हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “बेदर्द” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “बेदर्द” पर चर्चा।

☆ कविता  ☆ बेदर्द ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

☆

बेदर्द हैं वो लोग जो दर्द ना जाने ओरों का,

किसान मजदूर करें मेहनत जाने ओरों का ।

*

महिलाओं का सम्मान नहीं इस जग सारे में,

जबर भरोटा बांध के रख ठेकेदार ओरों का‌ ।

*

बहन बेटी का जन्म दुनिया में लगता पराया धन,

इज्जत खुद की बचाती  बढाती जग में मान ओरों का‌।

*

मोमबत्ती की तरह समाज रूप घर में तम को दूर कर,

पहले खुद का फिर घर मोहल्ला का फिर कर ओरों का।

*

दर्द दुनिया का सुनाते सुनाते हुए हम भी बेदर्द हैं,

दुनिया भर छान कर रहा हूं मैं  ना दर्द लेता कोई ओरों का‌।

*

किसान की गति धीमी हो जाती जब फसल नहीं होती,

खेत किनारे बैठ सोचते कैसे गुजरेगा दिन ओरों का।

*

मजदूर महल बना बना थक जाता कब बनता है मेरा,

पूरी उम्र गुजार दी मैंने घर बनाते बनाते ओरों का।

*

शिक्षा शिक्षक किसान मजदूर इन सब को जीवंत कर दो,

देश दुनिया खेल व्यापार खेती से ग़रीबी मिटा ओरों का।

*

मनजीत कह इस जग सारे में कौन क्या करता है,

भूल गए हैं अपने आप को जो जीवन जीते ओरों का ।

☆

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०४ ☆ भावना के दोहे – नव वर्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नव वर्ष।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नव वर्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

बीते कल की सीख से, जगता नव विश्वास।

 ले आया नव वर्ष है, मन में नवल उजास ।।

 *

अब तो देखो ढल रही, ढली दिसंबर शाम।

बीते लम्हें को करें, दिल से सभी सलाम।।

 *

करते हम तो अलविदा, बीता प्यारा वर्ष।

नमन साल को कर रहे, खूब मनाओ हर्ष।।

 *

समय कभी रुकता नहीं, समय सिखाता सीख।।

जिसने कीमत समझ ली, मांगे समय न  भीख।।

 *

चक्र समय का घूमता, घूम रहा दिन रात ।

समय रेत सा फिसलता, करो समय से बात।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८६ ☆ अहम पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके  अहम पर कुछ दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८६ ☆

☆ अहम पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

अहम करे किस बात का, हे मूरख इंसान

क्यों जमीर को मारता, पाल पोष अभिमान

*

धन, दौलत, वैभव सभी, कभी न देते साथ

अंत समय सब छोड़कर, जाना खाली हाथ

*

छोटा हो या हो बड़ा, हो कोई इंसान

अहम पालता जो सदा, उसका गिरता मान

*

रखें बड़प्पन चित्त में, मन में उच्च विचार।

सबके प्रति सद्भावना,  प्रियता का व्यवहार।।

*

खुद की महिमा का कभी, खुद मत करें बखान

बड़बोलापन छोड़िये, गिरता उससे मान

*

अहम पाप का मूल है,  रहें अहम से दूर।

सहज सरल होकर करें, परहित कार्य जरूर।।

*

पाकर पद अधिकार जब,  बिगड़े चाल चरित्र।

काम, क्रोध, मद, लोभ तब, बनते कपटी मित्र।।

*

अहम सदा ले डूबता,  करता मति विध्वंस।

बचे न कोई देखलो, रावण, कौरव, कंस

*

जीवन में यदि चाहिए, शांति परम संतोष

छोड़ें कभी न नम्रता, नाहक  करें न रोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ६ – कविता – क्यूं उच्छवास में उदासी है ? ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘क्यूं उच्छवास में उदासी है ?‘।)

☆ शशि साहित्य # ६ ☆

? कविता – क्यूं उच्छवास में उदासी है ? ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

मलाल है, कि 25 भी निकल गया..

समय ही तो वह चक्र है,

जिसका हर पल बदल गया..

बीते कल पर डालो नजर,

कितने खजाने झोली में भर गया..

नए से रिश्ते, नयी दोस्तियां,

नई पहचान, नए सपने और,

नए अनुभव दे, परिपक्व कर गया..

कदमों तले तुम्हारे, ठोस आधार बन,

उन्नति के नए सोपान रच गया..

बिखेरे थे, जो धरती के गोद में,

उन बीजों का उत्सर्जन हो गया..

जितना बन सके, भला करते चलो,

धर्म से सुगम मार्ग, प्रशस्त हो गया..

बंदिशों की बेड़ी डालो, दुर्गुणों पर..

कह सको.. 26 नई उपलब्धियां दे गया..    

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आगत का स्वागत करें…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – आगत का स्वागत करें…!

☆ ॥ कविता॥ आगत का स्वागत करें…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

विगत  की करें विदाई, आगत  का स्वागत करें,

छोटों को गले लगाएँ,बड़ों समक्ष शीश नत करें।

* 

परहित की सोचें दुखियों के दृगों से आँसू पोंछें,

मानव होने का दायित्व निभाएँ, दूर आरत करें।

 *

जो सज्जन हैं उनकी सबके सम्मुख प्रशंसा करें,

दुष्टजनों की सार्वजनिक लानत-मलामत करें।

 *

जीवन में चाहें जितनी आँधियाँ औ’ तूफ़ां आएँ,

किन्तु हरदम ऊपर उठने का जतन-चाहत करें।

 *

जीवन में गुजरे पल कभी लौटकर आते नहीं हैं,

कल की चिन्ता छोड़ें, आज की हिफ़ाज़त करें।

 *

घृणा-द्वेष,कटुता मिटाकर,शत्रुता को भुलाकर,

मिल-जुलकर सभी निर्मित अभिनव भारत करें।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जस दृष्टि तस सृष्टि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

🙏 नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏

? संजय दृष्टि – जस दृष्टि तस सृष्टि ? ?

हर दिन देखता है

नये सूरज का उत्थान,

हर दिन देखता है

पुराने सूरज का अवसान,

हर दिन देखता है

जीवन का संघर्ष नया,

हर दिन देखता है

जीवन का उत्कर्ष नया,

हर दिन देखता है

दिन में समाया हर्ष नया,

हर दिन देखता है

दिन में सिमटा वर्ष नया,

चाहो तो अपनी आँख में

उसकी दृष्टि उतार लो,

चाहो तो हर पल

नये वर्ष की सृष्टि उतार लो…!

 

? सभी पाठकों को शुभ 2026 ?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 11.37 बजे, 31 दिसम्बर 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नूतन वर्ष अभिनंदन … ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “नूतन वर्ष अभिनंदन …”।

? नूतन वर्ष अभिनंदन… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

बीता वर्ष धुँधला होकर, एक इतिहास मात्र रह गया

कल की थकी हवाओं में, हर संघर्ष कहीं बह गया

* 

समय न रुकता कभी, न मुड़ता, उसका धर्म है गति

सूर्य नित्य सिखलाता ये, हर अस्त के बाद है ज्योति

 *

अब नए वर्ष की दहलीज पर, आशाओं का दीप जले

मन दृढ़ हो, नित्य संकल्प उठें- हर अँधियारा छूट चले

 *

जो खोया, वह अनुभव बनकर मन की गहराई बन गया

हर पीड़ा का छोटा कण भी जीवन का अध्याय बन गया

 *

नूतन वर्ष लाएगा नव-सुख व समृद्धि का हर्षित गीत

नव आशाओं की शीतल छाया में, हर पथ होगा प्रदीप्त

 *

करें सहस्र दीपशिखा प्रज्वलित, हों पूरित समस्त आकांक्षाएं

नव वर्ष के शुभ अवसर पर, स्वीकारें हमारी, शुभकामनाएँ

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७९ ☆ यह अपना  नूतन वर्ष है… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७९ ☆ 

