हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३३ – शायद बादलों के परे भी… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – शायद बादलों के परे भी…।)

✍ शायद बादलों के परे भी… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

नभ के वितान पर

शुभ्र- श्वेत जलधर का डेरा

खो जाता है जिस में सबकुछ

हाँ सबकुछ

विमान भी, जो उड़ रहा हो ऊंचाई पर ।

 

जानता है व्योम

अपरिमित है विस्तार उस का

पर,  है कोई शक्ति कहीं

जो रच रही, लीलाएं  सभी

उसके

चाहे- अनचाहे,  जाने- अनजाने ।

 

होता है बहुत कुछ हूबहू वैसा

चाहते हैं हम जैसा

लेकिन

होता है कुछ ऐसा भी

चाहता है वो जैसा

जो बसता है,  शायद बादलों के परे भी

या फिर,

यहीं कहीं,  मेरे आपके आसपास ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२६ ☆ सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२६ ☆

✍ सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

जो बोले आपका सानी नही है

समझ लो शख़्स बेमानी नही है

* 

न भूँखा नंगा हो दुनिया में कोई

सहर ऐसी कभी आनी नहीं है

 *

बनेंगे बे-बज़ह दुश्मन हजारों

मधुर गर आपकी वाणी नहीं है

 *

हवस दौलत की कब मिटती है उनकी

समझते दुनिया जो फ़ानी नहीं है

 *

बचा लो ज़िंदगी को फिर न रहना

अगर पीने को जो पानी नहीं है

 *

जुटा कर चार गीदड़ शेर घेरो

ये कोशिश बोल बचकानी नहीं है

 *

मिले अवसर भुना लो अक्लमंदी

घटा मौके की फिर छानी नहीं है

 *

करो तालीम हासिल हो जहाँ से नहीं है

गँवाया वक़्त नादानी नहीं है

 *

बड़े बूढ़ों की सुन लो ध्यान देकर

कोई यूं बात समझानी नहीं है

 *

इसे मन की निगाहों से  निहारो

ख़ुदा की जात जिस्मानी नहीं है

 *

कई है रंग के ये गुल का गुच्छा

हयात अपनी परेशानी नहीं है

 *

दगा करना रहा फ़ितरत में उसकी

उसे कोई पशेमानी नहीं है

 *

हसीं कितनी वहाँ कुदरत अभी तक

जहाँ इंसां की निगरानी नहीं है

 *

सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो

 भले ही इसमें आसानी नहीं है

 *

पका न सब्र का फल उम्र बीती

अरुण को सब्र अब खानी नहीं है

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४१ ☆ लघुकथा – देश प्रेम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “देश प्रेम… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४१ ☆

✍ लघुकथा – देश प्रेम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

देश प्रेम दिखावा नहीं होता

हृदय से प्रेम का संचार होता है।

 

देश की जमीन पर

अधिकार के भाव,

चेहरे के कुत्सित भाव

अहंकारी मूंछों पर ताव,

नहीं कर सकता प्रेम प्रदर्शन

न ही उपजता देशप्रेम का भाव।

 

संसाधनों पर अधिकार कर

बढ़ते मिथ्या अहंकार पर

समझ – समझ दिखाना

मुफ्त के माल पर गढ़ी नज़र

देशप्रेम नहीं करने दे सकती

दिल में कोई जज्बा नहीं भर सकती,

ऐसे लोग देश क्या

किसी से प्रेम नहीं करते।

 

देशप्रेम ही करना है प्यारे

देश को समझना होगा,

मानव, फल फूल, वृक्ष,

नदी, नालों से प्रेम करना होगा,

देश से प्रेम करना और कहना,

अंतर समझना होगा।

 

लोगों से बैर

पृकृति के विरुद्ध

आचरण करना,

मासूम लोगों की

जान लेना

देशप्रेम नहीं होता,

देशप्रेम एक जज्बा होता है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२३ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २३ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२३ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २३ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

देखा न ख्वाब कोई, हर गम रहे जगाते, 

विपदा की आग, मेरे आँसू रहे बुझाते, 

सारी मुसीबतें तो मेहमान बनके आयीं 

स्वागत में अपनी पलकें, कैसे न हम बिछाते।

0

जिसके लिये गाँव से आया, 

शहरों में वह चैन न पाया, 

सारे सुख-वैभव हैं लेकिन 

मिली न अपनेपन की छाया।

0

किसने हरियालियों को खाया है, 

बाग लोहे का ऊग आया है, 

आज वीरान हो गये जंगल 

कोई बिल्डर जरूर आया है।

0

बात केवल न मुँहजुबानी कर, 

तोड़ पत्थर को पानी-पानी कर, 

जिसकी खुशबू से सारा जग महके 

अपनी वाणी को रातरानी कर।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९६ – स्मृतियों के आँगन में… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “स्मृतियों के आँगन में…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९६ – स्मृतियों के आँगन में… ☆

