आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – सप्तम अध्याय (26) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

सप्तम अध्याय

ज्ञान विज्ञान योग

( भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा )

 

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ।।27।।

 

राग द्वेष के जाल में फॅसा हुआ संसार

अर्जुन सुख दुख मोह से भ्रमित सतत बेकार।।27।।

      

भावार्थ :  हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं।।27।।

 

By the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Bharata, all beings are subject to delusion at birth, O Parantapa!

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 25 ☆ स्मित रेखा और संधि पत्र ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “स्मित रेखा और संधि पत्र ”.   जयशंकर प्रसाद जी की कालजयी रचना  ‘कामायनी ‘ की  चार पंक्तियों को सुप्रसिद्ध कवि कुमार  विश्वास जी के विडिओ पर सुनकर  डॉ मुक्त जी द्वारा इस सम्पूर्ण आलेख की रचना कर  दी गई ।  कामायनी की चार पंक्तियों पर नारी  की संवेदनाओं पर संवेदनशील रचना डॉ मुक्त जैसी संवेदनशील रचनाकार ही ऐसा आलेख रच सकती हैं।  मैं निःशब्द हूँ और इस ‘निःशब्द ‘ शब्द की पृष्ठभूमि को संवेदनशील और प्रबुद्ध पाठक निश्चय ही पढ़ सकते हैं. डॉ मुक्त जी की कलम को सदर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 25 ☆

☆ स्मित रेखा और संधि पत्र 

‘आंसू से भीगे अंचल पर

मन का सब कुछ रखना होगा

तुझको अपनी स्मित रेखा से

यह संधि पत्र लिखना होगा’

कामायनी की इन चार पंक्तियों में नारी जीवन की दशा-दिशा और उसके जीवन का यथार्थ परिलक्षित है। प्रसाद जी ने नारी के दु:खों की अनुभूति की तथा उसे,अपने दु:ख,पीड़ा व कष्टों को आंसुओं रूपी आंचल में समेट कर, मुस्कुराते हुए संधि-पत्र लिखने का संदेश दिया। यह संधि-पत्र एक-तरफ़ा समझौता है अर्थात् विषम परिस्थितियों का मुस्कराते हुए सामना करना… इस ओर संकेत करता है, क्योंकि उसे सहना है, कहना नहीं। यह सीख दी है, बरसों पहले प्रसाद जी ने, कामायनी की नायिका श्रद्धा को…कि उसे मन में उठ रहे ज्वार को आंसुओं के जल से प्रक्षालित करना होगा और अपनी पीड़ा को आंचल में समेट कर समझौता करना होगा।

आज कामायनी के चार पद, जिन्हें कुमार विश्वास ने वाणी दी है, उस वीडियो को देख-सुनकर हृदय विकल-उद्वेलित हो उठा। मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पायी और मेरी लेखनी, नारी जीवन की त्रासदी को शब्दों में उकेरने को विवश हो गई। एक प्रश्न मन में कुनमुनाता है कि जब से सृष्टि का निर्माण हुआ है, उसे मौन रहने का संदेश दिया गया है…दर्द को आंसुओं के भीगे आंचल में छुपा कर, मुस्कराते हुए जीने की प्रेरणा दी गई है…क्या यह उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है?शायद! यह कुठाराघात है उसकी संवेदनाओं पर… समझ नहीं पाता मन… आखिर हर कसूर के लिए वह ही क्यों प्रताड़ित होती है और अपराधिनी समझी जाती है…हर उस अपराध के लिए, जो उसने किया ही नहीं। प्रश्न उठता है, जब कोर्ट-कचहरी में हर मुजरिम को अपना पक्ष रखने का अवसर-अधिकार प्रदान किया जाता है, तो नारी इस अधिकार से वंचित क्यों?

