हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५८ – शब्द अब नहीं रहे शब्द ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – शब्द अब नहीं रहे शब्द…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५८ – शब्द अब नहीं रहे शब्द ✍

(काव्य संग्रह – शब्द अब नहीं रहे शब्द) 

शब्द को ब्रह्म कहा गया है

और ब्रह्म को देखा नहीं किसी ने

शब्द को भी कोई कहाँ देख पाता है

हाँ सुन पाता है उसे

अगर सुनना चाहे तो ।

मगर, क्या होता है मात्र सुनने से

जबकि अर्थहीन हो गए हों शब्द

लगता है शब्दों की केंचुली उतर गई है

बदल गई है उनकी तासीर

अब प्रेम शब्द न तो स्निग्धता देता है

न ऊर्जा

और विश्वास का दावा

कानों में उड़ेल देता है पिघला शीशा

सम्बोधन के सारे शब्दों से

सड़ी मछली की बू आने लगी है

शब्द अब शब्द नहीं रहे।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५८ – “सुरमइ – तम का कलश…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “सुरमइ – तम का कलश–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “सुरमइ – तम का कलश–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

बैठी है झोपड़ी में

फूस की ।

मूरत कोई ज्यों

आबनूस की ॥

 

लगती है शहद में

नहाई सी ।

होठों पर ठहरी

शहनाई सी ।

 

बेशक मीठी मीठी

दिखती है –

गोली जैसे

लेमनचूस की ॥

 

सुरमइ – तम का कलश

छलका है ।

कुहरीला रंग तनिक

हलका है ।

 

विठुर रही व्याकुल

अमावस में –

रात विकट हो जैसे

पूस की ॥

 

काँपी पत्तों की

वन्दनवा रें ।

टिटहरियाँ मंत्रों को

उच्चारें ।

 

घोंसला बया का

था लटक रहा –

फीकी कर रंगत

फानूस की ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

11 -11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ – हास्य-व्यंग्य – “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ ☆

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

लल्लू की शादी थी। लल्लू के दोस्तों की जिद थी कि बारात में कल्लू का बैंड बजेगा, तभी झल्लू, लल्लू और सिल्लू नाचेंगे।

बारात में नृत्य होना अब कितना जरूरी “आइटम” हो गया है यह सभी जानते हैं। वह बारात भी कोई बारात है जिसमें घोड़ी चढ़े दूल्हे के आगे – आगे बैंड वादकों के बीच उसके दस – बीस साथी नाच – नाच कर आसमान सर पर न उठा लें। नर्तकों के दल के बिना आज बारात की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नृत्यों के प्रदर्शन के बिना बारात वैसी ही बेमजा, अनाकर्षक लगती है जैसे नमक के बिना दाल, बूट के बिना सूट और ठुमकों के बिना खूबसूरत कमसिन हसीना की चाल।

यदि व्हेनसांग या फाहयान जैसा कोई चीनी यात्री इस समय भारत यात्रा का वर्णन लिख रहा होगा तो उसने यहां के विवाहों और बारातों पर अवश्य ही लिखा होगा कि भारत में विवाह अब पंडितों के मुहूर्त पर नहीं बैंड वादकों के दिए समयानुसार निर्धारित होकर संपन्न होते हैं। वर पक्ष नगर में उपलब्ध श्रेष्ठतम बैंड पार्टी को अपनी बारात हेतु तय करके पूरा पैसा कन्या पक्ष के सर मढ़ने की कोशिश करता है।

वर – पक्ष की हैसियत अब बारात के साथ चल रही बैंड पार्टी के स्टैण्डर्ड से आंकी जाने लगी है। बारात में बैंड वादकों के आगे आगे चमचमाते रथों अथवा सुसज्जित ठेलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्र (लाउड स्पीकर) चलते हैं जो बैंड वादकों की संगीत कला और वर पक्ष की प्रतिष्ठा को दूर – दूर तक फैलाने का काम करते हैं। बैंड वादकों के दोनों ओर कतार से गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले बच्चे अथवा महिलाएं सर पर डिस्को लाइट व्यवस्था से जुड़े विद्युत बोर्ड रख कर चलते हैं जिनकी विद्युत छटा वाद्य यंत्रों से निकली तरंगों की भांति कंपित होकर नृत्य का वातावरण निर्मित करती है।

