वाट पहात बसण्याशिवाय पर्याय नसायचा. कधी कधी त्याला जास्तच उशीर झाला, तर घरातली वडील मंडळी आम्हां पोरांना त्याची स्वारी कुठल्या चाळीत आपल्या हातातलं कसब दाखवत बसली आहे, याचा शोध घेण्यासाठी पाठवत असे. आता मी जरी “भावजाच्या” केस कापण्याला त्याच्या हातातलं कसब म्हटलं, तरी तेंव्हा बहुतेक “क्रू कटचा” शोध त्याच्याच “मशीन” मधूनच जन्माला आला असावा, असं म्हटलं तर वावगं ठरणार नाही. पुढे आमच्या या “भावजाचा” तो “क्रू कट” त्यावेळच्या पोलीस शिपायांच्या माथी जाण्यामागे आमच्या “भावजाचाच” तर हात नाही ना? इतपत शंका घेण्यास काही चाळकऱ्यांची मजल तेंव्हा गेली होती.

केस कापायला आपल्यापुढे कोण बसलंय, त्याच वय काय, त्याला कसे केस कापून हवेत अशा क्षुल्लक गोष्टींची चर्चा न करता, समोरच्या व्यक्तीच डोकं आपल्यापुढे त्याची मान दुखेपर्यंत जास्तीत जास्त वाकवून, दिसला केस काप करत, तो डोक्यावरील केसांची “कतले आम” त्याच्या पद्धतीने करत सुटे! या त्याच्या केस कापण्याच्या स्वतःच्या स्टाईलमुळे एखाद्या सोमवारी, आठ चाळीतल्या समस्त आयांचा आपापली मुलं मागच्या बाजूने ओळखण्यात फारच गोंधळ उडे मंडळी. कारण केस कापल्यावर सगळी मुलं मागून थोडे दिवस तरी सारखीच दिसायची! मग काही कारणाने एखाद्या मुलाला दुसऱ्याच आईचा फटका खायचा प्रसंग सुद्धा ओढवायचा!

त्या जमान्यात हिंदी सिनेमे पाहण्यापेक्षा लोकं मराठी संगीत नाटकं पहाणं जास्त पसंत करीत असतं. त्यामुळे हिंदी सिनेमांतल्या एखाद्या “कुमारा” सारखी आपण पण हेअरस्टाईल करावी असं कोणाला वाटत नसे. शिवाय तशी फॅशन पण तेंव्हाच्या तरुण मंडळीत फोफावली नव्हती आणि मराठी संगीत नाटकातल्या एखाद्या कळलाव्या नारदा सारखी हेअरस्टाईल (? ) करायचा तर प्रश्नच नव्हता. कारण डोक्यावरच जंगल कंगव्याने केस फिरवण्या इतकं वाढलं रे वाढलं, की लगेच “भावजाला” फर्मान जाई!

आज वयाच्या बहात्तरीत “डोक्याने” किंवा “डोक्याची” अनेक कामं करून म्हणा, अथवा अनूवांशीक जीन्समुळे म्हणा, आजमितीस मानेवर जी काय पांढऱ्या केसांची तुरळक झालर उरल्ये, ती वाढल्यावर कापायला सटी सामाशी “सलूनमधे” जायचा योग येतो, तोच काय तो! पण आता पूर्वीसारखी “भावजा” समोर लहानपणी जशी मान तुकवावी लागत असे, तशी आता सलूनमध्ये तुकवावी लागत नाही, हेच काय ते त्यातल्या त्यात मनाला समाधान! फक्त या बाबत एकच तक्रार मी मनातल्या मनांत स्वतःलाच करत असतो मंडळी. माझ्या मानेवरची केसांची पांढरी तुरळक झालर कापायलासुद्धा, एखाद्याच्या डोक्यावरील संपूर्ण जंगल कापण्या इतकेच पैसे द्यावे लागतात! त्यामुळे वेगळ्या अर्थाने आपलं पाकीट किंवा खिसा कापला जातोय, याच नाही म्हटलं तरी माझ्या सारख्या पेन्शनराला आत कुठेतरी दुःख होतच होतं!

