हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – शूल बोए जा रहे हैं…!
☆ ॥ कविता॥ शूल बोए जा रहे हैं…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८८ ☆
☆अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
अधिक मास भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का सुंदर समन्वय है। यह हमें स्मरण कराता है कि संसार को बदलने की अपेक्षा यदि हम स्वयं को बदलना प्रारंभ करें, तो हमारी दृष्टि बदलती है और उसी के साथ हमारी सृष्टि भी बदलने लगती है।
हम प्रायः जीवन में परिस्थितियों, लोगों अथवा भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है। जब हम अपने विचारों, आदतों और कार्यशैली में सुधार लाते हैं, तब उसके सकारात्मक परिणाम हमारे संबंधों, कार्यों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं।
अधिक मास हमें थोड़ी देर रुककर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है—क्या मैं कल से आज बेहतर हूँ? क्या मेरे व्यवहार, धैर्य, संवेदनशीलता और कर्म में गुणवत्ता बढ़ी है? यदि प्रतिदिन केवल एक छोटा-सा सुधार भी हो, तो समय के साथ वही परिवर्तन जीवन को नई दिशा दे सकता है।
जैसे माली पौधे की जड़ों को सींचता है और फिर हरियाली स्वयं प्रकट होती है, वैसे ही आत्मविकास के बीज बोने पर सफलता, संतोष और प्रसन्नता स्वतः फलित होते हैं। अधिक मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर के दीप को प्रज्वलित किया जाए।
जब स्वयं में परिवर्तन आता है, तब वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ भी नई प्रतीत होने लगती हैं। यही अधिक मास की साधना है और यही उसके आध्यात्मिक महत्व का सार।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ The Ethereal Enchantress…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
शादी से पहले की बातचीत और चाय की पत्ती में एक समानता होती है। शुरुआत में दोनों खूब रंग देती हैं खुशबू ऐसी कि पूरा मोहल्ला जान जाए कि कुछ उबल रहा है। फिर धीरे धीरे समय बीतता है और वही चाय की पत्ती बर्तन के कोने में पड़ी सूखी घास जैसी लगने लगती है। हमारे बीच भी यही हुआ। शादी के फेरों के समय जिस इंसान ने सात जन्मों का वादा किया था उसने सात महीने में ही खुद को एक स्क्रीन के भीतर बंद कर लिया। अब वह घर आता है तो सोफे पर लेटकर बस अंगूठा चलाता रहता है। रील्स की वो पंद्रह सेकंड की दुनिया मेरे पूरे जीवन से ज्यादा कीमती हो गई है। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर ऐसे फिसलती हैं जैसे कोई जादूगर ताश के पत्ते पलट रहा हो। मैं बगल में बैठी चाय का कप लिए ताकती रहती हूँ पर उसकी नजरें कभी नहीं भटकतीं। ऐसा लगता है कि मैं उस घर का कोई पुराना फर्नीचर हूँ जिस पर धूल जम चुकी है और जिसे हटाने की जहमत भी कोई नहीं उठाना चाहता।
एक दिन मैंने कहा “सुनो मुझे कुछ बात करनी है।“ उसने बिना आंखें ऊपर किए कह दिया “अभी बिजी हूँ यार बाद में देखेंगे” यह “बाद में“ कभी नहीं आता। मर्द जब व्यस्त होने का नाटक करता है तो वह असल में अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा होता है। इस अकेलेपन के सन्नाटे को तोड़ने के लिए मैंने एक नया रास्ता निकाला। मैं अपने ही मोबाइल से अपने ही नंबर पर फोन लगा देती। जब उधर से आवाज आती कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है तो मेरे सीने में एक अजीब सा सुकून उतर आता। कम से कम कोई तो कह रहा था कि मैं व्यस्त हूँ। कोई तो था जो मेरी मौजूदगी को दर्ज कर रहा था भले ही वह एक कंप्यूटर की रिकॉर्डेड आवाज ही क्यों न हो। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा वियोग था कि मुझे खुद को यह समझाने के लिए अपने ही नंबर का सहारा लेना पड़ता था कि दुनिया में मेरा भी एक वजूद है।
