(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “प्रेम गीत…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆
कविता ☆ प्रेम गीत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
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गाते जाओ, गाते जाओ, प्रेम के गीत गाते जाओ,
जो भी मिले दीन-दुखियारा, गले उसे लगाते जाओ।
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नफरत की हर एक चिंगारी, मिलकर आज बुझानी है,
प्रेम-सुधा की गंग बहाकर, दुनिया नई सजानी है।
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जो बाँटें मानव-मानव को, वे बंधन टूट जाने दो,
दिल से दिल का सेतु बनाकर, प्रेम-ध्वजा लहराने दो।
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भूखे के घर रोटी पहुँचे, प्यासे को जल भी मिल जाए,
रोती हुई हर माँ की आँखों में, नया तराना फिर से आए।
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जिसके तन पर वस्त्र न हों, अपना आँचल बिछा देना
जिसके मन में दर्द भरा हो, अपना ही दिल थमा देना।
*
मंदिर मस्जिद बाद में जाना, पहले मन को मंदिर कर,
ईश्वर वहीं विराजेगा जहाँ, प्रेम बहे निष्कलुष निर्झर।
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पत्थर में भगवान खोजने वालों, इतना याद रख लेना,
रोते हुए इंसान के आँसू, पहले हँसकर पोंछ सुखा देना।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तो बुरा मान गए !…“।)
अभी अभी # १०६९ ⇒ आलेख – तो बुरा मान गए ! श्री प्रदीप शर्मा
हम इंसान हैं ! हमें अच्छा भी लगता है, और बुरा भी लगता है।
अच्छे से कभी हम आहत नहीं होते लेकिन बुरा हमें केवल लगता ही नहीं, हम बुरा मान भी जाते हैं। कोई हमें बुरा मानने का कहता नहीं, हम खुद ही बुरा मान जाते हैं।
अच्छा-बुरा लगना, अक्सर हमारे मूड पर निर्भर करता है। अच्छे मूड में सब अच्छा लगता है, हँसी मज़ाक, छींटाकशी सब चलती है। लेकिन अगर मूड ठीक न हुआ, तो पत्नी के हाथ की चाय स्वाद खो बैठती है। ब्यूटी पार्लर से सजी-धजी आई पत्नी खाने को दौड़ती है। यह सब एकांगी नहीं होता ! जब पति पत्नी के जन्मदिन की तारीख भूल जाता है, तो सदन में भूचाल आ जाता है। राजा दशरथ रानी कौशल्या के आगे घुटने टेक देते हैं।।
अच्छे माहौल में हमारा स्वभाव भी अच्छा रहता है। हर बड़े-छोटे को गले लगाने की इच्छा होती है, लेकिन अगर वातावरण अप्रिय हो, तो सबसे पीछा छुड़ाने का मन करता है। आखिर हम बुरा मानते ही क्यूँ हैं।
इंसान का मिज़ाज़ भी किसी मौसम से कम नहीं ! एक अच्छे मौसम की तरह कुछ लोग हमेशा खुशनुमा, मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं तो कुछ बेईमान मौसम की तरह चिड़चिड़े, मुँह लटकाए हुए। कुछ लोग इसे इंसान की फ़ितरत कहते हैं। किसी का चेहरा हमेशा एक ताज़े गुलाब की तरह खिला हुआ होता है, तो कुछ का एक बासी, मुरझाई हुई फूलगोभी की तरह फूला;फूला। जब पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं, तो सभी इंसानों का स्वभाव एक जैसा कैसे हो सकता है।।
बुरा मानने वाले भी दो तरह के होते हैं, एक जिनके बुरा मानने की कोई वजह होती है, और दूसरे, जो बिना वज़ह बुरा माने बैठे रहते हैं। बिना वजह बुरा मानने वालों में अक्सर मौसाजी और फूफाजी का नंबर आता है।
उनके एक शादी में बुरा मानने की वज़ह दूसरी शादी में जाकर पता चलती है, और तब तक वे पुनः बिना वज़ह बुरा मान बैठ गए होते हैं। वैसे भी जिनकी बुरा मानने की कोई वजह भी होती है, वह अक्सर बेवज़ह ही होती है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है !
सबसे मिल-जुलकर हँसते-खेलते, सबके लिए प्रेम और उदारतापूर्वक दृष्टिकोण रख, ज़िन्दगी जीना ही उसका मक़सद होता है, लेकिन अगर कोई रूठा है, नाराज़ है, किसी कारण बुरा मान बैठा है, तो उसे मनाना भी पड़ता है। बच्चे अगर ज़ल्दी रूठते हैं, तो ज़ल्दी मान भी जाते हैं। मान-मनव्वल तो बड़ों के साथ करनी पड़ती है।।
जब कोई फितरती इंसान अचानक किसी बात को बिना समझे बुरा मान बैठता है, तो उसका मान-सम्मान, इज़्ज़त, स्वाभिमान
सभी दाँव पर लग जाता है।
महामना चाणक्य, महर्षि दुर्वासा और परशुराम का क्रोध उस्में फनफनाने लगता है। उस्का बस चले तो धरती को श्राप दे दे, आसमान में आग लगा दे। लेकिन जब उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाता है, तब
जाकर अपनी ही लंका को जलाने वाले ये वीर पुरूष, पश्चाताप के सागर में अपनी जलती पूँछ को बुझा पाते हैं। और कहीं कहीं तो देर होने पर लंका जलकर ख़ाक भी हो जाती देखी गई है।
रूठना मनाना, बुरा मानना, अगर सहज और बच्चों जैसा हो, तो जीवन का आनंद ही कुछ और है। किसी की बात को दिल पर ले लेना, किसी से न कहना, मन ही मन घुटना, जीवन में अवसाद की स्थिति निर्मित कर देता है। खुलकर कहना, मन की गाँठों को खोलना और हर बात का सकारात्मक अर्थ निकालना ही
एक खुशहाल व्यक्तित्व की निशानी है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में, जो बुरा लगे, तो एक रोटी ज़्यादा खा लेते हैं।।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आईना।)
“नेहा! तुम हमेशा मेरे दुश्मनों से ही क्यों बात करती हो? मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं। आज ही मेरा मकान खाली कर दो।”
मकान मालकिन शांता देवी का स्वर गुस्से से काँप रहा था।
नेहा बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। पीछे से शांता देवी की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही—”किराए के घर में रहती है और तेवर महारानी जैसे!”
