☆ निवांत एकांत… लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – स्वाती मंत्री ☆
मंदिराच्या पायऱ्या चढताना हातातील फुलांच्या हारापेक्षाही मनातील मागण्यांचे ओझे जास्त जड असते..
प्रत्येक पाऊल एका अपेक्षेने पडत असते आणि प्रत्येक नमस्कारात काहीतरी पदरात पाडून घेण्याची धडपड असते..
आपण देवाकडे जातो ते बहुधा स्वतःला अपूर्ण समजूनच..
कुणाला धन हवे असते, कुणाला यश, तर कुणाला केवळ मनाची शांती..
पण या मागणारे आणि देणारे यांच्या गर्दीत एक निराळाच प्रवाह वाहत असतो.
तो म्हणजे त्या जिवांचा, ज्यांनी मागणे सोडून दिले आहे..
ज्यांच्या डोळ्यांत आता आसवांची जागा एका संथ शांततेने घेतली आहे..
माणूस जेव्हा स्वतःच्याच अंतर्मनाच्या गाभाऱ्यात डोकावतो, तेव्हा त्याला उमजते की खरी श्रीमंती बाहेरून काही मिळवण्यात नसून आत जे आहे त्यात तृप्त राहण्यात आहे.
हे जगणे सोपे नसते..
या तृप्तीला एक सूक्ष्म दुःखाची किनार असते. हे दुःख एखाद्या जुन्या जखमेसारखे नसते, तर ते एका अशा जाणीवेचे असते की आता आपल्याला जगाकडून काहीही नको आहे..
ज्याला काही नको असते, तोच खऱ्या अर्थाने ‘सुखी आत्मा’ असतो..
पण या वैराग्यात एक प्रकारची एकाकीपणाची सावली असते..
जग जेव्हा धावत असते, ओरडत असते, तेव्हा हा माणूस आपल्याच हृदयाच्या कोपऱ्यात शांत बसून स्वतःच्या अस्तित्वाचा उत्सव साजरा करतो..
ही तृप्ती आनंदापेक्षाही जास्त गंभीर आणि मौनापेक्षाही जास्त सखोल असते..
अशा वेळी बाहेरच्या मूर्तीसमोर हात जोडण्याचं भानही उरत नाही, कारण साऱ्या जगाला व्यापणारा तो विधाता स्वतःच्याच निवांत एकांतात सामावलेला असतो..
हे एक नितांत सुंदर सत्य आहे..
*
लेखक: अज्ञात
प्रस्तुती: स्वाती मंत्री
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘आस‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६० ☆
☆ लघुकथा – आस☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
“सर! अनाथालय से एक बच्ची का प्रार्थना पत्र आया है।”
“अच्छा, क्या लिखा है उसने ?”
“पत्र में लिखा है कि वह पढ़ना चाहती है, उसे स्कूल आना है.”
“क्या नाम है उसका?”
“रेणु।”
“रेणु ? पर अभी तक तो वह पढ़ने के लिए तैयार ही नहीं थी – वह अचंभित थे । कितना समझाया था हम लोगों ने उसे लेकिन वह स्कूल आई ही नहीं।”
स्कूल की शिक्षिका ने एक पत्र उनके हाथ में देते हुए कहा – “सर! आप रेणु का यह प्रार्थनापत्र पढ़िए — ”
“टीचर जी! मुझे बताया गया है कि विदेश से कोई मुझे गोद लेना चाहते हैं| वो मेरे मम्मी- पापा होंगे न! अंग्रेजी नहीं आएगी तो मैं अपने मम्मी -पापा से बात कैसे करूंगी ? मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी है। मुझे नहीं मालूम था कि मम्मी-पापा से बात करने के लिए स्कूल जाना जरूरी होता है, मुझे पढ़ना है टीचर! — रेणु “
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भक्ति, शक्ति और हरियाली…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८४ ☆