केस कापण्यावरून आठवलं, साधारण तीस पस्तीस वर्षापूर्वी ट्रेनच्या किंवा बेस्ट बसच्या प्रवासात ज्याच पाकीट किंवा खिसा कापला गेला नाही, असा चाकरमानी मिळणं विरळाच! आणि कोणी फुशारकीने तसं म्हटलं तर त्याने त्यावेळच्या ट्रेनच्या “थर्ड क्लासने” गर्दीच्या वेळेस डोंबिवली किंवा विरार लोकलमधून, संध्याकाळच्या रश अवर मधे प्रवास केलेलाच नसावा, हे तुम्ही त्याला खात्रीपूर्वक सांगू शकता.

त्यावेळच्या ट्रेनमधल्या खिसा कापण्याच्या एक एक चमत्कारिक आणि सुरस कथा आज नुसत्या आठवल्या तरी खूपच मनोरंजन होतं. सध्या पाकीट आणि खिसा कापणाऱ्या टोळ्या अस्तित्वात आहेत की नाहीत, अशी शंका घेण्या इतपत सध्याची परिस्थिती आहे. कारण आत्ताच्या कलियुगी अशा चिल्लर चोऱ्या करण्यापेक्षा, आजकाल सगळ्यांनाच स्वतःच्या जिवापेक्षा प्यारा झालेल्या एखाद्या महागड्या “मोबाईलची” चोरी करण्यावर सांप्रत काळातील चोरांच्या नवीन पिढीने आपला मोर्चा वळवला आहे, हे आपण सुद्धा मान्य कराल. त्यामुळे पुन्हा एकदा मी “कालाय तस्मै नमः” म्हटलं, तर आपल्याला त्यात वावगं वाटणार नाही अशी आशा करतो!

एखाद्या वास्तूच उदघाटन त्याच्या दाराला लावलेल्या आडव्या “लाल फीतीला” कापून, कोणा मान्यवरच्या हाती करायची पद्धत आपल्याकडे कधी पासून आली, हा एक संशोधनाचा विषय ठरावा. कारण स्वातंत्र्यापुर्व काळात आणि स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतर सुद्धा काही वर्ष मान्यवरांच्या हस्ते “दिप प्रज्वलनकरून” एखाद्या कार्यक्रमाची सुरवात व्हायची, हे आपल्याला आठवत असेलच. स्वातंत्र्यानंतरच्या काळात तेव्हांच्या स्वतःला फॉरवर्ड समजणाऱ्या उच्चभ्रू लोकांनी अशा समारंभात ही फीत कापायची पद्धत सुरु केली असावी, असा आपला माझा अंदाज! अर्थात त्याचा उगम नक्कीच त्यांच्या डोक्यतून न हॊता, त्यांनी या बाबतीत सुद्धा इंग्रजांचेच अनुकरण करण्यातून झाला असावा, हे ही तितकंच खरं असण्याची शक्यता जास्त!

हल्ली गल्ली बोळात स्वतःला “नेता” म्हणवणाऱ्या लोकांना तोटा नाही आणि त्यांच्या निरुद्योगी अनुनायांचे तर “सगळं काही” फुकट मिळत असल्यामुळे मोहोळच उठलेलं आपल्याला पाहिला मिळतं. अशा या स्वयंभू नेत्यांना काही उत्साही लोकं आपल्या कुठल्याही “वास्तूची” उदघाटनाची फीत कापायला बोलवत असतात आणि हे नेतेही तेवढ्याच तत्परतेने, उत्साहाने असे समारंभ अगदी अगत्यपूर्वक अटेंड करत असतानां आपण पाहिले असेल. मी वर “कुठल्याही वास्तूची” उदघाटनाची फीत असं म्हटलं, कारण सध्या आधीच नावापुरत्या राहिलेल्या फुटपाथवर, एखाद्या नवीन बांधलेल्या “सार्वजनिक शौचालयाची” फीत कापून त्याच उदघाटन सुद्धा असे नेते करत असतात! एवढच कशाला, त्या सार्वजनिक शौचालयावर स्वतःचा मोठा फोटो आपल्या नावासकट, मोठ्या आणि भडक रंगात रंगवला आहे की नाही याची आधी खात्री करून घेतात आणि मगच त्या शौचालयाचे फीत कापून उदघाटन करतात!

