मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ जे पेराल ते उगवेल – लेखिका : शोभा ननवरे ☆ प्रस्तुती – शीतल कुलकर्णी ☆

शीतल कुलकर्णी

? वाचताना वेचलेले ?

☆ जे पेराल ते उगवेल – लेखिका : शोभा ननवरे ☆ प्रस्तुती – शीतल कुलकर्णी ☆

☆

शुद्धबीजा पोटीं। फळे रसाळ गोमटीं ||१॥

मुखीं अमृताची वाणी। देह देवाचे कारणीं ॥ध्रु. ॥

सर्वांग निर्मळ । चित्त जैसें गंगाजळ ॥२॥

तुका म्हणे जाती। ताप दर्शनं विश्रांती॥३॥

जगद्गुरू संत तुकाराम महाराज जेव्हा “शुद्ध बीजापोटी, फळे रसाळ गोमटी” असे म्हणतात, तेव्हा ते आपल्याला सावध करत असतात. आजचा तरुण वर्ग, आजचा समाज ‘इन्स्टंट” निकालाच्या मागे धावत आहे. कोणालाही कष्टाची पेरणी नको आहे, पण प्रत्येकाला यशाचे रसाळ फळ हवे आहे. पण निसर्गाच्या दरबारात लाच चालत नाही आणि वशिलाही चालत नाही. तिथे बाभळीच्या काट्यांची पेरणी करून हापूसच्या गोडव्याची अपेक्षा करणे म्हणजे स्वत:चाच घात करण्यासारखे आहे. बीज म्हणजे काय? बीज म्हणजे केवळ धान्याचा दाणा नव्हे; तर बीज म्हणजे आपले विचार, आपले संस्कार, आपली संगत आणि आपली नीतिमत्ता.

क्रिकेटचा देव मानला जाणारा सचिन तेंडुलकर हा काही आकाशातून पडला नाही. त्याच्या जडणघडणीत त्याच्या गुरूंनी – रमाकांत आचरेकर सरांनी पेरलेले ‘शिस्तीचे बीज’ महत्त्वाचे होते.

शिवाजी पार्कवर सराव करताना, जेव्हा सचिन थकून जायचा, तेव्हा आचरेकर सर स्टंपवर एक रुपयाचे नाणे ठेवायचे आणि सांगायचे, “जो गोलंदाज सचिनला बाद करेल, त्याला हे नाणे मिळेल आणि जर सचिनने कोणालाही आपली विकेट दिली नाही, तर हे नाणे सचिनचे. “

त्या एका रुपयाच्या नाण्यासाठी सचिन जिवाची बाजी लावून खेळायचा. ते नाणे म्हणजे पैशाचे आमिष नव्हते, तर ते ‘कष्टाला पर्याय नाही’ आणि ‘एकाग्रता ढळू देऊ नको’ या संस्कारांचे बीज होते. पुढे सचिनकडे कोट्यवधी रुपये आले, पण त्या गुरुंनी दिलेल्या एका रुपयाच्या नाण्याची किंमत त्याच्यासाठी सर्वाधिक राहिली. हे ‘शुद्ध बीज’ होते. म्हणूनच, एवढी प्रसिद्धी मिळवूनही सचिनच्या डोक्यात कधी हवा गेली नाही. त्याचे पाय जमिनीवर राहिले.

मित्रहो, हे प्रकरण वाचताना स्वतःला एक प्रश्न विचारा,

“आज मी माझ्या मेंदूच्या शेतात कोणते बीज पेरतोय?” जर तुम्ही आळसाचे बीज पेरले, तर उद्या दारिद्र्याचे पीक उगवेल.

जर तुम्ही व्यसनाचे बीज पेरले, तर उद्या विनाशाचे पीक उगवेल.

जर तुम्ही अहंकाराचे बीज पेरले, तर उद्या अपमानाचे पीक उगवेल.

जर तुम्ही कष्टाचे बीज पेरले, तर यश उगवेल.

जर तुम्ही नम्रतेचे बीज पेरले, तर सन्मान उगवेल.

आणि जर तुम्ही माणुसकीचे बीज पेरले, गेले तर समाधान उगवेल.

तुकाराम महाराजांचा हा अभंग केवळ भक्तीचा नाही, तर ती एक ‘वॉर्निंग बेल’ आहे आणि यशाची ‘गुरुकिल्ली’ सुद्धा आहे. तुमची परिस्थिती आज कशीही असू तुमचे ‘बीज’ (विचार आणि हेतू) शुद्ध असेल, तर तुमची फळे (भविष्य) रसाळ आणि गोमटी असणारच, यावर विश्वास ठेवा. कारण शेवटी निसर्गाचा नियम एकच आहे ज्याची पेरणी जबरदस्त, त्याचीच उगवण जबरदस्त!  

 ☆

लेखिका :सौ शोभा ननवरे

प्रस्तुती : शीतल कुलकर्णी

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ बालकाची विनवणी.. ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक 

 

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? बालकाची विनवणी.. ? श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

☆

नैवेद्याच्या नावाखाली 

पडे पूर्णब्रह्म चौथऱ्यावर,

निर्जीव दगडांच्या देवासाठी

मात्र पंचपक्वानांचा आहार!

*

फाके पडती घरच्यांना 

त्यात पडला हा दुष्काळ,

तुझ्या नशिबात मात्र देवा 

असे फुकटचा सुकाळ!

*

तुझ्याच घरची आम्ही फुले 

ठेवतोस का आम्हां उपाशी?

सदा भुकेले ठेवून आम्हाला 

तूच का बरे जेवावे तुपाशी?

*

दिसताच सुग्रास भोजन 

नजर त्याच्यावर पडली,

एवढे सगळे तू कसे खाणार 

बाल मनात शंका आली!

*

प्रसाद समजून घेतो थोडं 

भूक घरच्यांची भागवतो,

चोरी समजू नको तू याला 

एवढे एकच तुज विनवितो!

एवढे एकच तुज विनवितो!

☆

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६७ ☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘इंसानियत‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६७ ☆

☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“प्लीज अंकल, दो महीने से मुझे सैलेरी नहीं मिल रही है, जैसे ही मिलेगी मैं आपको किराया दे दूंगी.”

“मुझे कुछ नहीं पता, रहना हो तो किराया दो, नहीं तो मकान खाली कर दो.”

