(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१३ ☆
☆ संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
जी हाँ ये सारी कच्छ रियासत की अपनी स्वयं की मुद्राएं थींl ये सोने, चांदी और ताँबे के सिक्कों से बनी होती थींl इन सभी सिक्कों के एक तरफ कच्छ के राजा का नाम देवनागरी लिपी में और राजघरानों के चिन्ह त्रिशूल, कटार और अर्धचंद्र उकेरे होते थेl
कच्छ का मांडवी तट जो अरब सागर का एक तट था यहाँ चौरासी देश की ध्वजाएं लहराती थींl इसी कारण से इसे चौरासी झंडो का बंदरगाह भी कहते थेl ये झंडे कच्छ के व्यापारिक साम्राज्य को दर्शाते थेl यहाँ हाथी दाँत, खजूर, लकड़ी, मसाले आदि आयात होते थेl और हस्तशिल्प, घी, चमड़ा, नमक आदि निर्यात होते थेl
उन दिनों वस्तु विनिमय होता था परन्तु कच्छ में व्यापारियों को प्रवेश करने से पहले इन मुद्राओं को खरीदना होता था, तभी वो मुद्राओं से व्यापार कर सकते थेl
सिर्फ समुद्री मार्ग से नहीं अपितु सडक मार्ग से भी व्यापार राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और मुंबई में भी होता थाl सड़क व्यापार अधिकतर ऊँट से होता थाl ये खराई ऊँट होते थेl ये पानी में भी तैर सकते थेl ये ऊँट समुद्र के आसपास के मैंग्रोज खाते थेl ये कई दिनों तक मीठे पानी के बिना भी जीवित रह सकते थेl
ऊन दिनों मांडवी बंदरगाह पर जहाजों को दिन और रात के समय रास्ता दिखाने की बड़ी ही अनोखी तकनीक होती थीl दिन में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ से दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाजों को देखकर अधिकारी रंगीन झंडे लहराते थेl ज्वार का इंतजार करते ये किनारे से लग जाते थेl
वहीं रात्रि में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ पर बहुत बड़ी सी मशाल जलती थी जो लाइट हाउस का काम करती थीl जब दूर से आने वाले जहाज की लाइट दिखती तब मांडवी के नाविक अपनी नावों में मशालें जलाकर उनके पास पहुंचते और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ले आते थेl जब ठंड के दिनों में कोहरा होता तब एक समयावधि पर तोप दागते थे और विशाल नगाड़े भी बजाते थेl जिससे जहाजों को बंदरगाह की दिशा मालूम हो जाती थीl
जब 1947 में हमें आजादी मिली तब कच्छ को भी भारत में मिला लिया गयाl उस समय के अंतिम शासक मदनसिंह जी ने अंतिम सिक्का बनवाया जिसपर देवनागरी लिपि में जयहिंद लिखवाया थाl
स्वतंत्रता के पश्चात कच्छ को मुंबई के एक जिले रूप में सम्मिलित कियाl तब कच्छ की सरकार मुंबई से चलती थीl पर भाषाओं को ध्यान में रखकर मुंबई का विभाजन हुआ तब कच्छ को मुंबई से अलग कर गुजरात में शामिल कर दिया गयाl
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “झोला, भीख और भिखारी…“।)
अभी अभी # १०५३ ⇒ आलेख – झोला, भीख और भिखारी श्री प्रदीप शर्मा
(BAG, BEG & BEGGAR)
झोला शब्द कितना सात्विक और यायावर लगता है, लेकिन भीख और भिखारी उतना ही दीन, हीन और दरिद्र। लेकिन अगर इसी में दर्शन और वैराग्य के दर्शन करने हों तो हरि ओम की शरण में आवें ;
भिखारी सारी दुनिया
दाता एक राम ..
