हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९७ ☆ गीत – ।। पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९७ ☆

☆ गीत ।। पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

पैसों के लिए दोस्ती पैसे का याराना है।

आ गया यह कैसा  अजब सा जमाना है।।

***

पैसे की गुलाम बनती   जा रही है दुनिया।

मतलब परस्त सी ढलती जा रही है दुनिया।।

अच्छे कर्मों से अब नाम नहीं कमाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

****

कुछ के अच्छे कर्मों से संसार चल रहा है।

मानवता नाम अभी जिंदा सा लग रहा है।।

रिश्ते भी दिखते जैसे पैसों का दोस्ताना है।

पैसों के लिए दोस्ती,  पैसे का याराना है।।

***

भूल गए लोग किअपनों का साथ जरूरी है।

सुख बढ़ता दुख बंटता यह इसकी दस्तूरी है।।

बना आज कल जिंदगी का गजब फसाना है।

पैसों के लिए दोस्ती, पैसे का याराना है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २४ – कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋतु वसंत“.)

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २४ ?

? कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

क्या कविता-गीत लिखूँ तुम पर, तुम ख़ुद हो गीत-ग़ज़ल साथी

तुम कली हो तुम ख़ुद तितली हो, तुम ख़ुद हो खिला कमल साथी ll

=2=

इतना है प्रेम प्रगाढ़ मेरा, जीना तुम बिन दुश्वार मेरा

धड़कन कहती दिल भी कहता, तुम बिन हर पल है विकल साथी ll

=3=

अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, तुम साथ निभाना सुख-दुःख में

फ़िर देखो सजा-सुसज्जित सा, अपने ख़्वाबों का महल साथी ll

=4=

शर्मो-हया के दल-दल में, देखो मैं दला सा जाता हूँ

बातें मैं न कर पाऊँगा, अब तुम ही करो पहल साथी ll

=5=

हो बहार जीवन में संगी, रहे न शिकवा-गिला कोई

हर लम्हा ख़ुशनुमा सजीला, जीवन जाए सम्हल साथी ll

=6=

जब दौर बुरा आये कोई, तब साथ मेरे रहना ऐसे

ज्यों परछाई रहती है, संग रहना तुम हर पल साथी ll

=7=

मुस्कान चाँदनी जैसी है, स्वर कोई मधुर कोकिला सा

दुनिया में चीज़ हसीं जितनी, लगती है तेरी नकल साथी ll

=8=

तुम हो सतरंगी इन्द्रधनुष, मेरे जीवन नभ-मण्डल पर

हुआ बसेरा मन में जबसे, दिल में मची हलचल साथी ll

=9=

ओझल यूँ न होना नज़र से, बस यही इल्तिज़ा है मेरी

दूर हुई तुम कुछ क्षण को भी, ये दिल न जाए मचल साथी ll

=10=

विकट क्षणों में जीवन के तुम, सदा निभाना साथ मेरा

बनना ऐसा मेरा सहारा, ज्यों ग्रंथों की रहल साथी ll

=11=

ऋतु वसंत आयी मादकमयी, रंग पर्व रंगीला

दिल निश्छल यह प्रेम अटल, यह इश्क़ रहे अव्वल साथी ll

=12=

फाल्गुन मादक मस्त अहा, रंगीला नशीला महीना

महुआ ज्यों मदमत्त होके, सब दूर करें अटकल साथी ll

=13=

जीवन क्यों बदरंग रहे, इस रंग-बिरंगी होली में

‘राजेश’ रंग दूँ गाल तेरे, तू साथ मेरे अब चल साथी ll

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६० ☆ कविता – इस दुनियाँ में… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – इस दुनियाँ में…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६०

