(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “गुल्लक की याद में…” ।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ ☆
☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।
दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।
मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –
छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा
खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा
मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –
“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,
दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –
अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…
सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…
वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कविता का साया…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘यही प्रेम है, प्रियवर!‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १०० ☆ यही प्रेम है, प्रियवर!☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खरी खरी…“।)
अभी अभी # ९५१ ⇒ आलेख – खरी खरी श्री प्रदीप शर्मा
जो व्यक्ति खरे होते हैं, वे हमेशा खरी बात ही करते हैं। खरा, निखालिस शुद्ध को कहते हैं। खरा केवल सोना ही नहीं होता, खरे सोने जैसी बहू भी होती है, जिसमें कोई खोट नहीं होता। ऐसी बहू लाखों में एक होती है।
जब ऐसी बहू की तारीफ़ में कसीदे कढ़े जाते हैं, तो सास से बर्दाश्त नहीं होता, और वह कह उठती है, हमारा लड़का भी हीरा है हीरा।
जब सोने के आभूषण बनते हैं, तब उसमें थोड़ा खोट मिलाना पड़ता है, वह पीतल, चाँदी, तांबे का भी हो सकता है। शुद्ध सोने को टंच कहते हैं, इसके केवल बिस्किट बनते हैं, जो खाये नहीं जाते, केवल स्मगलिंग के काम आते हैं। खरे, खोटे, लोगों के नाम भी हो सकते हैं। शुभा खोटे और दुर्गा खोटे दोनों अच्छी मंजी हुई कलाकार थी, लेकिन उनमें कोई खोट नहीं था।।
जो लोग स्पष्टवक्ता होते हैं, वे ज़्यादा लाग-लपेट में विश्वास नहीं करते। चाहे किसी को बुरा लगे या भला, खरी-खरी सुना देते हैं। खरी खरी सुनने वाले को इतनी खरी तो नहीं लगती, लेकिन सुनाने वाले के चेहरे पर एक विजयी भाव अवश्य देखा जा सकता है।
जब मन में बहुत-कुछ उबल रहा होता है, और बाहर आने को आमादा होता है, तब खरी-खरी ही नहीं, खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। खरी-खोटी सुनाना पराक्रम है, और सुनना पराजय। खरी-खरी में जहाँ हल्का सा समझाइश का पुट होता है वहीं खरी-खोटी में अच्छा-गलत, भला- बुरा, अपमानजनक और शालीन भाषा में अपशब्दों का प्रयोग होता है। खरी खरी, और खरी खोटी कभी शालीनता की मर्यादा नहीं लांघते। जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तब गाली-गुप्ता की नौबत आती है। खरे गाली नहीं बकते। सभी खोटे गुप्ता नहीं होते।।
खरी खरी और खरी खोटी अक्सर सुनाई जाती है। इनके अलावा एक अवस्था और होती है, जिसमें कुछ कहा-सुनी नहीं होती, केवल भूरि भूरि प्रशंसा होती है। यह न तो चापलूसी की श्रेणी में आती है, और न ही कटाक्ष की। आप इसे जमकर तारीफ करना भी कह सकते हैं, लेकिन तारीफ भी वहीं की जाती है, जहाँ कुछ निहित स्वार्थ होता है।
आजकल भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती। यह प्रशंसा निःस्वार्थ होती है, और व्यक्ति के गुणों के आधार पर की जाती है। मुझे खुशी है कि इस प्रशंसा का अभी तक राजनीतिक प्रयोग नहीं हुआ है। तब शायद इसका रंग भूरा न रहे, मटमैला या बदरंग हो जाए।।
जगात तेहतीस कोटी देव आहे अस मानलं जात.. असतील ही कदाचित.. पण प्रत्येकाच्या मनात त्याच्या देवाची एक वेगळी प्रतिमा असते.. प्रत्येकाचं आराध्य वेगळं असत.. कोणी विष्णू भक्त असतो तर कोणी शिव भक्त.. कोणी देवी भक्त असतो तर कोणी गणेश भक्त..
किती किती रूपे तुझी..
कुठे कुठे शोधू तुला..
तुझे अनंत देव्हारे…
हे जरी खर असलं तरी प्रत्येकाची श्रद्धा त्याची भक्ती ही वेगळी असते.. कोणी देवावर फुलं वाहून आपली भक्ती जपत असत.. तर कोणी खडकाळ मातीवर अनंत फुलं फुलवून आपली भक्ती दाखवत असत आता इथे प्रत्येकाची श्रद्धा महत्वाची.. आणि जिथे श्रद्धा असते तिथे अंध श्रद्धेला अजिबात स्थान नसते हे महत्वाचे… जेंव्हा पासून देव ही संकल्पना कळायला लागलीय तेंव्हा पासून बाप्पाचे म्हणजे गणपती बाप्पाचे साजिरे रूप च माझ्या डोळ्यासमोर येतं.. आणि मग ह्या सगळ्या च्या ही पलीकडे मनात खोल वर घर करून आहे तो माझा सखा.. कृष्ण… सावळा कान्हा.. त्याचं आणि माझं नात एका गोड आठवणीने जोडलं गेलंय.. लहानपणी आजी आम्हा मुलांना वेगवेगळ्या गोष्टी सांगायची.. रामायण, महाभारत आणि किती काय काय गोष्टी ती सांगायची त्या सगळ्याच फार रंजक असायच्या पण कृष्णाची गोष्ट जास्त आवडीचे.. रामायणातील राम जेंव्हा सीता मातेला सोडून जायचा तेंव्हा वाईट वाटायचं.. त्या वेळी तर रामाचा राग ही यायचा पण कृष्णाच्या कुठल्याच गोष्टीचा कधी राग आला नाही.. त्याने राधेला किती ही वाट पाहायला लावली.. त्रास दिला तरी तो नटखट कान्हा अजूनच जवळचा वाटायचा.. अर्थात राम आणि कृष्ण हे कोणी वेगळे नाहीत हे कळायचं ते वय न्हवत.. पुढे दोघांच्या प्रेमाची तुलना करायला लागले तेंव्हा दोघं ही आपापल्या अवतारात किती महान होते ह्याची खात्री पटत गेली.. माझी आजी पण गोष्टी इतक्या रंगवून सांगायची ना की बास आत्ता चे हे मालिका वाले पण तिच्या पुढे पाणी कमच म्हणावे लागतील🤪 कृष्ण जन्म रंगवून सांगताना वसुदेवा ने टोपलीत लपेटून ठेवलेलं ते देखणं बाळ अगदी डोळ्यासमोर उभं राहायचं.. कारावासातून बाहेर निघताना झोपी गेलेले पहारेकरी, नदीला आलेला पूर, देवकीचा आक्रोश सगळं सगळं आपण जगतो आहोत असा भास व्हायचा.. तेंव्हा पासून हा बालगोपाल मनात घर करून बसला तो कायमचा.. नंद यशोदा घरी वाढताना त्याच्या लिला.. त्याच्या वर आक्रमण करणारे ते क्रूर राक्षस.. ती पुतना मावशी.. आपल्या वरच चाल करून येतायत की काय इतकं ते कृष्ममय जीवन मी जगते आहे असं वाटायचं.. पायाला मुसळ बांधून घर भर फिरणारा लड्डू गोपाळ तर जास्तच लाडका वाटतो.. नटखट कान्हाच्या खोड्या त्याच्या बाल लिला, त्याच लोण्यावर ताव मारणं.. लोण्यानी माखलेला तो निरागस चेहरा सगळच कस लोभसवाण वाटतं.. सवंगड्यांना सोबत घेऊन त्याने काढलेल्या खोड्या, गोवर्धन पर्वत उचलून गोकुळ वासियांना दिलेल मायेचं छत, इंद्राचा चुर केलेला अहंकार हे सगळच कौतुकास्पद वाटतं.. कृष्ण कधी देव आहे म्हणून त्याची भिती नाही वाटतं तो जवळचा मित्र बनून नेहमी जास्तच जवळचा वाटतो.. आयुष्याच्या प्रत्येक वळणावर तो आपला सखा, सोबत, प्रेरणास्थान, आदर्श पुत्र, स्त्रियांचा कैवारी, दुष्टांचा वैरी आणि राधेचा प्रियकर.. ही त्याची सगळीच रूप आपण जगतो आहोत ह्याचा सतत भास होत राहतो ते आपण कृष्ण मय आहोत म्हणूनच.. कृष्ण फार आपला सामान्य माणसा सारखा अगदी आपला वाटतो.. जेवढा तो नंद यशोदेच्या लाडाकोडात वाढला तेवढाच तो संदीपणी च्या आश्रमात सुदामा सोबत सामान्य रोजची कर्तव्य करताना पण तेवढाच प्रभावी वाटतो.. वयाच्या प्रत्येक टप्प्यात कृष्णाने जगण्यासाठी उत्तमोत्तम उदाहरण घालून दिलेली आहेत.. कृष्णा वरचं प्रेम त्याची भक्ती जगण्याची एक वेगळीच प्रेरणा देऊन जाते.. त्याच्या त्यागातलं त्याच निस्सीम प्रेम त्यांचं समर्पण आजच्या पिढीने अनुकरण करण फार गरजेचं वाटतं.. आज जेंव्हा छोट्या छोट्या संकटाना घाबरून मुलं आत्महत्या करताना दिसतात तेंव्हा कृष्ण निती महत्वाची वाटते… कृष्णाची संकटावर मात करण्याची जिद्द जगण्याची नवी ऊर्जा देऊन जातात.. फक्त ती समजून घेण्याची गरज आहे.. आणि मैत्रिणींनो खर सांगू का आपण संकटात आहोत, आपल्यावर अत्याचार होतायत आपल्याला सोडवायला कृष्ण येईल ह्याची वाट बघण्यापेक्षा स्वतः कृष्ण बनून त्या संकटावर मात करणं म्हणजे कृष्ण भक्ती.. तो तर आहेच आपल्या मनात आपल्या मनाच्या प्रत्येक कोपऱ्यात आपण केलेल्या प्रत्येक चांगल्या कृत्यात, आपल्या प्रेमात, आपल्या त्यागात त्याची साथ असतेच ती फक्त आपल्याला ओळखता आली पाहिजे इतकचं.. कधी हा कृष्ण आपला बाबा बनून येतो तर कधी हा मित्र, भाऊ, सखा तर कधी पतीच्या रुपात फक्त त्या कृष्णाला आपल्याला ओळखता आलं पाहिजे.. म्हणूनच वाटतं कृष्ण येईल मदत करेल ह्याची वाट पाहत राहण्या पेक्षा आपल्या प्रयत्नांनी ते संकट दूर करण्याचे प्रयत्न करून स्वतः कृष्ण बनता आलं पाहिजे..