“सकल उत्पन्नाच्या मूलभूत गुंतवणूकीवर मुळापासून कर कापला जाईल! ” हे एखाद्या कंपनीच्या गुंतवणूक विषयीच्या फॉर्मवरच्या सर्वात छोट्या फॉन्ट मधलं प्रिंट केलेलं वाक्य, शुद्ध मराठीत असलं तरी, वाचायला म्हणण्यापेक्षा “कळायला” बऱ्याच जणांना जरा जड जाईल! म्हणून सोप्या चालू भाषेत सांगायचं तर, “Tax will be deducted at source! ” असं म्हणतो, म्हणजे 99% वाचकांचा जीव भांड्यात पडेल, याची मला खात्री आहे!

“अरे काय सांगू तुला, या वेळेस मी दीड लाखाचं फुल सेव्हिंग केलं, तरी पंचावन्न हजार टॅक्स भरायला लागला! “

“टॅक्स! ” तुमच्या माझ्यासारख्या जगातल्या तमाम मध्यमवर्गीयांचा, अगदी कधीही, कुठेही आणि कोणाबरोबरही उगाच “फुकट” चर्चा करण्याचा जागतिक विषय! आता या आधीच्या वाक्यात मी जो “फुकट” शब्द वापरला त्याला कारण म्हणजे, आपल्या सारख्या लोकांनी या विषयावर कितीही वायफळ चर्चा केली तरी, त्याचा सरकारवर दबाव पडून, सरकार टॅक्सच्या टक्केवारीच्या स्लॅबमधे बदल करेल ही शक्यता अजिबातच नसते. हे जरी आपल्या सारख्या लोकांना दरवर्षीच्या अनुभवावरून माहित असलं तरी, त्यावर चर्चासत्र किंवा परिसंवाद हे सगळ्याच बजेट नंतर झडतच असतात!

मंडळी, अजूनही कुठं कुठच्या “कापण्याचे इव्हेंट” होऊ शकतील असे अनेक प्रकार जे मला माहित आहेत, ते आपल्याला सुद्धा माहित असतील. पण एखाद्या लेखाची पण काही शब्दमर्यादा असते हे सुद्धा आपल्या सारख्या चाणाक्ष वाचकांना माहित असेलच! त्यामुळे वरील लेख कोणी छापणार असेल तर, त्यांच्या “एडिटरकडून” मूळ लेखाची (मला) नको इतकी “काट छाट” होण्याआधीच लेख संपवतो!

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ”रमा.. माझा आदर्श..” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “रमा.. माझा आदर्श.. ☆ संध्या बेडेकर ☆

Always Remember Life In Front Of You Is more Important Than Life Behind You.

मी आणि रमा दोघी बाल मैत्रिणी. अगदी शाळेपासून बरोबर. लग्नानंतरही दोघी एकाच शहरात. मी लहानपणी रडू बाई होते. रमा मला सांभाळायची. माझ्यासाठी भांडायची. मला समजावून सांगायची. तिच्या मुळे मी आपली लढाई लढायला शिकले. तिच्या संगतीत माझा आत्मविश्वास वाढला. लग्नानंतर ही आमची दोस्ती आधी पेक्षाही जास्त झाली.

आता तर सर्व मनमोकळेपणाने बोलायला एक भरवशाचे ठिकाण होते. वयाच्या वेगवेगळ्या फेजचे प्रश्नही वेगळेच असतात. त्या त्या प्रश्नांची उत्तर प्रत्येक जण आपापल्या परिस्थिती प्रमाणे, स्वभावानुसार घेत असतोच. बरोबर कोणी आधार देणारं असेल तर प्रवास थोडा सोपा होतो.

रमा नेहमी म्हणते,    

 अग! आपल्या आयुष्याची १००% जबाबदारी आपलीच असते. आपण कसं वागावं? हा आपला निर्णय असतो. लोकांनी ठरवायला आपले प्रश्न म्हणजे काही ग्राम पंचायतीचे मुद्दे नाहीत.

खूप कमी लोक असतात, जे आपल्याला समजतात.

रमा म्हणजे देवाने मला दिलेलं सुंदर, मुल्यवान उपहारच आहे, असं मी समजते.