तभी घर के सामने एक नया युवक रहने आया था। वह मुझसे उम्र में दो साल छोटा था और शायद इसीलिए दुनिया की चालाकियों से थोड़ा दूर था। वह मेरे अकेलेपन को मेरे चेहरे की उदासी से भांप गया था। जब घर का मालिक सोफे पर रील्स स्क्रोल करने में व्यस्त रहता तब वह लड़का मेरी खामोशी को पढ़ रहा था। पति के घर पर न रहने के समय वह कभी नमक के बहाने तो कभी चाय पत्ती के बहाने मेरे घर पर आता था। उसकी आँखों में एक अजीब सी हमदर्दी थी जो मुझे इस मरुस्थल जैसी जिंदगी में ठंडी फुहार जैसी लगती थी। उसने बातों बातों में एक दिन बड़ी सादगी से बताया कि उसकी अभी शादी नहीं हुई है। मुझे लगा कि विधाता ने मेरे इस एकांतवास को समाप्त करने के लिए ही उसे मेरे सामने वाले मकान में भेजा है।
हमारी मुलाकातें जब बढ़ने लगीं तो मेरे भीतर की सूखी नदी में फिर से बाढ़ आने लगी। हर बार जब मैं उसके साथ इस घुटन भरे माहौल से दूर भागने की योजना बनाती तो वह मुस्कुराकर कहता “जल्दबाजी मत करो। कल कुछ प्लान बनाते हैं” मुझे लगता कि वह हमारी सुरक्षा के लिए ऐसा कह रहा है। पुरुष का कल कभी कभी स्त्री की पूरी जिंदगी का इंतजार बन जाता है। वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देता और मैं फिर से उसी रील्स वाले सोफे के किनारे आकर बैठ जाती। प्रेम जब किश्तों में मिलने लगे तो उसकी कीमत और बढ़ जाती है। मैं उसके दिए उसी झूठे दिलासे के सहारे अपने दिन काट रही थी और खुद को दिलासा दे रही थी कि एक दिन यह अंधेरा छंटेगा।
एक दिन अचानक उसने खुद सामने से आकर मुझसे कहा “कल हम हमेशा के लिए कहीं दूर चले जाएंगे। सामान बांधकर तैयार रहना” उस दिन मुझे लगा कि मेरी सालों की तपस्या सफल हो गई। मैंने चुपचाप अपनी अलमारी से अपनी पसंदीदा साड़ियां निकालीं और उन्हें सूटकेस में बंद करने लगी। पतिदेव बगल वाले कमरे में मोबाइल पर किसी प्रैंक वीडियो को देखकर ठहाके लगा रहे थे। उनकी हंसी मेरे कानों में किसी नुकीली कील की तरह चुभ रही थी। मुझे तरस आ रहा था उस इंसान पर जिसे यह भी नहीं पता था कि उसकी छत के नीचे से जमीन खिसकने वाली है। मैंने अपनी जिंदगी के सबसे कड़वे सच को एक पोटली में बांधा और उस सुबह का इंतजार करने लगी जो मेरी विदाई की गवाह बनने वाली थी।
जब मैं उसके पास अपना सारा सामान बांधकर पहुंची तब तक वह वहां से जा चुका था। सामने वाले मकान का ताला लटक रहा था और वहां सिर्फ धूल उड़ रही थी। मेरी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं और सूटकेस हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। अगल बगल देखने पर जब कोई नहीं मिला तो मैंने पास के एक दुकानदार से उसके बारे में पूछा। दुकानदार ने जो सच बताया उसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही गायब कर दी। दुकानदार ने तंबाकू थूकते हुए बड़े सहज भाव से कहा “अरे वो तो शादीशुदा था उसकी पत्नी बेंगलूरु में रहती है और वह सुबह तड़के ही उसे लेने आई थी दोनों पहली बस से निकल गए”
यह सुनते ही मेरे भीतर का सब कुछ बिखर गया। जिस लड़के को मैं अपने अकेलेपन का मसीहा समझ रही थी वह खुद एक छलावे के सिवा कुछ नहीं था। वह तो बस अपने खाली समय को काटने के लिए मेरे घर की चाय पत्ती और नमक का इस्तेमाल कर रहा था। वियोग का इससे वीभत्स रूप और क्या हो सकता था कि जिसे मैंने अपनी मुक्ति का मार्ग समझा उसने मुझे और गहरे कुएं में धकेल दिया था। मैं उस सूने मकान की दहलीज पर बैठकर हंसने लगी क्योंकि रोने के लिए मेरे पास आंसू कम पड़ गए थे। पूरा खेल बस टाइमपास का था चाहे वह रील्स देखना हो या पड़ोस में नमक मांगना।