जगेन मी कृष्ण बनुनी
राधेचा सखा होऊन
गोपिकांचा बालगोपाल..
यशोधेचा नंदलाल..
होऊनी मित्र सुदाम्याचा..
आधार बनू आपल्या सख्याचा..
रुक्मिणी चा होऊनी नाथ..
सोबत करू देऊ निरंतर साथ..
बनुनी प्रद्युमनाचा पिता..
मार्ग दाखवू सर्वथा..
पांडवांचा होऊनी कैवारी..
दूर करू कौरवी दूर विचारी..
कुण्या द्रौपदीचा होऊनी सखा..
देऊ विश्वास रक्षणाचा..
अर्जुनाचा होऊनी सारथी..
घेऊनी सुदर्शन हाती..
आपणच होऊन आपले मुरारी
मारून टाकू सारे दूर विचारी…
होऊनी कृष्णमय..
मिरवू आनंद निरामय…
टीप – सोनी लीव्ह वरती लालो नावाचा सिनेमा पाहिला आणि कृष्णप्रेमाने मन भरून आल.. कृष्ण प्रेमीनी आवर्जून बघावा असा मूव्ही आहे नक्की बघा…)
युद्ध हा शब्द आपण रामायण महाभारत हे वाचताना ऐकला यावरचे सिनेमे त्याच्या सिरीयल पाहताना ते पाहायला खूप मजा येत होती. रावणाची 10 तोंड बाणाने कापली जात असताना लहानपणी छान वाटायचं… मग बिभीषण सांगायचा नेमका बाण कुठे मारायचा आहे… मग रावण मरायचा… रामाचा विजय… रावणाचा अंत्यविधी… त्याला रामाची उपस्थिती… आणि मग सितेला घेऊन रामाचे परतणे…!
तसंच महाभारतामध्ये कुरुक्षेत्रावर झालेले युद्ध. सख्खे आणि चुलत यांचं… श्रीकृष्णाने सांगितलेली गीता… कुरुक्षेत्रावरती असलेल्या व्यवस्था… म्हणजे उद्या सैन्याचा किती सैनिकांचा स्वयंपाक करायचा किती मेले आहेत… किती उरले आहेत… हे श्रीकृष्ण खात असलेल्या शेंगाच्या टरफलावरून ठरत असे… आणि तितक्या लोकांचा स्वयंपाक युद्धभूमीवर व्हायचा… ह्या सगळ्या रंजक कथा वाचून कमाल वाटायची.
मी सातवीत असताना हिंदी प्रवीण परीक्षेला बसले होते. खरं तर ती परीक्षा बीए समकक्ष होती आणि मी फक्त सातवीत. त्यात अभ्यासाला एक पुस्तक होतं ‘भारत दर्शन ‘आणि त्यात काही लेख होते त्यातला कुरुक्षेत्रावरचा एक शेवटचा लेख होता त्यामध्ये मरताना दुर्योधन युधिष्ठराला म्हणतो “युधिष्ठिर मै तो विरोंको साथ लेकर स्वर्ग जा रहा हूं तुम विधवाओंको लेकर राज करो”*हे वाक्य संदर्भा सहित स्पष्टीकरण.. चार मार्क इतकाच अभ्यास केला… पण त्या वाक्याचा खरा अर्थ मोठ झाल्यावर कळायला लागला… की अरे खरंच युद्धामध्ये सर्वात जास्त नुकसान कोणाच होत असेल तर ते स्त्रियांचं होतं. पुरुष सगळे सैनिक… ते युद्धभूमीवर मरतात तो मरणारा माणूस कोणाचातरी भाऊ असतो, कुणाचा तरी मुलगा असतो, कुणाचा तरी बाप असतो, कुणाचा तरी नवरा असतो, आणि या सगळ्या बायकांची म्हणजे आई मुलगी बायको या सगळ्यांची यानंतर परवड होते म्हणजे सर्वात जास्त नुकसान स्त्रियांचं होतं… त्यांना वैधव्य घेऊन बिनआधाराचे जगावे लागते आणि ते खरोखर कठीण होते… आणि तो विजय पांडवांच्या हातात येताना सुद्धा त्याला कारुण्याची केवढी झालर होती हे आपल्या लक्षात येईल. पांडव कोणावर राज्य करणार होते? … पुरुष तर सगळे मेले होते ना युद्धात…! ही ही सगळी त्याकाळी होणारी जमिनीवरची युद्ध त्या युद्धाला नियम होते. सामान्य माणसाला त्याची झळ फक्त या पद्धतीने लागत होती मालमत्तेचं नुकसान नव्हतं आताची युद्धं वेगळी आहेत पण कारणं तीच आहेत.. सत्ता…! माझ्या हातात सत्ता असायला हवी. आपल्या भूभागापलीकडे जाऊन मला सत्ता हवी आहे. आणि तो भूभाग मला काबीज करायचा आहे. तेच कारण आहे… तेल साठ्यांचा भूभाग आपल्या ताब्यात कसा येईल यासाठी प्रयत्न…! यामध्ये भारत मात्र चतुर आहे. एकीकडे विरोधी पक्ष हाकाटी पिटत आहे की भारताने कोणाची तरी बाजू घ्यावी नरेंद्र मोदी सारखा हुशार पंतप्रधान त्यांनी कोणाची बाजू घेणे पसंत केले नाही पण आपणच युद्धात मध्यस्थी केली पाहिजे अशी परिस्थिती मात्र फार पूर्वीपासून त्यांनी तयार केली आहे चाबहार(चारबहार) बंदर
