हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – वारी-लघुता से प्रभुता की यात्रा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

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? संजय दृष्टि – वारी-लघुता से प्रभुता की यात्रा ? ?

(वारी यात्रा आज पुणे पहुँच रही है। इस संदर्भ में विशेष आलेख)

भारत की अधिकांश परंपराएं ऋतुचक्र से जुड़ी हुई एवं वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरने वाली हैं। देवता विशेष के दर्शन के लिए पैदल तीर्थयात्रा करना इसी परंपरा की एक कड़ी है। संस्कृत में तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है – पापों से तारनेवाला। यही कारण है कि तीर्थयात्रा को मनुष्य के मन पर पड़े पाप के बोझ से मुक्त होने या कुछ हल्का होने का मार्ग माना जाता है। स्कंदपुराण के काशीखण्ड में तीन प्रकार के तीर्थों का उल्लेख मिलता है – जंगम तीर्थ, स्थावर तीर्थ और मानस तीर्थ

🙏 जय हरि विठ्ठल🙏

(आलंदी और देहू से हरि दर्शन के लिए पंढरपुर की 265 किमी की पदयात्रा अर्थात महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी। यह वारी आज पुणे पहुँची। मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने लगभग 14 वर्ष पूर्व वारी का वीडियो शूट किया था। उस आधार पर वारी की जानकारी विशेषकर हिंदीभाषी समाज को देने के लिए एक डॉक्युमेंट्री फिल्म लिखी और उसे स्वर दिया। वारी पर आधारित इस फिल्म को 26 हज़ार से अधिक दर्शक देख चुके।)

स्थावर तीर्थ की पदयात्रा करने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी इस परंपरा का स्थानीय संस्करण है।

पंढरपुर के विठ्ठल को लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में मान्यता मिली। तभी से खेतों में बुआई करने के बाद पंढरपुर में विठ्ठल-रखुमाई (श्रीकृष्ण-रुक्मिणी) के दर्शन करने के लिए पैदल तीर्थ यात्रा करने की परंपरा जारी है। श्रीक्षेत्र आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की चरणपादुकाएँ एवं श्रीक्षेत्र देहू से तुकाराम महाराज की चरणपादुकाएँ पालकी में लेकर पंढरपुर के विठोबा के दर्शन करने जाना महाराष्ट्र की सबसे बड़ी वारी है।

पहले लोग व्यक्तिगत स्तर पर दर्शन करने जाते थे। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, स्वाभाविक था कि संग से संघ बना। 13 वीं शताब्दी आते-आते वारी गाजे-बाजे के साथ समारोह पूर्वक होने लगी।

वारी का शाब्दिक अर्थ है-अपने इष्ट देवता के दर्शन के लिए विशिष्ट दिन,विशिष्ट कालावधि में आना, दर्शन की परंपरा में सातत्य रखनावारी करनेवाला ‘वारीकर’ कहलाया। कालांतर में वारीकर ‘वारकरी’ के रूप में रुढ़ हो गया। शनैःशनैः वारकरी एक संप्रदाय के रूप में विकसित हुआ।

अपने-अपने गाँव से सीधे पंढरपुर की यात्रा करने वालों को देहू पहुँचकर एक साथ यात्रा पर निकलने की व्यवस्था को जन्म देने का श्रेय संत नारायण महाराज को है। नारायण महाराज संत तुकाराम के सबसे छोटे पुत्र थे। ई.सन 1685 की ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी को वे तुकाराम महाराज की पादुकाएँ पालकी में लेकर देहू से निकले। अष्टमी को वे आलंदी पहुँचे। वहाँ से संत शिरोमणि ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुकाएं पालकी में रखीं। इस प्रकार एक ही पालकी में ज्ञानोबा-तुकोबा (ज्ञानेश्वर-तुकाराम) के गगन भेदी उद्घोष के साथ वारी का विशाल समुदाय पंढरपुर की ओर चला।

