हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१७ ☆ गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१७ ☆

गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं,आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है,हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं,उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।

मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है,परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंसकर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा-शक्ति,आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।

इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं;  उसकी सोच सकारात्मक है तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम,स्नेह,सौहार्द,करुणा, सहनशीलता,सहानुभूति,त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय,उपास्य,प्रमण्य  व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी,प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच,भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और उसके बदले में मानव को कोई भी मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा, ‘कोयला होय न ऊजरा,सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए। यह कथन कोटिश: सत्य है कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है,क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं–जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए  सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।

शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है,क्योंकि मानव की कथनी- करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध–भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकते और दुष्कर्म कर डालते हैं,क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है,परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।

आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना सर्वथा असंभव है।

मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबा डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान् नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है,देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी,जल,वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८९ – गीत – नवनिर्माण… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतनवनिर्माण

? रचना संसार # ८९ – गीत – नवनिर्माण…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बीती बातें भूले हम सब,

आओ नवनिर्माण करें।

नवल रचें इतिहास पुनः अब ,

जन-जन का कल्याण करें।।

*

रहे मीत सच्चाई के हम ,

झूठों से मुख मोड़ चलें।

निश्छलता हो प्रेम सुधा रस ,

भेद-भाव को छोड़ चलें।।

सबक सिखा कर जयचंदो को,

हर दुख का परित्राण करें।

*

बने तिरंगे के हम रक्षक,

शत्रु  भाव का अंत रहे।

शीश झुका दे हर रिपु का हम,

हर ऋतु देख वसंत रहे।।

देश भक्ति की रहे भावना,

न्योछावर हम प्राण करें।

*

नैतिकता की राह चलें हम,

भौतिकता का त्याग रहे।

मानवता की कर लें सेवा,

दुखियों से अनुराग रहे।।

अंतस बीज प्रेम के बोएँ,

पाठन वेद -पुराण करें।

*

राम -राज्य धरती पर लाएँ,

अपनों का विश्वास बनें।

तोड़ बेड़ियाँ अब सारी हम,

भारत माँ की आस बनें ।।

रूढिवाद को दूर भगाकर,

हम कुरीति  निर्वाण करें।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विस्मृति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विस्मृति ? ?

उसके अक्षम्य अपराधों की

सूची बनाता हूँ मैं

फिर एक-एक कर

क्षमा करता जाता हूँ मैं,

वह भी शायद

ऐसा ही कुछ करती है

विस्मृति की कोख में

स्मृति पलती है।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम,

कण-कण में बसने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

सूरज चाँद सितारे तेरी महिमा गाएँ,

नदियाँ पर्वत वन उपवन तेरा यश लहराएँ।

जीवन की हर श्वास कहे तेरा ही नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

माटी से मानव गढ़ डाला, उसमें प्राण भरे,

दुख-सुख, हँसी-आँसू सब तेरे ही रंग धरे।

अहंकार हर ले प्रभु, दे दे सच्चा ज्ञान,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

जब भटके मन अँधियारे में, दीपक बन जल जाए,

टूटे विश्वास की डोर को तू ही जोड़ लाए।

तेरे चरणों में ही मिले जीवन को विराम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

ना मैं कुछ हूँ, ना मेरा कुछ, सब कुछ तेरा दान,

तेरी कृपा से ही चलता ये सारा जहान।

निश्छल भाव अर्पण करता, लेकर तेरा नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१७ ☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – मन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

तुम आए हो यहाँ  पर तो बड़ा मौसम सुहाना है।

मुझे तो आज लगता है पुरवाई तो बहाना है।

तेरी बातों को मैं तो तेरे नयनों से पढ़ती हूँ।

मुझे तो लगता है अब तो तुझे बस बातें घुमाना हैं।

 *

तेरी बातों से समझा है तेरा आना बहाना है।

मुझे तुम प्यार से देखो यही तेरा बहलाना है।

तू आया है मनाने मुझको चाहत में मेरी तो

नहीं समझी तेरी बातें ये तो मन को लुभाना है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९९ ☆ कविता – बाबाओं से बचकर रहिए… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता –  बाबाओं से बचकर रहिए आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९९ ☆