असे आमचे एकमेकांच्या सहवासात वैवाहिक जीवन मजेत सुरू होते. आमच्या नवऱ्यांची पण दोस्ती झाली, त्यामुळे आमची चौकडी मजेत होती.

रमा तेथे क्षमा अस बरेच जण म्हणायचेही.

आजही मला ती सकाळ आठवते. रामाचा फोन आला. म्हणाली,    

अग! सेवासदन दवाखान्यात तुम्ही दोघे लवकर या. हे चक्कर येऊन खाली पडले. अजय ऑफिस मध्ये गेलाय.

आम्ही दोघं लगेचच पोहचलो. तोपर्यंत सर्व संपलेल होत. सिव्हीयर‌ हार्ट अटॅक. अचानक सर्व जग बदलल. वयाच्या पन्नाशीतच रमावर सर्व जबाबदारी आली. तिची शाळेची नोकरी, अजय नुकताच नोकरीला लागलेला. रमाच्या मुलीचे पल्लवी चे लग्न दोन वर्षांपूर्वीच झालेलं.

हळूहळू परिस्थितीला धैर्याने तोंड देत स्वतः लाच सांभाळत रमा पुन्हा उभी राहिली.

मागच्या वर्षी अजयचे लग्न झाले. अनिता घरात आली.

अजय अनिता, म्हणाले     

अग! आई तुला नोकरी सोडायची असेल तर तू सोड. अगदी मजेत रहा, नोकरीमुळे तुला तुझे छंद, enjoy करता येत नाहिये. रमा छान गाणं म्हणते. वेगवेगळ्या स्पर्धेत भाग घेते. आपल्या मैत्रिणींचा गृप तयार करून त्यांना पण स्पर्धेसाठी तयार करते. हसतमुख मृदुभाषी रमा सर्वांना आवडते. नोकरी मुळे माझा वेळ छान जातो, म्हणून नोकरी पण करते.

पुन्हा एकदा आयुष्याची घडी व्यवस्थित बसली होती, म्हणण्यापेक्षा वैचारिक ताकदीने तिने आयुष्यात सकारात्मक बदल घडवून आणला होता.

अनुजाचां जन्म झाला आणि घरात पुन्हा नव्याने उत्साह संचारला.

देवाने बहुतेक रमाची परीक्षा घ्यायचे ठरविलेच होते.

पुन्हा एकदा ती भयावह सकाळ होती. रमाचा फोन आला म्हणाली,    

अग! पल्लवी ला बरं नाहिये, म्हणून तिला दवाखान्यात भरती केलय. काय झालं? काय नाही? समजायच्या आत पल्लवीला देवाज्ञा झाली.

एका समस्येतून स्वतः ला सांभाळतच होती तर, दुसरी समस्या समोर उभी. पल्लवी ची दोन लहान मुलं, जावयी आणि अर्ध्यावर संसार सोडून पल्लवी गेली.

कधी कधी देवालाही प्रश्न विचारावेसे वाटतात. असं का? कशासाठी एवढी शिक्षा? एक साधारण जीवन जगणारा माणूस अशी एवढी मोठी कोणती चूक करतो? की ही अशी शिक्षा? ग्रहांचा एवढा प्रभाव, एवढी वक्रदृष्टी?? की ज्या दिवशी देवाने रमाची पत्रिका लिहायला घेतली, त्यादिवशी देवाचा मूड ठीक नव्हता.? की मागच्या जन्माचे भोग? हे तर आपल्या समजण्याच्या पलीकडचे प्रकरण आहे.

देवाचा हा हिशेब आजपर्यंत कोणालाच कळला नाही. त्याची आज्ञा मानन्या पलीकडे आपल्या समोर दुसरा काही पर्यायही नसतोच.

 Sometimes you have to accept the facts that certain things will never go back as they used to be.

 परिस्थिती माणसाचा स्वभाव बदलते. कधी माणूस हताश होऊन देवाला, आपल्या भाग्याला कोसतो, तर कधी आपण बघतो 

 Strong men don’t complaint. They adjust, adapt and conquer the situation.

रमा म्हणजे असच एक strong व्यक्तिमत्व.