☆ हनुमान जयंती विशेष – भक्ति, शक्ति और हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भक्ति, शक्ति और हरियाली: हनुमान जी का वो संदेश जिसे आज का युवा भूल रहा है… और फिर से पा सकता है।
हनुमान जयंती केवल शक्ति और पराक्रम का उत्सव नहीं, बल्कि अटूट भक्ति और प्रकृति से जुड़ाव का भी पावन अवसर है। हनुमान जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी शक्ति नहीं, उनकी निष्कलंक भक्ति है—एक ऐसी भक्ति जिसमें अहंकार नहीं, केवल समर्पण है।
आज की युवा पीढ़ी सफलता, नाम और पहचान की दौड़ में कहीं न कहीं भीतर की शांति और जुड़ाव खोती जा रही है। ऐसे समय में हनुमान जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति भक्ति से ही जन्म लेती है। जब मन ईश्वर से जुड़ता है, तब वही ऊर्जा प्रकृति के प्रति प्रेम में भी बदल जाती है।
हनुमान जी “पवनपुत्र” हैं—वायु के पुत्र। उनकी भक्ति केवल प्रभु तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर उस तत्व तक फैली थी जो जीवन को सम्भव बनाता है। यही कारण है कि उनकी भक्ति हमें सिखाती है कि पेड़-पौधे, जल, वायु—ये सब भी पूजनीय हैं। जब हम एक पौधा लगाते हैं, उसकी सेवा करते हैं, तो वह भी एक प्रकार की भक्ति ही है—प्रकृति के प्रति समर्पण की भक्ति।
युवा अगर इस भाव को समझ ले, तो उसकी ऊर्जा केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज और पर्यावरण को भी संवारने लगेगी। आज की “ग्रीन मोटिवेशन” दरअसल वही भक्ति है, जो हनुमान जी ने अपने जीवन से सिखाई—सेवा, संरक्षण और संतुलन।
इस हनुमान जयंती पर, आइए हम केवल मंदिरों में दीप न जलाएँ, बल्कि अपने भीतर भी भक्ति का दीप प्रज्वलित करें। एक पेड़ लगाएँ, उसे प्रेम से सींचें, और हरियाली को अपना साथी बनाएँ। यही भक्ति का आधुनिक रूप है—जहाँ ईश्वर और प्रकृति दोनों का सम्मान हो।
“हनुमान जी की भक्ति जब जीवन में उतरती है, तो हाथ सेवा में लगते हैं और दिल प्रकृति से जुड़ जाता है।”
आपका यह भाव ही भक्ति को जीवित रखेगा और धरती को भी हरा-भरा बनाएगा।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Criterion…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
~ Criterion… ~
☆
On a white canvas
colours arrive uninvited—
they spill, collide, breathe
and the silence of white
begins to shape a meaning
They call it art…and
a crowd gathers to celebrate
On a white sari falls
one stray drop—
and the same white
turns into judgment
The pallu trembles
not with wind,
but with probing eyes
Another crowd gathers—
to correct, to contain…
How paradoxical
these lines are
—where colour is freedom
and where it becomes stigma
The canvas may bear
a thousand reckless strokes
and be called alive
but a woman must
remain unblemished white
The painter pauses—
what if the frame wore the sari
and the woman the canvas
would color still be a crime
or be seen as truth…!
