हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

दर्रों की लुकाछिपी 

01 जुलाई 2022 को सुबह सात बजे भोपाल से दिल्ली उड़ान पकड़ने राजा भोज विमान तल रवाना होना था। पर्यटन की शुरुआत करने के उत्साह में सुबह की ताजी हवा और भी सुहानी लग रही थी। लगे भी क्यों न, आख़िर हवा बदलने के लिए दुनिया के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित लेह हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे। वहाँ की ज़मीन कुछ-कुछ चाँद सी वीरान दिखती है। शायरी में चौदहवीं का चाँद लाजवाब होता है। लेकिन अपोलो-११ के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग ने सचमुच के चाँद को बहुत खुरदुरा बताया है। वहाँ पीने को पानी नहीं है और साँस लेना दूभर है। घर के चाँद के सानिध्य में तो साँस कतिपय कारणों से अक्सर तेज हो जाती है। लद्दाख़ में आक्सीजन कम होने से साँस धीमी होने लगती है।

पिछले पंद्रह दिन से इस यात्रा की तैयारी कर रहे थे। चाहे कितनी भी तैयारी कर लो लेकिन अंतिम समय की अफ़रातफ़री से बचा नहीं जा सकता। महिलाओं की तैयारी का आलम बिल्कुल अलहदा होता है। कपड़े-ज़ेवर-जूते-चप्पल और खाने पीने की सामग्री सब गड्डमड्ड हो जाते हैं। लद्दाख़ में समुद्र तल से 14,000 से 18,000 फुट ऊपर अजीबोग़रीब मौसम होता है। वहाँ हरियाली रहित सूखे नंगे पहाड़ हैं जिनके शिखरों पर जमी बर्फ़ पर तेज धूप से दिन में 37-38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहता है परंतु शाम घिर आते ही तापमान एकदम से गिर कर 4-8 डिग्री तक पहुँच जाता है।

आख़िर वह क्षण आ ही गया जब टैक्सी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, और गरम कपड़ों को रखने की अफ़रातफ़री ने माहौल बिगाड़ दिया। भारतीय घरों में अक्सर तनावग्रस्त वातावरण में पर्यटन यात्रा की शुरुआत होती है। आपको तनाव झेलने और उससे निजात पाने की आदत डालना ही होती है। फिर भी कुछ न कुछ सामान छूट ही जाता है। जैसे साबुन, दवाइयाँ, दंतमंजन ट्यूब और ब्रश वग़ैरह। इन चीजों का एक अतिरिक्त पैकेट पहले से ही बैग में रख लेना चाहिए। फिर भी महिलाओं के रबर बैंड, सुई-धागा, अतिरिक्त नाड़ा और सिंदूर डिबिया छूटते-छूटते बचीं। टैक्सी में बैठते ही विमान में अनुमत सामान और हैंडबेग हेतु नियत क्रमशः पंद्रह और दस किलो वजन निर्धारित होने लगा। थोड़ा-थोड़ा करते सामान अधिक हो ही जाता है। फिर कम करते-करते बहुत कम हो जाता है। ख़ैर गहरी साँस लेकर मन के विमान को संतुलित किया। इतने में हवाई अड्डा आ गया। सुरक्षाकर्मी को टिकिट और पहचान के साक्ष्य दिखाकर अंदर घुसे। बोर्डिंग पास के बाद सुरक्षा जाँच में सामान की बिदाई के समय महिलाएँ कुछ इस तरह द्रवित हो रही थीं, मानो बेटी की बिदाई हो रही हो।

सात बजे विमान में बैठने के लिए गेट नम्बर 4 की तरफ़ प्रस्थान किया। सौम्या ने वेब चेक-इन करके सभी की कुर्सियाँ खिड़की की तरफ़ ले ली थीं। तक़रीबन एक घंटा इंतज़ार करते बैठे रहे। विमान में चढ़ने कि घोषणा होने पर विमान में प्रवेश किया। चार उड़नपरियों का समूह विमान के प्रवेश द्वार पर नमस्कार की मुद्रा में कुछ बोलता सा नज़र आ रहा था लेकिन उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे। उनसे नज़र मिलाकर धन्यवाद कह आगे बढ़ गये। हमारी सीट 16-A खिड़की किनारे पर थी। नज़दीक जाकर खड़े हुए तो वहाँ एक जोड़ा बैठा था। उन्होंने हमें मूर्ख समझ 16-C की तरफ़ बैठने का इशारा किया लेकिन हम जन्म से ही मूर्ख नहीं हैं। हमने प्रत्युत्तर में आँखों से 16-A की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने हमारी बुद्धिमानी से चकित हो खड़े होकर हमें अपनी कुर्सी तक जाने दिया। फिर वे तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाने में और हम लद्दाख़ की घाटियों के विचार में खोए यात्रा वृतांत लिखने में व्यस्त हो गये।

विमान ने नियत समय 7:45 पर उड़ान भरी। विमान रनवे याने उड़ान भरने के लम्बे रास्ते पर पहुँचा। कैप्टन के कुछ बुदबुदाने के बाद विमान दौड़ाना शुरू किया। विमान ने पल भर में गति पकड़ ठीक तीस सेकंड में ज़मीन छोड़ दी। उड़ान भरते ही भोपाल का बड़ा तालाब और ताज़ुल मसाज़िद दिखने लगी। अब हम सही के आसमान में उड़ रहे थे। वो वाला नहीं, जिसे लोग कहते हैं “साला आसमान में उड़ रहा है।” ख़्याल आया, ज़मीन पर थे तो आसमान मुट्ठी में नहीं था, आसमान में पहुँचे तो ज़मीन छूट गई। निदा फ़ाज़ली ने क्या ख़ूब कहा है।