अन्यान्य कारणों से भविष्य में देहू से तुकाराम महाराज की पालकी एवं आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी अलग-अलग निकलने लगीं। समय के साथ वारी करने वालों की संख्या में विस्तार हुआ। इतने बड़े समुदाय को अनुशासित रखने की आवश्यकता अनुभव हुई। इस आवश्यकता को समझकर 19 वीं शताब्दी में वारी की संपूर्ण आकृति रचना हैबतराव बाबा आरफळकर ने की। अपनी विलक्षण दृष्टि एवं अनन्य प्रबंधन क्षमता के चलते हैबतराव बाबा ने वारी की ऐसी संरचना की जिसके चलते आज 21 वीं सदी में 10 लाख लोगों का समुदाय बिना किसी कठिनाई के एक साथ एक लय में चलता दिखाई देता है।

हैबतराव बाबा ने वारकरियों को समूहों में बांटा। ये समूह ‘दिंडी’ कहलाते हैं। सबसे आगे भगवा पताका लिए पताकाधारी चलता है। तत्पश्चात एक पंक्ति में चार लोग, इस अनुक्रम में चार-चार की पंक्तियों में अभंग (भजन) गाते हुए चलने वाले ‘टाळकरी’ (ळ=ल,टालकरी), इन्हीं टाळकरियों में बीच में उन्हें साज संगत करने वाला ‘मृदंगमणि’, टाळकरियों के पीछे पूरी दिंडी का सूत्र-संचालन करनेवाला विणेकरी, विणेकरी के पीछे सिर पर तुलसी वृंदावन और कलश लिए मातृशक्ति। दिंडी को अनुशासित रखने के लिए चोपदार

वारी में सहभागी होने के लिए दूर-दराज के गाँवों से लाखों भक्त बिना किसी निमंत्रण के आलंदी और देहू पहुँचते हैं। चरपादुकाएँ लेकर चलने वाले रथ का घोड़ा आलंदी मंदिर के गर्भगृह में जाकर सर्वप्रथम ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करता है। ज्ञानेश्वर महाराज को माउली याने चराचर की माँ भी कहा गया है। माउली को अवतार पांडुरंग अर्थात भगवान का अवतार माना जाता है। पंढरपुर की यात्रा आरंभ करने के लिए चरणपादुकाएँ दोनों मंदिरों से बाहर लाई जाती हैं। उक्ति है-‘ जब चराचर भी नहीं था, पंढरपुर यहीं था।’

चरण पादुकाएँ लिए पालकी का छत्र चंवर डुलाते एवं निरंतर पताका लहराते हुए चलते रहना कोई मामूली काम नहीं है। लगभग 260 कि.मी. की 800 घंटे की पदयात्रा में लाखों वारकरियों की भीड़ में पालकी का संतुलन बनाये रखना, छत्र-चंवर-ध्वज को टिकाये रखना अकल्पनीय है।

वारी स्वप्रेरित अनुशासन और श्रेष्ठ व्यवस्थापन का अनुष्ठान है। कुछ आंकड़े इसकी पुष्टि करने के लिए कुछ आंकड़े जानना पर्याप्त है-

– विभिन्न आरतियों में लगनेवाले नैवेद्य से लेकर रोज़मर्रा के प्रयोग की लगभग 15 हजार वस्तुओं (यहाँ तक की सुई धागा भी) का रजिस्टर तैयार किया जाता है। जिस दिन जो वस्तुएँ इस्तेमाल की जानी हैं, नियत समय पर वे बोरों में बांधकर रख दी जाती हैं।

– 15-20 हजार की जनसंख्या वाले गाँव में 10 लाख वारकरियों का समूह रात्रि का विश्राम करता है। ग्रामीण भारत में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में अद्वैत भाव के बिना गागर में सागर समाना संभव नहीं।

– सुबह और शाम का भोजन मिलाकर वारी में प्रतिदिन 20 लाख लोगों के लिए भोजन तैयार होता है।

– रोज़ाना 10 लाख लोग स्नान करते हैं, कम से कम 30 लाख कपड़े रोज धोये और सुखाये जाते हैं।

– रोज़ाना 50 लाख कप चाय बनती है।

– हर दिन लगभग 3 करोड़ लीटर पानी प्रयोग होता है।

– एक वारकरी दिन भर में यदि केवल एक हजार बार भी हरिनाम का जाप करता है तो 10 लाख लोगों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले कुल जाप की संख्या 100 करोड़ हो जाती है। शतकोटि यज्ञ भला और क्या होगा?

