हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – कटखने दिन हुए है…!
☆ ॥ कविता॥ कटखने दिन हुए है…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित “साफ़ – सुथरा…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०० ☆
☆ “साफ़ – सुथरा – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति : लघुकथा संग्रह साफ सुथरा
लेखक :सुरेश पटवा
प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन भोपाल
मूल्य : 399 रु
☆ समकालीन विसंगतियों के बीच एक ‘साफ़-सुथरा’ हस्तक्षेप – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लघुकथा समकालीन साहित्य की एक ऐसी सशक्त विधा है, जो सीमित शब्दों में जीवन के अनगिन पहलुओं को छूने की सामर्थ्य रखती है। इसी विधा की गरिमा को केंद्र में रखते हुए सुरेश पटवा का नवीन लघुकथा-संग्रह ‘साफ़-सुथरा’ (मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल) सामने आया है। यह संग्रह न केवल विधागत अनुशासन को बनाए रखता है, बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विमर्श को नई दिशा भी प्रदान करता है। संग्रह की विविध लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों, धार्मिक विडंबनाओं और मानवीय अंतर्द्वंद्वों की गहरी पड़ताल करती हैं, जिनसे लेखक की वैचारिक सघनता स्पष्ट रूप से उजागर होती है।
संग्रह की कथाभूमि अत्यंत व्यापक है। जहाँ एक ओर ‘तीन-तलाक’ जैसी कथा मुस्लिम समाज में व्याप्त धार्मिक पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी होती है, वहीं ‘सौम्या का ख़्वाब’ शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता की सूक्ष्म व्याख्या करती है। लेखक यहाँ मनोवैज्ञानिक गहराई से स्पष्ट करता है कि वास्तविक संघर्ष सपनों को देखने में नहीं, बल्कि उन्हें हर हाल में ज़िंदा रखने में है। राजनीति के क्षेत्र में सामाजिक रूप से हाशिये पर पड़ी अस्मिताओं, जैसे ट्रांसजेंडर समुदाय के उभार को ‘काँटे की टक्कर’ में बखूबी चित्रित किया गया है, जो हमारे लोकतंत्र की रूढ़ियों पर एक तीखा कटाक्ष है।
सुरेश पटवा के लेखन में दार्शनिकता और व्यंग्य का अनूठा संगम है। ‘भगवान’ जैसी कथा बच्चों के भोले प्रश्नों के माध्यम से ईश्वर की संकल्पना को संवेदनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है, तो ‘लालच पर काबू’ आत्मनिरीक्षण के जरिए मनुष्यता की कसौटी को परिभाषित करती है। लोककथा की पुनर्रचना करती ‘राजा का परिधान’ आज के राजनेताओं के मिथ्याचार और चाटुकारिता पर प्रहार करती है, जहाँ सत्य कहने के लिए एक बच्चे जैसा निष्कलुष साहस अनिवार्य बताया गया है।
साहित्यिक जगत की विसंगतियों पर भी लेखक की दृष्टि पैनी रही है। ‘लंच का समय’ और ‘छपास सम्मान सुख में सेंध’ जैसी कथाएँ साहित्यिक आयोजनों के बौद्धिक दिखावे, खोखली आत्ममुग्धता और सम्मानों के पीछे छिपे सांस्कृतिक संकट को उजागर करती हैं। इसके विपरीत, ‘सच्चा हिंदुस्तानी’ जैसी रचनाएँ भारत की साझी संस्कृति और सहिष्णुता की पक्षधर बनकर उभरती हैं, जो यह संदेश देती हैं कि सच्ची राष्ट्रभक्ति धार्मिक कट्टरता से नहीं बल्कि मनुष्यता से शुरू होती है।