ती नेहमी म्हणते,    

 Always Remember life in front of you is more important than the life behind you.

पुन्हा एकदा गाडी रूळावरून घसरली. अशा वेळेस प्रत्येक दिवशी एक नवीन परीक्षा असते. Head of the family म्हंटल्यावर तसं वागायची जबाबदारी पण असतेच.

प्रोब्लेम सगळ्यांनाच असतात फक्त त्या प्रोब्लेम मधून बाहेर पडायला भावना, वास्तविकता, समोर उभी असलेली परिस्थिती यांचे विश्लेषण करत दररोज या परिस्थितीत काय महत्वाचे आहे? याचा विचार करून भावनांवर कंट्रोल करता आला पाहिजे. हे तेवढं सोपं काम नाही. त्याकरिता आपल्या पेक्षा दुसऱ्यांच्या भावनांचा विचार करावा लागतो.

. Strong people never accept the definition of life from others. They say,    

 It is my life. I will define it as per requirements of my family.

रमाने पुन्हा एकदा धैर्याने परिस्थिती ला तोंड दिलं. यावेळेस एक नाही दोन दोन परिवारांना सांभाळलं.

काळ कोणत्याही परिस्थितीवर औषध आहे. हे खरंय.

जसजसा काळ पुढे सरकत होता, पल्लवी ची मुलं मोठी झाली.

आज तर शिक्षण संपवून चांगल्या नोकरीत आहेत.

कोणतेही प्रोजेक्ट कसे successfully पूर्ण करावे? हे कोणीही रमा कडून शिकावे.

मधल्या काळात रमाच्या व्यक्तिमत्वाची एक वेगळीच झलक मला दिसली.

अनुजाच्या जन्मानंतर, दुसऱ्या बाळासाठी इच्छा असूनही अजय अनिता दोघे दुविधेत होते.

घरात सर्वच नोकरी करणारे, मग नवीन छोट्या बाळाला कोण सांभाळेल?

यावर चर्चा होताना, रमाने सहजच निर्णय घेतला.

म्हणाली,     

अग! अनिता, मी सोडते ना नोकरी. आता माझी पेंशनेबल नोकरी झालीय. मी लक्ष देईन घराकडे, बाळाकडे. अनुजा ला एक बहिण/ भाऊ नक्की असू दे. अग! काळजी करू नका. मैं हून ना!

हा नोकरी सोडण्याचा निर्णय एवढा सोप्पा होता का? पण अगदी सहजपणे रमाने घेतला. रमा सारख्या लोकांचे विचार vision खूप क्लीअर असतात.

म्हणतात ना,

हम क्या करते इसका महत्व तो हैं ही । परंतु हम किस भाव से करते हैं? इसका महत्व अधिक हैं।

खरंय,

Family is not about blood, It is who is willing to hold your hand when you need to hold it.

आज आम्ही दोघीही सिनियर सिटीझन आहोत. आजही रमाच्या उत्साह बघण्यासारखा आहे. घर, जबाबदारी, त्याचबरोबर आपले छंद जोपासणे याचे गणित/ तालमेल जमत तिला.

मैत्रिणींचा खूप जमावडा नसला तरी चालतो. रमा सारखी एक मैत्रिण म्हणजे माझ्यासाठी लॉकर मध्ये ठेवण्यासारखा मुल्यवान ठेवा आहे.

आम्ही दोघी एकाच वयाच्या मैत्रिणी असलो, तरीही मला तिच्या बद्दल खूप आदर आहे.

Thank you Rama for being with me.

I always enjoy company of People who introduce you to new ways of thinking and new ways of seeing life. They are always very important for me.

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ स्वतःला पृथ्वीशी जोडणे… ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🌈 इंद्रधनुष्य 🌈

☆ स्वतःला पृथ्वीशी जोडणे… ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

स्वतःला पृथ्वीशी जोडणे, ज्याला आधुनिक भाषेत ‘अर्थिंग’ (Earthing) किंवा ‘ग्राउंडिंग’ (Grounding) असेही म्हणतात, हे केवळ आध्यात्मिक नसून वैज्ञानिकदृष्ट्याही अत्यंत महत्त्वाचे आहे.