(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem मानदंड)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “मानवीय सभ्यता और युद्ध” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०८ ☆
आलेख – मानवीय सभ्यता और युद्ध श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मानवीय सभ्यता की कहानी वास्तव में मनुष्य की जिजीविषा और उसके संघर्षों की एक लंबी दास्तान है।
सभ्यता सामाजिक नियमों का परिपालन चाहती है, इन मान्य प्रचलित नियमों की अवहेलना युद्ध की जन्मदात्री बनती है।
संपत्ति, संसाधन , स्त्री , या जमीन के लिए युगों से युद्ध होते रहे हैं। हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि विकास और विनाश सिक्के के दो पहलू रहे हैं। सभ्यता का अर्थ अगर सुसंस्कृत होना है तो युद्ध उसी संस्कृति का एक काला अध्याय है।
आदिम युग में जब मनुष्य वनों में रहता था तब उसकी लड़ाई केवल अस्तित्व को बचाने की थी। वह भोजन के लिए लड़ता था और जंगली जानवरों से स्वयं की रक्षा करता था। धीरे धीरे उसने समूह में रहना सीखा और यहीं से समाज की नींव पड़ी। समाज बनने के साथ ही अधिकारों की भावना जागी और इसी भावना ने युद्ध को जन्म दिया।
प्रारंभिक बस्तियों ने जब नगरों का रूप लिया तो संसाधनों पर कब्जे की होड़ शुरू हो गई। नदियों के किनारों पर फली फूली सभ्यताएं पानी और उपजाऊ भूमि के लिए आपस में टकराने लगीं। विकास की दौड़ में मनुष्य ने पहिए का आविष्कार किया और इसी पहिए ने युद्ध के रथों को गति दी। धातु की खोज हुई तो कुल्हाड़ी के साथ साथ तलवारें भी बनाई जाने लगीं। यह एक विडंबना ही है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि का उपयोग जीवन को सुगम बनाने के साथ साथ दूसरों के जीवन को संकट में डालने के लिए भी किया। जैसे जैसे साम्राज्य बढ़े वैसे वैसे सीमाओं का विस्तार हुआ और उन सीमाओं की रक्षा के लिए रक्तपात अनिवार्य मान लिया गया।
इतिहास के पन्ने पलटें तो महान सभ्यताओं के उदय और पतन में युद्धों की बड़ी भूमिका रही है। मेसोपोटामिया से लेकर सिंधु घाटी तक और रोम के वैभव से लेकर चीन की महान दीवार तक हर जगह विजय और पराजय की गाथाएं अंकित हैं। महान सम्राटों ने शांति की स्थापना के नाम पर विशाल सेनाएं खड़ी कीं। उन्होंने विशाल किलों का निर्माण किया जो आज भी हमारी वास्तुशिल्प की उन्नति के गवाह हैं। लेकिन इन किलों की दीवारों के पीछे अनगिनत चीखें और रक्त की बूंदें दफन हैं। विकास ने हमें विज्ञान दिया और विज्ञान ने हमें बारूद थमा दिया। तलवारों की जगह तोपें आ गईं और आमने सामने की लड़ाई दूर से वार करने वाले हथियारों में बदल गई।
मध्यकाल तक आते आते युद्ध केवल जमीन का टुकड़ा जीतने का माध्यम नहीं रह गए। अब विचारधाराओं और धर्मों के नाम पर तलवारें खिंचने लगीं। मनुष्य ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन उसके भीतर का शिकारी कभी शांत नहीं हुआ। वह महलों में रहने लगा और रेशमी वस्त्र पहनने लगा पर उसकी आंखें अब भी पड़ोसी के वैभव पर टिकी रहती थीं। व्यापार के मार्ग खुले तो उन पर अधिकार जमाने के लिए नौसेनाएं तैयार की गईं। समुद्रों की लहरें भी मानवीय रक्त से लाल होने लगीं। खोज और आविष्कार की इस यात्रा ने मानवता को सात महाद्वीपों तक पहुँचाया लेकिन साथ ही गुलामी और शोषण की नई व्यवस्थाएं भी दीं।
औद्योगिक क्रांति ने दुनिया का चेहरा पूरी तरह बदल दिया। कारखानों से उत्पादन बढ़ा और देशों की भूख भी बढ़ गई। कच्चे माल की तलाश और तैयार माल को बेचने की होड़ ने विश्व को दो भयानक युद्धों की आग में झोंक दिया। बीसवीं सदी का विकास अभूतपूर्व था लेकिन इसी सदी ने हिरोशिमा और नागासाकी का वह मंजर भी देखा जिसने मानवीय चेतना को झकझोर दिया। परमाणु शक्ति जो ऊर्जा का स्रोत बन सकती थी वह सर्वनाश का प्रतीक बन गई। विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि ने ही मनुष्य को सबसे अधिक डरा दिया। आज हम अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं लेकिन धरती पर शांति स्थापित करने में अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
