हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४७ – ममता का स्पर्श ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ममता का स्पर्श”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४७ ☆

🌻लघु कथा🌻 🔥ममता का स्पर्श 🔥

यौवन की दहलीज से बढते सौरभ को अब मम्मी पापा की बातें खटकने लगी थी। कुछ मत करो, मै सब संभाल लूँगा, आप टेन्शन मत लो—

आज के बे सिर पैर के रीति रिवाज वाले विवाह आयोजन, दोस्तों की मस्ती, नतीजा शारीरिक कष्ट, अत्यधिक थकान, – – दिमाग को शांत करने के लिए दवाईयाँ इनजेक्शन देकर डा सख्त आराम करने की सलाह देकर चला गया।

दिन भर बेचैनी, काँपते हाथों से मम्मी शाम को आरती वंदन करते विश्वास की पराकाष्ठा मंदिर से थोड़ी सी भभूती लेकर, नमक राई से बेटे की नजर उतारी।

सिर पर हाथ फेरते बोली, अब थोड़ा आराम कर ले। गहरी नींद का आगोश। हाथ पकडे ममता का स्पर्श।

पापा ने धीरे से कंधे पर हाथ रखते कहा – – चिंता न करो। सुबह तक चंगा हो जायेगा। बहुत दिनों से अपने मन की कर रहा था। आज मन से माँ की कर गया। बेटे के आँखों से अश्रु धीरे धीरे गिरने लगे।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५५ – देश-परदेश – साइबर क्राइम ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५५ ☆ देश-परदेश – साइबर क्राइम ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त पेपर क्लिपिंग्स, व्हाट्स ऐप के माध्यम से प्राप्त हुई। आज रविवार को प्रातः कालीन साप्ताहिक साथियों से चर्चा का दिन हैं, इसीलिए आज एक एस बी आई बैंक अधिकारी के साथ हुए साइबर क्राइम पर ही केन्द्रित था।

जबलपुर निवासी श्री अनिल जी ननहोरिया ने विगत 22 नवंबर 2025 को 76 लाख गवां दिए हैं। साथियों ने फ्रॉड आदि से बचने के लिए अपने अपने विचार प्रस्तुत किए, जोकि आपके विचारार्थ निम्नानुसार हैं। आप के मन भी अवश्य कुछ ना कुछ विचार आ रहें होंगे, चाहें तो सब के लिए सांझा कर सकते हैं।

एक साथी ने बताया कि बैंक खाते के लिए एक अलग मोबाइल कनेक्शन रखना चाहिए। जिसकी जानकारी किसी को भी नहीं देवें।

एक दूसरे साथी ने जानकारी दी कि सभी बैंक खाते (FD,SB आदि) पत्नी के साथ Joint operation में करवा लेवें।

एक साथी ने तो ये भी कह दिया कि अधिकतम बचत राशि को बच्चों के नाम कर देवें, और भजन करें।

कहने वाले तो ये भी कहने लगे कि सोना खरीद कर लाकर में रख देना चाहिए, दिन दोगुना रात चौगुना महंगा हो जाएगा। एक और साथी लपक कर बोले, जमीन खरीद कर रख दो, ताकि कोई रंगदार कब्जा कर लेवें।

अंत में एक साथी ने कबीर का दोहा ” पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय” सुना कर आज सभी साथियों के चाय नाश्ते का बिल भर कर अपने कथन को प्रमाणित कर दिया।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३०८ ☆ रातभर जागलात का?… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३०८ ?

☆ रातभर जागलात का? ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

चांदोबा रातभर जागलात का?

चुकीचं असं तुम्ही वागलात का?

यानाने येण्याची दिली संधी

तिथे नाही वाडा चिरेबंदी

*

आम्हा खाली बघून हसलात का?

आमची वाट बघत बसलात का?

ढगाच्या मागुन निघताल का?

गोरा गोरा चेहरा दावताल का?

*

चांदोबा एकटे फिरता तुम्ही

सोबत का हो नसते मामी

सांगा तिला माहेरी धाडलंत का?

वा कुठं दडवून ठेवलंत का?

*

अवचीत पाऊस कसा आला

आणि तुम्ही गायब कुठे झाला

दामिनीला पाहून दडलात का?

खरं सांगा चांदोबा रडलात का?