विकसित करून भारताने त्या ठिकाणी मोठे काम केले आहे त्यामुळे हा भौगोलिक प्रदेश तेल साठे उपलब्ध करून देण्याला अत्यंत उपयुक्त आहे तो विकसित करून देण्याची ताकद भारतीय इंजिनियर्स मध्ये आहे त्यामुळे इराणला आपल्या विरोधात जाऊन चालणार नाही तसेच ट्रम्प साहेबांना सुद्धा युद्धामध्ये तेल साठ्यावरती आक्रमण करायचे नाही. कारण ते संपले तर युद्धाचे कारण संपेल तेव्हा यातील काही बेटांवर येथे तेल साठे मोठ्या प्रमाणावर उपलब्ध आहेत ती बेटे सुरक्षित आहेत.! … कालच बातमी आपण वाचली की रिलायन्स कंपनीने तेला साठ्याबद्दल मोठा सौदा केला आहे वगैरे वगैरे… हे काय आज ठरलेलं नसतं अनेक वर्षापासून याची योजना झालेली असते ते साठे आपल्या वर्चस्वाखाली कसे येतील याची तरतूद मोदी सरकारने आधीच करून ठेवली त्यामुळे आता मध्यस्थिला जर बोलावलं गेलं तर ते फक्त मोदींना बोलवलं जाईल आणि युद्ध थांबेल. युद्ध भौगोलिक कारणाने सुरू होते त्याने इतिहास घडतो, बदलतो, सत्ता पालट होऊ शकतो, याचा नेमका फायदा कसा उठवायचा याचे ज्याला सूत्र कळाले तो त्या युद्धात न पडताही त्यावर वर्चस्व गाजवतो.
भारतासारख्या शांतता प्रिय राष्ट्राला युद्ध नकोच आहे.. कुणाचेच नकोय! कारण आम्ही बुद्धाला मानणारे लोक आहोत कोणत्याही देशातल्या शाळेतली मुलं एखाद्या बॉम्बने मृत्युमुखी पडणं या बातमीने आमच्या देशातला प्रत्येक नागरिक अस्वस्थ होतो. युद्धात अपरिमित हानी होते ती महिलांची आणि मुलांची परवा तर मी एक व्हिडिओ पाहिला आजूबाजूला मोठ्या प्रमाणात बॉम्ब चे गोळे पडत होते. अंगाला तोंडाला काळ लागलेल आहे पडल्यामुळे काहीतरी थोड्याशा जखमा झाल्यात असा एक छोटा मुलगा जो पाठीमागे होत असलेल्या बॉम्ब च्या आवाजाने भयभीत झालेला आहे आणि तो हात हलवून सांगत होता” प्लीज स्टॉप इट प्लीज स्टॉप इट “… त्याच्या चेहऱ्यावरचे भय पाहून डोळे पाणावले. तसेचयुक्रेंनच्या युद्धाच्या वेळी सुद्धा तेथील मुलांना सुरक्षितपणे हलवत होते तेव्हा एक मुलगी अगदी पाच सहा वर्षाची बापाला सोडून जायला तयार नव्हती आणि ते दोघे इतके धाय मोकलून रडत होते. त्यांच ते दूर जाणं बघून पोटात अक्षरशा कालवत होत..! काय मिळवणार आहोत जमिनीच्या तुकड्यावर सत्ता साधून..? हे सत्तेची अभिलाषा असणाऱ्यांनाच ठाऊक पण दुनियेतल्या सगळ्या दुःखाची जाणीव झाल्यानंतर शांततेच्या शोधात फिरलेल्या बुद्धांनी जी शिकवण आम्हाला दिलेली आहे त्यामुळे आपण भारतीय लोक युद्धापेक्षा शांती पसंत करतात परवाच्या ऑपरेशन सिंदूर मध्ये आम्ही फक्त जो संदेश द्यायचा होता तो दिला वास्तविक पाहता पाकिस्तान बरोबर दोन हात करून त्याला नेस्तनाबूत करणे इतकी ताकद भारताकडे नक्कीच आहे पण आपल्याकडे एक मंत्र आहे फुत्कारो लेकिन काटो नही आम्हाला कोणालाही बेचिराख करायचे नाही त्या देशातल्या निरपराध सामान्य माणसाला काहीच करायचे नव्हते तुम्ही तुमच्या देशात सुखाने नांदा आम्ही आमच्या देशात पण… पण जर काही कराल तर मात्र सोडणार नाही हे नुसत्या फुत्कारण्यावरून आम्ही दाखवून देतो आमच्यासमोर उदाहरण असतं… सगळं जग जिंकल्यानंतरही मोकळ्या हाताने परत जाणाऱ्या नेपोलियनचे… आणि प्रेतांचे खच पाहून अस्वस्थ झालेल्या सम्राट अशोकाचे… म्हणून आम्हाला भारताला युद्ध नकोच आहे. आम्हाला फक्त बुद्ध हवा आहे! शांततेचा संदेश देणारा… स्थिर जीवनाची शाश्वती देणारा… निसर्गाला जपायला सांगणारा. आणि युद्धभूमी वरती ही गीता सांगणारा कृष्ण.. आम्ही आजही पसंत करतो आणि मला वाटते हेच आम्हा भारतीयांच्या संतोषकारक समाधानाच्या जीवनाचे रहस्य असावे…!
