हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कुर्बानी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – कुर्बानी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

बाज़ार गुलज़ार था

वो चीज़ नहीं मिल रही थी

जिसकी ज़रूरत थी

हताश होकर

पूछताछ की

तब पता चला कि

” सत्य की दुकान “

बहुत पहले बंद हो गई है

इसका दुकानदार फ़ाक़े करते

भूख से मर गया

अब वहाँ एक वीराने में

उसकी एक दरगाह है

जहाँ  झूठ की ख़ुशबूदार अगरबत्तियां

ढ़ेरों सरपरस्त रोज़ सुलगाया करते हैं

हर बरस

एक मेला लगता हैं वहां

उर्स होता है

उसकी कुर्बानी की याद में…!!!!!

 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४६ – कविता – मैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४६ ?

? कविता – मैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

मैं क्या हूँ मुझे आईना दिखाइये जनाब

औक़ात मेरी मुझको तुम, बताइए जनाब

=2=

दूजों पे नुस्ख़ ढूँढ़ने का ऐब है मुझमें

निज गिरेबाँ में झाँकूँ ये सिखाइए जनाब

=3=

शिकवे-गिले तमाम का हिसाब मांगिए

अब ऐसा मज़ा मुझको तुम चखाइए जनाब

=4=

कुछ तो फ़ायदा हो आने वाली नस्ल को

मुझसे वसीयत में ये लिखाइये जनाब

=5=

‘ राजेश ‘ कब क्या कह गया  ख़याल ये रहे,

शेर मेरे मुझको ही सुनाइए जनाब

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २२० ☆ मुक्तक – ।। समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २२० ☆

☆ मुक्तक ।। समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान।

सबका लेखा – जोखा  देखता है ऊपर बैठा भगवान।।

***

कैसा अहम और कैसा वहम चार दिन के जीवन में।

याद रहता केवल अच्छे कर्मों का सुफल   जीवन में।।

कुछ कर जाओ ऐसा दुनिया करे आपका गुणगान।

समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान।।

***

अच्छा काम मन से करो सम्मान की बात स्वयं मिलेगी।

जीवन संघर्ष से मत डरो सफल पहचान स्वयं मिलेगी।।

छोटी सी जिंदगी छोड़ नफरत पूरे करो अपने अरमान।

समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान।।

***

हर नया दिन अपने साथ कुछ बात नई सी लेकर आता है।

आज का दिन ही कुछ बात भविष्य की भी   बतलाता है।।

अच्छे काम काअवसर दो हरआदमी बनता अच्छा इंसान।

समय बहा कर ले जाता है हर नाम और निशान।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १८ – !! जग के आधार राम !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! जग के आधार राम !)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १८ ☆

☆ !! जग के आधार राम !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

इस जग के आधार राम है, राम बसें हैं सृष्टि में ।

धूप-छांँव में नील गगन में, राम समाँए वृष्टि में।।

सूरज उनसे ऊर्जा पाकर, जग को ऊर्जा बाँटता।

देता है समरूप सभी को, कहाँ कभी वह छाँटता ।।

* 

मन में राम विरोध अगर है, सत्य बोध भी चाहिए।

प्राण वायु में राम बसें हैं, रुकना प्रयोग चाहिए।।

नीर बनें वो प्यास बुझाते, जल पीना भी छोड़ दो।

धरा बने प्रभु धान लुटाते, सबसे नाता तोड़ दो।।

 *

नहीं इष्ट यदि राम तुम्हारे, सरोकार क्या राम से ।

आपा खोते जयकारों से, घृणा जताते नाम से।।

मानों या फिर मत मानो सच, राम नाम में शक्ति है ।

मात्र नाम है राम अगर तो, इतनी क्यों आसक्ति है ।।

 *

धर्म सभी का यही सिखाता, मानवता ही धर्म है।

जन-जन की कल्याण कामना, सबसे पावन कर्म है।।

अल्प काल का जीवन सारा, जाना है हरि धाम में।

राम अंश बनकर हम आए, मिल जाना है राम में।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३९ ☆ बप्पा की बिदाई ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – बप्पा की बिदाई।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ बप्पा की बिदाई ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

अनंत डोर बंधी कलाई पर

हैं विश्वास का धागा

 बप्पा गणपति जा रहे

मन का वही सहारा है।

 

अगले बरस बप्पा आना तुम

करते दिल से पुकार।

तेरी माया है अनंत,

तेरा अनंत है प्यार।

 

बप्पा  अनंत है, अनादि हैं,

है आप पालनहार,

आशीष आपका मिले

नहीं मानेंगे हार।

 

हम तो विदाई दे रहे

नहीं विसर्जन आज।

हँसी खुशी हम विदा करें

निपटे सबके हर काज।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२० ☆ कविता – हे लम्बोदर गजवदन… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  कविता  – हे लम्बोदर गजवदन… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२० ☆

☆ कविता – हे लम्बोदर गजवदन… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

हे लम्बोदर गजवदन, मंगल कीजै काज

सब विघ्नों को दूर कर, कृपा रखें गणराज

*

कलुष निकंदन आप हैं, प्रथम पूज्य भगवान

भव बाधाएँ दूर हों, ऐसा दो वरदान

*

ऋद्धि-सिद्धि के अधिपति, देवों के सरताज

मंगलकारी देव प्रभु, रखिये मेरी लाज

*

पूजा-पाठ न जानते, न ही कोई विधान

रक्षा सबकी कीजिये, हे प्रभु दयानिधान

*

पान, फूल मोदक चढ़ें, लड्डू मेवा थाल

सद्गुण हमको दीजिए, हे शिव जी के लाल

*

संकट हरिये आप सब, गौरी तनय गणेश

करना ऐसी प्रभु दया, खुशियाँ हों बस शेष

*

धूम्रकेतु गजमुख नमन, महिमा अमित अपार

मातु आज्ञा सिर धरें, मूसक पर असवार

*

विघ्न मिटें संकट कटें, मंगल हों सब काज

बाधाओं को दूर कर, रखें हमारी लाज

*

जिनके सुमरन से सदा, मिले हमें संतोष

प्रथम पूज्य गणनायक, दूर करें सब दोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११२ – गीत – टूटती आशा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टूटती आशा…।

? रचना संसार # ११२ ?