संग्रह की शीर्षक कथा ‘साफ़-सुथरा’ प्रतीकात्मकता के सहारे बाहरी स्वच्छता बनाम नैतिक गंदगी पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है। यह कहानी अंतरात्मा की शुचिता को सर्वोपरि मानती है। अंततः, सुरेश पटवा का यह लेखन एक जागरूक दृष्टा का लेखन है, जो हास्य-व्यंग्य और तर्क की त्रयी से एक सशक्त सामाजिक आलोचना निर्मित करता है। यह संग्रह सिद्ध करता है कि लघुकथा केवल क्षणिक प्रभाव नहीं, बल्कि एक गहन विचार का बीज है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक अंकुरित होता रहता है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता दिव्य गीत यह है गाना।)
☆ कविता ☆ दिव्य गीत यह है गाना ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम चौराहा…“।)
अभी अभी # ९७८ ⇒ आलेख – अंतिम चौराहा श्री प्रदीप शर्मा
चार दिल चार राहें जहां मिले उसे चौराहा कहते हैं।
मैं तो चला, जिधर चले रस्ता! मैं चलूं, वहां तक तो ठीक, लेकिन क्या कहीं रास्ता भी चलता है। कबीर के अनुसार, अगर चलती को गाड़ी कहा जा सकता है, तो रास्ता भी चल सकता है और जब रास्ता चलेगा तो वह भी घिस घिसकर रास्ते से, रस्ता हो जाएगा।
चौराहे को चौरस्ता भी कहते हैं। कहीं कहीं तो इसे चौमुहानी भी कहते हैं। रास्तों की तरह, गलियां भी होती हैं, ठाकुर शिवप्रसाद सिंह की गली, आगे मुड़ती है, और वहीं कहीं बंद गली का आखरी मकान धर्मवीर भारती का है।।
इंसान का क्या है, जिंदगी में कभी दोराहे पर खड़ा है तो कभी चौराहे पर। होने को तो खैर तिराहा भी होता है, लेकिन न जाने मेरे शहर के गांधी स्टेच्यू को लोग रीगल चौराहा क्यूं कहते हैं, जब कि यहां तो तीन ही रास्ते हैं। हां, यह भी सही है कि एक रास्ता स्वयं रीगल थिएटर भी था, लेकिन समय ने वह रास्ता भी बंद कर दिया।
थिएटर तो सारे बंद हुए, मैं अब फिल्म देखने कहां जाऊं।
जिस चौराहे से चार राहें निकलती हैं, उन्हें आप चौराहे की भुजा भी कह सकते हैं। हम तो जब भी श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए नाथद्वारा जाते हैं, काकरौली, चारभुजा जी और एकलिंग जी होते हुए झीलों की नगरी उदयपुर अवश्य जाते हैं। जहां सहेलियों की बाड़ी हो, वहां तो भूल भुलैया होगी ही।
यह अंक चार हमें एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है जहां हमें जयपुर की बड़ी चौपड़ और छोटी चौपड़ याद आ जाती है। बही खाते वाले चोपड़ा जी कब फिल्मों में आ गए, और यश कमा गए कुछ पता ही नहीं चला।।
अगर आपसे पूछा जाए, आपके शहर में कितने चौराहे हैं, तो शायद आप गिन नहीं पाएं। इसीलिए इन चौराहों का नाम दे दिया जाता है। कहीं चौक तो कहीं चौराहा। हमने अगर एक चौराहे का नाम जेलरोड रख दिया तो दूसरे का चिमनबाग चौराहा। चिमनबाग तो आज चमन हो गया, लेकिन हमारे भाइयों ने उस चौराहे का नाम ही बदलकर चिकमंगलूर चौराहा कर दिया। वैसे भी किसी विकलांग को दिव्यांग बनने में कहां ज्यादा वक्त लगता है।
हमारे शहर के प्रमुख चौराहों में अगर पलासिया चौराहा है तो गिटार चौराहा भी। जहां रोबोट लगा है, वह रोबोट चौराहा और जहां आज लेंटर्न होटल नहीं है, वहां भी लैंटर्न चौराहा है। सांवेर रोड पर अगर मरी माता चौराहा है तो रेडिसन होटल पर रेडिसन चौराहा। कुछ चौराहों पर भुजाएं जरा जरूरत से ज्यादा ही फड़फड़ाती हैं, रीजनल पार्क के आसपास तो इतनी राहें हैं कि राही, राह भी भटक जाए।।
इन सब चौराहों के बीच, पंचकुइया रोड पर एक अंतिम चौराहा भी है, क्योंकि वहां से आखरी रास्ता मुक्ति धाम की ओर ही जाता है। लेकिन यह जीव माया में नहीं उलझता ! वह जानता है, कोई ना संग मरे। बस थोड़ा श्मशान वैराग्य, शोक सभा और उठावने के बाद शाम को छप्पन दुकान।