उस दाता से मांगने में कैसी शर्म। जिसने उस भोले भंडारी से मांगने में शरम की, समझो उसके फूटे करम।
झोला और झोली शब्द में फर्क है। झोले में आवश्यक सामान रखा जाता है, जब कि झोली फैलाई जाती है। झोला यह दर्शाता है कि जीवन की आवश्यकता उतनी अधिक नहीं जितनी हम सोचते हैं। सच्चा वैरागी वही, जो झोला उठाकर चल दे। जब कि जो झोली फैलाई जाती है, उसकी आवश्यकता की कोई सीमा नहीं होती। एक बार आपने किसी के सामने झोली फैलाई, तो वह कभी भर नहीं सकती। पूरा संसार भी अगर उस झोली में डाल दिया जाए तब भी तृष्णा की झोली हमेशा खाली ही खाली रहती है। ।
भीख से कभी पेट नहीं भरता। मांगने की भीख कभी शांत नहीं होती। रहीम कहते हैं ;
आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गए, जबहि कहा कछु देहि। ।
स्वाभिमान और मेहनत पसीने की कमाई ही पुरुषार्थ है। लेकिन जब इंसान अपना स्वार्थ छोड़ परमार्थ की राह पर चल निकलता है, तब उसके भोग और संचय की वृत्ति पर विराम लग जाता है और उसके कदम अनायास ही सन्यास की ओर उठ जाते हैं। तब वह रहीम को छोड़ राम की शरण में चला आता है। एक शरणागति का अपना कुछ नहीं होता। कैसा मान और कैसा अपमान।
राम की चिड़िया राम का खेत और सबै भूमि गोपाल की।
सन्यास वृत्ति का शुभ मुहूर्त भी भिक्षा से ही होता है। पहले अपना अहंकार और अस्मिता गलाओ, अपनी उपाधि गलाओ। जब संसार ही त्याग दिया तो काहे की पद प्रतिष्ठा और घर परिवार। बुद्धं शरणं गच्छामि। बस जितनी झोली में समाए, उतनी ही भिक्षा। ।
हमारे समाज में आज भी भिक्षावृत्ति अपराध है। लेकिन सुना नहीं आपने, दूसरों के लिए मांगने में परमार्थ है। किसी भले और अच्छे कार्य के लिए चंदा मांगना और रसीद काटना क्या बुरा है। परमार्थ का दूसरा नाम चैरिटी है और क्या आप नहीं जानते, सन्यास तो मन से लिया जाता है, तन से नहीं।
अगर एक बार आपकी सन्यास वृत्ति जाग गई और आपमें वैराग्य भाव जाग गया तो फिर तो समझिए, सभी मठ, आश्रम और एनजीओ के द्वार आपके लिए खुल गए।
कीजिए शान से गौसेवा और दीन हीन, दिव्यांगों की सेवा !आपकी पद, प्रतिष्ठा वहां बहुत काम आती है। फिर आप झोला नहीं, रसीद बुक लेकर शान से कार में जाएं, अपनी झोली फैलाएं, नेक, अच्छे और आदर्श उद्देश्य के लिए भीख मांगे, गिड़गिड़ाएं। बेफिक्र रहें, आपका मान बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं। आप उठें, आगे बढ़ें, सिर्फ मठ और आश्रम ही नहीं, परमार्थ की राह में, अनासक्त सेवा की राह में, रोटरी क्लब और लायंस इंटरनेशनल के द्वार भी आपके लिए खुले हैं।
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘वो मेरा मार्गदर्शक…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३२ ☆
कविता – वो मेरा मार्गदर्शक… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
☆
एक पूरा समुद्र उफान पर है दिल में मेरे,
एक बूंद को भी आंसू बनने से रोका है मैंने…
*
जज्ब कर ली है, कठोरता सारे जहान की,
खुद को मोम की तरह पिघलने से रोका है मैंने…
*
परख लिया है, पहले हर एक पैमाने को,
खुद से रूबरू होने का, फिर फैसला लिया मैंने…
*
सिर्फ,फूलों सी नाजुक, पावन मुस्कुराहटें रोकती है मुझे,
☆ जीवनाची शाळा – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सुनीला वैशंपायन☆
ते पावसाचे थेंब ना… शेवटी एका ओळीत बसले. शाळेतल्या बाई वर्गात आल्या की एका क्षणात कसा सगळा कल्ला थांबतो आणि सगळी मुलं एका रांगेत उभी राहतात, अगदी तसं…
मी गंमत म्हणून त्यातल्या एका थेंबाला विचारलं,
“काय रे… सरीबाई ओरडल्या का? “
थेंब हसला. पानाच्या टोकावरून किंचित डोलला. मग म्हणाला,
“नाही हो… सरीबाई ओरडत नाहीत कधीच. त्या फक्त शिकवतात. “
मी चकित झाले…
तो पुढे म्हणाला,
“आम्ही आकाशातून उतरताना प्रत्येकजण आपापल्या मनाचे राजे असतो. कुणाला वाऱ्याबरोबर उधळून जायचं असतं, कुणाला मातीला कवटाळायचं असतं, कुणाला नदी व्हायचं असतं… पण जेव्हा एखाद्या पानावर येऊन विसावतो ना, तेव्हा कळतं— एकट्याने चमकण्यात फारसा अर्थ नसतोच. सोबत बसण्यात वेगळंच सौंदर्य असतं. “
त्याच्या त्या वाक्याने माझ्या मनात कितीतरी आठवणी हलक्या सरींसारख्या बरसू लागल्या.
लहानपणी आपणही असेच होतो ना… एकाच बाकावर बसणारे, एकाच डब्यातला घास वाटून खाणारे, शिक्षा झाली तर एकत्र उभे राहणारे. मोठं होत गेलो आणि प्रत्येकाने आपापल्या दिशेने वाहायला सुरुवात केली. कुणी यशाच्या डोंगरावर जाऊन थांबलं, कुणी जबाबदाऱ्यांच्या वाळवंटात हरवलं, कुणी गर्दीत असूनही एकटं पडलं.
थेंब पुन्हा म्हणाला,
“रांग म्हणजे शिस्त नाही गं… रांग म्हणजे दुसऱ्याला जागा देण्याची संस्कृती. स्वतःचं अस्तित्व जपतानाही दुसऱ्याच्या अस्तित्वाला धक्का लागू न देण्याचं नाव रांग. “
मी त्या पानाकडे पाहिलं.
प्रत्येक थेंब स्वतंत्र होता. प्रत्येकाचं प्रतिबिंब वेगळं होतं. तरीही कुणी कुणाला ढकलत नव्हतं. कुणी दुसऱ्यापेक्षा मोठं दिसायचा प्रयत्न करत नव्हतं. सगळे एका अदृश्य मर्यादेचं भान ठेवून शांत बसले होते.
किती विलक्षण आहे निसर्ग!