यों तो पथ पर जगह – जगह बारात रुकवाकर उपस्थित नर्तक दल अपने नृत्य का प्रदर्शन करता है, किंतु तिराहों – चौराहों पर नाच के विशेष और लम्बे प्रदर्शन हुआ करते हैं। आमतौर पर नशे के कारण बारात में उपस्थित युवा नर्तकों का समय बोध समाप्त हो जाता है। वे नाचना शुरू करते हैं तो उस समय तक नाचते ही रहते हैं जब तक कि बारात के साथ युवकों का संकोच पालते चुपचाप होश में चल रहे बड़े – बूढ़े बार – बार उनसे आगे बढ़ने का अनुरोध नहीं करते।

नर्तकों में कुछ तो घोषित नर्तक होते हैं जिन्हें केवल बारात के आगे – आगे नृत्य करने के उद्देश्य से ही दूल्हे अथवा उनके छोटे बड़े भाईयों द्वारा आमंत्रित किया जाता है। ऐसे युवा नर्तक नृत्य के प्रभाव को उभारने वाली भड़कीली, नए फैशन की पोशाकें धारण किए रहते हैं। सामान्यतः इनके बाल या तो बड़े – बड़े होते हैं अथवा सिर के चारों ओर के बाल साफ, केवल सिर के ऊपर बालों का गुच्छा होता है जैसे छिला हुआ नारियल। बैंड वादकों को इनके निर्देशानुसार नृत्य प्रधान फिल्मी गीतों की धुनें बजाना पड़ती हैं। युवकों की दृष्टि में इन कुशल तथा बड़े – बूढों की दृष्टि में इन भौंडी हरकतें करने वाले युवा नर्तकों का नृत्य अथवा उछलकूद जब पूरे जोश में होता है तब दर्शनीय वातावरण निर्मित होता है। ऐसा लगता जैसे अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, ऋषि कपूर, सलमान खान और ऋतिक रौशन के भूत एक साथ इन पर सवार हो गए हों। अब तो बड़ी संख्या में महिलाएं भी बारातों में सड़क पर होने वाले नृत्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगी हैं। सच भी है जमाना बराबरी का है।

बारात के समक्ष नृत्य प्रदर्शन में बीच – बीच में निपुण नर्तकों द्वारा नृत्य से अंजान अथवा नृत्य करने में शर्माने, झिझकने वालों को भी नृत्य में सम्मिलित होने के लिए पकड़ – पकड़ कर खींचा जाता है। चूंकि बारात में नाचना दूल्हे से निकटता का परिचायक है, अतः नाच न जानने वाले अथवा नाच की इच्छा न रखने वालों को भी नृत्य आमंत्रण के बलात्कार का शिकार होना पड़ता है। जब इस तरह के लोग सामूहिक नृत्य करते हैं तो केवल तीन काम किए जा सकते हैं। पहला जी खोल कर हंसने का, किंतु हंसना अभद्रता का प्रतीक हो जाता है इसीलिए बारात में उपस्थित दर्शक हंसी आने पर भी हंस नहीं पाते, हां कुछ चेहरों पर मुस्कुराहट अवश्य आ जाती है। नृत्य से बिल्कुल ही अपरिचित किंतु नृत्य करने को मजबूर कुछ बेचारों का नृत्य देखकर जो दूसरा काम किया जा सकता है वह है सिर पटकने का। इसी तरह तीसरा काम, अपने बाल नोंचने का भी यदि दर्शक चाहें तो कर सकते हैं।

अस्तु, अंत में कन्या के घर तक पहुंचते – पहुंचते नर्तक दलों और बैंड वादकों में तू – तू, मैं – मैं होने लगती है। बैंड वादक भिन्न – भिन्न नर्तक दलों के पसंद की धुनें बजा – बजाकर परेशान हो जाते हैं। कोई कहता है ” खई के पान बनारस वाला” बजाओ, कोई “घोड़ी पे होके सवार, चला है दूल्हा यार” की फरमाइश करता है। तो कोई कहता है कि “तंबू में बम्बू” बजाओ। सबकी अलग फरमाइश होती है।

लड़की के घर के समक्ष नृत्य का विशाल, अनोखा और अंतिम प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सारे कुशल, अकुशल नर्तक एक साथ भाग लेकर हंगामा खड़ा कर देते हैं। पंडित लड़की के माता – पिता से मुहूर्त निकला जा रहा है की गुहार लगाते हैं। आखिर समझने – बुझाने पर किसी तरह नृत्य निशा समाप्त होती है। मिलने को आतुर समधी गले मिलते हैं। नचईया कम हो रहे नशे की पूर्ति को निकल जाते हैं।