शाम को संदीप घर पहुँचा तो शांता देवी ने फिर वही बात दोहरा दी। कमरे में आकर उसने पूछा, “आख़िर बात क्या हुई?”
नेहा ने शांत स्वर में कहा, “कोने वाले घर में हमारे गाँव की पूजा रहती है। वह मुझसे दो बातें कर लेती है। आंटी उसे अपना दुश्मन मानती हैं। उनकी दुश्मनी में मेरा क्या दोष?”
संदीप ने कहा, “ठीक है, दोस्त का मकान खाली है। वहीं चलेंगे।”
दोनों सामान समेटने लगे। अलमारी बंद करते हुए नेहा की नज़र अपने पुराने पारिवारिक फोटो पर पड़ी। उसने उसे देर तक देखा, फिर धीमे से बोली, “एक बार सास-ससुर से दूर होकर सोचा था कि शांति मिल जाएगी। अब यहाँ भी वही कड़वाहट… क्या हर बार घर ही बदलना समाधान है?”
संदीप उसकी ओर देखने लगा।
कुछ क्षण बाद नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं… गाड़ी विश्वकर्मा नगर नहीं जाएगी।”
“तो कहाँ?” संदीप ने पूछा।
नेहा की आँखें नम थीं।
“रामपुर… माँ-पिताजी के पास। अब किराए के मकान नहीं, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करूँगी। शायद रिश्ते घर बदलने से नहीं, रवैया बदलने से सँवरते हैं। आज मैंने स्वयं को आईने में देख लिया है।”
गाड़ी रामपुर की ओर मुड़ चुकी थी और नेहा के जीवन की दिशा भी।
☆ दिल, दोस्ती आणि रियुनियन…☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆
आयुष्य हे एका प्रवाही नदीसारखे असते.. ती नदी वाहत राहते, किनारे बदलत राहतात, प्रवासी बदलतात पण काही दगड तिच्या तळाशी कायमचे विसावलेले असतात. मैत्रीही अशीच असते. काळ कितीही पुढे सरकला, आयुष्याने कितीही नवी वळणे घेतली, तरी मनाच्या तळाशी जपलेल्या मित्रांच्या आठवणी कधीच पुसल्या जात नाहीत. आणि जेव्हा अनेक वर्षांनी मित्र पुन्हा एकत्र येतात तेव्हा तो केवळ रियुनियन नसतो तो हरवलेल्या दिवसांना पुन्हा एकदा कवेत घेण्याचा भावनिक उत्सव असतो…
शाळेच्या त्या वर्गात एकाच बाकावर बसलेली मने आज जगाच्या वेगवेगळ्या दिशांना विखुरलेली असतात. कुणी यशाच्या शिखरावर पोहोचलेला असतो, कुणी संघर्षाच्या वाटेवर चालत असतो तर कुणी संसाराच्या जबाबदाऱ्यांत स्वतःला विसरून गेलेला असतो पण रियुनियनच्या दिवशी या सगळ्या ओळखी मागे पडतात. पुन्हा एकदा तेच खट्याळ चेहरे, तेच निरागस हसू आणि तेच बेधडक मन समोर उभे राहते. काळाने चेहऱ्यावर सुरकुत्या उमटवल्या असतील, केसांवर पांढरेपणा चढवला असेल पण मैत्रीच्या आठवणी मात्र अजूनही तारुण्याने उजळलेल्या असतात… शाळेच्या अंगणात एकत्र खेळलेले खेळ, डब्यातील घास वाटून खाल्लेले दिवस, शिक्षकांच्या रागानंतरही ओठांवर उमटलेले खट्याळ हास्य, परीक्षेच्या आदल्या दिवशी केलेला अभ्यास आणि सुट्टीची घंटा वाजताच दप्तर खांद्यावर टाकून धावणारी पावले हे सारे क्षण काळाच्या पडद्याआड गेलेले असतात मात्र रियुनियनच्या निमित्ताने ते पुन्हा नव्याने जिवंत होतात. प्रत्येक चेहऱ्यावर काळाच्या रेषा उमटलेल्या असतात पण डोळ्यांतील निरागस मैत्री तशीच ताजी असते…
मैत्री म्हणजे अपेक्षारहित विश्वास. न सांगताही मनातील वेदना समजून घेणारे डोळे, अपयशात खांद्यावर ठेवलेला आधाराचा हात आणि यशात मनापासून वाजवलेली टाळी
यालाच तर मैत्री म्हणतात… रक्ताच्या नात्यांपेक्षाही अनेकदा मैत्रीचे नाते अधिक जवळचे वाटते कारण ते स्वार्थाने नव्हे तर मनाने जोडलेले असते… मैत्री ही रक्ताच्या नात्यापेक्षाही अधिक जिव्हाळ्याची असते. या नात्याला स्वार्थाचा स्पर्श नसतो, अपेक्षांचे ओझे नसते. मित्रांच्या सहवासात माणूस स्वतःला विसरून मनमोकळेपणाने हसतो. जीवनातील यश-अपयश, आनंद-दुःख, संघर्ष आणि स्वप्ने यांची देवाणघेवाण करताना जाणवते की वर्षांचे अंतर मैत्रीची उब कमी करू शकत नाही…
रियुनियनमध्ये जुन्या आठवणींची पाने एकामागून एक उलगडत जातात. वर्गात केलेल्या खोड्या, डबा चोरून खाण्याचे प्रसंग, शिक्षकांची बोलणी, वार्षिक स्नेहसंमेलनातील गोंधळ, परीक्षेच्या आदल्या रात्री केलेली अभ्यासाची धडपड
प्रत्येक आठवण हसवते तर काही आठवणी डोळ्यांत नकळत पाणी आणतात.. त्या क्षणी काळ थबकतो आणि आयुष्य पुन्हा एकदा बालपणाच्या उंबरठ्यावर येऊन उभे राहते.