युद्ध ने तकनीकी विकास को गति तो दी है पर मानवीय मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। हवाई जहाज से लेकर रडार और इंटरनेट तक कई महान आविष्कार युद्ध की जरूरतों के कारण ही अस्तित्व में आए। सेनाओं को बेहतर संचार चाहिए था इसलिए हमने सूचना क्रांति का सूत्रपात किया। सैनिकों की जान बचाने के लिए चिकित्सा विज्ञान ने नई ऊंचाइयां छुईं। लेकिन क्या इस भौतिक उन्नति की कीमत उन करोड़ों मासूमों की जान से ज्यादा है जो इन युद्धों में स्वाहा हो गए। सभ्यता का विकास तभी सार्थक है जब वह संवेदनशील समाज का निर्माण करे। आज की दुनिया हथियारों के ढेर पर बैठी है और एक छोटी सी चूक सदियों की मेहनत को राख कर सकती है।
आधुनिक युग में युद्ध का स्वरूप बदल गया है। अब केवल सीमाओं पर गोलियां नहीं चलतीं बल्कि आर्थिक और साइबर युद्ध के माध्यम से भी देशों को घुटनों पर लाया जाता है। हमने विकास के नाम पर प्रकृति को भी युद्ध का मैदान बना दिया है। जंगलों का कटना और प्रदूषण का बढ़ना भी एक तरह का युद्ध ही है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ लड़ रहे हैं। सच्चा विकास वह है जो समन्वय और सहअस्तित्व की भावना पर आधारित हो। मानवीय सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे पास कितने उन्नत हथियार हैं बल्कि इस पर निर्भर करता है कि हम आपसी मतभेदों को कितनी समझदारी से सुलझाते हैं।
सभ्यता की लंबी यात्रा में हमने बहुत कुछ सीखा है। हमने लोकतंत्र को अपनाया और मानवाधिकारों की बात की। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बनाई गईं ताकि संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाए जा सकें। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य अब युद्ध की विभीषिका से ऊब चुका है। वह शांति और प्रेम की भाषा समझना चाहता है। बुद्ध और गांधी जैसे महापुरुषों ने हमें अहिंसा का मार्ग दिखाया जो आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक है। विकास की परिभाषा केवल ऊंचे भवन और तेज रफ्तार गाड़ियां नहीं होनी चाहिए। एक ऐसा समाज जहां हर व्यक्ति सुरक्षित महसूस करे वही वास्तव में विकसित समाज कहलाने का अधिकारी है।
अंत में हमें यह समझना होगा कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। हर युद्ध अपने पीछे विनाश और प्रतिशोध की नई कहानियां छोड़ जाता है। मानवीय सभ्यता का वास्तविक उत्कर्ष तभी संभव है जब हमारी बुद्धि और हृदय के बीच संतुलन हो। हम विज्ञान की शक्ति का उपयोग दुखों को दूर करने के लिए करें न कि नए जख्म देने के लिए। भविष्य की राहें तभी प्रशस्त होंगी जब हम हथियारों को त्याग कर ज्ञान और करुणा के दीप जलाएंगे। सभ्यता की मशाल को जलते रहने के लिए शांति की हवा की जरूरत है न कि नफरत के तूफान की। मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना ही विकास की अंतिम मंजिल होनी चाहिए।
☆ श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
श्री राज सागरी
(जन्म दिवस 1अप्रैल पर मंगल भाव सहित)
आज जब मैं बुंदेली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे सबसे पहले तो इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रोफेसर श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि की ये प्रतिक्रिया काफी प्रभावित कर रही है कि श्री राज सागरी ने खड़ी बोली, बुंदेली और उर्दू में साधिकार रचनाएं लिखी हैं। अपने चालीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में पूरे प्रदेश और देश में हजारों पाठकों के मन में किसी न किसी रूप में अपनी रचनाओं को प्रतिष्ठित किया है और मंचों से काव्य पाठ करके हजारों हजार श्रोताओं को मंत्र मुग्ध किया है। बार बार श्रोता उनकी रचनाओं को सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। साहित्य के त्रिवेणी संगम -प्रयाग राज सागरी के शीर्षक से श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि लिखते हैं कि वर्तमान में चुटकुले बाज तथाकथित कवियों के बीच राज सागरी जब काव्य पाठ करते हैं तो केवल वही मंच लूटते नज़र आते हैं। उनकी कविताएं न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि प्रेरणा भी देती हैं, ऊर्जा प्रदान करती हैं,नयी दिशा देती हैं। ऋषि के उपरोक्त नजरिए से ये बात तो