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६० – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अधिनायक वादी प्रजातंत्र…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६० – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रजातंत्र में

प्रजा ने जिसे चुना

हमने उसे गुना ।

यह क्या

विदेशी वेशभूषा

और

अधिनायकवादी स्वर ।

हम उसे उखाड़ देंगे

उसे पछाड़ देंगे

उच्च स्वर में कहेंगे

केवल हम ही रहेंगे

इस बस्ती में रहेंगे वे

जो हमारा आदेश मानेंगे

हमें सहेंगे।

क्या किसी के पास है

इस कालिया के काटे का मंत्र

आखिर कब तक चलेगा

यह अधिनायकवादी प्रजातंत्र

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६० – “इंतजार मे रही सूखती…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “इंतजार मे रही सूखती...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “इंतजार मे रही सूखती–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

एक सकोरा पानी, दाना

रक्खा करती,  माँ ॥

औरों की खातिर चिडिया सी

उड़ती रहती,  माँ ॥

 

छाती में दुनिया – जहान की

लेकर पीड़ायें –

आँचल भर, उसको

जैसे हों क्रीड़ायें ।

 

आगे खिडकी में आँखों के

चित्र कई टाँगे,

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती,  माँ ॥

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुडेर तोती ।

जहाँ दिखाई देते सबको

आशा के मोती ।

 

वहीं दिखाई देती सबकी

खुली सजल आँखें ।

इन्ही सभी में भरे कलश सी

छलका करती,  माँ ॥

 

लम्बे -चौड़े टीम -टाम हैं

बस अनुशासन के ।

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नगर प्रशासन के ।

 

गरमी गले गले तक आकर

जैसे सूख गई ।

इंतजार मे रही सूखती

पानी कहती, माँ ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

(17 – 4- 2022 को लिखा गीत – पोस्टिंग तिथि > 13-11-2025)

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मन ? ?

सार्वकालिक चर्चा है,

प्रकृति की

सनातन गूढ़ता,

अध्यात्म दिखाता है

कण-कण में छिपा गूढ़,

विज्ञान दर्शाता है

सजीवों की संरचना में

अंतर्निहित दुरूहता…,

दर्शन और मनोविज्ञान

गूढ़ता की सरलता और

क्लिष्टता के बीच,

शोधन और

संशोधन में विचरते हैं,

ये सब पढ़ते-सुनते-गुनते,

मन जाने कहाँ-कहाँ

चक्कर लगा आया,

अपवादस्वरूप ही

देह के साथ रहा,

बाकी विदेह-सा

ब्रह्मांड का भ्रमण कर आया,

एक निष्कर्ष मेरा भी है-

कस्तूरी मृग-सा रूढ़ है,

बाहर क्या देखें

मन सबसे गूढ़ है!

?

© संजय भारद्वाज  

दोपहर 4:34 बजे, 11.11.2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २० – हास्य-व्यंग्य – “फेरी वाले और पड़ोसन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “फेरी वाले और पड़ोसन”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २० ☆

☆ व्यंग्य ☆ “फेरी वाले और पड़ोसन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

बचपन में जब भी मां मुझे बाजार भेजा करतीं, मोल – भाव कर दाम निश्चित करके समान खरीदने की हिदायत देना न भूलतीं। कभी – कभी तो वे मंगाई जाने वाली वस्तुओं का व्यापारी द्वारा निर्धारित अनुमानित मूल्य बताकर, मेरे द्वारा तय की जाने वाली राशि की पहली परिधि भी निश्चित कर देतीं, जैसे आलू का भाव 20 रूपये किलो बताया जाए तो तुम 15 रूपये किलो मांगना।

मां के कहने से मैं खरीद फरोख्त के समय थोड़ा प्रयास भी करता कि व्यापारी द्वारा मांगी कीमत से कम दामों में मुझे वस्तु मिल जाए, परंतु मुझे खेद है कि मैं भाव ठहराने अथवा तय करने की कला में निपुणता प्राप्त नहीं कर पाया और हमेशा ही अपनी मां एवं मित्रों की तथा अब पत्नी की नजरों में भी एक कुशल खरीददार न कहला सका। अपने द्वारा खरीदी गई किसी भी वस्तु का मूल्य बताकर में लोगों पर रौब न जमा सका, उन्हें आश्चर्य में न डाल सका। जब मेरे मित्र और मेरी पत्नी मेरे द्वारा लाई गई वस्तु का मूल्य सुनकर मुझे ठगा हुआ साबित कर देते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि शायद वह दिन मेरे जीवन में कभी नहीं आएगा जब मेरे द्वारा खरीदी वस्तु की तथा उसके मूल्य की तारीफ करते हुए लोग दांतों तले अंगुली दबा कर मुझसे उस दुकान का पता पूछेंगे। कभी – कभी मुझे दुख होता है कि मैंने दाम ठहराने अथवा मोल भाव करने जैसी अत्यावश्यक कला मन लगा कर क्यों न सीखी।

मोल भाव करने की आवश्यकता कहां नहीं पड़ती, रिक्शा करने, सब्जी खरीदने से लेकर शादी करने – कराने और पुराने कपड़ों से बर्तन खरीदने तक कदम – कदम पर मोलभाव कर मूल्य ठहराने या दाम निश्चित करने की आवश्यकता पड़ती है।

मेरी पत्नी पर हमारी पड़ोसन का प्रभाव है जहां दिन के बारह घंटे में से छह घंटे तो फेरी वालों का आना – जाना लगा ही रहता है। अच्छे – अच्छे पठान फेरी वाले जो दरी – गलीचे जैसी महंगी वस्तुएँ किश्तों में बेचते हैं हमारे पड़ोस में आकर ठग लिए जाते हैं। न जाने कौन सी कला हमारी पड़ोसन के पास है, सारे मोहल्ले की महिलाओं पर खरीद फरोख्त के मामले में उनका प्रभाव है।

जानकार फेरी वाले तो स्वयं आवाज लगते हुए उनके घर के दरवाजे पर बैठ जाते हैं। अनजान या नए फेरी वालों को पकड़ – पकड़ कर लाने का कार्य उनके चुन्नू – मुन्नू किया करते हैं। वैसे हमारा और हमारी पड़ोसन का मकान गली की नुक्कड़ पर ही है, अतः यह कहा जा सकता है कि चाहे वह कोई भी फेरी वाला क्यों न हो बिना मेरे पड़ोस में रुके आगे जा ही नहीं सकता।

फेरी वालों को कुशलता पूर्वक ठग कर उनसे उचित मूल्य पर समान खरीदने में हमारी पड़ोसन को सिद्धि प्राप्त है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे गीदड़ मौत आने पर शहर की ओर भागता है वैसे ही फेरी वाले दुर्भाग्य आने पर हमारे पड़ोस में सामान बेचने पहुंच जाते हैं। पड़ोसन की ख्याति धीरे – धीरे आसपास के सभी घरों की घर मालकिनों तक एवं उनके माध्यम से घर मालिकों तक पहुंच चुकी है। मोहल्ले की अनेक महिलाएं जो वस्तु क्रय करने में हमारी पड़ोसन का नेतृत्व स्वीकार कर चुकी हैं, फेरी वाले के आने पर चुन्नू – मुन्नू की सूचनाओं के द्वारा उनके घर पहुंच जाती हैं, पड़ोसन की अगुवाई में वस्तु को उचित मूल्य पर खरीदने।

ठंड का मौसम चल रहा है आजकल फेरीवालों को फंसा कर सस्ते मूल्य पर ऊन खरीदने का अभियान मोहल्ले की महिलाओं ने उन्हीं के नेतृत्व में चलाया है। घर घर में ऊनी बनियान बनाई जा रहीं हैं। फुर्सत के क्षणों में मेरे घर में भी मेरी पत्नी की बातों का विषय ऊन ही रहता है। हमारे किस पड़ोसी की पत्नी ने कौन से रंग का कितना ऊन, किस मूल्य पर लिया है इसकी जानकारी तो मुझे है ही यदि मैं गंभीरता पूर्वक पत्नी की बात सुनूं तो यह भी मालुम कर सकता हूं कि किस पड़ोसन ने किसके लिए कितने फंदे डाले।