जिथे माणसाला शिस्त शिकवण्यासाठी नियम लिहावे लागतात, तिथे पाण्याचा प्रत्येक थेंब कोणतंही पुस्तक न वाचता जगण्याचं तत्त्वज्ञान जगत असतो.
थेंब शेवटी अलगद म्हणाला,
“आम्ही पडतो ना म्हणून झाडं हिरवी राहतात. आम्ही थांबतो ना म्हणून पानं सुंदर दिसतात. आणि आम्ही निघून जातो म्हणून पुन्हा नव्या सरींना जागा मिळते. आयुष्याचं रहस्य एवढंच आहे— वेळ आली की बरसायचं, वेळ आली की थांबायचं, आणि वेळ झाली की शांतपणे निघून जायचं. “
एवढं बोलून तो थेंब अलगद पानाच्या टोकावरून निसटला… तेंव्हा
मातीने त्याला मिठीत घेतलं.
आणि मला जाणवलं—
शाळेतल्या बाई खरंच ओरडत नसत. त्या फक्त मुलांना एकत्र उभं राहायला शिकवत असत.
बहुतेक… पावसाच्या सरीबाईही तेच शिकवतात.
एकटं चमकणं म्हणजे मोठेपण नसतं;
एका ओळीत, एका मनाने, एकमेकांना न ढकलता जगणं— हीच खरी जीवनाची शाळा असते.
लेखक : अज्ञात
प्रस्तुती – सुनीला वैशंपायन
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – ३० ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆
(सामान्यांविषयी तुकारामांचे मत)
आजच्या भागात समाजातील सामान्य जनतेविषयी तुकाराम महाराजांचे काय मत होते, त्याविषयीच्या अभंगांचा विचार करू. सामान्य म्हणजे तुमच्या आमच्यासारखे, संसारात गुरफटलेले, एका ठराविक चक्रातून अहोरात्र फिरणारे.
आपल्याच फुंदे/ जेथे तेथे घेती छंदे//
पडला सत्याचा दुष्काळ/ बहु फार झाली घोळ//
विश्वाचे माठ/ त्याचे कपाळी ते नाट//
तुका म्हणे घाणा/ मूढा तीर्थी प्रदक्षिणा//
या अभंगाचा अर्थ काय? तर तुकारामांच्या मते असे अनेक लोक आहेत की ते त्यांच्या गर्वाने प्रत्येक वेळी दुराग्रह धरतात. परमार्थातील खरी तत्वे काय आहेत ती त्यांना समजली नसल्यामुळे सगळाच घोळ होतो. या नश्वर जगताचा खोटा अभिमान धरून त्यांचे आचरण चालू असते. उदाहरणार्थ- आपल्याला आवडलेली वस्तू न मिळता जर ती दुसऱ्याला मिळाली, तर अत्यंत दुःख होते, पण हे कळत नाही की त्या वस्तूचे अस्तित्व किती काळ असणार आहे? मग विनाकारण दुःख का करायचे आणि स्वतःस त्रास करून का घ्यायचा? म्हणून तुकाराम महाराज म्हणतात की जसा घाण्याचा बैल घाण्याभोवती फिरतो तसा तो मूर्ख मनुष्य जगातल्या सर्व तीर्थांना प्रदक्षिणा घालत बसतो, परंतु त्याच्या अशा वागण्याने त्याला हरीच्या प्राप्तीचे भान आणि ज्ञान नसते.
अहंकार तो नासा भेद/ जगी निंद्य ओवळा//
नातळे तो धन्य यासी/ जाला वंशी दीपक//
करवितो आत्महत्या/ नेदी आत्मा आतळो//
तुका म्हणे गुरुगुरी / माथा थोरी धरुनी//
या अभंगात महाराज जनतेला हेच समजावून सांगत आहेत की माणसाचा अहंकार, म्हणजे मी पणा, हे माझे आहे, हे मी केले आहे, हा गर्व
त्याचा विनाश करतो. माणसामाणसात भेदभाव निर्माण करणारा अहंकार अगदी मलीन आहे, तो ओवळा म्हणजे अशुद्ध आहे, निंदनीय आहे. सगळा घात या अहंकारानेच केला आहे. ज्याने या अभिमानाचा विटाळ होऊ दिला नाही, त्यानेच वंशाचे नाव उज्वल केले आहे व तोच धन्य आहे असे समजावे. अहंकारानेच आत्मा स्वतःचा अपारपणा विसरतो आणि या मर्यादित देहाला कवटाळतो. जसा काही तो आत्मघातच करतो. या अभिमानामुळेच खऱ्या श्रीहरीची भेट होऊ शकत नाही. यामुळे माणूस स्वतःकडे मोठेपणा घेऊन उगीचच गुरगुरत राहतो.
तुकाराम महाराजांचे सामान्य माणसांना कळकळीचे हेच सांगणे आहे की आपण सामान्य माणसे म्हणजे एक साधन आहोत, कर्ता- करविता तो एक श्रीहरीच आहे.