बाबाओं से बचकर रहिए☆ श्री संतोष नेमा ☆

बाबाओं   से    बचकर    रहिए |

मन  की  बात न  सबसे  कहिए ||

ओढ़  धर्म  का   चोला   निकलें |

इनकी   नीयत  खुद  ही  पढ़िए ||

*

बन    जाते    हैं    ये    अवतारी |

रहे    ढोंगपन     इनका     भारी ||

करें   कभी    मत   अंधी   श्रद्धा  |

बहुधा   तन   के   हुए   शिकारी ||

बहिन   बेटियों    सावधान    हो |

स्वयं   ज्ञान   से   निर्णय  करिए ||

बाबाओं    से    बचकर    रहिए |

*

रोज    मीडिया    हमें    दिखाता |

नाम    नवीन    रोज     बतलाता ||

पाखंडों   की    कमी   नहीं    है |

इनका  नहीं   धर्म     से    नाता ||

आज      चेतना     हुई     जरूरी |

बहुरुपियों   से  खुद   ही  बचिए ||

बाबाओं    से     बचकर    रहिए |

*

वाणी    में    है    ज्ञान   धर्म   का |

मन   रखते   पर   बुरे   कर्म   का ||

इनके     अन्तस    को    पहचानो |

हो   न   सामना  कभी   शर्म  का ||

खूब   चढ़ा   कर   इन्हें    चढ़ावा |

नहीं   मुफ्त    में   झोली   भरिए ||

बाबाओं    से     बचकर     रहिए |

*

ईश्वर    पर    हम   रखें    आस्था |

एक    लक्ष्य    बस   एक   रास्ता ||

हर मुश्किल  का  हल  करता  वह |

रखें    न    कोई    अन्य    वास्ता ||

डग – डग   पर  मिलता  है  धोखा |

अब  “संतोष”   धर्म  पथ   गहिए |

बाबाओं    से     बचकर     रहिए ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ फॅमिली डे ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  फॅमिली डे।)

 

? आलेख – फॅमिली डे ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

वर्तमान समय में समाज जिस गति से आगे बढ़ रहा है, बदल रहा है, सभी जब भी आपस में मिलते हैं एक ही बात करते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता थाl अब आपको नहीं लगता बहुत कुछ बहुत जल्दी बदल गया है? आखिर क्या बदला? पानी का रंग, फूलों की सुगंध, पक्षियों की आवाज, भवरों का गुनगुन या पत्तों का रंग? चलिए इन सब को छोड़ते हैंl कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा देखने का नजरिया ही बदल गया हो? कहते हैं ना जैसी जाकि दृष्टि वैसी दिखे सृष्टिl जैसी नजर वैसा दिखे नजाराl हम इंसान एक दूसरे में बुराइयाँ ही खोज रहे हैंl यही हमारी दृष्टि का दोष हैl

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि खिड़की की सलाखों से बाहर झाँक कर देखा तो नीचे कीचड़ और ऊपर चाँद पायाl

ये हमारा नजरिया ही तो है कि हम क्या ढूंढ़ रहे हैं हमें ज्ञात ही नहींl हम यहीं बातें अपने ड्राइंग रूम से लेकर ऑफिस के गलियारे तक, प्लेटफॉर्म से लेकर शादी के शामियाने तक सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही ढूंढ़ रहे हैं, बुराइयाँ ही देख रहे हैं और उन्हें ही बढ़ाचढ़ा कर एक दूसरे को बयां करते आ रहे हैंl हम समाज का एक ऐसा आइना बच्चों के सामने पेश कर रहे हैं जो उनकी परवरिश के दौरान सही नहींl इस तरह हम हमारे स्वयं के परिवार में भी पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट नहीं कर पा रहे हैंl जब भी हम अपने परिवार के साथ बैठते हैं तो आस पडोस की, सगे संबंधियों की बुराइयाँ ही तो करते रहते हैंl

परिवार में बच्चों के साथ अच्छी बातें, अच्छी आदतें एवं अच्छे अनुभवों को साझा करेंl और एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट करेंl

कुछ दिनों पहले हम फॅमिली डे मना रहे थेl सारा व्हाट्सप्प का इनबॉक्स भर गया थाl और बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया गयाl

मैं सोच रही थी कि हम आज के दिन भी अपने परिवार में महज एक दिखावे की जिंदगी जी रहे हैंl हम कुछ बेशकीमती उपहारों के जरिये रिश्ते खरीद रहे हैंl क्या हम इतना भूल गये कि रिश्ते बिकाऊ नहीं होते?

