हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६१ ☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ।)

☆ शेष कुशल # ६१ ☆

☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान – शांतिलाल जैन 

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का,  एरीना ईरान में. दो सांड एक तरफ, एक सांड दूसरी तरफ. जोड़ी में एक सांड अंकल सैम का, एक सांड ज़ायोनिस्टों का. दूसरी तरफ एक अकेला सांड,  पर्शियन नस्ल का. ये क्या!! शुरू मेई बेईमानी! पास के वेन्यू ओमान में शांतिवार्ता चल रही थी कि जोड़ीदार सांडों ने पर्शियन सांड को अकेला पा कर अटैक कर दिया. जुबां शांति की,  अंगुलियाँ मिसाईलों के ट्रिगर पे. बुल फाईट में नुकसान  बागड़ का. कुवैत, बहरीन,  क़तर इस बागड़ पर ज़ख्मी तो लेबनान उस बागड़ पर. नुकसान तो दूर देशों तक पसरी बागड़ का भी हो रहा है. जम्बूद्वीप जैसे देश जो दो रोज़ पहले ही जाकर ‘आ सांड मुझे मार’  कर आए थे, लहुलुहान वे भी कम नहीं है. सांड लड़ वहाँ रहे हैं,  सिलेंडर की कतार में हम और आप यहाँ खड़े हैं. बाज़ार की दुनिया के सांड वाल-स्ट्रीट से दलाल-स्ट्रीट तक हर जगह दुबक गए हैं,  बीयर हावी हैं. क्षत-विक्षत है बागड़ इन्वेस्टर्स की. मज़े में हैं तो बस चीन और रूस. चतुर हैं,  बागड़ पर नहीं दर्शक दीर्घा में जा बैठे हैं. माल भी कमा रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं. उनकी कम्पनियाँ मुनाफ़े में है और तीसरी दुनिया लॉस में. आप देख रहे हैं बुल-फाईट में  दुनिया की शेष बागड़ का सत्यानाश.

आगे का हाल सुनाने से पहले हम आपको बताते चलें दो सांडों की जोड़ी मान कर चल रही थी एक अकेला, दुबला-पतला, कमज़ोर सांड रमजान में क्या तो खुद को बचा पाएगा, क्या आक्रमण कर पाएगा. अनावृत्त मानकर चल रहे थे उसे. सोचा क्या तो नहाएगा, क्या तो निचोड़ेगा. पर्शियन नस्ल को वे चुटकियों में मसल देंगे. मगर ऐसा होता दीख नहीं रहा. सांडो की लडाई जलिकट्टू की लड़ाई नहीं है. ये न परंपरा के लिए है, न मनोरंजन के लिए. असल मकसद तो पर्शियन सांड के कब्ज़े वाली उस दुधारू गाय का अपहरण करना है जिसे तेल का कुआँ कहा जाता है. आँखों में सपने पेट्रो डॉलर के हैं. फाईट टफ़ है, नुकसान जबरजस्त.

