हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७५ – सुमित्र के दोहे ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है सुमित्र के दोहे।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७५ – सुमित्र के दोहे ✍

☆ 

रोई ब्रज की गोपिका, रो रहे नंदलाल।

 चुप्पी साधे राधिका, आंसू करे सवाल।

 *

आंसू का इतिहास है आशु का भूगोल ।

आंसू का विज्ञान अब, रहस्य रहा है खोल।।

 *

आंसू है संवेदना आंसू, मन की पीर।

यशोधरा का रूप है, जसोदा की जंजीर।।

 *

जनक दुलारी चल पड़ी, ओढ़ अश्रु का चीर ।

आंसू डूबी अयोध्या, राम मौन गंभीर ।।

 *

घनानंद का अश्रुधन, अर्पित कृष्ण सुजान।

उसी अश्रु की धार में, डूबे थे रसखान ।।

 *

आंसू डूबी सांस से, रचित ईश्वरी फाग।

रजउ ब्रह्म थी, जीव थी, ऐसा था अनुराग।।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७४ – “सपनों जैसा घर…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत सपनों जैसा घर...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “सपनों जैसा घर...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

उसके आँचल के खूँटों में

जैसे बँधी व्यथा ।

माँचौके में लिखकर आयी

है प्राचीन कथा ॥

 

भूख, स्वाद, संतुष्टि, पुष्टि के

सारे पात्र जहाँ ।

मिलजुल कर के लिखें तृप्ति की

बारह खड़ी वहाँ ।

 

वहीं कहीं विश्वास, सेंक कर

रखती डिब्बे में –

उसका प्रेम पराँठों के संग

होता नहीं मृथा ॥

 

वह अदभुत करुणा की

अनुपम दाल पकाती है ।

जिसमें संध्या, चाँद कूदकर

बना चपाती है।

 

और इसी क्रम, चावल का

पकना, खुशबू देना –

बस आधारहीन असमंजस

जैसा जथा – तथा ॥

 

सपनों जैसा घर, घरके

सपने , सपने से हैं ।

यहाँ प्रश्न के उत्तर , सब

अपने अपने से हैं ।

 

सभी पाण्डवों का पालन

कुन्ती करती आयी –

जो थी कभी बोझ न,

सहने वाली विनत प्रथा ।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

07-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सेलेक्टिव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सेलेक्टिव ? ?

अधिकांशत:

उनका लेखन

केंद्रित होता है

स्त्री देह पर,

मन,अंतर्द्वंद

भावना,वेदना

तो बहुत दूर

जाने क्या है

उन आँखों में

कि उभरता ही नहीं

प्रतिबिम्ब, स्त्री के

हाथ, पैर

कंधे, कान

घुटने, टखने

पेट, पीठ का,

वे आँखें देखती हैं

…देखती नहीं..,

वे आँखें घूरती हैं

प्राकृतिक लज्जा को ढके

कुछ ‘सेलेक्टिव’ हिस्सों को,

कोई बता रहा था

चर्चित होने के लिए

‘सेलेक्टिव’ होना

ज़रूरी होता है..,

पर मेरी बात

यहाँ समाप्त नहीं हुई है

सुनो प्रसिद्धि-पिपासुओ!

मैं कलम चलाते

रहना चाहता हूँ,

लिखते रहना चाहता हूँ,

लेखक बने रहना चाहता हूँ,

लेखन पर चर्चा चाहता हूँ

पर चर्चित होने के लिए

‘सेलेक्टिव’ लिखना नहीं चाहता!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रंग तो रंग है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆

☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆

रंग तो रंग है

हर शै में उमंग है

 

कहीं पीला है कहीं नीला है

कहीं सफेद है कहीं लाल है

कहीं बैंगनी कहीं हरा है

कहीं जामुनी है कहीं काला है

हर कोई मतवाला है

 

सारा जमाना रंगों से सरोबार है

खूब रंगों का कारोबार है

पिचकारियों की धूम है

कहीं रंगों से झूमती टोली है

कहीं फूलों के रंगों की

सादगी पूर्ण होली है

 

कहीं इतराती, बचती बचाती बालाएं है

रंगों ने जिन्हें भिगो डाला है

उनके गले में रंग बिरंगी मालायें है

नये नये रंग लगायें है

नाचती हुई तरुणाई है

सब पर झूमती हुई होली आई है

 

वयस्क टीका लगा रहे हैं

भांग के नशे में युवा फाग गा रहे हैं

चंग और डफ बज रहे हैं

 रंग-बिरंगे परिधानों में सब सज रहे

 

चहु और उल्लास उमंग छाई है

यह होली खुशियां लेकर आई है

 

पर कहीं पर सन्नाटा है

जिनके घर अभी-अभी बुलडोजर से टूटा है

वह आंसुओं की होली मना रहे हैं

भूखे पेट फिर भी फाग गा रहे हैं

आसमान में बिखरे कई रंग है

क्या उनके जीवन में कोई रंग उतर आएगा ?

क्या उनका यह होलिकोत्सव रोते-रोते ही बीत जाएगा ?

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९८ – कृष्ण खेलें होली, राधा के संग… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कृष्ण खेलें होली, राधा के संग।)

☆ अभिव्यक्ति # ९८ ☆ कृष्ण खेलें होली, राधा के संग☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

रंगों में रंग, होली के रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंग गुलाबी, प्रेम भरा है,

लाल रंग विश्वास भरा है,

नीला रंग है, श्याम के जैसा,

रहें सदा संग संग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंगों की वर्षा, राधा करतीं,

सखियां भी न पीछे हटतीं,

रंग गुलाल की वर्षा होती,

गोकुल की गलियां रंगती,

नर नारी के संग, ,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

संग नहीं खेलना, मुझको ये रंग,

तेरे ही रंग में, अंग जाए रंग,

राधा खो जाए, श्याम में आकर,

जैसे ज्योति दीपक में जाकर,

आपस में एक रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष – रौशनी के बल पर…!  ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – रौशनी के बल पर…!

☆ ॥ कविता॥  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष – रौशनी के बल पर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

स्त्री! जो सदियों से

पुरुष के द्वारा रचे गए

पिंजरे में क़ैद थी

जिसे भोग की वस्तु समझा गया

जिसके आत्मसम्मान को

बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया

जिसकी मुक्तता को

बदचलनी करार देकर

उसे जंजीरों में जकड़ दिया गया

जिसके सपने देखने पर

बंदिशों की बाड़ खड़ी कर दी गई

पर वक्त ने करवट बदली

और आज वह तालीम की

रौशनी के बल पर

हौसलों के परों पर सवार होकर

परी-सी अंबर में उड़ी जा रही है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७० – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७० ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

(छंद दोहा, भाषा हिंग्लिश)

पढ़ी तुम्हारी फेस बुक, बाँच लिया मैसेज।

मन मोबाइल ने हुलस, किया तुम्हें एंगेज।।

.

मन मीठी मनुहार भर, करता रहा कमेंट।

गिरा रहा बिजली निठुर, मधुमेही परहेज।।

.

चुटकी काटी ख्वाब में, कर तेरा दीदार।

गुझिया खाई-खिलाई, करी शुगर मैनेज।।

.

रँगे रुपहले बाल जब, पूछ रहे थे गाल।

हमको रँगने का कहो, कहाँ खो गया क्रेज।।

.

ड्रीम दिखा मिल गा रहे, ड्युएट चढ़ाए भाँग।

चढ़ी न उतरी दिलजले, सैल्फी रहे सहेज।।

.

आई कह आई नहीं, ड्रीम गर्ल   क्यों लेट?

वेट वेट कर कम हुआ, क्या उसको नॉलेज?

.

रँगरेजन आ रंग ला, लगा रही चितचोर।

वाट्स एप इंस्टा करें, लुक-छिपकर कवरेज।।

.

आई लड़ी झुक उठ मिली, आई चुराए हार्ट।

आई आई तो आई कह, आई सजाए सेज।।

.

होली होली हो गई, होती होगी मान।

सुमिर लोनली बैठकर, सलिल मालगुडी डेज।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

४.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ महिला दिवस 8 मार्च ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

