हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६८ ☆ कविता – वह शिक्षा क्या है?… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – वह शिक्षा क्या है?” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६८ ☆

☆ आदर्श भाषण कला : वह शिक्षा क्या है? ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

वह शिक्षा क्या जो मानव को सामाजिक शुभ संस्कार न दे

जन जीवन में मिल जीने को हितकर आचार विचार न दे।।

कई नई समस्याएं हर दिन जीवन में प्रायः आती हैं

सरिता की चंचल लहरों सी उठ गिर प्रश्न उठाती है

उलझन सुलझा सकने को जो सद्बुद्धि न दे आधार न दे ।।।।।

ज्यों मृग मरीचिका आकर्षित करती है रेगिस्तानों में

जीवन में भी बिन समझ भटक जाते यात्री वीरानों में

जो सूझबूझ औ’ दूरदृष्टि का मानव को उपहार न दे ।।2।।

जग में जीवन का केन्द्र बिन्दु सुख पाने की अभिलाषा है

इससे ही जीवन में रस है इससे ही जीवित आशा है

मस्तिष्क हदय औ’ हाथों को जो सर्जन का अधिकार न दे ।।3।।

सिद्धान्त सदा आदर्शों के उज्ज्वल सम्मार्ग दिखाते हैं

पर भावुकता की भंवरों में सिद्धान्त डूब भी जाते हैं

जो चिन्तन को वैज्ञानिक मन को आध्यात्मिक आधार न दे ।।4।।

जिससे गुण गरिमा भय सुगंध सात्विक विनम्रता आती है

जो मुक्ति दायिनी सतत मित्र पथ का अंधकार मिटाती है

वह है शिक्षा सत्साधन जो अभिमान न दे कुविचार न दे ।।5।।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (८) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (८) ? ?

चुप रहो…

क्यों?

देर तक

तुम्हारी खामोशी

सुनना चाहता हूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 6:52 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९५ – नवगीत – नव चिंतन है नवल चेतना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – नव चिंतन है नवल चेतना…।

? रचना संसार # ९५ – गीत – नव चिंतन है नवल चेतना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

मन तुरंग उड़ता ही जाता

डालो भले नकेल।

*

कभी पढ़े कबीर की साखी,

कभी पढ़े वह छंद।

तृषित हृदय की प्यास बुझाता,

पीकर मधु मकरंद।।

अंग-अंग में बजती सरगम,

चलती प्रीति गुलेल।

*

संकल्पों की सीढ़ी चढ़ता,

हों कितने अवरोध।

हर चौखट पे अमिय ढूँढ़ता,

करता है अनुरोध।।

चढ़कर अनुपम शुचिता डोली,

नवल खेलता खेल।

*

नव चिंतन है नवल चेतना,

शब्द-शक्तियाँ साथ।

शब्दकोश करता समृद्ध भी,

सजे गीत हैं माथ।।

मधुरिम नवरस अलंकरण की,

चलती जैसे रेल।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२३ ☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रेम।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

प्रेम बिना कुछ भी नहीं, प्रेम मधुरतम राग।

प्रेम अनोखी साधना, यही प्रेम अनुराग।।

 *

प्रेम अगर सच्चा मिले, हो जीवन गुलज़ार।

समझा जिसने प्रेम को, छाई मधुर बहार।।

 *

प्रेम नदी की धार है, बहता शीतल नीर।

इसमें जो भी डूबता, हर जाती है पीर।।

 *

प्रेम सुधा का भाव है, मन का मिटता क्लेश।

जिसके उर में प्रेम हो, बनता वही विशेष।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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1

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०५ ☆ कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०५ ☆

☆ कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

सर चढ़कर अब गर्मी बोले |

सबकी सहनशीलता तोले ||

आँख तरेर दिवाकर कहता |

अब झेलिए आग के गोले ||

*

युद्ध छिड़ा खाड़ी में भीषण|

संकट में है जन साधारण||

जिसकी लम्बी नाक यहाँ पर |

बढ़ चढ़कर कर रहा आक्रमण ||

बढ़ती खूब युद्ध की गर्मी |

बरस  रहे  बारूदी शोले |

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

व्याकुल सब इंसान यहाँ हैं |

पशु पक्षी हैरान जहाँ हैं ||

किसे खबर है यहाँ जीव की |

शांति दूत अब बुद्ध कहाँ है |

कोई करता बात शांति की |

कोई बातों से विष घोले||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

लगते सभी खून के प्यासे |

सर्वनाश के  घिरे  कुहासे ||

धधक रही बदले की ज्वाला |

नेता  देते  झूठ  दिलासे ||

रंग  बदलते जैसे गिरगिट |

चंचल मन  जैसे है डोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

आँखों में अब नीर कहाँ है |

सबके मन अब धीर कहाँ है ||

टूट रहा विश्वास सभी का |

अब पहले से वीर कहाँ हैं ||

लादी  जैसे  अब  बेशर्मी |

कहता समय बनो मत भोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

युद्ध तेल को ताप रहा है |

असंतोष अब व्याप रहा है ||

मानव घातक शस्त्र बन रहा |

विकट तबाही  नाप रहा है ||

युद्धों  में  संतोष  खोजता |

दृश्य देख लगता है रो ले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆ मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है  ‘मंजिरी की कुण्डलियाँ ‘।)