मैंने कांपते हाथों से अपना सूटकेस उठाया और वापस अपने उसी पुराने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए जहां सन्नाटा मेरा इंतजार कर रहा था। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था और सोफे से अभी भी वही रील्स की आवाजें आ रही थीं। पति ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और स्क्रीन देखते हुए ही कहा “अरे आ गई तुम जरा देखना नमक खत्म हो गया है क्या” मैंने बिना कुछ बोले रसोई की तरफ देखा जहां नमक का डिब्बा पहले से ही आधा भरा हुआ था। मुझे समझ आ गया कि इस संसार में हर कोई अपनी अपनी स्क्रीन और अपनी अपनी कहानियों में व्यस्त है और दूसरों की भावनाएं बस मनोरंजन का साधन हैं।
मैंने अपना फोन निकाला और फिर से अपने ही नंबर पर डायल कर दिया। उधर से फिर वही जानी पहचानी आवाज आई कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है। मैंने फोन को कान से सटाए रखा और उस व्यस्त टोन के सुकून को महसूस करने लगी। अब मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि इस मतलबी और फरेबी दुनिया में सिर्फ मेरा अपना नंबर ही था जो मेरे एकांत को कभी धोखा नहीं दे सकता था भले ही वह हमेशा व्यस्त रहने का ढोंग ही क्यों न करता हो। प्रेम की इस अंतिम विदाई ने मुझे पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक व्यंग्य – “हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१५ ☆
व्यंग्य – हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
इन दिनों देश-विदेश के राजनीतिक मौसम की रंगत बड़ी अजब है। बाहर हवा ठंडी हो या गरम, लेकिन सत्ता के गलियारों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कल तक जो विदेशी नुमाइंदे हमारे देश में सिर्फ पर्यटन के खूबसूरत ठिकानों की बातें करते थे, व्यापारिक सौदों पर दस्तखत करते थे और हमारे विशाल बाजार को देखकर लार टपकाते थे, वे आज अचानक हाथ में माइक थामकर और चेहरे पर दुनिया भर की फिक्र ओढ़कर हमारे अभिभावक की भूमिका में नजर आने लगे हैं।
अभी हाल ही में, जब देश के सर्वोच्च ‘प्रधान’ सुदूर यूरोप के एक खूबसूरत, ट्यूलिप के फूलों और पवन चक्कियों वाले साइकिल-प्रिय मुल्क की यात्रा पर थे, तब वहां की एक तीखे तेवरों वाली विदेशी महिला पत्रकार साहिबा ने सात समंदर पार से लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों और प्रेस की आजादी के कुछ सुलगते हुए सवाल दाग दिए कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे सचिवालय का एसी अचानक फेल होने लगा।
इस नजारे को देखकर पृष्ठभूमि में वही पुराना और घिसा-पिटा फिल्मी गाना बजने लगता है, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा!”
हमारे विदेश मंत्रालय को इन विदेशी पड़ोसियों का यह मुफ्त में बंटने वाला ज्ञान और अपनी धोती को छोड़कर पूरे जमाने की चिंता करने की आदत बड़ी नागवार और चिंतनीय लग रही है। उनका पत्रकारिता इंडेक्स नम्बर एक होगा , हम अपने 157 नम्बर में ही खुश बने रहना चाहते हैं।
पड़ोसियों का तो शाश्वत धर्म ही यही होता है कि वे अडोस-पड़ोस के हर फटे में टांग अड़ाएं। जब आपका घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा हो, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही हो, तब वे अपनी खिड़की से झाँककर बड़े मासूम चेहरे से पूछते हैं कि, “अरे भाई, आपके घर में जो कड़ाही चढ़ी है, उसके तेल की बू कुछ तीखी सी आ रही है। सब खैरियत तो है?”