🌻कविता 💃🏼 महिला दिवस 8 मार्च 🌻

दोहा–

नारी तू नारायणी, बाँटे सबको प्यार ।

सृजन करें नव वंश की, रखे नही अधिकार।।

चौपाई – –

कुलवंती रसवंती प्यारी ,अलग-अलग रूपों में क्यारी।।

रहती मर्यादा है बाँधे , ह्दय सुकोमल धीरज कांधे ।।

 बनी अन्नपूर्णा कल्याणी, ममता भरती मीठी वाणी ।।

सृजन करें शुभ वंशज नारी, हर विपदा को हँस कर टारी।।

दोहा—-

ममता कर अनमोल है, कहते वेद पुराण।

ऋणी रहे है देव भी, संकट करती त्राण।।

चौपाई – – –

सोनपरी बाबुल की प्यारी, बनी पराई है लाचारी।।

घर आँगन को हँस कर छोड़ा, नये घरो से नाता जोड़ा।।

मातु-पिता की बिटिया भोली,भ्रात कहे बंदुक की गोली।।

छू लेती है नभ के तारे, इनके शौक बड़े ही न्यारे।।

दोहा–

हर नारी के भाग में, प्रभु लिख दे वरदान।

शुभ लक्ष्मी है संग में, इनका हो सम्मान।।

चौपाई – – –

है अनगढ़ चमकीली मोती, दर्द मिले आंसू से धोती।

लेकर पलकों में सब बातें, जाग रही वो सारी रातें।।

लाज शरम की गठरी ओढ़े, सपनों को मुट्ठी में मोड़े।।

हर रिश्ते की प्रीत निभाई, फिर भी  सब क्यों कहें पराई।।

दोहा–

मन की भाषा बोलती,रख नैनों का ध्यान।

 मांग सिंदूर साजती, बनती पति पहचान।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४५ – कविता ☆ ~ बुझा दो इस अग्नि को – क्रोध ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४५ ☆

☆ कविता ☆ ~ बुझा दो इस अग्नि को – क्रोध ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ )

क्रोध में शब्दों की मर्यादा बिखर जाती है।

भावनाओं की हत्या होती है

औऱ रिश्तो की अर्थी निकल जाती है

 

क्रोध वह बुझी हुई आग है

जो न जाने क्यों,

राख में भी धधकती है

समुद्र की शांत लहरों से

उठकर भभक पड़ती है

 

क्रोध एक ऐसी अग्नि है,

जिसमें हवन हो जाती है खुशियां,

जल जाते हैं

वर्षो के सजोये सपने,

पल भर में जल जाती है,

मेहनत से उगायी फसलें,

 

क्रोध डराती है, कांपते हाथों को

गर्दन से लटकती झुर्रियो को

मल मूत्र से भीगे,

मुश्किल से सूखे आँचल को

पूरी रात जग कर बिताये उस पल को

 

दुबारा तड़प उठती है वह गरीबी,

जो अभी-अभी,

नर्म मुलायम बिस्तर पर सोई थी

बरस पड़ते हैं सूख चुके आंसुओं के बादल

भीगने लगतीं हैं मुश्किल से सुखी पलकें

 

बुझा सको तो हमेशा के लिए बुझा दो,

स्वयं के भीतर जलती क्रोध की लौ को

जला सको तो जला दो,

अर्थी पर भी उठकर,

बैठ जाने वाले शव को

 

भूल जाओ छोटी मोटी बातों को

दिल के भीतर के जज्बातों को

पूरी रात जगकर एकटक निहारती रातों को,

आंखों में छाई घटा और बरसातों को

 

क्रोध के दावानल के दफन होते ही,

पुराने खुशियों के दिन लौट आते हैं

मैंने देखा है, गन्ने की जली फसल से भी

मीठे पौध निकल आतें है।

रातें हंसने लगती हैं, दिन गुनगुनाते हैं

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उ प्र, (भारत)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बीज ? ?

धरती जन्मती है

घने अरण्य,

हरी घास

कच्ची दूब

सुरभित पुष्प..,

 

धरती उपजाती है

स्वादिष्ट कंदमूल,

पौष्टिक अनाज,

फलों से लदी लताएँ

बुुुुभुक्षा की सारी संभावनाएँ..,

 

धरती बलात पैदा करती है

केमिकल से सने अनाज

पेस्टिसाइड से भीगी तरकारियाँ

संस्करित के नाम पर संकरित फल

खुशबू की राह तकते फूल..,

 

धरती उछालती है

असीम समंदर

मीठी नदियाँ

ताल-तलैया

प्यास बुझाती झील-कुइयाँ..,

धरती उगलती है

सुनामी

ज्वालामुखी

ज़हरीली गैस

और भूकंप भी..,

 

जानते हो न,

‘धृ’ धातु से बनती है धरती

‘धरिणी’ धारण करती है,

जो ‘धरती’ है,

वही धरती है,

जो निगलती है

वही उगलती है..,

 

सुनो,

कुछ समय

अब भी शेष है,

विचार कर लो

धरती क्या निगले

ताकि क्या उगल सके..,

बीज तुम्हारे हाथ है,

तुम सुन रहे हो न मनुष्य..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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