“इस समय मुझे यहीं रहने दीजिए. आप ही बताइए ना मैं कहाँ जाऊँ इस समय?”

“मुझे कुछ नहीं पता” – बडे रूखेपन से मकान मालिक ने जबाब दिया.

“अंकल! आपको पता है ना कोरोना के कारण देश का क्या हाल है. मुझे मकान कहाँ मिलेगा किराए पर इस समय” – उसने बडी मायूसी से कहा.

“मुझे इससे कोई मतलब नहीं, मैंने पहले ही कहा था कि किराया समय पर देना होगा”.

रिया ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन मकान मालिक ने एक ना सुनी, साफ कह दिया कि- “किराया दो या मकान खाली करो.” रिया ने परेशान होकर अपने लिए मकान देखना शुरू किया . दोस्तों के परिचय से मकान मिल तो गया अब समस्या यह थी कि नए घर में सामान कैसे पहुँचाया जाए? लॉकडाउन के कारण कोई आ नहीं सकता था, बालकनी में खडी सोच रही थी कि सडक पर कुछ लडकों को जाते देखा, सबके कंधो पर बैग लदे थे, हाथों में भी सामान था. सबके चेहरों पर बडी थकान दिख रही थी. रिया ने बडे सकुचाते हुए उन्हें अपनी परेशानी बताई और पूछा – मुझे नए घर में सामान शिफ्ट करना है आप लोग मेरी मदद कर देंगे क्या? मेरे पास पैसे भी थोडे ही हैं.

उन्होंने एक दूसरे की तरफ देखा. “अरे दीदी काहे नहीं करेंगे मदद” – मुस्कुराता हुआ एक लडका बोला, “हमें आदत है मेहनत – मजूरी करने की.” सबने अपना सामान एक किनारे रखा और लग गये रिया की मदद करने. सामान पहुँचाने के बाद रिया ने उन्हें पैसे देने चाहे तो एक मजदूर हाथ जोडकर बोला –  “दीदी पैसे की बात ना करना, हम समझते हैं सबके हालात, देखो ना हम भी तो मारे – मारे घूम रहे हैं. बस इतनी दुआ करना कि हम अपने घर पहुँच जाएं अपनों के पास” —  उसकी आँखें भर आईं.  

रिया को इंसान में भगवान के दर्शन हो गये थे.

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # ३०३ ☆ शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०३ ☆

☆ शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

माँ की ममता छाँव, शक्तिमय पावन धारा।

सुंदर हो हर राह, लगे सुखमय जग सारा॥

माँ से मिलती आस, फैलता हिय उजियारा।

माँ चरणों में प्रीत, रहे मन भावन प्यारा॥

☆

नवरात्रि शक्ति की आराधना के साथ प्रकृति के प्रति हमारी आस्था और जीवन में सकारात्मकता का संदेश देने वाला पर्व भी है। इस अवसर पर जवारे बोने की परंपरा धार्मिक विश्वास के साथ जीवन के गहरे अर्थों को भी अभिव्यक्त करती है। मिट्टी के पात्र में बोए गए अनाज के दाने जब हरी कोपलों के रूप में फूटते हैं, तो प्रकृति की सृजनशीलता साकार हो उठती है।

नवरात्रि के प्रथम दिन स्वच्छ मिट्टी और अनाज के दानों से जवारे बोए जाते हैं। नौ दिनों तक देवी की आराधना के साथ इनकी देखभाल की जाती है। प्रतिदिन बढ़ती हरियाली भक्तों के मन में शुभता और समृद्धि का भाव जगाती है। नवमी के दिन विधिपूर्वक पूजा-अर्चना के पश्चात जवारों का विसर्जन किया जाता है अथवा स्थानीय परंपरा के अनुसार उन्हें उपयोग में लाया जाता है।

जवारों का अंकुरण प्रकृति के एक सहज सत्य से परिचित कराता है—जीवन के विकास के लिए अनुकूल वातावरण, धैर्य और देखभाल आवश्यक हैं। मिट्टी के भीतर दबा बीज अंधकार में भी अपने अस्तित्व की संभावनाएँ सँजोए रहता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही वह धरती को भेदकर प्रकाश की ओर बढ़ने लगता है। मनुष्य का जीवन भी इससे अलग नहीं है। विपरीत परिस्थितियों के बीच आशा और आत्मविश्वास का सहारा नई राह खोजने की प्रेरणा दे सकता है।

जवारों की हरियाली को शुभता, समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में इनके रंग, लंबाई और वृद्धि को लेकर अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। इन मान्यताओं का अपना सांस्कृतिक महत्त्व है, यद्यपि इन्हें भविष्य के निश्चित संकेतों के बजाय लोकविश्वास के रूप में देखना अधिक उचित है।

जवारे बोने की परंपरा हमें मिट्टी, बीज और जीवन के परस्पर संबंध का स्मरण कराती है। जिस प्रकार नन्हे अंकुरों के विकास के लिए संवेदनशील देखभाल आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन में भी संबंधों, मूल्यों और प्रकृति के संरक्षण के लिए सजगता अपेक्षित है। नवरात्रि की यह हरियाली हमें सिखाती है कि आस्था का वास्तविक विस्तार तभी होता है, जब वह हमारे व्यवहार में उतरकर प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का रूप लेती है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आह्वान… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आह्वान… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

(कविता संग्रह ‘योंही’ से)

कह दो उनसे,

संभाल लें

मोर्चे अपने-अपने,

जो खड़े हैं

ताक़त से मेरे ख़िलाफ़,

कह दो उनसे,

बिछा लें बिसातें

अपनी-अपनी,

जो खड़े हैं

दौलत से मेरे ख़िलाफ़,

हाथ में

क़लम उठा ली है मैंने

और निकल पड़ा हूँ

अश्वमेध के लिए…!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 126 – The Relic on the Doorpost… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Relic on the Doorpost.  

☆ Witful Warmth# 126 ☆

☆ Satire ☆ The Relic on the Doorpost… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Near the doorway of the main veranda at the town’s oldest state veterinary hospital, a weathered leather strap fitted with an iron horseshoe had hung from a rusty nail for twenty solid years. Its hand-stitched seams had long unraveled under decades of damp winds and relentless sun. Once upon a time, that coarse horseshoe had carried the tender devotion of someone determined to shield the cracked hooves of abandoned bullocks and draft horses; now, it was simply an antique dust-trap buried under flaking lime.