 

☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆

? कविता – मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

-1-

द्वारे मेरे प्रभु चलो,  क्यों करते अवलम्ब l

राह आपकी मैं तकूँ,  कर में लिये प्रलम्ब ll

कर में लिये प्रलम्ब,  भरत आये अब मिलने l

राज पाट सब छोड़,  मना कर लाऊं धर में ll

ले कर ये सन्देश, कहें चल संग हमारे l

सभी तके हैं राह,  चलो प्रभु अब तो द्वारे ll

-2-

गाते गाथा वह चला,  माधव का संदेश l

आया जब उद्धव लिये,  बृज में किया प्रवेश ll

बृज में किया प्रवेश,  देख ही झपटे सारे l

क्या कहता है कृष्ण,  बात करते हैं न्यारे ll

समझा उद्धव आज,  प्रेम की सारी बातें l

नमन हुआ हैं माथ,  चला वह गाथा गाते ll

-3-

आता जन को तब समझ,  करता पल जब चूर l

तूफानों में सब बड़े,  हो जाते हैं दूर ll

हो जाते हैं दूर,  सभी ने हैं यह माना l

समय दिया संदेश,  भूल मत मुझको जाना ll

बोले पैसा आज,  दम्भ सर पर चढ़ जाता l

हो जाता कंगाल,  समझ तब जन को आता ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २४ – कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘एक सफर बीज का…‘।)

☆ शशि साहित्य # २४ ☆

? कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

हर बीज का नसीब नहीं होता वृक्ष हो जाना,

जाने कितनी अग्नि परीक्षा से गुजर कर अंकुरित हो पाना…

कहीं नर्म मुलायम मिट्टी की गोद नहीं मिलती,

कहीं जल भरे मेघों की बूंदे नहीं गिरती…

कभी जलाती तपन, बन जाती है कफन,

कभी बाढ़ में ठहरने को जमीं नहीं मिलती…

जीवन शुरू होने से पहले, सपने हो जाते हैं दफन,

बड़े वृक्षों से पनपने की इज़ाजत नहीं मिलती,

पैरों तले कुचल जाते हैं, कुछ नन्हे अंकुरण,

बेपरवाह परिस्थिति से, चंद सांसे नहीं मिलती…

फिर भी !!!! जो दम रखते हैं, हर मुश्किल का करने सामना…

वो खिल उठते हैं चीरकर, पत्थरों का भी सीना…

अथाह समर्पण और शक्ति का है यह मामला,

आसान नहीं है विपरीत परिस्थितियों को सहयोगी बना लेना…

ईश्वर की कृपा से ही पर्वत पर हरियाने की किस्मत है मिलती,

ना हो यह तो हरियाली में भी एक पत्ती नहीं खिलती…

तय करना पड़ती है तमाम मुश्किलें राहों की,

वरना हर बीज को, पुनः बीज बनाने की क्षमता नहीं मिलती…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆

☆  कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

 

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

 

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

 

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (७) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (७) ? ?

कोलाहल

निपट पहली

संख्या हो

या असंख्येय

हो चुका हो,

कोलाहल

संख्यारेखा के

बाएँ हो या दायें हो,

हर बार

हर समय

कोलाहल की

परिणति

चुप्पी ही होती है,

चुप्पी शाश्वत है

शेष सब नश्वर!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018,  प्रातः 6:59 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५२ ☆ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते …“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆

✍ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ज़ुबाँ से अपनी जो भी तुम कहा नहीं  करते

तुम्हारे चश्म बयाँ सब वो क्या नहीं करते

 *

कभी वो अपनी न मंज़िल को पा सके यारो

जो अपने पैरों पै इंसाँ चला नहीं करते

 *

नज़र से सिर्फ हिक़ारत की देखते हो सभी

वहाँ बुलावा हो लेकिन  रुका नहीं करते

 *

है जिनका अज़्म मुक़म्मल पहुँचते मंज़िल पर

सफ़र तबील हो फिर भी थका नहीं करते

 *

अना में उसकी व मेरी रहेगा क्या अंतर

भले किया वो दगा पर दगा नहीं करते

 *

यक़ीन आप परख देख कर किया कीजे

घुने जो बीज है बो लो उगा नहीं करते

 *

है बेवफा वो तो तुहमत न आम कर दीजे

सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते

 *

बुझाने आग को तकलीफ जो उठा  न सको

अरुण है काफी जो उस पर हवा नहीं करते

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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