आजच्या यांत्रिक जगात माणूस मोबाईलच्या संपर्कात आहे पण मनांच्या संपर्कापासून दूर जात आहे.. हजारो संदेशांची देवाणघेवाण होते तरीही मन मोकळे करून हसण्यासाठी माणूस शोधावा लागतो म्हणूनच रियुनियन ही केवळ भेट नसते ती नात्यांना पुन्हा जिवंत करणारी ऊब असते. मित्रांच्या हास्यात दडलेला आनंद आणि त्यांच्या मिठीत मिळणारा दिलासा कोणत्याही संपत्तीपेक्षा मोठा असतो… आजच्या डिजिटल युगात संदेश आणि व्हिडिओ कॉल सहज उपलब्ध आहेत पण समोरासमोर भेटून हातात हात घेण्याची, खांद्यावर हात ठेवून हसण्याची आणि डोळ्यांत डोळे घालून आठवणींना उजाळा देण्याची ऊब कोणतेही तंत्रज्ञान देऊ शकत नाही. म्हणूनच रियुनियन हा केवळ कार्यक्रम नसतो तो नात्यांना पुन्हा नव्याने जगवणारा उत्सव असतो…. खरे तर जीवनाच्या प्रवासात पद, पैसा आणि प्रतिष्ठा मिळवता येते पण बालपणीची निरागस मैत्री विकत घेता येत नाही. ती फक्त जपावी लागते. रियुनियन हा त्या जपलेल्या नात्यांचा उत्सव असतो. तो आपल्याला शिकवतो की आयुष्य कितीही व्यस्त झाले तरी मनासाठी काही माणसे राखून ठेवली पाहिजेत कारण शेवटी यशाच्या शिखरावर उभे राहिल्यावर टाळ्या वाजवणारे अनेक मिळतील पण पडल्यावर हात धरून उभे करणारे मित्रच असतात म्हणूनच ‘दिल, दोस्ती आणि रियुनियन’ हे तीन शब्द नसून आयुष्याचा हळवा, जिवंत आणि अमूल्य अनुभव आहे. काळाच्या ओघात सर्व काही बदलते पण मैत्रीचे धागे मात्र काळालाही तोडता येत नाहीत म्हणूनच मनाच्या प्रत्येक कोपऱ्यात एक हाक कायम घुमत राहते
“मित्रांनो, पुन्हा भेटूया… कारण आठवणींना नव्याने जगण्यासाठी रियुनियनची एक भेटच पुरेशी असते. “
रियुनियन हा त्या मैत्रीच्या झऱ्याला पुन्हा एकदा उगम देणारा क्षण असतो. म्हणूनच आयुष्याच्या संध्याकाळी मागे वळून पाहताना जर काही सर्वाधिक मौल्यवान वाटत असेल, तर ते म्हणजे
मित्र, त्यांच्या आठवणी आणि पुन्हा एकदा त्यांना भेटण्याचा तो अविस्मरणीय रियुनियन…!
शेवटी असे वाटते की, ‘दिल, दोस्ती आणि रियुनियन’ ही तीन शब्दांची गोष्ट नसून आयुष्यभर जपण्यासारखी अमूल्य ठेव आहे…
लोढा शेठच्या गाडीचा हाॅर्न वाजला तसा एकनाथच्या ऐवजी दिनू सिक्युरिटीच्या रुममधून बाहेर आला. त्याने लगबगीनं फाटक उघडलं. गाडी जशी गेटच्या बाहेर पडू लागली तसा त्याने आपला बाप जसा ठोकतो तसा सॅल्यूट लोढाशेठला पाहून ठोकला. लोढाशेठच्या चेहऱ्यावर त्याला बघून एक प्रसन्न हास्य झळकलं. “पोरगा खरंच स्मार्ट आहे”ते मनातल्या मनात म्हणाले. गाडी पुढे रस्त्याला लागली तसा कालचा प्रसंग त्यांना आठवला. काल त्यांच्या मुलाचा पंधरावा वाढदिवस त्यांनी सोसायटीच्या क्लबहाऊसमध्ये जोरदार साजरा केला. त्यांचा मुलगा सनी दहावीच्या परीक्षेत ९९%घेऊन पास झाला होता हे खरं वाढदिवस साजरा करण्यामागचं मुख्य कारण होतं. सोसायटीचा सिक्युरिटी गार्ड कम केयरटेकर एकनाथचा मुलगा दिनू वाढदिवसाला आपल्या आईबहिणीसोबत हजर होता. लोढाशेठ सगळ्या पाहुण्यांची चौकशी करतकरत दिनूजवळ पोहचले. दिनू त्यांचाच नाही तर पुर्ण सोसायटीचा आवडता मुलगा. त्याला पाहून लोढाशेठ थांबले. त्याच्या उत्साहाने भरलेल्या चेहऱ्याकडे पहात त्यांनी विचारलं
“काय दिनू कशी वाटली पार्टी? “
“लई झकास ” दिनूनं त्याच्या नेहमीच्या स्टाईलने उत्तर दिलं “पुढच्या महिन्यात माझा पण वाढदिवस आहे आणि माझे पप्पा पण अशीच सगळ्यांना पार्टी देणार आहेत “
