हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – केंद्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – केंद्र ? ?

खींचकर एक वृत्त

बीचोंबीच बिठा दी गई औरत

घोषित कर दिया गया उसे केंद्र,

बताया गया,

वृत्त, केंद्र के इर्द-गिर्द घूमता है,

भूल गए ताली बजानेवाले हाथ

राउंडर की नोक पर

छिदने-गुदने से बनता है केंद्र,

वृत्त की परिधि छोटी-बड़ी

करता है परकार

केंद्र की नाभि पर होकर सवार,

हाँ, परकार के कृत्य का

विवश, मूक माध्यम भर बनता है केंद्र,

केंद्र आनंदित है

परिधि को विस्तृत कर दिया गया है,

केंद्र दमित है

परिधि को लगभग समेट दिया गया है,

अपने ही वृत्त में कैद औरत

आजीवन मनाती रहती है जश्न

मिलती-छिनती आज़ादी का,

उस रोज़ कोई मंच से कह रहा था

देखो हम इंसानों ने

औरत को कितनी आज़ादी दी है,

जरा मुझे बताना भाई

औरत इंसान नहीं होती क्या?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मराठी कविता  – कविता तुम्हारे लिए… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ☆

श्री भगवान वैद्य प्रखर

? मराठी कविता ?

कविता तुम्हारे लिए… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

उज्ज्वला केळकर

यह कविता तुम्हारी 

तुम्हारे लिए

सामने बरसता धुआंधार पानी

सम्पुष्ट कर रहा है

रोम-रोम में बोया गया

तुम्हारा स्पर्श …

घर ने कब का नकार दिया मुझे

मंदिर भी नहीं कोई निगाह में

या कोई धर्मशाला, जर्जर ही सही

 

नीला आकाश

रूठकर दूर चला गया है मुझसे

धूप का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं

उष्मा के लिए

इस दिशाहीन सफर में साथ हैं

तुम्हारी अनगिनत यादें

और…अब…

उनकी छितरी हुईं कविताएं…।

** 

 मूल कविता – -उज्ज्वला  केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

भावानुवाद  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

30, गुरुछाया कालोनी, साईंनगर, अमरावती  444607

संपर्क : मो. 9422856767, 8971063051  * E-mailvaidyabhagwan23@gmail.com *  web-sitehttp://sites.google.com/view/bhagwan-vaidya

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४५ ☆ वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४५ ☆

✍ वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अपने ईमान को कमजोर बनाता क्यूँ है

ख़ुद के किरदार को  इंसान गिराता क्यूँ है

 *

है ये अच्छा कि निकल जाए किनारा करके

दिल नहीं मिलता है तो हाथ मिलाता क्यूँ है

 *

बेचकर कोई पकौड़े न बना अंबानी

शेख चिल्ली के हमें ख़्वाब दिखाता क्यूँ है

 *

इस खराबात के रस्ते की तबाही मंज़िल

हर बशर जानता पर खुद को चलाता क्यूँ है

 *

हैसियत की हो जहाँ क़द्र हुनर से बढ़कर

ऐसी महफ़िल में ए फ़नकार तू जाता क्यूँ है

 *

वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है समझे

बाप को आज कोई पुत्र सिखाता क्यूँ है

 *

वस्वसा दिल से नहीं दूर हो तो जाँ ले लो

आज़मा के तू मुझे रोज़ सताता क्यूँ है

 *

सामने सबके नज़र भी न उठा के देखे

वक़्त बे वक़्त मुझे घर पे बुलाता क्यूँ है

 *

पान मुझको न दिया मान लिया हो गुस्सा

गैर को हाथ से तू अपने खिलाता क्यूँ है

 *

है बराबर के जो बेटे तो मदद ले उनकी

बोझ काँधों पे सभी घर का उठाता क्यूँ है

 *

भूलिए शौक़ वो तकलीफ़ दे मख्लूक़ को जो

मुर्ग तीतर व बटेरों को लड़ाता क्यूँ है

 *

हाथ सोने को लगाऊँ तो हो जाता माटी

इतना नाराज़ हुआ मुझसे विधाता क्यूँ है

 *

एक फक्कड़ से जरूरत जो वो सीखी न अरुण

दाँव पर ज़र के लिए जान लगाता क्यूँ है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५० – भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – भरोसा।)

☆ हेमंत साहित्य # ५० ☆

✍ भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे  

बिजली की तार पर

या

पतली सी डगाल पर

सोते,

ऊंघते,

परिन्दे देखकर

लगता है ऐसा

 

कि

नही गिरेंगे वो

कभी भी नींद में

किसी भी तार से

किसी भी डगाल से ।

 

कि

भरोसा है उन्हें

उस पर

जो दिखता तो नही

पर है

यहाँ,

वहाँ,

सर्वत्र ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४३ – बुन्देली कविता – ”रिश्ते-नाते टोरत जा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४३ ☆

☆ बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

रिश्ते-नाते टोरत जा रय

मन की खीब बहोरत जा रय

*

हाँत फेर खें बे समझाउत

तुम उनखें झकझोरत जा रय

*

निकरौ बाहर खीब सपर लव

गैरी नदिया लोरत जा रय

*

कैत भले की, काय सुनत नइँ

जबरइँ दाँत निपोरत जा रय

*

राम-लखन ने तिलक लगाये

तुलसी चंदन गोरत जा रय

*

बे गोबिन्दा पहलमान हैं

कई मटकियाँ फोरत जा रय

*

पंडत जी खें काय भिड़ा दव

‘भगवत’ सपरत-खोरत जा रय

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मंज़िल पर फ़ैसला… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “मंज़िल पर फ़ैसला…

? मंज़िल पर फ़ैसला ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

 