यह दृश्य केवल लल्लू की शादी और कल्लू की बैंड पार्टी का नहीं, आज की अधिकांश बारातों का है। हर शादी में झल्लू, मल्लू और सिल्लू जैसे नर्तक होते हैं। भले ही इनके नाम कुछ और हों। शादियों का समय चल रहा है, वैसे तो मुझे भरोसा है कि सभी के पास बारात के लिए नाचइयों का इंतजाम होगा फिर भी यदि किसी को नाचने वाले न मिल रहे हों तो उसे चाहिए कि वह पहले से दौड़ धूप कर ले, आजकल किराए पर सब उपलब्ध है।

☆

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४० ☆ # “चलो जिंदगी को…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चलो जिंदगी को…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४० ☆

☆ # “चलो जिंदगी को…” # ☆

☆

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

पुरानी बोतल में नई मदिरा

रोज थोड़ी-थोड़ी पीते हैं

 

खुशियों से भरा संसार है

कांटे थोड़े फूल बेशुमार है

खुशबू ही खुशबू है चारों तरफ

चमन में बहार ही बहार है

क्यों याद करें जो पल हमारे बीते

चलो जिंदगी को

नई उमंगों के साथ जीते हैं

 

पतंगों सी हमारी प्रीत है

जल जाना प्रीत की रीत  है

एक रात के मेहमान है हम

एक रात के सब यहां मीत है

फिर क्यों अपने जज्बातों को सिते हैं

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

 

सब दिखावे के यहां रिश्ते हैं

सब दिखावे के यहां फरिश्ते हैं

किसी को फिक्र नहीं है तेरी

क्यों तेरे जख्म दिन रात रिसते है

चल जो बची है मय

उसे बेहिसाब पीते हैं

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

पुरानी बोतल में नई मदिरा है

रोज थोड़ी-थोड़ी पीते हैं  /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बाल दिवस विशेष – बचपन में सपने भरना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बचपन में सपने भरना है…‘।)

☆ बाल दिवस विशेष – कविता – बचपन में सपने भरना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

अब बच्चों के हाथों में,

ये चांद नहीं देना है,

चांद उन्हें खुद पाना है

मेहनत, को अपनाना है,

बचपन में सपने भरना है,

सपनों को पूरा करना है,

सूरज के जैसे चमकें वो,

कर्म यही बस करना है,

मन में हो अपनत्व सदा,

सम्मान गुरु का करना है,

मुट्ठी में ही सपने हों,

सपनों को ऐसे पाना है,

नींद त्याग,हौसला रख,

पढ़ने में ध्यान लगाना है,

अपनो को अपना जाने,

रिश्तों का पालन करना है,

निज गौरव का मान करें

सदा गर्व से जीना है,

गुरुओं का सम्मान करें,

भाव यही बस भरना है,

अनुशासन पालन करना है,

सम्मान सभी का करना है,

छल दंभ द्वेष से दूर रहें,

राष्ट्र धर्म, पालन करना है.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३११ ☆ व्यंग्य – ‘रूट्स’ की खोज-खबर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘‘रूट्स’ की खोज-खबर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३११ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘रूट्स’ की खोज-खबर ☆

संतोष भाई आठ दस साल से ‘स्टेट्स’ में बस गये हैं। बच्चे भी अब आठ दस साल के हो गये हैं। बड़ी बेटी है और छोटा बेटा। संतोष भाई के गांव में अभी मां-बाप और अन्य रिश्तेदार हैं। तीन चार साल पहले वे अकेले गांव गये थे। अमेरिका के घर में मां-बाप, चाचाओं-चाचियों और गांव के घर की फोटो टंगी है। कई बार उन्हें हसरत से देख लेते हैं, लेकिन इंडिया वापस लौटने की नहीं सोचते।

लेकिन कुछ दिनों से संतोष भाई के मन में यह बात बार-बार आ रही है कि बच्चे बड़े हो गये, उन्हें अपनी ‘रूट्स’ से परिचित कराना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके ‘एंसेस्टर्स’ कहां से आये थे, वे कैसे रहते थे, इंडिया का गांव कैसा होता है, वगैर:-वगैर:। बेटी सयानी हो  रही है, कहीं कल के दिन डेटिंग वेटिंग के चक्कर में न पड़ जाए, इसलिए इंडियन कल्चर की जानकारी देना ज़रूरी है। जब से संतोष भाई के दिमाग में ये  बातें आयी हैं तब से वे ‘टु द रूट्स’, ‘टु द रूट्स’ बुदबुदाते रहते हैं।