☆ यह अपना  नूतन वर्ष है… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

शस्य श्यामला धरती पर

हरषे नर्तन की शहनाई

तब अपना नूतन वर्ष है

मंद-सुगंध चले पुरवाई

तब अपना नूतन वर्ष है

*

यह सर्द कुहासा छँटने दो

रातों का पहरा हटने दो

धरती का रूप निखरने दो

फागों के गीत थिरकने दो

*

कुछ करो प्रतीक्षा और अभी

प्रकृति को दुल्हन बनने दो

खुशियों में गाए अमराई

तब अपना नूतन वर्ष है

मंद-सुगंध चले पुरवाई

तब अपना नूतन वर्ष है

*

प्रतिप्रदा चैत की आने दो

धरती को सुधा लुटाने दो

चहुँदिश को ही महकाने दो

तन-मन में फाग सुनाने दो

*

यह कीर्ति सदा है आर्यों की

यह आर्यावर्त की प्रीत रही

जब धरा दुल्हन-सी मुस्काई

*

तब अपना नूतन वर्ष है

मंद-सुगन्ध बहे पुरवाई

तब अपना नूतन वर्ष है

*

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध

नव वर्ष हमारा है प्रसिद्ध

ब्रह्माण्ड रचे कुछ नव नूतन

तब होती जग में रिद्धि-सिद्धि

*

तितली फूलों पर मँडराएँ

भौंरे फागों को गुंजाएँ

उल्लास उमंगें मन भाईं

*

तब अपना नूतन वर्ष है

मंद-सुगंध बहे पुरवाई

तब अपना नूतन वर्ष है

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दोहे नये साल के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ दोहे नये साल के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

नये साल के पल नवल, खुशहाली है आज।

मंगलमय यह दौर है, चहके ख़ूब समाज।।

* 

नई चल रही है हवा, खुशबू के नव रंग।

आज निराशा से करे, नव आशा तो जंग।।

 *

सूरज की तैयारियाँ, नया लिया संकल्प।

देखो अब अवसाद का, काल बहुत ही अल्प।।

 *

नग़मे अधरों पर नये, नया बज रहा साज़।

हैं उमंग में आज सब,  खुशियांँ हैं सरताज।।

 *

नई चेतना दे रही, जग को नव आनंद।

मस्ती में अब झूमता, नर-नारी का वृंद।।

 *

मायूसी रोने लगी, उल्लासित मुस्कान।

नया आज परिवेश है, मिला समय को मान।।

 *

आज नया संघर्ष है, आज नवल है जोश।

उम्मीदों के दौर में, लक्ष्य आज आगोश।।

 *

अर्जुन ने ली है शपथ, धारित नया कमान।

नया तीर है शक्तिमय, होगा नव संधान।।

 *

धूप सुनहरी है निकट, सिद्ध आज दिनमान।

सकल विश्व की गति नवल, हर कोई बलवान।।

 *

नये साल का आवरण, नव होने की बात।

समय बा़ँटता बेहिचक, जन-जन को सौगात।।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०८ – कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय दोहे “धन जीवन की दौड़…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०८ ☆

☆ कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

धन से घर आबाद कुछ, धन से कुछ बर्बाद।

धन में ही है विष बसा, धन ही पुनित प्रसाद।।

*

धन जीवन धन प्राण है, धन जग का आधार।

है अनंत धन की कथा, महिमा अपरंपार।।

*

द्वेत और अद्वेत के, चतुर तुम्हारे दाँव।

धन्य-धन्य धनदेव जी, धन्य तुम्हारे ठाँव।।

*

धन-धन कर जीते रहे, निधन हुआ तो शुन्य।

माया के व्यामोह में, कमा सके कब पुण्य।।

*

धन तब श्रेष्ठ पुनीत है, मन भी हो धनवान।

धन-मन का हो संतुलन, मिलता तब सम्मान।।

*

जिनके मन सद्भाव है, उनके सभी करीब।

प्रेमहीन जो धन यहाँ, वह धन बड़ा गरीब।।

*

केवल धन से ही नहीं, मन से बनें अमीर।

वह धन सार्थक है तभी, हरे दीन की पीर।।

*

बड़े मौज में हैं वही, जो खुद से संतुष्ट।

धन लोभी को घेरते, चोर-लुटेरे-दुष्ट।।

*

ताला धन पर डालकर, लगी मुहर की छाप।

फिर चाबी चिंता बनी, बढ़ा और संताप।।

*

खुश रहना है तो जियें, मन से बनें अमीर।

चाह नहीं चिंता नहीं, जैसे मस्त फकीर।।

*

जीवन भर संग्रह किया, आखिर खाली हाथ।

सद्भावी शुभ सम्पदा, होगी केवल साथ।।

*

परहित सेवा धन बिना, जीवन का क्या अर्थ।

बाद मृत्यु के संचयित, सारी सम्पति व्यर्थ।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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