हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पहरुए ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

अब उनको समझाना क्या है

सब जाना, अनजाना क्या है।

 *

घोर अराजकता का दलदल

इसमें भला ठिकाना क्या है ।

 *

वो चलता है चालें टेढ़ी

बचना और बचाना क्या है।

 *

अरे पहरुए जागो भाई

हाथ मले पछताना क्या है।

 *

जीवन रिसता एक घड़ा सा

उम्र का ताना-बाना क्या है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२८ ☆ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “हो गया है मर के भी वंदा अमर…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२८ ☆

✍ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

प्यार की मुझको निशानी दे गया

ज़िंदगानी को रवानी दे गया

 *

हो गया है मर के भी वंदा अमर

मुल्क को अपनी जवानी दे गया

  *

उसकी ख़ुशबू चाहता था लम्स कर

और वो है रातरानी दे गया

 *

आशिक़ी कुर्बानियों का नाम है

इश्क़ को मेरे मआनी दे गया

 *

ख़ुदकुशी कर ली किसी मजबूर ने

गाँव को रचने कहानी दे गया

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “पंख…!” (मराठी कविता) – सुश्री प्रभा सोनवणे ☆ हिन्दी भावानुवाद – हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ “पंख…!” (मराठी कविता) – सुश्री प्रभा सोनवणे  ☆ (हिन्दी भावानुवाद) हेमन्त बावनकर ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे जी की मराठी कविता “पंख…!” पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक कीजिए 👉 मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ पंख… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆ पंख…! ☆

बहुत पहले काट दिए थे तुमने,

मेरे पंख,

कहीं मैं दूर न उड़ जाऊँ इसलिए,

किन्तु न जाने किस शक्ति से,

मैं उड़ सकी —

तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध… पता नहीं!

 

तब वह मेरा विद्रोह ही था,

औरत को चार दीवारी में

कैद करने वाली

पुरुष प्रधान संस्कृति के विरुद्ध!

याद आता है किसी

हिंदी फिल्म का डायलॉग,

“शरीफ खानदान की औरतें,

घर की चार दीवारी को

कैद नहीं माना करती!”

 

किन्तु, मैंने पार किया चौखट,

खुद को सिद्ध करते हुए,

कहीं अंदर से खुश हो रही थी,

वर्ष १९७५ की,

मेरी स्त्री मुक्ति की कविताओं को

जागृत करते हुए!

 

लेकिन इस सांझ वेला में,

जब तुम रोगग्रस्त हो,

तुमने नहीं काटे मेरे पंख…

जबरन कैद करने का फरमान सुनाकर,

और उसे एक नाम दे दिया

सीधा सादा भोला सा

पतिव्रता धर्म!

अब मेरा तेज भी ढल गया है,

और मैंने भी—

भीतर से अपने घर के

सारे दरवाजे बंद कर लिए हैं!

 

यह प्रायश्चित है या पराजय?

अपने स्त्रीत्व का!!

पता नहीं!

☆ ☆

भावानुवाद – हेमन्त बावनकर

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ३५ – विस्तारित सम्प्रभुता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – विस्तारित सम्प्रभुता…।)

✍ विस्तारित सम्प्रभुता… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

इससे पहले कि,

खो जाये स्वतंत्र पहचान,

और हो जाये विलय,

किसी डबरे,

पोखर,

तालाब,

नदी या नाले में

 

पानी के हर टपके ने

बनाया

वर्तुल वलय एक

और,

मना लिया उत्सव

अपनी सम्भावित

विस्तारित सम्प्रभुता का ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२५ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २५ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२५ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २५ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

नष्ट जहाँ संस्कृति समूल हो, 

जहाँ ताक पर हर उसूल हो, 

वहाँ पुलिस, कानून, न्याय में 

परिवर्तन आमूल-चूल हो।

0

आजादी की अर्ध सदी का, 

लेखा, नेकी और बदी का, 

हाल राष्ट्र का वैसा ही है 

ज्यों कीचड़ से भरी नदी का।

0

पुत्रों को, टकसाल पिता है, 

होता रहा हलाल पिता है, 

जो था पूज्य, वृद्ध होने पर 

अब जी का जंजाल पिता है।

0

भूखे श्रम की पीर वही है, 

फटे हाल तस्वीर वही है, 

चापलूस चमचमा गये हैं, 

पर, पद दलित कबीर वही है।

0

कोई दृश्य ललाम न आया, 

मन-वाँछित परिणाम न आया, 

कितना भटकाया तृष्णा ने 

मन का तीरथ धाम न आया।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यात्रा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – यात्रा ? ?