एक दिन जब मेरी पत्नी पड़ोसन के यहां उनके आमंत्रण पर किसी फेरी वाले से कुछ खरीदने गई थी, मैंने सोचा क्यों न अपने गर्म कपड़े निकाल कर उनकी झाड़ – पोंछ करके उन्हें धूप दिखा दूं। मैंने घर की तमाम पेटियां, अलमारियां इत्यादि छान डालीं परंतु जब मुझे अपना इकलौता ससुराल से मिला गर्म सूट न मिला तो मैं आश्यर्च में पड़ गया। वही तो एक सूट था जिसे कभी – कभी विशेष पार्टियों आदि में पहिन कर मैं लोगों पर अपनी सम्पन्नता की धाक जमा दिया करता था। पत्नी के वापस आने पर रहस्योद्घाटन हुआ – मेरा सूट और अपनी एक पुरानी बनारसी साड़ी फेरी वाले को देकर उन्होंने कुछ बर्तन पड़ोसन के नेतृत्व में ले लिए थे। मैंने अपना माथा ठोक लिया और पड़ोसन को कोसता हुआ पश्चाताप करने लगा। मुझे दुखी और परेशान देख कर पत्नी अपने हाथों का ऊन दिखा कर प्रसन्नता पूर्वक बोली – चिंता न करो अभी, मैंने कुछ पुराने बर्तनों के तुम्हारी स्वेटर के लिए ही ऊन लिया है, दो – चार दिन में ही स्वेटर तैयार हो जाएगी। मैं बर्तनों के बदले ऊन की बात सुनकर चौंक गया, परंतु पत्नी विजय से गर्वित मुस्कान लिए सलाई में फंदे डालते हुए बनियान का डिजाइन पूछने पुनः पड़ोसन के यहां जा चुकी थी। मैंने चुपचाप कपड़े पहने और इस पड़ोसन से दूर नए मकान की तलाश में निकल पड़ा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४२ ☆ # “वृद्ध आदमी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “वृद्ध आदमी…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४२ ☆

☆ # “वृद्ध आदमी…” # ☆

☆

जीवन के अंतिम पहर में

अपने ही दौड़ते हुए शहर में

अपने ही रहते हुए घर में

वृद्ध आदमी अनजान सा रहता है

 

सभी प्रसन्न है ,मस्त है

सभी रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त है

सभी निपुण और सिद्ध हस्त है

वृद्ध आदमी चुपचाप सब  देखता है

 

आंगन में  चिड़ियों की चहचहाहट है

हवाओं मे किरणों की गर्माहट है

वाटिका में भंवरो के आगमन की आहट है

वृद्ध आदमी फूलों की सुगंध के साथ बहता है

 

बाहर भीड़ है पर वह अकेला है

कोई उसे नहीं पूछने वाला है

रंगीनियों का लगा हुआ मेला है

वृद्ध आदमी मन मसोस कर सब कुछ सहता है

 

उसका होता तिरस्कार रोज है

परिवार पर वह एक भारी बोझ है

शायद वह दूसरी दुनिया की खोज है

वृद्ध आदमी सब सहकर भी कुछ नहीं कहता है

 

जीवन भर रिश्तो को जोड़ता है

जीवन भर धाराओं को अपनी ओर मोड़ता है

विषम परिस्थितियों में भी संघर्ष नहीं छोड़ता है

वृद्ध आदमी मरते मरते भी खुश रहो सबको कहता है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ होगा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘होगा…‘।)

☆ कविता –  होगा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

 

होगा

क्या होगा?

जाने क्या होगा?

कैसे होगा?

क्यों होगा?

जब होगा,

तब होगा,

कब होगा?

कहां होगा?

अच्छा होगा,

बुरा होगा,

कुछ तो होगा,

वो जाने,

क्या होगा?

कैसे होगा?

होने दो,

जो होगा,

सो होगा,

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१३ ☆ कथा कहानी – ख़ुशहाली ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम कथा – ‘ख़ुशहाली ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१३ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ख़ुशहाली  ☆

श्री और श्रीमती कौशल सवेरे उठे तो उन्होंने एक दूसरे को बड़े प्यार से चूमा। उस दिन उनकी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी। श्रीमती कौशल की इच्छा के अनुसार पच्चीसवीं सालगिरह कुछ ख़ास इंतज़ाम के साथ मनायी जानी थी।

श्रीमती कौशल ने शाम की पार्टी में आमंत्रित किये जाने वाले सब लोगों के नाम कार्डों पर लिखे, फिर पति से पूछा, ‘कार्ड बांटने के लिए बंटी को भेज दें? कार लेकर चला जाएगा।’

श्री कौशल ने असहमति में सिर हिलाया, कहा, ‘अभी घंटे भर में धूप तेज़ हो जाएगी। बंटी वैसे ही नाज़ुक मिजाज़ है। बिशन को भेजो। स्कूटर से दो-तीन घंटे में बांट कर आ जाएगा।’

बिशन को बुलाकर कार्ड सौंप दिये गये। उसने पूरी हिफाज़त से कार्ड एक थैले में रखे और स्कूटर लेकर निकल गया। कार्ड बांटने वाले काम की चिन्ता खत्म हुई।