☆

स्मृतियों के आँगन में यह,

काव्य कुंज का प्रतिरोपण ।

रंग – बिरंगे पुष्पों जैसे,

भावों का तुमको अर्पण ।

*

कविताओं में अनजाने ही,

लिख बैठा मन की बातें ।

मैं कवि नहीं,न कविता जानूँ ,

न जानूँ जग की घातें ।

*

आँखों से जो झलकी बॅूंदें ,

उनको लिख कर सौंप रहा ।

मन के उमड़े भावों की मैं ,

हृदय वेदना रोप रहा ।

*

माटी की यह सौंधी खुशबू ,

जब छाएगी घर आँगन में ।

संस्कृतियों के स्वर गूँजगे ,

सदा सभी के दामन में ।

*

यही धरोहर सौंप रहा मैं,

तुम मेरी कविताएँ पढ़ना ।

जब याद तुम्हें मैं आऊॅं तो ,

अपने कुछ पल मुझको देना ।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यात्रा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – यात्रा ? ?

झूठ की नींव पर, सच की

मीनार खड़ी नहीं होती,

छोटे मन से कोई यात्रा

कभी बड़ी नहीं होती।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५७ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ७ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५७ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ७ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)

☆

बरनन तुमरे रूप की, छैंयां सौ बढ़ जात ।

कहने खों अँखियन रहत, रहत हत बहुजात ||

 *

जोबन बढ़ बढ़ लेते है, मेंगाई से होड़ ।

जिनके छोटे हाँत हो, उनखे उठे मरोड़ ||

 *

मन परबत बुड़ी रहत, तुमरे प्रेम समुन्द ।

नेंनन में छाई रहे, सदा रूप की धुन्द ||

 *

मुख छब बरनत ना बनें, की से समता होय ।

बाँचों जाँचो चन्द्रमा, हॉतन रहल सँजोय ||

 *

जात हमाई पूँछ लो, पूँछो हमरो नाँव ।

जौरें हमरे आव तौ, हम पीपर की छाँव ||

 *

पेसी पे आये सबई, नाँव लेत दरबान ।

को जाने की खों मिले, कैंसो का फरमान ||

 *

पिंगल की कविताड़ अब, है दिल्ली की कील ।

कविता की दुरगत भयी, बन गय कुकवि वकील ||

 *

जन्ता खों राजा कहें, राजा भये मजूर ।

सेवक राजा हो गये, सब कुइ कहें हजूर ।।

 *

नीत राज से अलग भइ, छितर गये, मन-भेद ।

कट्टर पन ने कर दओ, धरम-नाव में छेद ॥

* 

मन मोरो औगुन भरो, कैसे करौं पवित्र ।

सूझ गई तरकीब जा, राखो नाम सुमित्र ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५७ – “मुँह बाये खड़ी हुई है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मुँह बाये खड़ी हुई है...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मुँह बाये खड़ी हुई है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

कितनी क्या मीठी हो,

 यह तुम्हारी, राय में ।

उतने चम्मच शक्कर

डालूँ मैं चाय में ॥

* 

कितनी कडुआहटें

घुली हुईं जीवन में ।

उधड़ गये टाँके सब

बचे छेद सीवन में ।

 *

भोजन नहीं सम्भव

छोटी सी आय में ।

 *

किश्तों में पनपी है

इस घरको बीमारी ।

मुँह बाये खड़ी हुई

है सब की लाचारी ।

 *

कितना समय बाकी,

रहना सराय में ॥

 *

वक्त जुटा करने को

है अपनी ऐयारी ।

हंस कर रहा बेशक

उड़ने की तैयारी ।

 *

कुछ तो हो सम्भव इस –

आखिरी उपाय में ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

07-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अगुआ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अगुआ ? ?

आहत है अगुआ,

अभ्याहत है अगुआ,

वह जानता था,

सारी आशंकाएँ मार्ग की,

सो समूह की रक्षा के लिए,

समूह के आगे चलता रहा..,

डग भरने से आई चोटें,

घिसटने से लगी खरोंचें,

पीछे चलने वालों के घात,

साथ चलने वालों के आघात,

सुनिश्चित संकटों से दो-दो हाथ,

जयचंदों के अप्रत्याशित विश्वासघात..,

रास्ता दिखाने वालों के पास,

आहत होने के सिवा

कोई विकल्प भी तो नहीं होता ना!

..पर रुको और आगे सुनो!

अव्याहत है अगुआ..!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अबुध ज़िद पर अड़े हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अबुध ज़िद पर अड़े हैं…!

☆ ॥ कविता॥ – अबुध ज़िद पर अड़े हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

तुम  भी ग़ज़ब करते हो यार,

खुद  पर करने चलो हो वार।

*

दुश्मन से जंग को निकले हो,

हाथ में लिए दुधारी तलवार।

*

घृणा के बीज बोए जा रहे हैं,

मात्र कहने को बचा है प्यार।

*

ज्यों-ज्यों हम सभ्य हो रहे हैं,

बढ़ता ही जा रहा है दुराचार।

*

अबुध अपनी ज़िद पर अड़े हैं,

बुध को सुनने को नहीं तैयार।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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