टीप :वरील लेख खूप अभ्यासाचा नाहीच आहे मला नेमकं काय वाटलं त्याचा आहे त्या दृष्टिकोनातून याचे मूल्यमापन करावे.
“Graceful, durable old furniture आणि New fashionable furniture ची सांगड घालून घर सजवू या. ”
काल छायाचा फोन आला. इकडच्या तिकडच्या गप्पा झाल्यावर मला तिने विचारले, “मागच्या वर्षी तुझ्या नेहाचे लग्न झाले ना. तुमच्या काय अपेक्षा होत्या ग?? नेहाच्या काय अटी होत्या?? “
मी म्हंटले, “काय ग?? काय झाले आज?? अचानक हा प्रश्न कुठुन डोक्यात आला?? असं का विचारते आहेस?? “
छाया म्हणाली, “अग!! यावर्षी अजयचे लग्न करायचा विचार आहे. एका विवाह संस्थेत नाव नोंदवले होते. काही मुलींची नावे शॉर्टलिस्ट केली आहेत. मुलींकडच्यांचे फोन पण येत आहेतच. मला तर हे खूप कठीण काम वाटतंय ग. कसं करावं की मुलींची पण dignity राहिल, व सर्व दृष्टीने समाधान होईल. खूप जास्त मोठ्या अपेक्षा नाहीत आमच्या, आपल्या सारखीच असावी. एकदा वाटतं मुलीला आधी आम्ही बघून, मग अजयने बघावी का? एकदा वाटतं, आधी अजयनेच बघावी, तिच्याशी बोलावे, भेटावे व नंतर जर गोष्टी पूढे गेल्या तर मग पूढच्या गोष्टी कराव्यात. “
छाया पुढे म्हणाली, “मला वाटलं तुझ्याशी थोडं बोलावं म्हणजे, माझे विचार थोडे स्पष्ट होतील. तुला मुलीच्या आईचा अनुभव आहे ना. तेंव्हा मुलीकडे कसा आणि काय विचार करतात हे कळेल. खूप अपेक्षा असतात का ग?? आजकाल म्हणे मुली आधी मुलाचे पॅकेज किती?? व प्रोपर्टी किती आहे?? हेच बघतात. खरं आहे का?? “
मी म्हंटले, “खरं सांगू का?? अग! प्रत्त्येक घर वेगळं असतं. अग! आपली मुलगी आनंदी रहावी यापेक्षा दुसरे काय हवं असतं ग?? आम्ही नेहाला पहिल्या पासून हेच सांगत आलो, की लग्न झाल्यावर दोनाचे चार हात होतात. तेंव्हा दोघे मिळून खूप कमवू शकता. मुलगा चांगला पाहिजे व घरचे अन्य सदस्य पण महत्वाचे असतातच. पैशापेक्षा माणसं महत्वाची.
मला अस वाटते, आधी तुम्हीच बघा. घरदार बघून बरंच लक्षात येतं. चौकशी करा. एखादी चांगली फॅमिली, म्हणजे तुमचे, त्यांचे विचार जुळत असतील तर, दोन्ही कडील पूर्ण फॅमिलीने दोन तिनदा भेटण्यास काही हरकत नाही. गप्पांमध्ये बरेच कळते. तुमचे विचार, अपेक्षा, परिस्थिती, त्यांच्या घरचे सणवार लक्षात येतात.
आजकाल मुली शिकलेल्या असतात, त्यांना डायरेक्ट प्रश्न विचारणे बरोबर वाटत नाही. तेंव्हा अशा भेटीत सर्व प्रश्नांची उत्तरे सहज मिळतात. बोलताना त्यांचा विचारांचा कल कळतो. व्यक्तिमत्त्वाचा अंदाज येतो. जीवनाकडे बघायचा दृष्टिकोन कळतो. चांगले होमवर्क करून जा, म्हणजे बोलण्यात कोणते विषय काढायचे??? याची तयारी होईल.
सध्याची परिस्थीती म्हणजे, समाजात सध्या चालू असलेली प्रथा बदलायला हवी आहे. मुलींचे विचारही सध्या वेगळ्या दिशेने जात आहेत. घरातील माणसांपेक्षा घरातील वस्तूं जास्त महत्त्वाच्या वाटतायेत.