उस नीले-सफेद आसमान वाले ठंडे मुल्क की उन विदेशी पत्रकार महोदया को भी हमारे यहाँ की इस तपती हुई लोकतांत्रिक गर्मी की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही थी। उनकी यह फिक्र बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती है जैसे किसी मोहल्ले की कोई बुजुर्ग ‘ताई’ किसी नए-नवेले दूल्हे को घेरकर पूछने लगे कि, “सुना है तुम अपनी दुल्हन को बोलने ही नहीं देते, उसकी आवाज बाहर तक क्यों नहीं आती?”
ताई रूपी इन जोशी पड़ोसियों के तीखे सवालों पर हमारे सिस्टम का बिल्कुल खामोश हो जाना और अपने फोन को साइलेंट मोड पर डाल लेना एक बेहद मजेदार और सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। यह एक ऐसी सधी हुई ‘कूटनीतिक चुप्पी’ थी जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। एक ऐसी चुप्पी जो सामने वाले के चेहरे पर देखकर मुस्कुराते हुए कहती है कि, “तुम ठहरे परदेसी, तुम्हें हमारे घर के अंदरूनी झगड़ों की कड़वाहट और हमारे आपसी प्यार की गहराई के बारे में भला क्या खाक पता होगा!”
जब उस अंतरराष्ट्रीय मंच से लोकतंत्र और जन अधिकारों जैसे भारी-भरकम शब्दों के गोले फेंके जा रहे थे, तब हमारा पूरा तंत्र मन ही मन सोच रहा था कि तुमने पूछा तो पूछा, पर हम तुम्हें जवाब देकर मुफ्त का फुटेज और टीआरपी क्यों दें? आखिर कैमरे के सामने ‘नो कॉमेंट्स’ कहकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरने की जो कला हमारे साहब को आती है, वह दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाई जाती है?
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नाटक का सबसे दिलचस्प और यू-टर्न वाला मोड़ तब आता है, जब यही सुलगता हुआ सवाल देश के भीतर का ही कोई विपक्षी या अपना स्वदेशी और घरेलू पत्रकार पूछ बैठता है। यहाँ आकर सत्ता का व्याकरण और नियम एकदम सीधे और स्पष्ट हो जाते हैं।
सात समंदर पार का गोरी चमड़ी वाला विदेशी पत्रकार सवाल पूछे, तो हम होठों पर वैश्विक मुस्कान बिखेरकर और ‘जोशी पड़ोसी’ गाते हुए बगल से सुरक्षित निकल सकते हैं। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अतिथि देवो भव’ का पालन करते हुए उन्हें चाय-समोसा खिलाना और हाथ मिलाकर विदा करना हमारी कूटनीति की महान कला है।
लेकिन जैसे ही वही सुलगता हुआ सवाल अपने ही घर का कोई पत्रकार पूछ लेता है, तो तंत्र की भौहें तन जाती हैं और आँखों में अंगारे उतर आते हैं कि,”अच्छा! तुम्हारी इतनी जुर्रत कि तुम सवाल करो? तुम देशद्रोही हो या किसी विदेशी टूलकिट का हिस्सा?”
विदेशी मेहमानों के सामने जिस खामोशी को कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है, वही चुप्पी जब घर के अंदर देश के नागरिकों पर लागू होती है तो उसे ‘अनुशासन’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ से जोड़ दिया जाता है। घरेलू पत्रकार अगर ज्यादा समझदार या सयाना बनने की कोशिश करे तो उसे बहुत सलीके से याद दिला दिया जाता है कि, “बेटा! इस मोहल्ले का राशन कार्ड, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी फाइलें हमारे ई डी, आई टी दफ्तर की दराजों में ही बंद हैं।
हमारे यहाँ अब सवालों की भी ‘नागरिकता’ तय कर दी गई है। अगर सवाल विदेशी पासपोर्ट के साथ आए तो उसे ‘इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज किया जाता है, और अगर सवाल देसी जुबान में निकले तो उसे ‘देश को बदनाम करने की साजिश’ मानकर सीधे कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है।
महामंत्र है , हे संजय ! “तू पूछता बहुत है, पूछ मत , सुन और ताली बजा!”
