हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३४ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मधुमास।)

☆ शशि साहित्य # ३४ ☆

? कविता – मधुमास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

रूप सजा वसुधा का दुल्हन सा,

बलिहारी हो रहे ऋतुराज…

बदरा भी रिमझिम हुए,

हरियाली का है राज…

*

टिप टिप करती बूंदनियां,

ज्यों बजे कहीं पर साज…

भावुक मन में उठे हिलोरें,

बतलाओ क्या है राज…

*

प्रकृति खिलखिला उठी,

पहन लिया  सौंदर्य का ताज…

ना बोलो कुछ कठोर बोल,

दिल पर गिरे है गाज…

*

बूंदों संग खुशियां बरसें,

छाया मधुमास है आज…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “शहर कहाँ है?” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆

☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

तुम्हीं बताओ

शहर कहाँ है?

अभी यहीं था

गया कहाँ है ।

 

घर सारे बन गए दुकानें

विज्ञापन से ढके मोहल्ले

शहद घुली खो गईं बोलियाँ

पसर गए कर्कश हो-हल्ले

कुछ तो बोलो

आम आदमी

आख़िर क्यों

लाचार यहाँ है ।

 

तीरथ गुंडे घट-घट व्यापे

चौराहों पर रोज़ प्रदर्शन

मठाधीश के आदेशों पर

ठग मंडल के भजन कीर्तन

चौपट सारी

हुई व्यवस्था

मूक बधिर

कानून जहाँ है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६२ ☆ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “उसका ईमान मर गया“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६२ ☆

✍ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मन के भ्रम से उबर गया कब का

सच था मुझमें निखर गया कब का

 *

हार की फ़िक़्र,डर गया कब का

जीत का ज़ोम भर गया कब का

 *

राह की रौनकें जो रास आई

छोड़ वो हम सफ़र गया कब का

 *

सच का परचम उठा लिया जबसे

सबका ख़ौफ़ो-ख़तर गया कब का

 *

बात पर जिसकी हो फ़िदा इतने

उसका ईमान मर गया कब का

 *

छाँव हटते पिता की सिर से मेरे

दर्प सारा उतर गया कब का

 *

तोड़कर रब्त हाल वो पूछे

ख़्वाब हर इक बिखर गया कब का

 *

दौरे हाजिर का ये सितम है अरुण

आदमी मुझमें मर गया कब का

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६६ – मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – मिल जाए गर कोई नाख़ुश।)

☆ हेमंत साहित्य # ६६ ☆

✍ मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना,मनाना,मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत,शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना, फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश,नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

 

तीरगी =  अंधकार, तनकीद = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७४ ☆ कविता – साथी आज मेरे साथ चल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “साथी आज मेरे साथ चल“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७४ ☆

✍ कविता ☆ साथी आज मेरे साथ चल☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

साथी आज मेरे साथ चल, 

कल क्या था कल क्या होगा, 

इसको मत याद कर।

*

बीता हुआ पल काँटा था, 

आने वाला ख्वाब है, 

दोनों के बीच ये लम्हा 

सबसे हसीन जवाब है।

*

साथी आज मेरे साथ चल,

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

दर्द को अलमारी में बंद कर दे, 

फिक्र को खिड़की से फेंक दे, 

आज धूप भी हमारी है, 

आज हवा भी हमारी है।

*

साथी आज मेरे साथ चल,

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

चल उस पीपल के नीचे बैठें, 

चाय की चुस्की में किस्से बुनें, 

न कल का हिसाब माँगें, 

न कल का वादा ढूंढें।

*

साथी आज मेरे साथ चल

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

ज़िंदगी ठहरी नहीं है साथी, 

वो तो बहती नदी का नाम है, 

तू मेरा हाथ थाम ले बस, 

यही इस पल का पैग़ाम है।

*

साथी आज मेरे साथ चल

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५७ – बुन्देली कविता – ”खुदइ कलारी जाउत हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – खुदइ कलारी जाउत हैं।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५७ ☆

☆  बुन्देली कविता – खुदइ कलारी जाउत हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

