हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४१ ⇒ पतिव्रता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पतिव्रता।)

?अभी अभी # १०४१ ⇒ आलेख – पतिव्रता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

००० पतिव्रता ०००

जो पत्नी अपने पति के लिए व्रत-उपवास रखे, वह पतिव्रता कहलाती है। ये पतिव्रताएं भारतवर्ष में बहुतायत से पाई जाती हैं। पति, देव भी है, और परमेश्वर भी। पत्नी केवल धर्म-पत्नी है। धर्म-पिता, धर्म-भाई और धर्म-बहन तो होते हैं, लेकिन धर्म-पति नहीं होते।

पति चूँकि परमेश्वर होते हैं, इसलिए वे व्रत-उपवास नहीं रखते! हड़ताली तीज और करवा चौथ की तरह पत्नी के लिए कोई भी व्रत-उपवास के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं। विवाह के वक्त सात फेरों में ही सात जन्मों का एडवांस बुकिंग हो जाता है। बहु-पत्नी होने पर सात जन्मों तक इन पत्नियों को बहुतायत से झेलना भी पड़ सकता है।।  

अक्सर पतिव्रताएं, अगले जनम मोहे यही पति दीजो, के लिए और पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, लेकिन अपने पति को भूखा नहीं रखती। पतिव्रता का यही त्याग रिज़र्व बैंक के गवर्नर की तरह अगले जन्म में उसी पति के लिए वचन-बद्ध होता है, लेकिन नोटबन्दी की तरह इस वचन में शिथिलता भी लाई जा सकती है।

आदतन सभी पतिव्रताएं धार्मिक ही होती हैं। लेकिन उनके पुण्य एक अलिखित विधान के तहत 50 प्रतिशत पतिदेव को ट्रांसफर हो जाते हैं। पति तो एक धार्मिक, सुशील पत्नी पाकर ही धन्य हो जाता है, जब कि एक पतिव्रता, जैसा भी है, मेरा पति देवता है, मानकर अपने जीवन को धन्य मान लेती है।।  

पत्नी को अन्नपूर्णा भी कहा गया है और गृह-लक्ष्मी भी! लेकिन यह अन्नपूर्णा अपने पति के भोजन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। दहेज में लक्ष्मी लाने के कारण ही वह लक्ष्मी कहलाती है और पति लक्ष्मी-पति होता है, स्वामी होता है, घर वाला होता है। पड़ोसियों की दृष्टि में ज़रूर वह उसकी घर-वाली होती है।

जब देश डिजिटल हो रहा है, तो पुरानी मान्यताएँ भी बदल रही हैं। पतिदेव भी आजकल धर्म-पत्नी के लिए व्रत-उपवास रखने लगे हैं। चाँद सी महबूबा के होते हुए वे क्यूँ पति-व्रताओं की देखादेखी करवा-चौथ के दिन चलनी की आड़ में चाँद को देख अपना व्रत तोड़ें।।  

21 वीं सदी साथ-साथ चलने की है। महिला सशक्तिकरण ने पति-व्रताओं के दायरे बढ़ा दिए हैं।

अब वह पति के चरणों की दासी नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सह-धर्मिणी हो गई है। अपनी मर्यादा में रहते हुए वह सभी कर्त्तव्यों का पालन भी कर लेती है और घर-गृहस्थी सुचारू रूप से चलाते हुए, तीज-व्रत-उपवासों का भी मनोयोग से पालन करते हुए, अपने जीवन को धन्य करती है।

यूँ ही नहीं कहा गया है!

तुमसे ही घर, घर कहलाया।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९३ ☆ हर मन माली बनकर जीने लगे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हर मन माली बनकर जीने लगे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९३ ☆

हर मन माली बनकर जीने लगे ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

चाहत मन की ज्योति, बढ़ेगी देखो कैसे।

उम्मीदों से प्रीत,जीतते हरदम जैसे।।

हरियाली की बात, करेगा  जब सब कोई।

सूखे को दें मात, देख धरती खुश होई।।

धरती को हरा-भरा बनाने का स्वप्न केवल वृक्षारोपण अभियानों से पूरा नहीं होगा; उसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मन माली बनकर जीना सीखे। माली होना केवल पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उनके साथ आत्मीय संबंध स्थापित करना है।

आज घरों में पौधे सजावट का हिस्सा बन गए हैं। वे ड्रॉइंग रूम, बालकनी और उद्यान की शोभा तो बढ़ाते हैं, पर अनेक बार हमारा संबंध उनसे वहीं तक सीमित रह जाता है। हम उन्हें वस्तु की तरह रखते हैं, परिवार के सदस्य की तरह नहीं। परिणामस्वरूप हरियाली का विस्तार नहीं, केवल प्रदर्शन बढ़ता है।

भारतीय संस्कृति ने वृक्षों और पौधों को सदैव जीवन का सहचर माना है। तुलसी, पीपल, वट, नीम और बेल जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे, बल्कि श्रद्धा, संरक्षण और सहअस्तित्व के प्रतीक बने। यह परंपरा हमें बताती है कि प्रकृति से जुड़ाव केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर संवेदना, धैर्य और करुणा का भी विकास करता है।

समय आ गया है कि हम पौधों को केवल सजावटी वस्तु नहीं, अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब किसी नए पत्ते के निकलने पर हमें उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी किसी अपने की मुस्कान पर होती है, तब हर घर सचमुच एक छोटा-सा उपवन बन जाएगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के माली को जागृत कर ले, तो हरियाली केवल बगीचों में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में भी दिखाई देगी। यही हरित चेतना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत सिद्ध होगी।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद।)