Directly below the doorway, perched on a cracked brick plinth, sat old Hardev every morning at seven sharp, anchored to the pavement by an ancient bamboo staff. Clad in a frayed white khadi kurta and sporting a grubby towel over his shoulder, Hardev spent entire days staring down that rusty horseshoe with hollow, petrified eyes.

Meanwhile, just past the veranda steps, the hospital grounds were choked with a gleaming fleet of modern livestock ambulances, glossy brochures for imported pedigree dog spa products, and chauffeur-driven sedans carrying the high-ranking mandarins of the Animal Welfare Board. From the raised pavilion, blaring PA horns sprayed the crowd with interminable, honey-glazed sermons on compassion for our mute, four-legged brethren. Naturally, neither the fresh crop of clinical interns nor the bespoke-suited directors had any intention of acknowledging a moldering leather strip in the corner.

Whenever Sukhram, the aging herdsman, shuffled past clutching a bale of green fodder, the old man’s motionless vigil would give him the chills. Hardev would invariably ask in a raspy, feeble croak: “Tell me, Sukhram, on this glorious World Animal Day, has any grand decree arrived to measure the agony in an old bullock’s split hoof using this horseshoe? Or are the delegates strictly being fed recycled podium rhetoric for pasture today?”

Sukhram would drop his gaze, let out a well-rehearsed administrative sigh, and shuffle quietly into the haze.

The hospital had recently acquired a brand-new Chief Veterinary Officer straight from the capital’s animal husbandry secretariat: Dr. Animesh Agnihotri, a notoriously stiff martinet, an authority on laparoscopic veterinary surgery, and a worshiper of antiseptic protocol. Whenever Dr. Agnihotri stepped out of his state-issued sedan to inspect the newly air-conditioned operation theaters, his eyes unfailingly collided with old Hardev stationed on the bricks, locked in silent communion with the junk on the doorframe.

To a modern bureaucrat celebrating World Animal Day amidst boutique pet clinics and pedigree grooming vans, a tattered geriatric folding his hands before a scrap of corroded iron looked less like devotion and more like unauthorized architectural squatting.

When the inaugural speeches finally wrapped and the dignitaries filed into the air-conditioned VIP pavilion to graze on salted cashews and government-funded buffets, Agnihotri left his security detail behind and marched straight up to Hardev.

“Look here, old man,” the Chief Officer barked, deploying his best administrative bass. “Why block the main thoroughfare day in and day out? If you need a rural livestock pension or a complimentary vaccine voucher, join the queue at the OPD counter inside. Staring a hole through a piece of rusty scrap won’t fill the stomachs of the stray cattle roaming this country’s highways.”

Hardev joined his palms with maddening composure. “Officer Sahib, I am not here to hustle for free vaccines or pension doles. I am merely keeping watch for the day when that horseshoe recovers the compassion that was stolen from this very threshold years ago.”

Agnihotri scoffed at the riddle. “What stolen compassion? The ministry burns through millions every World Animal Day erecting state-of-the-art shelters. What grand mystery could possibly cling to this flea-market horseshoe?”

Pandit Someshwar, a retired livestock extension officer who had spent forty years examining every limping hoof and infected laceration in the district, stepped forward. “Do not dismiss him as a lunatic, Director. Twenty years ago, when the local trade was routinely shipping sick, worn-out bullocks directly to the abattoirs, Hardev’s only son, Manas, stood right on this veranda and lit the fiercest torch for animal rights this state had ever seen.”

Agnihotri raised an eyebrow. “And what did this prodigy accomplish that ties him to a strip of rotting leather?”

“He was the state’s brightest, most empathetic young veterinary surgeon,” Someshwar recalled with a heavy sigh. “When commercial traders abandoned broken workhorses to starve in the gutters, Manas spent sleepless nights cleaning their bleeding hooves and binding them with that very shoe. He nailed it to this doorway and took an oath: until the last voiceless beast in this town was granted the right to live, he would never surrender to the corporate lobbies.”

Hardev reached out, his trembling fingertips lightly grazing the dry, cracked hide. “Yes, Sahib. My Manas stood on these bricks and told me: ‘Bapu, this isn’t just a lump of iron; it is a shield for the tears of the defenseless.’ He swore that the day he returned from the capital with a sanctioned sanctuary charter from the National Animal Board, he would rub mustard oil into this strap with his own hands and seat me as the guest of honor on the nation’s grandest stage.”

Pricked by bureaucratic curiosity, Agnihotri retreated into the records room to exhume the twenty-year-old case file. Flipping through the brittle, classified pages, the ground vanished beneath his polished leather oxfords.

The archival trail laid bare a classic corporate buyout. Twenty years ago, just as Manas’s grassroots campaign threatened to choke the illicit livestock pipelines, a multinational syndicate of pet-food conglomerates and leather exporters stepped in with a standard corporate solution. Rather than break his movement, they bought the crusader: an appointment as Managing Director of their international pet-nutrition subsidiary, sweetened with a discreet twenty-five percent equity stake.

Manas promptly junked his vows, forgot the horseshoe, signed on the dotted line, and reinvented himself into the country’s premier billionaire meat-processing tycoon. Today, his automated slaughterhouses consumed the town’s spent bullocks by the thousands, tinning their flesh into gourmet pâté for high-pedigree foreign house pets.

Agnihotri walked back out into the sun with wobbly knees, his clinical swagger completely drained. “Old man…” he stammered, his throat dry, “your savior of the voiceless didn’t liberate the cattle. He built the slaughterhouse.”

Tears carved silent tracks down the old man’s face, though his gaze remained anchored to the iron shoe.

“I have known he was bought for a very long time, Sahib,” Hardev whispered quietly. “I only sit here every day to check one simple thing: when our decorated grandees gather on stage to perform their tearful tributes to dumb beasts, after having traded their own heritage and their own herdsman father’s work for an export quota—does this deaf society catch even the faintest whiff of rot rising from the shroud of monetized compassion? Or are the snacks in the VIP lounge simply too savory to notice?”