इस खरीद फरोख्त कि दुनिया से बाहर आएंl अपने बच्चों को जीवन के अर्थ की सही पहचान कराएंl हमने तो नर्सरी के बच्चे को भी इस वैश्विक दौड़ का हिस्सा बना दियाl बच्चों की विशेषताओं एवं खूबियों को किनारे कर दियाl उनकी भावनाओं को कुचल कर रख दिया और बड़ी ही सहजता से ख दिया कि हमने यह तो नहीं कहा थाl

हम क्यों ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के लालच में अपने बच्चों से उनका बचपना और साथ में उनकी मासूमियत जाने अंजाने में छीन रहे हैं ? अंत में मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि – प्यार, विश्वास और उम्मीद की जिंदगी अपने बच्चों को दीजिएl साथ ही उन्हें पहचानिए और महसूस कीजिएl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १९ – कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता युद्ध अहंकार का…।)

☆ शशि साहित्य # १९ ☆

? कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

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बादलों के नरम आगोश में पलकें मूंदे,

चांद मुस्कुरा रहा था,

तेज रोशनी निगल गई,

उसकी इस खुशगवारी को,

हड़बड़ा कर आंखें खोले,

देख रहा जलती धरती को

धरती कांप रही है डर से,

कैसे रक्षित करे,

लाखों जिंदगानी को,

खून के आंसू बहा रही है,

धधकता, देख अपने आंचल को,

कोई तो, कैसे तो, खत्म करे,

भीषण युद्ध की विभीषिका को,

चांद भी रोने लगा, चित्कारता देख पृथ्वी को..

विचलित हो गया, भविष्य अपना देख कर..

धिक्कार रहा है मानवता को,

कैसे रोके मनुष्य की इस आवाजाही को..

हश्र उसका भी निश्चित है,

खा जाएगा, खत्म कर देगा मानव अहंकार,

उसकी शीतल सुंदरता को..

सब दुआ करो….

इंसानियत खत्म करे, इस कलंकित कृत्य को..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६८ ⇒ मच्छर, छिपकली और मनुष्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मच्छर, छिपकली और मनुष्य।)

?अभी अभी # ९६८ ⇒ आलेख – मच्छर, छिपकली और मनुष्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवः जीवस्य भोजनम् ! मनुष्य को मच्छर खाता है, तो मच्छर को छिपकली। अपनी आबादी को बचाने के लिए और सुरक्षित रखने के लिए, मच्छरों और छिपकली पर नियंत्रण जरूरी है इसलिए मनुष्य युद्ध स्तर पर घरों में पेस्ट कंट्रोल करवाता है और मच्छरों, कॉकरोच और छिपकलियों से एकमुश्त छुटकारा पाता है।

एक मच्छर मनुष्य को पूरा नहीं खा सकता। कहां मच्छर और कहां मनुष्य ! लेकिन जिस तरह पुष्टि के लिए मनुष्य रोज रात को एक ग्लास दूध का सेवन करता है, एक अंडे के लिए जिस प्रकार मुर्गी को नहीं मारा जाता, कुछ बूंद खून की ही मच्छरों की पुष्टि वर्धनम् के लिए पर्याप्त होती हैं।

मच्छर भी समझदार है, वह सोने की मुर्गी को हलाल नहीं करता। रोज रात को उसे दुहा करता है, यानी उसका आसान किस्तों में लहू पिया करता है।।

रात को मेरा कमरा, धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र हो जाता है। जिस प्रकार सात तालों में भी मौत प्रवेश कर जाती है और यमदूत जिसके प्राण लेना होते हैं, लेकर निकल ही जाते हैं, एक मच्छर सभी सुरक्षा प्रयासों के बावजूद और cctv कैमरे की नजरों के सामने रात्रि-दहाड़े कमरे में प्रवेश कर ही जाता है। एक मच्छर के लिए वैसे क्या दिन और क्या रात। क्या अंधेरा और क्या उजाला। उसने तो गंदगी और अंधेरे में ही अपने परिवार को पैदा किया, और पाला।