☆ आलेख – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

चापेकर बंधु महाराष्ट्र पुणे के निकट चिंचवड़ ग्राम के तीन सगे भाई थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांति की पहली चिंगारी जलाई थी। दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर, वासुदेव हरि चापेकर  तीनों ब्राह्मण परिवार में जन्मे सगे भाई थे। इनके पिता हरिपंत चापेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार तथा माता का नाम लक्ष्मीबाई था। तीनों भाई बचपन में पिता के साथ कीर्तन में सहभाग किया करते थे। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक इनके आदर्श थे। तिलक की प्रेरणा से इन भाइयों ने युवकों का ‘ व्यायाम मण्डल ‘ बनाया जिसमें 1894 ई० से हर वर्ष शिवाजी और गणेश महोत्सव प्रारम्भ किया। 12 जून 1897ई० में जब पहली बार शिवाजी उत्सव मनाया गया तो इन भाइयों ने बड़े ही उत्साह के साथ इसमें सहभाग किया। इन्होंने इस उत्सव में जो श्लोक गाए, उसका अर्थ था कि शिवाजी की गाथा दुहराने से आज़ादी नहीं मिल सकती। हमें तो शिवाजी और बाजीराव की भाँति कमर कसकर संघर्ष करना होगा, आज़ादी हित तलवार उठानी होगी। हम मारकर ही मरेंगे और आप लोग घर बैठे औरतों की तरह हमारी कहानी को सुनोगे। इसी प्रकार गणेश उत्सव पर इन भाइयों ने गाया, जिसका भाव था कि मर जाओ किन्तु पहले अँग्रेजों को मारो! चुप मत बैठो! पृथ्वी पर बोझ मत बढ़ाओ! हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है, फिर यहाँ अँग्रेज क्यों राज्य करते हैं? ये थी चापेकर बंधुओं की अँग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की ललकार।

दामोदर बचपन से ही सैनिक बनना चाहते थे इसलिए वे व्यायाम और सैन्य प्रशिक्षण में रुचि लेते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पुणे भारतीय राष्ट्रवाद का प्रमुख केन्द्र बन चुका था। अँग्रेजी शासन भारतीय जनता का आर्थिक दोहन कर रहा था, कुटीर उद्योग नष्ट होने लगे और बेरोजगारी बढ़ रही थी, भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव सामान्य बात थी। ब्रिटिश राज्य के खिलाफ दामोदर ने मुंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोतकर जूतों की माला पहनाई थी। वर्ष 1886 ई० के अंत में पुणे में ब्युबोनिक प्लेग फैला, जिसकी रोकथाम के लिए ब्रिटिश सरकार ने आईसीएस अधिकारी वाॅल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया। प्लेग नियंत्रण के नाम पर अँग्रेज अधिकारियों का बिना अनुमति के घरों में प्रवेश करना, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना, धार्मिक स्थलों का अपमान करना तथा लोगों की निजी सम्पत्ति को नष्ट करना आरम्भ कर दिया। तिलक ने ‘ केसरी ‘ समाचार पत्र में इसकी कड़ी आलोचना की, जिसके कारण उन्हें जेल हुई। चापेकर बंधुओं ने प्लेग के दौरान जनता की पीड़ा को निकट से देखा था। वे स्वयं प्रभावित परिवारों के सम्पर्क में आए और ब्रिटिश सैनिकों के दुर्व्यवहार के अनेक उदाहरणों के साक्षी बने थे इसलिए तीनों भाइयों ने विचार किया कि यदि ऐसे अत्याचारों का प्रतिरोध नहीं किया गया तो अँग्रेजी शासन और अधिक निरंकुश हो जाएगा, इसलिए इन्होंने अत्याचार के प्रतीक माने जाने वाले रैंड को दण्डित करने का निर्णय लिया। इन बंधुओं ने कई दिनों तक रैंड की गतिविधियों का अध्ययन किया तदन्तर 22 जून 1897 ई० को महारानी विक्टोरिया की 60वीं वर्षगाँठ के समारोह से लौटते समय दामोदर हरि चापेकर ने रैंड को और बालकृष्ण ने उसके सहायक लेफ्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मार दी। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई में पहला क्रांतिकारी धमाका था।

रैंड बध कांड ने ब्रिटिश प्रशासन की नींव हिला दी थी। आसपास के क्षेत्रों में तलाशी अभियान शुरू हुआ। इनाम के लालच में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड ने चापेकर बंधुओं के सम्बन्ध में जानकारी दी और ब्रिटिश पुलिस ने दामोदर हरि चापेकर को गिरफ्तार कर लिया अंतत: 18 अप्रैल 1899ई० को उनको फाँसी दे दी गई। बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर ने इस विश्वासघात को राष्ट्रद्रोह मानते हुए मुखबिर द्रविड बंधुओं को दण्डित करने का निर्णय लिया। सन् 1899ई०में दोनों मुखबिरों की हत्या कर दी गई। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने और अधिक कठोर कार्यवाही करते हुए बालकृष्ण और वासुदेव दोनों को गिरफ्तार कर लिया अंतत: वासुदेव को 08 मई 1899 तथा बालकृष्ण को 12 मई 1899 ई०को फाँसी दे दी गई। इस प्रकार तीनों भाइयों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