चौंकिए नहीं! यह तो हमारे पूर्वजों की धरोहर है, जिसे आज तक प्रतिपक्ष ने संभाल कर रखा हुआ है और उसकी अनुपालना भी आज तक बखूबी की जा रही है। ‘क्या कहती हो ठहरो! नारी/संकल्प अश्रुजल से अपने/तुम दान कर चुकी पहले ही/ जीवन के सोने से सपने’ द्वारा नारी को आग़ाह किया गया है कि वह तो अपने स्वर्णिम सपनों को पहले ही दान कर चुकी है अर्थात् होम कर चुकी है। अब उसका अपना कुछ है ही नहीं,क्योंकि दान की गयी वस्तु पर प्रदाता का अधिकार उसी पल समाप्त हो जाता है। स्मरण रहे, उसने तो अपने आंसुओं रूपी जल को अंजलि में भर कर संकल्प लिया था और अपना सर्वस्व उसके हित समर्पित कर दिया था।

सो! नारी, तुम केवल श्रद्धा व विश्वास की प्रतिमूर्ति हो और तुम्हें जीवन को समतल रूप प्रदान करने हेतु  पीयूष-स्त्रोत अर्थात् अमृत धारा सम बहना  होगा। युद्ध देवों का हो या दानवों का, उसके अंतर्मन में सदैव संघर्ष बना रहता है…परिस्थितियां कभी भी उसके अनुकूल नहीं रहतीं और पराजित भी सदैव नारी ही होती है। युद्ध का परिणाम भी कभी नारी के पक्ष में नहीं रहता। इसलिए नारी को अपने अंतर्मन के भावों पर अंकुश रख, आंसुओं रूपी रूपी जल से उस धधकती ज्वाला को शांत करना होगा तथा उसे अपनी मुस्कान से जीवन में समझौता करना होगा। यही है नारी जीवन का कटु यथार्थ है…कि उसे नील- कंठ की भांति हंसते-हंसते विष का अआचमन करना ही होगा… यही है उसकी नियति। सतयुग से लेकर आज तक इस परंपरा को बखूबी सहेज-संजो- कर रखा गया है, इसमें तनिक भी बदलाव नहीं आ पाया। नारी कल भी पीड़ित थी, आज भी है और कल भी रहेगी। जन्म लेने के पश्चात् वह पिता व भाई के सुरक्षा-घेरे में रहती है और विवाहोपरांत पति व उसके परिवारजनों के अंकुश में, जहां असंख्य नेत्र सी•सी•टी•वी• कैमरे की भांति उसके इर्दगिर्द घूमते रहते हैं और उसकी हर गतिविधि उन में कैद होती रहती है।

दुर्भाग्यवश न तो पिता का घर उसका अपना होता है, न ही पति का घर… वह तो सदैव पराई समझी जाती है। इतना ही नहीं, कभी वह कम दहेज लाने के लिए प्रताड़ित की जाती है, तो कभी वंश चलाने के लिए, पुत्र न दे पाने के कारण उस पर बांझ होने का लांछन लगा कर, उसे घर से बाहर का रास्ता दिखला दिया जाता है।जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने पर, केवल चेहरा बदल जाता है, नियति नहीं। हां! पिता और पति का स्थान पुत्र संभाल लेता है और उसका भाग्य-विधाता बन बैठता है। उस स्थिति में उसे केवल पुत्र का नहीं, पुत्रवधु का भी मुख देखना पड़ता है, क्योंकि अब उसकी ज़िन्दगी की डोर दो-दो मालिकों के हाथ में आ जाती है।

आश्चर्य होता है, यह देख कर कि मृत्योपरांत उसे पति के घर का दो गज़ कफ़न भी नसीब नहीं होता, वह भी उसके मायके से आता है और भोज का प्रबंध भी उनके द्वारा ही किया जाता है। अजीब दास्तान है… उसकी ज़िन्दगी की, जिस घर से उसकी डोली उठती है, वहां लौटने का हक़ उससे उसी पल छिन जाता है, और जिस घर से अर्थी उठती है, उस घर के लिए वह सदा ही पराई समझी जाती थी। उसका तो घर होता ही कहां है…इसी उधेड़बुन व असमंजस में वह पूरी उम्र गुज़ार देती है। प्रश्न उठता है,आखिर संविधान द्वारा उसे समानता का दर्जा क्यों प्रदत नहीं? अधिकार तो पुरूष के भाग्य में लिखे गये हैं और स्त्री को मात्र कर्त्तव्यों  की फेहरिस्त थमा दी जाती है…आखिर क्यों? जब परमात्मा ने सबको समान बनाया है तो उससे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों? यह प्रश्न बार-बार अंतर्मन को कचोटते हैं… हां!यदि अधिकार मांगने से न मिलें,तो उन्हें छीन लेने में कोई बुराई नहीं।श्रीमद्भगवत् गीता में भी अन्याय करने वाले से अन्याय सहन करने वाले को अधिक दोषी ठहराया गया है।