स्पष्ट होती है की राज सागरी जी ने बुंदेली भाषा में काव्य सृजन करते हुए संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। उन्होंने दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से बुंदेली को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में जो योगदान दिया है,वह अन्य साहित्यकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय हो सकता है। राज सागरी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार में उनकी जो भी रचनाएं शामिल हैं वे समाज के विभिन्न पाठकों की रुचियों को ध्यान में रखकर सृजित की गई है। पाठकों को ये रचनाएं इसलिए भी पठनीय प्रतीत होती है क्योंकि बुंदेली भाषा में उन्हें ये रचनाएं अपने आसपास की घटनाओं और प्रसंगों पर आधारित महसूस होती हैं और फिर कवि ने भी अपने आसपास जो भी सामाजिक समस्याओं और स्थितियों को देखा परखा उसे पूरी ईमानदारी के साथ कलम के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया।
राज सागरी जी की ग़ज़लों और दोहों की एक विशेषता और है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए बड़ी बेबाकी से लिखा है और पाठकों ने इसे बेहद पसंद भी किया है। कवि ने अपने काव्य सृजन को अपना श्रेष्ठ धर्म और कर्म माना है और यही संदेश उनकी रचना में भी दिखता है –
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गीत ग़ज़ल तुम गातई चलयो
जाग में नाम कमातई चलयो
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कवि ने विद्वता के लिए आंखों की भाषा की समझ और सोच को भी अपनी रचना में प्रमुखता दी है और एक जगह लिखा भी है –
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मोरी बातई छोड़ दो, मैं तौ हूं नादान
आंखें तुम जो बांच लो, तौ समजूं विद्वान
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राज सागरी जी राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को आवश्यक मानते हैं और यही बात उनकी कविता में भी झलकती है। भारत माता कविता में उन्होंने लिखा भी है कि –
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हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम चारों हैं भाई
हिन्दुस्तानी प्यार सिखाते
लड़ते नहीं लड़ाई
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राज सागरी जी का वैचारिक दृष्टिकोण उनकी बुंदेली कविता में भी परिलक्षित होता है। उनका सोचना है कि ग़लत काम करने वाले लोग निडरता से अपना काम करते हैं-
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खा जैहें का जोन डरें हम
काय खों उनके पांव परें हम
प्यार सें बे हैरत लौ नयींया
उनपे बोलो काय मरें हम
ऐसीं बुद्धि दे अब ईसुर
कोई गलत नें काम करें हम
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वैसे तो श्री राज सागरी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में काफी लिखा है लेकिन उन्हें बुंदेली भाषा में सृजन के लिए अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता अर्जित हुई है। खड़ी बोली में उनका काव्य संग्रह पल भर की पारो और तारे जमीन के भी चर्चित रहा। बाल साहित्य के अंतर्गत स्कूल चलें हम, उर्दू में कदम कदम और बुंदेली में ग़ज़ल संग्रह चलो अब घर खों चलिए और जाम- ए-गजल का प्रकाशन हो चुका है जो कि पाठकों के बीच अत्यंत पठनीय सिद्ध हुए हैं।
अमन प्रकाशन सागर से प्रकाशित नदिया के ओ पार में श्री राज सागरी जी की काव्य रचनाओं को पाठकों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा कि पूर्व में प्रकाशित काव्य कृतियों को मिला है और सागरी जी ने भी इसीलिए कृति के प्रारंभ में ही पाठकों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की है –
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भाग्य-सेंसर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८८ – व्यंग्य – भाग्य-सेंसर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
