(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज प्रस्तुत है एक लघुकथा ‘मेरे ख़ैरख़्वाह’। इस हास्य कथा के लिए डॉ परिहार जी के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 73 ☆
☆ लघुकथा – मेरे ख़ैरख़्वाह ☆
सबेरे आठ बजे दरवाज़े की घंटी बजी। खोला तो सामने मल्लू था। मुझे देखकर उसने ज़ोर से, जैसे आश्चर्य से, ‘अरे’ कहा और फिर दौड़ कर मुझसे लिपट गया। मैंने घबरा कर उसे पीछे ढकेला, कहा, ’ए भाई, कोरोना काल में लिपटना चिपटना सख़्त मना है। उधर बैठ।’
वह और ज़्यादा मेरी छाती से चिपक गया, विनती के स्वर में बोला, ’थोड़ी देर रुक जाओ, भैया। बड़ी राहत महसूस हो रही है।’
जैसे तैसे उसे अलग करके पूछा,’सबेरे सबेरे इतना इमोशनल क्यों हो रहा है भाई?’
वह सोफे पर बैठकर बड़े भावुक स्वर में बोला,’बात यह है भैया, कि रात को आपके बारे में बहुत बुरा सपना देखा। तीन बजे जो नींद खुली तो सुबह तक चिन्ता के मारे जागता ही रह गया। रात भर दिल में धुकधुक होती रही। यहाँ डरते डरते आया कि पता नहीं क्या देखने को मिले। पता नहीं आपसे भेंट होगी या नहीं। आपको देखा तो जान में जान आयी।’
मैंने हँसकर कहा,’चलो कोई बात नहीं। कहते हैं किसी की मौत की झूठी खबर फैलने से उसकी उम्र बढ़ जाती है।’
मल्लू बोला,’ठीक कहते हैं, लेकिन मैं इसलिए परेशान हूँ कि मेरे सपने अक्सर सच निकलते हैं। मैंने अपने चाचाजी के बारे में ऐसा ही सपना देखा था। दो दिन बाद ही वे चल बसे थे।’
मैंने जवाब दिया,’चिन्ता मत करो। मेरा ब्लड प्रेशर ठीक है। शुगर वुगर भी नहीं है। हाथ पाँव दुरुस्त हैं।’
वह बोला,’आपके मुँह में घी शक्कर, लेकिन सपने के हिसाब से दस बीस दिन चिन्ता तो रहेगी। मैं फोन करके हालचाल लेता रहूँगा।’
थोड़ी देर बैठने के बाद वह बोला,’अब चलता हूँ, लेकिन मेरा चित्त इधर ही लगा रहेगा। वैसे तो सब ठीक है, लेकिन सपने की वजह से खटका होता है। सब कुछ नार्मल होने के बावजूद लोग बैठे बैठे लुढ़क जाते हैं।’
मैंने तिरछी नज़र से दाहिने बायें देखा कि परिवार का कोई सदस्य मल्लू भाई के शुभ वचन न सुन रहा हो। सौभाग्य से वहाँ कोई नहीं था।
वह उठ खड़ा हुआ, फिर हाथ जोड़कर बोला, ’आप ऐसा मत समझना कि मैं आपके लिए बुरा सोचता हूँ। मैं तो उस सपने की वजह से परेशान हूँ।’
मैंने कहा,’चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। मैं घर में बता दूँगा कि मेरी तबियत गड़बड़ होने पर तुम्हें फोन कर दें। देखते हैं तुम्हारे सपने में कितना दम है।’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी की एक कविता पाँच पर्व । )
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 70 – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 1☆
पहला शब्ददीप
दीपावली की शाम.., बाज़ार से लक्ष्मीपूजन के भोग के लिए मिठाई लेकर लौट रहा हूँ। अत्यधिक भीड़ होने के कारण सड़क पर जगह-जगह बैरिकेड लगे हैं। मन में प्रश्न उठता है कि बैरिकेड भीड़ रोकते हैं या भीड़ बढ़ाते हैं?