आस निसरली गोविंदाचे भेटी/
सवंसारी तुटी पुढीलिया//
पुढे पाठविले गोविंद गोपाळ/
देऊनी चपळ हाती गुढी//
हाका आरोळी या देऊनी नाचती/
एक सादाविति हरी आला//
आरंधी पडिली होती तया घरी/
संकीर्ण त्या नारी नरलोकां//
लोकां भूक तहान नाही निद्रा डोळा/
रूप वेळोवेळा आठविती//
आहा कटा मग करिती गेलिया/
आधी ठावा तया नाही कोणा//
* आधी चुकी मग घडे आठवण/*
* तुका म्हणे जन परिचय*//
सर्वसामान्य माणसांची पद्धतच आहे, की कोणतीही गोष्ट करताना सखोल विचार न करता ती करायची. कधी कोणाच्या सांगण्यावरून करायची, नंतर त्याचे परिणाम काय होतील याचा सारासार विचार करायचा नाही आणि नंतर अंगाशी आले की देवाला आळवायचे. आपल्याकडे म्हणच आहे करून करून भागले अन् देवपूजेला लागले संत तुकाराम नेमकी सामान्य जनांची हीच ओळख त्यांच्या या अभंगातून देत आहेत.
ते म्हणतात की, गोविंदाची भेट झाल्याने सर्व आशा नाहीशी होऊन पुढच्या संसाराचा संबंध सुटला. गोविंदाने चपळ गोपाळांच्या हाती पताका देऊन त्यांना पुढे पाठवले. मोठमोठ्याने हाका, आरोळ्या देऊन ते नाचू लागले व एकमेकांना हरी आला म्हणून सावध करू लागले. आपापल्या घरी ते स्त्री-पुरुष उद्विग्न होते. त्या लोकांची तहानभूक निद्रा नाहीशी होऊन ते वेळोवेळी हरीचे रूप आठवीत असत. हरि डोहात गेल्यावर कृष्ण किती चांगला होता म्हणून आक्रोश करू लागले परंतु पूर्वी त्याचे मोठेपण कोणी जाणत नव्हते. तुकाराम महाराज हेच सांगतात की आधी चुका करायच्या नंतर पश्चातापाने पोळायचे हा जगाचा स्वभावच आहे.
भारवाही न ओळखती या अनंता/
जवळी असता अंगसंगे//
अंगसंगे तया न कळे हा देव/
कळोनी संदेह मागुताला//
मागुते पडती चिंतेचिये डोही/
जयाची हे नाही बुद्धी स्थिर//
बुद्धी स्थिर राहो नेदी नारायण/
आशाबद्ध जन लोभिकांची//
लोभिका न साहे देवाचे करणे/
तुका म्हणे तेणे दुःखी होती//
या अभंगात साध्या सरळ संसारी माणसाचे वर्णन महाराजांनी केल्याचे आपण पाहतो. जी माणसे प्रपंचाचा गाडा वाहत आहेत, ती माणसे परमेश्वर कितीही जवळ असला तरी त्याला पाहू शकत नाहीत. देहात असलेल्या देवाला ती ओळखत नाहीत. अंग संगतीने असलेला देव त्यांना कळत नाही आणि यदाकदाचित समजलाच तर त्याविषयी त्यांच्या मनात संशय निर्माण होतो. ज्यांची बुद्धी स्थिर नाही ते काळजीच्या डोहात बुडतात. जे लोभी आहेत, नारायण त्यांची बुद्धी स्थिर होऊ देत नाही. लोभी माणसांना देवाचे हे कृत्य सहन न झाल्यामुळे ते कायम दुःखीच राहतात.
थोडक्यात सांगायचे तर संसारात राहूनही लोभ, मोह… इत्यादी शड्रिपुंना दूर ठेवले तर हरिनारायण आपली बुद्धी स्थिर ठेवील आणि देहातील देवाची जाणीव होऊन सर्व दुःखे नाश पावतील.
☆ ये दोस्ती हम नही तोडेंगे… ☆ राधिका माजगावकर पंडित ☆
एस. पी. चा आमचा आवडता कट्टा आज बरेच दिवसांनी टोळभैरवांनी भरगच्च भरला होता. प्रत्येकाच्या हातात मस्त रंगीत फुलांचे बुके नाचत होते.
हो! आज अभ्याचा वाढदिवस आहे ना! शिक्षणाच्या कोर्सच्या वाटा बदलल्या म्हणून काय झालं! ‘येदोस्ती हम नही तोडेंगे’ चा नारा आम्ही आधीपासूनच पक्का केला होता. भेटल्यावर पहिली सलामी शिव्यांचीच असायची, “साल्या कुठे कलमडला होतास? भुतासारखा कुठल्या पिंपळावर बसला होतास आज उगवलास? ” अशीच सुरुवात व्हायची पण प्रेमाने दिलेली शिवीही एकमेकांना वडापाव सारखी वाटायची. खरं प्रेम होतं आमच्या मित्रांमध्ये.
कुणाला मदत करताना आम्ही ‘साथी हाथ बढाना’ होतो तर माजलेल्या गुंडांचा माज उतरवण्यासाठी आम्ही रांगडे पैलवान व्हायचो. आपल्याच मस्तीच्या विचारात मी असताना पोरं खिंकाळली, “अरे अभ्या आला रे आला! उचला त्याला मिरवत आणूया आणि नाचणाऱ्या मित्रांच्या खांद्यावरून तोल सांवरत अभ्या अवतरला.