बेलतारा गांव के सबसे बड़े लफ्फाज ‘फरेब दास’ ने जब इस बार प्रधानी का परचा भरा, तो उन्होंने सड़कों और बिजली जैसे उबाऊ मुद्दों को दरकिनार कर दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’एंटी-बदकिस्मती कवच और नक्षत्र-सेंसर योजना’। फरेब दास का तर्क था कि गांव की असली समस्या गरीबी नहीं, बल्कि ‘खराब ग्रहों की चाल’ है, जो सड़क पर बिछे रोड़ों से भी ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे गांव के हर घर की छत पर एक ‘नक्षत्र-फिल्टर’ लगवाएंगे, जो राहु-केतु की कुदृष्टि को सोखकर उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदल देगा। गांव के लोग, जो अपनी हर नाकामी का दोष शनिदेव के माथे मढ़कर निश्चिंत हो जाते थे, अचानक इस ‘एस्ट्रो-टेक’ क्रांति के पीछे ऐसे दीवाने हुए कि उन्हें लगने लगा कि अब बिना मेहनत किए ही छप्पर फाड़कर धन बरसेगा।
प्रचार के अंतिम पड़ाव पर फरेब दास ने गांव के चौराहे पर एक ‘किस्मत-स्कैनर’ लगाया। यह वास्तव में एक पुराना कबाड़ हो चुका फोटोकॉपी मशीन का ऊपरी हिस्सा था, जिस पर उन्होंने दीपावली वाली झालरें लपेट दी थीं। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने का संकल्प लेकर इस मशीन पर अपनी हथेली रखेगा, उसकी हस्तरेखाएं ‘रिफ्रेश’ होकर सीधे इंद्रलोक के डेटाबेस से जुड़ जाएंगी। विपक्षी उम्मीदवार ‘भोला नाथ’ खाद और सिंचाई की बातें कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उनकी फूटी किस्मत की मरम्मत होने वाली थी। फरेब दास ने एक पुराने रेडियो से विचित्र आवाजें निकालकर उसे ‘ग्रहों का सिग्नल’ बताया और ग्रामीणों को विश्वास दिला दिया कि विधाता ने अब गांव की चाबी उन्हें सौंप दी है। लोग अपनी जमा-पूँजी फरेब दास के चरणों में चढ़ाने लगे ताकि उनके भाग्य का ‘सॉफ्टवेयर’ अपडेट हो सके।
जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और फरेब दास की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपना ‘किस्मत-अपग्रेड’ लेने उनके घर पहुँच गया। लोग चाहते थे कि अब उनके घर में नोटों की बारिश हो और दुख-तकलीफें परलोक सिधार जाएं। फरेब दास अपनी नई चमचमाती एसयूवी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक नींबू और लाल मिर्च थमाते हुए बोले— “भाइयों, मशीन का सर्वर डाउन हो गया है क्योंकि गांव में ‘अविश्वास’ का वायरस बहुत ज्यादा है!” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, फिर हमारे भाग्य का क्या?” फरेब दास ने ठहाका लगाया और गरज कर बोले, “मूर्खों! तुम्हारा भाग्य तो उसी दिन फूट गया था जब तुमने एक कबाड़ मशीन के भरोसे अपना वोट मुझे बेच दिया। अब इन नींबू-मिर्च को अपने दरवाजे पर लटकाओ और अगले पांच साल अपनी बेवकूफी का नजर-बट्टू बनो। मैंने तो तुम्हारे वोटों से अपना ‘राजयोग’ सिद्ध कर लिया है!” जनता सन्न खड़ी उस नींबू को देख रही थी और फरेब दास ‘भाग्य-सुधार’ की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर निकल पड़े।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कदर जाने ना…“।)
अभी अभी # ९६० ⇒ आलेख – कदर जाने ना श्री प्रदीप शर्मा
हम सभी की भावनाओं का ख्याल रखते हैं, और महिलाओं का सम्मान ही नहीं, कद्र भी करते हैं। साहित्य ने भले ही हमारी कद्र ना की हो, हम संगीत के कद्रदान हैं, और फिल्मी संगीत सुन सुनकर ही आज कानसेन बन बैठे हैं।
हमें ना तो कोई शिकायत जमाने से है और न ही कोई शिकायत अपनी पत्नी से। जिस तरह संगीत ने पिछले सत्तर सालों से हमारा साथ निभाया है, हमारी धर्मपत्नी भी पचास वर्षों से हमारा साथ निभाती चली आ रही है।
चले थे साथ मिलकर, चलेंगे साथ मिलकर। तुम्हें रुकना पड़ेगा, मेरी आवाज सुनकर।।
संगीत की हमारी शिक्षा दीक्षा केवल रेडियो सीलोन सुनने तक ही सीमित रही। आप चाहें तो हमें एक अच्छा श्रोता कह सकते हैं। हुस्न, इश्क, जुल्फ और दामन जैसे शब्द हमने यहीं से सीखे हैं। सहगल का दौर निकल चुका था और अनारकली, बैजू बावरा, मुगले आजम और मेरे महबूब का जमाना था। सुरैया, शमशाद, नूरजहां और खुर्शीद के साथ लता, आशा, रफी, तलत, किशोर और राजकपूर की आवाज मुकेश, के तराने लोग गुनगुनाते रहते थे।
जब जीवन में कोई कद्रदान मिलता है, तो आपकी लाइफ बन जाती है। आप किसी के हसबैंड बन जाते हैं, कोई आपकी वाइफ बन जाती है। आपने, अपना बनाया, मेहरबानी आपकी! हम तो इस काबिल ना थे, है कद्रदानी आपकी।।
मदनमोहन ही तो लाए थे वह खूबसूरत नगमा हमारे लिए!