संतोष भाई करीब एक महीने का प्लान बनाकर पांच छः दिन के लिए अपने गांव आ गये। दोनों बच्चे और पत्नी, रेखा, साथ हैं। गांव से ससुराल जाएंगे, फिर घूमने के लिए शिमला मसूरी।

मां बाप पोते-पोती को देखकर खुश हुए। गांव से और रिश्तेदार-परिचित जुटने लगे। गांव की दीदियां, चाचियां, बुआएं आने लगीं। घर में भीड़ होने लगी। महिलाएं बच्चों को लिपटाने चिपटाने की कोशिश करतीं तो रेखा की नाक सिकुड़ती। ‘इनफेक्शन’ का डर लगता। यहां कोई ढंग का डॉक्टर भी नहीं मिलेगा।

गांव में बहुत तब्दीली हो गयी। संतोष भाई के बचपन में रोशनी के नाम पर लालटेनें और लैम्प थे, पानी कुएं से आता था, रसोई के लिए चूल्हा था, खेती के लिए हल और परिवहन के लिए बैलगाड़ी थी, लोग कम पढ़े-लिखे और सीधे-सादे थे और सब तरफ सादगी और मजबूरी का आलम था। कारों के दर्शन कभी-कभी  रसूखदारों की कृपा से होते थे। अब सब घरों में बिजली और नल थे, रसोई के लिए गैस थी, खेती- परिवहन के लिए ट्रैक्टर आ गये थे, लोग शिक्षित और चतुर हो गये थे और जीवन में चमक आ गयी थी। पहले लड़कियां संकोच में सिकुड़ीं घर में रहती थीं, अब वे पूरे आत्मविश्वास से मोबाइल और लैपटॉप पर काम करती दिखायी पड़ती थीं। कई घरों के दुआरे पर कारें देखी जा सकती थीं। कभी गांव में सिर्फ वैद्य का एक घर था जिसकी सेवा बड़े लोगों को ही मयस्सर होती थी, बाकी जनता रामभरोसे थी। अब सरकारी डॉक्टर के अलावा प्राइवेट डॉक्टर भी थे। सरकारी स्कूलों के अलावा प्राइवेट स्कूल भी पहुंच गये थे। गांव में ज़रूरी सुविधाएं पैदा हो गयी थीं।

लेकिन संतोष भाई को बच्चों को उनकी ‘रूट्स’ से रूबरू कराना है। वे घर के टांड़ में पुरानी चीज़ों को खंगालने में लगे हैं। पुरानी चीज़ों का ढेर  लग रहा है। मिट्टी मंगवा कर चूल्हा बन रहा है। जलाने के लिए सूखी टहनियां मंगा ली गयी हैं। टांड़ पर एक टूटी चिमनी वाली लालटेन मिल गयी है। संतोष भाई उसे पोंछ-पांछ कर जलाते हैं। बच्चे देखकर कौतूहल से ताली बजाते हैं। दादी चूल्हा जलाती है, बच्चे धुएं  की मार से बचने के लिए दूर खड़े होते हैं। रेखा हाथ नहीं लगाती, जलने का डर है।

टांड़ में हाथ से झलने वाला पंखा भी मिल जाता है। संतोष भाई बताते हैं कि पुराने ज़माने का ‘फ़ैन’ यही है। इसी के सहारे गर्मी कटती थी। बच्चे ताज्जुब से उस अजूबे को देखते हैं। संतोष भाई घुमा घुमा कर उसका प्रदर्शन करते हैं। बताते हैं कि उसे ‘बिजना’ कहा जाता था।

सवेरे दही बिलोने के लिए मथानी चलती है। दादी बच्चों को दिखाने के लिए रस्सी से खींचकर मथानी चलाती हैं। मक्खन या ‘नैनूं’ निकाला जाता है। बच्चे भी एक दो बार खींचा- खांची करते हैं। मज़ा आता है। फिर मां बरजती है। रस्सी से हाथ कटने का डर है।

संतोष भाई बच्चों को घर के सामने मीठे पानी के कुएं पर ले जाते हैं। गांव में मीठे पानी के दो-तीन कुएं ही हैं। कुएं पर मोटी रस्सी और उसमें बंधी बाल्टी पड़ी है। संतोष भाई वीरता दिखाने के लिए बाल्टी को कुएं में लटका देते हैं। कुआं गहरा है। संतोष भाई भरी बाल्टी खींचते हैं। आधी दूर तक  खींचते खींचते उनकी हालत खराब हो जाती है। हांफी चढ़ जाती है। मुश्किल से बाल्टी को जगत तक पहुंचाते हैं, फिर कमर पर हाथ रखकर लंबी सांसें लेने लगते हैं। रेखा नाराज़ होकर बुदबुदाती है—‘सिली।’