☆ इस दुनियाँ में…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

इस दुनियाँ में सबसे सुन्दर अनुपम भारत देश है

अपने में अपना सा प्यारा इसका हर परिवेश है ।।

इस दुनियाँ में…

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण बिखरा अति सौंदर्य है

वन, मरूथल, पर्वत, नदियों मंदिरों में भी आश्चर्य है

प्राकृत सुषमा, हरे भरे खेतों में अजब मिठास है

हर प्रदेश का खान-पान कुछ भिन्न है, मोहक वेश है || 1 ||

इस दुनियाँ में…

उत्तर, ओड़ीसा, कर्नाटक अलग नृत्य संगीत है

खान पान जीवन पद्धति में सबकी अपनी रीति है

फिर भी सब हैं सरल भारतीय, संस्कृति अनुपम एक सी

गंगोत्री से रामेश्वर तक धार्मिक भाव विशेष है || 2 ||

इस दुनियाँ में…

राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हर मन की पावन चाह है

प्रगति हिमालय सी संवृद्धि हो जैसे सिन्धु अथाह है

जीवन सबका निर्मल मन पावन हो कर्मठ भावना

भारत का युग युग से “बंधुता’ प्रेम रहा संदेश है ||3||

इस दुनियाँ में…

सकल देश में दूर छोर तक सरल सादगी व्याप्त है।

अभ्यागत का स्वागत मन से करना सबको आप्त है।

धार्मिक मर्यादाओं का सभी निर्वाह सदा हर हाल में

हरेक निवासी के मन में बैठा पूर्वज आदेश है ||4||

 *

इस दुनियाँ में सबसे सुंदर अनुपम भारत देश है।

जिसके आध्यात्मिक वैभव की चर्चा देश-विदेश है ।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८४ – नवगीत – नेह-डोर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीतनेह-डोर

? रचना संसार # ८४ – गीत – नेह-डोर…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मत जाना तुम कभी छोड़ कर,

रात-दिवस मैं जगता हूँ।

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

*

प्रिये सामने जब तुम रहती,

मन पुलकित हो जाता है।

लेता है यौवन अँगडाई,

माधव फिर प्रिय आता है।।

प्रेम सुमन पल-पल खिल जाते,

भौरों-सा मैं ठगता हूँ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

**

नेह  डोर तुमसे बाँधी है,

जन्म- जन्म का बंधन है ।

साथ न छूटे अब प्रियवर भी,

प्रेम ईश का वंदन है ।।

मेरे उर में तुम बसती हो,

नाम सदा ही जपता हूँ ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

**

रूप -अनूप बड़ा मनमोहन,

तन में आग लगाता है ।

आलिंगन को तरस रहा मन,

हमें बहुत तडपाता है।।

चंचल चितवन नैन देख कर,

ठंडी आहें भरता हूँ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विभाजन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विभाजन ? ?

यथा-तथा

किंतु-परंतु

अगर-मगर

ओह-पर

फ़सादी ़ज़बान

उन्मादी माहौल

सर्वदा जन्म देते हैं

विभाजन को..,

 

रेल ढोती है लाशें

छतों पर होती हैं जच्चा

सीमाओं की जंग में

जनती हैं बच्चा..,

मुझे लगता है,

विभाजन के दंश

सबसे ज्यादा

भोगती-सोखती है औरत,

घर,परिवार, बच्चों और

बारबार अपनी देह पर..,

 

इस ओर का बीज उस ओर,

उस ओर का बीज इस ओर,

लाशों से भरी रेलों में

प्राण का संवाहक होती है औरत..!

 

औरत की कोख में दबा

यहाँ का बीज पनपता है वहाँ,

वहाँ का बीज पनपता है यहाँ..,

 

भविष्य में यही बीज

उठ खड़े होते हैं

एक-दूसरे के विरुद्ध

और अपने नये खेमे से

फूँकते हैं शंख

अपनी ही धरोहर के विरुद्ध..,

 

धरती पर खड़े कर

कँटीले तार

शासक बाँट लेता है सीमाएँ

पर माँ बच्चों को बाँट नहीं पाती..,

 

सुनो विभाजन के पक्षधरो!