सगळ्यांची वर्णी लागली होती पण मन्याचा पत्ता नव्हता अभयनी विचारल्यावर कोणीतरी किंचाळल “अरे तो मजनू पार कामातून गेलाय त्याची लैला त्याला सोडून गेलीय नां म्हणून तो जन्तर मंतर झालाय. परवा तर आत्महत्येची भाषा करत होता. ” नऱ्याचं टाळकच् सटकलं, सोडून गेली? म्हणजेकांय? माझ्यासमोर प्रेमाचा, लग्नाचा पाढा वाचलाय त्यांनी. आणि आता ती पळून जाते म्हणजे काय? बघतोचं तिच्याकडे. ”
त्याच्या डोक्यावर बर्फाचे लादी ठेवत मी म्हणालो, “समंधा शांत हो तिच्याकडे आपण नंतर बघू आधी त्या मजनुला ताळ्यावर आणू. “
अभ्या बोलला, “माझा बर्थडे उद्या होणार आज आपली धाड मनोजच्या घरावर पाडायची. आमचा मोर्चा मनोजच्या घराकडे वळला शिट्ट्या वाजल्या. मन्याला आम्ही घराबाहेर रस्त्यावर खेचला. गॅलरीतून त्याची आई कळवळली, “अरे सांभाळून न्यारे त्याला” तर बाबा ओरडले, “बरं झालं तुम्ही आलात ते, चार दिवस झाले सुतकी चेहरा करून, त्या पोरी पायी टाळकं फिरवून बसलय कार्ट, डोकं ठिकाणावर आणा त्याचं”
काकांचं म्हणणं बरोबर होतं मन्याला धोपटून ब्रेन वॉश करणं आवश्यक होतं. दाढी काय, डोळे काय, देवदास झालेल्या मन्याला अगदी रामदास नाही पण वास्तवदास करायचा चंग आम्ही बांधला. “मी नाही येत रे” चा पाढा वाचणाऱ्या त्याला आम्ही उचलला आणि बाकावर आदळला. सम्या करवादला “अरे तिच्यापाई काय अवस्था करून घेतलीस स्वतःची. आणि रडतोस काय बायल्या हातभर बांगड्या भर लेका” आमच्याकडून मुक्ताफळांची उधळण चालली होती. आमच्यात अभ्या जरा शांत डोक्याचा आणि सीनियर आहे मन्याच्या भोवतांलचं आमचं कोंडाळ फोडून तो आत शिरला. त्या फडतुस मुलीसाठी वेड्या झालेल्या वेड्याला त्यांनी चुचकारत विचारलं, ” काय झालंय मन्या? कोण ही पोरगी? अरे! तिच्यासाठी तू जीव द्यायला निघाला होतास? चल त्या पोरीकडे सरळ करतो तिला. “
एकानी शंख केला, “अरे अभ्या सरळ करायला ती इथे आहे कुठे, पैसेवाल्याचा हात धरून केव्हाच पळालीय ती. ”
मन्याला पुन्हा दुःखाचा उमाळा आला. त्याच्या नरड्यात आम्ही अख्खी बिसलरी ओतली तेव्हा त्याचे उसासे थांबले. तो म्हणाला, “अरे चांगली होती, सुंदर होती रे ती मला आवडली होती. ह्या बजरंगापुढे आम्ही आणाभाका घेतल्या, सात जन्म एकत्र राहण्याचा वचन दिलं होतं तिनं मला. दोन्हीकडचे आई-बाबा एकदम खुश होते सगळीकडून हिरवा सिग्नल मिळाला. लग्नाची तारीख पक्की झाली पत्रिका कशा छापायच्या, तुझी आवड सांग म्हणून मी तिच्या घरी विचारायला गेलो तर आई-वडिलांनी हात झटकले. तुमच्या घरात तिची हौस नसती पुरवली गेली म्हणून तिने पैसेवाल्याशी लग्न केलं” असं म्हणून त्यांनी मला अक्षरशः हकललं रे!
मध्या दात ओठ खात मन्याला मारायला धावला, “मुर्खा त्यांनी सांगितलं आणि तू ऐकलंस? हा सगळा त्यांचा आधीपासूनचा प्लॅन असेल. लबाड साले”एवढं महाभारत घडूनही आमचा हा हिरो रिंगणाबाहेर यायला तयारच नव्हता. “अरे पण ती चांगली होती रे माझं प्रेम होतं तिच्यावर” मन्याचं गाणं चालूच होतं. अजूनही हे पात्र तिच्या प्रेमातून बाहेर यायला तयारच नव्हतं. त्याच्यापुढे डोकं आपटायचंच बाकी राहयलं होत. त्याला धोधो धुवावासा वाटत होतं. आता मात्र मध्या भडकून म्हणाला “चुलीत घाल तिचं प्रेम, अरे मुर्खा फसवलय तिने तुला. तुझं घर, पैसा, इन्कम, बचत बघायला तुझ्या घरात आणि गोड बोलून तुझ्या आई बाबांच्या मनात शिरली ती बया. तुझा मासा गळाला लागला होता. पण पैसा हातात येत नव्हता मग काय सोडलं तुला आणि गाठला तिने मोठा लक्षाधीश मासा
आणि हे येडं अजूनही अडकलय तिच्यात. अरे सोड! छपन्न मुली आणून उभ्या करतो तुझ्या पुढे” आम्ही हिरवा सिग्नल दाखवला. तरी पण आमचं हे बाळं तुणतुण वाजवतच राह्यलं, ” 56 राहू दे रें एक तरी मुलगी लग्न करायला तयार आहे का माझ्याशी? वय वाढतय माझं. आई बाबा थकलेत. मी नाही गुडघ्याला बाशिंग बांधलं पण आई माझ्या डोक्यावर अक्षता टाकायला उतावळी झालीय. आता कोण देईल मला मुलगी? आमचं हे बेनं दळण दळतच होतं. आम्ही वास्तवात आलो या रड्याच्या बोलण्यात तथ्य होतं त्याचं म्हणणं बरोबर होतं. आमची लग्नाची वय मागे पडताहेत. गुडघ्याला बाशिंग बांधलय खरं पण नवरीचा पत्ता नाहीये. केविलवाणी परिस्थिती झालीय आमची. तरी पण मन्याला स्वप्नातून कसंबसं आम्ही खाली आणलं.