प्रश्न को निरुत्तर छोड़ भीड़ से बचने के लिए गलियों का रास्ता लेता हूँ। गलियों को पहचान देने वाले मोहल्ले अब अट्टालिकाओं में बदल चुके। तीन-चार गलियाँ अब एक चौड़ी-सी गली में खुल रही हैं। इस चौड़ी गली के तीन ओर शॉपिंग कॉम्पलेक्स के पिछवाड़े हैं। एक बेकरी है, गणेश मंदिर है, अंदर की ओर खुली कुछ दुकानें हैं और दो बिल्डिंगों के बीच टीन की छप्पर वाले छोटे-छोटे 18-20 मकान। इन पुराने मकानों को लोग-बाग ‘बैठा घर’ भी कहते हैं।
इन बैठे घरों के दरवाज़े एक-दूसरे की कुशल क्षेम पूछते आमने-सामने खड़े हैं। बीच की दूरी केवल इतनी कि आगे के मकानों में रहने वाले इनके बीच से जा सकें। गली के इन मकानों के बीच की गली स्वच्छता से जगमगा रही है। तंग होने के बावजूद हर दरवाज़े के आगे रंगोली रंग बिखेर रही है।
रंगों की छटा देखने में मग्न हूँ कि सात-आठ साल का एक लड़का दिखा। एक थाली में कुछ सामान लिए, उसे लाल कपड़े से ढके। थाली में संभवतः दीपावली पर घर में बने गुझिया या करंजी, चकली, बेसन-सूजी के लड्डू हों….! मन संसार का सबसे तेज़ भागने वाला यान है। उल्टा दौड़ा और क्षणांश में 45-48 साल पीछे पहुँच गया।
सेना की कॉलोनी में हवादार बड़े मकान। आगे-पीछे खुली जगह। हर घर सामान्यतः आगे बगीचा लगाता, पीछे सब्जियाँ उगाता। स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हर घर का साझा अस्तित्व भी। हिंदीभाषी परिवार का दाहिना पड़ोसी उड़िया, बायाँ मलयाली, सामने पहाड़ी, पीछे हरियाणवी और नैऋत्य में मराठी। हर चार घर बाद बहुतायत से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते पंजाबी। सबसे ख़ूबसूरत पहलू यह कि राज्य या भाषा कोई भी हो, सबको एकसाथ जोड़ती, पिरोती, एक सूत्र में बांधती हिंदी।
कॉलोनी की स्त्रियाँ शाम को एक साथ बैठतीं। खूब बातें होतीं। अपने-अपने के प्रांत के व्यंजन बताती और आपस में सीखतीं। सारे काम समूह में होते। दीपावली पर तो बहुत पहले से करंजी बनाने की समय सारणी बन जाती। सारणी के अनुसार निश्चित दिन उस महिला के घर उसकी सब परिचित पहुँचती। सैकड़ों की संख्या में करंजी बनतीं। माँ तो 700 से अधिक करंजी बनाती। हम भाई भी मदद करते। बाद में बड़ा होने पर बहनों ने मोर्चा संभाल लिया।
दीपावली के दिन तरह-तरह के पकवानों से भर कर थाल सजाये जाते। फिर लाल या गहरे कपड़े से ढककर मोहल्ले के घरों में पहुँचाने का काम हम बच्चे करते। अन्य घरों से ऐसे ही थाल हमारे यहाँ भी आते।
पैसे के मामले में सबका हाथ तंग था पर मन का आकार, मापने की सीमा के परे था। डाकिया, ग्वाला, महरी, जमादारिन, अखबार डालने वाला, भाजी वाली, यहाँ तक कि जिससे कभी-कभार खरीदारी होती उस पाव-ब्रेडवाला, झाड़ू बेचने वाली, पुराने कपड़ों के बदले बरतन देनेवाली और बरतनों पर कलई करने वाला, हरेक को दीपावली की मिठाई दी जाती।
अब कलई उतरने का दौर है। लाल रंग परम्परा में सुहाग का माना जाता है। हमारी सुहागिन परम्पराएँ तार-तार हो गई हैं। विसंगति यह कि अब पैसा अपार है पर मन की लघुता के आगे आदमी लाचार है।
पीछे से किसी गाड़ी का हॉर्न तंद्रा तोड़ता है, वर्तमान में लौटता हूँ। बच्चा आँखों से ओझल हो चुका। जो ओझल हो जाये, वही तो अतीत कहलाता है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 28 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 29) ☆
Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi. He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper. The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.
In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.
Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.
His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like, WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.
☆ English translation of Urdu poetry couplets of Anonymous litterateur of Social Media# 29☆
काळानुरुप प्रत्येक गोष्टीत बदल होणे अपरिहार्य आहे. तसाच बदल मुंबईत साजरा होणा-या दिवाळीत झाला आहे… दिवाळी ही धनश्रीमंतांचे इमलेही उजळते व मन श्रीमंतांचे दरवाजेही उघडते..मुंबईची दिवाळी म्हणजे फटाक्यांचा दणदणाट, आतषबाजी, चमचमीत फराळ, सुगंधी उटणे, दिव्यांची रोषणाई असे बरेच काही असते..
दिव्यांची रोषणाई म्हणजे फक्त दिवे लावून अंगण उजळणं एवढचं नाही तर या दिव्यांनी मनाचा गाभारा भरला पाहिजे उजळला पाहिजे. आज माणसांचं मन अंधारात चाचपडतयं त्याला स्वतःचा उजेड मिळेनासा झालाय त्यासाठी त्यानं स्वतःच स्वतःचा दिवा लावायला पाहिजे. दिव्यांचे प्रतीक असलेली ही इवलीशी पणती समाजाच्या प्रत्येक घटकाला आपलसं करून समसमान प्रकाश देते ना अगदी तसच्चं…
मोबाईलच्या जमान्याने शुभेच्छा पत्र, मेसेजेस कालबाह्य झाली आणि आपली मन बँकवर्ड झालीत.
एकमेकांच्या संवादाचे सूर धुसर झालेले दिसतात. दिवाळीच्या निमित्ताने ख-या अर्थाने प्रत्यक्ष जगण्यातचं स्वतःला झोकून द्यावं . चारचौघांबरोबर, समाजाबरोबर संवादाच्या भिंती बांधाव्यात त्यामुळे जीवनात नवचैतन्य निर्माण होईल.
सामाजिक बांधिलकी जोपासण्याचाही मोठ्या प्रमाणात प्रयत्न करायला हवा तसेच या कालावधीतही वक्तृत्व स्पर्धा, प्रश्न मंजुषा, स्पर्धा, कविता पाठांतर, गायन कथा-कथन अश्या स्पर्धांचे आयोजन करावे त्यामुळे आपण एकत्र येतो व एकत्रित संवादही साधला जातो.
दिवाळी पहाट ही संकल्पना तर अतिशय सुंदर… सांस्कृतिक क्षेत्रातून केला गेलेला एक अनोखा कार्यक्रम.. दिवाळी पहाट संगीतमय व्हावी हा हेतू विविध कला असलेले कलाकार एकत्र येऊन कलेचे सादरीकरण घरघुती स्वरूपात करत होते. कालांतराने त्याचे सार्वजनिक स्वरूप झाले.आता तसे न करता ” दिवाळी पहाट ” ही घरघुती स्वरूपाचीच असावी त्यामुळे सर्वांना अगदी सर्वांनाच त्याचा लाभ घेता येईल व आनंदही लुटता येईल.
खरी ” दिवाळी पहाट ” झाल्याचा आनंद त्यांच्या चेह-यावर दिसून येईल.
आपल्या समाजात असेही काही उपेक्षित लोक आहेत जे या सगळ्या आनंदा पासून वंचित आहेत या आनंदाला मुकले आहेत. अश्या लोकांबरोबर जर दिवाळी साजरी केली तर आपल्या बरोबरच सर्वांची दिवाळी सुखाची जाईल आणि सर्वांच्याच चेह-यावर आनंद दिसेल.
अनाथ मुले, ज्येष्ठ नागरिक अशांसाठी कामे करणा-या संस्थांना देणग्या द्याव्यात. त्यांच्या बरोबर जर आपण दिवाळी साजरी केली तर त्यांच्या चेह-यावरचे हसू आनंद आपल्या मनाला आत्मिक समाधान देऊन जातं ख-या अर्थाने दिवाळी साजरी होईल असे मी मनापासून नमूद करीन.. या सणामागचा उदात्त हेतू असा की कृतज्ञतापूर्वक माणुसकी जोपासून परोपकार करावा. सर्वांना आपल्या आनंदात सहभागी करून घ्यावे. तसेच विश्वाचं पालन करणा-या महाशक्तीलाही विसरू नये..
( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी की दीपावली पर्व पर एक विशेष कविता लक्ष्मी स्तवन। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। )
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का एक अत्यंत विचारणीय आलेख बेमानी रिश्ते. यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 70 ☆
☆ बेमानी रिश्ते ☆
रिश्ते जब मज़बूत होते हैं/ बिन कहे महसूस होते हैं…मात्र कपोल-कल्पना है। आधुनिक युग में रिश्तों की अहमियत रही नहीं और कोई भी रिश्ता पावन नहीं रहा। हर रिश्ता टूटने की कग़ार पर है; मुंह चिढ़ा रहा है। रिश्ते चाहे खून के हों या दोस्ती के, प्यार, समर्पण व त्याग का भाव इनमें से इस प्रकार नदारद हैं, जैसे चील के घोंसले से मांस। आजकल रिश्तों से व्याप्त है…छल, कपट, अविश्वास व तक़रार और अपने भी, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं। यह मंज़र सबसे हृदय-विदारक होता है, जब अपने अपनों से मुख मोड़ लेते हैं या अपने दुश्मनों का साथ निभाने हित अपनों से छल-कपट करते हैं। इंसान दूसरों द्वारा किए गए प्रहार तो सहन कर लेता है, परंतु जब अपने पीठ पीछे से छुरा घोंपते हैं, तो वह पीड़ा असहनीय होती है। इन विषम व असामान्य परिस्थितियों में रिश्तों के मज़बूत होने की उम्मीद रखना बेमानी है। आजकल मानव का हृदय पाषाण हो गया है और उसके अंतर्मन में निहित दैवीय भाव लुप्त हो गए है। सो! उन्हें महसूस करने की कल्पना कैसे की जा सकती है?
चंद वर्ष पहले घर-परिवार में पति-पत्नी व अन्य संबंधियों में स्नेह-सौहार्द होता था और संयुक्त- परिवार व्यवस्था थी। एक कमाता था, दस खाते थे। घर-आंगन में दीवारें नहीं पनपती थीं। परंतु आजकल वह सब गुज़रे ज़माने की बातें हो गयी हैं। एकल- परिवार व्यवस्था के कारण परिवार पति-पत्नी तथा बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं। भले ही विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है, परंतु दिलों के फ़ासले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। पति-पत्नी दोनों धन कमाने में व्यस्त हैं और बच्चे नैनी व आया की छत्र-छाया में रहने को विवश हैं। वे उनके आश्रय में पल-बढ़ रहे हैं और उनकी दुनिया टी•वी• व मोबाइल तक सिमट कर रह गई है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद हैं। संबंध-सरोकार समाप्त हो गए हैं। मामा, बुआ, दादा-दादी व नाना-नानी के रिश्तों को ग्रहण लग गया है, जिसका मूल कारण है… हम दो, हमारा एक। इसलिए हर संबंध में अजनबीपन का अहसास सिर चढ़कर बोल रहा है। पति-पत्नी एक छत के नीचे अजनबी की भांति रहने को विवश हैं। सो! अलगाव की स्थितियां सुरसा के मुख की भांति अपने पांव पसार रही हैं। पति-पत्नी के संबंध स्वार्थ पर टिके हैं और वे दुनियादारी निभा रहे हैं। उनमें स्नेह-सौहार्द व मर्यादा का भाव रहा ही नहीं। जीवन- मूल्य दरक़ रहे हैं। उनके जीवन का मूल लक्ष्य एक-दूसरे को कोंचना, कचोटना, बुरा-भला कहना व नीचा दिखाना रह गया है और वे इसमें सुक़ून का अनुभव करते हैं।
हर तकलीफ़़ से इंसान दु:खता बहुत है, परंतु सीखता भी ज़रूर है। दु:ख जीवन की पाठशाला है, जिससे हमें अनुभव प्राप्त होता है। सुख-दु:ख तो क्रमानुसार आते-जाते रहते हैं। परंतु मानव कभी भी अपने जीवन से संतुष्ट नहीं रहता। उसे और …और…और अधिक पाने की तमन्ना बनी रहती है। संसार में ऐसा कोई नहीं हुआ, जो आशाओं का पेट भर सके, क्योंकि मनुष्य की आशाएं समुद्र के समान विशाल हैं, वे कभी भरती अर्थात् समाप्त नहीं होतीं। बावरा मन सदैव उनकी पूर्ति में मग्न रहता है। इसलिए वह सदैव दु:खी रहता है। गुलज़ार जी के मतानुसार ‘जीवन में कुछ नहीं बदलता। हां! उम्र के साथ बचपन की ज़िद्द समझौतों में बदल जाती है।’ जी! हां, समय के साथ हमारी सोच व व्यवहार परिवर्तित होते रहते हैं। पहले हम ठान लेते थे और उस वस्तु को प्राप्त करने के पश्चात् सुक़ून प्राप्त करते थे। परंतु उम्र के साथ-साथ हम समझौते करना सीख जाते हैं और जो मिला है, उसे नियति स्वीकार लेते हैं। इसी आधारशिला पर महफूज़ रहते हैं रिश्ते, जो अब दिखावा-मात्र रह गये हैं। हर इंसान मुखौटा धारण कर, एक-दूसरे को छल रहा है और जो जितना अधिक छल करता है, उतना ही क़ामयाब इंसान कहलाता है। आइए! नकाब उतार कर एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए, अपनी संस्कृति की ओर लौट चलें और अपने बच्चों को सुसंस्कारों से पल्लवित करें। करुणा व त्याग को अपने जीवन का मकसद बनाएं और स्नेह व सौहार्द से अपने जीवन को आप्लावित करें। सेवा व सम्मान को जीवन में स्थान दें और दूसरों के प्रति ऐसा व्यवहार करें, जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। दुनिया गोल है और जैसा हम करते हैं, वही लौट कर हमारे पास आता है। ‘कर भला, हो भला।’ यदि आप दूसरों की राह में कांटे बिछाओगे, तो फूल कहां से प्राप्त करोगे?
हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म हमारे भाग्य- विधाता हैं। उनकी उपेक्षा मत करो। ज़िंदगी में कुछ लोग बिना रिश्ते के रिश्ते निभाते हैं, वे दोस्त कहलाते हैं तथा वे नि:स्वार्थ भाव से काम करते हैं। जीवन में वाकिंग डिस्टेंस भले ही रख लें, परंतु टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें। संवाद जीवन-रेखा है, जीवन की मात्र धुरी है। सो! संवाद की सूई व स्नेह के धागा उधड़े रिश्तों की तुरपाई कर देता है। परंतु आजकल संवादहीनता इस क़दर पांव पसार रही है कि संवेदन-
हीनता जीवन का अभिन्न अंग बन कर रह गई है, जिसके परिणाम-स्वरूप अजनबीपन का अहसास गहरे में अपनी जड़ें स्थापित कर के बैठ गया है। इसका मुख्य कारण है, संस्कृति व संस्कारों से अलगाव के कारण पनप रही दूरियां, विवाहेतर- संबंधों व लिव-इन के रूप में द्रष्टव्य है। सो! जीवन में लंबे समय तक शांत रहने व संबंधों को बनाए रखने का सर्वोत्तम उपाय है… ‘जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करें।’ विवेकानंद जी के शब्दों में ‘दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए मूल्यों का समझौता मत करो। आत्म-सम्मान बनाए रखो और चले आओ।’ दूसरों की खुशी में अपनी खुशी देखना सबसे बड़ा हुनर है। जो यह हुनर सीख जाता है, कभी दु:खी नहीं होता और उसके चाहने वालों की फेहरिस्त भी बहुत लंबी होती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, महात्मा बुद्ध की वे पंक्तियां…’ जो तुमसे स्नेह रखते है, प्रशंसा करो; जिन्हें ज़रूरत है, सहायता करो; जो चोट पहुंचाते हैं, क्षमा करो। जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें भूल जाओ।’ इसलिए हमेशा शांत रहें, जीवन में खुद को मज़बूत पाएंगे, क्योंकि लोहा ठंडा होने पर ही मज़बूत रहता है। गर्म रहने पर तो उसे किसी भी आकार में ढाल लिया जाता है। अंत में मैं कहना चाहूंगी ‘अहसासों की नमी ज़रूरी है हर रिश्ते में/ रेत भी सूखी हो, तो हाथों से फिसल जाती है।’ इसलिए ज़िंदगी की तपिश को सहन कीजिए, क्योंकि अक्सर वै पौधे मुरझा जाते हैं, जिनकी परवरिश छाया में होती है।
( हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। दीपावली पर्व के विशेष अवसर पर उन्होंने एक अनुकरणीय उदहारण ‘आचार्य कुंदनलाल की अनूठी दीवाली’ साझा किया है। सहज ही विश्वास नहीं होता कि अभी भी समाज में ऐसी वंदनीय वरिष्ठतम पीढ़ी है जिनसे हमें सीखने की आवश्यकता है। हम आपसे उनकी अनुभवी कलम से ऐसे ही आलेख समय समय पर साझा करते रहेंगे।)
☆ आलेख ☆ दीपावली विशेष – आचार्य कुंदनलाल की अनूठी दीवाली ☆
हिसार शहर की अग्रसेन कॉलोनी में रह रहे हमारे पड़ोसी 83 वर्षीय आचार्य कुंदनलाल का परिवार पिछले करीबन दस दिन से दीवाली उपहार के किट तैयार करने में जुटा है। लक्ष्य 108 उपहार का है जिन्हे वे अपने पैतृक गांव डोभी की गौशाला के मजदूर परिवारों व अन्य गरीब घरों को प्रदान करेंगे। गौशाला 35 एकड़ क्षेत्र में बनी है और वहां लगभग 8500 गाएं रखी गई हैं।
हर उपहार किट में दी जा रही सामग्री भी अनुपम है।
लक्ष्मी गणेश जी की प्रतिमा -1,
बड़ा दीपक -1,
छोटे दीपक -21,
सरसों तेल बोतल -1,
रोली – 1,
मोली – 1,
चावल – 500 ग्राम
मोमबत्ती – 2,
तैरती मोमबत्ती – 2,
धूपबत्ती डब्बी – 1,
अगरबत्ती डब्बी – 1
रुई की बत्ती – 21
माचिस – 1
बिस्कुट पैकेट – 4
टॉफी – 10
फिक्की खील – 100 ग्राम
मिट्ठी खील – 250 ग्राम
इतर शीशी – 1
सूती चद्दर का सेट – 1
(उल्लेखनीय है कि किट में पटाखे, फुलझड़ी या बॉम्ब आदि बिल्कुल नहीं हैं।)
“भगवान रामचन्द्र जब बनवास से लौटे तो अयोध्यावासियों ने दीपमाला कर उनका स्वागत किया था। पटाखों व बंबों से नहीं। इनका चलन एक ग़लत प्रथा है। ये प्रदूषण फैलाते हैं जो इन दिनों एक भारी समस्या बन गई है। दिल्ली में ज्यों ज्यों प्रदूषण बढ़ा है, त्यों त्यों कोरोना महामारी के केस बढ़ते जा रहे हैं।
जो लोग पटाखे आदि चलने को धार्मिक सांस्कृतिक परंपरा मानते हैं, वे ग़लत प्रचार कर रहे हैं। किसी धर्म ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं है”, आचार्य जी स्पष्ट करते हैं।
कुंदनलाल जी के घर पर लगभग एक हज़ार धार्मिक पुस्तकों की लाइब्रेरी है। वे बाज़ार में गीता प्रेस की व अन्य धार्मिक पुस्तकें बेचते हैं। उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ज़रूरी सामग्री की एक अलग दुकान भी की है।
असल में कुंदनलाल बहुत पढ़े लिखे नहीं है। वे केवल आठवीं पास हैं पर उनके जानकार उन्हे आचार्य कह कर ही संबोधित करते हैं। वे धार्मिक ग्रंथों के ज्ञाता हैं। वे धार्मिक संस्थानों में प्रवचन करते हैं। उनके जानकार इसीलिए उन्हें आचार्य जी कह कर संबोधित करते हैं।
( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य गुण-दोष“. )
☆ किसलय की कलम से # 22 ☆
☆ भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य गुण-दोष ☆
