हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 51 ☆ लघुकथा – इज्जत ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण  और सार्थक लघुकथा  “इज्जत ”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 51 – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघुकथा – इज्जत ☆

आज मामी का फोन आया और बिटिया की शादी का शुभ समाचार मिला। बहुत खुशी हुई सोचा आज मामा होते तो बहुत खुश होते। शादी में अभी समय है पता चला दिती घर से चली गई है।  वह शादी नहीं करना चाहती। लेकिन मालूम हुआ उसके मौसाजी समझा बुझाकर उसे घर वापस ले आए और शादी के लिए मजबूर किया। सिर्फ घर की इज्जत बची रहे।

लेकिन आज शादी के कई  वर्ष बाद पता चला दोनों में बन नहीं रही अक्सर झगड़ा होता रहता है। दोनों की इतने वर्षों में भी नहीं बन पाई।

मौसी ने बताया कि ..” क्योंकि दिती अपने प्यार को भूल नहीं पा रही और अक्सर मिलती रहती है।”

ओह ऐसी बात है  “अब मामी की इज्जत कहां गई जिसे बचाने के लिए अपनी बेटी की खुशियां कुर्बान कर दी।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 42 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  भावप्रवण  “ संतोष के दोहे ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 42 ☆

☆ संतोष के दोहे ☆

विपदा

विपदा जब हो सामने, डरिये कभी न मित्र

धीरज धरम न छोड़िए, खीचें ऐसा चित्र

 

पक्षपात

पक्षपात जब भी हुआ, बढ़ा आपसी द्वंद

अगर भलाई चाहिए, छोड़ें सब छल छंद

 

मायावी

दुनिया मायावी लगे, बहुरूपी इंसान

रहें संभलकर जगत में, बनें नहीं नादान

 

आहत

दिल को आहत कर गया, सीमा चीन विवाद

इसे जल्द सुलझाइए, करें सघन संवाद

 

विभोर

सुन वर्षा का आगमन, वन में नाचे मोर

छटा सुहानी देख कर, मन हो गया विभोर

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #2 ☆ सुश्री वसुधा गाडगिल की हिन्दी लघुकथा ‘लाइलाज’ एवं मराठी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  

आज प्रस्तुत है  सर्वप्रथम सुश्री वसुधा गाडगिल जी की  मूल हिंदी लघुकथा  ‘लाइलाज ’ एवं  तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  द्वारा मराठी भावानुवाद  ‘नाइलाज ’।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #2 ☆ 

सुश्री वसुधा गाडगिल

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री वसुधा गाडगिल जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है । पूर्व प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य), महर्षि वेद विज्ञान कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश. कविता, कहानी, लघुकथा, आलेख, यात्रा – वृत्तांत, संस्मरण, जीवनी, हिन्दी- मराठी भाषानुवाद । सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक, भाषा तथा पर्यावरण पर रचना कर्म। विदेशों में हिन्दी भाषा के प्रचार – प्रसार के लिये एकल स्तर पर प्रयत्नशील। अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलनों में सहभागिता, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ,आकाशवाणी , दैनिक समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित। हिन्दी एकल लघुकथा संग्रह ” साझामन ” प्रकाशित। पंचतत्वों में जलतत्व पर “धारा”, साझा संग्रह प्रकाशित। प्रमुख साझा संकलन “कृति-आकृति” तथा “शिखर पर बैठकर” में लघुकथाएं प्रकाशित , “भाषा सखी”.उपक्रम में हिन्दी से मराठी अनुवाद में सहभागिता। मनुमुक्त मानव मेमोरियल ट्रस्ट, नारनौल (हरियाणा ) द्वारा “डॉ. मनुमुक्त मानव लघुकथा गौरव सम्मान”, लघुकथा शोध केन्द्र , भोपाल द्वारा  दिल्ली अधिवेशन में “लघुकथा श्री” सम्मान । वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। )

☆ लाइलाज ☆

अस्पताल की लेखा शाखा में दोनों लिपिकों की आपस में चर्चा चल रही थी।

” सरकार ने हर मरीज पर राशि भेजी है ! ”

” अच्छा! कितनी ! ”

” पचास हज़ार प्रति मरीज ।”

” बहुत है! ”

” कुर्सी तन्नक इधर लो …हाँ ऐसे! मरीज तक दस हज़ार का इलाज पहुँच रहे हैं । ”

” बाकी चालीस हज़ार! ”

” मंत्रियों, अफसरों, स्वास्थ्य विभाग के अन्य अधिकारियों की तंदुरुस्ती बनाने में… हेंहेंहें..! ”

” महामारी का पैसा भी ड़कार लेंगे! हद है ! ”

” लालच… लाचारी, महामारी को नहीं देखती! ”

” हाँ मित्र, ये महामारी तो एक समय बाद खत्म हो जायेगी लेकिन भ्रष्टाचार की महामारी…ये लाईलाज है!

