(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो जीना है नहीं जीना…“)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “युगांतर.. ” ।)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – राय अपनी अपनी…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “चुस्कियाँ… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆
लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
सतीश और भीम लंबे अरसे के बाद मिले। दोनों ठेकेदार थे। पानी की लाइन डालना, सड़क बनाना और भी सरकार के निर्माण कार्य दोनों ही करते थे। संबंध मधुर थे पर व्यवसाय में कड़ा मुकाबला और गोपनीयता थी। कई बार सुरेश के ऊंची दर वाले टेंडर को अनुभव या किसी अन्य तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया जाता और कम दर होने पर भीम का टेंडर स्वीकार हो जाता।
लेकिन दोनों में से किसी ने कभी यह जिक्र नहीं किया कि ऐसा कैसे हो जाता है। सतीश को अखरता तो टेंडर पास होते समय भीम की आंखें झुक जाती थी। हृदय में जो कुछ हो उसे आंखों से कोई समझले तो समझले पर शब्दों में नहीं आ पाता।
अब दोनों ही वृद्ध हो गए हैं और ठेकेदारी भी छोड़ चुके हैं। दोनों चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं। न सतीश के चेहरे पर अखराव के भाव हैं और न ही भीम की आंखें झुकी हुई हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अशोक अर्जुन…“।)
अभी अभी # ९४६ ⇒ आलेख – अशोक अर्जुन श्री प्रदीप शर्मा
आज हम करन अर्जुन की नहीं, अशोक और अर्जुन की बात करेंगे। हमारे अशोक भी कोई साधारण पुरुष नहीं, मौर्य वंश के सम्राट अशोक हैं। कर्ण और अर्जुन तो समकालीन थे, दोनों कुन्ती पुत्र और भाई भाई थे, लेकिन कर्ण सूत पुत्र कहलाया।
कर्ण और अर्जुन की कथा में बहुत अगर मगर हैं। अगर कर्ण और अर्जुन दोनों भाई एक हो जाते, तो शायद महाभारत ही नहीं होती। कर्ण श्रीकृष्ण की शरण में नहीं गया, उसने दुर्योधन की मित्रता में अपना सम्मान ढूंढा। अपमान और उपेक्षा अवसाद को जन्म देता है।
भले ही नियति ने कर्ण के साथ न्याय नहीं किया हो, उसके बल, पराक्रम और दानशीलता का लोहा सबने माना और वही कर्ण शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युञ्जय का मुख्य पात्र बना।।
भाई भाई तो खैर रावण और विभीषण भी थे। विभीषण भी जब अपने भाई से अपमानित हुए तो उनमें विषाद जागा, और वे प्रभु राम की शरण में गए।
होइहि वही जो राम रचि राखा। अतः यहां ज्यादा अगर मगर नहीं चलता।
लेकिन विभीषण के चरित्र पर कोई उपन्यास नहीं, और आचार्य चतुर सेन ने रावण के चरित्र पर वयं रक्षाम: लिख मारा। इतिहास जितना महत्व नायक को देता है, उतना खलनायकों को भी देता है।
श्रीकृष्ण की शरण में अर्जुन पूरी तरह तब गया जब कुरुक्षेत्र में उसका विषाद दूर हुआ और उसने लड़ने के लिए शस्त्र उठा लिए। अवसाद और विषाद में यही तो अंतर है। अवसाद और उपेक्षा कर्ण को दुर्योधन की ओर खींच ले जाता है, जब कि विषाद विरक्ति, वैराग्य उत्पन्न करता है तथा जो विभीषण को शरणागति की अवस्था में ले आता है।।
आइए अब हम अर्जुन से सम्राट अशोक की ओर रुख करें। दोनों ओर युद्ध है। अर्जुन के विषाद योग से ही श्री भगवद्गीता आरंभ होती है। श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के पश्चात् ही अर्जुन का मोहभंग होता है और वह धर्म की रक्षा के लिए कुरुक्षेत्र में शस्त्र उठा लेता है और धर्म की विजय होती है।