ते ऐकून लोढाशेठ जोरात हसले. या पार्टीकरता त्यांना दिड लाख खर्च आला होता. एक सिक्युरिटी गार्ड एवढा खर्च करणं शक्यच नव्हतं. एकनाथने त्याला नको ते स्वप्न दाखवलं होतं. दिनूच्या भाबडेपणाची त्यांना गंमत वाटली पण त्यांना त्याचं मन मोडायचं नव्हतं म्हणून ते म्हणाले
ते आठवून आताही शेठजींच्या चेहऱ्यावर हसू उमटलं. एकदम त्यांना जाणवलं की एकनाथची एवढा खर्च करण्याची ऐपत नक्कीच नाही. महिन्याला दहा हजार कमावणारा माणूस एकदिड लाख फक्त वाढदिवसाला खर्च करणार नाही. मात्र सोसायटीत रहाणारे सगळे मिळून तर करु शकतात. या विचाराने त्यांना एकदम उत्साह वाटायला लागला. काय हरकत आहे? प्रत्येकाने दोन हजार जरी जमा केले तरी दिनूचा वाढदिवस जोरदार साजरा करता येणार होता आणि सोसायटीतला कुणी नाही म्हणेल असंही त्यांना वाटत नव्हतं कारण सगळेच पैसेवाले होते आणि महत्वाचं म्हणजे दिनू होताच तसा. सदोदित उत्साहाने फसफसलेला. हाक मारली की कुणाच्याही मदतीला धावून जाणारा. कोणतंही काम सांगा दिनूने ते केलं नाही असं नाही. बरं या कामाचा कुणी मोबदला देईल अशीही अपेक्षा नाही. तो शाळेतून आला की सारखा सोसायटीतल्या रहिवाशांच्या कामासाठी वरखाली करायचा. कधी कंटाळा नाही की नाही म्हणणं नाही. “दिनू मला भाजी आणून दे” “दिनू जरा रुम साफ करायचीय. येतोस का मदतीला? ” “दिनू आजीला जरा फिरवून आणतोस का बागेत? ” “दिनू कोपऱ्यावरच्या मेडिकल मधून औषधं आणून दे बरं” “दिनू बाळ रडतोय. त्याला फिरवून आण जरा” अशी शेकडो कामं रोजच दिनूला सांगितली जायची आणि दिनू ती उत्साहाने करायचा. कधी कुणी त्याच्यावर चिडलं, रागावलं तरी दिनूने कधीही उलटून उत्तर दिलंय असं होत नव्हतं.
सोसायटीला तीन सिक्युरिटी गार्ड होते. त्यातले दोन गावातच रहायचे. एकनाथ मराठवाड्यातल्या परभणी जिल्ह्यातून आलेला. एक्स सर्व्हिसमॅन. सोसायटीच्या अगोदरच्या अध्यक्षांनी त्याला आणलं होतं. सोसायटीच्या बेसमेंटमध्ये बांधलेल्या दोन छोट्या रुममध्ये कुटुंबासह रहायचा. सिक्युरिटी गार्ड कम केअर टेकर अशा दोन्ही भुमिका तो निभवायचा. दिनू हा त्याचा छोटा मुलगा. तेरा वर्षाचा. गोरागोमटा आणि चुणचुणीत. एकनाथची बायको आणि मोठी मुलगीही सोसायटीतल्या रहिवाशांची गरज पडली तर बऱ्याचदा धुण्याभांड्याची कामं करायची. एकंदरीत या पुर्णच कुटुंबाची सोसायटीला बरीच मदत व्हायची पण खरा हिरो होता तो दिनू. सर्वांच्या मदतीला ताबडतोब धावून जाणारा.
लोढाशेठ सोसायटीचे सेक्रेटरी होते. त्यांनी ठरवलं सोसायटीच्या मेंबर्सची मिटिंग बोलवायची आणि हा मुद्दा मांडायचा. बारा मजली सोसायटीत ४८ फ्लॅट होते आणि त्यात रहाणारे जवळजवळ सगळेच सधन होते. दोनतीन हजार काढून द्यायला कुणी नाही म्हणणार नव्हतं.
रात्री ते घरी परतले तेव्हा एकनाथ ड्युटीवर होता. त्याला त्यांनी विचारलं
“एकनाथ आपल्या दिनूचा वाढदिवस कधी असतो? “
“सोळा ऑक्टोबर. का बरं साहेब? “
“अरे काल तो म्हणत होता माझे पप्पा पण माझा वाढदिवस सनीसारखाच साजरा करणार आहेत. खरंय का? “
एकनाथ जोरात हसला
“अहो साहेब आपली काय ऐपत असा वाढदिवस साजरा करण्याची. पण काल सनीबाबाचा वाढदिवस पाहून तो माझ्या मागे लागला की माझाही वाढदिवस असाच करायचा. मी त्याला खुप समजावून सांगायचा प्रयत्न केला पण ऐकेचना म्हणून म्हंटलं ठिक आहे करु. तर तो सगळ्यांना तेच सांगत सुटलाय. अर्थात त्याच्यावर कोण विश्वास ठेवायलाय? “
“आम्ही करु त्याचा वाढदिवस “असं सांगायचं शेठजींच्या अगदी ओठावर आलं होतं पण दिनूला सरप्राईज द्यायला पाहिजे या विचाराने ते काही बोलले नाहीत.
जेवण वगैरे झाल्यावर त्यांनी सोसायटीच्या अध्यक्षांना फोन लावला.