आजकाल मुलांचे आई-वडीलही आधीच माघार घेतात. आधीच ठरवून मोकळे होतात. आधीच असे दाखवतात की लग्न झाल्यावर वेगळे राहणेच बरं राहील. व त्याअर्थाचे वक्तव्य देतात. तयारी करतात. हा शेवटचा option असावा. “
“मुलाला मुलगी पसंत पडली की, तिने अजयला नीट साथ द्यावी. बस, एवढीच अपेक्षा आहे आमची. बाकी आमची काही अपेक्षा नाही. आमचा भार आमच्या मुलावर नाही. ते वेगळे राहिले तरी चालेल, वगैरे वगैरे बोलून मोकळे होतात. आधी पासून असे सिग्नल आपल्या बोलण्यातून द्यायची काय गरज?? त्यापेक्षा आम्हाला सून मुलीच्या रुपात हवी आहे, घराला सांभाळणारी, आमच्यात मिळुन मिसळून राहणारी. तिच्या नोकरी करण्याला आमचे बंधन नसेल. दोघांना दोन्ही घरचा आधार असणारच आहे. दोन्ही घरी अडीअडचणी ला ही मुलं असतीलच.
लग्न म्हणजे दोन्ही घरचा नेहमीचा संबंध असायला हवा. दोन्ही घरच्या सुख दुःखात एकमेकांची साथ हवी.
अहो! एकाच घरच्या दोन भावांची घरे वेगळी असतात. कारण दोन्ही घरच्या बायका वेगवेगळ्या घरातुन येतात ना म्हणून. आपल्या बाबतीत तर आपण अगदी दोन वेगळ्या फॅमिलीज आहोत. तेंव्हा फरक असणारच आहे. तुमच्या आणि आमच्या काही चांगल्या पद्धती मिळुन नवीन काही चांगल्या पध्दती दोन्ही घरात सुरू होतील. नक्कीच चांगले होईल. आणि घाई कशाचीच नाही. adjust व्हायला थोडा वेळ लागेल एवढंच. ‘ अशा अर्थाचे बोलणे जास्त चांगले व positive वातावरण निर्माण करेल.
मुलगा लग्न झाल्यावर आपला रहात नाही असा विचारच करायचा नाही. मी छायाला म्हंटलं, “तू आपल्या सूनेबद्दल जे चित्र मनात रेखाटलं आहे ते तसंच व्हायला तुम्हाला प्रयत्न करावा लागेल. हे बघ आरामदायी म्हातारपण हवे असेल तर एकत्र राहणं तुमच्या करिता चांगलेच आहे व नोकरी करणाऱ्या सूनेकरिता पण ते सोईस्करच असणार आहे. दोन पीढी एकत्र रहायचे म्हणजे सोपं गणित नाही. तडजोड करावीच लागणार आहे. कारण जनरेशन गॅप एवढा मोठा आहे की सर्वांचे सर्वांना सर्व पटेल हे शक्यच नाही.
अग! पस्तीस वर्षे झाली आम्हा दोघांना बरोबर राहून. तरी प्रत्त्येक गोष्टी वर एकमत असतंच असं नाही. पण आपल्या माणसांसाठी तडजोड केली तर काय हरकत आहे?? नोकरी करणारी सून पाहिजे तर तडजोड जास्तच करावी लागेल. स्पष्ट व गोड बोलून सर्व सहज शक्य होऊ शकतं. मनातल्या मनात धूसफूस, भुणभुण करणे, बाहेरच्या लोकांना घरातील गोष्टी सांगण्यापेक्षा घरातील लोकांशी स्पष्ट बोलून मार्ग काढणे जास्त चांगले नाही का?? त्यामुळे कान भरणे हा प्रकार होणारच नाही.
सून म्हणजे, तुझ्या एवढाच तिचा पण मान या घरात असायला हवा आहे. ती तुमची पुढची पिढी आहे. तुझ्या लाडक्याची अर्धांगिनी आहे. मुलगा तेवढा माझा, मग सून तुझी नाही का?? हा दूजाभाव नको.
अजयला नुसता खोकला झाला तरी तू काळजी करते, तेवढेच प्रेम आपल्या सूनेवरही करायचे. आपण आपल्या कडून पूढाकार घ्यायचा. सूनेला आपलं मानणे व ते आपल्या कृतीतून दाखविणे ही या नात्याची सर्वात महत्त्वाची व आवश्यक पहिली पायरी आहे.
माझी आजी म्हणायची, मुलगा तर माझा आहेच. सूनेला आपलसं करण्यासाठी मी नेहमीच प्रयत्न करते. तिच्या घरच्यांचा मान ठेवते. शेतावरून आंबे आले, धान्य आले की आधी त्यातले थोडे तरी मी सूनेच्या माहेरी नक्की पाठवते. सूनेचा वाढदिवस मी आठवणीने साजरा करते. हे असे प्रसंग नातं घट्ट करतात.
माझा मुलगा आता फक्त माझा नाही त्याच्यावर माझ्या इतकाच हक्क असणारी त्यांची बायको ही आहे, हे सत्य पचले पाहिजे. आता सूनेचे माहेर ही माझ्या मुलाची extended फॅमिली असणार आहे. हे ही सत्य पचले पाहिजे.