सारत: हम कह सकते हैं कि चापेकर बंधुओं का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अत्यन्त प्रेरक अध्याय है। इनकी शहादत ने युवाओं में आत्मविश्वास, संगठन और प्रतिरोध की भावना को नई दिशा दी, इसी कारण उन्हें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीदों में अग्रणी स्थान प्राप्त है। महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब और उत्तर भारत के अनेक क्रांतिकारी संगठनों ने इन भाइयों के साहस से प्रेरणा प्राप्त की। विनायक दामोदर सावरकर के वैचारिक निर्माण पर चापेकर बंधुओं के बलिदान का गहरा प्रभाव माना जाता है। खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि की भी कार्यशैली और वैचारिक पृष्ठभूमि भिन्न थी किन्तु इनके बलिदान की भावना में चापेकर बंधुओं की परम्परा स्पष्ट दिखाई देती है। इन बंधुओं का साहस, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा हमारी अमूल्य धरोहर है इसलिए भारतीय इतिहास में इनका नाम सदैव आदर,श्रद्धा व गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२० ☆ आलेख – प्रेम जन्य अपराध ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२० ☆

?  आलेख – प्रेम जन्य अपराध ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

प्रेम मानव इतिहास की वह आदिम और शाश्वत ऊर्जा है, जो जीवन को अर्थ देती है, पर साथ ही वह अग्नि भी है जो मर्यादा की दीवारों को राख करने का साहस रखती है। समाज के ढाँचे को यदि एक स्थायित्व चाहिए, तो वह अक्सर परंपराओं, नियमों और दंड-विधानों के इर्द गिर्द बुना जाता है। इस व्यवस्था में ‘अपराध’  समाज का एक अवांछित अंग है, तो ‘प्रेम’ को समाज ने सदैव एक संदिग्ध, पर अनिवार्य अंग माना है।

प्रश्न यह है कि जो प्रेम जीवन का उत्सव होना चाहिए , वह हिंसा और छल की विभीषिका में क्यों बदल जाता है?

इंदौर की सोनम और पुणे की सिया द्वारा अपने प्रेमी की कुत्सित हत्या जैसी घटनाएँ इसी प्रश्न को एक भयावह समकालीन विमर्श में खड़ा करती हैं, जहाँ प्रेम की भाषा में अपराध की स्याही घुल गई है।

भारतीय मनीषा में प्रेम का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहा। यदि हम ‘कामसूत्र’ के पन्नों को पलटें, तो वहाँ प्रेम को केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक परिष्कृत संस्कृति और परस्पर विश्वास के रूप में स्थापित किया गया है। वहाँ प्रेम के लिए एक स्वतंत्र स्थान की कल्पना थी। परंतु, इसके समानांतर मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय परंपराओं का कठोर अनुशासन भी चलता रहा। यह हमारे सामाजिक इतिहास का चिरंतन द्वंद्व है। एक ओर हमने प्रेम को काव्य माना, दूसरी ओर समय के प्रवाह में उसे कुल और जाति के कठोर अनुशासनों में कैद करने की कुचेष्टा की। जब प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को सामाजिक दीवारों के भीतर जबरन मोड़ने की कोशिश की जाती है, तो वह अपना प्राकृतिक स्वभाव खोने लगता है। और यह  धीरे-धीरे छल, अपराध और घुटन के विषैले अंकुर भी पैदा करता है।

सोनम और सिया की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि आज का प्रेम जब अनियंत्रित और निकास रहित हो जाता है, तो वह मानवीय संवेदनाओं को त्याग देता है। फिल्मों में भी हमने इस अंतर्विरोध को बार-बार देखा है। कभी ‘इश्किया’ जैसी फिल्में प्रेम में छिपी उस काली छाया को दिखाती हैं, जहाँ जुनून अपराध का मार्ग प्रशस्त करता है, तो कभी थ्रिलर फिल्में यह दिखाती हैं कि कैसे रिश्तों के झूठ को छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है।

इंदौर और पुणे की ये समकालीन घटनाएँ मात्र दो व्यक्तियों का अपराध नहीं हैं। यह उस सामाजिक वातावरण की विफलता है जहाँ रिश्तों के टूटने को ‘अपमान’ से जोड़ दिया जाता है। माता पिता के अहम पर चोट माना जाता है। जब कोई व्यक्ति समाज के डर से अपना सच नहीं कह पाता, या जब वह अपने प्रेम को ‘स्वामित्व’ समझने लगता है, तब उसे लगने लगता है कि प्रेम को समाप्त करने का एकमात्र तरीका ‘सामने वाले को समाप्त करना’ है।

यह हिंसा उस भावनात्मक परिपक्वता का अभाव है, जिसे हमारा शिक्षा तंत्र और पारिवारिक ढांचा कभी सिखा ही नहीं पाया।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रेम का भाव स्वयं में नैसर्गिक स्वरूप में कभी अपराधी नहीं होता। अपराध तब जन्म लेता है जब प्रेम ‘उत्तरदायित्व’ से मुक्त होकर ‘स्वार्थ’ और ‘स्वामित्व’ की बेड़ियों में जकड़ जाता है। जब समाज प्रेम को अनुमति और निषेध के बीच सीमित कर देता है, तो युवा मन संवाद की स्वस्थ भूमि खो देता है। परिणामस्वरूप, संबंध या तो पूरी तरह आदर्शीकृत हो जाते हैं, या फिर वे अपराधीकरण की ओर ढल जाते हैं।

इन घटनाओं में मीडिया की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है, जो अपराध को एक सनसनीखेज कहानी की तरह परोसता है, जिससे समाज में डर तो फैलता है, लेकिन अपराध के पीछे के सामाजिक मनोविज्ञान पर चर्चा कम होती है।