और ये दांव. धोबी पछाड़. जोड़ीदार सांडों का पॉवर मूव. प्रतिबंध के सींगों में फँसा कर विचारधारा बदलने का दांव….. ओह्ह मूव फिर फेल हुआ. पर्शियन सांड फिर बच निकला. अबकि बार निज़ाम से बेदख़ल कराने डबल-लेग टेकडाउन लगाया गया है. पर्शियन सांड को सींगों की बजाए पैरों में घुसकर पकड़ने का दांव लगाया गया है. मगर ये क्या…. अधिनायकवादी निज़ाम से बेदख़ल कराने निकले अंकल सैम का अपना चेहरा अधिनायकवादी निकल आया है. पर्शियन सांड है कि लीडरान-दर-लीडरान मारे जाने के बाद भी अंकल सैम के काबू में आ नहीं रहा. अलबत्ता, ड्रोननुमा छोटे छोटे सींगों से अंकल सैम को हलाकान किए दे रहा है. अभी तक दो सांडों की जोड़ी एक भी राउंड पूरी तरह से जीत नहीं पाई है. ‘परमाणु खतरे को रोकना है और मध्यपूर्व में स्थिरता लानी है’   कहते हुए अंकल सैम का सांड एक बार फिर आगे बढ़ा, एक बार फिर मुँह की खाई. न यार मिला,  न विसाले सनम. न परमाणु बम मिला न ख़तरा. जोड़ीदार सांड का हर दांव फेल हो रहा है. वे बार बार मुँह की खा रहे हैं, मगर अभी चुके नहीं हैं. अंकल सैम यूरोप से ला कर एडिशनल सांड्स उतारने के मूड में हैं. लेकिन ये क्या!! सांड-सखाओं ने मना कर दिया. बुल जर्मनी का हो, इटली का हो,  फ़्रांस या ऑस्ट्रेलिया का,  सबने अंकल सैम को अंगूठा दिखा दिया है. कह रहे हैं कि भांडों के लिए सांडों के सींग नहीं पकड़े जाते. अलग-थलग पड़ता जा रहा है पॉवरफुल पेयर ऑफ़ सांड्स. हारने की कगार पर दीखते तो हैं मगर मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है. तरकशों में तीर बाकी हैं. कुछ भी हो सकता है. जो यूरेनियम बुझा सींग मार दिया तो मनुष्यता की बागड़ का गहरे तक झुलस जाना तय है.

जंग जारी है. वैश्विक बागड़ पर बैठे अबोध, निहत्त्थे, निर्दोष नागरिकों को कभी ये सांड कुचल रहा है कभी वो. न कोई अस्पताल बख्श रहा है न स्कूल, न बीमार न अपाहिज, न औरतें न बच्चे, न गरीब न मजलूम. रहम किस चिड़िया का नाम है!!

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – हास्य-व्यंग्य – “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।

दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।

मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –

छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा

खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा

मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –

“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,

दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –

अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…

सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…

वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२८ ☆ व्यंग्य – मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘मंत्री जी का हाज़मा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

मंत्री जी लाव-लश्कर के साथ डॉक्टर के दवाखाने पहुंचे। लश्कर को बाहर छोड़कर मंत्री जी डॉक्टर के चेंबर में दाखिल हुए। डॉक्टर ने आने का कारण पूछा तो मंत्री जी ने बताया— ‘पेट में बहुत तकलीफ रहती है। कुछ भी पचता नहीं। कभी उल्टी होती है तो कभी डायरिया। बेचैनी बहुत रहती है। अचानक ही घबराहट होने लगती है। हलक सूखता रहता है।’

डॉक्टर ने पूछा, ‘खाना क्या खाते हैं? कुछ बदपरहेज़ी होती होगी।’

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘बहुत सादा खाना खाता हूं। कोई बदपरहेज़ी नहीं होती।’

डॉक्टर साहब चक्कर में पड़े, बोले, ‘पूरी जांच करनी पड़ेगी।’

मंत्री जी कुछ संकोच में बोले, ‘वैसे आप अपने तक ही रखें तो बताना चाहता हूं कि मेरी तकलीफ तभी बढ़ती है जब लोग पैसा वैसा दे जाते हैं। लोग ब्रीफकेस लेकर आते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं। मना करता हूं तो कहते हैं रख लीजिए, नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा। तभी हमें घबराहट होती है और उल्टी डायरिया का सिलसिला शुरू हो जाता है। रात को नींद भी नहीं आती।’

डॉक्टर साहब हंस कर बोले, ‘समझ गया। आपकी दूसरी वाली यानी माल हज़म करने वाली पाचन-शक्ति कमज़ोर है। आपके पिताजी क्या करते थे?’ 