उधर कलिंग विजय के पश्चात् विजयोन्माद की जगह विजयी सम्राट अशोक को युद्ध की हिंसा और खून खराबे के कारण वही विरक्ति और विषाद उत्पन्न होता है जो अर्जुन को शस्त्र त्यागने के पश्चात् हुआ था, और विजयी अशोक बुद्ध की शरण में चला जाता है। एक जगह श्रीकृष्ण: शरणम् मम: है तो एक जगह बुद्धं शरणं गच्छामि।।
अर्जुन और अशोक के साथ अगर एक और शरणागति विभीषण को और ले लिया जाए तो द्वापर, त्रेता और तीनों कालों का निचोड़ हमारे सामने मौजूद है। राम, कृष्ण, बुद्ध, और महावीर से चलकर हम गांधी तक पहुंच ही जाते हैं। गांधी के बाद जब हमें शून्य नजर आता है तो हम फिर सनातन की ओर लौट चलते हैं। आज हम पंचशील और अहिंसा का गुणगान नहीं करते, शास्त्र और शस्त्र दोनों की बात करते हैं।
एक मजबूत लोकतंत्र के आधार पर ही आज हम पुनः रामराज्य का सपना देख सकते हैं। आज हमारे पास कई चाणक्य मौजूद हैं, बस भीष्म पितामह और महात्मा विदुर की कमी है।
सकारात्मक सोच और सार्थक संवाद दशा और दिशा दोनों प्रशस्त करे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कर्तव्य।)
आशा जी अपने एक बैग में किताबें भरकर जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ाते हुए ऑटो रिक्शा में बैठकर सिटी के बीच स्थित हिंदी लाइब्रेरी में पहुंच जाती हैं। जैसे ही वे गेट के अंदर जाती है, पक्षियों की चहचहाहट का मनोरम संगीत माहौल को खुशनुमा बना रहा था।
बाहर एक टेबल पर अखबार और तरह-तरह की मैगजीन रखी थी।
नगर के सभी वरिष्ठ नागरिक यहाँ पर आकर अखबार पढ़ते हैं और वे अपने बच्चों के अच्छे कपड़े, किताब, कॉपी, जैकेट एवं जूते सब यहाँ एक कोने में अलमारी में रख देते हैं जरूरतमंद अपने घर ले जाते हैं।
यह देखकर आशा जी को बहुत अच्छा लगा मन में एक प्रसन्नता हुई उन्होंने बाहर बैठे व्यक्ति से पूछा कि – “मैं भी कुछ दान करना चाहती हूँ, कहाँ रख सकती हूँ? पास बैठे व्यक्ति ने कहा कि “आप अंदर जाइए वहां पर एक बुजुर्ग दंपति बैठे हैं वह आपको सब बता देंगे।”
उसे सामने रिसेप्शन में बैठे सीनियर सिटीजन नजर आए ।
देखकर आशा ने कहा- “मैं कुछ किताबें यहाँ पर दान करने के लिए लाई हूँ लेकिन मैं क्या कुछ सामान भी लाकर यहाँ रख सकती हूँ?”
बुजुर्ग दंपति ने कहा- “बिल्कुल बहन आप यहाँ पर आकर पढ़ सकती हैं और सामान को दान दे सकते हैं।”
आशा जी ने कहा- “यहाँ पर मैं बैठकर अपने लेखन कार्य को अच्छे से कर सकती हूँ।”
आज मैंने एक बात समझी -“आप रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित करने का नेक कार्य भी कर सकती हैं।”
वृद्ध महिला ने कहा- “महिलाऍं बहुत संघर्ष से लेखन कार्य करती है इसलिए हम उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे लाइब्रेरी में कोई भी आ सकता है।”
आशा जी ने कहा – “अधिकार की बात सब करते हैं किन्तु, आपने एक मिसाल कायम की है। अपने कर्तव्य का समाज के प्रति निर्वाह किया है।”
बुजुर्ग दंपति और आशा जी दोनों मुस्कुराने लगते हैं आशा जी की ऑंखों में एक नई ऊर्जा और चमक आ जाती है।
प्रारब्धात कर्म व स्वीकार असेल तर ते नशिब आहे असं म्हंटल्यास अतिशयोक्ती ठरणार नाही.