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता।

बग़ल वाला तोता-मैना जोड़ा ग़ैरज़रूरी बातें करके हाथों में हाथ डालकर सो गया। थोड़ी देर बाद हाथ से हाथ छूटे तो मैना का सिर तोता के कंधे पर था। किरदार तो नींद में थे परंतु उनकी बाहों और कलाइयों पर छपे टैटू आपस में जो बयाँ रहे थे। उसे देख हम निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे-

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,

ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता।

थोड़ी देर में उनकी साँसों से बिना धुएँ के शोले उठने लगे।

बुझा सका है भला कौन वक़्त (इश्क़) के शोले,

ये ऐसी आग है जिसमे धुआँ नहीं मिलता।

उन्हें देखकर लगा कि इनकी ज़िंदगी का यह रूमानी  वक्त गुज़रने के बाद सब लोगों की तरह ये लोग गुनगुनाएँगे। 

 तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,

जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता।

आसमान में उमड़ते-घुमड़ते सफ़ेद बादलों से बातें करते सोचते रहे कि इस घूमती फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है- मुहब्बत भी। इतने में नाश्ता परोसने वाली परिचारिका आ गई। जब से मास्क चलन में आया है, उनकी नक़ली ख़ुशी बिखेरती मुस्कान दिखती नहीं है। वह काली घटाओं को गोल माथे पर से खींच पीछे कसकर जूड़ा बाँधे सिर्फ़ आँखों से बात कर रही थी। नाश्ता भुगतान पर उपलब्ध था। मतलब 295.00 रुपए की सैंडविच, जिसमें 29.00 रुपए से अधिक लागत नहीं लगी थी, GST सहित 307.00 रुपयों में मिल रही थी। सैंडविच की विमान सी ऊँची क़ीमत सुनकर हमें चक्कर आने लगा। ऐसा लगा क़ीमत सुनकर आक्सीजन कम हो रही है। इसीलिए शायद उड़ान के पहले ही विमान में आक्सीजन लेने की विधि से परिचय करा दिया जाता है। विमान हसीना से एक गिलास पानी लेकर गले में उँडेला और दिल्ली पहुँचने लग गए।

तोता-मैना जोड़ा गहन निद्रा में था। शायद कई दिनों से सोया नहीं था। बाहर निकलने के लिए आख़िर उनकी नींद में ख़लल डालना पड़ा। वे चौंक कर उठे। अस्तव्यस्त परिधानों को व्यवस्थित करने लगे। विमान रुका नहीं कि यात्री तुरंत खड़े हो गये। जबकि उतरने की सीढ़ी विमान के दरवाज़े पर लगाने में पंद्रह-बीस मिनट का समय तो लगता ही है। तब तक अपन आराम से बैठे रहे। जब स्थिति धक्कामुक्की से सामान्य हुई तब विमान से उतरना शुरू किया। विमान के दरवाज़े पर पहुँचे तब सीढ़ियाँ ख़ाली थीं। दरवाज़े पर थोड़ा रुककर किसी राष्ट्राध्यक्ष सी धीमी चाल से चारों तरफ़ देखते हुए उतरे। अरे भाई! फोकट में इतराना भी तो एक अदा है। जब कोई न देख रहा हो तो थोड़ा इतराने में क्या हर्ज है। ख़ैर आसमान में उड़कर ज़मीन पर आ गये। कितना भी ऊँचा उड़ लो आख़िर ज़मीन पर तो आना ही पड़ता है।  

ज़मीं की गोद में इतना सुकून है ’आतिश’
जो उतरा वो सफ़र की थकान भूल गया।

 हमें दिल्ली से लेह की उड़ान पकड़नी थी। दिल्ली विमानतल पर प्रस्थान से बाहर निकल पुनः आगमन द्वार से सुरक्षा जाँच उपरांत मालूम पड़ा कि लेह की उड़ान गेट नम्बर 32 से प्रस्थान करेगी। क्रेडिट कार्ड संस्कृति के कुछ फ़िज़ूल खर्ची नुक़सान हैं तो कुछ फ़ायदे भी मिलते हैं। ये किसी-किसी विमानतल पर इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में मुफ़्तखोरी करवाते हैं। इत्तफ़ाक़न इग्ज़ेक्युटिव लाउंज गेट नम्बर 32 के बिल्कुल बग़ल में था। थोड़ी लम्बी क़तार थी। क्रेडिट कार्ड की दो रुपया पकड़ जुगाड़ से दस मिनट में लाउंज के अंदर थे। अमेरिकन नाश्ता और हिंदुस्तानी नाश्ता का विकल्प था। हिंदुस्तानी इडली साम्भर चटनी उपमा उदरस्त किया और साथ में काप्पीछिनों काफ़ी का कड़क ज़ायक़ा गले में उतारा। इतनी देर में बोर्डिंग की घोषणा हुई और विमान में चढ़कर खिड़की वाली 18-A कुर्सी पर आसान जमाया।

विमान कप्तान ने बताया लेह का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक होने के कारण बर्फ़ पर सूर्य रश्मियाँ चकाचौंध पैदा करती हैं। जिससे विमान उतारने में दिक़्क़त हो सकती है। इसलिए 11:45 के तय समय से पूर्व ही 11:30 को उड़ान भरना पड़ेगी। विमान के उड़ान भरते ही गुड़गाँव का कांक्रीट जंगल दिखने लगा। दस मिनट के बाद हम बादलों से बातें कर रहे थे। उसके बाद शिवालिक पहाड़ियाँ, पीर पंचाल पर्वत शिखर दिखने लगे।

शिवालिक पहाड़ियाँ मुख्य हिमालय से उतार की बाह्य हिमालयी पर्वतमाला है, जो  भारतीय महाद्वीप के उत्तरी भाग में पश्चिम में सिंधु नदी  से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2,400 किलोमीटर तक पसरी है। यह लगभग 10–50 किमी चौड़ी है और इसके शिखरों की औसत ऊँचाई 1,500–2,000 मीटर (4,900–6,600 फुट) है। असम में  तीस्ता और रायडक नदी के बीच लगभग 90 किलोमीटर (56 मील) का गलियारा है, जहाँ शिखर कम ऊँचाई के हैं। वहीं से अरुणाचल का रास्ता है। यह हिमायल पर्वत प्रणाली के दक्षिणतम और भूगर्भ शास्त्रीय दृष्टि से, कनिष्ठतम पर्वतमाला कड़ी है। इसकी औसत ऊंचाई 850-1200 मीटर है और इसकी कई उपश्रेणियां भी हैं। यह 1600 कि॰मी॰ तक पूर्व में तीस्ता नदी सिक्किम से पश्चिमवर्त नेपाल और उत्तराखंड से कश्मीर  होते हुए उत्तरी पाकिस्तान तक जाते हैं। बीच में शाकंभरी देवी की पहाडियों से सहारनपुर,  देहरादून मसूरी  के पर्वतों में जाने हेतु मोहन दर्रा  प्रधान मार्ग है। “शिवालिक” का अर्थ “शिव की जटाएँ” है। शिवालिक से उत्तर में ऊँची हिमालय पर्वत माला  है, जो मध्य हिमालय भी कहलाती है। एक पौराणिक मिथक के अनुसार रघु कुल के भागीरथी प्रयासों से गंगा स्वर्ग से धरा पर आने की सहमत हुईं लेकिन उनके तीव्र वेग को पृथ्वी पर झेलना मुश्किल था। शिव अपनी जटाएँ फैलाकर कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए, तब उनकी जटाएँ हिमालय की तराई तक फैल गईं, वे ही शिवालिक पहाड़ियाँ कहलाती हैं। 

लेह में चटक तेज धूप की अल्ट्रा वायोलेट किरण बर्फीले पहाड़ों पर पड़कर गर्मी बढ़ा देती है। सूर्य रश्मियों की तेज़ी नज़र को दृश्यों पर थमने नहीं दे रही थी। आसमान में मानसूनी बादलों का दूल्हा बिना बूँदों की बारात नृत्य कर रहा था। विमान को बादलों से ऊपर उठाने के प्रयास में विमान बुरी तरह हिलने लगा। कुछ लोग घबराहट में एक दूसरे को देखने लगे। वैसे भी विमान में सिवाय उड़नपरियों को देखने के अलावा और कुछ था भी नहीं। कुछेक को उल्टियाँ होने लगीं। थोड़ी देर में भोजन परोसने की घोषणा हुई। सवारियाँ चौकन्नी हो गईं। उनकी जीभें लपलपाने लगीं। यह जानकारी मिलते ही कि भोजन भुगतान पर उपलब्ध है, सुनते ही सबने अपनी जीभें समेट लीं। हमारी टिकट कारपोरेट बुकिंग में होने से मुफ़्त नाश्ते में सजीधजी सैंडविच एक गिलास पानी के साथ परोसी गई।

विमान आधा घंटे बाद 18000 फुट की ऊँचाई पर था। बादल नदारत और उनकी जगह धूप में झुलसते हिम शिखरों ने ले ली। हिमालय का अर्थ ही हिम का आलय याने बर्फ़ का भंडार होता है जैसे पुस्तकों का भंडार पुस्तकालय होता है। पायलट ने सूचना दी कि सब हम लेह पहुँचने वाले हैं। सभी यात्री कुर्सी सीधी करके बेल्ट कस लें। विमान सुविधाजनक तरीक़े से नीचे पहुँचने लगा। फ़ौज की छावनी दिख रही थी। उसके ठीक बाजू की हवाई पट्टी पर विमान उतरा। लेह की हवाई पट्टी फ़ौजी है। उसे नागरिक विमान उतरने की अनुमति है। सामान समेटकर बाहर निकले। एक टैक्सी चालक हमारे नाम की तख़्ती लिए खड़ा था। सवार होकर लेह शहर के बीच में स्थित मानसरोवर होटल पहुँच गये।

लेह की मानसरोवर होटल में पहले माले पर कमरा मिला। कमरे में पंखा या एसी होने को कोई प्रश्न नहीं है। दिन में यद्यपि 38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है परंतु रात ढलते ही सात डिग्री पर खिसक जाएगा। रूम हीटर चलाना पड़ता है। स्वागत पेय के रूप में बढ़िया गाढ़े लीकर की चाय पीकर मज़ा आ गया। स्थानीय नियमों के अनुसार शरीर के थर्मोस्टेट को सेट करने और कोविड नियमावली पालन हेतु एक दिन का आराम आवश्यक है। चार बजे पैदल घूमने निकले तो घरों में सेवफल से लदे पेड़ दिखे। बाक़ी दिन आराम किया। मुफ़्त के खाने का भी एक अलग मज़ा होता है। होटल की तरफ़ से सौजन्य रात्रिभोज करके जल्दी सोने चले गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८३ ☆ मुक्तक – ।। कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८३ ☆