शायद! नारी की सुप्त चेतना जाग्रत हुई होगी और उसने समानाधिकर की मांग करने का साहस जुटाया होगा। सो!कानून द्वारा उसे अधिकार प्राप्त भी हुए, परंतु वे सब कागज़ की फाइलों तले दब कर रह गये। नारी शिक्षित हो या अशिक्षित, उसकी धुरी सदैव घर- गृहस्थी के चारों ओर घूमती रहती है।दोनों की नियति एक समान होती है। उनकी तक़दीर में तनिक भी अंतर नहीं होता। वे सदैव प्रश्नों के घेरे में रहती हैं। पुरूष का व्यवहार औरत के प्रति सदैव कठोर ही रहा है, भले ही वह नौकरी द्वारा उसके बराबर वेतन क्यों न प्राप्त करती हो? परंतु परिवार के प्रति समस्त दायित्वों के वहन की अपेक्षा उससे ही की जाती है। यदि वह किसी कारणवश उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तो उस पर आक्षेप लगाकर, असंख्य ज़ुल्म ढाये जाते हैं। सो!उसे पति व परिजनों के आदेशों की अनुपालना सहर्ष करनी पड़ती है।

हां!वर्षों तक पति के अंकुश व उसके न खुश रहने के पश्चात् उसके हृदय का आक्रोश फूट निकलता है और वह प्रतिकार व प्रतिशोध की राह पर पर चल पड़ती है। उसने लड़कों की भांति जींस कल्चर को अपना कर, क्लबों में नाचना गाना, हेलो हाय करना, सिगरेट व मदिरापान करना, ससुराल-जनों को अकारण जेल के पीछे पहुंचाना, उसके शौक बन कर रह गए हैं। विवाह के बंधनों को नकार, वह लिव-इन की राह पर चल पड़ी है, जिसके भयंकर परिणाम उसे आजीवन झेलने पड़ते हैं।

‘तुमको अपनी स्मित-रेखा से/ यह संधि पत्र लिखना होगा।’ यह पंक्तियां समसामयिक व सामाजिक हैं, जो कल भी सार्थक थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। परंतु नारी को पूर्ण समर्पण करना होगा, प्रतिपक्ष की बातों को हंसते-हंसते स्वीकारना होगा…यही ज़िन्दगी की शर्त है। वैसे भी अक्सर महिलाएं,बच्चों की खुशी व परिवार की मान-मर्यादा के लिए अपने सुखों को तिलांजलि दे देती हैं… अपने मान-सम्मान व प्रतिष्ठा के लिए अपने सुखों को तिलांजलि दे देती हैं। अपनी अस्मिता व प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर, शतरंज का मोहरा बन जाती हैं। कई बार अपने परिवार की खुशियों व सलामती के लिए अपनी अस्मत का सौदा तक करने को विवश हो जाती हैं, ताकि उनके परिवार पर कोई आंच ना आ पाए। इतना ही नहीं, वे  बंधुआ मज़दूर तक बनना स्वीकार लेती हैं, परंतु उफ़् तक नहीं करतीं। आजकल अपहरण व दुष्कर्म के किस्से आम हो गए हैं…दोष चाहे किसी का हो, अपराधिनी तो वह ही कहलाती है।

‘ज्ञान दूर, कुछ क्रिया भिन्न है

इच्छा क्यों पूरी हो मन की

एक दूसरे से मिल ना सके

यह विडंबना है जीवन की।’