नशीब स्वीकारण्यासाठी सुद्धा धैर्य व आत्मविश्वास लागतो यात २ भाग स्पष्ट आहेत.
पहिला अनुकूल व सकारात्मक परिस्थिती असेल तर नशीब हा भाग लक्षात येत नाही
नकारात्मक परिस्थिती असेल तर नशीबालाच दोष दिला जातो
दोन्ही ठिकाणी नशिबाचा भाग असतोच पण तो अहं त्या आवरणाखाली असतो.
पण जर जीवनाकडे तटस्थपणे पहाता आले तर सकारात्मक व नकारात्मक दोन्ही ही परिस्थिती एकाच जीवनाचा अविभाज्य घटक आहेत हे जाणवतं व संपूर्ण जीवन मात्र वेगळंच आहे हे लक्षात येतं. या क्षणी नशिब किंवा स्वकर्तव्य काय यावर विचारमंथन घडतं.
असे विचारमंथन घडले तर बाहेर पडणारे नकारात्मक विचार म्हणजेच मर्यादित अहं ची जाणीवच असतात व अमृत म्हणजे विस्तारित स्वयंची अनुभूती असते.
प्रारब्धातूनच आपल्याला ही जाणीव होऊ शकते हे लक्षात यायला हवं. प्रारब्ध आपल्या जीवनाचा नकाशा असतो प्रत्येक गोष्ट आपल्याच कर्माचे फळ असते म्हणून च वैयक्तिक अनुभव येतात हे सत्य स्वीकारले तरच तटस्थ भूमिकेतून स्वतः च्या आयुष्याचा अभ्यास करता येईल. म्हणून मिळालेले हे आयुष्य ही सुसंधी आहे हे समजायला जी बुद्धी लागते त्यासाठी विवेक आवश्यक आहे. दुसरे कुणीही यात बदल करु शकत नाही हे ही त्रिकालाबाधित सत्य आहे.
शिक्षक पूर्ण वर्गाला शिकवतात पण मोजकेच विद्यार्थी याचा खरा फायदा घेतात त्याप्रमाणे सद्गुरू आत्मकल्याणाचा मार्ग दाखवतात त्यांची महावाक्ये समजून घेणे हे सद्षिष्याचे लक्षण आहे. सनातन धर्मात गुरु शिष्य जोडीला म्हणूनच अनन्यसाधारण महत्त्व आहे.
सूर्यप्रकाश सर्वत्र असतो पण जो खिडकी बंद करेल त्याला तो प्रकाश अनुभवता येणार नाही व ज्याने खिडकी उघडली, त्याच्या घरातील अंधार राहूच शकणार नाही
तसेच प्रारब्धाचा आनंदाने व साक्षीभावाने स्वीकार करणे म्हणजे आपले नशीब आपण ठरवणे आहे , हा विवेक सद्गूरु व सद्संगाशिवाय शक्य नाही म्हणूनच
महाजनो येन गत स पंथ: ……..
आपले प्रारब्ध हे आपले नशिब ठरवण्याची शिडी आहे हे मात्र निश्चित!
मग आपण नशिबवान ठरायचे की करंटे हा आपलाच निर्णय नाही का?
भाऊ बामण गेल्याची बातमी समजली आणि क्षणात मी हताश झालो. काही केल्या डोळ्यातून बाहेर यायला तयारच होईना भाऊ बामण. तसाच डोळ्यांच्या पापणीत घट्ट रुतून बसलेला. कधी काळी त्यानं म्हंटलेला कानात अजूनही तोच आवाज, “तुज्या बापाच्या लग्नाचा आंतरपाट म्याच धरला अन तुजा बी म्याच! तुमच्या आज्ज्या-पंज्ज्या सकट सगळ्यांचं महाळ बी म्याच केलं, पण कधी तुमच्याकडून एक रुपया बी घेतलेला नाय!” माणसं म्हणायची, “झोपलेला देव जागा करण्याची हिम्मत फ़क्त पांडोबाच्या हलगीत अन भाऊ बामणाच्या घंटीतच आहे. ” भाऊ बामण नुसत्या गावाचा बामण नव्हता तर अख्ख्या पंचक्रोशीचा बामण होता. तांबडं फुटायच्या आधीच जाग यायची त्याला. अगोदर भाऊ बामण जागा व्हायचा मग जाग यायची गावाला. अंधारात गोठ्यातली रिकामी बादली घेऊन मंदिरापुढच्या आडावर हजर व्हायचा भाऊ बामण. राहाटावरून खाली बादली सोडून साखर झोपेत असलेलं पाणी शेंदायचा भाऊ बामण. कितीही कडाक्याची थंडी असो, पावसाची कितीही उभी धार असो, तरीही थंड पाण्याने गावात पहिली अंघोळ उरकायचा भाऊ बामण. कडाक्याच्या थंडीत उघड्या अंगावर दानवं घातलेला भाऊ बामण गावच्या देवळातली ठण-ठण आवाज घुमवत जेव्हा पहिली घंटा वाजवायचा, तेव्हा कुठे जाग यायची गावाला. माणसं म्हणायची, “गड्या भाऊ बामण उठला! पहाट झाली! उठा आता!”