थोड़ी देर में बिजली वाले के दो आदमी आकर बंगले को बल्बों से सजाने लगे। दोनों नयी उम्र के थे। दोनों की पतलूनें मोहरी पर छिनी हुई और खस्ताहाल थीं। कुछ ऐसा ही हाल कमीज़ों का था। उन्होंने बंगले की दीवार पर सीढ़ी टिकायी और  बंगले को झालरों से सजाने के काम में मशगूल हो गये। धूप के बढ़ने के साथ उन्हें काम करने में दिक्कत हो रही थी, लेकिन उसके बावजूद वे काम तेज़ रफ़्तार से कर रहे थे।

थोड़ी ही देर में उनका मालिक स्कूटर पर वहां पहुंच गया। वह ठिंगना, तोंदियल आदमी था। उसने स्कूटर पर बैठे-बैठे ही छोकरों के काम पर निगाह डाली। फिर बोला, ‘ज़रा तेज हाथ चलाओ। टाइम से काम पूरा नहीं हुआ तो तुम्हें भी जूते पड़ेंगे और मुझे भी।’

फिर उसने स्कूटर छाया में खड़ा कर दिया और उसी पर बैठकर रूमाल से पसीना पोंछने लगा।

शाम होने से पहले बंगले के दो नौकरों ने सामने की ज़मीन को सींचना शुरू कर दिया। ज़मीन से सोंधी गंध उठने लगी और जल्दी ही आसपास ठंडक महसूस होने लगी। शाम होते ही बंगले पर सजाये लाल-हरे बल्ब जल उठेऔर बंगला बेहद खूबसूरत दिखने लगा। फिटिंग करने वाले दोनों लड़के एक तरफ बैठे बल्बों पर नज़र डाल रहे थे।

कुछ देर बाद गुबरैलों की तरह रेंगती हुई कारें आने लगीं। जल्दी ही बंगले का सामने वाला हिस्सा कारों से भर गया। मेहमानों के बैठने का इंतज़ाम लॉन में ही था। बहुत से लोग कुर्सियों पर बैठ गये और कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी करते रहे। कुछ लोग बंगले में लगे खूबसूरत फूलों को देखने लगे।

श्रीमती अस्थाना श्रीमती कौशल से बोलीं, ‘आपके फूल बहुत खूबसूरत हैं। खूब ‘टेस्ट’ है आपका।’

श्रीमती कौशल खुश होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी। दरअसल यह सब हमारे माली का काम है। हमें तो बगीचे की देखभाल की फुरसत ही कहां मिलती है? सवेरे शाम घूम लेते हैं यही बहुत है।’

माली का ज़िक्र करते समय उन्होंने एक मरियल चुटियाधारी आदमी की ओर इशारा किया जो धारीदार पायजामा पहने चुपचाप एक तरफ खड़ा था।

श्रीमती अस्थाना बोलीं, ‘फिर भी, आपको शौक है तभी तो माली करता है।’

श्रीमती कौशल ने कहा, ‘हां जी, थैंक्यू जी।’

लॉन पर ही ‘ड्रिंक्स’ पेश किये गये। जो शराब नहीं पीते थे उनके लिए ‘सॉफ्ट ड्रिंक्स’ थे। चार-पांच नौकर इस काम में मुस्तैदी से लगे रहे।

श्रीमती सिंह ने टिप्पणी की, ‘आपके नौकर बहुत ‘ट्रेन्ड’ हैं। बहुत कायदे से पेश आते हैं।’

श्रीमती कौशल गद्गद होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’

थोड़ी देर बाद श्रीमती कौशल ने सबसे डिनर के लिए अन्दर चलने का अनुरोध किया। सब लोग भोजन से लदी मेज़ो के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गये।

तभी श्रीमती कौशल की छः वर्षीय पुत्री सीढ़ियों से उतरी और ‘ममी! ममी!’ पुकारती हुई उनसे लिपट गयी। श्रीमती कौशल परेशान हो गयीं। बोलीं, ‘ओ डियर! तुम नीचे क्यों आ गयीं? तुम्हारी तबियत अभी ठीक नहीं है।’

फिर उन्होंने आवाज़ दी, ‘जानकी! जानकी!’ सीढ़ियों पर से एक अधेड़ औरत, सफेद साड़ी पहने, नंगे पांव तेज़ी से आयी। श्रीमती कौशल उसे झिड़ककर बोलीं, ‘बेबी को रूम में रखो। उसकी तबियत ठीक नहीं है।’

