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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (15) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ द्वितीय अध्याय साँख्य योग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) (सांख्ययोग का विषय)   यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।15।। जिन्हें दुखी करते नहीं ये परिवर्तन पार्थ वही व्यक्ति जीवन अमर , जीते हैं निस्वार्थ ।।15।। भावार्थ :  क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है ।।15।।   That firm man whom surely these afflict not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality! ।।15।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)  ...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल – ध्यान कैसे करें? (वीडियो लिंक #2) – श्री जगत सिंह बिष्ट

ध्यान कैसे करें? वीडियो लिंक #2    ध्यान कैसे करें? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है. इस विडियो में ध्यान करने हेतु निर्देश दिए गये हैं जिन्हें सुनते हुए आप ध्यान कर सकते हैं. चार विडियो की श्रंखला में यह दूसरा विडियो है. इन वीडियोज़ के माध्यम से आप ध्यान की शुद्ध विधि क्रमशः सीख सकते हैं. LifeSkills Jagat Singh Bisht, Founder: LifeSkills lifeskills.happiness@gmail.com...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * आग * – डा. मुक्ता

डा. मुक्ता आग   (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है  विचारणीय एवं सार्थक कविता ‘आग ’)   आग!माचिस की तीली से लगाई जाए या शॉर्ट सर्किट से लगे विनाश के कग़ार पर पहुंचाती दीया हो या शमा...काम है जलना पथ को आलोकित कर भटके राही को मंज़िल तक पहुंचाना   यज्ञ की समिधा प्रज्जवलित अग्नि लोक-मंगल करती प्रदूषण मिटा पर्यावरण को स्वच्छ बनाती क्योंकि जलने में निहित है त्याग,प्यार व समर्पण का भाव... और जलाना… सदैव स्वार्थ व विनाश से प्रेरित   भेद है,लक्ष्य का...सोच का क्योंकि परार्थ व परोपकार की सर्वोपरि भावना सदैव प्रशंनीय व अनुकरणीय होती   आग केवल जलाती नहीं मंदिर की देहरी का दीया बन निराश मन में उजास भरती ऊर्जस्वित करती सपनों को पंख लगा नयी उड़ान भरती आकाश की बुलंदियों को छू एक नया इतिहास रचती   © डा. मुक्ता पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com  ...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * जॉब बची सो… * डॉ. सुरेश कान्त – (समीक्षक – श्री एम एम चन्द्रा)

व्यंग्य उपन्यास - जॉब बची सों......  - डॉ. सुरेश कान्त    पुस्तक समीक्षा   जॉब  बची सो.... नहीं, व्यंग्य बची सो कहो...! (महज 22 वर्ष की आयु में 'ब' से 'बैंक जैसे उपन्यास की रचना करने वाले डॉ. सुरेश कान्त जी  ने बैंक ही नहीं कॉर्पोरेट जगत की कार्यप्रणाली को भी बेहद नजदीक से देखा है। व्यंग्य उपन्यास "जॉब बची सो....." की मनोवैज्ञानिक समीक्षा श्री एम. एम. चंद्रा  जी (सम्पादक, आलोचक, व्यंग्यकार एवं उपन्यासकार) की पैनी दृष्टि एवं कलम ही कर सकती है।) डॉ. सुरेश कान्त जी को e-abhivyakti की ओर से इस नवीनतम  व्यंग्य उपन्यास के लिए हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।         Amazon Link - >>>>  जॉब  बची सो.... सुरेश कान्त के नवीनतम उपन्यास “जॉब  बची सो” मुझे अपनी बात कहने के लिए बाध्य कर रही है। मुझे लगता है कि “किसी रचना का सबसे सफल कार्य यही है कि वह बड़े पैमाने पर पाठकों की दबी हुयी चेतना को जगा दे, उनकी खामोशी को स्वर दे और उनकी संवेदनाओं को विस्तार दे।” बात सिर्फ यहाँ...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – * सून…? सून…?…..कसमसे ! * – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे * सून...? सून...?.....कसमसे ! * (ज्येष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री प्रभा सोनवणे जी  का e-abhivyakti में स्वागत है।  सास-बहू के सम्बन्धों पर आधारित सुश्री प्रभा सोनवणे जी का यह  विनोदपूर्ण आलेख निश्चय ही आपका हृदय प्रफुल्लित कर देगा।)   सासू सुनेचं नातं हे एक अजबच रसायन आहे! दोघींच्या एकमेकींकडून असलेल्या अपेक्षा कधीच पूर्ण होत नाहीत! सगळ्यात प्रथम माझ्या नजरेसमोर येते माझी आजी (आईची आई) कोकणात आजी आजोबा गावाकडे रहायचे आजोबा नोकरी तून सेवानिवृत्त झाल्यावर शेती करायचे. ...आजी आजोबा दोघेही सुशिक्षित! अगदी देवमाणसं ! सूना मुंबई ला असायच्या त्या ही सुशिक्षित घरंदाज...पण त्यांच्या मध्ये कधीच सुसंवाद घडलेला मला आठवत नाही...कर्तव्य केली त्यांनी  ..पण खुप सुंदर खेळीमेळीचे संबंध असायला काही हरकत नव्हती...पण एक अंतर जाणवायचंच त्या नात्यात! एकदा मामांच्या पायाला काहीतरी झालं होतं ते आजी ला दाखवत होते ...आजी म्हणाली "रिंग वर्म म्हणतात त्याला!" यावर आजी तिथून उठून गेल्यावर मामी म्हणाल्या,"इंजिनिअर मुलाला आई इंग्रजी शिकवतेय"! सासू ची टर उडवणं हा सगळ्या सूनांचा आवडता विषय असावा! दुसरी सासू म्हणजे इकडची आजी वडिलांची आई त्या अशिक्षीत होत्या, पण स्वतःची सही करायला शिकल्या...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (14) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ द्वितीय अध्याय साँख्य योग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) (सांख्ययोग का विषय)   मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।14।। बाह्य प्रकृति सुख दुख अनुभवदायी  ये अनित्य अनिवार्य हैं इसे सहो हे भाई ।।14।।   भावार्थ :  हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥14॥   The contacts of the senses with the objects, O son of Kunti, which cause heat and cold and pleasure and pain, have a beginning and an end; they are impermanent; endure them bravely, O Arjuna!  ।।14।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)  ...
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संस्थाएं – पृथा फाउंडेशन, पुणे