Agnihotri stood entirely paralyzed, staring up at the rusted horseshoe, as the grand veterinary pavilion choked on the suffocating, shameful silence of an old father’s quiet grief.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३४ ☆ हिंदी साहित्य में लघुकथा : छोटी काया, व्यापक जीवन-दृष्टि ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३४ ☆

?  आलेख – हिंदी साहित्य में लघुकथा : छोटी काया, व्यापक जीवन-दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य में लघुकथा की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि रचना का महत्त्व उसके आकार से नहीं, उसके अनुभव और प्रभाव से तय होता है। कुछ पंक्तियों में भी कोई कथा मनुष्य के भीतर एक लंबी बहस शुरू कर सकती है। किंतु लघुकथा को केवल ‘कम शब्दों वाली कहानी’ मानना भूल होगी। उसमें कथा-सूत्र, पात्र या स्थिति, अर्थपूर्ण तनाव और ऐसी परिणति चाहिए जो कहे हुए के साथ अनकहे को भी पाठक के अनुभव में जगा दे।

भारतीय कथा-परंपरा में पंचतंत्र, जातक, लोककथाएँ, दृष्टांत और बोधकथाएँ संक्षिप्त कथन के पुराने उदाहरण हैं। फिर भी इन्हें आज की हिंदी लघुकथा का सीधा पर्याय नहीं माना जा सकता। उनकी रचना-प्रेरणा प्रायः नीति, शिक्षा अथवा मनोरंजन से जुड़ी थी; आधुनिक लघुकथा अधिकतर जीवन की जटिलता, विडंबना और सामाजिक यथार्थ से अपना अर्थ ग्रहण करती है। परंपरा ने उसे संक्षेप का संस्कार दिया, आधुनिक समाज ने उसकी अलग पहचान बनाई।

हिंदी साहित्य को लघुकथा से क्या मिला, यह सवाल विचारणीय है। यह अभिव्यक्ति की एक सशक्त विधा है।

लघुकथा ने सबसे पहले साधारण दिखने वाले क्षण को साहित्यिक गरिमा दी। दफ्तर का एक संवाद, अस्पताल के बाहर की प्रतीक्षा, घरेलू कामगार की चुप्पी या किसी बच्चे का प्रश्न, ऐसे दृश्य बड़े सामाजिक तंत्र की असमानता खोल सकते हैं। उपन्यास व्यापक संसार रचता है और कहानी अनुभव को अपेक्षाकृत विस्तार देती है।  लघुकथा एक चुने हुए बिंदु पर दृष्टि केंद्रित कर पाठक से शेष संसार की मनोगत कल्पना करवाती है। यह किसी अन्य विधा का विकल्प नहीं, रचना का अलग कलात्मक रास्ता है।

हिंदी गद्य को मितव्ययी भाषा, सार्थक संवाद और संकेत की शक्ति का नया अभ्यास भी लघुकथा ने दिया है। अच्छी लघुकथा उपदेश सुनाकर पाठक का काम पूरा नहीं करती, sवह प्रश्न छोड़ती है। इसीलिए उसका योगदान केवल सामाजिक विसंगतियाँ दिखाने तक सीमित नहीं। वह मनुष्यता, स्मृति, अकेलेपन, सह-अस्तित्व और छोटे नैतिक निर्णयों की जटिलता को भी व्यक्त कर सकती है। व्यंग्य उसका एक सशक्त औजार है, अनिवार्य स्वभाव नहीं।

प्रायः कहा जाता है कि लघु कथा में एक घटना, कम पात्र, छोटा समय, तीखा अंत और निश्चित शब्द-सीमा होनी चाहिए। ये सूत्र अभ्यास में उपयोगी हो सकते हैं, पर इन्हें अटल विधान बना देने से रचना कृत्रिम हो जाती है।

इनके अभाव में कुछ लोग लघुकथा को लघु कहानी कह देते हैं।

मेरी समझ में अधिक विश्वसनीय कसौटी है कथात्मक एकाग्रता,  क्या हर वाक्य मुख्य अनुभव को आवश्यक रूप से आगे बढ़ाता है? क्या पात्र और प्रसंग जितने हैं, उतने ही चाहिए? क्या अंत से पहले की पूरी रचना उसके अर्थ को तैयार करती है?

कम शब्द होना पर्याप्त नहीं।  घटना का संक्षिप्त समाचार लघुकथा नहीं बन जाता। चुटकुले का अंतिम पलटाव क्षणिक हँसी दे सकता है, जबकि लघुकथा का अंत पाठक को पहले पढ़ी बात नए अर्थ में सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हर रचना में चौंकाने वाला ‘ट्विस्ट’ या स्पष्ट नैतिक शिक्षा भी अनिवार्य नहीं समझी जानी चाहिए। कभी मार्मिक मौन, कभी अप्रत्याशित संवाद और कभी बिना किसी नाटकीय घोषणा के खुली रह गई परिस्थिति अधिक प्रभावी होती है। शीर्षक अर्थ को खोल सकता है, पर उसे पूरी कथा का सारांश बनने की आवश्यकता नहीं। भाषा सहज हो, मगर सपाट नहीं, विवरण कम हों, मगर जीवन-संदर्भ अनुपस्थित न हो। लघुकथा कार के विवेक एवं शिल्प को नियमों में बांधना मेरी शैली और समझ में कम आता है।

‘एक ही समय-काल’ की अनिवार्यता पर भी व्यापक विचार ज़रूरी है। एक केंद्रित दृश्य लघुकथा के लिए अक्सर उपयोगी है, किंतु बीते समय की एक स्मृति या सीमित समय की छलाँग यदि मुख्य अनुभव को गहरा करती है, तो उसे केवल तकनीकी नियम के कारण निषिद्ध नहीं किया जा सकता। मेरे विचार में एक केंद्रीय प्रभाव अधिक सार्थक अनुशासन है, न कि घड़ी की सुइयों से बाँधी गई कथा। समय-विस्तार इतना ही हो कि रचना की सघनता बनी रहे। जहाँ कई स्वतंत्र प्रसंग और विस्तृत चरित्र-विकास आवश्यक हों, वहाँ संभव है कि विषय कहानी का आकार माँग रहा हो। रचनाकार को विधा की पहचान और कथ्य की आवश्यकता, दोनों समाझनी चाहिए।

आज लघुकथा संग्रहों, साहित्यिक पत्रिकाओं, मंचों और डिजिटल माध्यमों में निरंतर लिखी-पढ़ी जा रही है। इस प्रसार ने नए लेखकों और विविध सामाजिक अनुभवों को प्रवेश दिया है। साथ ही त्वरित प्रकाशन का दबाव अधूरी रचना, तैयारशुदा संदेश और केवल ‘आखिरी पंक्ति के झटके’ को भी बढ़ा सकता है। पाठकों की संख्या से अधिक महत्त्वपूर्ण है आलोचनात्मक पाठ, संपादन और श्रेष्ठ रचनाओं का विवेकपूर्ण चयन। क्षेत्रीय भाषिक अनुभव, स्त्री-दृष्टि, श्रमजीवी जीवन, पर्यावरण, तकनीकी बदलाव तथा हाशिये की आवाज़ें लघुकथा के कथ्य को और व्यापक बना सकती हैं।

लघुकथा की शक्ति यह नहीं कि वह कम समय में ‘खत्म’ हो जाती है। उसकी असली शक्ति यह है कि पढ़ने के बाद भी वह पाठक के भीतर चलती रहती है। हिंदी साहित्य को उसने इसी उत्तरजीवी अर्थ का एक सघन रूप दिया है। विधा को अनुशासन चाहिए, पर ऐसा अनुशासन जो अनुभव को तराशे, उसकी साँस न रोके।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “आने वाले समय की कहानी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – आने वाले समय की कहानी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

युग युग बीते

वो ऊपर जाती सीढ़ियां

कभी खत्म ही नहीं होतीं

जैसे किसी पिरामिड पर हो

चट्टानों को लेकर चढ़ना

और, जिस्म पर हमेशा

समय के हंटर का चलना

एक समय उभरेगा

प्रयासों के स्मारक बन जाएंगे

लेकिन पीढ़ियों को फुरसत नहीं होगी

कभी पलकों में दो आंसू लिये

यहाँ भ्रमण करने की

ये भी एक युग बन कर बीत जाएगा

फर्श से अर्श तक की चढ़ाई का

फिर कोई इतिहास क्यों बने

जैसे बीते अध्यायों पर

अब कोई लकीरें, आकृतियां

उकेरे जाने का सिलसिला,

समाप्तप्राय हो चला है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११७ ⇒ विकृति विज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विकृति विज्ञान…“।)

?अभी अभी # १११७ ⇒ आलेख – विकृति विज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 *PATHOLOGICAL TEST *

हमारी कंचन सी काया जब स्वस्थ रहती है तो इसे चंदन सा बदन, चंचल चितवन जैसे विशेषणों से सुशोभित किया जाता है, लेकिन एक छींक अपशकुन कर जाती है, कहीं सर्दी है, तो कहीं बुखार और कहीं सरदर्द। लो जी, कोयल को वायरल हो गया। अच्छा भला कोकिल कंठ, कौवे की तरह, काँव काँव और खांव खांव करने लग गया।

आप भले ही सत्तर लाख की कार के मालिक हों, आपके इस शरीर रूपी रथ की रगों में खून के साथ साथ, कफ, पित्त और वात जैसे विकारों का भी वास है। अगर आपकी सड़कों पर बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसी गाड़ियां दौड़ रही हैं तो आपके खून में भी आरबीसी और WBC मौजूद हैं। थोड़ा भी संतुलन बिगड़ा, और एक्सीडेंट हो गया रब्बा रब्बा। गाड़ी सर्विस सेंटर में।।

हमारे शरीर के भी मेकेनिक हैं।

जिस तरह हम सौदा खरीदने के पहले सैंपल देखते परखते हैं वैसे ही हमारे शरीर की भी जाँच परख होती है। डॉक्टर के पास अपने औजार होते हैं। एक टॉर्च और गले में स्टेथोस्कोप ! वह पहले आपकी आँखें देखता है, कहीं पीकर तो नहीं आए।

फिर आदेश होता है, जबान बाहर करो। आप उसे पहले आँखें और पश्चात् जबान दिखाते हैं। उसे बुरा नहीं लगता। अपने गुस्से को दबाने के लिए वह हमें लंबी गहरी सांस लेने को कहता है। कभी हमारी हँसी तो कभी खाँसी छूट जाती है। वह फिर भी नहीं मानता। हमारी कलाई थाम लेता है और अपने यंत्र को कान में लगाकर हमारी धड़कन सुनता है। फिर हमारी बांह थामकर ब्लड प्रेशर चेक करता है। वायरल है, कहकर कुछ एंटीबायोटिक लिख देता है।

अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है। आप दवा की पुड़िया लेकर घर आ जाते हैं। कुछ दवा के जल्दी असर के लिए, साथ में दारू भी लगा लेते हैं। जब दवा दारू असर नहीं करते तब डॉक्टर कुछ पैथोलॉजिकल टेस्ट लिखता है जिसे सरकारी अस्पतालों की भाषा में खून, टट्टी और पेशाब की जाँच कहते हैं।

और अंग्रेजी में ब्लड, यूरीन और स्टूल टेस्ट। अगर सस्ते में निपट गए तो ठीक वर्ना बीमारियां और डॉक्टर मिलकर जांच को युद्ध स्तर पर ले जाते हैं और बात एंजियोग्राफी, सीटी स्कैन, और एम. आर.आई .तक पहुँच जाती है और कभी भी सर्जिकल स्ट्राइक का खतरा बना रहता है।।

अंग्रेजी भाषा का यह टेस्ट शब्द भी बड़ा अजीब है। अंग्रेजी में दो शब्द हैं, test और taste ! Test जांचने, परखने को कहते हैं जब कि taste का संबंध स्वाद और चखने से है। जिस स्टूल पर हम बैठते हैं, उसका अंग्रेजी में और भी एक अर्थ होता है। अर्थ क्या जी अनर्थ होता है। आगे देखिए अब क्या होता है।

दिवाली की मिठाइयों ने हमें भी विकारग्रस्त कर दिया और डॉक्टर ने दवा दारू के सेवन के पश्चात् तीनों टेस्ट करवाने की सलाह दी। खून का क्या है, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें रिपोर्ट दूंगा, और हमने खून जांच के लिए दे दिया। यूरीन में भी कोई खास परेशानी नहीं हुई। वहीं पैथोलॉजिस्ट के यहां थोड़ा पानी पीया और एक शीशी में सैंपल छोड़कर चले आए। स्टूल हम साथ नहीं लाए थे, इसलिए स्टूल का सैंपल हमें अपने घर से ही लेकर आना था।।

हम रवींद्र नाथ त्यागी नहीं, फिर भी त्यागे मल को हमने किसी तरह एक मधुरम स्वीट्स के खाली मिठाई के डब्बे में सुरक्षित कैद किया और उसे एक शालीन स्वरूप प्रदान किया। सुबह सवेरे जब पैथोलॉजिकल क्लिनिक में गए तो रिसेप्शन काउंटर पर बैठी बालिका को हमारी आकर्षक धरोहर सौंपी और हम कुछ कह पायें, उसके पहले ही उसकी बांछे खिल गई और वह बोली, इसकी क्या जरूरत थी। वह बालिका समझी, हम उसके लिए दीपावली की मिठाई लेकर आए हैं।

मजबूरन हमें यह कहने को बाध्य होना पड़ा, मैडम स्टूल टेस्ट के लिए सैंपल मंगाया था, यह वही है। उसके बाद हम उसका उतरा हुआ चेहरा नहीं देख पाए, बस एक अफसोस भरा ओह, अच्छा, सॉरी और थैंक यू का स्वाद ही चख पाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ – पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग जी द्वारा लिखित पुस्तक – “गुल्लक और उसकी रजाई” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ ☆

☆ पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

कहानी-संग्रह : गुल्लक और उसकी रजाई

कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग

प्रकाशन सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

प्रथम संस्करण : 2026

ISBN : 978-93-7251-012-6

मूल्य : ₹199/-

समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ गुल्लक और उसकी रजाई : बालमन की जिज्ञासा से सामाजिक चेतना तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बाल साहित्य को लेकर एक सामान्य धारणा यह रही है कि वह बच्चों के मनोरंजन और नैतिक शिक्षण का माध्यम है। किंतु आधुनिक बाल साहित्य ने इस सीमित धारणा से आगे बढ़कर बालक को उसके समय, समाज, पर्यावरण और बदलती जीवन-स्थितियों के बीच देखने का प्रयास किया है। आज का बच्चा केवल परी-कथाओं का पाठक नहीं है; वह तकनीक से परिचित है, प्रश्न करता है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखता है और अनेक बार बड़ों की स्थापित धारणाओं पर भी सवाल उठाता है। इसलिए आज की बाल कहानी से अपेक्षा है कि वह बालमन की जिज्ञासा को स्वीकार करे और उसे संवेदना, विवेक तथा सामाजिक चेतना से जोड़े।

अंजना मनोज गर्ग का कहानी-संग्रह ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी बदलती हुई बाल साहित्यिक चेतना का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। इसमें बीस कहानियाँ हैं और लगभग प्रत्येक कहानी किसी न किसी समकालीन सरोकार को बालमन के निकट ले आती है। जल-संरक्षण, पर्यावरण, पशु-पक्षी, स्वच्छता, पुस्तकों के प्रति प्रेम, बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक संबंध, त्योहार, प्रकृति और आधुनिक तकनीकी जीवन—ये सभी विषय संग्रह में अपनी अलग-अलग कथात्मक शक्ल में उपस्थित हैं।

इस संग्रह की विशेषता यह है कि लेखिका गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सीधे भाषण के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें कहानी की स्थितियों में बदलने का प्रयास करती हैं। कहीं रजाई कथा का माध्यम बनती है, कहीं पुस्तक स्वयं अपना दर्द व्यक्त करती है, कहीं जंगल एसी की माँग करता दिखाई देता है और कहीं पक्षियों के माध्यम से प्रकृति का मौन संकट सामने आता है। यही रचनात्मक प्रयोग इस संग्रह को सामान्य उपदेशात्मक बालकथाओं से अलग करने का प्रयास करते हैं।

अंजना मनोज गर्ग के आमुख को पढ़ते हुए उनके बाल लेखन की मूल प्रेरणा स्पष्ट होती है। वे बचपन की निर्मलता, अबोधता और जिज्ञासा को अपनी रचनात्मकता का आधार मानती हैं। उनके लिए बालमन प्रश्नों का एक ऐसा संसार है, जहाँ जीवन की साधारण घटनाएँ भी कौतूहल का विषय बन सकती हैं।

उनकी रचनात्मक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चे को केवल परिवार और विद्यालय के दायरे में नहीं देखतीं। उनके बच्चे जंगल, पक्षियों, पेड़ों, मौसम, जल और घरेलू संसार से भी जुड़े हुए हैं। इसीलिए संग्रह में प्रकृति और मनुष्य का संबंध बार-बार उभरता है।

लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने जीवन में काम आने वाले सामान्य किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को बालमन की जिज्ञासा में ढालकर कहानी रचने का प्रयास किया है। यही बात उनके कथा-संसार की आधारभूमि बनती है। वे बड़े प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में बदलती हैं और बच्चों को उन प्रसंगों के बीच रख देती हैं।

आज तकनीकी विकास ने बच्चे की दुनिया को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यम उसके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इस स्थिति में बाल साहित्य का दायित्व कम नहीं, बल्कि बढ़ गया है। सूचना के विस्तार के साथ संवेदना का विकास भी आवश्यक है।

तकनीक बच्चे को बहुत कुछ जानने का अवसर देती है, लेकिन साहित्य उसे यह समझने में सहायता करता है कि उस ज्ञान का मानवीय उपयोग क्या है। बाल साहित्य उसे प्रकृति से जोड़ सकता है, दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि दे सकता है और उसके भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव पैदा कर सकता है।

जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह की भूमिका में इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा है कि आज बच्चों में तकनीकी समझ तेजी से बढ़ रही है, इसलिए उन्हें संवेदना, सामाजिक सरोकार और संस्कृति से जोड़ना भी आवश्यक है। ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी आवश्यकता को अपने कथ्य में ग्रहण करता है।

इस संग्रह की बीस कहानियाँ विषयगत रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक व्यापक सूत्र से जुड़ी हैं—बालमन के माध्यम से जीवन और समाज को देखना।

‘घमण्डी गुलाब’ से संग्रह की शुरुआत होती है। गुलाब जैसे फूल को केंद्र में रखकर निर्मित यह कथा बाल साहित्य में मानवीकरण की परंपरा का उपयोग करती है। फूल को व्यक्तित्व देना बच्चे के लिए प्रकृति को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखने की संभावना खोलता है।

शीर्षक कहानी ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ में सर्दी और विद्यालय जाने की स्थिति के माध्यम से कर्तव्य-बोध को कथा का आधार बनाया गया है। यहाँ रजाई केवल सर्दी से बचाने वाली वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि बालक के आराम और उसके दायित्व के बीच एक रोचक प्रतीकात्मक स्थिति निर्मित करती है। बालक का अपने कर्तव्य की ओर लौटना कथा का केंद्रीय भाव बनता है।

‘मकर संक्रान्ति और बरगद काका की सीख’ में प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना का स्वर है। त्योहार को केवल परंपरा के रूप में न लेकर उसके भीतर छिपी प्रकृति-संवेदना को रेखांकित करने का प्रयास कहानी को सामाजिक अर्थ देता है।

‘शुभम की नयी होली’ और ‘पानी की चोरी’ जल-संरक्षण के प्रश्न को बच्चों के सामने रखती हैं। पानी के संकट को यदि केवल तथ्य या आँकड़े के रूप में बताया जाए तो बालक उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता। कहानी इस समस्या को अनुभव में बदल देती है। यही बाल साहित्य की शक्ति है।

‘भोलू का अपना घर’ स्वच्छता के प्रश्न को सामने लाती है। स्वच्छता यहाँ केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि रहने के परिवेश और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बनती है।

‘जंगल लौटी चिनचिन गौरैया’ और ‘चिंकी और गौरैया’ में पक्षी बाल साहित्य के माध्यम से प्रकृति के संकट के प्रतिनिधि बनते हैं। गौरैया का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पक्षी भारतीय घर-आँगन और मानवीय जीवन से गहरे जुड़ा रहा है। उसके अस्तित्व को लेकर चिंता स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों की ओर संकेत करती है।

‘सोनू की तासीर’ संग्रह की विषय-विविधता का उदाहरण है। यह गर्म तासीर वाले फलों को किस प्रकार खाया जाए, जैसे सामान्य जीवनोपयोगी प्रश्न को बाल कथा का रूप देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका के लिए बाल कहानी का विषय केवल बड़े सामाजिक प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चे के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी हैं।

‘किताबों का दर्द’ संग्रह की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक को मानवीय संवेदना देकर उसके ‘दर्द’ को सामने रखना एक प्रभावी कल्पनात्मक युक्ति है। बच्चों द्वारा पुस्तकों को फाड़ने या खराब करने की आदत को सीधे डाँटने के बजाय यदि पुस्तक स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करे तो बच्चा उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकता है।

‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ और ‘दादाजी और धूप’ आधुनिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। यहाँ बुजुर्ग केवल ज्ञान देने वाले पात्र नहीं हैं; वे भावनात्मक संबंधों की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक व्यस्तता में कमजोर पड़ रही है।

‘गीतु-मीतु की समीरा’ और ‘रसोई बीमार है’ घरेलू और पर्यावरणीय जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने लाती हैं। विशेषकर ‘रसोई बीमार है’ का शीर्षक ही अपने भीतर एक मानवीकरण छिपाए हुए है। रसोई का ‘बीमार’ होना वास्तव में उस घरेलू व्यवस्था की उपेक्षा का रूपक बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ता है।

‘जंगल में जब लगा एसी’ संग्रह की सबसे अधिक कल्पनाशील और समकालीन कहानियों में रखी जा सकती है। जंगल में एसी की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह असंभव-सी लगने वाली स्थिति बच्चे के भीतर तुरंत प्रश्न पैदा करती है। यही प्रश्न आगे पर्यावरणीय संकट की ओर ले जाता है। एसी और रेफ्रिजरेटर से ओजोन परत को होने वाले नुकसान की ओर संकेत कहानी को वैज्ञानिक चेतना से जोड़ता है।

‘दीपावली और सफाई’ त्योहार और सामाजिक सरोकार के संबंध को रेखांकित करती है। दीपावली केवल सजावट और उत्सव नहीं, बल्कि स्वच्छता तथा सामुदायिक जीवन से जुड़ा अवसर भी है—कहानी इसी दिशा में विचार करती है।

अंतिम कहानियों में ‘नन्हें प्राशु की समझदारी’ और ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ जैसी रचनाएँ बाल-बुद्धि और पर्यावरणीय संकट को केंद्र में लाती हैं। ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ में कटते जंगल, उत्खनन और नदियों से रेत के दोहन जैसे प्रश्नों को कथा के दायरे में लाया गया है। इस प्रकार संग्रह का पर्यावरणीय पक्ष केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास की उन प्रक्रियाओं पर भी संकेत करता है जो प्रकृति के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

बालमनोविज्ञान : संग्रह का केंद्रीय आधार

इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका बालमनोविज्ञान है। लेखिका ने बच्चों को उपदेश ग्रहण करने वाली निष्क्रिय इकाई नहीं माना है। उनकी कहानियों में बच्चा प्रश्न करता है, देखता है, अनुभव करता है और कई बार समाधान की दिशा भी खोजता है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक बाल साहित्य के लिए आवश्यक है। बच्चे को यदि केवल ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ बताया जाए तो कहानी उपदेश बन जाती है। किंतु जब वही बात किसी पात्र की समस्या और उसके अनुभव से निकलती है, तो वह कथा का स्वाभाविक निष्कर्ष बन जाती है।

मानवीकरण : कथा को रोचक बनाने का साधन

लेखिका ने कई कहानियों में मानवीकरण का प्रयोग किया है। गुलाब, किताब, रसोई, गौरैया और जंगल जैसे तत्वों को मानवीय संदर्भ देकर उन्होंने बच्चों की कल्पनाशीलता को सक्रिय किया है।

मानवीकरण बाल साहित्य का पुराना किंतु अत्यंत प्रभावी उपकरण है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लेखक उसके माध्यम से केवल मनोरंजन करता है या कोई नया अर्थ भी निर्मित करता है। इस संग्रह में मानवीकरण का उपयोग अधिकांशतः किसी सामाजिक या पर्यावरणीय प्रश्न को बालमन के निकट लाने के लिए किया गया है।

प्रकृति एक पात्र के रूप में

संग्रह में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कई कहानियों में वह स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है। गौरैया, बरगद, जंगल, बारिश, पानी और पेड़ कथानक के भीतर अपना अर्थ निर्मित करते हैं।