आता पुढे काय? हा गुंता सुट्ता सुटत नव्हता. निराश झालेला आमचा दोस्त आणि उदास झालेल्या त्याच्या आई बाबांचा चेहरा डोळ्यासमोरून हालत नव्हता आता काय करायच? हा राक्षसी प्रश्न ‘आ’वासून गिळायला बघत होता.
त्याच तिरीमिरीत चंद्याकडे गेलो दार त्याच्या बहिणीने उघडलं. आणि डोळ्यासमोर लख्ख वीज चमकली, मेंदू हलला, झटका बसला आणि झटक्यात विचारआला ‘अरे ही पोरगी तर लग्नाची आहे की. मन्यासाठी हिला विचारलं तर.. चंद्या नुकताच चतुर्भुज झाला होता आणि गेला होता त्याच्या चंद्राला घेऊन मधुचंद्राला. मग काय थेट त्याच्या आबांना गाठलं खडा टाकून बघितला, मनोजची वकिली करून त्याच्याबद्दल त्यांना पटवलं. बाबातर एकदम खुश झाले चंद्याची आई देवापुढे साखर ठेवायला धावली. पडद्याआडून डोकावणाऱ्या मनालीकडे मी बघितलं. मनोजला ती ओळखत होतीच. खुणेने मी तिला विचारलं तर पोरगी झक्कास लाजली. चला अर्धा गड तर सर झाला.
आता मन्याला घोड्यावर बसवायचं. एस. पी. चा कट्टा गाठला. मोबाईल खणखणले मित्रांचा अड्डा जमला. मन्याला मधे घेतला, चारी बाजूंनी हल्ला करून ‘अरे मारो गोली उस छोकरीको असं म्हणून त्या पळालेल्या पोरीचं त्याच्या मानगुटीवर बसलेलं भूत उतरवलं. अखेर त्याचा भेजा ठिकाणावर आला आणि या बैलाने मुंडी हलवली,
लगेच आमचं दोस्त मंडळ तयारीला लागलं. हो! हे खुळं परत बिथरलं तर काय करा! कारण मन्या त्या पोरीपायी पार कामातून गेला होता. येरवड्याला न्यायचंच बाकी होतं अनेक रात्री त्याने जागवल्या. दिवसा तो मनांत रडायचा. त्याचा उदास आणि केविलवाणा चेहरा बघून त्याच्या आई-बाबांचा जीव धास्तावला होता.
त्याला ह्या निराशेच्या डोहातून बाहेर काढणं आवश्यक होतं. अशावेळी फक्त त्याच्यावर फोकस करून आमच्या दोस्त मंडळींनी त्याला माणसात आणण्याचा विडा उचलला चंद्या ला निरोप गेला तो हनिमून सोडून धावत पळत आला.
चक्र वेगाने फिरत होती. मनाली तर खुश होतीच, पण आमचं हे ध्यान मन्याही आता लग्नाला उतावळा झाला होता. अंतरपाट वर धरला तरी टाचा उंच करून तो मनालीला न्याहाळत होता. ते बघून आमचं मित्रमंडळ पुढे सरसावलं, नवरदेवाला उंचावर नेण्यासाठी दहीहंडी केली आणि म्हणालो “कशी घालतोस माळ बघु लेका, आता माळ घालूनच दाखव ”
पण ह्या l बहाद्दराने दहीहंडी फोडून उडी मारली आणि तो धपक्कन मनालीच्या पुढेच पडला. आम्ही तिथे पोहोचायच्या आतच चलाखीने नवरीच्या गळ्यात त्याने माळ घातली, मनालीने पण तितक्याच चपळाईने त्याच्या गळ्यात हार घातला. आणि काय म्हणाली माहित आहे कां “.. हमभी कुछ कम नही..
अक्षतांचा मारा झाला हास्याची लाट उसळली, फुलांची उधळण झाली आणि.. आणि.. शुभमंगल एकदाचं पार पडलं. आम्ही रोखलेले श्वास सोडले.
आज डोकं ठिकाणावर आलेलं आमचं हे यडखुळं हनिमूनला निघालय. त्याला पोहोचवायला वीस गाड्या बाहेर पडल्यात. विमानतळावर त्याला सोडताना आम्ही आरोळ्या ठोकल्या.
☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “हा मीच तो… आणि तो हाच तो…!” ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆
– – भीक मागणाऱ्या वृद्धांमध्ये बसून टगेगिरी करणारा आणि त्यांना त्रास देणारा तो हाच तो…
– – माझ्या कामात उगीचच अडथळे निर्माण करणारा तो हाच तो…
… आणि खूप समजावून सांगून, कधी सांभाळून घेणारा हा मीच तो…
– – अंगकाठी बारीक परंतु कोणतीही गुन्हेगारी करण्यास न घाबरणारा तो हाच तो…
– – आई वडील दोघेही नाहीत कोणतेही संस्कार न झालेला तो हाच तो…
– – एके दिवशी माझ्या देखत एका वृद्धाला थोबाडीत मारणारा, तो हाच तो…
… आणि माझा ताबा सुटला, शेजारी पडलेला दांडका, त्याच्या दिशेने जोराने फेकलेला…
हा मीच तो…
– – हेतू नव्हता, परंतु डोळ्याच्या शेजारी दांडक्याने झालेली मोठी जखम… तो हाच तो…
… आणि जीव आणि डोळा थोडक्यात वाचला… घाबरून गेलेला मी हाच तो…
– – रागाने त्याने पायातली चप्पल मला फेकून मारली, या चपलीचा नेम चुकवणारा तो मीच तो…
– – पुनः मांडीवर डोकं घेऊन जखमेचे ड्रेसिंग करणारा हा मीच तो…
– – ड्रेसिंग करता करताही मला शिव्यांची लाखोली वाहणारा हा तोच तो…
– – घाणेरड्या शिव्या ऐकून रडणारा तो मीच तो…
– – आपलीच चूक आहे, शिक्षा भोगायला हवी, हा विचार करणाराही तो मीच तो…
– – रस्त्यावर कुणीतरी मेलंय आणि कोणीतरी रडतंय असं वाटून त्याचाही तमाशा बघणारा घोळका जमला… तो घोळका हाच तो…
दुसऱ्याची वेदना हि आपली करमणूक आहे, असं समजून सेल्फी घेणारा षंढ घोळका… तोही हाच तो…
– – असो, बिना आई बापाचा… वाट चुकलेला मुलगा तो हाच तो…
… आणि आपणच आता आई होऊ, आणि याचा बाप होऊन त्याला जवळ घेऊ असं वाटणारा मीच तो…
– – हळूहळू माझी सावली आणि माझी कवच कुंडलं होऊन माझ्या मागे मागे फिरणारा तो हाच तो…
– – “तुमी काय बी सांगा सर, आपुन येकांद्याचा खून बी करंल तुमच्यासाटी, तुम्ही फकस्त बोलून बगा” म्हणणारा तो हाच तो…
– – मग त्याला एका खुनाची सुपारी द्यायला, आड बाजूला घेऊन गेलो… हो तोही मीच तो…
– – मी त्याला पाच हजार रुपये दिले, एक खून करायचा आहे म्हटलं, पैसे खिशात ठेवीत उत्साहीत होणारा… तो हाच तो…
– – “खून कुणाचा करायचा सर? ” भाबडेपणाने विचारणारा… तो तोच तो…
… आणि “तुझाच माझ्या बाळा” हे तितक्याच भाबडेपणाने सांगणारा… तो मीच तो…
– – सर…? तुमी…?? माझा??? खून…????
गोंधळलेल्या अवस्थेत, तोंडावर भीती स्पष्ट, पण अस्पष्ट वाक्य बोलणारा तो हाच तो…
… होय माज्या राजा, खून तुझाच करायचा आहे, पण तुझ्या आतल्या गुंडगिरीचा, गुंडाचा, टवाळखोर आणि टगेगिरीचा… तू खूप गोड आहेस रे सोन्या… लोकं लोखंडावर सोन्याचा मुलामा देतात आणि त्याला बाजारात खपवतात… तू तर अस्सल सोनं आहेस रे माझ्या बाळा… लोखंडाची सुरी घेऊन कोणाला धमकावण्यापेक्षा… पडलेल्या कोणालातरी उठवून बघ, मरणाऱ्या कुणाला तरी जगवून बघ, विझलेली एखादी ज्योत पेटवून बघ, एखाद्यासाठी प्रार्थना करून बघ… मग तुजा हातच सोन्याचा होऊन जाईल रे माज्या सोन्या…!
… करशील खून तुझ्यातल्या गुंडाचा…? या पाच हजारात एखादा धंदा चालू कर…
… मी तुजी आई होण्याचा प्रयत्न करंल आन बापबी…!
… भाऊकपणे प्रश्न विचारणारा… तो मी हाच तो…
– – रडत म्हणाला “आजपत्तूर मला कुनी सोन्या बाळा राजा म्हनालं नाही… ” तुमी म्हनला… यानंतर अंगावरले सर्व कपडे फाडत, रडत रडत म्हणाला केला खून मी… माझ्यातल्या गुंडाचा… फेकून दिलं मी समदं… समदा नागडा झालो मी. आता नाव द्या मला…! “
– – मी काय नाव देणार… आजपासून माणूस म्हणून जन्माला आलेला तो हाच तो… आता त्याच्यावर कसलाही कोणताही शिक्का नव्हता, नावाचा सुद्धा…
… तो… तो… हाच तो…!
– – मग गळ्यात पडून कधी आई म्हणत, कधी बाबा म्हणत, रड रड रडला… रडला… खुप रडला… तो हाच तो…
आम्ही एका नदीकाठी बसलो होतो… याच नदीकाठी एक डिलिव्हरी झाली… मात्र जन्माला तिघे आले…!