कामायनी की अंतिम पंक्तियां मन की इच्छा-पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म के समन्वय को दर्शाती हैं। इनका विपरीत दिशा की ओर अग्रसर होना, जीवन की विडम्बना है… दु:ख व अशांति का कारण है। सो! समन्वय व सामंजस्यता से समरसता आती है, जो अलौकिक आनंद-प्रदाता है।इसके लिए निजी स्वार्थों के त्याग करने की दरक़ार है, इसके द्वारा ही हम परहितार्थ हंसते-हंसते समझौता करने की स्थिति में होंगे और पारिवारिक व सामाजिक सौहार्द बना रहेगा।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – एक दिन ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  –  एक दिन

 

एक दिन मेरे पास चार-छह एकड़ में फैला बंगला होगा….एक दिन मेरे पास दुनिया की सबसे महंगी कार होगी….एक दिन मेरे पास अपना चार्टर्ड प्लेन होगा….एक दिन मेरे पास ये होगा….एक दिन मेरे पास वो होगा….।

आकांक्षा को कर्म का साथ नहीं मिला। दिन आते रहे, दिन जाते रहे। उस एक दिन की प्रतीक्षा में हर दिन यों ही बीतता रहा। एकाएक एक दिन, सचमुच वो एक दिन आ गया।

उस दिन वह मर गया।

आज का दिन कर्मठ हो।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 23 ☆ कविता ☆ सागर की गहराई ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  उनकी कविता सागर की गहराई । 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 23  साहित्य निकुंज ☆

☆ सागर की गहराई

 

कौन जान सका

है सागर की गहराई

कौन समझ सका

सागर के उतार चढ़ाव को।

कितना चाहा

सागर को कसना।

पर न हो सका संभव

उठती है जब तरंगे

मचलता है सागर

आता है उफान

बांहे फैलाता है सागर

समेटने के लिए

संभव नहीं लम्हों को रोकना

बेबस सी मै देखती हूं

इन लम्हों लम्हों को

उफनते सागर को

छलकते गागर को ।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

wz/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व ), नई दिल्ली –110056

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प बावीस # 22 ☆ साहित्य संवर्धनात मोबाईलचे योगदान ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज प्रस्तुत है श्री विजय जी की एक भावप्रवण कविता  “सागर सरीता मिलन – क्षण मिलनाचे ”।  आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प बावीस # 22 ☆

☆ साहित्य संवर्धनात मोबाईलचे योगदान ☆

 

सद्य परिस्थितीत माणूस माणसापासून मनाने दुरावत चालला आहे. त्याला  औपचारिक रित्या जोडून ठेवण्याचे महत्वाचे कार्य मोबाईल करतो आहे.  जे प्रत्यक्ष भेटीत बोलता येत नाही ते काम सामंजस्यानं ज्ञानवर्धक ससंदेशवहनातून मोबाईल सातत्याने करीत आहे. मदतीचा हात म्हणून  मोलाची भूमिका  मोबाईल पार पाडीतआहे .  दैनंदिन लेखन कला व्यासंग जोपासताना नोकरी,  व्यवसाय, सर्व  जबाबदाऱ्या पार पडतांना अनेक प्रकारे  विविध माध्यमातून हा मोबाइल गुरू, मित्र, प्रचारक,  प्रसारक  या भूमिकेतून मोबाईल व्यासंग वाढविण्यात  उपयोगी ठरतो.

नित्य लेखन करणारे  मोबाईल द्वारे  समाजात आपले साहित्य प्रसारित करीत आहेत.   मोबाईल, व्हाट्सएप, फेसबुक आणि सोशल मिडिया तंत्रज्ञानाचा वापर करून स्वतःला सिद्ध करीत आहे.

इतरांचे विविध विचार मत प्रवाह संग्रहीत करून त्यातून  कलाव्यासंग जोपासण्याची  आणि  आवश्यक ते  ज्ञान मिळवण्याची सेवा संधी मोबाईल मुळे मिळाली आहे.