गुरुत्वाकर्षण केवल

धरती में होता है

इसके अभाव में

अंतरिक्ष में पैर धरातल पर

टिक नहीं पाते,

औरत धरती होती है,

धरतीवासियो! सोचो

अगर धरती नहीं होती तो..?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१२ ☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – फागुन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

आया फागुन मास अब, सुन्दर चले बयार।

हर आँगन में गूँजती, ढोलक की झंकार।।

धरा सजी है आज तो, करे लाल शृंगार।

मन में सबके उठ रहे, सुखकर प्रीति विचार।।

 *

बैर मिटेगा आज तो, रंग भरा त्यौहार।

रंग बरसता प्यार का, नेह  भरी बौछार।।

 *

गुझिया मीठी रसभरी, स्वाद लगे हर बार।

घर-घर बनती है यही, होली  प्रिय त्योहार।।

 *

श्याम संग राधा सजी, बरस रहा है प्यार।

प्रेम सुधा की धार है, आओ सब नर-नार।।

 *

भाई बहन के प्यार का, भाई दूज त्यौहार।

हर रूप में अमर रहे, भाई बहन का प्यार।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९४ ☆ मीरा पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – मीरा पर कुछ दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९४ ☆

☆ मीरा पर कुछ दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

मीरा मानक प्रेम की, जिनका पावन प्यार

लड़ती रहीं समाज से, मानी कभी न हार

*

कृष्ण प्रेम में डूब कर, लोक लाज दी छोड़

संतों के सत्संग से, आया नूतन मोड़

*

मीरा सी दीवानगी, मधुर प्रेम का राग

इस जग में दूजा नहीं, मीरा-सा अनुराग

*

स्वामी समझें कृष्ण को, मन में प्रेम अपार

मीरा सुध-बुध भूलकर, करतीं जय जयकार

*

रसिक बिहारी में रमी, करतीं नृत्य कमाल

मन मथुरा तन द्वारिका, मीरा के ये हाल

*

वृंदावन-सा है हृदय, बहे प्रेमरस धार

मनमोहन मन में बसे, यही एक शृंगार

*

मीरा ने जग की कभी, करी नहीं परवाह

साधक मोहन की बनूँ, यही एक थी चाह

*

कृष्णमयी लगता रहा, मीरा को संसार

जित देखें उत कृष्ण ही, दिखते थे हर बार

*

हे मनमोहन हमें भी, शरण लीजिए आप

मन में हो ‘संतोष’ धन, करूँ सदा ही जाप

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – गोपी संग रास रंग… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता गोपी संग रास रंग।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – गोपी संग रास रंग…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

ओ रे कान्हा, तू कितना सयाना,

जाने कब गगरी में मेरी,

तूने केसर रंग मिलाया,

मैं तो हूं निपट अनाड़ी,

भोली भाली, सीधी सादी,

जान सकी ना, तेरी शरारत,,

तुझे अपनी और देख निहारत,

मैं शरमाई, मैं सकुचाई,

धड़कते दिल, लरजते हाथों से,

मटकी उठा, कमर से लगा, फिर सर पर चढ़ाई,,

मैं चल दी पनघट से घर की राह,

ना पा सकी, तेरे मुस्काते नैनन की थाह,,

होले से फिर कुछ तूने फेंका,,

हाये, , महकते फूल या कोई प्रेम निशानी ???

लेकिन, अरे रे रे रे,,

कंकड़ी मोहे मारी,

गागरिया फोड़ डाली,,

केसर के रंग में रंग गई,

मेरी चोली चुनर सारी…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अनौपचारिक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अनौपचारिक ? ?

मन विदीर्ण हो जाता है

जब कोई ऊपरी

कह-बोल कर

आदर, अपनत्व

बताता-जताता है,

भीतर कुछ दरक जाता है,

जब कोई रिश्तों को

औपचारिकता का

लिबास पहनाता है,

जानता हूँ-

नेह की छटाओं में

होती नहीं एकरसता है

पर मेरी माँ ने कभी नहीं कहा

‘तू मेरे प्राणों में बसता है।’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्री” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्रीपर चर्चा।

☆ कविता  ☆ सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्री ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

