हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२९ ☆ बदलाव ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बदलाव” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२९ ☆ बदलाव ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

सारी चौपाल गुमसुम बैठी है

सभी के चेहरे बुझे हुए हैं

पंच से लेकर सरपंच तक

मूक दर्शक की तरह

कर रहे हैं आचरण सूझ नहीं रहा

इस कर्मकांड से निजात पाना

हल्कू की लड़की मुँ ह काला

करके जो लौट आई है

और बार बार यही कहती है

मैंने नहीं किया है कोई गुनाह

शहर से लेकर गाँव तक

फैल गई है खुलेपन की हवा

इस हवा में जल रहे हैं सारे वजूद

सारी व्यवस्था परंपरा, और आदमी का ग़ुरूर

सहमते माहौल में बात के लिए

नहीं रह गया है कोई मुद्दा

शब्द भाषा के स्तर पर सभी दृष्टिकोण

लगने लगे हैं बेमानी

और मैं ठगा सा देखता हूँ बदलाव

इस बदलाव के माने क्या हैं?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “रात सब बराबर कर देती है” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कविता – “रात सब बराबर कर देती है” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सुख दुःख

गमी खुशी

हर ऊंच नीच

सब बराबर हो जाते हैं

रात की अंधेरी चादर में !

सब एक जैसे हो जाते हैं!

यह दिन है

जो उजाले में

सारी पोल खोल देता है

रात की कारीगरी पर !

रात बराबर करती है

और दिन का उजाला

सब खुली आंखों के सामने परोस देता है!

उफ्फ! रात खत्म क्यों हो जाती है

इतनी जल्दी?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४० – बचपन की मिठास… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बचपन की मिठास…।)

✍ बचपन की मिठास… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

बचपन में जाते थे,

हम भाई- बहन

अपने दादा – दादी के गाँव

होती थी जब छुट्टियाँ गर्मियों की।

होता था वहाँ उनका

मिट्टी- गोबर से लिपा – पुता

बडा सा घर,

और

निम्बू के सोलह पेड का

बागीचा एक।

 

बिका करता था बागीचा

एक मौसम के लिये, हमारे वास्ते

और

आती थी इन्ही पैसों से

कभी पाव भर रबड़ी,

तो कभी जलेबी,

और हाँ

कभी रसमलाई भी।

 

दादा- दादी

पोता – पोती

के बीच

बढ़ जाती थी मिठास

कुछ और

इस तरह।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३४ ☆ वीरान दिल में फूल खिलाया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वीरान दिल में फूल खिलाया…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३४ ☆

✍ वीरान दिल में फूल खिलाया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

अपने वतन का शम्स हुआ दिन में अस्त है

हिंसा से ये अहिंसा की यारो शिकस्त है

 *

तौहीन मेरी रोकने निकला न घर से वो

कल बारी उसकी आनी पड़ोसी जो मस्त है

 *

बढ़कर ये हैसियत से तमन्नाएं पालता

औरों से आदमी नहीं खुद से ही त्रस्त है

 *

जी जान जो निसार मुझे कर दे कह रहा

इमदाद मांगिये तो कहे तंग हस्त है

 *

छीना हँसी है घर की मुबाइल का आगमन

बैठे है एक कमरे में हर शख़्स व्यस्त है

 *

बहुमत का जोर लोक सभा में ये  दिख रहा

कानून हाथ बाँधे जो होता निरस्त है

 *

वीरान दिल में फूल खिलाया जो प्यार के

तक़दीर मेरी कर गया वो फिर से दश्त है

 *

रौनक हर इक शज़र पे नहीं एक सी दिखे

बेलौस इस चमन का नहीं सर परस्त है

 *

होती है लूटमार धड़ल्ले से शहर में

कैसी पुलिस लगाती यहाँ रोज़ गश्त है

 *

जाना था घूमने को पहाड़ों पे मार्च में

तुम फस गए हो जाके अरुण ये अगस्त है

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४८ ☆ कविता – फ़र्क पड़ता है… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “फ़र्क पड़ता है… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४८ ☆

✍ कविता – फ़र्क पड़ता है… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब सीमा पर

कोई जवान गोली खाता है

और

शहीद हो जाता है।

 

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब सीमा पर तैनात फ़ौजी

अपने साथी की शहादत पर

आँसू नहीं बहा पाता

वरन् और दृढ़ हो जाता है।

 