साहित्यिक  ग्रुपची  महत्वपूर्ण  वैचारीक देवाण घेवाण  आणि लेखन प्रगती, कवितेचा प्रचार  आणि प्रसार करण्यात  मोबाईल ने उच्चांक गाठला आहे.  साहित्यिकांना आवश्यकता आहे.

सोशल नेटवर्किंग साईट वर सर्व साहित्यिकांच्या मुलाखती,  विविध  नवे जुने काव्य प्रकार  मोबाईल मधून वाचायला, लिहायला मिळतात.   त्यातून रसिक वाचक, साहित्यिक यांचे  अतूट स्नेहबंधन निर्माण होते.

अनेक स्पर्धा,  उपक्रम  यात सहभागी होण्याचे भाग्य केवळ मोबाईल मुळे मिळते.  कलावंतांचे कलागुण व अंगी असलेल्या साहित्य गुणांना,  त्यांच्या विचारांना नाव, गाव, वाव  आणि भाव देण्याचे महत्त्व पूर्ण कार्य मोबाईल करत आहे.

लेखन करायचे  म्हटले की अनेक गोष्टी जुळून याव्या लागतात. पण मोबाईल मुळे   फार काही विनासायास घडत आहे.  मोबाईल  अद्ययावत माहिती तंत्रज्ञानाचा आरसा आहे.  याच्यात डोकावणारे काळाचे भान विसरून जातात.  पण संयमाची कळ त्यांना हवे ते  मिळवण्याचा  अनुभव  आणि संधी  उपलब्ध करून देते. मोबाईल  खळाळणारी नदी. मोबाईल घनगर्द  अंबराई. मोबाईल  एक नयनमनोहर शब्द चित्र, रेखाचित्र,  भावदर्पण आणि बरेच काही. . . . !

समाज पारावरून मोबाईल हा विषय आता केवळ टिकेचे लक्ष्य नसून  साहित्य संवर्धन करणारे प्रभावी माध्यम ठरला आहे.

असा हा जिव्हाळ्याचा विषय  अतिरेक केला तर व्यसन  आणि प्रसंगी शापही ठरू शकतो. हा धोका टाळायचा कसा हे देखिल मोबाईल च शिकवतो.  कुणाशी काय, कधी, कसे किती बोलायचे  याचे अनुभव प्रचुर धडे मोबाईल  क्षणोक्षणी देत रहातो. माणूस सुजाण करण्यात मोबाईल यशस्वी झाला आहे.

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ लघु कथा – ☆ ताना बाना ☆ – श्री दिलीप भाटिया

श्री दिलीप भाटिया 

( श्री दिलीप भाटिया जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। 26 दिसंबर 1947 को जन्में भूतपूर्व परमाणु वैज्ञानिक  श्री दिलीप भाटिया जी ने अपना पूरा जीवन बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। एक अच्छे साहित्यकार के साथ ही वे बच्चों के लिए प्रेरक-मार्गदर्शक  भी हैं। वे स्वयं गायत्री नवचेतना केंद्र पर बाल संस्कारशाला का संचालन भी करते हैं। उनकी प्रेरक पुस्तकें ‘उपकार प्रकाशन, आगरा’ से प्रकाशित, कई उपन्यास, कथा संग्रह आदि प्रकाशित एवं 50 से अधिक आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित। तीन पुस्तकें प्रकाशित एवं शताधिक पुरस्कार प्राप्त जिनमें प्रमुख केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा से आत्माराम पुरस्कार 2004 तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी के कर कमलों से प्राप्त।आज प्रस्तुत हैं  आपकी एक लघुकथा  “ताना  बाना ”.)

☆ लघु कथा –  ताना बाना ☆

प्रिय  एकता,

उद्योग कुटीर पर प्रशिक्षण के पश्चात् बुनाई केंद्र पर आत्मनिर्भर बन कर अपनी नन्ही बिटिया शिल्पी का लालन पोषण करने का एक सकारात्मक प्रयास कर रही हूँ। ईश्वर के निर्णय से नन्ही बेटी के सिर पर अब उसके पापा की सशक्त छाया तो नहीं है, पर, फिर भी मेरा प्रयास रहेगा कि -उसे जीवन के तूफानों में भी अपनी सहनशीलता एवं विवेक का दीपक प्रज्वलित रखने की क्षमता पैदा कर सकूँ।

अभी केंद्र पर कार्य करते हुए स्वयं के जीवन के ताने-बाने स्वतः ही स्मरण हो गए। बुनाई मशीन पर उलझे धागे सुलझाना सरल है। पर, एकता, जीवन के उलझे हुए तानो-बानो को सुलझाना कठिन है।

मम्मी पापा के दिए हुए संस्कार अनुशासन, शिक्षा की शक्ति से ही जीवन के सबसे बड़े तूफान में भी हार नहीं मानी। तुम्हारे जीजाजी के असामयिक निधन के पश्चात भी हिम्मत बनाए रख रही हूँ। शिल्पी को मम्मी की ममता एवं वात्सल्य कुछ कम देकर उसके पापा की भूमिका का प्रतिशत बढ़ा कर अनुशासन नियम अधिक देकर उसे एक मजबूत इन्सान बनाने का प्रयास कर रही हूँ

जीवन का ताना बाना उलझे नहीं, बस, यही शेष जीवन का लक्ष्य है।

शेष फिर।

सस्नेह राशि।

 

©  दिलीप भाटिया

संपर्क-  238 बालाजी  नगर  रावतभाटा  323307 राजस्थान

मोबाइल –  9461591498.

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – यात्रा-संस्मरण ☆ नर्मदा परिक्रमा – द्वितीय चरण # पाँच ☆ – श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(ई- अभिव्यक्ति में हमने सुनिश्चित किया था कि – इस बार हम एक नया प्रयोग  कर रहे हैं।  श्री सुरेश पटवा जी  और उनके साथियों के द्वारा भेजे गए ब्लॉगपोस्ट आपसे साझा  करने का प्रयास करेंगे।  निश्चित ही आपको  नर्मदा यात्री मित्रों की कलम से अलग अलग दृष्टिकोण से की गई यात्रा  अनुभव को आत्मसात करने का अवसर मिलेगा। इस यात्रा के सन्दर्भ में हमने कुछ कड़ियाँ श्री सुरेश पटवा जी एवं श्री अरुण कुमार डनायक जी  की कलम से आप तक  पहुंचाई ।  हमें प्रसन्नता है कि यात्रा की समाप्ति पर श्री अरुण जी ने तत्परता से नर्मदा यात्रा  के द्वितीय चरण की यात्रा का वर्णन दस -ग्यारह  कड़ियों में उपलब्ध करना प्रारम्भ कर दिया है ।

श्री अरुण कुमार डनायक जी द्वारा इस यात्रा का विवरण अत्यंत रोचक एवं उनकी मौलिक शैली में हम आपको उपलब्ध करा रहे हैं। विशेष बात यह है कि यह यात्रा हमारे वरिष्ठ नागरिक मित्रों द्वारा उम्र के इस पड़ाव पर की गई है जिसकी युवा पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती। आपको भले ही यह यात्रा नेपथ्य में धार्मिक लग रही हो किन्तु प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक मित्र का विभिन्न दृष्टिकोण है। हमारे युवाओं को निश्चित रूप से ऐसी यात्रा से प्रेरणा लेनी चाहिए और फिर वे ट्रैकिंग भी तो करते हैं तो फिर ऐसी यात्राएं क्यों नहीं ?  आप भी विचार करें। इस श्रृंखला को पढ़ें और अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य दें। )

ई-अभिव्यक्ति की और से वरिष्ठ नागरिक मित्र यात्री दल को नर्मदा परिक्रमा के दूसरे चरण की सफल यात्रा पूर्ण करने के लिए शुभकामनाएं। 

☆हिंदी साहित्य – यात्रा-संस्मरण  ☆ नर्मदा परिक्रमा – द्वितीय चरण # पाँच ☆ – श्री अरुण कुमार डनायक ☆

09.11.2019 कल शाम को लगभग पांच सौ मीटर की चढ़ाई चढ़कर जब ब्रह्म कुंड पहुंचे तो खाने और सोने के अलावा कुछ न सूझा।

सुबह उठकर एक नजर दौड़ाई ।  सामने विशाल बरगद का वृक्ष आकर्षित कर रहा था तो कुटी के आसपास पालिथीन की थैलियां,  गिलास और थर्मोकोल की खाने की प्लेटों का अंबार लगा था। मैंने और मुंशीलाल पाटकर ने  सफाई अभियान शुरू किया तो आधे घंटे में ही आश्रम के आसपास से गंदगी साफ हो गई। निवृत हुए ही थे कि मनोज पाराशर दूध लेकर आ गये हम सबने  चाय पी और वहां से एक किलोमीटर चलकर सिद्ध घाट पहुंचे, रमणीय स्थल है और नर्मदा नदी काफी गहरी है व बहाव कुछ इस तरह का है कि आकृति गोलाकार होकर कुंड का आभास देती है।

यही स्थल ब्रह्म कुंड है जहां देवासुर संग्राम के पहले देवताओं ने तपस्या की थी। चारों ओर सघन वन हैं और उनसे मंद मंद बहती सुगन्धित वायु मन को शांति देती है। यहां प्राचीन शिव मंदिर और राम जानकी मंदिर है। मूर्तिया आकर्षक हैं। पुजारी के परिवार ने कल एकादशी का पूजन किया था और पूजा स्थल को बड़ी सुंदरता से सजाया था। आगे नदी के तीरे तीरे मार्ग कठिन था तो गांव से बाहर निकल नहर के किनारे किनारे आगे बढ़े। मार्ग संगम पर दाहिने हाथ की ओर मुड़ गये और बुध गांव से होते हुए घाट  पहुंचे।

बुध घाट के बारे में ख्याति है बुध ग्रह ने यहां तपस्या की थी। यहां एक आश्रम काफी ऊंचाई पर स्थित है और चढ़ाई कठिन। बाबा ने किसी भी प्रकार का सहयोग न किया। बाबा आश्रम में निर्माण कार्य की माया में लिप्त थे। हमने नहाने की इच्छा जताते हुए अनुमति मांगी तो अपने सेवक को बोलकर पंप बंद करा दिया। चाय बनाई पर केवल अग्रवालजी को दी। भोजन के लिए तो साफ मना कर दिया।

दुःखी हो हम आश्रम से नीचे उतरे और कोई तीन बजे नदी के किनारे चलते चलते सांकल घाट पहुंचे। सांकल गांव दक्षिणी तट पर है और उत्तरी तट पर शंकराचार्य की तपोस्थली की साक्षी एक गुफा है।  शायद यहीं पद्मासन में विराजमान शंकराचार्य ने नर्मदाष्टक की रचना की होगी।सांकल गांव भी काफी ऊंचाई पर है और कोई एक किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़कर, पीपल वृक्ष के नीचे स्थित शिव व शनि मंदिर के दर्शन करते हुए हम और पटवाजी साहू जी की धर्मशाला में विश्राम हेतु पहुंच गये। स्नानादि से निवृत्त हुए ही थे कि शेष साथी भी धर्मशाला पहुंच गये। हमने दोपहर को लौकी की सब्जी और रोटी  आम के अचार के साथ खाई। पहले तो साहू परिवार की महिलाओं ने पका पकाया भोजन देने से मना कर दिया। यहां तक कि अस्सी वर्षीय स्वसुर सिब्बू साहू के आदेश को भी न माना पर जब हमें अनाड़ीपन के साथ सब्जी काटते देखा तो वे भोजन पकाने तैयार हो गई। भोजन बनने में देरी थी तो मैं गांव का चक्कर लगाने निकल पड़ा।

स्कूल वगैरह बंद थे पता चला कि अयोध्या के मामले फैसला आ गया है। हम चिंता ग्रस्त हो गये। घर पर फोन से संपर्क किया और राजी खुशी के समाचार प्राप्त किये।

यहीं बरगद के पेड़ के नीचे मेरी मुलाकात राजाराम पटैल से हो गई। मैंने उन्हें नर्मदा यात्रा के दौरान हम लोगों के सामाजिक सरोकारों के विषय में बताया और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तथा सरपंच से मुलाकात की इच्छा जताई। सरपंच से तो मुलाकात न हो सकी पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सावित्री मेहरा से मुलाकात हो गई। मैंने उन्हें श्री ए डी खत्री द्वारा रचित बाल कविताओं की पुस्तक ‘अनय हमारा’ भेंट की और अनुरोध किया कि छोटे छोटे बच्चों को इससे कविताएं सुनाकर पढायें। सावित्री ने एक दो कविताएं बच्चों को सुनाई जिसे सुनकर बच्चे प्रसन्न हो गए। मैंने श्री खत्री से तुरंत फोन पर बात की व उनसे कुछ कहने का आग्रह किया। श्री खत्री ने मुझ अपरिचित का यह अनुरोध तत्काल स्वीकार कर लिया।

रात्रि में हमने दूध पिया कुछ नवयुवकों के साथ पढ़ाई लिखाई के अपने व उनके अनुभव साझा किये और साहू परिवार को पटवाजी ने रामचरित मानस की कथा सुनाई। सिब्बू साहूजी की धर्मशाला, जहां हम रुके थे, वह  उनके बड़े भाई कनछेदी साहू ने सन् 2000 में बनवाई थी। धर्मशाला में पानी की व्यवस्था नहीं है कारण साहू परिवार के अनेक प्रयासों के बाद भी  गांव के लोगों ने वहां हैंडपंप न लगने दिया। रात अच्छी कटी पहली बार गेंहू  से भरे बोरों के बीच सोते हुये चूहों और सांपों का डर न लगा।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 13 ☆ चंगी जान,जहान है ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी भावप्रवण  कविता  “चंगी जान,जहान है ”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . ) 

 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 13 ☆

☆ चंगी जान,जहान है  ☆

 

चंगी जान,जहान है ।

सेहत ही धनवान है ।।

 

मिलता किसको साथ यहाँ।

सोचो सभी अनाथ यहाँ।।

ईश्वर कृपा महान है ।

चंगी जान,जहान है ।।

 

सबकी अपनी राह अलग।

भरी स्वार्थ से चाह अलग ।।

कहाँ बचा ईमान है ।।

चंगी जान,जहान है ।।

 

बातें केवल प्यार की ।

चाहत के इकरार की ।।

चढ़ती जो परवान है ।

चंगी जान,जहान है ।।

 

सच से सब कतराते हैं।

जिन्दा झूठ पचाते हैं।।

कैसा अब इंसान है ।

चंगी जान,जहान है ।।

 

मंज़िल सबकी एक यहाँ ।

राहें अपितु अनेक यहाँ ।।

तन की गति शमशान है ।

चंगी जान,जहान है ।।

 

होगा स्वस्थ अगर तन-मन।

तब होगा “संतोष” भजन।।

जीवन कर्म प्रधान है ।

चंगी जान,जहान है

चंगी जान,जहान है ।।

 

© संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

Please share your Post !

Shares

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – सप्तम अध्याय (26) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

सप्तम अध्याय

ज्ञान विज्ञान योग

( भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा )

 

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।26।।

 

भूत भविष्य ओै” आज का सब कुछ मुझको ज्ञात

किन्तु सबों के मध्य हूँ मै प्रायः अज्ञात।।26।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता॥26॥

 

I know, O Arjuna, the beings of the past, the present and the future, but no one knows me.।।26।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

Please share your Post !

Shares

Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 16 – Memories ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

 

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Memories.)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 16

☆ Memories ☆

 

Memories envelope you
Like the helplessness
On an evening of unexpected rains.

 

Caught unawares,
You aren’t able to even open an umbrella,
And you get soaked.

 

Your emotions,
Which were covered by white polyster tunic,
Suddenly become exposed-
The rain has made the material transparent.

 

You run helter-skelter
To find a chamber of solace,
But there is none.

 

The rains
Take their own time,
And leave you only when they feel like.

 

Till then,
You have to keep a guard
And let no one touch
Your susceptibility.

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

Please share your Post !

Shares