क्या भरोसा कब जिंदगी की शाम आ जाए, कौन सा चौराहा हमारा अंतिम चौराहा हो जाए ! लेकिन हमने तो चौराहों को पार करना सीख लिया है। ट्रैफिक का सिपाही भले ही सीटी बजाता रहे, सिग्नल लाल लाल आंखें दिखलाता रहे, कोई मार्ग अवरोधक हमारी जिंदगी की गाड़ी को इतनी आसानी से नहीं रोक सकता।।
ऊपर भले ही चित्रगुप्त गणेश चोपड़ा भंडार खोले हमारे खाते बही की जांच करते रहें, हम स्वयंसेवक अपनी लाठी स्वयं साथ लेकर आएंगे। चित्रगुप्त के खातों की भी सरकार जांच करवा रही है। सब डिजिटल, ऑनलाइन और पारदर्शी हो रहा है। ईश्वर की मर्जी जैसा डायलॉग अब नहीं चलेगा।
जिसकी लाठी उसकी भैंस। यमराज को दूसरा वाहन तलाशना पड़ेगा। चित्रगुप्त को आईटी सेक्टर के लिए शिक्षित लोगों को ऊपर भी जॉब देने होंगे, और वह भी फाइव डे वीक और आकर्षक पैकेज के साथ। उसके बाद ही हमारी अंतिम चौराहे से रवानगी होगी। स्वर्ग में बर्थ नहीं, एक नया जॉब, एक नया चैलेंज।।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अक्षय मिलन”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆
🌻लघुकथा🌻अक्षय मिलन🛕
मोहनी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चली जा रही थी। हाथों में पूजन की थाली, जिसमें गुड़ चना, सत्तू, मेवा, मौसमी फल पूजन का सामान।
मन में वही दृढ विश्वास मेरा अक्षय मिलन अटूट अमर है। सुंदर सादगी से भरा परिधान परन्तु चेहरे पर अब मासूमियत की जगह बेबसी ने ले लिया है। आँखे आज निहार रही है—सुना था अक्षय तृतीया को जो दान पुण्य किया जाता है वह अमर हो जाता है। मोहनी ने तो अपने अक्षय का ही दान कर दिया था।
जानती थी वह अक्षय के बिना नही रह पायेगी। परन्तु अक्षय किसी और का है ये वह कैसे निभा कर जी सकती थी।
नमः पार्वती पतये हर – हर महादेव के उच्चारण से निर्मल जल की धार अर्पण कर रही थी।
लाल चुनरी उसके सिर पर पीछे से सिर ढकते गिरा – – –
अक्षय सुहाग वर शुभ वर पीछे पलट कर देखी कोई और नही अक्षय ही तो थे। जल का लोटा पति चरणों पर अर्पित कर अक्षय मिलन का आनंद लेने लगी।
किसी ने ऊपर लगे घंटे को लगातार बजा कर अक्षय तृतीया की बधाइयाँ दी।
विवाह वर्षगांठ की हार्दिक बधाई से मंदिर परिसर गूँज उठा।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७४ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆
मित्र के गैस संबंधित कार्य के लिए सब बाधाएं पार कर डीलर के हॉल में प्रवेश कर राहत की सांस ली। संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने की लिए ज़िग जैग व्यवस्था थी। इसको “क्राउड मैनेजमेंट” भी कहा जाता है।
समय बहुत लग जाएगा, ये विचार आते ही दिमाग के घोड़े चलाए। कहीं पढ़ा था, पानी अपना रास्ता स्वयं बनाता है। उसी तर्ज पर हम भी चल पड़े, अधिकतर लोग मोबाइल में वीडियो देख रहे थे, उनकी नजरों के सामने से उनसे आगे निकल गए।
अधिकतर लोग तो झगड़ा कर रहे थे, पेट खाली हो तो गुस्सा भी बहुत आता है। यहां तो घर के चूल्हे ही नहीं जल पा रहें हैं। हम जैसे ही बुकिंग कर्मचारी के सामने पहुंचे और अपना काम बताया, वो बोला आप गलत जगह में आए हैं। आपको तो एजेंसी के कंप्यूटर विभाग में जाना पड़ेगा। हम तो भेड़ चाल के कारण भीड़ के साथ चले आए थे।
कंप्यूटर विभाग वाले सज्जन फुर्सत में थे। उन्होंने मित्र के आधार कार्ड को सिस्टम से हटा दिया। मित्र को इस बावत सूचित कर राहत की सांस ली। हमें डर लग रहा था, कहीं मित्र परिवार सहित हमारे यहां ना आ जाए, कुकिंग गैस की किल्लत का समय जो चल रहा हैं।