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब अपने सीने में दर्द छुपाए

बड़े लंबे बॉक्स में

अपने साथी शहीद का मृत शरीर

राष्ट्रीय झंडे में लपेट

बिना आँसू बहाये

उसके परिवार के सामने

रख देते हैं।

 

लेकिन मुझे तब फ़र्क पड़ता है

जब शहीद के माँ बाप

आँसू छुपाए रोते हैं

और कहते जाते हैं

कि, काश हमारा दूसरा बेटा होता

तो उसे भी सीमा पर भेज देते।

 

और, मुझे फ़र्क पड़ता है तब भी

जब शहीद का आठ वर्षीय बालक

पिता के दाह संस्कार के बाद

रोता नहीं, वरन्

बिना आँसू गिराये बोलता है

मैं भी अपने पिता के समान

बहादुर बनूंगा।

तब बहुत फ़र्क पड़ता है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३० – कविता – झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  “झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है” ।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३० – झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

ग्रीष्म ने जब भी जलाये गाँव मेरे

पीर की अनुभूति से

परिचय हुआ है।

धूप में मज़दूर जब नंगे बदन थे,

देखकर आतप्त तब मेरे नयन थे।

सर्वहारा एक मुझमें तप रहा था,

खुद मेरे अहसास को

विस्मय हुआ है!

पाँव में छाले, किसी के फूटते थे,

वो गिरें तो अंग मेरे टूटते थे।

रंग जब अट्टालिकाओं पर चढ़े हैं,

झोंपड़ी के कत्ल का

संशय हुआ है!

साँस जब फूली श्रमिक की, धमनियों की,

आँख भर आयी, विटप की फुनगियों की।

भ्रूण अँकुराये लता की कोख में जब,

हार में भी जीत का

निश्चय हुआ है!

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दुधारी तलवार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दुधारी तलवार ? ?

स्मृतियाँ,

जितना दबाओ,

उतना उभर आती हैं,

उभारो तो

निर्वासन को मचल जाती हैं,

दुधारी तलवार है

नेह की पीड़ा,

कहीं से भी थामो,

कलेजा चीर कर

निकल जाती है..!

?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 11:12 बजे, 2 जनवरी 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०३ – जीवन में आलस्य का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में आलस्य का”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०३ – जीवन में आलस्य का ☆

☆

जीवन में आलस्य का, बढ़ता जाता रोग।

व्यर्थ समय है बीतता, घटे लाभ का योग।।

* 

कार्य पूर्ण होते नहीं, बढ़ता जाता भार।

जनता पिसती है सदा,पड़ती भारी मार।।

* 

गलत राह पर ये चलें, करें देश बदनाम।

जब चाहे हड़ताल से, करते चक्का जाम।।

 *

घर में ही बैठे रहें, करें जतन दिन रात।

अधिकारों की आड़ ले, देते रहते मात।।

* 

नेतागीरी में लगे, खूब मचाते शोर।

कामकाज करते नहीं, निज स्वारथ पर जोर।।

* 

सरकारी हर तंत्र में, ऐसों की भरमार।

 कभी मुक्ति इनसे मिले,तब होगा उपकार।।

 *

यही हाल हर घर सखे, मचता बड़ा बवाल।

मूर्तवान आलस्य ही, घर में करें धमाल।।

* 

बैठ घरों में कर रहे, फेमस अपना नाम।

मोबाइल में खो रहे, रोज सुबह औ शाम।।

* 

लाइक औ शेयर करें, मेसेज सुबह शाम।

व्हाटसएप व फेस बुक, चेटिंग में बदनाम।।

 *

खाने में आगे रहें, मुख से छीनें भोग।

काम चोर मस्ती करें, मेहनत करते लोग।।

* 

कर्तव्यों से विमुख हैं, धरे हाथ पर हाथ।

समय बीतने पर यही, सदा पीटते माथ।।

 *

जीवन दर्शन अब यही, छाया है चहुँ ओर।

अगर ग्राफ बढ़ता गया, कैसी होगी भोर।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८७२ ⇒ ताइवान के अमरूद ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताइवान के अमरूद…“।)

?अभी अभी # ८७२ ⇒ आलेख – ताइवान के अमरूद ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर आपने बागपत के खरबूजों की तारीफ सुनी है,तो हमने भी बड़वानी के पपीते खाए हैं। आज अगर लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी का जमाना है,तो हमारा जमाना तो पूरा देसी ही था। मांडव की खिरनी और फलबाग के जाम अगर देसी थे तो बड़वाह का चिवड़ा और राऊ की कचौरी भी अपनी ही तो थी।