सादा जीवन अर ऊँचे विचार

यो नारा तो बहुतां नै दिया सै,

पर अगर किसी आदमी के जीण में

इस बात नै साच्चा उतरता देखणा हो,

तो वो थे लाल बहादुर शास्त्री।

प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद पै पहुंच कै भी

उनकी सादगी वैसी ही रही

जैसी बचपन में थी।

जो बोल्या, पहले खुद अपनाया—

यो ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी।

अगर महात्मा गांधी कहैं थे

म्हारा जीवन ही म्हारा संदेश सै,

तो शास्त्री जी भी इस कसौटी पै

पूरे उतरै।

इत्तफाक देखो—

दोनों की जयंती एक ही दिन आवै सै।

कई मायनों में

शास्त्री जी भी गांधी जी से

कम ना थे।

प्रधानमंत्री बणण के बाद

देश-विदेश में लोग सोचण लागै

कि यो नन्हा सा आदमी

इतणा बड़ा देश कैसे संभालेगा?”

पर जब पाकिस्तान नै हमला किया,

तो शास्त्री जी नै ऐसा करारा जवाब दिया

कि अयूब खान घबरा गया।

जिस आदमी नै वो सीधा,

सरल अर मृदुभाषी समझै था,

उसे यो पता ही ना था

कि उसके पीछे

लोहे जैसा मजबूत आदमी छुपा सै।

घुसपैठ करकै हार्या हुआ दुश्मन

अर कर भी क्या सकता था—

अपने ही लगाई आग में

उसके हाथ जल चुके थे।

ऐसी सादगी की प्रतिमूर्ति

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म

2 अक्टूबर 1904 नै

बनारस के पास रामनगर कस्बे में हुआ।

उनके पिता शारदा प्रसाद

इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में

अध्यापक थे।

शारदा प्रसाद अर उनकी घरवाली

रामदुलारी—

दोनों ही बड़े धार्मिक अर संस्कारी थे।

बचपन में ही पिता गुजर गए,

तो मां के सारे संस्कार

उनके जीण में बस गए।

उनकी परवरिश

ननिहाल में नाना हजारीलाल के साए में हुई,

जो खुद स्कूल मास्टर

अर सुसंस्कृत आदमी थे।

शास्त्री जी का बचपन

घणी गरीबी में बीता।

खेलण का मन था—

हॉकी अर फुटबॉल खेलणा चाहते थे,

पर जब घर में खाने के पैसे ना हों,

तो खेल का सामान कहां से आवै?