यहीं संग्रह की पर्यावरणीय चेतना सबसे प्रभावी रूप में सामने आती है। लेखिका प्रकृति को ‘बचाने योग्य वस्तु’ मात्र नहीं मानतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन का सहभागी बनाती हैं।

पारिवारिक संबंध

दा-दादी और बच्चों के संबंध संग्रह में विशेष स्थान रखते हैं। ‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ तथा ‘दादाजी और धूप’ जैसी कहानियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिकता के बीच बुजुर्गों की भूमिका और उनके प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी को पुनः समझने की आवश्यकता है।

इन कहानियों का महत्त्व इसलिए भी है कि ये बच्चों को परिवार की बहु-पीढ़ीय संरचना से जोड़ती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

भाषा और शैली

लेखिका की भाषा सहज और संप्रेषणीय है। बाल पाठक के लिए कठिन शब्दावली या अत्यधिक जटिल वाक्य-विन्यास से बचने का प्रयास किया गया है। कहानियों में कथ्य के अनुसार कल्पनात्मक और संवादात्मक शैली का उपयोग मिलता है।

जहाँ पर्यावरणीय समस्या है वहाँ विचार प्रमुख होता है, जबकि पशु-पक्षियों और वस्तुओं के मानवीकरण वाली कहानियों में कल्पना का पक्ष मजबूत हो जाता है। इस शैलीगत विविधता के कारण संग्रह एकरस नहीं बनता।

शीर्षक और कथात्मक कौतूहल

संग्रह के कई शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं—’किताबों का दर्द’, ‘रसोई बीमार है’, ‘जंगल में जब लगा एसी’, ‘पानी की चोरी’ और ‘गुल्लक और उसकी रजाई’।

इन शीर्षकों में एक प्रश्न छिपा हुआ है। किताब को दर्द कैसे हो सकता है? रसोई बीमार कैसे हो सकती है? जंगल में एसी क्यों लगा? पानी की चोरी किसने की? यही प्रश्न बाल पाठक को कथा की ओर खींचते हैं।

नवाचार : संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता उसका नवाचार है। नवाचार का अर्थ केवल नए विषय चुनना नहीं, बल्कि परिचित विषय को नई दृष्टि से प्रस्तुत करना भी है।

पर्यावरण पर हजारों रचनाएँ लिखी गई हैं, लेकिन जंगल के पशुओं को एसी की आवश्यकता पड़ने की कल्पना समस्या को एक नए कोण से देखने का अवसर देती है। पुस्तक संरक्षण पर उपदेश देने की जगह ‘किताबों का दर्द’ उनकी भावनात्मक आवाज बन जाता है। घरेलू उपेक्षा को ‘रसोई बीमार है’ के रूपक में बदल देना भी इसी रचनात्मकता का उदाहरण है।

इस प्रकार लेखिका ने कई गंभीर विषयों को बालमन के लिए प्रतीक, कल्पना और मानवीकरण के माध्यम से सुगम बनाने का प्रयास किया है।

आलोचनात्मक सीमाएँ

किसी भी कृति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। आलोचना का उद्देश्य रचना की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को देखना है।

इस संग्रह की प्रमुख सीमा यह कही जा सकती है कि कुछ कहानियों में सामाजिक और नैतिक संदेश इतना स्पष्ट है कि पाठक के लिए निष्कर्ष तक पहुँचने की गुंजाइश कुछ कम रह जाती है। बाल कहानी की शक्ति तब और बढ़ती है जब बच्चा स्वयं कहानी के अनुभव से अर्थ ग्रहण करे।

कुछ कहानियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास की अपेक्षा कथ्य और संदेश अधिक प्रमुख दिखाई पड़ते हैं। यदि पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, असमंजस और संघर्ष को थोड़ा अधिक स्थान मिले तो कहानियों का साहित्यिक विस्तार बढ़ सकता है।

इसी प्रकार पर्यावरणीय कहानियों में समस्या और समाधान के बीच का तनाव कुछ और गहरा किया जा सकता था। उदाहरण के लिए जंगल, जल या वर्षा से जुड़े संकट केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जटिलताओं से भी जुड़े हैं। बाल साहित्य में इन जटिलताओं को सरल बनाना आवश्यक है, किंतु उन्हें पूरी तरह सपाट कर देना कथा की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। प्रूफ की कमी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अखरती है।

फिर भी यह आलोचना संग्रह की मूल रचनात्मक उपलब्धियों को कम नहीं करती। यह लेखिका की आगामी रचनाओं के लिए संभावनाओं की ओर संकेत करती है।

निष्कर्ष

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ समकालीन बाल साहित्य की उन रचनाओं में अपना स्थान बनाने की क्षमता रखता है, जो बालमन और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह संग्रह केवल नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों का संकलन नहीं है। इसमें लेखिका ने बालक की जिज्ञासा को प्रकृति, पर्यावरण, परिवार और समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया है।

इसकी कहानियों में पानी है तो उसके साथ जल-संकट का प्रश्न भी है; गौरैया है तो उसके साथ प्रकृति-संरक्षण की चिंता भी है; पुस्तक है तो उसके साथ ज्ञान और पुस्तक-संस्कृति का प्रश्न भी है; दादा-दादी हैं तो उनके साथ पारिवारिक संवेदना का प्रश्न भी है; जंगल है तो उसके साथ पर्यावरणीय संकट भी है।

यही इस संग्रह की सार्थकता है।

अंजना मनोज गर्ग ने बालमन की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ने का जो प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। उनकी कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के मन और संवेदना को आकार देने वाला साहित्य भी है।

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ का महत्त्व इस बात में है कि यह बच्चे को केवल कहानी सुनाकर छोड़ नहीं देता; वह उसके आसपास की दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में हल्का-सा परिवर्तन करने का प्रयास करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह बालमन की निर्मलता, प्रकृति की पुकार और सामाजिक संवेदना को एक साथ समेटे हुए बीस कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें मनोरंजन के साथ विचार और विचार के साथ संवेदना भी खिलती है। अंजना मनोज गर्ग की यह कृति बाल साहित्य की वर्तमान धारा में अपने विषय-नवाचार और समकालीन सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करती है और लेखिका के आगामी रचनात्मक विकास के लिए एक आशाजनक आधारभूमि तैयार करती है।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

08/10/2026

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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