☆ मुक्तक ।। कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

जिंदगी पल – पल यों ही ढलती जा रही है।

ऐसे ही कल – कल में चलती जा रही है।।

न कोई उत्साह उमंग जीने की आदमी को।

जैसे रेत बस मुठ्ठी से फिसलती जा रही है।।

=2=

बीज बनो ऐसे मिट्टी में दबकर फिर उग आओ।

फल से लद कर पेड़ की  तरह झुक जाओ।।

कोशिश हो हर क्षण  बिखर  कर संवरने की।

मीठा ही बोल सको जीवन में ऐसा रुख लाओ।।

=3=

कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है।

होली रंगों में भीग कर ही रंग गुलाल मिलता है।।

मन नियंत्रित हो आपकाऔर न कोई षडयंत्र हो।

तप कर ही हमें फिर सोने सा जलाल मिलता है।।

=4=

किरदार बनाओ खुशबू खुद सफर तय करती है।

प्रेम समा जाए खुद ही नफरत की शय मरती है।।

बस चार दिनों को ही मिलें हैं ये श्वास और प्राण।

जिंदादिली  ही तो जिंदगी से भय को हरती है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४७ ☆ कविता – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम..” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४७ ☆

☆ जो जैसा है सोचता वैसे करता काम…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

चेहरा है शरीर का ऐसा अंग प्रधान

जिससे होती आई है हर जन ही पहचान।

* 

द्वेष भाव संसार में है एक सहज स्वभाव

जाता है बड़ी मुश्किल से कर ढेरों उपाय ।

 *

स्वार्थ, द्वेष हैं शत्रु दो सबके प्रबल महान

जो उपजाते हृदय में लोभ और अभियान | ।

 *

होती प्रीति की भावना गुण-दोषों अनुसार

पक्षपात होता जहाँ दुखी वही परिवार

 *

जिनका मन वश में सदा औ खुद पर अधिकार

उन्हें डरा सकता नहीं कभी भी यह संसार ।

 *

इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार

वैसा करता काम जन जैसा सोच विचार

 *

बहुतों को होता नहीं खुद का पूरा ज्ञान

 क्योंकि उनकी बुद्धि को हर लेता अभिमान।

 *

 हर एक जैसा सोचता वैसे करता काम

सहना पड़ता भी किये करमो का परिणाम ।

 ☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १० – कविता – कई हैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “कई हैं…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १०   ?