गावात तशी बामणाची मोजून चार घरं. एकाच बुडक्यातली. एकाच रांगेत उभी. छोटीशी बामण गल्लीच. गावच्या प्रमुख मंदिरातील पूजा अर्चा यांच्याकडेच आळी पाळीने येई. कालमानानुसार यातील तीन घरे कायमची शहराकडे स्थलांतरित झाली. गावगाड्यात उरलेला भाऊ बामण मात्र गावाला चिकटून मागं राहिला. कशासाठी राहिला असेल? माहीत नाही. पण वडिलोपार्जित मिळालेल्या शेताच्या तुकड्यात आयुष्यभर तो राबला. नेमका कुणासाठी तो राबला असेल? माहीत नाही. त्यानं त्याचं अख्खं आयुष्य गावकी करण्यातच का घालवलं असेल? ते ही माहीत नाही.
भाऊ बामणानं सबंध आयुष्यात पायाला कधीही चप्पला घातल्या नाहीत. आयुष्यभर तो अनवाणी पायानं जमीन तुडवत आणि सायकलचं पायंडल मारीत राहिला. माणसं म्हणायची, “कोणताही विधी करावा तर भाऊनच!” घाई नाही की गडबड नाही. सगळं कसं त्याच्या हातून शांततेत पार पडणार. भाऊ बामणानं अख्ख्या पंचक्रोशीतील कित्येक पिढ्यांची लग्ने लावली. कित्येक घरात शांततेचे होमहवन पेटवले. कित्येकांचे अभिषेक घातले. कित्येक घरात सत्यनारायणाचे सकळ खंडाचे अध्याय वाचले. कित्येक घरांच्या कुंडल्या जुळवल्या. कित्येक घरांची साडेसाती घालवली. सत्यनारायणाची पूजा वाचताना त्याने एका विशिष्ट लयीत वाचलेली साधू वाण्याची कथा अजून माणसांच्या कानात तशीच घुमते. खरं खोटं माहित नाही पण अजून जुनी माणसं सांगतात, “भाऊ बामणाचा हात जर पिंडाला लागला नसेल तर कावळा सुद्धा शिवायचा नाही पिंडाला!”
बारशापासून ते चौदाव्या पर्यंतचे सर्वच कार्यक्रम अगदी यथासांग पार पाडायचा भाऊ बामण. पितृ पंधरावड्यात तर त्याची सायकल कधी थांबायचं नावच घ्यायची नाही. गावासोबत साऱ्या पंचक्रोशीत महाळ घालायच्या विधीचा मान हा भाऊ बामणालाच असणार. त्याशिवाय वाडवडील जेवले असं म्हणताच यायचं नाही. आता कदाचित तुम्हाला वाटेल की, भाऊ बामणानं त्याच्या आयुष्यात चिक्कार कमाई केली असेल. पण मंडळी, यातलं काहीच त्यानं केलं नाही. मिळेल त्या पसा-मूठ शिदोरीवर त्यानं आयुष्यभर गावगाड्यातली गावकी सांभाळली. मंदिराच्या दानपेटीत कधीही त्याच्या हाताची बोटे शिरली नाहीत की तिजोरीत असलेल्या देवीच्या जुन्या दागिन्यावर त्याची नजर रुतली नाही. की कधी त्याच्या बायकोच्या गळ्यातल्या काळ्या मण्यांचं, सोन्याच्या मण्यात रूपांतर झालं नाही. इतका प्रामाणिक आणि विश्वासू होता भाऊ बामण.