आपकी नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल हमें, और, जी हमें मंजूर है, आपका हर फैसला।
हर नजर कह रही, बंदा परवर शुक्रिया।
गृहस्थी की गाड़ी बस ऐसे ही तो चल निकली थी हमारी भी। सारे तीज, त्योहार और उत्सव कितने उत्साह से संपन्न होते थे। हरताली तीज हो अथवा करवा चौथ! तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता। हमें अपने आप पर भरोसा नहीं होता था जब ऐसे गीत कानों में पड़ते थे; मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।।
हमारे गीतकार वर्मा मलिक भी कम नहीं आग में घी डालने में! तेरी दो टकियां दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए। हाय हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी। लेकिन हमारी धर्मपत्नी बहुत समझदार निकली। छोड़ दें सारी दुनिया, किसी के लिए। ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।
लेकिन किसे पता था, उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें भी मदन मोहन का ही यह गीत भी सुनना पड़ेगा ;
कदर जाने ना
मोरा बालम, बेदर्दी
कदर जाने ना …
हम संगीत प्रेमी तरानों और पत्नी के तानों को बराबर का महत्व और सम्मान देते हैं। आखिर इन ५० बरसों में ऐसा क्या बदल गया कि बालम, बेदर्दी हो गए। हमने तो कभी नहीं कहा, सजनवा बैरी हो गए हमार। कुछ तो गड़बड़ है।।
उम्र के साथ अगर महिलाएं धार्मिक होती चली जाती हैं तो पुरुष पॉलिटिकल! जिस टीवी पर कभी पूरा परिवार बैठकर दूरदर्शन देखता था, आजकल धर्मपत्नी में आस्था और सत्संग के संस्कार जाग गए हैं। न्यूज, शेयर मार्केट और कॉमेडी शो के लिए पति को मोबाइल और लैपटॉप का सहारा लेना पड़ता है। घर, घर नहीं, राज्यसभा लोकसभा टी वी हो चला है।
टेबल पर पत्नी चाय रखकर चली गई है, सीहोर वाले लाइव आ रहे हैं। नाश्ता कब का ठंडा हुआ पड़ा है। कानों में कुछ गर्मागर्म शब्द प्रवेश कर रहे हैं। पूरी जिंदगी इनके लिए खपा दी, लेकिन इन्होंने हमारी कभी कद्र ही नहीं की।।
लेकिन शब्द मोम बनकर नहीं पिघल रहे। लता का मधुर स्वर याद आ रहा है ;
लाख जतन करूं
बात न माने जी
बात न माने
मेरा दरद न जाने जी।
कदर जाने ना
हो कदर जाने ना
मोरा बालम बेदर्दी
कदर जाने ना …
सोचता हूं, अगर अभी भी कद्र नहीं जानी, तो बहुत देर हो जाएगी। घर घर की यही कहानी है। जागो बेदर्दी बालमों, अब तो जागो।।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।