कानून , जुनूनी प्रेम के सम्मुख निर्बल रह जाता है।

इस समस्या का समाधान दंड की कठोरता से परे, सामाजिक चेतना के विस्तार में निहित है। सबसे पहले, हमें परिवारों के भीतर संवाद का एक नया वातावरण बनाना होगा। बच्चों को केवल अकादमिक शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता देनी होगी ताकि उन्हें यह समझ हो कि रिश्ता टूटना जीवन का अंत नहीं है। विवाह को एक सामाजिक सौदे से ऊपर उठाकर मानवीय सहमति का क्षेत्र बनाना होगा, जहाँ व्यक्ति अपनी असहमति को बिना किसी डर के व्यक्त कर सके। कानूनों का पालन अपनी जगह अनिवार्य है, लेकिन समाज को भी यह समझना होगा कि किसी भी अपराध को ‘प्रेम का नाम’ देकर उसे रोमांटिसाइज करना बंद करना होगा।

अंततः, प्रेम और अपराध के इस दुष्चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय प्रेम को अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार बनाना है।

हमें समाज में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ व्यक्ति का सम्मान उसकी ‘मर्यादा’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘संवेदनशीलता’ से आंका जाए। जब प्रेम में ईमानदारी होगी, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, और जब छिपाने की जरूरत नहीं होगी, तो अपराध अपनी छाया में स्वतः गुम होकर सिमट जाएगा।

प्रेम की असली गरिमा उसे अनारकली सा दीवारों में कैद करने में नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायित्व और परिपक्वता के खुले आकाश में जीने देने में है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८४ – देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८४ ☆ देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे देश में तो “पड़ोसी” को भाई जैसे रिश्ते से भी अधिक महत्व दिया जाता है। दुःख की घड़ी में तो सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है।

आज उपरोक्त फोटो स्थानीय समाचार पत्र में देख मन बहुत आहत हुआ। जिस समाज में “पड़ोसी पहले” या पड़ोस प्रेम/ सौहार्द का उदाहरण दिया जाता है, वहां इस प्रकार की घटना होना,  हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा का पैमाना बन चुका है।

हम तो विगत छह दशकों से हमेशा अच्छे पड़ोसी से लाभान्वित होते आ रहे हैं। छोटे मोटे विवाद, विचारों में मतभेद एक आम बात हैं।

बचपन से आज तक सप्ताह में, कम से कम एक बार जब तक पड़ोसी से “बार्टर” पद्धति में प्राप्त व्यंजन का आनंद छूटा नहीं है। घर की सब्जी जब मन पसंद नहीं रहती थी, तब पड़ोस की चाची/ मासी के यहां से बिना मांगे स्वादिस्ट व्यंजन का खूब आनंद लेते आ रहें हैं। ये सब आप के साथ भी होता आ रहा है।

अब प्रश्न ये है, कि हमारी नैतिकता में इतनी गिरावट क्यों आ रही है? कहीं हम सब पारिवारिक मूल्यों से दूर पश्चिम की शरण में जाना तो नहीं है? धर्म से दूरी बढ़ती ही जा रही हैं। विषय विचार करने का है।

अब कलम को विश्राम देता हूं, द्वार पर लगी घंटी बजी है, अवश्य ही पड़ोसी की होगी, रविवार शाम के समय उनके यहां से इडली प्रति सप्ताह प्राप्त होती है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ दो शब्द अतंस के – आशिर्वाद और मृगतृष्णा ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ दो शब्द अतंस के – आशिर्वाद और मृगतृष्णा ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

जीवन की पदयात्रा में बहुत कुछ पीछे छूट गया।

कुछ वक़्त ने उपहार स्वरूप दिया।

उन उपहारों में सबसे कीमती उपहार मेरी सेहत है क्योंकि एक वक्त ऐसा भी आया जब कहने- सुनने के लिए बेहड भीड़ थी परन्तु बेहद भीड़ से बेहतरीन नाम कोई भी उगलियों पे गिनने पर नहीं आया जो उस वक़्त मेरे पास और सिरहाने पे खड़ा हो कर एक शब्द बोला हो

मैं हूँ न✍️

जिदंगी ने यह सिखाया- पढ़ाया और छलावा भरी भीड़ से निकाल कर केवल उस मिट्टी पर मुझे लगाया जहाँ से केवल एक ही आवाज़ आती थी और वह आवाज थी परमात्मा की जिसे किसी ने देखा नहीं फिर भी अनुभूति हुई कि एक पल में बिखरने से कोई रोक सकता है तो केवल आत्मशक्ति और उसी शक्ति में छुपे हुए हैं प्रभु का प्रभाव बाकी अध्ययन केवल शून्य।।

आध्यात्मिक व धार्मिक होना अलग- अलग बात है।

मैं, दोनों ही नहीं हूँ क्योंकि अध्यात्मिक शिव में समाहित होता है और धार्मिक प्रभु मुर्ति प्रेम में,  मैं, ठहरी खुदगर्ज एक गृहस्थी में डूबीं हुई गृहणी जिसके पन्नों में नमक की नमी से लेकर बच्चों की खवाहिशें तक समेटनी होती हैं।

अनकहे – अनदेखी दरारें जिसे उपर बढियां सा फोटो फ्रेम से छुपाया जा सकें उन जज्बात को जो मचलते तो थे लेकिन तोड़ दिए गए केवल इस लिए कि उसने घर के सबसे छोटे स्तंभ को चुना था खुद के लिए।

और समेटने होतें हैं गांधारी की उस पट्टी को भी जो बांधने के बाद भी वह मोह से दूर नहीं जा सकीं और तोड़ दिया उन्होंने मौन संवाद अपने ही बगीचे में।

लकीरों में बहुत कुछ होने के साथ भी बहुत कुछ नहीं होता है बिलकुल महाभारत की बराबरी के जैसे जिस को उस गलती की सज़ा मिली जो उसने किया ही नहीं और सब कुछ समाप्ति के साथ मिला केवल एक आशिर्वाद??