जानकी बच्ची को लेकर चली गयी।

मेहमान भोजन की तारीफ कर रहे थे। श्रीमती कौशल ने सफाई दी, ‘इसके लिए मेरे कुक को थैंक्स देना चाहिए। मेरा कुक बहुत होशियार है।’

श्रीमती सक्सेना बोलीं, ‘ओह, मिसेज़ कौशल, आप बहुत ‘मॉडेस्ट’ हैं। आप सब चीजों का ‘क्रेडिट’ अपने नौकरों को दे देती हैं। असली ‘क्रेडिट’ तो घर की मालकिन का ही होता है।’

श्रीमती कौशल बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’

भोजन के बाद सब लोग फिर लॉन में आ गये और गपशप होने लगी। तभी मुखर्जी साहब ने अपनी कुर्सी के पास उल्टी कर दी। सब की नाकें सिकुड़ गयीं। महिलाओं ने नाक पर रूमाल रख लिये।

श्रीमती मुखर्जी का चेहरा उतर गया। बोलीं, ‘मैं इन्हें इतना समझाती हूं कि ‘लिमिट’ के भीतर ‘ड्रिंक’ करो, लेकिन मानते ही नहीं।’

श्रीमती कौशल ने अपने चेहरे पर आया चिड़चिड़ाहट का भाव दबा लिया। हंसकर बोलीं, ‘कोई बात नहीं जी। हो जाता है।’

फिर उन्होंने आवाज़ लगायी, ‘बिशन!’

बिशन के आने पर उन्होंने कहा, ‘यहां जल्दी से सफाई करके अच्छी तरह धो दो।’

रात के दस बज गये थे। मेहमान विदा लेने लगे। कारें अपनी अपनी बत्तियां जलाकर सरकने लगीं।

श्री वर्मा की कार बार-बार कोशिश करने के बाद भी स्टार्ट नहीं हो रही थी। थोड़ी देर बाद वे कार से बाहर निकल कर पसीना पोंछने लगे। श्रीमती कौशल बोलीं, ‘रुकिए, मैं अपने ड्राइवर को बुलाती हूं।’

उन्होंने आवाज़ दी, ‘अब्दुल!’ तुरन्त खाकी कमीज़-पैंट पहने एक सांवला आदमी उनके सामने हाज़िर हो गया। अब्दुल ने दस पन्द्रह मिनट के परिश्रम से कार स्टार्ट करके श्री वर्मा को सौंप दी।

श्री और श्रीमती सूर्यवंशी कुछ परेशान से श्रीमती कौशल के पास आये। श्रीमती सूर्यवंशी बोलीं, ‘यहां टैक्सी मिल जाएगी? हम टैक्सी से आये थे। हमारी कार गैरेज में है।’

श्रीमती कौशल बोलीं, ‘कैसी बातें करती हैं आप? हम आपको अपनी कार से भिजवा देते हैं।’

उन्होंने फिर अब्दुल को बुलाया, कहा, ‘अब्दुल! साहब को शास्त्री रोड पर छोड़कर आओ।’ और अब्दुल कार में सूर्यवंशी दंपति को लेकर निकल गया।

धीरे-धीरे सब मेहमान विदा हो गये। श्रीमती कौशल थक गयी थीं— कुछ मेहमाननवाज़ी के कारण और कुछ औपचारिकता का मुखौटा पहने पहने। वे पति के साथ अन्दर गयीं और ड्राइंग रूम में ही एक आराम कुर्सी पर फैल कर ऊंघने लगीं। श्री कौशल दूसरी आराम कुर्सी में लेट गये।

आराम कुर्सियों में श्री और श्रीमती कौशल ऊंघ रहे थे। उधर बिशन खाने की मेज़ों की सफाई कर रहा था। ऊपर कमरे में जानकी श्रीमती कौशल की सोयी हुई बच्ची की बगल में बैठी थी। नींद से कई बार उसका सिर लटक जाता था, लेकिन वह फिर आंखें खोल कर देखने लगती थी। रसोईघर में रसोइया और बंगले के दूसरे नौकर उकड़ूं बैठे खाना खा रहे थे। बिजली वाले के दोनों नौकर बाहर अपनी झालरें समेट रहे थे। उधर अब्दुल सूर्यवंशी दंपति को छोड़कर सड़क की छाती पर गाड़ी दौड़ाता हुआ वापस लौट रहा था।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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