☆ गीत – टूटती आशा…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

नित्य मन को मार कर के,

और विष पी हम जिये हैं,

शूल राहों में बिछे पर,

घाव अपनों ने दिये हैं।।

*

टूटती आशा कड़ी सब

साँस भी बंधक बनी है।

घुट रहा है दम धुँए से,

मौत से अपनी ठनी है।।

लीलता अजगर दुखों का,

वेदना हिय में घनी है।

*

टाट का बिस्तर जला सब,

वारुणी जी भर पिये हैं।।

**

उड़ गया है प्रीति -पंछी,

छटपटाता है शिकारी।

वासना का जाल जकड़ा,

कर्म गीता देख हारी।।

दाँव पर पत्नी लगाते,

बैठ कर पागल जुआरी।

*

है छलावा हर कदम पर,

ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।।

**

दे रहा है जग चुनौती,

रूठती भी है प्रभाती।

है अँधेरा भी घनेरा,

ये अमावश भी सताती।।

तामसी हैं नृत्य करते,

रोशनी आँखें चुराती।

*

जूगनू भी करते शरारत,

आस के बुझते दिये हैं।

**

दोष किसका है कहें क्या,

मौन बैठे हैं सितारे।

आसुरी माया बढ़ी है,

घात करते हैं सहारे।।

है छलावा हर कदम पर,

सत्य निष्ठा भी पुकारे।

*

हाशिए पर हम खड़े हैं,

संग आकुल उर लिये हैं।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४० – कविता – सर्वोच्च… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सर्वोच्च…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४० ☆

? कविता – सर्वोच्च…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

कतरा बनकर आंसू का, आंखों से ना बह जाओ।

यह सोचकर हमने, अब रोना छोड़ दिया।।

*

पढ़ ना ले कोई हमारी नजरों में तुमको।

सबके सामने पलकों को, गिराकर उठाना हमने छोड़ दिया।।

*

नींद आएगी, साथ तेरे ख्वाब भी लायेगी।

रात ने भोर का इंतजार  छोड़ दिया।।

*

कुछ भाव ऐसे होते हैं, सिर्फ एहसासों में जीते हैं।

उनको शब्दों के बंधन में बांधना छोड़ दिया।।

*

जन्म मरण से ऊपर भी कुछ ऐसे रिश्ते होते है।,

कितने जन्म लिए हमने, यह गिनती करना छोड़ दिया।।

*

हर सांस में तू.. हर दुआ में शामिल है।

कितने दर पर शीश झुकाया हमने गिनना छोड़ दिया।।

*

एक विश्वास मिला,, सर्वोच्च  मिला, अब तो कुछ बाकी नही।

इच्छाएं खत्म हुई और मांगना छोड़ दिया।।

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मोक्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मोक्ष… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

भविष्य जीने की चाह,

वर्तमान खोता रहा,

प्रति पल संप्रति,

अतीत होता रहा,

अमर कामनाओं का भार,

नश्वर जीव ढोता रहा,

संसार लालसाओं का

अपूर्ण परितोष है,

लालसाओं के पार

सम्पूर्ण मोक्ष है..।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३११ ☆ गीत – देश बचाए दयानंद जी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३११ ☆ 

☆ गीत – देश बचाए दयानंद जी…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

देश बचाए दयानंद जी,

आओ मिल सब याद करें।

कुर्बानी को भूल न जाऐं,

मिल बैठे संवाद करें।

 

छुआछूत का भेद मिटाया,

बाल विवाहों को रोका।

सती प्रथा को बंद करा कर,

नहीं दिया कोई मौका।

पाखंडों पर छुरी चला कर,

मार दिया छक्का-चौका।

 

जीवन कला सिखाई उनने,

ओम नाम का जाप करें।

 

जब भी बॅंटे देश के हिंदू,

घोर गुलामी ने घेरा।

गुरुकुल नष्ट हुए अपने तो,

आया घोर ॲंधेरा।

आर्य, सनातन संस्कृति से,

आए नया सवेरा।

 

ऋण न भूलें दयानंद के,

न हम जातिवाद करें।

 

वेद भाष्य कर डाले ऋषि ने,

ज्ञान की गंगा लहराई।

जातिवाद का भेद मिटाया,

जागृत हुई थी तरुणाई।

जाग गए राजे महाराजे,

ड्यूटी उनको बतलाई।

 

ऋण उनका अपने ऊपर है,

नहीं कभी प्रतिवाद करें।

 

प्रेरित हुए युवा अनगिन ही,

अंग्रेजों को छका दिया।

बिगुल फूॅंक कर आजादी का,

जीवन अपना गॅंवा दिया।

झूल गए फांसी का फंदा,

हंसते-हंसते प्राण दिया।

 

शेखर, भगत से चांद सितारे,

यह अभी आह्लाद करें।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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