वैसे ही मेरे पास केवल एक आशिर्वाद है बाकी सब कुछ एक छलावा।

एक आशिर्वाद और मृगतृष्णा में जैसे कैद हो गईं वे सारी उम्मीदें जो मेरी थी लेकिन मेधा के बादल के जैसे- छीन लिया गया।

उससे तमाम उम्र की यौवन भरी बूंद को और सृष्टि उस पर अधिकार जमाने के साथ- साथ अंगारे बरसाती हूई आंखें दिखाती हूई बोले –

‘तेरे भाग्य में यही है’

खैर कृष्ण की भक्त हूँ लेकिन, रणछोड़ नहीं हूँ नीति- राजनीति छल- कपट से दूर केवल एक भावुकता से परिपूर्ण स्त्री हूँ जो केवल इतना जानती है, सारा खेल महत्वाकांक्षा का हैं। अत: उसी महत्वाकांक्षा ने किसी को कैकेयी तो किसी को यशोदा बनाया अब हमारे उपर है, हम नियति से क्या लेते हैं और अपने बच्चों के लिये क्या छोड़कर जाते हैं क्योंकि न ही कैकेयी और ना ही यशोदा माता कुछ भी लेकर गई।

बस स्मृति छोड़ गई वही स्मृति हमें पुण्य- आत्मा व धार्मिक बनाता है।

जीवन का सबसे बड़ा धन जो है पास और मुट्ठी बंद हो या खुली साथ जायेगा, वह है केवल कर्म।

आज उम्र के एक मनका और जुड़ने के बाद कुछ शब्द खुद के लिए खर्च करती हूँ

शायद यह पल दोबारा मिले या ना मिले#

कर्म की खेतीबाड़ी व मानवता का बीज केवल शून्य हृदय से ही किया जा सकता है क्योंकि जिस हृदय में प्रपंच भरा हुआ होगा वह केवल भीष्म बनेगें द्रोणाचार्य बनेगें किन्तु एकलव्य बनने के लिए आत्मशक्ति- आत्मशांति चाहिए जो केवल प्रभु स्तुति में है। कोई फर्क नहीं पड़ता आप के पास क्या है क्योंकि चार कंधे भी नही मिलतें है अक्सर शोहरत वाले को और कबीर के लिए कोई धर्म बचा नहीं तर्पण मुक्ति के लिए। अतः अति नहीं केवल आरंभ कीजिये केवल नेकी भरे अतंस से छलावा से केवल छल मिलेगा मुक्ति नही।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ – मारिशस से ~ गद्य क्षणिका और गद्य भँवर ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के चुनिन्दा साहित्य को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करते रहते हैं। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं।

☆ दस्तावेज़ # ३१  – मारिशस से ~ गद्य क्षणिका और गद्य भँवर ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆ 

मैं श्री रामदेव धुरंधर जी का हृदय  से आभारी हूँ. मैंने उनसे अनुरोध किया था कि- सभी प्रबुद्ध पाठकों के लिए आपके नवीन शोध “गद्य भँवर” की उत्पत्ति इतिहास और भविष्य पर आपके उदगार आलेख स्वरुप अपेक्षित. दस्तावेज स्वरुप में उनका प्रत्युत्तर आप सभी के लिए अक्षरशः प्रस्तुत है. 

इसके पूर्व श्री रामदेव धुरंधर जी के दस्तावेज गद्य – क्षणिका पर सविस्तार आलेख प्रकाशित किया गया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं >>

☆ दस्तावेज़ # 30 – मारिशस से ~ गद्य – क्षणिका : मेरे लेखन का एक सबल पक्ष ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆ 

 – संपादक ई-अभिव्यक्ति  

हेमंत जी

नमस्कार।

आपके लिखे हुए शब्दों के अनुसार उत्तर करने की कोशिश कर रहा हूँ। मैंने दो किताबें संलग्न की हैं। तारों का जमघट में 1200 गद्य क्षणिकाएँ संकलित हैं। चारों किताबों में 3000 तक गद्य क्षणिकाएँ हैं। इन्हीं कृतियों की गद्य – क्षणिकाएँ मैं फेसबुक में पोस्ट करता हूँ जो आप अपनी ई—पत्रिका में संलग्न करते हैं।

तारों का जमघट की भूमिका डा. नूतन पाण्डेय ने लिखी है। उन्होंने लिखा है और वास्तविकता यही है गद्य – क्षणिका रामदेव धुरंधर की अपनी विधा है जिसका हिन्दी जगत में अच्छा स्वागत हुआ है। नूतन जी का लिखा हुआ है अच्छा होगा लोग इस विधा को अपनाएँ। पुणे के शरद पवार ने मुझसे संपर्क किया। उन्होंने बताया मुझसे प्रेरित हो कर वे गद्य – क्षणिकाएँ लिख रहे हैं। अब उनकी पुस्तक प्रकाशित हो जाने पर उसका भव्य विमोचन हो गया। मैंने इस कृति की भूमिका लिखी है। भारत के मथाराम कृष्णमुरारी ने भी यही किया। यहाँ भी वही बात हुई। उन्होंने लिख कर पुस्तक प्रकाशित करवायी। इसमें भी मेरी लिखी हुई भूमिका संलग्न है।

मैं विशेष कर खाली वक्त में क्षणिका लिखता हूँ। ईश्वर की कृपा से दिमाग में कहानी जैसा कुछ तो बन ही जाता है। आधे घंटे के बीच एक गद्य – क्षणिका पूरी हो जाती है। इधर के दिनों में मेरे खयाल में आया इसी को एक नया रूप दूँ।

यही गद्य – भँवर है। गद्य – क्षणिका में 80 शब्दों की सीमा थी और यहाँ 150 शब्दों की। शब्द संख्या की दृष्टि से लिखना कठिन होता है, लेकिन फिर भी मैं चला लेता हूँ। मैंने जान बूझ कर गद्य – भँवर शुरु किया है। इसमें अधिक शब्द होने से मुझे कुछ विस्तार से अपनी बात लिखने में सुविधा होती है। मैंने अभी 50 तक ही गद्य – भँवर फेसबुक में डाला है। प्रकाशक ने मुझे लिख दिया उसे प्रकाशित करने के लिए दूँ।

कुछ प्रतिक्रियाएँ आपके पास भेज रहा हूँ।

हरेराम पाठक ने प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा था —

आपकी इस क्षणिका की सच्चाई को मैंने स्वयं अपने जीवन में गहराई से अनुभव किया है। मेरे पास समीक्षा की पुस्तकें आती हैं। महीनों तक पड़ी रहती हैं। लिखने बैठ कर भी नहीं लिख पाता। पर जब मन बन जाता है और लिखने लगता हूँ तो ऐसा लगता है मानो कोई लिखवा रहा हो। सबका एक मुहूर्त होता है। वह मुहूर्त ही वह काम करवाता है हम केवल माध्यम भर होते हैं। विचार का प्रवाह एक निश्चित काल खण्ड में होता है उसे अनुभव की आंखों से देखना, पकड़ना ही लेखक का काम है। इसीलिए लेखक को दृष्टा कहा गया है, स्रष्टा तो दूसरा कोई है। हम देख लें, अनुभव कर लें, लिख लें इतना ही हमारा काम है। इस महत्वपूर्ण क्षणिका के लिए हार्दिक बधाई। अब आप लेखक नहीं, एक साधक की मंजिल प्राप्त करने में प्रयासरत दिखाई दे रहे हैं। साधना की मंजिल पर पहुँच कर आप क्षणिका से भी छोटी रचना करेंगे जो सूक्ति अथवा सूत्र रूप में होगा जिससे बूंद में समुद्र का एहसास होगा।**

*

अखिलेश सिंह ने 27जून 2024 को मेरी एक गद्य – क्षणिका के उपलक्ष्य में यह टिप्पणी लिखी थी —

धुरंधर साहब, आप की क्षणिकायें मुझे बताती है कि आप में एक गद्य गीतकार भी है जो मारीची देश की खुशबू पूरे विश्व में फैला सकता है ।

*

कुछ विशेष है आपके लेखन में

यूँ ही तो कोई धुरंधर नहीं बनता

करना पड़ता है स्वाहा स्व को

राष्ट्रहित में, यूँ ही तो देव,

राम नहीं बनता

~ कृतवर्धन अग्रवाल~

*

धनराज शंभु, मरिशस

इस द्वीप के कलम के सिपाही हैं आप, शुभकामनाएँ।

*

 मैंने तारों का जमघट में इस तरह की 50 तक प्रतिक्रयाएँ संलग्न की हैं।

*

आपने अतीत, वर्तमान और भविष्य की जो बात लिखी है उसका उत्तर मेरे पास हो नहीं सकता। ज्यादा से ज्यादा स्वयं मैं वर्तमान से हूँ और यही आपके सामने है। फेसबुक के अनुसार तमाम लोगों की नजर इस पर जाती है।

  – रामदेव धुरंधर

***

© श्री रामदेव धुरंधर

दिनांक  – 28 – 06 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४३ – बूँदें ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४3 💧 बूँदें… 🌧️

लगभग एक घंटे पहले छिटपुट बारिश हुई है। भोजन के पश्चात घर की बालकनी में आया तो वहाँ का दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा। सुरक्षा जाली की सलाखों पर पानी की मोटी बूँदें झूल रही थीं। बालकनी के पार खड़े विशाल पेड़ अपनी फुनगियों पर गुलाबी फूलों से लकदक यों झूम रहे थे मानों सुबह-सवेरे कोई मुनिया अपनी चोटियों पर दो गुलाबी रिबन कसे इठलाती हुई स्कूल जा रही हो। इस दृश्य को कैमरे में उतारने का मोह संवरण न कर सका।

मोबाइल के कैमरे ने चित्र उतारा तो मन का कैमरा चित्र को मस्तिष्क की तरंगों तक ले गया और मन-मस्तिष्क का गठजोड़ विचार करने लगा। क्या हमारा क्षणभंगुर जीवन साँसों का आलंबन लिए इन बूँदों जैसा नहीं है? हर बूँद को लगता है जैसे वह कभी न ढलेगी, न ढलकेगी। सत्य तो यह है कि अपने ही भार से बूँद प्रतिपल माटी में मिलने की ओर बढ़ रही है।

कालातीत सत्य का अनुपम सौंदर्य देखिए कि बूँद माटी में मिलेगी तो माटी उम्मीद से होगी। माटी उम्मीद से होगी तो अंकुर फूटेंगे। अंकुर फूटेंगे तो पौधे पनपेंगे। पौधे पनपेंगे तो वृक्ष खड़े होंगे। वृक्ष खड़े होंगे तो बादल घिरेंगे। बादल घिरेंगे तो बारिश होगी। बारिश होगी तो बूँदें टपकेंगी। बूँदें टपकेंगी तो सलाखें भीगेंगी। सलाखें भीगेंगी तो उन पर पानी की मोटी बूँदें झूलेंगी…!

वस्तुत: सलाखें, बूँदें, पेड़, सब प्रतीक भर हैं। जीवात्मा असीम आनंद के अनंत चक्र की चौरासी कोसी परिक्रमा कर रहा है। बरसाती बादल की तरह छिपते-दिखतेे इस चक्र को अद्वैत भाव से देख सको तो जीवन के ललाट पर सतरंगा इंद्रधनुष उमगेगा।…इंद्रधनुष उमगने के पहले चरण में चलो निहारते हैं सलाखें, बूँदें और पेड़…!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३८ ⇒ इतवार के बहाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इतवार के बहाने।)

?अभी अभी # १०३८ ⇒ आलेख – इतवार के बहाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी दिनचर्या में वर्ष भर में कई वार त्योहार आते जाते रहते हैं, सूरज रोज निकलता, अस्त होता रहता है, लेकिन सिर्फ रविवार ही एक ऐसा छुट्टी का दिन है, जो हर हफ़्ते आता है, और हमारा संडे का मूड बना जाता है। विदेशों में लोग वीक ऐंड मनाते हैं, हम संडे मनाते हैं।

संडे को ही छुट्टी का दिन क्यूं ?जब कि हमारा तो हर दिन ही सूर्य के उदय होने से शुरू होता है। सुना तो यह भी है कि एक जमाना ऐसा भी था जब अंग्रेजों का साम्राज्य इतना फैला हुआ था कि उनके राज में सूरज अस्त ही नहीं होता था, फिर भी ठंडे प्रदेश में रहने वाले फिरंगी बेचारे धूप को तरस जाते थे, और जिस दिन सूरज निकलता, उस दिन को वे संडे, यानी छुट्टी का दिन घोषित कर देते थे। दिन भर पड़े पड़े धूप खाया करते थे। हमारे धूप स्नान को वे basking कहते हैं।।

सूर्य हमारे लिए देवता है। हमने सूर्य को बारह नाम दिए हैं और जब हर सुबह हम सूर्य नमस्कार करते हैं, तो उसे बारह नामों से स्मरण करते हैं। सवेरे का सूरज हमारे लिए है। हमें सूर्य से ही नहीं, गर्मी से भी विशेष प्रेम है।अंग्रेज तो सिर्फ संडे मनाकर रह गए, हमारे यहां तो गर्मी के मौसम में पूरे स्कूलों की ही छुट्टी हो जाती थी।अंग्रेजों की नानी नहीं होती। हमें नानी के यहां जाने के लिए, विशेष रूप से, गर्मी की छुट्टी दी जाती थी। कहां गए वे दिन !अब तो सात दिनों की बड़े दिनों की छुट्टी देने में इनकी नानी मरती है। भला हो कोरोना बला का, भला हो आपदा में अवसर का।

वैसे हमारा संडे का मूड शनिवार से ही बन जाता है। कुछ लोग इस दिन सूर्यवंशी बन जाते हैं। तानकर सोते हैं। जब तक सूरज, पहले सर पर, और बाद में छाती पर नहीं आ जाता, तब तक सोते रहते हैं। महिलाएं तो ब्यूटी पार्लर चली जाती हैं, पुरुष भी आजकल देखादेखी जेंट्स पार्लर जाने लगा है। पहले तो आपले केश कर्तनालय पर ही केश विन्यास, यानी हजामत हो जाती थी। नाई की जबान कैंची की तरह चलती थी, और केंची जबान की तरह। कई न्यूज चैनल्स का प्रसारण एक ही चैनल पर।।

छुट्टी का दिन बहुत छोटा होता है। सुबह होती है, शाम होती है, छुट्टी यूं ही तमाम होती है।कई दिनों से बाहर का घूमना, खाना, सब बंद है, लॉक डाउन ने जीवन में कई अप्स एंड डाउन्स, बोले तो, उतार चढ़ाव ला दिए, लेकिन जिस तरह सूरज रोज निकलता रहा, हमें विटामिन डी प्रदान करता रहा, हमें ऊर्जा प्रदान करता रहा, पुराने दिन भी लौट आएंगे। हम फिर पहले जैसे संडे मनाएंगे।

सप्ताह में सात दिन हैं और कोई कहता है, जिंदगी के सिर्फ चार दिन हैं। तीन दिन और कम क्यों कर रहे हो भाई साहब ! जिंदगी के पूरे सात दिन हैं। संडे को हम चार्ज होते हैं और फिर पूरे सप्ताह काम पर लग जाते हैं।

यह सिलसिला सदियों से चलता चला आ रहा है, और ऐसे ही चलता रहेगा। हर दिन सुहाना दिन, हर शाम सुहानी शाम।आज की शाम इतवार, तुम्हारे नाम। सूर्य देवता, तुम्हें संडे की सुबह का सलाम, प्रणाम, नमस्कार !