“पाटिल साहेब, एक विचार मनात आलाय. आपला सिक्युरिटी गार्ड एकनाथचा मुलगा दिनूचा पुढच्या महिन्यात वाढदिवस आहे. तुम्हांला तर माहितच आहे की दिनू किती कामाचा मुलगा आहे ते. तेव्हा मला असं वाटतं की आपण सगळ्या सोसायटीने मिळून त्याचा वाढदिवस साजरा करावा”
“कल्पना चांगली आहे. पण साजरा करायचा म्हणजे कसा? “
“सोसायटीतल्या प्रत्येक परीवाराने दोन हजार जमा करायचे. साधारण शहाण्णव हजार जमतील. त्यात केक कापणं, सगळ्यांचं जेवण आणि मनोरंजनात्मक कार्यक्रम आयोजित करु. त्या निमित्ताने एक गेटटुगेदर होऊन जाईल”
“गेटटुगेदर ठिक आहे पण एका सिक्युरिटी गार्डच्या मुलाचा वाढदिवस साजरा करणं आपल्यासारख्या उच्चभ्रू लोकांना शोभेल का? सोसायटित असे अनेक जण आहेत ज्यांना आपल्या मुलांचे वाढदिवससुद्धा घरातच साजरे केलेले आवडतात मग दिनूच्या वाढदिवसाला ते तयार होतील का? अजून एक प्राॅब्लेम आहे. हा वाढदिवस आपण आपल्या खर्चाने साजरा केला तर बाकीचे सिक्युरिटी गार्ड म्हणतील आमच्या मुलांनी काय घोडं मारलंय? दिनूचा केला तर आमच्याही मुलांचे करा. मग तेव्हा काय उत्तर द्यायचं? “
“अहो साहेब त्यांची फॅमिली इथं रहात नाही. सिक्युरिटी शिवाय इतर कोणतंही काम ते किंवा त्यांची फॅमिली करत नाही. शिवाय तुम्ही पहाता तो पोरगा शाळेतून आला की सोसायटीतल्या लोकांची वैयक्तीक कामं करत असतो तीही फुकट. कधी त्याने कामाचे पैसे मागितले नाहीत की कामाला नाही म्हंटलं नाही. सोसायटीतले लोक त्याला आपल्या स्वार्थाकरीता वापरुन घेतात. मग एक दिवस त्याच्या साठी खर्च केला तर बिघडलं कुठं? “
“ठिक आहे. माझी काही हरकत नाही. ठेवा मिटिंग. बोलावून घ्या सगळ्यांना. पण मला नाही वाटत लोक तयार होतील. एकेक नमुने आहेत सगळे”
” पण मला खात्री आहे, दिनूसाठी ते नक्कीच पैसे देतील. आणि त्यांनी नाही दिले तरी मी एकटा करेन त्याचा वाढदिवस “लोढाशेठ जिद्दीने बोलून गेले
“मग तर प्राॅब्लेमच नाही. व्हा पुढे”
सोसायटीतल्या सगळ्या परीवारांचा एक व्हाॅटस्अप ग्रुप होता. त्यावर शेठजींनी येत्या रवीवारी पाच वाजता मिटिंग आयोजित केल्याचा मेसेज टाकला. मिटिंगचा विषय त्यांनी मुद्दामच टाकला नाही. विषय पाहूनच बरेच जण मिटिंगला यायचेच नाहीत असं त्यांना व्हायला नको होतं.
रविवार उजाडला. लोढाशेठ पाच वाजताच मिटिंग हाॅलमध्ये जाऊन बसले. कुणीही आलं नव्हतं. हे नेहमीचंच होतं. कोणत्याही विषयावर मिटिंग असो येणारे फार कमी. जे यायचे तेही आपल्या फुरसतीने सेक्रेटरीवर उपकार केल्यासारखे डुलतडालत यायचे.
सहा वाजले तेव्हा अध्यक्ष पाटील उगवले.
“अरे!अजून कुणीच आलं नाही? तुम्ही मेसेज पाठवला होता ना सगळ्यांना? “त्यांनी विचारलं
” हो तर. एकूणएक जणाला मेसेज पाठवलाय”
“मग असं कसं झालं? मेसेज ऐवजी तुम्ही फोनच करायला हवे होते. मेसेज वाचलाच नसेल तर त्यांना कळणार कसं? “
“अहो साहेब सगळ्यांनी मेसेज वाचलाय. मी चेक केलंय”
तेवढ्यात तीन चार जण आले. मग परत तीनचार जण आले. शेवटी सव्वासहा वाजता बारा जणांची उपस्थिती झाली. विषय जास्तीत जास्त लोकांपर्यंत पोहचावा म्हणून लोढाशेठनी दहापंधरा मिनिटं थांबायचं ठरवलं.
” लोढा शेठ मिटिंगचा विषय नाही कळवला तुम्ही” लोखंडे जरा रागातच म्हणाले
“साहेब ही ऑफिशियल मिटिंग नाहिये. पण एक पाच मिनिट थांबा सगळा विषय क्लियर होईल “
शेवटी आहे ती मंडळीही निघून जाऊ नये म्हणून शेठजींनी सुरुवात केली.