सूरज की पहली किरण के साथ ही,दूध,अखबार,अटाला और सब्जी वाला मोहल्ले में एक साथ दस्तक देते थे। उनके सभी लोकल काम,  वोकल ही तो होते थे। सूर्योदय से पहले ही सबसे पहला संगीत सड़क पर झाड़ू बुहारने का गूंजा करता था। और फिर शुरू होता था बिग बास्केट और ज़ोमेटो की जगह ठेलों पर ताजी सब्जियों,  और फलों का तांता,अपने अपने सुर और राग में। एक ही सांस में सभी सब्जियों के नाम। तेरी आवाज ही पहचान है। फेरी वालों की पहचान आवाज से ही होती थी।

दोपहर होते होते तो एक बूढ़ी लेकिन कड़क आवाज हींग वाले की भी सुनाई दे जाती थी।। 

तब तो टमाटर भी देसी ही आते थे और नींबू भी कागदी,बिल्कुल पीयर्स साबुन की तरह पारदर्शी। फिर शुरू हुआ संकर मक्का और हाइब्रीड का दौर ! टमाटर भी देसी और सलाद के आने लगे,बिना बीज के,बिना रस,स्वाद और खटाई के। बीज से लोगों को पथरी होने लगी।

रासायनिक खाद ने छिलकों में छोड़िए,पूरे फलों में ही जहर भर दिया।

पहले अंगूर खट्टे और बीज वाले होते थे। आज उन्नत अंगूर देखिए बिना बीज वाले,लंबे लंबे,नासिक वाले। आज आप कौन से संतरे खा रहे हैं,आप ही जानें। हम तो नागपुरी संतरों की बात कर रहे हैं।। 

पपीते की जगह तो कब से ताइवान के पपीते ने ले रखी है,  नासपाती और अमरूद ने मिलकर एक अलग ही खिचड़ी पका ली। केले समय पूर्व पकने के चक्कर में अपना स्वाद और खुशबू,सब खो चुके हैं। करते रहिए छींटाकशी,बाजार में छींटे वाले केले कहीं नजर नहीं आएंगे।

इस बार तो देसी भुट्टो के लिए भी तरस गए। यह कैसा स्वदेशी और लोकल फॉर वोकल, हर जगह अमरीकन भुट्टे का ही बोलबाला। जो किसान बोएगा,वही तो बाजार में उपलब्ध होगा।। 

बदलते मौसम के साथ फलों की भी बहार आती है। एकाएक पूरे बाजार में ताजे ताजे,बड़े बड़े अमरूदों की बहार आ गई। अमरूद किसकी कमजोरी नहीं। एक अमरूद रोज,an apple a day, का ही काम करता है,क्योंकि इसके बीज आंतों की सफाई करते हैं और इसे शुगर वाले मरीज भी खा सकते हैं।

लेकिन हाय री किस्मत,इस बार हमें अमरूद भी ताइवान के ही हाथ लगे। हम अमरूदों की खुशबू पहचानते हैं। खुशबू तेरे बदन सी,किसी में नहीं नहीं ! लेकिन पहली बार उस ताइवानी अमरूद की शक्लो सूरत और बाहरी सुंदरता पर मर मिटे। अच्छा हरा भरा,मोटा ताजा,मुंह में पानी लाने वाला।। 

हमें न जाने क्यों ऐसे वक्त पर बर्नार्ड शॉ याद आ जाते हैं। जो चाहते हो,वह पा लो,वर्ना जो पाया है,उसे ही चाहने लग जाओगे। अरहर और मूंग की दाल भी आजकल हमें आकार में छोटी नजर आने लगी है,बड़ी मांगो तो स्वाद और खुशबू गायब। अब तो बस,जो मिल गया,उसी को मुकद्दर समझ लिया। मैं स्वाद,खुशबू और गुणवत्ता के साथ समझौता करता चला गया।। 

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६५ – पूछता है यक्ष ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – शब्द नहीं रहे शब्द…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६५ – पूछता है यक्ष ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से)

पूछता है यक्ष

सब हैं निरुत्तर

कोई नहीं दे पा रहा

उत्तर।

वही दे सकता है उत्तर

जिसकी दृष्टि में

आस्था, निष्ठा और

विश्वास का ध्रुवतारा हो

हाथ में समर्पण का

इकतारा हो ।

शायद कहीं कोई नहीं है

क्या, कोई कहीं है?

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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