ॐ सूर्याय नमः

ॐ मित्राय नमः

ॐ रवये नम:

ॐ भानवे नमः

ॐ खगाय नमः

ॐ पूष्णे नमः

ॐ हिरण्यगर्भाय नमः

ॐ मारीचाय नम:

ॐ आदित्याय नमः

ॐ सावित्रे नमः

ॐ अर्काय नमः

ॐ भास्कराय नमः

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३७ ⇒ आषाढ़ का एक दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आषाढ़ का एक दिन।)

?अभी अभी # १०३७ ⇒ आलेख – आषाढ़ का एक दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आषाढस्य प्रथम दिवसे पर अगर कालिदास का कॉपीराइट है तो आषाढ़ के एक दिन पर मोहन राकेश का। मुझे संस्कृत नहीं आती, अतः मैं कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल, कुमारसंभव और मेघदूतम् नहीं पढ़ पाया। कालिदास को हिंदी में पढ़ना शेक्सपीयर को हिंदी में पढ़ने जैसा है। जिसे संस्कृत नहीं आती, वह सुसंस्कृत नहीं कहलाता और जिसे अंग्रेजी नहीं आती, आजकल वह पढ़ा लिखा नहीं कहलाता। हमने मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन पढ़ लिया और संस्कृत नहीं आने के अपराध बोध से मुक्त हो गए।

हमारे अभिन्न मित्र श्री हृदयनारायण जी, जब प्रेम के ढाई अक्षरों में भी धाराप्रवाह संस्कृत बहा देते हैं, तो हमारी हिंदी हमें थाम नहीं पाती। जिसे तैरना नहीं आता, उसे भाषा के प्रवाह में बह जाना चाहिए। भाषा का प्रवाह सबको पार लगा देता है। जिसे एक बार भाषा का ज्ञान हो जाता है फिर वह ज्ञान के सागर में डुबकियां लगाता रहता है। ज्ञान के मोती भी उसी के हाथ लगते हैं।।

आषाढ़ के प्रथम दिन का शायद मेघदूत से संबंध है।

इस बार आषाढ़ के पहले दिन ही एक बूंद भी पानी नहीं गिरा। शुक्र है फागुन की तरह, आषाढ़ के दिन चार नहीं होते, अभी आधा आषाढ़ पड़ा है, मेघदूत जल्दी कर, हरी अप।

इस बार आषाढ़ के दिनों में और भी कई दिन मिक्स हो गए। एक दिन तो ऐसा आया जिस दिन कई दिन एक साथ आ गए। आजकल दिन, दिवस हो जाता है, और दिवस, डे।

साल में वैसे तो सिर्फ 365 दिन होते हैं लेकिन अगर मदर्स डे, वेलेंटाइन्स डे और फादर्स डे की तरह अन्य दिवस अर्थात days का हिसाब लगाया जाए, तो वे 365 से अधिक ही बैठेंगे, कम नहीं। फरवरी का तो पूरा सप्ताह days’ week अर्थात् दिवसों का सप्ताह कहा जा सकता है। रोज़ डे, प्रोमिस डे, चॉकलेट डे, दिल दे, दिल ले, इत्यादि इत्यादि।

अभी अभी टाइपराइटर्स डे निकला, फादर्स डे भी अकेला नहीं आया, साथ में योग दिवस भी लेकर आया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, रोज दिन में तीन चार बार चाय पीने वाले हम भारतीय, चाय दिवस भी मनाते हैं। बस मैगी दिवस और पास्ता दिवस की कमी है शायद।।

मेरे लिए ” आषाढ़ का एक दिन ” बहुत महत्वपूर्ण है।

कथाकार और नाटककार स्व.मोहन राकेश का यह पहला नाटक (1958)

है। जो संस्कृत के ज्ञाता हैं, वे कालिदास को पढ़ें, हमारे जैसे हिंदीभाषी लोगों के लिए मोहन राकेश एक बहुत बड़ा काम कर गए। कितने कम समय में कोई इंसान सृजन के क्षेत्र में इतना कुछ कर जाता है ; (1925-1972) कि विश्वास ही नहीं होता। उनके दो और नाटक भी यहां उल्लेखनीय हैं, आधे अधूरे और लहरों के राजहंस

अभी देव सोये नहीं हैं। मेघ हम पर मेहरबान नहीं। आषाढ़ के किसी भी दिन झमाझम हो सकती है। आप भी आषाढ़ के किसी एक दिन फुर्सत निकालकर मोहन राकेश का “आषाढ़ का एक दिन”, पढ़ ही लें। अगर पढ़ भी लिया हो, तो भी बार बार पढ़ने लायक है। जो नाट्य विधा अर्थात् स्टेज से जुड़े हैं, वे इसकी मंचीय खूबियों से भली भांति अवगत होंगे।

स्वागत, अभी आषाढ़ मास के कई दिन बाकी हैं।।

आषाढ़ के एक दिन की तरह शायद एक दिन विश्व नाट्य दिवस का भी अवश्य होगा। संस्कृत में कालिदास के अलावा भास और भवभूति भी नाटककार हैं। उधर अंग्रेजी साहित्य में भी विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के अलावा भी कई नाटककार हुए हैं।

हमारे देश में आज हिंदी की अपेक्षा मराठी मंच अधिक सक्रिय है।

कारण अच्छे मंचीय कलाकारों की फिल्मों में मांग। फिलहाल तो लगता है राजनीति साहित्य और संस्कृति को पूरी तरह लील रही है। कहीं हमें ऐसा दिन ना देखना पड़े कि लोग पूछें कौन कवि कालिदास और कौन मोहन राकेश ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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