पर उनकी तेज बुद्धि नै रास्ता ढूंढ लिया।

खजूर के फूल बटोर कै,

फटे-पुराणे कपड़े में लपेट कै

वो खुद गेंद बणा ले।

मजबूत पेड़ की टहनी तोड़ कै

हॉकी स्टिक बणा ले।

परिस्थितियां चाहे जैसी हों,

लाल बहादुर नै

उन्हें अपने अनुकूल बणाण की

पूरी कोशिश की।

वो जानै थे

कि कर्म का रास्ता

कभी फूलां की सेज ना होया।

उन्होंने कभी

अपने लक्ष्य के लिए

आसान राह ना पकड़ी।

कद छोटा था,

शरीर कमजोर था,

पर हिम्मत बला की थी।

इतिहास गवाह सै—

आसान काम करै वाला

कभी महान काम ना कर सके।

लाल बहादुर जी

संघर्ष की मिट्टी से बने थे।

प्रेम देना अर पाणा

उन्होंने ननिहाल से सीखा।

दुखी आदमी नै देख कै

पिघल जाणे का गुण

उन्हें मां से मिला।

शिक्षा का मान

उन्हें पिता के खून से मिला।

जैसी भी हालत आई,

उन्होंने खुद नै

उसी में ढाल लिया।

दुख सहे,

पर टूटे ना—

बल्कि और निखर गए।

वो कहा करै थे—

संतोष के किले नै

कोई भेद ना सके।

थोड़े में खुश रहणा

उनकी बड़ी ताकत थी।

परेशानियां साथ चलती रहीं,

फिर भी उन्होंने लिखा—

कुल मिलाकै

म्हारा स्कूली जीवन

हंसी-खुशी बीता।

उनकी बोली मीठी थी

अर व्यवहार दोस्ताना।

मित्रता के लिए बढ़ा हाथ

कभी ठुकराया ना।

अर जब जरूरत पड़ी,

तो दोस्ती का हाथ

आगे बढ़ाण में

कभी हिचकिचाए ना।

कर्म के मामले में

वो हमेशा गंभीर रहे।

उन्होंने अपने जीण में

छोटे-बड़े घणे काम किए,

पर किसी काम नै

नीचा समझ कै ना देख्या।

हर काम नै

कुशल कारीगर की तरह

पूरे मन से किया।

जो आदमी कर्म में

सावधान अर साहसी हो,

वही सबसे आगे निकले सै—

अर यो दोनों गुण

शास्त्री जी में भरपूर थे।

घर की हालत

कुछ खास ना थी,

पर देशसेवा

उन्हें सबसे ऊपर लागै थी।

कर्म नै पूजा मानण वाले

गांधी जी से

उनका गहरा लगाव था।

पहली बार

गांधी जी का भाषण सुना,

तो वो पूरी तरह

मंत्रमुग्ध हो गए।

लाल बहादुर

मां की इजाजत जरूरी समझै थे।

जब उन्होंने देशसेवा की बात कही,

तो मां बोल्ली—

बेटा, मन्नै तुझ पै पूरा भरोसा सै।

तू कोई भी फैसला

सोच-समझ कै ही करेगा।

मां की यो बात

उनके दिल का बोझ उतार गई।

इजाजत मिलते ही

वो छात्र आंदोलन में कूद पड़े।

1921 में

उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा,

पर रत्ती भर भी अफसोस ना हुआ।

कुछ घंट्यां बाद

चेतावनी देकै

उन्हें छोड़ दिया गया।

एक बार

उन्हें साइकिल खरीदणी थी,

पर पैसे ना थे।

पर लाल बहादुर

मुश्किलां नै

जिंदगी की परीक्षा मानै थे

अर मुस्कुरा कै सह ले।

उनकी सोच

इन पंक्त्यां में दिखै सै—

मुश्किलें आदमी का हौसला परखैं सै,

सपणां पै पड़्या पर्दा हटावैं सै।

गिर जावै, गिर कै संभल जा,

ठोकरां ही चाल सिखावैं सै।

जिंदगी की सच्चाई यो सै

कि गिरणा अर गिर कै संभलणा

ही चलणा सिखावै सै।

लाल बहादुर

भीड़ से अलग सोचै थे,

इसीलिए

अपणी अलग पहचान बना सके।

उनकी घरवाली

ललिता देवी

भी सादगी की मिसाल थीं।

जब शास्त्री जी

केंद्रीय मंत्री बने,

तो भी ललिता जी के कपड़े

दो-चार से ज्यादा ना बढ़े—

वो भी तब,

जब बेट्यां नै

साड़ी पहनाण की जिम्मेदारी ले ली।

आजादी के बाद

शास्त्री जी नै

पुलिस अर यातायात मंत्री बनाया गया।

उत्तर प्रदेश में

सड़क यातायात का राष्ट्रीयकरण

उनका बड़ा फैसला था।

बाद में

दूसरे राज्यां में भी

यो लागू हुआ।

नेहरू जी

शास्त्री जी की काबिलियत

अच्छी तरह जानै थे।

27 मई 1964 नै

नेहरू जी के गुजर जाण के बाद

देश में सवाल उठ्या—

अब देश नै

कौन संभालेगा?

भारत का भविष्य

कौन संवारेगा?

नेहरू जी पहले ही

लाल बहादुर शास्त्री नै

भावी प्रधानमंत्री

मान चुके थे।

पर किस्मत नै

ज्यादा मौका ना दिया।

10 जनवरी 1966 की रात

दिल का दौरा पड़ा

अर 11 जनवरी की सवेरे

वो परमात्मा में

लीन हो गए।

देह चली गई,

पर सादगी, ईमानदारी बच गई

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares