हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०४ ☆ बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆

?  आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।

मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था ,  संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।

अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो  शेरों  की मूर्तियां नजर आती हैं।

ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।

शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।

लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।

यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ – करुण पुकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “करुण पुकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕

मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।

घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।

आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।

धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।

सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।

अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।

बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।

सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।

इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७० – देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७० ☆ देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गर्मी का सीज़न इस बार भी निर्धारित समय से पूर्व ही आ गया है। दूसरी और पश्चिम एशिया का युद्ध भीषणतम हो कर गर्मी बढ़ाने में वैसा ही कर रहा है, जैसे कि जलती आग में घी करता है।

हमारे घर में विगत कुछ वर्षों से तथाकथित “शीतल पेय” का सेवन व्हाट्स ऐप महाविद्यालय से मिले ज्ञान से बंद हो चुका है। खाना बनाने वाली गैस की कमी के चलते घर में चाय के सेवन पर प्रतिबंध की चर्चा परवान चढ़ चुकी है। इसी क्रम में शीतल पेय की यादें ताज़ा हो गई हैं।

साठ के दश्क में कोका कोला, ऑरेंज (फेंटा नहीं) और सोडा कांच की बोतलों में उपलब्ध रहता था। सोडा दो आने और अन्य चार आने में बिक्री होती थी। दुकानदार कांच की बोतल के नाम से सिक्योरिटी डिपोजिट जमा करवा लेता था। बोतल की सही सलामती पर उस राशि की वापसी संभव हुआ करती थी। बोतल के ढक्कन हटाने पर ज़रा सा भी कांच टूटने  से राशि काट कर बोतल ग्राहक को थमा दी जाती थी। कुछ अमीर विवाह आदि कार्यक्रमों से खाली बोतल घर ले आते थे। जब कभी बाजार से शीतल पेय खरीदते तो घर रखी खाली बोतल घर से साथ ही ले जाते थे, और सिक्योरिटी जमा करने से बच जाते थे। इन कांच की बोतलों को खोलने वाले छोटे से यंत्र को ओपनर कहा जाता था। हमारे जैसे किशोर तो मुंह में लगे हुए दांतों की दाढ़ के सहारे ही बोतल खोल लेते थे। पड़ोस के लोग भी हमारी सेवाएं ले कर उसकी एवज में थोड़ा सा पेय दे दिया करते थे।

मोहल्ले के परिचित दुकानदार भी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी देने पर सिक्योरिटी जमा करने की झंझट से मुक्त रहते थे।

अब तो प्लास्टिक युग में शीतल पेय भी विगत कुछ दशकों से प्लास्टिक की बोतलों में विक्रय किया जाता है, हालांकि बोतल खोलते ही इनकी गैस निकल जाती है, वो मज़ा नहीं आता है, जो कांच की बोतलों में हुआ करता था।

इस लेख के माध्यम से अपने मित्रों को संदेश देना चाहता हूं, कि हम जब भी उनके घर पर आएं, तो वो खाने वाली गैस की कमी के नाम पर चाय के स्थान पर शीतल पेय परोस सकते हैं। हमें कोई गुरेज नहीं है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२० ☆ दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२० ?

☆ दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

मी दगड कोरला देवा तू त्यात भेटला होता

अन् छन्नी हातोड्याचा आघात सोसला होता

*

देवा तू सोबत होता मी म्हणून चुकलो नाही

तू माझ्या ह्या हाताचा सन्मान राखला होता

*

मूर्तीची प्राणप्रतिष्ठा झालेली डोळ्यांदेखत

डोळ्यांचे सोने झाले मी श्वास रोखला होता

*

मज बहाल केली देवा तू दिव्यत्वाची शक्ती

पाषाण म्हणूनच मी तो नेमका जोखला होता

*

असुरांची टोळी होती मूर्तीला दगड म्हणाली

थडग्यांना पुजणारांनी तो डाव फेकला होता

*

मातेची आज्ञा झाली तू वनात गेला तेव्हा

वनवास पाच शतकांचा कलियुगी भोगला होता

*

ह्या आयोध्या नगरीचे प्रारब्ध उजळले आता

त्या जुलमी सत्तेनंतर तू उभा ठाकला होता

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १ ✍

(काव्य संग्रह – उजास ही उजास से )

कुछ दिनों से

अजब घटनाएँ घट रही हैं।

परिचितों के पाँवों में

बिमाइयाँ फट रही हैं

लोग

बड़ी आतुरता से / बड़े गौर से

देखते हैं मेरा चेहरा / मेरा मुख

शायद कोशिश करते हैं

मन की इबारत को पढ़ने की

जिसे कहते हैं दुख।

मुख और में दुख

कोई तालमेल नहीं

किसी के मुख को पढ़ लेना

दुख को हर लेना

हँसी खेल नहीं।

ज्यादा हुआ/ तो

हँसा जा सकता है

किसी विपत्ति में फँसे पर,

तिनके की जगह

फेंका जा सकता है पत्थर

धार में धँसे पर

बड़ी अलग सी बातें हैं

दुख में रहना

दुख को सहना

और

चुप रहना!