खुदइ कलारी जाउत हैं

लरकों खें समझाउत हैं

 * 

टुन्न भये कवि मंचों पे

लच्छन उतै झराउत हैं

 *

बे साली-जीजा बन खें

घटिया जोक सुनाउत हैं

 *

जी पै ताली पिट रइ हैं

ग़ज़ल हमाई गाउत हैं

 *

नकली, ढोंगी बाबा जे

संतों खें लजबाउत हैं

 *

आगी में घी डार रये

दो की चार लगाउत हैं

 *

कोट – कचैरी के चक्कर

भगवतघर बिकबाउत हैं

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२९ – रिश्तों की डोरी फिर टूटी…. ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रिश्तों की डोरी फिर टूटी….। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२९ ☆

रिश्तों की डोरी फिर टूटी….  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

रिश्तों की डोरी फिर टूटी।

समझो अपनी किस्मत फूटी।।

*

सामाजिक प्राणी है मानव।

अपने परिवारों की खूटी।।

*

नेताओं की बात न पूछो।

धन दौलत जमकर है लूटी।।

*

दर्द विनाशक हैं सदियों से।

आयुर्वेद की जड़ी-बूटी।।

*

मानव रहा अकेले घर में।

आँगन कौदों-कुटकी कूटी।।

*

प्लेटफार्म पर मैं भी पहुँचा।

देख रहा था गाड़ी छूटी।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९६ – प्रायमरी का मास्टर…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९६ ☆

☆ – प्रायमरी का मास्टर…१  ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

(रचनाकाल : दीपावली 1970)

 कहीं पढ़ा था

गुरू बहुत बड़े होते हैं,

कहीं सुना था कि

वे प्रभु की बराबरी से खड़े होते हैं।

 

कबीर की कड़ी के लोग

चाहे जितना गाएँ-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाँय

लेकिन आज

गरियाये जाते हैं गुरूजी

बिलानागा।

 

कोई नहीं कहता

बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा

कैसे प्रकट करूँ मैं

अपने मन के पाप को,

 

कि काम भी बन जाय

और

बुरा भी न लगे आपको।

जी, तबियत उचट रही है

अपने व्यवसाय से,

और भी संगाती है

पूछ लीजिये न समूचे समुदाय से-

कि पूरा पड़ जाता है

तुम्हारा तुम्हारी आय से ?

उत्तर में निकलती है

सिर्फ एक हाय

क्रमशः…२

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९३ – “फिर भी रही तिरस्कृत…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “फिर भी रही तिरस्कृत ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “फिर भी रही तिरस्कृत...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रही अनिश्चिता

जो उसको तोड़ रही थी।

वही अभागिन बस

अपना घर छोड़ रही थी ॥

 

पीछे उस की बुनियादी

जरूरतों वाली ।

थी शापित परम्परा

या गम की दीवाली ।

 

पुत्र नहीं दे सकी महज

उसकी गलती थी –

यह रूढी समाज की

उसे निचोड़ रही थी ॥

 

जब कि उसी के हाथों में

इस  घर का कौशल ।

उसके हृदय नहीं था

चिन्तित करता छल बल ।

 

और पुराने लोगों की

बस कहन -समझ में –

सज्जनता -सच्चाई का

गठजोड़ रही थी ॥

 

सारे गुण थे उसमें

फिर भी रही तिरस्कृत ।

नये उलहने और झिडकियाँ

सहती नितनित ।

 

सहनशक्ति ,कर्तव्यपालना

के रहते वह –

अच्छाई की ओर बुराई

मोड रही थी।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “झोपड़ी निर्जीव न थी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – झोपड़ी निर्जीव न थी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

 

उस झोपड़ी में

सिर्फ़ घास फूस तिनके ही न थे

उसमें बसती थी

ज़िंदगी की जद्दोजहद

वह सिर्फ़ धूप से राहत नहीं

और बारिश से बचाती ही नहीं थी

एक सुरक्षित आसरा और पनाहगाह थी

टूटती सांसों को थामने के लिये

चूल्हे की आंच में तपते संघर्ष की

वह मूक साक्षी थी

टूटी चारपाई में वहां

कोई गुदड़ी का लाल पलता था

रात को टिमटिमाते दिये के उजाले से

कोई उम्मादें, आशाएं पलती थीं वहाँ

वो हारी नहीं, संसार के वैभव के आगे

हठ कर बैठी वह कुटिया

हारूंगी नहीं कभी

किसी आंधी, तूफ़ान के आगे

मेरे अंदर अभी

जीजीविषा की आधारशिला

बहुत मज़बूती से जड़वत् है

और रहेगी, तब तक

जब तक ” जीवन ” मेरे भरोसे

बसा रहेगा यहाँ…!!!!????

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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