भारतीय शिक्षा का गरिमामय इतिहास संपूर्ण विश्व के लिए अद्वितीय है। वैदिक युग से वर्तमान तक भारतीय शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। गुरुकुल परंपरा के अंतर्गत राम और कृष्ण की शिक्षा के प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान में नालंदा विश्वविद्यालय, काशी, उज्जयनी, गोलकी मठ जैसे शिक्षा केंद्र अस्तित्व में रहे हैं। बाल्यकाल में ही विद्यार्थियों को भाषा, राजनीति, धर्म, युद्ध, कला, शस्त्र-शास्त्रों सहित समग्र व्यवहारिक ज्ञान में पारंगत कर दिया जाता था। आज जैसे वेतनभोगी गुरुजन उन दिनों नहीं हुआ करते थे। गुरुजनों का सम्मान राजा-महाराजाओं से कहीं अधिक हुआ करता था।
भारत में हमेशा से ही धर्म, नीति और व्यवहारिक शिक्षा पर जोर दिया जाता रहा है। समय के साथ शिक्षा में बदलाव होते गए। मुगलों और अंग्रेजों के आते-आते शिक्षा के मायने ही बदलने लगे। अंग्रेजों ने शिक्षा नीति ही ऐसी बनाई जिसमें केवल ऐसी शिक्षा पर जोर दिया गया जहाँ शिक्षा प्राप्त कर केवल बाबूगिरी, मुंशीगिरी और कानून समझने वाले पैदा किए जा सकें जो अंग्रेजी प्रशासन के कुशल संचालन में मदद कर सकें। स्वतंत्रता प्राप्ति के बहुत बाद तक वही स्थिति रही, लेकिन पिछले चार दशकों में बहु-आयामी शिक्षा का प्रचार प्रसार त्वरित गति से बढ़ा। आज भाषा, राजनीति, तकनीकि, भूगोल, भूगर्भ, अंतरिक्ष, समुद्र सहित चिकित्सा एवं ब्रह्मांड संबंधी शिक्षा तक हमारी पहुँच बन चुकी है। आज हम बहुविषयक शिक्षा की बदौलत विकास के मार्ग पर गतिमान हैं। उपरोक्त ज्ञान एवं उपलब्धियों ने हमें खुशियाँ तो दी हैं परंतु हम स्वदेशी शिक्षा से इतने दूर निकल गए हैं कि अब पीछे मुड़ना संभव नहीं है। आज हम विदेशी भाषाओं विदेशी अविष्कारों एवं विदेशी परिवेश पर आधारित ज्ञान को प्राप्त कर रहे हैं। विश्व के समकक्ष खड़े होना तो ठीक है लेकिन अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपराएँ, परिवेश और वैदिक ज्ञान को भूलना अथवा उन से अनभिज्ञ होते जाना भी उचित नहीं है। भारतीय अद्भुत ज्ञान हमारे पूर्वजों ने यूँ ही नहीं प्राप्त किया। सदियों, सहस्राब्दियों की कठिन तपस्या और साधना के प्रतिफल को आज हम भुलाते जा रहे हैं । क्या यह भी उचित है? लेकिन हम इतना अवश्य कह सकते हैं कि जो ज्ञान आज की भारी-भरकम एवं जटिल यंत्रों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, हमारे पूर्वज उसे चुटकियों में ज्ञात कर लेते थे।
भारतीय शिक्षा का वर्तमान में जो पश्चिमीकरण हुआ है उससे मूल भारतीय समाज स्वदेशी से कटकर पश्चिमोन्मुखी होता जा रहा है। हमारे देश की परिस्थितियाँ, सभ्यता और संस्कृति शेष विश्व से अलग है। यहाँ तक कि हमारे द्वारा निर्वहन किए जाने वाले रिश्ते, मान-मर्यादा एवं व्यवहारिकता में भी बहुत अंतर है। हमारे दिलों में संवेदनशीलता पश्चिम से कहीं अधिक पाई जाती है। पश्चिमी शिक्षा का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय परिवारों पर पड़ा है। परिवारों का बिखराव, आत्मीयता में कमी होना, मन की जगह बुद्धि का इस्तेमाल होना तथा लोगों का प्रयोगवादी होना, यह सब पश्चिम की ही देन है। पाश्चात्य गुण दोषों से भारतीय शिक्षा भी आज नए स्वरूप में दिखाई देने लगी है।