? कविता – कई हैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

रह घूँघट में, जेठ कई हैं,

ठाठ हैं किंचित, ठेठ कई हैं

*

अव्यवस्था की चपेट में

चिपकर मटियामेट कई हैं

*

बच भागे, बेदाग़ वे देखो

मालूम जिनको गेट कई हैं

*

राशन मुफ़्त, योजना अनगिन

तब भी भूखे पेट कई हैं

*

खाट खड़ी, चकराया सर भी

चीज़ एक ही, रेट कई हैं

*

राजनीति के मकड़जाल में

फँसकर भी, अपडेट कई हैं

*

ऑफिस फाइल बाबू अफ़सर

कानूनी अलसेट कई हैं

*

कांक्रीट सिटी में बिजनेस

ग्राहक ज्यों आखेट कई हैं

*

ईमान बिक जाता सस्ता

ऐसे भी मार्केट कई हैं

*

सत्ता हुक़ूमत पॉवर उनकी

जिनके चमचे-प्लेट कई हैं

*

शोर, चुनावी – वादों हेतु

बैनर फ्लैक्स पैम्फलेट कई हैं

*

दुर्घटना में वो ही फटते

सर जो बिन हेलमेट कई हैं

*

फास्ट हुए न, रह गए पिछड़े

ऐसे लेज़ी – लेट कई हैं

*

न्यू जनरेशन उलझे जिसमें

ऐसे इण्टरनेट कई हैं

*

परहेज प्याज – लहसुन से

और खाते आमलेट कई हैं

*

पेट्रोल – डीजल के दाम पर

बिक जाते, घासलेट कई हैं

*

समझें वे ख़ुद को अमरीका

जिनके बम – रॉकेट कई हैं

*

श्री -श्री के कुर्ता – पाजामा

शूट – बूट जाकेट कई हैं

*

ढूंँढ़ न पाओगे, काला धन

गोपनीय पॉकेट कई हैं

*

गई मरोड़ी, वही गर्दनें

गले जिनके लॉकेट कई हैं

*

लाइफ भी तो इक क्रिकेट है

अब तक गिरे विकेट कई हैं

*

मिली जगह ना, केबिनेट में

बेचारे अपसेट कई हैं

*

टिकट जुगाडू वे ही पाते

जिनके लाग-लपेट कई हैं

*

बॉस की टेबल, के क्या कहने

बिल कम, पेपर – वेट कई हैं

*

मीडिया सोशल, रील-वीडियो

डेटाखोर, झकलेट कई हैं

*

ब्लैक आँकड़े, व्हाइट साइन

बिल हो रये, जनरेट कई हैं

*

बैलेट उनके ही फेवर में

जिनके पास, बुलेट कई हैं

*

“चुनावी आपदा” कम्बल-बॉटल

बँट जाते, पैकेट कई हैं

*

सी.बी.आई. भी, है अचरज़ में

दफ़्तर के सीक्रेट कई हैं

*

सियासती बैटिंग – फील्डिंग में

बॉलर कई, रन – रेट कई हैं

*

राजनीति के गलियारे में

बिछते कालीन – मेट कई हैं

*

हीरा पक्ष, विपक्षी सोना

इन सबके, कैरेट कई हैं

*

हंगामा बरपा है, चूँकि

स्कैण्डल – रैकेट कई हैं

*

चेतावनी लिखी है, फ़िर भी

पीते, बीड़ी-सिगरेट कई हैं

*

निजीकरण की स्पर्धा में

उलझे, कारपोरेट कई हैं

*

स्वच्छता अभियान है ज़ारी

ग़ुम – शुदा, टॉयलेट कई हैं

*

पॉवरफुल विज्ञापन जहँ-तहँ

बाज़ारू टैबलेट कई हैं

*

प्लेन खटारा, क्रैश हो रहे

मरने को पॉयलेट कई हैं

*

स्कूल सरकारी लेकिन

खर्चे भी प्रायवेट कई हैं

*

सी.डी., डी.वी.डी. के युग में

फँसी हुई कैसेट कई हैं

*

वाई-फाई ई-डिजिटल मैट्रो

लिंक – लैस गैजेट कई हैं

*

ई.डी. छापा, बाल न बाँका

सैफ्टी – सेफ – सैप्रेट कई हैं

*

पॉलिटिकल स्कोर बोर्ड में

ज़ीरो सिम्पल, ग्रेट कई हैं

*

ज़हाँपनाह! जहँ पनाह मांगे

अ – हिन्दी स्टेट कई हैं

*

गुरु अगर साइलेण्ट मोड पर

चेले भी वाइब्रेट कई हैं

*

सोर्स फुल एप्रोच करप्शन

एक्टिव ब्यूरोक्रेट कई हैं

*

वर्ल्ड वार का असली रीजन

बम ग्रेनेड औ जेट कई हैं

*

नये क़रतब क्यों न क्रिएट हों

अब भी एसोसिएट कई हैं

*

हैं डकैत और लठैत ऐसे

जिनके पास फिएट कई हैं

*

दिन अच्छे ‘राजेश‘ आ गए

नौकर विरले, सेठ कई हैं ll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश… ☆

*

पौधे लगाएँ आप ढेरों, भावना मंगल करें।

फैली यहाँ हरियालि देखो, पीर मन की जो हरें।

सारे करेंगे अनुसरण तो, श्रेष्ठ होगी कल्पना।

द्वारे सजेंगे आम्र पत्ते, भव्य होगी अल्पना।।

*

आज जब दुनिया पेड़ों को खो रही है, अगहन का गुरुवार हमें अपनी जड़ें याद दिलाता है। यह दिन एक तरह से प्रकृति की पुकार है, जैसे धरती नरम आवाज में कहती हो: “मेरी देखभाल भी पूजा का हिस्सा है।”

इस वर्ष अगहन मास (मार्गशीर्ष मास) 6 नवंबर 2025 को आरंभ हुआ है।

  1. पौधरोपण की शुभ शुरुआत

लोग मानते हैं कि इस दिन लगाया गया पौधा घर में शांति और स्थिरता लाता है। आप इस अवसर पर अपने घर, मोहल्ले या खेत की किनारियों पर एक पौधा अवश्य लगाइए।

यह पौधा आने वाले समय में आपकी मेहनत, धैर्य और उम्मीदों का एक जीवित रूप बन जाता है।

  1. परिवार को ‘ग्रीन संकल्प’ दिलाएँ

एक छोटा-सा संकल्प बनाया जा सकता है—

  • हर महीने एक पौधा
  • पानी की बचत
  • किचन वेस्ट से खाद
  • प्लास्टिक का कम उपयोग

अगहन गुरुवार इस संकल्प को शुरू करने का शांत और पवित्र बनाइए।

  1. धान कटाई और कृतज्ञता का संदेश

किसानों के लिए यह महीना धरती द्वारा दिया गया उपहार है। ग्रीन मोटिवेशन यही कहता है कि उपहार को लौटाना भी जरूरी है—

थोड़ा पानी बचाकर, थोड़ी छाँव उगाकर, थोड़ा हरापन फैलाकर।

  1. सोशल मीडिया पर सकारात्मक हरियाली

डिजिटल प्रयास करें…

  • एक पौधा लगाने का छोटा वीडियो
  • अपने आँगन की हरियाली दिखाएँ
  • अगहन गुरुवार का ‘धीमा, शांत और हरा’ संदेश शेयर करें।

इससे यह पर्व केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन में ताजगी भरने का दिन बनेगा।

अगहन गुरुवार को परंपरा की पीली रोशनी और हरियाली की ठंडी छाया से सराबोर करते हुए आगे बढ़ें। इस दिन की सुंदरता यही है कि यह मन को शांत करता है और धरती से जोड़े रखता है। और जब मन और मिट्टी दोनों मुस्कुराएँ, तभी जीवन सच्चे अर्थों में समृद्ध होता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८४ ☆ व्यंग्य – “सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८४ ☆