मन मोठ्ठं व मोकळं ठेवावे लागेल. लहान सहान गोष्टींवर दुर्लक्ष करणे, प्रतिक्रिया न देणे, body language वर लक्ष देणे हे प्रयत्नपुर्वक शिकावे लागेल.
सूनेच्या नावाने बोंब मारणे, सर्वात सोप्पे काम आहे. पण त्यात आपण आपले कर्तव्य व्यवस्थित पार पाडण्यात कमी पडलो का?? हाही अर्थ निघतोच. तेंव्हा home work खूप करायचे आहे.
Ego, पैसा, practical approach, प्रतिष्ठा, formal relations, चढाओढ, शोबाजी, property, माणसांपेक्षा पैसा जास्त महत्त्वाचा, ही समज या सध्याच्या परिस्थितीत हावी आहे. या पेक्षा प्रेम, संबंध, आत्मियता, एकमेकांची काळजी, आधार, समाधान या जास्त महत्वाच्या गोष्टी आहेत हे पुन्हा एकदा समाजात युवा मंडळीला समजावयाची गरज आहे. सुरवात करायला हवी आहे. वेळ लागेल, उशिरा का होईना पण परीणाम नक्की दिसतील.
पैसा व माणसं हे दोन्ही आयुष्यात महत्वाचे व आवश्यक आहेत पण त्याचा बॅलन्स सांभाळता आला पाहिजे.
कुठे थांबायचे??? हे प्रत्येकाला प्रत्त्येक क्षेत्रात नेहमी समजलंच पाहिजे. मग ते प्रकृतीवर अतिक्रमण असो किंवा पैशामागे धावणे असो. जूनी पीढी असो नाही तर नवीन पिढी असो.
आपली पीढी म्हणजे नवीन व जून्या पद्धती रितीरिवाज, संस्कार यांना जोडणारा ब्रिज आहे व त्यामधून मार्ग काढायला आपण शिकलो आहोत. अनेक challenges बघीतले आहेत, झेलले आहेत, व यशस्वीपणे पार केले आहेत. आता हे challenge ही सफलतेने पार पाडू या. नवीन वाहणाऱ्या वाऱ्याची दिशा बदलायचा प्रयत्न करू या. विचारांचे नातं इतकं घट्ट करूया की मतभेद पण हसत हसत स्विकारायला शिकूया. Graceful, durable old furniture व New fashionable furniture ची सांगड घालून पुन्हा एकदा घर सजवू या.
सामान्य जीवन जगणे हे खरंतर प्रत्येकाकरिता व त्याच्या कुटुंबीयांकरिता असामान्य व आनंददायी गोष्ट असते.
सुनेला पारखायचा नाही, समजायचा प्रयत्न करावा. म्हणतात ना, ‘रिश्ते बरकरार रखने के लिए एकही शर्त है, किसी की कमियां नहीं, अच्छाइयां देखें। ईश्वर तो सिर्फ मिलाने का काम करता हैं। संबंधों में नजदीकियां और दूरियां बढ़ाने का काम तो इन्सानही करता हैं।’
“अगं मग तू बोललीसच तशी! दसऱ्याला जसं सीमोल्लंघन करतात तसं पाडव्याला काय स्वर्गारोहण करतात की काय? “
“अहो नीट ऐकून तर घ्याल किनई, का लगेच सुतांवरून स्वर्ग गाठाल? “
“अगं मी कुठे स्वर्ग गाठायला चाललोय? तूच म्हणालीस नां, की आपण या पाडव्याला स्वर्गात जाऊ या म्हणून? “
“अहो हा स्वर्ग म्हणजे एक ग्रॅम सोन्याच्या दागिन्यांची शो रूम! “
“अगं मग असं सविस्तर सांग नां, मला कसं माहित असणार तुझ्या डोक्यात कुठला स्वर्ग आहे ते? पण तिथून तुला काय घ्यायच आहे ते नाही बोललीस. “
“अहो आता मला प्रत्येक पाडव्याला नवीन साडी वगैरे नकोय. अजून पाच सहा कोऱ्या साडया तशाच पडल्येत! “
“पण त्या साडया काय तुला ‘इधर का माल उधर! ‘ करण्यात कधीतरी कामाला येतीलच नां? “
“म्हणजे? “
“अगं म्हणजे एखादी मिळालेली साडी आवडली नाही, तर तोंड दाबून बुक्क्याचा मार खाल्ल्यागत तुम्ही बायका ती ठेवून घेताच की नाही? “
“मग तोंडावर कसं बरं सांगणार आवडली नाही म्हणून? ते बरं दिसत का? “
“हो ना, मग तीच साडी कधी ना कधी तरी दुसऱ्या बाईला देता नां, त्यालाच मी ‘इधर का माल… ‘
“कळलं, कळलं! आम्हां बायकांचं ते ट्रेड सिक्रेट आहे! “
“यात कसलं आलंय सिक्रेट, ओपन सिक्रेट म्हणं हवं तर! बरं ते जाऊ दे, तुला त्या स्वर्गाच्या शो रूममधे कशाला जायचय ते नाही कळलं. “