अगले सवेरे एक बैलगाड़ी दरवाज़े आ लगी। ‘द चिल्ड्रेन विल गो फॉर अ राइड। इट विल बी अ नेसेसरी एक्सपीरिएंस।’ बच्चे बैलों को देखकर ‘काउ काउ’ चिल्लाने लगे। उन्हें बताया गया कि वे ‘काउ’ नहीं, ‘ऑक्स’ थे। गाड़ी में मोटा कालीन बिछाया गया ताकि झटके कम से कम लगें। गाड़ी चली तो हर गढ्ढे पर उछलने पर बच्चे ‘ओह’ ‘आह’ करते। पहले तो उन्हें मज़ा आया, फिर उनका मुंह बिगड़ने लगा। रेखा परेशान होने लगी। ज़्यादा उछलने पर छोटी-मोटी चोट लगने का ख़तरा था। लाचार संतोष भाई ने आधे घंटे में ही गाड़ी वापस मुड़वा ली।

तीन दिन में संतोष भाई ने अपनी ‘रूट्स’ को काफी खंगाल लिया है। अब वे संतोष के साथ ‘स्टेट्स’ लौट सकते हैं। ‘वी हैव नॉट फॉरगॉटेन अवर रूट्स। अपनी रूट्स को भूलना नहीं है। वी आर प्राउड ऑफ़ देम। सैल्यूट टु अवर मदरलैंड। सैल्यूट टु इंडिया।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८३ – फिलहाल इतना ही… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– फिलहाल इतना ही…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८३ — फिलहाल इतना ही — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मेरी मातृभूमि की एक अद्भुत सी कथा है। कभी एक नामी धर्मनेता और एक राजनेता सूखे कुएँ में एक साथ गिर गए थे। दोनों अपने – अपने भविष्य के प्रति चिंतित थे। धर्मनेता धर्म के मामले में गोबर हो जाने से राजनीति में जाना चाहता था। राजनेता चुनाव हार जाने पर धर्म का रास्ता लेने के लिए विकल था। उन दिनों धोती का जमाना होने से उन्होंने आपस में धोती बदल ली। “फिलहाल इतना ही” बदलने से उनका काम चल जाता।

© श्री रामदेव धुरंधर

24 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३११ – संघे शक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३११ ☆ संघे शक्ति… ?

कुछ घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो नेत्रों को खारी बूँदों से भर देती हैं। उस सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ। कलेवर में छोटी पर प्रभाव में बड़ी घटना का साक्षी बना।

प्रात:कालीन भ्रमण से लौट रहा था। बस स्टॉप के पास वाले फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे दो-तीन वर्ष से एक फ़कीर का बसेरा है। फुटपाथ के एक ओर पार्क की दीवार है, दूसरी ओर सड़क और सड़क के उस पार चाय की छोटी-सी गुमटी। आते-जाते लोगों से फ़कीर की कभी चाय की मांग हो तो केवल पैसे देकर काम नहीं चलता। सड़क पार से एक प्याला चाय लाकर देना पड़ता है। शायद पैरों से लाचार से हैं यह वृद्ध क्योंकि उन्हें कभी चलते नहीं देखा।

सहसा दृष्टि पड़ी कि वृद्ध को घेरकर पास के उर्दू माध्यम के विद्यालय में पढ़नेवाली आठ-दस छात्राएँ खड़ी हैं। सिर पर स्कार्फ बाँधे, छठी-सातवीं में पढ़नेवाली बच्चियाँ। उत्सुकता के शमन के लिए अवलोकन किया तो नेत्र सजल हो उठे। भिक्षुक को पीने के लिए पानी चाहिए था और हर बच्ची अपनी वॉटर बॉटल में से थोड़ा-थोड़ा पानी फ़कीर के जलपात्र में डाल रही थी। अद्भुत, अलौकिक दृश्य! देखता ही रह गया मैं!