– वारकरी दिनभर में लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलता है। विज्ञान की दृष्टि से यह औसतन 26 हजार कैलोरी का व्यायाम है।

– जाने एवं लौटने की 33 दिनों की यात्रा में पालकी के दर्शन 24 घंटे खुले रहते हैं। इस दौरान लगभग 25 लाख भक्त चरण पादुकाओं के दर्शन करते हैं।

– इस यात्रा में औसतन 200 करोड़ का आर्थिक व्यवहार होता है।

– हर दिंडी के साथ दो ट्रक, पानी का एक टेंकर, एक जीप, याने कम से कम चार वाहन अनिवार्य रूप से होते हैं। इस प्रकार 500 अधिकृत समूहों के साथ कम से कम 2 हजार वाहन होते हैं।

– एकत्रित होने वाली राशि प्रतिदिन बैंक में जमा कर दी जाती है।

रथ की सजावट के लिए पुणे से रोज़ाना ताज़ा फूल आते हैं।

हर रात 7 से 8 घंटे के कठोर परिश्रम से रथ को विविध रूपों में सज्जित किया जाता है।

– एक पंक्ति में दिखनेवाली भक्तों की लगभग 15 किलोमीटर लम्बी ‘मूविंग ट्रेन’ 24 घंटे में चार बार विश्रांति के लिए बिखरती है और नियत समय पर स्वयंमेव जुड़कर फिर गंतव्य की यात्रा आरंभ कर देती है।

– गोल रिंगण अर्थात अश्व द्वारा की जानेवाली वृत्ताकार परिक्रमा हो, या समाज आरती, रात्रि के विश्राम की व्यवस्था हो या प्रातः समय पर प्रस्थान की तैयारी, लाखों का समुदाय अनुशासित सैनिकों-सा व्यवहार करता है।

– नाचते-गाते-झूमते अपने में मग्न वारकरी…पर चोपदार का हो का एक स्वर और संपूर्ण नीरव …… इस नीरव में मुखर होता है-वारकरियों का अनुशासन।

वारकरी से अपेक्षित है कि वह गले में तुलसी की माला पहने। ये माला वह किसी भी वरिष्ठ वारकरी को प्रणाम कर धारण कर सकता है। वारकरी संप्रदाय के लोकाचारों में शामिल है- माथे पर गोपीचंदन,धार्मिक ग्रंथों का नियमित वाचन, शाकाहार, सदाचार, सत्य बोलना, हाथ में भगवा पताका, सिर पर तुलसी वृंदावन, और जिह्वा पर राम-कृष्ण-हरि का संकीर्तन।

राम याने रमनेवाला-हृदय में आदर्श स्थापित करनेवाला, कृष्ण याने सद्गुरु- अपनी ओर खींचनेवाला और हरि याने भौतिकता का हरण करनेवाला।

राम-कृष्ण-हरि का अनुयायी वारकरी पालकी द्वारा विश्रांति की घोषणा से पहले कहीं रुकता नहीं, अपनी दिंडी छोड़ता नहीं, माउली को नैवेद्य अर्पित होने से पहले भोजन करता नहीं।

वारकरी कम से कम भौतिक आवश्यकताओं के साथ जीता है। वारी आधुनिक भौतिकता के सामने खड़ी सनातन आध्यात्मिकता है। आधुनिकता अपरिमित संसाधन जुटा-जुटाकर आदमी को बौना कर देती है। जबकि वारी लघुता से प्रभुता की यात्रा है। प्रभुता की यह दृष्टि है कि इस यात्रा में आपको मराठी भाषियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में अमराठी भाषी भी मिल जायेंगे। भारतीयों के साथ विदेशी भी दिखेंगे। इस अथाह जन सागर की समरसता ऐसी कि वयोवृद्ध माँ को अपने कंधे पर बिठाये आज के श्रवण कुमार इसमें हिंदुत्व देखते हैं तो संत जैनब-बी ताउम्र इसमें इस्लाम का दर्शन करती रही।

वारी, यात्री में सम्यकता का अद्भुत भाव जगाती है। भाव ऐसा कि हर यात्री अपने सहयात्री को धन्य मान उसके चरणों में शीश नवाता है। सहयात्री भी साथी के पैरों में माथा टेक देता है।