“मला ‘ठुशी’ घ्यायची आहे! सासूबाईंनी त्यांची खरी ‘ठुशी’ मोठ्या जाऊबाईंना दिली, तेंव्हा पासून माझ्या डोक्यात निदान एक ग्रॅमची ‘ठुशी’ घ्यायच फारच मनांत आहे. “
“अगं पण तुला आईनं, वहिनीला दिलेल्या ठुशीच्या बदल्यात तिचा ‘घपला हार’ दिला ना, मग? “
“अहो त्याला ‘घपला हार’ नाही ‘चपला हार’ म्हणतात! “
“तेच ते, अगं पण मी काय म्हणतो आपण तुला एक ग्रॅमची खोटी खोटी ‘ठुशी’ कशाला घ्यायची? आपण त्यापेक्षा वा. ह. पे. कडून किंवा पु. ना. गा. कडून खरी सोन्याची ‘ठुशी’ घेऊ या की? “
“नको गं बाई, हल्ली खरे दागिने घालायची सोय कुठे राहील्ये? सगळ्या बायकांचे सगळे खरे दागिने लॉकरची शोभा वाढवताहेत झालं. “
“मग माझ्या डोक्यात एक नाही दोन वस्तू आहेत, ज्या नुकत्याच बाजारात नव्याने आल्येत. त्या नवीन आणि इनोव्हेटिव्ह असल्यामुळे खूप म्हणजे खूपच महाग आहेत, त्या घेऊ या का? “
“अगं बाई, त्या आणि कुठल्या? “
“प्रेशर कुकर आणि… “
“काय s s s? “
“अगं किती जोरात ओरडलीस? शेजारी पाजारी बघायला येतील ना? “
“अहो तुम्ही बोललातच तसं! प्रेशर कुकर काय बाजारात नवीन आलेली वस्तू आहे? गेली कित्येक वर्ष मी वेग वेगळे कुकर वापरत्ये. “
“अगं खरंच सांगतो, हा प्रेशर कुकर बोलणारा आहे, जो नुकताच नवीन आलाय बाजारात! “
“काय सांगताय काय? “
“अगं खरं तेच सांगतोय, या कुकर मधे ना शिट्याच होत नाहीत! “
“मग कळणार कसं कुकर झाला आहे का नाही ते? “
“अगं जरा नीट ऐक. मी तुला म्हटलं ना, की हा बोलणारा कुकर आहे म्हणून, मग त्याच्यात शिट्या कशा होतील? तुला किती शिट्या हव्येत त्यावर तो सेट करायचा आणि गॅस चालू करायचा! “
“बरं, मग? “
“मग त्यातून थोडया थोडया वेळाने one, two, three असे आवाज येतील, त्यावरून तुला कळेल की कुकरच्या किती शिट्या झाल्येत त्या. “
“अस्स होय! मग बरंच आहे, सिरीयल बघायच्या नादात मला मेलीला कळतच नाही किती शिट्या झाल्येत त्या! चालेल मला, आपण तो बोलणारा कुकर घेऊयाच. ते ठुशी बिशीच जाऊ दे, पुन्हा कधी तरी बघू! “
“Ok, मग उद्याच जाऊन बोलणारा कुकर घेऊन येवू, काय? “
“हो चालेल, पण तुम्ही दुसरी वस्तू पण म्हणाला होतात, ती कुठली? “
“आहे, म्हणजे तुझ्या लक्षात आहे मी दोन वस्तू म्हटल्याचे. “
“म्हणजे काय? आम्हां बायकांची मेमरी तशी पुरुषांपेक्षा बरी असते असं म्हणतात! “
“असं कोण म्हणत? “
“आम्ही बायकाच! “
“अगदी बरोबर, पण ती फक्त तुम्हाला हव्या असलेल्या खरेदीच्या बाबतीतच बरं का! बाकी सगळा उजेडच म्हणायचा. “
“कळलं, कळलं! मला पण तुम्ही म्हणालात तसा सणा सुदीला वाद नकोय, ती दुसरी वस्तू काय आहे ना, ती बोला चटचट, मला अजून बरीच कामं पडल्येत! “
“अगं त्या दुसऱ्या नवीन वस्तूच तू नांव ऐकलंस ना, तर नाचायलाच लागशील बघ! “
“नाच करायचा कां आनंदाने गायचं ते नंतर बघू, पटकन त्याच नांव… “
“रिमोट कंट्रोलची गॅस शेगडी! “
“का s s य? “
“अगं आपल्या टीव्हीला कसा रिमोट कंट्रोल असतो ना, तसाच या गॅसच्या शेगडीला पण असतो. बसल्या जागेवरून तू गॅस चालू किंवा बंद करू शकतेस. बोल कशा काय आहेत या दोन नवीन वस्तू! “
“झ ss का ss स ss! आता सिरीयल सोडून मधेच उठायला नको गॅस बंद करायला! “
एवढं बोलून बायको किचन मधे पळाली आणि मी… खरी सोन्याची ठुशी परवडली असती, पण या दोन नवीन, त्याहून महागडया वस्तू घ्यायचे कबूल करून, स्वतःच्या पायावर धोंडा तर मारून नाही ना घेतला, या विचारात पाडव्याला आडवा पडलो!