आज पाश्चात्य जगत में जिस गति से विज्ञान, तकनीकि एवं अंतरजालीय क्षेत्र में प्रगति और प्रयोग हो रहे हैं, उससे मानव पूर्णतः यांत्रिक होता जा रहा है। लिंगपरिवर्तन, वनस्पतियों की संकर फसलें तथा तरह-तरह के कृत्रिम उत्पाद प्रकृति को चुनौती देने लगे हैं। वैज्ञानिक उपकरणों और नवीनतम अविष्कारों ने भारतीय शिक्षा को हाशिए पर खड़ा कर दिया है। आज भारतीयता की पहचान किसी कोने में सिसक रही है। हमारी संतानें उच्च शिक्षा ग्रहण कर पश्चिमी देशों में चली जाती हैं और उनके माँ-बाप संतानों से दूर एकाकी और बिना संतानसुख के जीवन यापन करते हुए भगवान को प्यारे हो जाते हैं। अनेक लोगों को तो बेटों के कंधे भी नसीब नहीं होते। किसी भारतीय माँ-बाप के लिए इससे बड़ी बदनसीबी और क्या हो सकती है कि उनकी अर्थी को उनका बेटा भी कंधा न दे सके। वहीं पश्चिमी रंग-ढंग में रची बसी अधिकांश संताने माँ-बाप को जानबूझकर नजरअंदाज करती हैं अथवा उन्हें अपने पास नौकरों की तरह रखती हैं। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि अर्थ के अतिरिक्त पाश्चात्य समाज में ऐसा क्या है जिसे महत्त्व दिया जाता हो। वहीं भारतीयता में पहला स्थान माँ-बाप का है, रिश्तों का है, फिर कहीं जाकर अर्थ की बात आती है। पाश्चात्य शिक्षा हमें उच्च पद तो दिला सकती है लेकिन रिश्ते और स्वास्थ्य नहीं। रिश्तों में आत्मीयता की कमी और समयपूर्व बी पी, मोटापा, चश्मा और हृदय रोग भी अपनी जड़े जमाने लगते हैं। इंसान के स्वास्थ्य के लिए मात्र दवाईयाँ ही पर्याप्त नहीं होती। प्रेम, शांति और नियमितता भी आवश्यक है, जो पाश्चात्य संस्कृति अथवा उच्च शिक्षा से प्राप्त प्रभुता के कारण नहीं मिलती। पश्चिम से प्रभावित फैशन, ड्रग्स, रहन-सहन एवं खान-पान भारतीयता को कभी रास नहीं आया। रिश्तों की अस्थिरता और टूटते परिवार इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आज हम देखते हैं कि कितने ही ऐसे सनाढ्य हैं जो अपनी शानो शौकत छोड़कर शांति की तलाश में भारत आकर भारतीय जीवन शैली अपना लेते हैं।
मेरा मानना यह कदापि नहीं है कि भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी गुण-दोषों का ही बुरा प्रभाव पड़ा है। भारतीय शिक्षा के नवीनीकरण हेतु पाश्चात्य शैक्षणिक गुणों का जितना योगदान है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। वैश्वीकरण के दौर में यदि हमने पाश्चात्य शिक्षा को न अपनाया होता तो हम आज विश्व में अलग-थलग खड़े होते। यह बात अलग है कि हमारी मौलिकता बरकरार रहती परंतु मौलिकता के संरक्षण हेतु नवीनता की अनदेखी करना कितना उचित है यह प्रबुद्ध वर्ग के चिंतन का विषय है।
मेरा तो बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर भारतीय छात्र को शिक्षा ग्रहण करते समय उन सभी अच्छे पाश्चात्य गुणों को आत्मसात करना चाहिए जो हमारे लिए उचित हो। जो हमारे सफल भविष्य के लिए हो। बस इतनी सतर्कता हमें पश्चिमी दोषों से बचा सकती है, इसलिए यहाँ यह कहना यथोचित होगा कि संपूर्ण विश्व में गुण और दोष एक साथ पाए जाते हैं, लेकिन जिस तरह हंस पानी छोड़ कर केवल दूध पी लेता है, उसी तरह हम और हमारे विद्यार्थी पश्चिमी दोषों को छोड़कर पाश्चात्य शिक्षा के गुणों को ग्रहण करेंगे तो कोई ऐसी ताकत नहीं है, जो आप पर बुरा प्रभाव डाल सके।
आईए, हम अपनी भारतीय शिक्षा को तो समग्र रूप से आत्मसात करें। पश्चिमी शिक्षा की सभी अच्छी बातों को भी ग्रहण करें। विश्व में स्वयं को श्रेष्ठ निरूपित करें तथा भारतीय शिक्षा को विश्वशिखर पर पहुँचाएँ।