?  व्यंग्य – सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

सत्य संशय में है,गांधी जी के तीनो जापानी बंदर  अब ए आई के जमाने में अपडेट हो चुके हैं। एक ने मुंह पर मोबाइल के पैक डिब्बे से निकला  टेप चिपका लिया है , दूसरा कानों में इयरबड लगाकर कह रहा है मैं एआई फेक नहीं सुनता , यह मेरी समझ से बाहर है, तीसरा कैमरे के सामने हाथ हिलाकर कह रहा है अब मुझे मत शूट करो भाई, मुझे वीडियो साक्ष्य पर अब भरोसा नहीं रहा ।

कभी लोग कहते थे जो आंखों देखा वही सच। पर आज वही वीडियो सत्य , झूठ साबित हो रहा है। आंखों देखी अब भरोसे के काबिल नहीं रही। आंखें तो अब मोबाइल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं और स्क्रीन पर जो कुछ दिखता है वो जेमिनी और उसके भाई बंधुओं का बनाया हुआ मायाजाल होता है। अब कोई भी वीडियो सच नहीं होता बस ए आई एडिटिंग की उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन होता है। पल भर में आप शेर की सवारी करते नजर आ सकते हैं, और अगले ही क्षण एक क्लिक से  गोआ के बीच पर रंगरेलिया मनाते दिखाए जा सकते हैं। वीडियो सत्य भी डॉक्टर्ड है जो फॉरेंसिक जांच के प्रमाण पत्र के बिना झूठ समझा जा सकता है।

पहले कोई रिश्वत लेते पकड़ा जाता था तो कहा जाता था कि वीडियो साक्ष्य पक्का सबूत है। अब वही अफसर मुस्कराकर कहता है साहब ये तो जेमिनी का बनाया हुआ वीडियो है ।  विभाग जांच बैठा देता है कि यह रिश्वत असली है या आर्टिफिशियल। रिश्वतखोर कहता है कि नोटों के बंडल तो मेरी जेब में खुद एआई ने डाले थे मैं तो फाइल में गांधी जी के आदर्श ढूंढ रहा था, यह सब मेरे विरुद्ध एक टेक्निकल साजिश है।

अब न्यायालय भी परेशान है। वकील साहब कहते हैं कि माय लॉर्ड यह वीडियो पूरी तरह से कंप्यूटर जनित भ्रम है। जज साहब सोच में पड़ जाते हैं कि फैसला सुनाएं या अपडेट डाउनलोड करें। अदालत में गवाह कहता है मैंने अपनी आंखों से देखा और सामने वाला वकील पूछता है क्या आपकी आंखें जेमिनी से वेरीफाइड थीं।

प्रेम की दुनिया भी इस तकनीक की शिकार हो गई है। अब लड़की पूछती है क्या तुम सच में मुझसे प्यार करते हो और लड़का कहता है जितना प्यार जेमिनी मुझसे करता है। अब रोमांस नहीं होता रेंडरिंग होती है। लोग कहते हैं वीडियो कॉल पर कितने प्यारे लगते हो और सामने मिलते ही पूछ बैठते हैं , आप कौन हैं। प्यार  बस एचडी क्वालिटी में दिखने वाला झूठ बन गया है।

शर्मा जी का हाल तो और भी खराब हुआ। ऑफिस में एक वीडियो फैला जिसमें वे अपनी टीम मेंबर के साथ पार्किंग में कुछ ज्यादा ही टीमवर्क करते दिखे। बीवी ने मोबाइल दिखाकर कहा ये कौन है। शर्मा जी बोले ये सब डीपफेक है , मैं तो बोर्ड मीटिंग में था। बीवी बोली बोर्ड मीटिंग में तुमने थाईलैंड जाने की बात कब से शुरू कर दी। शर्मा जी ने पसीना पोंछते हुए कहा अब जेमिनी आवाज तक कॉपी कर लेता है। बीवी बोली तो क्या अब मैं जेमिनी से पूछूं कि मेरा असली पति कौन है।

भ्रष्टाचार अब  कला का रूप ले चुका है। पहले चोरी करते लोग डरते थे अब चोरी का वीडियो खुद बनाते हैं और लिखते हैं यह समाजशास्त्र का प्रयोग है। अब चोर भागता नहीं इंटरव्यू देता है। कहता है मैंने चोरी नहीं की,  जेमिनी ने सिखाया था,  मैं तो अनुसंधान कर रहा था। पुलिस भी अब सर्वर से पूछताछ करती है अपराधी नहीं पकड़ा जाता उसका डेटा पकड़ा जाता है।

जनता की हालत और भी दयनीय है। सुबह सोशल मीडिया खोलते ही हर आदमी किसी न किसी स्कैंडल का हिस्सा होता है। कोई नेता रिश्वत लेता है । कोई संत भगवत कथा सुनते हुए लड़कियों के संग गुप्त तपस्या में लीन पकड़ा जाता  है ।  और हर कोई कहता है ये सब फेक वीडियो है। साजिश है ।अब भ्रम है ,  कौन असली है कौन आर्टिफिशियल। अब जो झूठ बोलता है वो मासूम कहलाता है और जो सच बोल देता है वो एआई विरोधी माना जाता है।

थाईलैंड अब एक पर्यटन स्थल नहीं वैवाहिक विवाद का प्रतीक बन गया है। कोई भी पुरुष वहां न भी जाए तो भी उसका डिजिटल वर्जन घूम आता है। बीवी वीडियो दिखाती है , देखो ये तुम बीच पर हो और पति कहता है ये फेस स्वैप है। बीवी कहती है तो पासपोर्ट की फोटो में वही मुस्कान क्यों है।  अब सच्चाई भी सर्वर की मरजी से चलती है।

सच अब वैसा है जैसे सरकारी टेंडर हमेशा अटैचमेंट में छुपा रहता है। या शेयर इनवेस्टमेंट की बारीक अक्षरों वाली शर्तों में। लोग कहते हैं सच देखना हो तो वीडियो भेजो और वीडियो भेजते ही सबूत मिट जाता है। जो सच था वो फाइल बन गया और जो झूठ था वो ट्रेंडिंग वायरल टॉपिक।

भविष्य का बच्चा स्कूल में निबंध लिखेगा मेरा असली पिता कौन है। परीक्षा में पूछा जाएगा सत्य और डीपफेक का तुलनात्मक अध्ययन। और विज्ञान मेले में बच्चे प्रोजेक्ट लगाएंगे सच्चाई को फर्जी बनाने की मशीन।

अब हर सत्य संशय में है। कोई कहता है मैंने देखा तो लोग कहते हैं स्क्रीन रिकॉर्डिंग दिखाओ। कोई कहता है मैं निर्दोष हूं तो जवाब मिलता है प्रमाण दो कि तुम इंसान हो न कि किसी सॉफ्टवेयर का एक्सपेरिमेंट।

सच बोलना अब अपराध है क्योंकि झूठ जेमिनी की मेहरबानी से और खूबसूरत हो गया है।

वीडियो साक्ष्य का सचमुच अंत हो चुका है। अब सच्चाई क्लाउड में अपलोड है और झूठ हर मोबाइल के व्हाट्सअप पर डाउनलोड हो रहा है। जो दिख रहा है वो झूठ है और जो नहीं दिख रहा वह सच हो इसमें सदा संशय है।

कहते हैं सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं। पर जेमिनी के जमाने में सत्य न सिर्फ परेशान है बल्कि एडिट भी हो चुका है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७१ – व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७१ – व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

अरे भैया, आप भी क्या खूब बात कर दिए! अपेक्षाएँ यानी आशाएँ! हा हा हा। यह तो ऐसा हो गया जैसे कहो कि पेट्रोल यानी गंगाजल। भई, गंगाजल से प्यास बुझती है, आस्था जगती है, पर पेट्रोल तो आग लगाता है! हमारी आपकी इस फालतू-सी जिंदगी में ये जो ‘अपेक्षा’ नाम का लाइलाज कोढ़ है न, यह केवल आशा का नाम नहीं है, यह तो जीवन का लाइसेंस है, और मृत्यु का वारंट भी! लाइसेंस इस बात का कि हाँ, तुम अभी जिंदा हो, क्योंकि तुम्हें किसी पड़ोसी की नई कार से, किसी रिश्तेदार की झूठी तारीफ से, या खुद अपनी निकम्मी औलाद से कोई गंभीर-सी अपेक्षा बाकी है। जिस दिन ‘जीने की वजह’ खत्म हो जाएगी, उसी दिन यह निरुद्देश्य जीवन जो तुम कोस रहे हो, वह अपने चरम पर पहुँच जाएगा। लेकिन ‘निरुद्देश्य जीवन’ भी कोई जीवन है? बिलकुल नहीं, वह तो सरकारी अस्पताल की फाइल है, जिसका कोई अता-पता नहीं, बस मोटी होती जाती है।

हमारे ‘मामाजी’ की अपेक्षाएँ तो इतनी ऊँची थीं कि छत से लगकर वापस आती थीं। उन्हें अपेक्षा थी कि उनकी मृत्यु पर कम से कम बीस हज़ार लोग रोएँ, जिसमें दस हज़ार तो ‘शो ऑफ’ करने वाले ही हों। और जब मरे, तो कुल पंद्रह आदमी पहुँचे, जिनमें से ग्यारह केवल खाना खाने के लिए आए थे। और आप कहते हैं कि अपेक्षाएँ रखनी चाहिए? ज़रूर रखिए! लेकिन यह ध्यान रखिए कि अपेक्षा जिससे रख रहे हैं, वह इंसान है—यानी फिसड्डी, कामचोर और मतलबी। आप अपेक्षा रखिए कि आपकी पत्नी चाय बनाएगी, और वह आपको ज़हर भी दे सकती है! और हाँ, यह बात तो बिलकुल ही सही है कि ‘पूरी न हो पाने पर निराश नहीं होना चाहिए’। यह उपदेश नहीं है, यह तो राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है! हर भारतीय यही उपदेश देता है, क्योंकि हममें से किसी की कोई अपेक्षा पूरी नहीं होती, इसलिए हम निराश नहीं होते, हम बस सन्न रह जाते हैं। यह निराशा नहीं, यह जन्मजात उदासीनता है। अपेक्षा रखो, और जब पूरी न हो, तो बस हँसो, एक ऐसी हँसी जो भीतर ही भीतर आपकी आँतों को निचोड़कर रख दे। यही जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है, मेरे भाई।