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘स्कूल मास्टर थे।’

डॉक्टर साहब फिर हंसे, बोले, ‘यही रोग की जड़ है। आपके खानदान में माल पचाने की परंपरा नहीं रही। इसीलिए आपको दिक्कत हो रही है।’

फिर कुछ सोच कर बोले, ‘इस मर्ज़ का इलाज आपको डॉक्टर के पास नहीं मिलेगा। आप किसी अनुभवी, तपे हुए राजनीतिज्ञ के पास जाइए। उन्हीं के पास माल पचाने का नुस्खा मिलेगा।’

मंत्री जी डॉक्टर साहब को धन्यवाद देकर रुख़सत हो गये। एक माह बाद डॉक्टर साहब के पास उनका फोन आया, बोले, ‘धन्यवाद, डॉक्टर साहब। आपने सही रास्ता दिखाया। मुझे एक सीनियर राजनीतिज्ञ से पाचन-शक्ति बढ़ाने का मशवरा मिल गया है। अब पेट की गड़बड़, घबराहट वगैरह  कुछ नहीं होती। आपको बहुत धन्यवाद।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक एक लघु व्यंग्य रचना “– धर्म – वृक्ष…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक अजीब अनोखा सा वृक्ष उग आया था। उसमें चंदन की सुगंध थी। उसे धर्म – वृक्ष नाम दिया गया था। पर उस पेड़ के प्रति अपमान का एक पहलू भी हुआ। लोग उस वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर अपने – अपने घर ले जाने लगे थे, क्योंकि उनसे चूल्हे खूब जलते थे। जिस दिन अंतिम टहनी तोड़ी गई थी उसी दिन पूरा वृक्ष सूख गया था। अब तो युग बीते। पीढ़ी दर पीढ़ी वहाँ उस वृक्ष की बात अब भी होती है। दुहाई यहाँ तक दी जाती है एक हमारा ही देश हुआ जहाँ धर्म – वृक्ष हुआ करता था। तब तो इसे विडंबना ही मानें, धर्म का क्षय सब से अधिक उसी देश में हुआ है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।

​मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”

​जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६०☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ६० ☆

☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ – शांतिलाल जैन 

आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.

यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.

वो कैसे किस्सागो ?

ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.

ख़वातीन-ओ-हज़रात,  बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से. 

हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात,  इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.

अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?

कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’.  होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.

होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ – हास्य-व्यंग्य – “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२

☆ व्यंग्य ☆ “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शिक्षक “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर” है। लोग मानते हैं कि शिक्षक से कुछ भी कराया जा सकता है। इसे यदि आप सम्मानजनक शब्दों में कहना चाहे तो शिक्षकों को सर्वगुण सम्पन्न भी कह सकते हैं। हमारे देश का सौभाग्य है कि चाहे यहां के पुराने राजा – महाराजा रहे हों अथवा आज के सरकारी प्रमुख सभी गुणों के पारखी होने के साथ साथ गुण ग्राहक भी हैं। इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने कॉलेजों के परिसरों में आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकने का जिम्मा प्राचार्यों को सौंप दिया है। 11 मार्च 26 को भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार “प्रदेश के सभी सरकारी और निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में आवारा पशु और कुत्तों की एंट्री रोकने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने निर्देश जारी किया हैं। कॉलेजों में प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जो परिसर की सुरक्षा करने और वहां आवारा पशुओं को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि नोडल अधिकारी का नाम और मोबाइल नम्बर परिसर में प्रदर्शित किया जाए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकायों से सहयोग लिया जाए। समाचार बड़ा है अंत में क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों को सभी कॉलेजों में इन निर्देशों के पालन की जांच कर रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया है। बताया गया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक प्रकरण में दिए गए निर्देशों के पालन में जारी किया गया है। लोग कहते हैं कि शिक्षक ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ? जो सभ्यता – संस्कृति, देश और सरकार तक को बना और बिगाड़ सकता है क्या वह कालेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से आवारा पशुओं, कुत्तों को नहीं भगा सकता क्या ? यहां विचारणीय यह है कि आवारा पशुओं को परिसरों से किस विधि से भगाया जाए, परिसर में “पशुओं का प्रवेश वर्जित” लिखे पोस्टर लगाने या उन्हें सम्मान पूर्वक भगाने से तो वे नहीं भागेंगे। उन्हें हट – हट कहते हुए भगाया जाए, छड़ी या डंडा दिखाकर अथवा मारकर  भगाया जाए आखिर परिसर में अवैध घुसपैठ करने वाले पशुओं को कैसे भगाया जाए, इसका उल्लेख सरकारी निर्देश में नहीं किया गया है। कुछ कालेज प्राचार्य भयभीत हैं कि यदि वे अपने सोचे किसी तरीके से आवारा पशुओं को भगाते हैं और यदि वह तरीका उन आवारा पशुओं के पालकों, पशु प्रेमियों अथवा सरकार को पसंद नहीं आता तब क्या होगा ?