पृथा फाउंडेशन, पुणे  सुश्री मीनाक्षी भालेराव  संस्थापक - अध्यक्ष  (Please click on following photograph for more information) ⇓   हर एक इंसान में एक इंसान और रहता है जो बचना चाहता है अपने इंसान होने को   ...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल – ध्यान कैसे करें? (वीडियो लिंक #1) – श्री जगत सिंह बिष्ट

ध्यान कैसे करें?  वीडियो लिंक #1    ध्यान कैसे करें? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है. इस विडियो में ध्यान करने हेतु निर्देश दिए गये हैं जिन्हें सुनते हुए आप ध्यान कर सकते हैं. चार विडियो की श्रंखला में यह पहला विडियो है. इन वीडियोज़ के माध्यम से आप ध्यान की शुद्ध विधि क्रमशः सीख सकते हैं. LifeSkills Jagat Singh Bisht, Founder: LifeSkills lifeskills.happiness@gmail.com...
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ई-अभिव्यक्ति: संवाद-4 – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति:  संवाद– 4  इस बात को कतई झुठलाया नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया ने वास्तव में साहित्यिक जगत में क्रान्ति ला दी है।  हाँ, यह बात अलग है कि इस क्रान्ति नें तकनीकी बदलावों की वजह से साहित्यकारों की तीन पीढ़ियाँ तैयार कर दी हैं। एक वरिष्ठतम पीढ़ी जो अपने आप को समय के साथ तकनीकी रूप से स्वयं को अपडेट नहीं कर पाये और कलम कागज तक सीमित रह गए। दूसरी समवयस्क एवं युवा पीढ़ी ने कागज और कलम दराज में रख कर लेपटॉप, टबलेट  और मोबाइल में हाथ आजमा कर सीधे साहित्य सृजन करना शुरू कर दिया। और कुछ साहित्यकारों नें तो वेबसाइट्स, सोशल मीडिया और ब्लॉग साइट में भी हाथ आजमा लिया। इन सबके मध्य एक ऐसी भी हमारी एवं वरिष्ठ पीढ़ी के साहित्यकार हैं जो अपने पुत्र, पुत्रवधुओं एवं नाती पोतों पर निर्भर होकर इस क्षेत्र  में सजग हैं। यह तो इस क्रान्ति का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि हमारे कई गाँव, कस्बों और शहरों...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * न जाने कैसी होती हैं ये स्त्रियां ? * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  न जाने कैसी होती हैं ये स्त्रियां ?   (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की भावप्रवण  कविता  “न जाने कैसी होती हैं ये स्त्रियां ?”)   फूल सी कोमल पर लोहे सी मजबूत होती है चांद सी शीतल पर सूर्य सी उष्ण होती है। न जाने कैसी होती हैं ये स्त्रियाँ?   कैसी विडंबना है  ? नदी सी पवित्र होकर भी छूने मात्र से अपवित्र होती हैं। जीवन भर ढो कर अपनों का बोझ ईट-गारे के मकान को श्रम और प्रेम की धार से घर बनाती हैं। न जाने कैसी होती है ये स्त्रियाँ  ?   सहकर शारीरिक- मानसिक यातनाएं , संबंधों से सूखे पत्तों सी जुड़ी रहती हैं। दबाकर दर्द की टीस हृदय में हंसती, मुस्कराती, खिलखिलाती और बतियाती हैं। प्रेम का दरिया होकर भी प्यासी अतृप्त रहकर जीवन भर ओस की दो बूंद का इंतजार करती हैं। न जाने कैसी होती हैं ये स्त्रियाँ ?   सूखे खोपरे सम ऊपर से कठोर पर भीतर से नरम होती हैं। प्रतिक्षण प्रतिपल नदी के वेग से दौड़ती हुई अनिश्चित अरूप मंजिल को पाना चाहती है। प्रात:काल के नरम सूरज से चांद...
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