जे-जे पाहिले भूत, ते-ते मानिले भगवंत……हर प्राणी में, हर जीव में माउली दिखने लगे हैं। किंतु असली माउली तो विनम्रता का ऐसा शिखर है जो दिखता आगे है , चलता पीछे है। यात्रा के एक मोड़ पर संतों की पालकियाँ अवतार पांडुरंग के रथ के आगे निकल जाती हैं। आगे चलते भगवान कब पीछे आ गये ,पता ही नहीं चलता।

संत कबीर कहते हैं-

कबीरा मन ऐसा भया, जैसा गंगा नीर
पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर।

भक्तों की भीड़ हरिनाम का घोष करती हैं जबकि स्वयं हरि भक्तों के नाम-संकीर्तन में डूबे होते हैं।

भक्त रूपी भगवान की सेवा में अनेक संस्थाएँ और व्यक्ति भी जुटते हैं। ये सेवाभावी लोग डॉक्टरों की टीम से लेकर कपड़े इस्तरी करने, दाढ़ी बनाने, जूते-चप्पल मरम्मत करने जैसी सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं।

वारी भारत के धर्म सापेक्ष समाज का सजीव उदाहरण है। वारी असंख्य ओस कणों के एक होकर सागर बनने का जीता-जागता चित्र है। वस्तुतः ‘वा’ और ‘री’ के डेढ़-डेढ़ शब्दों से मिलकर बना वारी यात्रा प्रबंधन का वृहद शब्दकोश है।

– आनंद का असीम सागर है वारी..

– समर्पण की अथाह चाह है वारी…

– वारी-वारी, जन्म- मरणा ते वारी..

– जन्म से मरण तक की वारी…

– मरण से जन्म तक की वारी..

– जन्म-मरण की वारी से मुक्त होने के लिए भी वारी……

वारी देखने- पढ़ने या सुनने की नहीं अपितु अनुभव करने की यात्रा है। इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए महाराष्ट्र की पावन धरती आपको संकेत कर रही है। विदुषी इरावती कर्वे के शब्दों में -महाराष्ट्र अर्थात वह भूमि जहाँ का निवासी पंढरपुर की यात्रा करता है। जीवन में कम से कम एक बार वारी करके महाराष्ट्रवासी होने का सुख अवश्य अनुभव करें।

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ From oil wells to WhatsApp wells—what a glorious journey! ☆ S Ranjeet Singh Uppal ☆

Ranjeet Singh Uppal

(E-abhivyakti welcomes S. Ranjeet Singh Uppal ji. He is a Mechanical Engineer from the Government Engineering College, Jabalpur. He completed his post graduate diploma in Petroleum Technology from Dibrugarh University. He retired as General Manager Production from the ONGC after years of distinguished service. Confessions of a Contented Omniscient Sardar.)

🌌 From oil wells to WhatsApp wells—what a glorious journey! 🌌 Ranjeet Singh Uppal 🌌

Life has been extraordinarily kind to me.

I am a mechanical engineer with a postgraduate diploma in petroleum technology. After a long and fulfilling career, I retired from ONGC as General Manager (Production). The oilfields gave me far more than a livelihood. They gave me dignity, friendships, countless stories, and a life richer than the dreams of the young man who first stepped into them. 

I belong to a traditional Sikh family that crossed over from West Punjab during Partition, carrying little more than courage, faith and hope. Waheguru smiled upon us. I received a good education, loving upbringing and, if I may say so, was a fairly bright student.

There was also a brief period when I was the prettiest girl in school.

It happened during a school play. Blessed with long flowing hair, I was chosen to play the heroine. Draped in costume and complete make-up, I walked home after the performance… only to discover a small procession of admiring boys following me all the way. Some illusions deserve to remain unbroken.

Every morning begins with a ritual dearer to me than meditation. I prepare tea for my wife—only Wagh Bakri will do. I repeat the ceremony in the evening as well. Some people chase world peace. I simply ensure the tea is brewed exactly the way she likes it. Experience has taught me that domestic harmony often begins in a teapot.

I visit the Gurudwara regularly and try to share whatever little Waheguru has blessed me with. I had, I confess, several marriage proposals in my younger days, but destiny had already written my name beside the finest companion I could have wished for. Some investments yield lifelong dividends.

Speaking of investments, a few wise property decisions transformed our modest beginnings into a comfortable retirement, with a handful of apartments and shops in Navi Mumbai. I even dreamt of opening a Patanjali store after retirement. Alas, Baba Ramdev had reached my neighbourhood before I could.