अतः कुछ कॉलेजों के प्राचार्य स्टाफ मीटिंग करके, कुछ प्राचार्य क्षेत्रीय समाजसेवियों – नेताओं से विचार विमर्श करके आवारा पशुओं को परिसरों से भगाने का सर्वमान्य तरीका खोजना चाह रहे हैं। सरकारी आदेशों – निर्देशों को अपने चातुर्य से लंबे समय तक लटकाए रखने में  माहिर एक प्राचार्य ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि वे इस सरकारी आदेश पर सरकार से यह मार्गदर्शन मांगने पत्र भेज रहे हैं कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए कौन – कौन से उपाय किए जा सकते हैं। किसी प्रकार का विवाद होने की स्थिति में नोडल अधिकारी के पास क्या विशेषाधिकार होंगे आदि – आदि।

मैं यह लिख ही रहा था कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण संबंधी नगर पालिका निगम, जबलपुर के सहायक आयुक्त सह स्वास्थ्य अधिकारी का एक पत्र भी वाट्स एप पर देखने मिला। इसे पढ़कर लगा कि शायद सुप्रीम कोर्ट के डर से आवारा पशुओं, कुत्तों आदि पर नियंत्रण को लेकर शासन – प्रशासन की नींद खुल गई है। नगर निगम ने समस्त शासकीय – अशासकीय शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेज, खेल स्टेडियमों, बस स्टेंडों, रेलवे स्टेशनों आदि को आवारा पशुओं, कुत्तों से मुक्त रखने नोडल अधिकारी नियुक्त करने दिशा निर्देश जारी किए हैं। परिसरों की बाउंड्रीवाल बनवाने – सुधारने, गेट लगाने/सुधारने, साफ सफाई रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। तीन माह में नगर निगम कमेटी सभी जगह निरीक्षण करके सुनिश्चित करेगी कि सब ठीक चल रहा है। कुछ हो न हो बाउंड्रीवाल और गेट आदि बनवाने/ सुधरवाने के टेंडर तो हो ही जाएंगे। इसमें कमीशन बाजी का अंदेशा तो है ही। अब आगे तीन माह बाद तब लिखूंगा जब नगर निगम का एक निरीक्षण हो जाएगा।

यहां एक बात और विचारणीय है कि जब इन परिसरों में आराम फरमा रहे आवारा पशुओं को सड़कों पर खदेड़ा जाएगा तब राहगीरों की सुरक्षा का क्या होगा। पुलिस आवारा पशुओं का चालान कटेगी क्या ?

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२७ ☆ व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ भुल्लन भैया की मूर्ति

हमारे शहर के रत्न भुल्लन भैया जन-जन के हृदय में निवास करते रहे। दो बार भारी बहुमत से एमैले का चुनाव जीते। चुनाव के समय दारू, कंबल, पैसे का मुक्त-हस्त से वितरण करते थे।उसके बाद भी कोई विरोध करे तो हाथ में डंडा या जूता धारण कर नये अवतार में प्रकट होते थे। उनके चेलों-चांटों की संख्या विशाल रही। पार्टी में ऊपर तक उनकी रसाई थी।