आपल्या शरीरात सतत जैविक-विद्युत क्रिया (Bio-electrical activities) सुरू असतात. जेव्हा आपण पृथ्वीच्या थेट संपर्कात येतो, तेव्हा त्याचे आपल्या आरोग्यावर अनेक सकारात्मक परिणाम होतात. याची प्रमुख कारणे खालीलप्रमाणे आहेत:– – – 

१. शरीरातील सूज (Inflammation) कमी करणे

आपल्या शरीरात चयापचय क्रियेमुळे ‘फ्री रॅडिकल्स’ तयार होतात, ज्यांच्यावर पॉझिटिव्ह चार्ज असतो. पृथ्वीवर मुक्त इलेक्ट्रॉन्सचा (Negative charge) अफाट साठा असतो. जेव्हा आपण अनवाणी पायाने जमिनीवर चालतो, तेव्हा हे इलेक्ट्रॉन्स आपल्या शरीरात प्रवेश करतात आणि फ्री रॅडिकल्सना संतुलित करतात. यामुळे जुनाट आजार आणि सूज कमी होण्यास मदत होते.

२. तणाव आणि स्ट्रेस कमी करणे

पृथ्वीशी जोडले गेल्यामुळे शरीरातील कॉर्टिसोल (Cortisol) या स्ट्रेस हार्मोनची पातळी नियंत्रित राहते. यामुळे मानसिक शांतता मिळते, चिंता कमी होते आणि आपली मज्जासंस्था (Nervous System) शांत होते.

३. झोपेची गुणवत्ता सुधारणे

ग्राउंडिंगमुळे शरीराचे ‘सर्काडियन रिदम’ (Circadian Rhythm – जैविक घड्याळ) सुधारते. ज्या लोकांना निद्रानाशाचा त्रास आहे, त्यांना जमिनीच्या संपर्कात राहिल्यामुळे गाढ आणि चांगली झोप लागते.

४. रक्ताभिसरण सुधारणे

काही संशोधनानुसार, अर्थिंगमुळे रक्ताची चिकटपणा (Viscosity) कमी होतो. यामुळे रक्त पातळ राहण्यास आणि शरीरात ऑक्सिजनचा पुरवठा सुरळीत होण्यास मदत होते, जे हृदयाच्या आरोग्यासाठी उत्तम आहे.

पृथ्वीशी कसे जोडून घ्यावे?

स्वतःला ग्राउंड करण्यासाठी तुम्ही खालील साध्या गोष्टी करू शकता:

 अनवाणी चालणे : गवत, माती किंवा वाळूवर किमान १५-२० मिनिटे अनवाणी चालावे.

 बागेत काम करणे : झाडांना पाणी देणे किंवा मातीशी संपर्क येईल अशी कामे करणे.

 नैसर्गिक पाण्यात पोहणे : समुद्र किंवा नदीच्या पाण्यात पोहणे हे ग्राउंडिंगचा एक उत्तम मार्ग आहे.

 पृथ्वी कडुन ऊर्जा मिळवणे हे मेडिटेशन करणे

आपल्याला पंचमहाभूतां कडून ऊर्जा मिळत असते. कारण आपणही निसर्गाचाच एक घटक आहोत.

आपण मदर अर्थ अर्थात पृथ्वी माता कडून ऊर्जा कशी मिळवायची हे बघणार आहोत.

– – सिमेंटचे रस्ते किंवा लाकडी फरशीवरून चालल्याने अर्थिंग होत नाही, कारण ते विद्युतरोधक असतात. नैसर्गिक माती किंवा गवत हाच सर्वोत्तम पर्याय आहे.

थोडक्यात सांगायचे तर, आपण निसर्गाचाच एक भाग आहोत. आधुनिक जीवनशैलीत आपण रबरी चपला आणि सिमेंटच्या घरांमध्ये अडकल्यामुळे हा संपर्क तुटला आहे. तो पुन्हा जोडणे हे आपल्या शारीरिक आणि मानसिक आरोग्यासाठी ‘नॅचरल हीलिंग’ (Natural Healing) सारखे काम करते.

समाप्त — 

©  विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन व हिलिंग मास्टर,  समुपदेशक,  सांगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

मोबाईल नंबर – ८०८७८१०१९७

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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