इसलिए अगली बार जब भी समाज, तंत्र या दफ्तर में कोई ऐसा तीखा सवाल पूछ ले जिसका सीधा जवाब मौजूद न हो, या जिसे सुनते ही ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे, तो बिल्कुल घबराने की जरूरत नहीं है।
बस एक गहरी सांस लीजिए, सामने लगे कैमरे की तरफ देखकर एक सम्मोहक, टेलीप्रॉम्प्टर वाली मुस्कान बिखेरिए और मन ही मन गुनगुनाना शुरू कर दीजिए, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा…”
सच तो यह है कि ट्यूलिप के फूल तो सिर्फ कुछ दिन महकते हैं, असली खुशबू तो अपनी कड़ाही के तीखे तेल में ही होती है!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुरी नजर दूर हट (थू थू थू)…“।)
अभी अभी # १००९ ⇒ आलेख – बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) श्री प्रदीप शर्मा
सन् १९६१ में एक फिल्म आई थी ससुराल जिसका एक गीत बड़ा लोकप्रिय हुआ था, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को, किसी की नजर ना लगे, चश्मे बद्दूर ! तब मेरी सूरत कोई खास प्यारी नहीं थी, लेकिन मैं तब भी नजर का चश्मा लगाता था। चश्मे का संबंध नजर से जरूर है लेकिन किसी चश्मा लगाने वाले का चश्मे बद्दूर से कोई लेना देना नहीं। लोग मुझे चश्मे बद्दूर सिर्फ इसलिए कहते थे, क्योंकि मैं चश्मा लगाता था।
अंग्रेजी और उर्दू में वैसे भी हमारा हाथ तंग ही रहता है। हमारे फिल्मी शायर इसीलिए इतने लोकप्रिय हो जाते हैं। कर्णप्रिय संगीत का श्रोता, शब्दों के फेर में नहीं पड़ता, वह गायक की मधुर आवाज और धुन में ही उलझ जाता है। शायर हसरत जयपुरी ने तो बस गीत लिख दिया और लोगों की ज़ुबान पर रातों रात यह गीत चढ़ गया, चश्मे बद्दूर ! जिसका आम भाषा में अर्थ होता है, बुरी नजर, दूर हट।।
जहां नजर है, वहां चश्मा है, और अगर सूरत प्यारी हुई तो उस ओर नजर उठ ही जाती है और अनायास मुंह से निकल ही जाता है, चश्मे बद्दूर। शायर ने अपना काम बखूबी किया, चश्मे बद्दूर का अर्थ भी बताया, किसी की नजर ना लगे। लेकिन रहा सहा काम हम जैसे नासमझों ने कर दिया। जहां किसी प्यारी सी सूरत पर चश्मा नज़र आया, उसे चश्मे बद्दूर कहना शुरू कर दिया।
आज पहले जैसी स्थिति नहीं। लोग पढ़ लिख गए हैं, गुलज़ार की शायरी पढ़ते हैं और जगजीत सिंह को सुनते हैं, और समझकर उसका आनंद भी लेते हैं।
बात नजर की हो रही है।
बहुत दिनों से हिंदी के ही एक शब्द का प्रयोग मुझे विचलित कर रहा है। कोई आश्चर्य नहीं अगर आज का शायर कुछ इस तरह का गीत लिख मारे ;
तेरी प्यारी प्यारी सूरत को
किसी की नजर ना लगे
थू थू थू !