एक रात मित्रों के साथ ‘गीली’ पार्टी में हिस्सा लेकर लौटते भुल्लन भैया की कार एक नाले में प्रवेश कर गयी। ड्राइव करने वाला उनका मित्र भी सुरा के सुरौधे में था। परिणामत: दोनों ही स्वर्ग या नरक की राह पर निकल गये।

शहर में खबर फैलते ही खलबली मच गयी। बड़े-बड़े नेता भुल्लन भैया के संभावनाशील सुपुत्र लल्लन को धीरज बंधाने आने लगे। लल्लन भैया हिलक हिलक कर कहते थे, ‘ऐसे बिना बोले बताये चले गये। हम कुछ सेवा नहीं कर पाये।’ भुल्लन भैया के क्रिया-कर्म में भारी भीड़ उमड़ी। कई चेले आंसू बहाते और सस्वर विलाप करते देखे गये।

चुनाव-क्षेत्र में स्वर्गीय भुल्लन भैया का असर देखकर पार्टी ने लल्लन भैया को उनके पिताजी के स्थान पर स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिये। जल्दी ही लल्लन भैया में भी उनके स्वर्गवासी या नरकवासी पिता के गुण प्रकट होने लगे। मुहल्ले में उनकी अघोषित सल्तनत कायम हो गयी।

पिताजी के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करने के लिए लल्लन भैया ने जल्दी ही घोषणा की कि पास के चौराहे पर स्वर्ग या नरक वासी उनके पिताजी की विशाल मूर्ति लगेगी। धन्नासेठों से चन्दा इकट्ठा होने लगा। अपने रसूख और ताकत का इस्तेमाल कर लल्लन भैया ने जल्दी ही इतना धन इकट्ठा कर लिया जो मूर्ति के अलावा उनके चुनाव अभियान और दीगर खर्चों में काम आ सके। राजस्थान के एक कलाकार को मूर्ति का ऑर्डर दे दिया गया।

तीन-चार महीने में मूर्ति बनकर आ गयी। लल्लन भैया ने उसे चौराहे पर ऊंचे आधार पर स्थापित करवा दिया। मूर्ति के नीचे आठ दस पंक्तियों में भुल्लन भैया के गुणों और उपलब्धियों का बखान कर दिया गया। सिर्फ एक तरफ का पत्थर खाली रहा जिस पर मूर्ति के अनावरण का ब्यौरा और तारीख लिखी जानी थी। इसके बाद अनावरण के इंतज़ार में मूर्ति को पूरी तरह कपड़े से ढंक दिया गया।

इसके बाद लल्लन भैया अड़ गये कि उनके यशस्वी पिता की मूर्ति का अनावरण ‘राश्टपति’ या ‘उपराश्टपति’ के कर-कमलों से होगा, अन्यथा मूर्ति ऐसे ही ढंकी-मुंदी खड़ी रहेगी। नगर के सांसद महोदय को चेतावनी दे दी गयी कि उपरोक्त विभूतियों को बुलाने का इंतज़ाम करें, अन्यथा स्वर्गीय भुल्लन भैया के चुनाव-क्षेत्र में पार्टी के लिए सूखा पड़ जाए तो लल्लन भैया को दोष न दिया जाए। सांसद महोदय सांसत में पड़ गये। दिल्ली तक फोन बजने लगे। अंततः सांसद महोदय उपराष्ट्रपति जी की मंज़ूरी लेने में सफल हो गये।

उपराष्ट्रपति जी पधारे। अनावरण का कार्यक्रम शानदार संपन्न हुआ। लल्लन भैया फूले फूले घूमते थे। कार्यक्रम में उन्होंने एक पढ़े- लिखे दोस्त से लिखवाया हुआ स्वागत-भाषण पढ़ा, लेकिन पढ़ने में उनकी गाड़ी वैसे ही अटकने लगी जैसे किसी मोटर के आगे गड्ढे आने से अटकती है। उन्होंने दांत-दर्द का बहाना करके भाषण का कागज उसे लिखने वाले दोस्त को ही पकड़ा दिया। बाद में उन्होंने दोस्त को उलाहना दिया— ‘जरा ढंग का लिखते जो हम पढ़ सकते। इतने बड़े लोगों के सामने हमारी ‘इंसल्ट’ करा दी।’