… एक कोणताही शिक्का नसलेलं बाळ… तो हाच तो
… एक आई आणि एक बाप… तो मीच तो…
… तो सर्वसामान्य माणूस म्हणून कामाला लागला, कमावू लागला… तो हाच तो…
… लगीन करायचं हाय, पोरगी मी शोदली हाय, म्हणत माझ्या मागे लागलेला… तो हाच तो…
… लग्न लागलं, वरपक्ष म्हणून एकटाच नाचणारा तो मीच तो…
– – लग्नाच्या आधी कानात काही गोष्टी विचारणारा तोच तो…
… लग्नाच्या आधी कानात काही गोष्टी सांगणारा मीच तो…
– – लग्न पार पडल्यानंतर हमसून रडू लागणारा तो हाच तो…
… वरपक्ष म्हणून छाती फुगवून उभा असणारा… तो मीच तो…
– – त्याला म्हणालो, ‘बेण्या, आज आपण रडायचं नसतंय… वधू पक्षाकडील मंडळी रडतील… रडू दे त्यांना’ हे म्हणणारा वरपक्ष म्हणून निर्ढावलेला मीच तो…
– – ‘सर तिच्या बापाची ती येकुलती येक मुलगी व्हती, आपुन आज तिच्या बापाचं काळीज घिवून चाललो, तिच्या बापाला कसं वाटलं आसंल, पोरी वाचून त्यो आता रोज कसा जगंल? म्हनुन मी रडतूय सर’…
हे म्हणणारा, सोन्याचे हात झालेला तो हाच तो…
– – एकेकाळी याच मुलाने मला चप्पल फेकून मारली होती,
आज बरोबर नेम धरून ती माझ्या थोबाडावर बसली होती…!
नेम वर्मी लागला होता, आता डोळ्यात पाणी आलेला हा मीच तो…
– – एकेकाळी सूरी घेऊन कुणाच्या तरी काळजावर बिनधास्त वार करणारा हाच तो…?
… आज मुलीच्या बापाच्या काळजाचाही विचार करणारा तो हाच तो…??
– – शरमून गेलो… शरमणारा फक्त मीच तो…!
… हा सर्व खेळ, नाटक समजून विंगेत बसून बघणारा मीच तो…!
एवढ्या सर्व गडबडीत तो भाबडेपणाने माझ्या कानात म्हणाला, ‘सर लग्नात माजी एक चप्पल हारावली… ‘
.. त्याला आता कोणत्या तोंडाने सांगू, एकदा तुझा नेम चुकला होता, आज तो नेम बरोबर माझ्या थोबाडावर लागला आहे, आणि ती चप्पल मी आता माझ्या हृदयात जपून ठेवली आहे… हे सांगणारा मीच तो…
मी विषय बदलला, ‘अरे येड्या चपलीचं काय विचारतो, तुम्हा दोघांचा “जोडा” बघ किती छान दिसतोय… बायकोकडे बघ की रं जरा… ‘
तो लाजला… आहा रे… तो… लाजला… बघा तो लाजला… लाजला… तो हाच तो…
… तिघांनी मिळून मग हा फोटो काढला… तो हाच तो…!
– – जाताना मुलीकडचे सर्व रडत होते, त्यात आणखी एक माणूस रडत होता… तो हाच तो…
… आणि… आणि त्याचा माणूस म्हणून झालेला जन्म, आणि तोंडावर मारलेली चप्पल हृदयात घेऊन, अत्यंत समाधानाने त्याच्या मागे मागे चालणारा हा मीच तो…!!!
… पिठापूरला जाताना सकाळी 10 च्या सुमारास विजयावाडा जंक्शन आले.
इथे इंजिन बदलते हे कळल्यावर म्हणलं चला बघू प्रोसेस. आमचा डबा ही इंजिना पासून 4- 5 वाच होता.
पूर्वी पुणे स्टेशनवर महालक्ष्मीचे डिझेल इंजिन बदलून इलेक्ट्रिक इंजिन लागायचे आणि मग गाडी मुंबई कडे जायची हे पाहिले होते.
हातात चहाचा कप घेऊन तिथे पोचेपर्यत पहिले इंजिन निघाले होते. समोर दिसणा-या अनेक इंजिना पैकी एखादे येईल म्हणून बघत बसलो. थोड्यावेळाने लक्षात आले जोडणी करणारे रेल्वे कर्मचारी ही नाहीत. कदाचित ते नवीन येणा-या इंजिनातून येतील असे वाटले. दहा – पंधरा मिनिटे झाली काहीच हालचाल नाही, तेवढ्यात घोषणा झाली की कोणार्क एक्सप्रेस सुटत आहे. शिट्टी मारून गार्डने झेंडा दाखवायला सुरवात केली आणि धावत पळत जाऊन गाडी सुटत असताना आमचा डबा पकडला.
इंजिन दुसऱ्या बाजूला लागले होते. पूर्वीच्या अनुभवावरून मनाने खात्री केलेली की इंजिन आम्ही जिथे आहोत तिथेच लागेल.
आयुष्याचं पण असंच नाही का? आपण एक विचार करत असतो पण एका योग्य स्टेशन वर थोडी प्रतीक्षा करायला लावून नियती एका वेगळ्याच मार्गाने, जो आपल्यासाठी कदाचित अधिक चांगला आहे तिकडे नेणार असते.