Every morning I walk with a cheerful band of senior citizens. We sit beside a pond where I lovingly feed the fishes. It is said that feeding fish at dawn is a noble deed that earns blessings.

By evening, however, another school of fish voluntarily appears—golden, crisp and delicious—on my dinner plate. Doctors assure me it is good for health. Who am I to argue with either the scriptures or the specialists? Miracles come in many forms.

One of life’s greatest blessings has been friendship. My childhood companions remain exactly that—companions. We still laugh over adolescent crushes, youthful escapades and harmless mischief with complete frankness. We know enough about one another to write biographies, but wisely settle for gentle leg-pulling instead.

If only we could all gather once again in Ranjhi, Jabalpur, where our stories first learnt to walk. I suspect the old lanes still remember our footsteps and occasionally whisper our names to the evening breeze.

In my younger days, I devoured books—from Gulshan Nanda to Premchand. These days, I have accepted a distinguished professorship at the University of WhatsApp.

My classes begin before sunrise and continue well past bedtime. Every worthy piece of knowledge, wisdom, humour, warning, blessing, medical breakthrough, historical revelation, patriotic message and motivational quote is carefully examined by me before being generously redistributed to society.

Whether the recipients graduate happily or silently mute me is entirely their academic decision.

At this glorious stage of life, I have reached a comforting conclusion.

I am practically omniscient. Whatever anyone forwards to me, I already know it.

I am almost omnipotent. There is hardly anything that cannot be solved with confidence, common sense and a suitable WhatsApp forward.

And thanks to AI, social media and live streaming, I have become delightfully omnipresent. A good morning message from me can greet people in several time zones before I have finished my second cup of tea.

Life, I have discovered, is not measured by the oil we extracted from the earth, but by the laughter we leave behind, the friendships we preserve, the tea we brew with love, the fish we feed, the fish we eat, and the messages we keep forwarding in the noble belief that humanity simply cannot manage without them.

Waheguru!

♥ ♥ ♥ ♥

© Ranjeet Singh Uppal

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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English Literature – Stories ☆ Witful Warmth # 90 – The Silent Weeping… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his StoriesThe Silent Weeping 

☆ Witful Warmth# 90 ☆

Stories ☆ The Silent Weeping… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

Deep within some hidden corner of my childhood memories, a particular scene remains frozen to this day—the swirling dust of the village fair held at the outskirts, the stifling summer heat, and cutting through it all, an old, creaking bicycle. Tied to the carrier at the back of that bicycle was a split bamboo frame, packed with colorful toy trumpets, plastic dolls, clicking clockwork partridge carts, and bright red-and-yellow cellophane pinwheels fluttering in the wind. He wasn’t merely a toy seller; it felt as though he arrived carrying an entire universe of happiness directly upon his back. When the bell of his bicycle rang, it felt as if a fresh breath of air had filled the lungs of every child in the neighborhood. But today, looking back, it seems that as we grew up, the entire world of that bicycle man was lost somewhere. Now, neither is that bell heard, nor is that familiar face visible in the dust of the fair. It feels as if the blinding speed of time has snatched the very pedals from that poor man’s feet.

In this new era of online shopping, where happiness comes packed at the mere touch of a screen and gets delivered right to our doorsteps, the grimy bundle of that poor peddler has begun to look like a heap of junk. Every morning he wakes up, replaces the slipped chain of his bicycle, and pedals with all his might—but the stubborn wheel of time has sped far ahead of him. Beneath the glittering debris of this modern market, his hopes and his small craft have suffocated and died. People rightly say that a hungry man cannot sing praises of the Divine, but here, an entire life has turned into an endless hymn of hunger. It breaks my heart to think that the person who wears away his heels just to scatter a few moments of smiles on the lips of others’ children for a few rupees, often has his own innocent children sleeping on an empty stomach at night, crying themselves to sleep. The dirt on his torn shirt and the odor of his sweat hold the final testimony of honesty, which this ruthless world simply refuses to see.