अनावरण संपन्न हो गया। उपराष्ट्रपति जी के कार्यक्रम पर करदाता के कुल दो-तीन करोड़ खर्च हुए, जिसका लल्लन भैया गर्व से बखान करते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२६ ☆ व्यंग्य – मिलावट-प्रधान देश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मिलावट-प्रधान देश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मिलावट-प्रधान देश डॉ कुंदन सिंह परिहार

हमारा देश धर्म-प्रधान होने के साथ-साथ मिलावट-प्रधान भी है। यह कहना मुश्किल है कि वह धर्म-प्रधान ज़्यादा है या मिलावट-प्रधान, क्योंकि यहां करीब-करीब हर चीज़ में मिलावट होती है। मिलावट का हाल यह है कि अब शुद्ध आदमी मिलना मुश्किल हो गया है। मिलावट करने वाले पूरी निष्ठा और समर्पण-भाव से अपने काम में लगे हैं। उनके काम की निपुणता और सफाई देखकर आश्चर्य होता है। मजाल है आदमी असली नकली में भेद कर पाये। मिलावट के मामले में उनके नये-नये प्रयोग देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

यहां मिलावट का आलम यह है कि शुद्ध चीज़ मिलना सौभाग्य की बात मानी जाती है। बाहरी उपयोग की चीज़ें छोड़ दीजिए, जो चीज़ें शरीर के भीतर जाती हैं उन्हें भी बख्शा नहीं जाता। दाल, चावल, मसाला, घी, खोया, मिठाइयां, दवाएं, फल, सब्ज़ियां, ईनो, आटा, बेसन, दूध, मक्खन, पनीर, सरसों, शराब, जीरा, हल्दी, सब में पूरे सेवा- भाव से मिलावट की जा रही है। नकली दवाओं का मतलब समाज के लिए क्या होता है यह समझा जा सकता है। कहीं पढ़ा कि अंडे भी मिलावटी हो रहे हैं, यद्यपि मेरे लिए समझ पाना मुश्किल है कि नकली अंडे कैसे होते होंगे।

चावल में कंकड़, मसाले में बुरादा, हल्दी में पीली मिट्टी मिलना आम है। नकली दवाओं का बाज़ार अरबों का है। अभी नकली कफ़ सीरप पीकर इंदौर में कई बच्चे काल-कवलित हुए। निम्न वर्ग के शराबी हर साल मिलावटी शराब पीकर मरते हैं।

फलों और सब्ज़ियों को कार्बाइड की मदद से जल्दी पकाया और तैयार किया जाता है, लेकिन कार्बाइड मनुष्य-शरीर के लिए बहुत हानिकारक है। चने भी नकली होने की ख़बर पढ़ी। मिट्टी से बनने वाले सीमेंट के बारे में भी पढ़ा।

हाल ही में राज्यसभा में एक सदस्य ने वक्तव्य  दिया कि जांच में दूध के 71% नमूनों में यूरिया और 64% में न्यूट्रलाइज़र पाये गये, जबकि कुल  खाद्य नमूनों में 25% मिलावटी निकले। यह भी बताया गया कि गर्म मसाले में ईंट और लकड़ी का बुरादा, चाय में सिंथेटिक रंग, शहद में शुगर सीरप और मिठाइयों में देसी घी की जगह वनस्पति की मिलावट पायी गयी।

हमारे देश में नकली डिग्री, नकली आधार कार्ड, नकली प्रमाण-पत्र उपलब्ध होना मुश्किल नहीं है, बशर्ते कि आप जोखिम लेने को तैयार हों। कई नेताओं की झूठी डिग्री पर प्रश्न उठते रहे हैं। नकली नोट छापने वालों की सक्रियता के प्रमाण जब-तब मिलते रहते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ नकल के धंधे का एक नया रूप है, जिसमें कई लोगों को करोड़ों रुपयों का चूना लग चुका है।