“माननीय सदस्यांचं मी स्वागत करतो. आज सोसायटीच्या प्रश्नांव्यतिरिक्त एका वेगळ्याच विषयावर चर्चा करण्याकरीता आपण जमलो आहोत. विषय असा आहे की आपण सर्वच जण आपल्या सिक्युरिटी गार्ड एकनाथचा मुलगा दिनेश उर्फ दिनूला जाणता. एक सगळ्यांच्या मदतीला धावून जाणारा, कसलीही अपेक्षा न करता सगळ्यांची काम चोख करणारा, सदोदित हसतमुख असणारा असा हा मुलगा आपल्या सर्वांचाच लाडका आहे. या दिनूचा वाढदिवस सोळा ऑक्टोबरला आहे. माझा असा विचार आहे की दिनूच्या या कामाबद्दल, त्याच्या आपल्या सर्वांना असलेल्या सहकार्याबद्दल यावेळेचा त्याचा वाढदिवस आपण सर्वांनी मिळून साजरा करावा”
शेठ थांबले. त्यांनी कुणी काही प्रतिक्रिया देतंय का याचा अंदाज घेतला. दोन मिनिट शांतता पसरली मग कुलकर्णी म्हणाले
“खरंच दिनू आपली खुपच काम करतो. आपण त्याचा वाढदिवस साजरा केला तर त्याला, त्याच्या आईवडिलांना खुप आनंद होईल. पण वाढदिवस साजरा कसा करणार? “
” सोपं आहे. आपण सर्वांनी दोन हजार रुपये जमा करायचे. ४८ घरांचे ९६ हजार जमा होतील. त्यात केक, दिनूला गिफ्ट, सगळ्या परीवारांचं एकत्र जेवण आणि मनोरंजनाचा हल्काफुल्का कार्यक्रम करता येईल “
“बापरे दोन हजार? खुप जास्त होतात “सुलक्षणेबाई म्हणाल्या.
” अहो मॅडम आपण हाॅटेलमध्ये जातो तेव्हा आपल्या चारपाच जणांचंच बिल तीनचार हजार होतं. ते आपण भरतोच ना? “शेठजी कळवळून म्हणाले
” पण काहो शेठजी, दिनू आपल्यासाठी जे काही करतो त्याचा काही ना काही मोबदला आपण देतोच ना!परवा त्याने माझ्या बाईकचं पंक्चर जोडून आणलं तेव्हा मी त्याला दहा रुपये खुशीने दिलेच होते. मग वेगळा वाढदिवस साजरा करायची गरज काय? ” महाजन मध्येच उठून म्हणाले.
” हो बरोबर आहे ” पवारांनी त्यांची री ओढली “आम्हीसुद्धा त्याने गहू वगैरे दळून आणले की खुशीने पाचदहा रुपये देतोच. आणि शेठजी या लोकांचे असे वाढदिवस साजरे करुन त्यांना मातवू नका. आज तुम्ही दिनूचा वाढदिवस साजरा करताय उद्या त्याच्या बहिणीचा करावा लागेल. मग दुसरे सिक्युरिटी गार्ड म्हणतील आमच्याही मुलांचे करा. मग प्रत्येक वेळी आम्ही असेच दोन दोन हजार द्यायचे का? “
शेठजींना शंका आली की पवार दारु पिऊनच आले असावेत कारण आताही त्यांचे डोळेही तारवटलेले होते. पवार सरकारी अधिकारी होते. दाबून वरकमाई करत होते आणि खर्चही तसाच करायचे. प्यायला बसले की पाचपाच हजाराची दारु ते पिऊन जातात असं शेठजींच्या कानावर आलं होतं. आणि आता एका चांगल्या कामासाठी दोन हजार द्यायला खळखळ करत होते
☆ फ्रेंडशिप डे – – लेख क्र. ३ ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆
त्या दिवशी फ्रेंडशिप डे असल्यामुळे भरपूर मित्रांबरोबर शुभेच्छांची देवाण-घेवाण झाली. काही मित्र-मैत्रिणींबरोबर गप्पा पण झाल्या.
… तुमचे पण मेसेजेस आणि गप्पा नक्कीच झाले असतील.
काल सकाळी नात तन्वी हिचा फोन आला : “ हॅपी फ्रेंडशिप डे. ”
मी पण तिला हॅपी फ्रेंडशिप डे म्हणालो.
मी : अगं आज फ्रेंडशिप डे आहे, ग्रँड फादर डे नाही.
तन्वी : आबा माहिती आहे. ग्रँड फादर च्या आधी यु आर माय बेस्ट फ्रेंड. तुम्ही माझ्याशी नेहमी मस्त गप्पा मारता. समजावून सांगता. म्हणून यु आर माय फ्रेंड.
… या संवादावर मी सहज विचार केला आणि लक्षात आलं की आजोबा आणि नात या नात्याला मित्र मित्र ही पण जोड दिली तर जास्तच मजा येईल.
आपण घराच्या बाहेर पडल्यानंतर आपल्या मागे अनेक विशेषणे लावून, स्टेटस लावून वावरत असतो. माझा धर्म, माझी जात, पोटजात वगैरे वगैरे ओळख लावून आपण आपसांमध्ये दुरावा निर्माण करत असतो. घराबाहेर खरंतर फक्त स्वतःचे नाव आणि सगळ्यांचा मित्र एवढीच आपली ओळख असावी.
घरामध्ये असताना नवरा, बायको, आई, वडील वगैरे विशेषणे आपल्या मागे असतात, त्यामुळे आपला अधिकार जागृत होतो. असं करू नका, तसं करू नका, असे आपले उपदेश सुरू होतात.
वयस्कर आई-वडिलांना मुलं असं करू नका, तसं करू नका, असे बजावत असतात. वयस्कर वडील मुलांना/ नातवंडांना सारखे सल्ले देत असतात. नवरा बायको यांच्यामध्ये पण हीच भाषा असते. पुढे त्याचे रूपांतर वादावादी आणि घरामध्ये ताण तणाव यामध्ये होते. घरातले संवाद, हसणं खिदळणं हे सगळचं लोप पावतं. आणि सगळे फेसबूक आणि व्हाट्सअप ला आपला कृत्रिम मित्र करतात. आणि यांचा अतिरेक तब्येती करता कसा त्रासदायक ठरतो हे आपण बघतोच
… म्हणून नातं या विशेषणातून बाहेर काढणारा सोपा मार्ग म्हणजे, आपल्या नात्याच्या बरोबर मित्र हा शब्द सोडायचा….. नवरा मित्र, बायको मित्र, सासु मित्र वगैरे.
… घरची जबाबदारी पार पडताना मी बायको करता नवरा असणार आणि इतर वेळा मित्र असणार.