पण त्याचं दुर्दैव हे की भाऊ बामणाला फक्त पाच वर्षेच संसार लाभला. एका सकाळी आडावर धुणं धुवायला गेल्यावर पाणी शेंदताना त्याची बायको आडात पडली. आडावर ओरडून बायकांनी नुसता कल्लोळ उठवला. सगळं गाव आडाकडं पळत सुटलेलं. पण बिन पायऱ्याचा आड. कोणी उडी मारायचं धाडसच करेना. अखेर मातंगवाड्यात कोणीतरी पळत जाऊन निरोप दिला. क्षणाचाही विलंब न लावता पट्टीचा पोहणारा चंदू नाईक आडाच्या दिशेने धावत सुटला. त्याने आडात कपड्यासहीत उडी टाकली. काही वेळातच तळातून रहाटाच्या साखळीला बांधून भाऊ बामणाच्या बायकोचं प्रेत त्यानं वर काढलं. उशीर झाला होता. तिला वर काढल्यावर “आरं रं रं लई वाईट झालं गड्या! नांदनं कडंवर जायाला पायजे व्हूतं! बयो कशी ग घसरलीसं आडात! लेकरानं कुणाला गं आय म्हणून हाक मारावी आता!” म्हणत चंदू नाईक मुळातून हळहळला.
दिवस पुढे सरकले. भाऊ बामण हळूहळू या दु:खातून बाहेर आला. पण त्यानं दुसरं लग्न काही केलं नाही. त्याच्या आई वडिलांसोबत त्यानं लहान पोर वाढवलं. शिकवलं. पोरगं मोठं झाल्यावर ते कामधंद्यासाठी शहराकडे बाहेर पडलं. सगळं काही सुरळीत चालू होतं. पण हळूहळू पोरगं गावाला यायचं कमी झालं. भाऊ बामण गावाकडून पत्र पाठवायचा. सुरुवातीला उत्तर यायचं. पण नंतर-नंतर पत्राला उत्तर येईनासं झालं आणि अशातच एक दिवस गावात कोणी तरी बातमी आणली. ‘भाऊ बामणाच्या पोरानं तिकडंच कुठल्यातरी पोरीशी लग्न केलयं. ’ भाऊ बामणाच्या कानांवर ही बातमी पडली. खात्री करण्यासाठी एक दिवस भाऊ बामण शहराकडे जाऊन आला. माघारी आल्यावर पोराचा नवा संसार सुरळीत आणि सुखाचा चालू असल्याचं त्यानं गावाला सांगितलं. खरं खोटं काय ते भाऊलाच माहीत. काही दिवसातच गाव भाऊच्या पोराला विसरून कामाला लागलं…
… एक-दीड वर्षे उलटलं असेल. अचानक भाऊचा पोरगा मतदानाला म्हणून एकटाच गावाला आला. महिना झाला. दोन-महिने झाले तरी परत जाण्याचे काही नावच घेईना. गावात हळूहळू कुजबुज सुरू झाली. रिकामी डोकी वळवळू लागली. आणि कुठून तरी गावाला खरी बातमी समजली. भाऊ बामणाची सून त्याच्या पोराला घटस्फोट देऊन निघून गेलीय. भाऊनं हळूहळू माणसात उठणं बसणं बंद केलं. अन्न पाण्यावरची त्याची वासनाच उडाली. आजूबाजूच्या गावात जाणंही त्यानं बंद केलं. गावातलं विधीकार्यही त्यानं कमी केलं. काही महिन्यांनी भाऊचा पोरगा पुन्हा शहराकडे वळाला. पण पुन्हा काही तो गावाकडे परतला नाही.