झूठ की नींव पर, सच की

मीनार खड़ी नहीं होती,

छोटे मन से कोई यात्रा,

कभी बड़ी नहीं होती।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९८ – गीत –  हो सके तो स्वार्थ… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत  “हो सके तो स्वार्थ…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९८ – गीत –  हो सके तो स्वार्थ… ☆

☆

हो सके तो स्वार्थ, नफरत को जलाओ ।

फूल-सी मुस्कान, अधरों पर सजाओ ।।

*

राह में आती मुसीबत सर्वदा है,

पार करना यह हमारी भी अदा है।

*

लोग हों निर्भीक पथ ऐसा बनाओ।

फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।।

*

जिंदगी कितने दुखों में जी रही है।

और दुख के घूँट कितने पी रही है।

*

दुश्मनों की आँधियों से लड़ रहे जो।

हो सके तो हाथ कुछ अपने बढ़ाओ,

*

खिंचतीं जातीं हैं दीवारें देश में ,

खुद गईं हैं खाइयाँ अब परिवेश में।

*

भारती-संस्कृति को अपनी न भुलाओ,

जो भरा है द्वेष दिल में वह हटाओ।

*

तिमिर छाया है घना, चहुँ ओर देखो,

मौत के पंजे फँसी है भोर देखो।

*

इस घड़ी में कुछ नया करके दिखाओ,

फूल-सी मुस्कान अधरों में सजाओ।।

*

जो समय के साथ आगे नित बढ़ेगा,

मंजिलों की सीढ़ियाँ निर्भय चढ़ेगा।

*

प्रगति के हर द्वार को मिलकर बनाओ,

फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ महारानी लक्ष्मीबाई  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ महारानी लक्ष्मीबाई ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

लक्ष्मीबाई नाम था, वीरों की थी वीर।

राज्यहरण उसका हुआ, तो चमकी शमशीर।।

* 

ब्रिटिश हुक़ूमत से भिड़ी, रक्षित करने राज।

नमन आज तो कर रहा, देखो सकल समाज।।

 *

शौर्यवान रानी प्रखर, जिसका मनु था नाम।

उसके कारण ही बना, झाँसी पावनधाम।।

 *

स्वाभिमान को धारकर, छेड़ दिया संग्राम।

झाँसी दे सकती नहीं, हो कुछ भी अंज़ाम।।

 *

रानी-साहस देखकर, घबराये अंग्रेज़।

यहाँ-वहाँ भागे सभी, लखकर रानी तेज।।

 *

घोड़े पर चढ़ भिड़ गई, चली प्रखर तलवार।

दुश्मन मारे अनगिनत, किए वार पर वार।।

 *

पर दुश्मन बहुसंख्य था, कैसे पाती पार।

गति वीरों वाली हुई, करो सभी जयकार।।

 *

मर्दानी थी लौहसम, अमर हुआ इतिहास।

लक्ष्मीबाई को मिली, जगह दिलों में ख़ास।।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५९ – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अधिनायक वादी प्रजातंत्र…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५९ – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

☆

प्रजातंत्र में

प्रजा ने जिसे चुना

हमने उसे गुना ।

यह क्या

विदेशी वेशभूषा

और

अधिनायकवादी स्वर ।

हम उसे उखाड़ देंगे

उसे पछाड़ देंगे

उच्च स्वर में कहेंगे

केवल हम ही रहेंगे

इस बस्ती में रहेंगे वे

जो हमारा आदेश मानेंगे

हमें सहेंगे।

क्या किसी के पास है

इस कालिया के काटे का मंत्र

आखिर कब तक चलेगा

यह अधिनायकवादी प्रजातंत्र

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५९ – “नदी एक दूध की…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “नदी एक दूध की...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “नदी एक दूध की...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सजी हुई गहनों में

किंचित सराफे सी तुम ॥

साल के मुनाफे सी तुम ॥

 

स्वर्ण रेख नभ से

ज्यों गुजरी हो ।

अप्सरा स्वर्ग से

आ उतरी हो।

 

गौरव की मूर्तिमती

किरण कोई –

आज के इजाफे सी तुम ॥

 

नीली संध्या के

घिरते -घिरते ।

सोम – सत्व नभसे

झरते – झरते ।

 

अम्बर की डाक से

अभी आये –

चौँद के लिफाफे सी तुम ॥

 

तारों से बूँद – बूँद

बिखरी हो ।

नदी एक दूध की

सिरफिरी हो ।

 

जैसे तह खोल

बाँध रखा हो जूड़े पर –

श्वेत – शुभ्र साफे सी तुम ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

12 – 11- 2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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