मच्छर प्रकाश में नृत्य करते हैं, मनुष्य का इंतजार करते हैं। मनुष्य के पास कई सुरक्षा कवच हैं मच्छरों के हमले से बचने के लिए। मच्छरदानी, ओडोमॉस, ऑल आउट और हिट। फिर भी मच्छर रणछोड़ नहीं। डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया इसके प्रमाण हैं।।

रात के बारह बजे हैं। कुछ मच्छर प्रकाशोत्सव में नृत्य का आनंद ले रहे हैं। कमरे में एक शिवजी की बड़ी तस्वीर लगी है जिनके भाल में चंद्र और जटाओं में गंगा को अभय मिला हुआ है।

सर्प भी सुरक्षित है नागेश्वर के गले में। बस इसी त्रिपुरारी की तस्वीर की आड़ में एक छिपकली ने भी शरण ले रखी है। जब भी कोई मच्छर उसके दायरे में आ जाता है, उसका भोजन बन जाता है।

मछली की आंख की तरह छिपकली और मच्छर के बीच कोई नहीं आ सकता। पूरे कमरे में वह बेखौफ मच्छरों का शिकार करा करती है। मच्छर मेरा शत्रु भी है। इस प्रकार वह मेरी भी शुभचिंतक ही हुई। मेरी कोप दृष्टि से बचने के लिए वह शिवजी की शरण में चली जाती है। छिपकली वहां छिपकर उतनी ही सुरक्षित है जितनी फूलों के बीच एक कली।।

स्वास्थ्य और सुरक्षा मनुष्य की पहली आवश्यकता है। बढ़ती जनसंख्या भी एक चेतावनी है। जनसंख्या नियंत्रण भी मनुष्य के लिए उतना ही जरूरी है। लेकिन उसके भी पहले बीमारियों की रोकथाम के मच्छर, छिपकली और कॉकरोच का इलाज भी जरूरी है। कंट्रोल कंट्रोल ! बर्थ कंट्रोल के पहले पेस्ट कंट्रोल..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८९ – सुखी संसाराची छाया…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८९ – विजय साहित्य ?

☆ सुखी संसाराची छाया…!

(काव्यप्रकार : अष्टाक्षरी)

परंपरा संस्कृतीत,

नारीशक्ती आहे वसा.

कर्तृत्वाची पराकाष्ठा,

संयमाचा दैवी ठसा…! १

*

गाते भुपाळी अंगाई,

नारी दळते दळण.

घर स्वच्छता पहाटे,

जमा करी सरपण…!२

*

लागे जीवनाचा कस,

होई सासुरासी जाच.

कसे जगावे जीवन,

सांगे आठवांना वाच…!३

*

पिढ्या पिढ्या राबतसे,

घर संसारात नारी.

पती मानुनी ईश्वर,

घेई कर्तृत्व भरारी…!४

*

कष्ट,त्याग, समर्पण

नाते संबंधांचा सेतू.

नारीशक्ती कर्मफल,

घरे जोडण्याचा हेतू…!५

*

माती आणि आभाळाशी,

नारी राखते इमान.

संगोपन छत्रछाया,

नारीशक्ती अभिमान…!६

*

नारी कालची आजची,

जपे स्वाभिमानी कणा.

कष्ट साध्य जीवनाची,

नारी चैतन्य चेतना…! ७

*

बदलले जरी रूप,

नाही  बदलली नारी.

अधिकार कर्तव्याची,

करे विश्वासाने वारी…!८

*

नारी आजची साक्षर,

करी कुटुंब‌ विचार.

सुख ,शांती, समाधान,

करी ऐश्वर्य साकार…!९

*

नर आणि नारी यांचा,

नारीशक्ती आहे बंध.

जाणिवांचा नेणिवांशी,

दरवळे भावगंध…!१०

*

देई कुटुंबास स्थैर्य,

नारीशक्ती प्रतिबिंब.

रवि तेज जागृतीचे,

जणू एक रविबिंब..! ११

*

नारी संसार सारथी,

नारी निजधामी पाया.

तिची कार्यशक्ती आहे,

सुखी संसाराची छाया…!१२

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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