… घरामध्ये वयस्कर वडील आहेत त्यांची जबाबदारी पार पाडताना मी त्यांचा मुलगा असणार, इतर वेळेला त्यांचा मित्र असणार.
आपण सगळ्यांनीच जर हा विचार अमलात आणला, तर “आनंदी आनंद गडे जिकडे तिकडे चोहीकडे” असेच छान वातावरण घरात आणि बाहेर नेहमीच राहणार हे नक्की.
☆ पर्यावरणाचे सदिच्छादूत :दिलीप आणि डॉ. सौ. पौर्णिमा कुलकर्णी– भाग – २ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
(आपण शहरात राहूनही पर्यावरणस्नेही जीवन जगण्याचा प्रयत्न करू शकतो. आपल्या गरजा आणि उपभोगवादी प्रवृत्ती आपल्याला कमी आली पाहिजे. प्लास्टिक, कागद इ सारख्या वस्तूंचा अनावश्यक वापर टाळला पाहिजे. पाणी जपून वापरले पाहिजे.) इथून पुढे – –
ते आपल्याला चार R सांगतात. पहिला R म्हणजे ज्या गोष्टी पर्यावरणाच्या दृष्टीने घातक आहेत, ज्यांचे लवकर विघटन होत नाही, अशा वस्तुंना refuse करा म्हणजेच नाही म्हणा. जर ते शक्य नसेल तर दुसरा R म्हणजे reduce म्हणजे त्या वस्तूचा कमीतकमी वापर करा. तिसरा R म्हणजे reuse. त्या वस्तूंचा पुनर्वापर करा. आणि चौथा R म्हणजे recycle. म्हणजे त्या वस्तूंचा वापर पुनर्निर्माणासाठी करा. उदा. कागदाची रद्दी रद्दीवाल्याकडेच द्या जेणेकरून त्यापासून नवीन कागद निर्मिती होईल. अधिक वृक्षतोड करावी लागणार नाही.
दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई ज्याला आपण लाल डबा म्हणून हिणवतो त्या लाल बसनेच प्रवास करतात. जवळ जायचं असेल तर शक्यतो पायीच जातात. त्यापेक्षा जास्त अंतर असेल तर सायकल वापरतात. लांबच्या अंतरासाठी लाल बसचा वापर करतात. ए सी तर नाहीच नाही. बसच्या प्रवासात काढलेलं तिकीट सुद्धा ते जपून ठेवतात. त्याच्या पाठकोऱ्या भागाचा त्यांना काहीतरी लिहिण्यासाठी उपयोग होतो. ते तिकीट नंतरही ते फेकून देत नाहीत. रद्दीच्या कागदाची एक पिशवी त्यांनी केली आहे. त्यात ते ठेवतात. पुरेशी रद्दी साठल्यावर रद्दीवाल्याला देऊन टाकतात. त्यांना अमेय आणि सृजन अशी दोन मुले आहेत. अमेय पुण्यात बी एस्सी करतो. सृजन दापोलीच्या शाळेत शिकतो. दोघंही सायकल वापरतात किंवा आपल्या आईवडिलांप्रमाणे बसचा वापर करतात. आपल्या आईवडिलांची साधी जीवनशैली त्यांनीही अंगिकारली आहे. ही दोन्ही मुले इतर सर्वसामान्य मुलांसोबत सरकारी मराठी माध्यमाच्या शाळेतच शिकली. समाजाच्या सर्व स्तरातील मुलांसोबत त्यांना मुक्तपणे शिकू दिले, खेळू दिले. समाजाच्या, निसर्गाच्या सान्निध्यात ती वाढतील याची काळजी घेतली.
जीवन जगण्यासाठी तुम्हाला किती पैसे लागतात असे विचारल्यावर दिलीपदादा हसत हसत म्हणतात. आम्हाला महिना पाच हजार रुपये खूप होतात. त्यातूनही पैसे उरतात. शिवाय आता पुस्तकांची रॉयल्टी, व्याख्यानांचे मानधन वगैरे धरून दहा बारा हजार रुपये मिळतात. एवढ्या पैशांचं काय करायचं हा प्रश्नच पडतो. ते म्हणतात, ‘ अर्थार्जन करायचं ते केवळ उदरनिर्वाहासाठीच! अनावश्यक वस्तूंचा संग्रह करायचा नाही. तुम्ही आम्ही तर चपला, बूट, कपडे, फर्निचर इ. वस्तूंचा किती अनावश्यक साठा करतो. निसर्गाच्या सान्निध्यात जीवन जगायचं. बागकाम करायचं. त्यानं आनंद मिळतो. माणूस हा दिनचर प्राणी आहे. निशाचर नाही. त्यामुळे दिवसा काम करावं. रात्री जागत बसून विजेचा अपव्यय करू नये. दिवसाचा प्रकाश डोळ्यांसाठी चांगला असतो. रात्री काम करण्याने संगणक, मोबाईल वापराने डोळ्यांवर ताण पडतो. दिवसा उपलब्ध असलेल्या सूर्यप्रकाशाचा भरपूर वापर करून घ्यावा. कपडे वाळवण्यासाठी वॉशिंग मशीन न वापरता सूर्यप्रकाशात ते वाळवावेत. भांडी घासण्यासाठी राखेचा वापर करावा म्हणजे तेच सांडपाणी बागेला वापरता येते. शहरातील लोक पाण्याची अक्षरशः नासाडी करतात. कपडे, भांडी धुण्यासाठी नळ सुरूच ठेवतात. गाडी धुण्यासाठी मुबलक पाणी वापरतात.