क्रमशः…

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७५ – “विपदा का क्या – क्या आशय है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “विपदा का क्या – क्या आशय है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “विपदा का क्या – क्या आशय है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

जितने बेटे उतने कमरे,

कहाँ रहेगी माँ , यह भय है ।

बेशक यह बूढ़ी अम्मा का,

सुविधा वंचित कठिन समय है ॥

 

माता जो निश्चेष्ट बैठकर

देख रही करतब ।

क्या ग्यारस, रविवार दिवस –

तिथि अखरा करते सब ।

 

जिन बहुओं के होने का

वह गर्व सदा करती ।

उनकी घनाक्षरी के आगे

चकित,अचंभित ज्यों छप्पय है।

 

सुबह नाश्ता, दोपहरी हो

या फिर संध्या की ब्यालू ।

क्रम से बटे तीन हिस्सों में

पर माँ के हिस्से आलू –

 

की चीजें उस मधुमेही को

मिलती रहती हैं प्रतिदिन ।

जान सकी, पति न रहने की

विपदा का क्या – क्या आशय है॥

 

तीनों बहुयें स्वांग किया

करती हैं लोगों के आगे ।

” अम्मा जैसी सासू माँ से

भाग हमारे हैं जागे ।”

 

कोई अगर ना देखे तो

मुह फेर चली जाया करती ।

मगर लोग भी जान गये

उनका यह केवल अभिनय है ॥  

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15 – 03 – 20 26

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६०☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ६० ☆

☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” – शांतिलाल जैन ☆

आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.

यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.

वो कैसे किस्सागो ?

ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.

ख़वातीन-ओ-हज़रात,  बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से. 

हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात,  इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.

अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?

कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’.  होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.

होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ – हास्य-व्यंग्य – “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

शिक्षक “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर” है। लोग मानते हैं कि शिक्षक से कुछ भी कराया जा सकता है। इसे यदि आप सम्मानजनक शब्दों में कहना चाहे तो शिक्षकों को सर्वगुण सम्पन्न भी कह सकते हैं। हमारे देश का सौभाग्य है कि चाहे यहां के पुराने राजा – महाराजा रहे हों अथवा आज के सरकारी प्रमुख सभी गुणों के पारखी होने के साथ साथ गुण ग्राहक भी हैं। इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने कॉलेजों के परिसरों में आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकने का जिम्मा प्राचार्यों को सौंप दिया है। 11 मार्च 26 को भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार “प्रदेश के सभी सरकारी और निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में आवारा पशु और कुत्तों की एंट्री रोकने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने निर्देश जारी किया हैं। कॉलेजों में प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जो परिसर की सुरक्षा करने और वहां आवारा पशुओं को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि नोडल अधिकारी का नाम और मोबाइल नम्बर परिसर में प्रदर्शित किया जाए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकायों से सहयोग लिया जाए। समाचार बड़ा है अंत में क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों को सभी कॉलेजों में इन निर्देशों के पालन की जांच कर रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया है। बताया गया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक प्रकरण में दिए गए निर्देशों के पालन में जारी किया गया है। लोग कहते हैं कि शिक्षक ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ? जो सभ्यता – संस्कृति, देश और सरकार तक को बना और बिगाड़ सकता है क्या वह कालेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से आवारा पशुओं, कुत्तों को नहीं भगा सकता क्या ? यहां विचारणीय यह है कि आवारा पशुओं को परिसरों से किस विधि से भगाया जाए, परिसर में “पशुओं का प्रवेश वर्जित” लिखे पोस्टर लगाने या उन्हें सम्मान पूर्वक भगाने से तो वे नहीं भागेंगे। उन्हें हट – हट कहते हुए भगाया जाए, छड़ी या डंडा दिखाकर अथवा मारकर  भगाया जाए आखिर परिसर में अवैध घुसपैठ करने वाले पशुओं को कैसे भगाया जाए, इसका उल्लेख सरकारी निर्देश में नहीं किया गया है। कुछ कालेज प्राचार्य भयभीत हैं कि यदि वे अपने सोचे किसी तरीके से आवारा पशुओं को भगाते हैं और यदि वह तरीका उन आवारा पशुओं के पालकों, पशु प्रेमियों अथवा सरकार को पसंद नहीं आता तब क्या होगा ?