फ़ैसला मंज़िल पर ही होगा

अभी से कैसे उसे बेवफ़ा कह दूँ

सफ़र मुकम्मल तो होने दो

बेबुनियाद इल्ज़ाम कैसे लगा दूँ

 *

अभी ख़ामोश हैं ये सर्द हवाएँ

लिए धड़कनों में उसका नाम

ये तो वक्त़ की तंगदिली है

इसे जुदाई का नाम कैसे दे दूँ

 *

तमाम मोड़ हैं बाक़ी राहों में

कई इम्तिहाँ अभी भी हैं बरक़रार

अधूरी सी इस दास्ताँ को ख़त्म

होने का ऐलान  कैसे कर दूँ

 *

नज़र की धुंध छँट जाएगी

हक़ीक़तें भी सामने आएँगी

अभी  तो  सच है अधूरा

यूँही ऐलानबेवफ़ा कैसे कर दूँ

 *

आफ़ताबये इश्क़ ठहरता नहीं

वक्त़ के साथ ही निखरता है

कल क्या रंग दिखाएगा ये

अभी से कैसे दूरअंदेशी कर दूँ

 *

वो धुंध में नहीं, मेरे यक़ीन में साफ़ है…!

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता ? ?

नाज़ुक होती हैं

कविता की अँगुलियाँ

नरम होती हैं

कविता की हथेलियाँ

स्निग्ध होते हैं पाँव

जैसे केसर-मलाई का लेप

दूधिया तलवे

जो मखमली दूब पर चलें

तो दूब की छाप

उन पर उभर आए,

यों समझो,

एकदम नाज़ुक

एकदम मुलायम

एकदम नरम

सुडौल

भरी-भरी देह वाली

बेहद सुंदर

बलखाती औरत-सी

होती है कविता;

प्रौढ़ शिक्षा वर्ग में

शिक्षक महोदय पढ़ा रहे थे,

वो मजदूर औरत

चुपचाप देखती रही

अपनी खुरदुरी हथेलियाँ

कटी-छिली अँगुलियाँ

मिट्टी सने पैर

बिवाइयों भरे तलवे

बेडौल

जगह-जगह से पिचकी-सी देह

उसका जी हुआ

उठे और चिल्लाकर कहे-

नहीं माटसाब!

कविता ऐसी भी होती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१६ – भारत की है शान, वंदेमातरम ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “भारत की है शान, वंदेमातरम। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१६ ☆

☆ भारत की है शान, वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

भारत की है शान, वंदेमातरम।

बंकिम जी का गान वंदेमातरम।।

 *

गोरों से लड़ी लड़ाई थी सबने।

आजादी का ज्ञान वंदेमातरम।।

 *

गाथाएँ बलिदानों की भरी हुईं।

जनता की अब तान, वंदेमातरम।।

 *

गांधी सुभाष आजाद भगत नारा।

स्वतन्त्रता बलिदान, वंदेमातरम।।

 *

झुका न पाया कभी तिरंगा कोई।

रखे हथेली जान, वंदेमातरम।।

 *

परिवर्तन आंदोलन का शस्त्र बने।

इस पर अब अभिमान, वंदेमातरम।।

 *

सैनिक कर्ज चुकाएँगे सीमा पर

कर्तव्यों का भान, वंदेमातरम।।

 *

राष्ट्रभक्ति की अलख जगाएंगे हम।

गाएंगे सब गान, वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७८ – अब तो जागो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – अब तो जागो।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७८ – अब तो जागो…१ ✍

(काव्य संग्रह – ‘उजास ही उजास’  से )

बड़े बाप के बिगड़ैल बेटे की तरह

बेवजह गुस्सा होता हुआ

तेजी से निकल गया – वर्ष।

और

एक जोरदार धक्के से गिरा दिया

उस बूढ़े बरगद को

जो हमारी छाया था, घर था, ईश्वर था।

उसने ही हमें रचा था

उसके सिवा हमारे पास

कुछ भी नहीं बचा था ।

हम पंछी नहीं थे

कि उड़ जाते

बस रोने लगे।

हमें याद आने लगे वे पल

जब हम

धूप के कोड़ों से हो जाते थे विकल

और छुप जाते थे बरगद की छाँह में

वह हमें लेकर बाँह में

झूला झुलाता था,

गाता था-

कादर मन कहुँ एक अधारा

दैव दैव आलसी पुकारा

उसने ही सौंपे थे

खेत और खलिहान

उसने ही सौंपी थी- गंधवती लताएँ

और बताएँ ?

क्रमशः १

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७७ “न जाने क्या क्या संज्ञा दें – …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत न जाने क्या क्या संज्ञा दें – ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “न जाने क्या क्या संज्ञा दें – ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

 नहीं निकल पाती हूँ

इस अवगुंठन झीने से ।

“सरक गई तिथियाँ ” –

असमंजस लिये ” महीने ” से ॥

 

बहुत व्यापती चिन्ता का

यह आगे बढ़ जाना ।

थकी देह को जैसे विवश

निरुत्तर गढ़ माना ।

 

कितु निरंतर यही एक

आश्वासन जैसा कुछ –

लिये हुये सोचा करती हूँ

जिसे करीने से ॥

 

” पेट रह गया ” कहा किसीने

था बेशरमी से ।   

रोक नहीं पायी है खुद को

तन की गरमी से ।

 

देहराग के सुख में डूबी

मनोकामना सी –

बचा नहीं पायी है खुद को

किसी कमीने से ॥

 

गाँव, गिरस्ती, बस्ती सब में

शीत लहर जैसा ।

फैल गया है कथा कथन

बस किसी कहर जैसा ।

 

लोग कुलच्छिनि कहें

न जाने क्या क्या संज्ञा दें –

जब कि ” चढ़ गये थे दिन “

मेहनत और पसीने से ॥

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

28-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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