त्याऐवजी बादलीत पाणी घेऊन गाडी ओल्या फडक्याने पुसली तर कमी पाण्यातही स्वच्छ करता येते. अंघोळीसाठी साबण वापरण्याची आवश्यकता नाही. साबण वापरला नाही तर अर्धी बादली पाण्यातसुद्धा छान अंघोळ होते. शिवाय ते पाणी झाडांना वापरता येते. दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई स्वयंपाकासाठी गॅसचा वापर करत नाहीत. ते वाळलेल्या काटक्या किंवा तुटलेल्या फांद्यांचा वापर करून चुलीवर स्वयंपाक करतात. त्याशिवाय सोलर कुकर स्वयंपाकासाठी वापरतात. त्यांच्या घरात टीव्ही नाही, मिक्सर नाही. बातम्या कळण्यासाठी आणि करमणुकीसाठी एक रेडिओ फक्त आहे. ताक रवीने घुसळतात. काही वाटायचे असले तर पाट्या वरवंट्यावर वाटतात. असे करण्यासाठी कष्ट जरूर पडतात, वेळ लागतो पण त्यातून त्यांना एक वेगळा आनंद मिळतो. शिवाय शारीरिक व्यायाम होतो. महिन्याकाठी जेमतेम एक ते दोन युनिट ते वीज वापरतात. त्याचे सत्तर पंचाहत्तर रुपये बिल येते तेवढेच. पण ते गमतीनं म्हणतात, ‘ आम्ही टाटा अंबानींपेक्षा महागडी वीज वापरतो. एका युनिटला सत्तर रुपये! ‘
जीवन जगण्याची काही सूत्रे त्यांनी ठरवली आहेत. त्याप्रमाणे आधी ते वागतात आणि मगच लोकांना सांगतात.
सूर्योदवपूर्वी उठावेच. अनेशापोटी काही व्यायाम वा योगासने करावी. ट्रेडमिलवर व्यायाम करणे त्यांना मंजूर नाही कारण त्यासाठी विनाकारण विजेची नासाडी होती. त्यापेक्षा फिरायला जाणे हा सर्वोत्तम व्यायाम आहे. त्यामुळे निसर्गाचे सान्निध्यही लाभते. दिवसातून एखादा तास तरी थोडा घाम येईपर्यंत काही शारीरिक कष्टाचे काम करावे. त्यामुळे आरोग्य चांगले राहते. झाडं, माती, पालापाचोळा म्हणजे घाण नाही. जे बायो डिग्रेडेबल आहे त्यामुळे रोग होत नाहीत. माती, पालापाचोळा यांना रोज एकदा तरी हात लागलाच पाहिजे. घरात नैसर्गिक खेळती हवा आणि पुरेसा उजेड असावा. पंख्याची गरज भासू नये आणि गरज लागलीच तर अगदी कमीतकमी वापर करावा. ए सी चा वापर तर नकोच. माठातील पाणी प्यावे. फ्रीजचा वापर टाळावा. ताजे अन्न, फळे, भाजीपाला खावा. शक्यतो घरीच जेवावे. बाहेरचे खाऊ नये. प्रवासात जाताना सुद्धा दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई स्टीलचे ग्लास सोबत नेतात. त्यातच ते चहावाल्याकडून चहा घेतात. चहासाठी कागदी वा प्लास्टिकचे मग वापरून पर्यावरणाची हानी करणे त्यांना मान्य नाही. दुपारी सूर्य डोक्यावर आला की जेवावं आणि संध्याकाळी अंधार पडण्याआधी जेवून घ्यावं. रात्र ही विश्रांतीसाठी आहे. दिसामाजी काहीतरी ते लिहावे या समर्थांच्या उक्तीचं ते पालन करतात. ते म्हणतात गरज आणि हाव यात आपल्याला फरक करता आला पाहिजे. निसर्ग आपल्या गरजा भागवू शकतो पण आपली हाव मात्र तो पुरी करू शकत नाही. आपल्या उत्पादन वाढीच्या आणि हावेच्या लालसेमुळे निसर्गाला आपण ओरबाडतो आहोत. पुढच्या पिढ्यांसाठी आपण काही ठेवणार आहोत की नाही?
त्यांचं एकंदरीत वागणं आपल्यासारख्या शहरी जीवनमान अंगवळणी पडलेल्या लोकांना विचित्र वाटेल. उपभोगासाठी विविध वस्तूंचा संचय करणाऱ्या आणि त्यासाठी भरमसाठ पैसा खर्च करणाऱ्या आपल्यासारख्यांना त्यांची जीवनशैली पचनी पडणार नाही. पण हे लक्षात घ्यायलाच हवे की हे दोघे उच्चशिक्षित आहेत. केवळ मी पर्यावरणस्नेही वागून असा कितीसा फरक पडणार आहे असा विचार त्यांनी केला नाही. त्यांनी सुरुवात स्वतःपासून केली. गांधीजींचे फोटो लावून व्यासपीठावर त्यांच्यावर बोलणाऱ्या आपल्यासारख्या लोकांपेक्षा गांधीजींच्या तत्वांचे खरे अनुकरण या दोघांनी केले आहे असे म्हटले तर वावगे होणार नाही. या दोघांची आध्यात्माची बैठकही पक्की आहे. विचारांची बैठक पक्की आहे. एकदा ठरवले की ते निर्धाराने करतात. गेली पंचवीस वर्षे ते ही जीवनशैली जगत आहेत. अनेक मंडळी आवर्जून त्यांचं घर, त्यांची जीवनशैली पाहायला जातात. अशा व्यक्तींचंही ते स्वागत करतात. त्यांचे ‘ स्वप्नामधील गावा ‘ हे पुस्तक त्यांना असे जीवन जगताना आलेले अनुभव आपल्याला सांगते. ‘ *थेंबांनी जर भरते घागर, का उधळावा उगाच सागर*? ‘ हे त्यांचे तत्वज्ञान आपणही एकदा जरूर विचार करावा असे आहे.