अतः कुछ कॉलेजों के प्राचार्य स्टाफ मीटिंग करके, कुछ प्राचार्य क्षेत्रीय समाजसेवियों – नेताओं से विचार विमर्श करके आवारा पशुओं को परिसरों से भगाने का सर्वमान्य तरीका खोजना चाह रहे हैं। सरकारी आदेशों – निर्देशों को अपने चातुर्य से लंबे समय तक लटकाए रखने में  माहिर एक प्राचार्य ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि वे इस सरकारी आदेश पर सरकार से यह मार्गदर्शन मांगने पत्र भेज रहे हैं कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए कौन – कौन से उपाय किए जा सकते हैं। किसी प्रकार का विवाद होने की स्थिति में नोडल अधिकारी के पास क्या विशेषाधिकार होंगे आदि – आदि।

मैं यह लिख ही रहा था कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण संबंधी नगर पालिका निगम, जबलपुर के सहायक आयुक्त सह स्वास्थ्य अधिकारी का एक पत्र भी वाट्स एप पर देखने मिला। इसे पढ़कर लगा कि शायद सुप्रीम कोर्ट के डर से आवारा पशुओं, कुत्तों आदि पर नियंत्रण को लेकर शासन – प्रशासन की नींद खुल गई है। नगर निगम ने समस्त शासकीय – अशासकीय शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेज, खेल स्टेडियमों, बस स्टेंडों, रेलवे स्टेशनों आदि को आवारा पशुओं, कुत्तों से मुक्त रखने नोडल अधिकारी नियुक्त करने दिशा निर्देश जारी किए हैं। परिसरों की बाउंड्रीवाल बनवाने – सुधारने, गेट लगाने/सुधारने, साफ सफाई रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। तीन माह में नगर निगम कमेटी सभी जगह निरीक्षण करके सुनिश्चित करेगी कि सब ठीक चल रहा है। कुछ हो न हो बाउंड्रीवाल और गेट आदि बनवाने/ सुधरवाने के टेंडर तो हो ही जाएंगे। इसमें कमीशन बाजी का अंदेशा तो है ही। अब आगे तीन माह बाद तब लिखूंगा जब नगर निगम का एक निरीक्षण हो जाएगा।

यहां एक बात और विचारणीय है कि जब इन परिसरों में आराम फरमा रहे आवारा पशुओं को सड़कों पर खदेड़ा जाएगा तब राहगीरों की सुरक्षा का क्या होगा। पुलिस आवारा पशुओं का चालान कटेगी क्या ?

☆

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆ # “परीक्षा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “परीक्षा…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆

☆ # “परीक्षा…” # ☆

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जीवन के हर मोड़ पर

हर पल हर क्षण

विधाता परीक्षा लेता है

एक सबक सबको देता है

छोटा हो या बड़ा

गरीब हो या अमीर

सबको एक मौका देता है

बचपन में पाठशाला होती है

मिडिल स्कूल होती है

उसके बाद हायर सेकेंडरी

उसके बाद कॉलेज में

आगे की पढ़ाई होती है

कॉलेज से निकलकर

जीवन के  अथाह सागर में

आपके ज्ञान की

तजुर्बा और

स्किल की आजमाइश होती है

स्पर्धा के इस युग में

गला काट प्रतियोगिता होती है

कुछ पास होते हैं

कुछ फेल होते हैं

दृढ़ निश्चय  वाले

निराशा में संयम नहीं खोते हैं

कई बार प्रयास करते हैं

कभी जीत तो कभी हार होती है

संघर्ष के इस दौर में

मेहनत और संकल्प से

हर कठिनाई पार होती है

ज्ञान के सागर की कोई सीमा नहीं है

ज्ञान प्राप्त करने का कोई फार्मूला

कोई तेज या कोई धीमा नहीं है

बस लगन, कड़ी मेहनत और समर्पण ही जरूरी है

इसके बिना लक्ष्य प्राप्त करने की जिद अधूरी है

यह आपके जीवन के हर ध्येय की समीक्षा है

जीवन भर हर व्यक्ति को कदम कदम पर देनी पड़ती परीक्षा है /

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© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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