यह क्या वाहियात मजाक है, आपको अनफ्रेंड किया जाता है। मैने भी जब पहली बार किसी के मुंह से थू थू थू सुना, तो मुंह फेर लिया। थू शब्द में क साइलेंट है। स्वच्छ भारत के पहले जहां दीवारों पर लिखा रहता था, यहां थूकना मना है, वहां पहले, मना, शब्द रंगबिरंगी पिचकारियों के बीच छुप जाता था और बाद में पूरी हिदायत को पान और पान पराग की बौछारों से नहला दिया जाता था।।
कोविड काल का मास्क अभी भी पूरी तरह से हमारे चेहरों से उतरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है कि हमारे थूक में बीमारियों के कीटाणु रहते हैं, इसलिए जिन लोगों के मुंह से बोलते वक्त फूल झरने की जगह थूक के छींटे स्प्रे मारते हैं, उनसे दो गज की दूरी बनाए रखें। लेकिन उन शुभचिंतकों का क्या किया जाए जो आपको बुरी नजर से बचाने के लिए पहले थू थू थू करते हैं और बाद में सफाई पेश करते हैं।
आप अन्यथा ना लें, लेकिन स्टार प्लस की अनुपमा भी बहुत थू थू थू करती है और उसी की देखा देखी मैंने आज की युवा पीढ़ी को भी पहले किसी की तारीफ और बाद में चश्मे बद्दूर की तरह थू थू थू करते देखा है। पहले थू, बाद में थू थू और उसके बाद थू थू थू, इस तरह नफरत से मोहब्बत की जानिब, तय की हमने मंजिलें। हमारी मोहब्बत को किसी की नजर ना लगे। चश्मे बद्दूर, थू थू थू।।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
☆ बच्चों में वैज्ञानिक सोच और कल्पनाशीलता बढ़ाने का अनोखा जरिया: ‘चंद्र बस्ती का रहस्य’ ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
यह समाचार आज के समय में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को कम करने और उनमें ‘वैज्ञानिक सोच’ (Scientific Temperament) पैदा करने जैसे सामाजिक सरोकार से जुड़ा है। नेशनल बुक ट्रस्ट की यह प्रस्तुति अभिभावकों और शिक्षकों के लिए बेहद मार्गदर्शन करने वाली साबित होगी। – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
रतनगढ़ (निप्र)। आज के डिजिटल युग में जहाँ बच्चे मोबाइल स्क्रीन और गेमिंग की दुनिया में खोए जा रहे हैं, वहीं उनकी कल्पनाशीलता को आसमान की उड़ान देने और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) विकसित करने के लिए एक बेहतरीन पहल की गई है। नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) द्वारा प्रकाशित नया किशोर उपन्यास ‘चंद्र बस्ती का रहस्य’ बाल-मन को भविष्य के विज्ञान से जोड़ने में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।
भविष्य की परिकल्पना को साकार करता उपन्यास:
आज पूरी दुनिया के वैज्ञानिक चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने की नई-नई परिकल्पनाओं पर काम कर रहे हैं। भविष्य के इसी गर्भ में छिपे सपने को आज के बच्चों के सामने एक रोमांचक ताने-बाने में पिरोकर प्रस्तुत किया है जाने-माने बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ने। यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भविष्य के विज्ञान का एक सजीव खाका है।
अभिभावकों और शिक्षकों के लिए क्यों है बेहद उपयोगी?
शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय यदि उन्हें कल्पना की उड़ान दी जाए, तो उनकी सोचने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। यह उपन्यास इस मामले में समाज के लिए बेहद उपयोगी है क्योंकि:
तनावमुक्त ज्ञान: यह बच्चों को भारी-भरकम विज्ञान की बातें बेहद मनोरंजक और सरल तरीके से सिखाता है।
रचनात्मकता का विकास: मोबाइल की लत छुड़ाकर बच्चों में फिर से पढ़ने (Reading Habit) की आदत को विकसित करता है।
भविष्य के वैज्ञानिक: यह कहानी बच्चों के मन में सवाल उठाती है कि “चंद्रमा पर जीवन कैसे संभव होगा?” जो उन्हें भविष्य का वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित करता है।
‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ की सराहनीय प्रस्तुति:
भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा इस उपन्यास का प्रकाशन यह साबित करता है कि इसकी सामग्री बच्चों के लिए कितनी स्तरीय और सुरक्षित है। ‘चंद्र बस्ती का रहस्य’ को पढ़कर बच्चे न सिर्फ अंतरिक्ष विज्ञान के रहस्यों को करीब से जान सकेंगे, बल्कि वे यह भी समझ सकेंगे कि आने वाले समय में मानव सभ्यता का विस्तार कैसे होने वाला है।
यदि आप भी अपने बच्चों को गैजेट्स की दुनिया से बाहर निकालकर एक अद्भुत और ज्ञानवर्धक दुनिया की सैर कराना चाहते हैं, तो यह उपन्यास हर घर की लाइब्रेरी और स्कूल के पुस्तकालय में होना अनिवार्य है।
साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
≈ संस्थापक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