© वसुधा गाडगिल

संपर्क –  डॉ. वसुधा गाडगिल  , वैभव अपार्टमेंट जी – १ , उत्कर्ष बगीचे के पास , ६९ , लोकमान्य नगर , इंदौर – ४५२००९. मध्य प्रदेश.

❃❃❃❃❃❃

☆ नाईलाज  ☆

(मूल कथा – लाईलाज   मूल लेखिका – डॉ. वसुधा गाडगीळ     अनुवाद – उज्ज्वला केळकर)

 

इस्पितळाच्या लेखा विभागात दोन लिपिक आपापसात बोलता होते.

‘सरकारने प्रत्येक रुग्णासाठी पैसे पाठवले आहेत.’

‘अच्छा! किती? ‘

‘प्रत्येक रुग्णागणिक पन्नास हजार.’

‘खूप झाले ना?’

‘जरा खुर्ची इकडे जवळ सरकवून घे…. हां… अशी …प्रत्येक रुग्णापर्यंत इलाजासाठी दहा हजार पोचतात.’

‘मग बाकीचे चाळीस हजार?’

‘मंत्री, ऑफिसर, स्वास्थ्य विभागातील अधिकार्‍यांना तंदुरुस्त बनवण्यात खर्ची पडतात… हाहाहा…!’

‘महामारीचा पैसासुद्धा गिळून टाकतात हे लोक…  हद्द झाली.’

‘लालसा… लाचारी, महामारी बघत नाही.’

‘होय मित्रा, ही महामारी काही काळाने का होईना संपून जाईल पण भ्रष्टाचाराची महामारी … हिच्यावर काहीsss इलाज नाही.’

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – अगरबत्ती ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  कामगारों के जीवन पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “अगरबत्ती” )

☆ विजय साहित्य – अगरबत्ती ☆

 

गंध अगरबत्तीचा

मांगल्याचा सहवास

शांत चित्त करण्याला

सुगंधित  एक श्वास. . . !

 

देह अगरबत्तीचा

क्षण क्षण देह जळे

कसे हवे जगायला

जळताना दरवळे.. . !

 

ठेवा अगरबत्तीचा

जीवनाचे सारामृत

राख होता जीवनाची

तन मन सेवाश्रृत . . . !

 

कार्य अगरबत्तीचे

प्रकाशाची दावी वाट

तिच्या विना अधुरेच

देव पुजेचे हे ताट.. . !

 

स्थान अगरबत्तीचे

दरवळे काळजात

पूजा, प्रार्थना, आरती

निनादते अंतरात.. . !

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 57 ☆ व्यंग्य – न देखो टूटा हुआ लाकडाउन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर समसामयिक व्यंग्य   “न देखो टूटा हुआ लाकडाउन ”।  श्री विवेक जी ने  गंभीर  प्रवृत्ति एवं अनुशासित पीढ़ी की  मानसिक पीड़ा का बयां अत्यंत सुंदरता से किये है। श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर  व्यंग्य के  लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 57 ☆ 

☆ व्यंग्य –  न देखो टूटा हुआ लाकडाउन ☆

स्थितियो को यथावत स्वीकार कर लेने का सुख ही अलग होता है. जिसने भी समर्पण भाव से यथा स्थिति को स्वीकार कर लिया, उसके सारे तनाव उसी पल स्वतः समाप्त हो जाते हैं . जब तक स्वीकारोक्ति नही होती तब तक संघर्ष होता है. थानेदार मार पीट कर अपराधी को स्वीकारोक्ति के लिये मजबूर करता रहता है. जैसे ही अपराधी स्वीकारोक्ति करता है, उसके सरकारी गवाह बनने के चांसेज शुरू हो जाते हैं.

पत्नी से तर्क करके भी कोई जीता है ? पत्नी को स्वीकार कर लीजीये फिर देखिये गृहस्थी की गाड़ी कितनी सुगमता से चलती है.

भगवान के सम्मुख भक्त की स्वीकारोक्ति और समर्पण के बाद भक्त और भगवान के बीच शरणागति का सिद्धांत लागू हो जाता है. भगवान कभी भी शरणागत को निराश नही करते. शरणागत वत्सल भगवान समर्पित भक्त की रक्षा के लिये सदैव तत्पर रहते हैं. विभीषण ने स्वयं को  भगवान राम की शरण में समर्पित कर दिया  तो श्री राम ने न केवल उसकी रक्षा की वरन उसे लंका का अधिपति ही बना दिया.

नेता जी हर अच्छी बुरी घटना को यथावत न केवल स्वीकार कर लेते हैं बल्कि उसमें से कुछ अच्छा ढ़ूंढ़ निकालने के गुण जानते हैं.टूटा हुआ लाकडाउन हम जैसे उन विमूढ़ लोगों को ही दिखता है, जो केवल टी वी देखते हैं. हमें लगता है कि लाकडाउन वन में ही कोरोना का निवारण हो गया होता यदि सबने हमारी ही तरह पूरे प्राणपन से लाकडाउन का पालन किया होता. किन्तु नेता जी लाकडाउन पांच के बाद भी जनता की प्रशंसा करते नही अघाते. उन्हें स्थितियो को स्वीकार करने की कला आती है. उन्होने आंकड़े ढ़ूंढ़ निकाले हैं, जिनके जरिये वे देश को दुनियां से बेहतर सिद्ध कर देते हैं. वे जनता की प्रशंसा करते हुये कहते हैं कि जनता ने लाकडाउन का पूरी तन्मयता से परिपालन किया. नेता जी की इस स्वीकारोक्ति से जनता खुश हो जाती है, नेता जी को तनाव नही होता. आज नही तो कल इस तरह या उस तरह कोरोना तो निपट ही जायेगा. गलतियां गिनाने से क्या होगा ? जब जिसे जो बेस्ट लगा उसने वह किया, जिसके लिये नेता जी सबकी पीठ थपथपा कर लोगों का मन जीत लेते हैं. उन्हें आगे की लड़ाई का हौसला देते हैं. जिसे वैक्सीन बनाने में रुचि हो वह अपनी कोशिश करे. जिसे जन सेवा करती तस्वीरें खिंचवानी हो वह वैसा कुछ करता रहे. जिसे घपले में रुचि हो वह ठेलम ठेल के इस माहौल में अपनी रुचि के अनुरूप काम कर डाले.

व्यर्थ ही अपना ज्ञान बांटकर, तर्क वितर्क कर, कुढ़ने वाले मुट्ठी भर लोगों की परवाह छोड़ दें तो बहुमत कोरोना से भी समझौता करने वालो का ही है. जब परिस्थिति अपने वश में ही न हो तो उससे जूझ कर तनाव लेने की अपेक्षा उस स्थिति के मजे लेने में ही भलाई है. तो इस कोरोना काल में सकारात्मकता ढ़ूंढ़कर स्थिति को स्वीकार कर लीजीये, योग कीजीये कोरोना से बचिये और प्रसन्न रहिये.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 23 ☆ बहानेबाजी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बहानेबाजी ”।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। इस समसामयिक सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 23 ☆

☆ बहानेबाजी  ☆

बहाना बनाने का गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बड़ी कुशलता के साथ हस्तांतरित होता चला आ रहा । झूठ व मक्कारी दोनों ही  इसके परममित्र हैं । पर कोरोना ने इस पर भी वार कर इसे चारो खाने चित्त कर दिया है । अब आप सोच रहे होंगे कि ये भी भला कोई चिंतन का मुद्दा है , सो जाग जाइये साहब आज की सबसे बड़ी समस्या यही है । जो भी लोग  या कार्य हमें पसन्द नहीं आता था वहाँ हम बड़े चातुर्य के साथ सफेद झूठ बोल देते थे । पर अब क्या करेंगे….?

कोरोना के चलते एक  बड़ा नुकसान हुआ है कि अब पुराने झूठ नहीं चल पा रहे हैं । पहले अक्सर ही लोग कह देते थे , घर पर नहीं  हैं , अब तो सभी को घर पर ही रहना है। साहब कहाँ गए हैं ,इसका उत्तर भी सोच समझकर ही दिया जा सकता है क्योंकि बहुत से कन्टेनमेंट एरिया हैं जहाँ जाना प्रतिबंधित है ।

बच्चों की भी ऑन लाइन पढ़ाई शुरू हो चुकी है सो उन्हें भी अब समय पर उठना होगा । पहले तो पेटदर्द का बहाना चल जाता था पर अब कोई सुनवाई नहीं । नींद पूरी हो या न हो , तबियत ठीक हो या न हो पढ़ना तो पड़ेगा , ऐसा आदेश माताश्री ने पास कर दिया है ।

बस अब कोई बचा सकता है तो वो है नेटवर्क न मिलने का बहाना, पढ़ाई वाला नया एप ठीक से कार्य नहीं कर रहा या क्लास अटेंड कर फिर गोल मार देना । ये सब बहाने जोर -शोर से चल रहे हैं । मोबाइल या लैपटॉप तो हाथ में है ही,  बस जो जी आये देखिए । न कोई चुगली करेगा , न टीचर कॉपी चेक करेगी । बस मम्मी का ही डर है ,जो धड़धड़ाते हुए किसी भी समय चेकिंग करने आ धमकती हैं ।

इस समय एक समस्या और जोर पकड़ रही है कि पहले अक्सर ही बीबी से कह देता था कि आज ऑफिस में ज्यादा काम है देर से आऊँगा पर अब तो समय से पहले ही घर आना पड़ता है क्योंकि नियत समय के बाद कर्फ़्यू लग जाता है । पहले  दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाते रहो कोई रोकने -टोकने वाला नहीं था पर अब तो कोरोना के डर से वे भी कोई न कोई बहानेबाजी कर देते हैं ।

सदैव की तरह सिर दर्द है , मूड ठीक नहीं है , डिप्रेशन है, काम में मन नहीं लग रहा, ये बहाने आज भी उपयोगी बने हुए हैं । खैर वो कहते हैं न कि एक रास्ता बंद हो तो हजारों रास्ते खुलते हैं । इसलिए चिंता की कोई बात नहीं मनुष्य बहुत चिंतनशील प्राणी है ; अवश्य ही कोई न कोई नए झूठों का अविष्कार कर लेगा । कहा भी गया है आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 53 – सजा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “सजा  ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 53 ☆

☆ लघुकथा –  सजा  ☆

 

“तुम ने जहर क्यों खाया था ? जानते हो आत्महत्या करने वाले को सजा होती है?”

“नहीं साहब ! मैं बीवी को अच्छी जिंदगी नहीं दे पा रहा था. बच्चे अच्छे खाने को तरस रहे थे. ऊपर से साहूकार का कर्ज , प्रकृति की मार. सब फसल चौपट हो गई थी . मैं घबरा गया था साहब. क्या करता?”

“तो मरने चले?”

“हाँ साहब ! मैं उन्हें तड़फता हुआ नही देख सकता था.”

“अच्छा. अब दोनों तड़फ़ना. एक बाहर और एक अन्दर.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

१५/०५/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 32 ☆ डोरी लगती गोली ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक सकारात्मक एवं भावप्रवण कविता  “डोरी लगती गोली”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 32 ☆

☆  डोरी लगती गोली ☆ 

 

उड़ी पतंगें देख गगन में

चिड़िया रानी  बोली।

नहीं सुहाए इनका उड़ना

डोरी लगती गोली।।

 

अनगिन साथी घायल होकर

प्राण गँवा देते हैं।

बढ़े प्रदूषण भू पर

झूठा सुख मानव लेते हैं।

 

अरे पतंगी तुम दुश्मन हो

हम जीवों के सारे।

तुम्हें एक दिन दण्ड मिलेगा

हम हैं ईश सहारे।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 50 –एकांताची करतो सोबत…. ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “एकांताची करतो सोबत….”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #50 ☆ 

☆ एकांताची करतो सोबत…. ☆ 

 

एकटाच रे नदीकाठी या वावरतो मी

प्रवाहात त्या माझे मी पण घालवतो मी

 

सोबत नाही तू तरीही जगतो जीवनी

तुझी कमी त्या नदीकिनारी आठवतो मी

 

हात घेऊनी हातात तुझा येईन म्हणतो

रित्याच हाती पुन्हा जीवना जागवतो मी

 

घेऊन येते नदी कोठूनी निर्मळ पाणी

गाळ मनीचा साफ करोनी लकाकतो मी.

 

एकांताची करतो सोबत पुन्हा नव्याने

कसे जगावे शांत प्रवाही सावरतो मी .

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

दिनांक  16/2/2019

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 52 – तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है इस सदी की त्रासदी को बयां करती  भावप्रवण रचना तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 52 ☆

☆ तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें…. ☆  

 

अपना यशोगान करना

पहचान हमारी

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।

 

थोड़े से गंभीर

मुस्कुराहट महीन सी

संबोधन में भ्रातृभाव

ज्यों नीति चीन की,

हो शतरंजी चाल

स्वयं राजा, खुद प्यादे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हो निशंक, अद्वैत भाव

मैं – मैं, उच्चारें

दिनकर बनें स्वयं

सब, शेष पराश्रित तारे,

फूकें मंत्र, गुरुत्व

भेद, शिष्यत्व लिखा दें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

बुद्ध, प्रबुद्ध, शुद्धता के

हम हैं पैमाने

नतमस्तक सम्मान

कई, बैठे पैतानें,

सिरहाना,सदियों का सब

भवितव्य बता दे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हों विचार वैविध्य,साधते

सभी विधाएं

अध्ययन, चिंतन, मनन

व्यर्थ की, ये चिंताएं,

जो मन आये लिखें और

मंचों पर बाँचें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

सुरेश तन्मय

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

12/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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