इच्छा हुई दौड़कर जाऊँ और इनके माथे पर हाथ रखकर कहूँ, “वेल डन बेटियो! सबाब का काम किया।” फिर लगा इस कच्ची उम्र को पाप-पुण्य के जटिल समीकरण से मुक्त ही रहने दूँ, रहने दूँ इन्हें सहज। सहजता जो जानती है कि प्यास है तो पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

फ़कीर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए एक साथ बढ़े इन नन्हे हाथों ने एक बात और सिखाई कि प्रयास सामूहिक हों तो पानी का पात्र ही नहीं, सूखी नदियाँ और रूठी बावड़ियाँ भी भरी जा सकती हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५६ – बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही – ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५६ ☆

☆ बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

१. श्रेया रानी

श्रेया रानी खूब सयानी

प्यारी लगती कर नादानी

पल में हँसे, रूठती पल में

कभी लगे नानी की नानी

चाहे मम्मी कभी न टोंकें

करने दें जी भर मनमानी

लाड लड़ाती है दादी से

बब्बाजी से सुने कहानी

***

२. अर्णव दादा

अर्णव दादा गुपचुप आता

रहे शांत, सबके मन भाता

आँखों में सपने अनंत ले-

मन ही मन हँसता-मुस्काता

मम्मी झींके:’नहीं सुधरता,

कभी न खाना जी भर खाता

खेले कैरम हाथी-घोड़े,

ऊँट-वज़ीरों को लड़वाता

***

३. आरोही

धरती से निकली कोंपल सी

आरोही नन्हीं कोमल सी

अनजाने कल जैसी मोहक

हँसी मधुर, कूकी कोयल सी

उलट-पलटकर पैर पटकती

ज्यों मछली जल में चंचल सी

चाह: गोद में उठा-घुमाओ

करती निर्झर ध्वनि कलकल सी

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३१ – लघुकथा – माँ – बेटी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ माँ – बेटी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

वह चौराहे पर पहुंच चुका था। मां बेटी को एक साथ खड़ा देखकर उसने अपनी गाड़ी किनारे लगायी। वह मां बेटी के बीच के प्यार को पढ़ना चाह रहा था। बेटी को दुलारती पुचकारती मां, न जाने क्या सोच रही थी। वह बायें -दाएँ गर्दन घुमाते हुए आरत दृष्टि से कुछ देख रही थी। कभी-कभी वह वह अपने दोनों वाह्य कर्ण को अलग-अलग दिशाओं में घुमा आने वाले संभावित खतरे के आहट को जानने और उससे सतर्क रहने का प्रयास कर रही थी। उसकी मूकभाव भंगिमा और एकटक ताकती नजरे शायद आने जाने वालों से कुछ कहना चाह रही थी।

 मां की गर्दन की ललरियों के नीचे बाल भाव में खड़ी बिटिया माँ के पास खड़ी होकर स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही थी। वह भी अपनी माँ की ही तरह रह रहकर वह अपनी पलके मुद लेती। उसकी माँ जिधऱ देखती वह भी उसी तरफ देखती। मानो वह अपनी माँ की नक़ल कर रही हो। यह सब न जाने उसका अत्यधिक खुशी का भाव था या किसी अंतरवेदना का प्रभाव। जो भी हो माँ – बेटी के प्रेम की मूक परिभाषा समझने के लिए लेखक के पास एक सुन्दर अवसर था।

एक बड़े वाहन के कर्कश आवाज में बजे हॉर्न ने उसको एक बार पुनः डरा दिया। अब माँ आगे दूसरी तरफ बढ़ गयी। बिटिया ने भी उसके पीछे पीछे जाने का निर्णय किया। यह उसका सामान्य एवं एक व्यावहारिक स्वभाव था जिसके अनुसार हर छोटा बच्चा अपने माँ के पल्लू को पकड़कर स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है। शायद यही मनोदशा उस नन्हे बिटिया बच्चे के साथ रही होगी। बछीया बिटिया के मंद गति से बढ़ते पाँव को देखकर लेखक नज़रें ठहर सी गयीं। बिटिया बच्चा अपना एक पैर जमीन पर रख ही नहीं रही थी। उसके एक पैर में गहरी चोट लगी थी,जिसके चलते वह अपने तीन पैरों पर ही चल रही थी। चौथे पैर को जमीन पर रखने की उसकी कुबत नहीं रह गई थी। शायद चौराहे पर खड़ी वह बछिया बिटिया किसी वाहन से चोटिल हो गई थी।

 मानवता को समभाव में रहते हुए मनुष्य और पशु में भेद नहीं करना चाहिए। दोनों के प्यार को यदि आप समझ सकते हैं तो उनकी पीड़ा को भी आपको समझना चाहिए।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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