काळ हळूहळू पुढे सरकत राहिला. दिवसामागून दिवस आणि वर्षामागून वर्षे संपत गेली. भाऊचे आई-वडीलही कधीच गेले होते. भाऊ बामणही म्हातारपणाकडे झुकला. मावळतीच्या सावल्या त्याच्या अंगावर कधी चढून बसल्या गावाला कळले सुद्धा नाही आणि एके दिवशी दिवस उगवायला भाऊ बामण गेल्याची बातमी गावभर पसरली. गावातले व्यवहार थांबले. नव्या दुकानांची उघडलेली शटरे पुन्हा झाकली गेली. भाऊ बामणाच्या पडक्या घरापुढं माणसांची तुडूंब गर्दी. माणसं हळहळली. जुन्या आठवणी काढू लागली. काही वेळाने तिरडीवर बांधलेल्या भाऊ बामणाचं प्रेत गावानं उचललं. रडायला जवळचं कोणी आलंच नाही. गावाचा शेवटचा बामण स्मशानात जळून राख झाला. एक वटवृक्ष कायमचा उन्मळून पडला…
… डोक्यात नुसता प्रश्नांचा भडीमार. काळासोबत जे बामण गावगाडा सोडून शहराकडे वळाले ते स्थिरस्थावर झाले. त्यांच्या पुढच्या पिढ्याचं घडलंही असेल आयुष्य? त्यांच्या पुढच्या पिढ्या शिकून गेल्याही असतील देश-विदेशात? भलेही त्यांनी मोठमोठे प्रबंध लिहिले असतीलही. पण त्यात भाऊ बामणासारख्यांना किती स्थान? मंडळी, गावासोबत गावकीला जोडून घेत जे गावगाड्यातल्या प्रथा परंपरा जपत राहिले त्या भाऊ बामणासारख्यांची नेमकी नोंद तरी कुठे? भले नव्या जागतिकीकरणात त्यांनी केलेल्या पूजा अर्चा, होमहवन निव्वळ अंधश्रद्धाही ठरतील? पण त्यांनी ज्या निष्ठेने त्या श्रद्धा जपल्या असतील त्याचं काय?
आयुष्यभर भाऊ बामणानं साऱ्या गावाचे विधी पार पाडले असतील. कित्येकांच्या नावाने पिंड तयार केले असतील. कित्येकांचे चौदावे पार पाडले असतील. पण त्याच्याच मृत्यूनंतर त्याचा स्वतःचा विधी करायला गावाला बामण उरलाच कुठे? अख्ख्या गावाच्या मंडवळ्या भाऊ बामणानं बांधल्या असतील पण स्वतःच्या लेका-सुनाच्या मंडवळ्या बांधण्याचं भाग्य त्याच्या नशिबी आलंच कुठे? मंडळी, हे त्याचं भाग्य म्हणायचं की दुर्भाग्य? मरून जाण्याआधी स्वतःच्या जमिनीची आणि घरादाराची मालकी त्याने पोराच्या नावावर करण्या ऐवजी गावाच्या मंदिर ट्रस्टीच्या नावे का केली असेल? आयुष्यभर त्याने कित्येकांच्या घरात शांततेचे होम पटवले असतील. तितकेच मंत्र म्हटले असतील. पण त्याच्या घरात शांतता नांदायला आलीच कुठे?
शेवटी, गावात आता पहाटेच्या वेळी “ठणsss ठणsss” वाजणारी घंटा नेहमीसारखी वाजत नसेल तेव्हा गावाला आणि मंदिरातल्या देवाला चुकल्या-चुकल्यासारखं वाटत असेल का? नव्या काळात पूजा आरत्या, होमहवन, पिंडदान हे सगळं कालबाह्य होईलही. पण हे सारं प्रामाणिकपणे आणि ज्या निष्ठेने त्यानं गावकीसाठी केलं म्हणून निदान त्याच्या आठवणी तरी कुणाच्या काळजात मागे उरतील का? की ऊठ सूठ आजूबाजूला बामणांना खच्चून शिव्या घालायच्या या नव्या जमान्यात तुम्हीही म्हणाल, “साला एक बामण मेलं म्हणून काय बिघडलं? देशात चिक्कार गर्दी बामणांची…!”
लेखक : ज्ञानदेव पोळ
प्रस्तुती : सुश्री प्रभा हर्षे
९८६०००६५९५
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