सबसे ताज़ा ख़बर यह पढ़ी कि जूते भी नकली बन रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि नकली जूतों में क्या नकली होगा। शायद ये पहनने के अलावा दूसरे काम के लिए बन रहे होंगे। शायद नकली जूतों के प्रहार से आदमी की इज़्ज़त कम ख़राब होगी।

बाबा रामदेव के गाय के घी के बारे में पढ़ा कि वह दो प्रयोगशालाओं में जांच में खाने योग्य नहीं पाया गया। उनके मिर्च पाउडर की गुणवत्ता का मामला भी संसद में उठाया गया था।

आदमी भी अब खरा नहीं रहा। मुंह पर कुछ बोलता है, मन में कुछ और रचता है।टेक्नोलॉजी के विकास के साथ स्वार्थपरता और संकीर्णता बढ़ रही है, रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं, सुविधाओं का मोह बढ़ रहा है। नतीजतन आदमी अपने आप में सिमटता जा रहा है, टापू होता जा रहा है। इसीलिए शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा— ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’

मैं यह सोच सोच कर परेशान हूं कि कई नेता और धर्मगुरु धार्मिक एकता की बातें करते हैं, दूसरे धर्म वालों को अपने से कमतर समझते हैं, लेकिन धार्मिक एकता में ये मिलावट के लिए समर्पित हुनरमंद लोग कहां ‘फिट’ होंगे? क्या धार्मिक एकता के लिए ये मिलावटखोर मिलावट करना छोड़ देंगे? क्या इनका हृदय-परिवर्तन हो जाएगा? क्या ये आसानी से मिल रहे बड़े मुनाफे का लालच छोड़ देंगे? फिलहाल तो ये अपने धर्म वालों का ही मुंडन कर रहे हैं।

हम गज़ा में सत्तर हज़ार निर्दोष लोगों की मौत पर सिहरते हैं, दुखी होते हैं, लेकिन हमारे देश में सीधे हत्या के बजाय धीमे ज़हर के द्वारा करोड़ों की ‘स्लो डेथ’ का इंतज़ाम है। हम बाकी मामलों में भले ही विश्वगुरु न बन पायें, मिलावट के मामले में हमारे विश्वगुरु होने में कोई संदेह नहीं हो सकता। अन्य देश आयें और हमसे उपयोगी शिक्षा ग्रहण करें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य  – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मनुष्य के जीवन में ‘संकल्प’ और ‘समोसे’ का वही रिश्ता है जो चूहे और बिल्ली का होता है। आप कितनी भी बड़ी ‘डाइट कंट्रोल’ की दीवार खड़ी कर लें, एक गरम समोसा उस दीवार के नीचे से ‘सुरंग’ बनाकर आपके आत्मबल को धराशायी कर देता है। हमारे मित्र ‘गजाधर बाबू’ ने जब से डॉक्टर की यह बात सुनी कि उनका शरीर अब ‘इंसानी शरीर’ कम और ‘फैट का गोदाम’ ज्यादा लग रहा है, उन्होंने ‘डाइट’ का भीषण व्रत ले लिया।

गजाधर बाबू ने घोषणा कर दी कि अब वे केवल ‘घास-फूस’ यानी सलाद पर जीवित रहेंगे। उनके डाइनिंग टेबल पर अब खीरे, ककड़ी और उबली हुई लौकी का साम्राज्य था। वे इन चीजों को ऐसे देखते थे जैसे कोई मुजरिम अपनी हथकड़ियों को देखता है। श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो, गजाधर बाबू का यह त्याग वैसा ही था जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रिटायरमेंट के बाद ‘सत्य और अहिंसा’ पर प्रवचन देने लगे।

लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम गजाधर बाबू दफ्तर से लौट रहे थे। रास्ते में ‘मुन्ना हलवाई’ की दुकान थी। मुन्ना हलवाई के यहाँ समोसे तलने की क्रिया किसी ‘यज्ञ’ से कम नहीं होती। कड़ाही में खौलता हुआ तेल, और उसमें गोते खाते हुए सुडौल समोसे—जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ अमृत कुंड में स्नान कर रही हों।

समोसे की वह सोंधी खुशबू जब गजाधर बाबू की नासिकाओं से टकराई, तो उनके ‘डाइट संकल्प’ के फेफड़े फूलने लगे। उनका मन चिल्लाया— “भाग गजाधर, ये मायाजाल है!” पर उनका पेट पलटकर बोला— “अबे रुक! देख तो सही, आलू का वो श्रृंगार, मसालों की वो जुगलबंदी!”

गजाधर बाबू दुकान के सामने ऐसे ठिठक कर खड़े हो गए जैसे कोई सन्यासी अपनी पुरानी प्रेमिका को देख ले। उन्होंने सोचा, “एक समोसे से क्या होगा? न्यूटन ने भी तो कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो एक समोसे की प्रतिक्रिया में मैं कल दो किलोमीटर ज्यादा चल लूँगा।” यह वह तर्क है जो दुनिया का हर डाइट करने वाला इंसान खुद को ‘बेवकूफ’ बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।

वे दुकान के करीब पहुँचे। समोसा एकदम गरम था, उसकी पपड़ी ऐसी कुरकुरी कि छूने मात्र से ‘साहित्यिक संगीत’ पैदा हो। गजाधर बाबू ने समोसे को हाथ में लिया। वह उनके हाथ में ऐसे थिरक रहा था जैसे कोई नवजात शिशु। उन्होंने उसे चटनी में डुबोया—हरी चटनी यानी तीखा प्रहार और लाल चटनी यानी मीठा धोखा।

जैसे ही उन्होंने पहला निवाला लिया, उन्हें लगा कि उनके भीतर की ‘कैलोरी’ पुलिस ने हड़ताल कर दी है और ‘कोलेस्ट्रॉल’ के गुंडे जश्न मनाने लगे हैं। स्वाद ऐसा कि उन्हें लगा जैसे मोक्ष का द्वार उनके तालू में खुल गया है।

गजाधर बाबू अभी दूसरे समोसे पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक परिचित आवाज़ गूँजी— “अरे गजाधर भाई! ये क्या? आप तो कह रहे थे कि अब आप केवल उबला हुआ पानी और हवा खाकर जिएंगे?”

पीछे उनके डॉक्टर खड़े थे, जो खुद हाथ में ‘जलेबी’ का दोना थामे हुए थे। गजाधर बाबू का समोसा उनके हाथ में ही जम गया। वे हड़बड़ाए, पर हार मानने वाले कहाँ थे।

गजाधर बाबू ने बड़ी गंभीरता से कहा, “अरे डॉक्टर साहब, आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल मैं तो इस समोसे का ‘पोस्टमार्टम’ कर रहा था। मैं देख रहा था कि मुन्ना हलवाई इसमें कितना ‘हानिकारक’ फैट डालता है, ताकि मैं कल सुबह ग्रुप में सबको इसके नुकसान बता सकूँ। और आप? आप ये जलेबी क्यों ले रहे हैं?”

डॉक्टर साहब ने भी बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “मैं? मैं तो इस जलेबी की ‘कुंडली’ चेक कर रहा था कि आखिर ये इतनी टेढ़ी क्यों होती है! विज्ञान के लिए बलिदान देना पड़ता है गजाधर बाबू!” अब दोनों ‘विज्ञानी’ एक-दूसरे की चोरी पर हाथ मिला चुके थे और मुन्ना हलवाई सोच रहा था कि अगर ये दोनों वैज्ञानिक हैं, तो फिर ‘पागल’ कौन है!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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