A fair once signified the coming together of relationships and the sharing of joy, but now fairs too have become corporate. Amidst massive pavilions, ticketed amusement rides, and VIP passes, that bicycle man is driven away right from the main gate. “Get out of here, don’t block the way!”—when an influential security guard or a policeman barks these dismissive words at him, it is not just his bicycle that retreats; his very self-respect is left bleeding internally. Dragging his worn-out slippers, he walks away with his head bowed and stands beneath the shade of some tree. Witnessing his utter helplessness and his silent lament, the heart of the heavens must surely tremble. He never begged from anyone, he never desired unearned wealth; he had merely nurtured his toys with the droplets of his sweat, yet this cruel world gave him this very reward for his honesty.

Now, it seems he is no longer just a toy seller, but the final shroud of our departed innocence, growing progressively soiled. The more modern we become, the more callous we turn. We feel pity for starving animals and unleash oceans of empathy on social media, yet the sob of this living, dying human being standing right before us fails to reach our ears. The dilapidated frame of his bicycle, with its handlebar now bent and its seat torn, spewing out cotton, is a perfect mirror of his life. Every single day, he sets out for a new battle, fully aware that in this market, his defeat has already been predetermined.

Even his voice now seems to have choked within the alleys. Once, at his single cry, the entire neighborhood would leap to life: “Come take it, little master—the flying bird, the clicking horse!” Now, that voice lies buried somewhere beneath the alarms of wristwatches and the loud noise of mobile reels. People shut the high doors and windows of their houses so that the outside dust and destitution do not breach the interior. He stares at the closed doors, licks his lips with his parched tongue, and moves forward without a word. His back is bent, his hair has grayed prematurely, and the veins on his hands bulge out like the branches of a withered tree. He has become a living ghost, searching for his lost life within this settlement of humans.

In the end, when he vanishes completely from the pages of history, we might look at his photographs and say, “Yes, there was once such an era.” But by then, it will be far too late. Upon the altar of our progress, we would have sacrificed an incredibly innocent and honest existence. Whenever you happen to find that dust-laden plastic pinwheel from some old cupboard, do pause and think whether a lamp was lit in the seller’s house that evening or not. That bicycle man is not a character from a story; he is a culture taking its last breath, agonizingly dying right before our eyes—a death over which no mourning will be observed, nor any tears shed. The final bell of his bicycle will merely echo somewhere in the wind and fall silent forever, while we remain absorbed in our well-decorated world, forgetting that someone’s entire existence was sacrificed to our indifference.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतहे राम धरा पर आ जाओ

? रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हे राम धरा पर आ जाओ,

प्रभु फिरती अकुलाई।

खोई है मानवता जग ने,

कली-कली मुरझाई।।

‌*

दानवता प्रभु खूब बढ़ी है,

रक्षक बनकर आओ।

संस्कारों को भूल गए सब,

आकर नाथ सिखाओ।।

समरसता का पाठ पढ़ा दो,

दूर करो कठिनाई।

*

भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं,

भ्रष्टाचार मिटादो।

भय से हीन जगत् हो सारा,

अत्याचार हटादो।।

अंत करो मन के रावण का,

हर उसकी परछाई।

*

राह प्रगति की खोलो सारी,

हो संस्कृति संस्थापक।

पोषित कर दो धर्म सनातन,

प्रभु हो शांति उपासक।।

राम राज्य फिर से आ जाए,

सुरभित हो अँगनाई।

*

रघुकुल रीति निभाने वाले,

प्रभु हो अन्तर्यामी।

तकती राह अहल्या फिर से,

दे दो दर्शन स्वामी।।

कलियुग के सब कलुष दूर हों,

मुक्तिधाम रघुराई ।

*

विनती करते रघुकुल भूषण,

शरणागत आते हैं।

वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी,

रामचरित गाते हैं।।

करुणानिधि सुख के सागर हो,

समय बड़ा दुखदाई।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२९ ☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – संवाद)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

पूछा हमने प्यार से, तेरी हाँ थी जान।

अब मैं तो पछता रहा, नहीं किया हैं मान।।

 *

घड़ी मिलन की देखता, आओगी अब पास।

अन्तस में तुम! ही बसी, बस चाहत की आस।।

 *

तेरे इस व्यवहार से, छूटे मेरे प्राण।

उमड़ा मन में ज्वार था, मगर दूर अरमान।।

 *

नहीं कहा मैंने गलत, जलता मैं दिन-रात।

उमड़ा सागर भाव का, सुन मेरी यह बात।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३११ ☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय मुक्तक – प्यार और ऐतवार आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३११ ☆

☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा ☆

आजकल लड़कियों पर  ऐतवार  कौन करे

बदलते  हालात  में सच्चा  प्यार  कौन करे

जिस कदर करतीं हैं विश्वास घात लडकियाँ

साथ  इनके  अब  सद  व्यबहार कौन करे

*

प्यार  में  इतने  जुनूनी  हो  गए

चाह में प्रेमी की मगनूनी हो गए

प्रेम में  अंधे  हुए वो  इस  कदर

हत्या  कर के  खुद खूनी हो गए

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १।)

☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆

? आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आज मैं आपको ले चलती हूँ भारत के एक ऐसे जिले के किस्से सुनाने जो असीम विषमताओं को समेटे, सिंधुघाटी संस्कृति या हड़प्पा सभ्यता या सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर अत्याधुनिक बंदरगाह और ट्रेड के लिये जाना जाता हैl यहाँ की प्रजा खुमारी में जीती हैl यहाँ हड़प्पन वर्ल्ड संस्कृति का चौथा शहर धोलावीरा हैl वो धोलावीरा जो उस समय का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र थाl यहाँ ओमान, अरब, इराक के व्यापारी समुद्र मार्ग से आकर व्यापार करते थेl इस बात की पुष्टि के लिये व्यापार के अवशेष यहाँ देखने को मिलते हैंl यह इतिहास का वह काल था जब मनुष्य ने टिन और ताम्बे के औजार और हथियार बनाने शुरू किये थेl यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर में स्थान दिया है और भारत सरकार ने इसे गुजरात राज्य के चौथे विश्व धरोहर का नाम दे दियाl

पढ़ने में आता है कि जलवायु परिवर्तन एवं नदियों के सूखने के कारण वहाँ बहुत भयंकर सूखा पडा जिसके चलते लोगो को शहर छोड़ देना पड़ा और आज ये धोलावीरा खंडहर बन गयाl

 ऐसा जिला जिसने अपने आप को विनाशकारी, दर्दनाक भूकंप से धराशाई होने पर भी पुनः संगठित कियाl ऐसा जिला जिसकी भूमि जो आज भी 23 प्रकार के खनिज सम्पदा अपने में समेटे हैl ऐसा जिला जहाँ दो बंदरगाह, चार हवाई अड्डे, दो ट्रेन टर्मिनस, पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र सभी एक ही जगह पर दिखते हैंl

यह जिला हिंदूस्तान में क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है, जिसकी ब्रिटिश सरकार के समय अपनी स्वयं कि मुद्राएँ होती थींl

हाँ जी आप में से बहुत लोगों ने इसे पहचान ही लिया होगाl यह जिला हमारे देश भारत के उत्तर पश्चिम का, समुद्र में तैरते हुए कछुए जैसा दिखने वाला कच्छ हैl इसकी धरती शांत और रहस्यमयी जरूर है परन्तु यह धरती प्राकृतिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अति संवेदनशील भी हैl हमारी सीमा सुरक्षा बल की सुरक्षा के कारण इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अभेद्य प्रहरी भी कहा जाता हैl

इस जिले की पूर्वी सीमा राजस्थान को एक छोटे रण द्वारा छूती हैl पश्चिमी सीमा पर विशाल अरब सागर रेत के धोरों और लहरों का एक अद्वितीय संगम हैl उत्तर में पाकिस्तान और कच्छ का महान रण हैl साथ ही दक्षिण में कच्छ की खाड़ी हैl

  – क्रमशः

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३० – कविता – बारिश की बूंदे… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता बारिश की बूंदे।)

☆ शशि साहित्य # ३० ☆

? कविता – बारिश की बूंदे…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

छम छम करके बरसें बूंदे,

नाचे जैसे संग सितार…

मन नाच रहा संग में,

सुनकर राग मल्हार…

 

सर से अपने हटा के छतरी,

सुन लो मेघों की प्रेम पुकार…

भीग जाने दो तन को,

मन को हो जाने दो तर,

लंबा रास्ता तय कर आई बरखा,

तुमसे मिलने, धर बूंदों का आकार…

 

बहुत समय तक तरसे नैना,

तब जाकर हुआ दीदार…

साकार होते देख लो,

अब अपना यह इंतजार…

कुछ अपनी कहो, कुछ उनकी सुनो…

मन की बातें करो हज़ार…

 

बसा के माटी की भीनी खुशबू…

सांस महक, हो जाए खुशगवार…

छमक कर लाई, प्रीत संदेशा,

जैसे हरसू बरसे,

खुशियों का उपहार…

हटा के छतरी, गले लगा लो,

स्वीकार करो यह अमोल बौछार…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०१ – निघाली पालखी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०१ – विजय साहित्य ?

☆ निघाली पालखी…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(संत तुकाराम महाराज पालखी सोहळा)

( सहाक्षरी रचना )

इनाम दाराचा

सोडूनीया वाडा

निघाली पालखी

सवे गावगाडा ..! १

*

आकुर्डी गावच्या

विठू मंदीरात

तुकोबा पालखी

थांबे गजरात ..! २

*

पुण्य नगरीत

स्वागत सन्मान

जागोजागी चाले

अन्न वस्त्र दान ..! ३

*

पालखी विठोबा

पुण्यनगरीत

निवडुंग्या विठू

रमे पालखीत..! ४

*

लोणी काळभोर

रंगलासे मेळा

सोलापूर मार्गी

हरीनाम वेळा..! ५

*

तुकोबा पालखी

यवत मुक्काम

दिंड्या पताकांत

निनादते धाम ..! ६

*

वरवंड गावी

पालखी निवास

आषाढी वारीचा

 सुखद प्रवास ..! ७

*

आनंदाचा कंद

गवळ्याचे नाव

रंगले वारीत

उंटवडी गाव…! ८

*

मंगल पवित्र

क्षेत्र बारामती

कैवल्याची वारी

सुखाच्या संगती …! ९

*

सणसर गावी

विठ्ठल जपात

रंगली पालखी

हरी कीर्तनात…! १०

*

आंथुर्णे गावात

घेताच विसावा

माय माऊलीत

विठ्ठल दिसावा…! ११

*

गोल रिंगणाचा

बेळवंडी थाट

निमगावी क्षेत्री

केतकीची वाट..! १२

*

इंदापुर येता

गण गवळण 

रिंगणाचे वेध

अभंगात मन…! १३

*

सुमनांची वृष्टी

सराटी गावात

अमृताची गोडी

विठ्ठल नामात..! १४

*

गोल रिंगणाचे

अकलूज गांव

मनामधे जागा

विठू भक्तीभाव…! १५

*

येता बोरगाव

दिंडी नाचतसे

काया वाचा मनी

विठू राहतसे…! १६

*

पिराची कुरोली

शिगेला गजर

पाहण्या पंढरी

पोचली नजर..! १७

*

वाखरी गावात

मिलनाची वेळा

रमला वारीत

वैष्णवांचा मेळा..! १८

*

कळस दर्शंनी

पाऊले अधीर

काया वाचा मनी

धरवेना धीर..! १९

*

दोहो पालख्यांचा

वाखरीत मेळ

विठू दर्शनाची

यथोचित वेळ…! २०

*

वैष्णवांची वारी

हरीनाम घोष

वारीचा सोहळा

परम संतोष…! २१

*

पोचल्या पालख्या

पंढरपुरात

आनंदला विठू

भक्तीच्या सुरात..! २२

*

निघाली पालखी

कैवल्य भरारी

विठूच्या सेवेत

पंढरीची वारी…! २३

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ पाऊस… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

 वाट पाहते पागोळीची,

 छपरावरून येईल कधी!

टप् टप् टप् टप् ध्वनी त्याचा,

 कानामध्ये घुमेल कधी? …

 मृग नक्षत्राची चाहूल लागली,

 पण येणे तुझे झाले नाही!

पावसा पावसा ये लवकर,

 तुजविण आमचे जीवन नाही! … २

 *

येतोस जेव्हा तू भरभरून,

 कळत नाही आम्हा किंमत तुझी!

 तुझ्या विना जेव्हा जगतो आम्ही,

 विरहातून जाणीव होई तुझी! … ३

 *

ऋतुचक्राच्या फेऱ्यामधले,

 तुझेच आहे मोठे स्थान!

 तू आलास तर ऐकणार आम्ही,

 तुझे मधुर ते निसर्ग गान! .. ४

© उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

वारजे 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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