वाह! क्या बात कही है! “जिंदगी चलने का नाम है”! बिलकुल, जिंदगी ऐसे ही चलती है, जैसे सरकारी बाबू की फाइल। धीरे-धीरे, रेंगते हुए, बिना किसी उद्देश्य के, और अंततः एक रद्दी के ढेर में सिमटकर। और ये जो इच्छाएँ अनन्त हैं न, यह तो ऐसा जुमला है, जिसे सुनकर तो आँखों में आँसू आ जाने चाहिए! एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी ने बेलन लेकर सिर पर दस्तक दे दी। अरे भाई, ये इच्छाएँ नहीं हैं, ये तो ब्याज हैं, जो हम अपनी आत्मा से ले रहे हैं! पहली इच्छा (एक साइकिल) पूरी होती है तो दूसरी (एक स्कूटर) तुरंत माँग पत्र भेज देती है। स्कूटर मिलता है तो तीसरी (एक सरकारी नौकरी) एफिडेविट लेकर खड़ी हो जाती है! यह अनन्तता नहीं है, यह तो नरक का इन्फिनिटी लूप है। एक इच्छा-पूर्ति का सुख सिर्फ दो मिनट का होता है, और अगली इच्छा का दुख दो जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ता।

जिस दिन सब पूरी हो जाएँ, यानी मन निर्मोही हो जाए! हा हा हा! यह तो भारतीय आध्यात्म का सबसे क्रूरतम व्यंग्य है। मन निर्मोही हो जाए? यानी मन काम करना बंद कर दे, यानी मन की मशीन में जंग लग जाए। तब मोक्ष मिलेगा? मोक्ष नहीं मिलेगा मेरे दोस्त, अधूरे सपनों का भूत मिलेगा, जो रात भर कान में फुसफुसाएगा, “क्यों नहीं किया? क्यों छोड़ दिया?” और आप कहते हैं कि तब व्यक्ति मरे हुए के समान हो गया? बिलकुल! मरे हुए के समान नहीं, बल्कि सच्चा भारतीय नागरिक हो गया! क्योंकि यहाँ आदमी जिंदा कम, मरा हुआ ज़्यादा नज़र आता है। सुबह-शाम काम करता है, बच्चों को पालता है, समाज को गालियाँ देता है, लेकिन भीतर से वह कोरा कागज़ है, जिस पर कोई इच्छा, कोई अपेक्षा अब कोई रंग नहीं भर पाती। यह जीती-जागती लाश बनना ही तो ‘मोक्ष’ है—उस मोक्ष का, जो इस समाज ने हमें उपहार में दिया है! अपेक्षा ही तो वह काला धागा है, जो हमें खुद से और दूसरों से बाँधे रखता है। यह धागा टूट जाए तो आदमी निर्गुण ब्रह्म हो जाए, यानी बेकार!

अपेक्षा ही वह जीवन-पथ है, जो निरंतर जीवन्तता की ओर अग्रसर होती है! आह! क्या सहानुभूतिपूर्ण झूठ है! अपेक्षा जीवन्तता की ओर नहीं ले जाती, वह तो हमें अस्पताल के बेड की ओर खींचती है, जहाँ हम अपेक्षा करते हैं कि डॉक्टर अब भी ईमानदार होगा और इंजेक्शन सही नस में लगाएगा! यह अपेक्षा ही तो है जो जीवन में रस घोलती है? बिलकुल घोलती है! यह माधुर्य नहीं घोलती, यह तो ज़हर का कड़वा घोल घोलती है! यह रस तो ऐसा है, जो हमारी नसों से खून निचोड़कर बाहर कर देता है, और हम कहते हैं, वाह! क्या माधुर्य है! एक कर्मचारी अपने बॉस से अपेक्षा करता है कि उसकी मेहनत का फल उसे मिलेगा। फल मिलता है? नहीं, उसे ज्यादा काम मिलता है! एक पत्नी अपेक्षा करती है कि पति उसे समझेगा। पति समझता है? नहीं, वह उसे रसोई का सामान समझता है! यही तो हमारे ‘जीवन का रस’ है—अधूरापन और उपेक्षा।

और ये लोगों के विचारों में जो उनकी अपेक्षाओं का दम होता है न, यह तो पेटेंट कराने लायक है! मरने के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ पाल लेना—इससे बड़ा मानवीय विदूषक और कोई हो ही नहीं सकता। हमारे ‘चाचाजी’ (फिर से नाम बदल दिया, पर आत्मा वही है) ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनके मरने के बाद उनके सारे झूठ और कमजोरियाँ जला दी जाएँ। उन्हें अपेक्षा थी कि दुनिया उन्हें एक देवता की तरह याद करेगी। और हुआ क्या? उनके मरने के अगले ही दिन उनकी अवैध ज़मीन पर कब्ज़ा हो गया, और उनके बेटा-बेटी आपस में चप्पलें चला रहे थे कि पिता का काला चश्मा किसे मिलेगा!

और यह जो आपने कहा, ‘मरने के बाद कोई लौट कर यह देखने नहीं आता’! यह बात तो रोने पर मजबूर कर देती है! कोई आता ही नहीं, क्योंकि जिसे आना था (यानी आत्मा), वह तो मोक्ष के चक्कर में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही होगी! लेकिन फिर भी, अपेक्षाएँ तो रहेंगी! हाँ! जीवन के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ रहेंगी—कि अगली बार इंसान न बनें, कम से कम कीड़ा ही बन जाएँ, जिसकी कोई अपेक्षा न हो! कम से कम कीड़े को मोक्ष की चिंता तो नहीं करनी पड़ती!

अंतिम बात, जो आपने कही, वह तो आत्म-उत्पीड़न का चरम है! जैसे अपेक्षाओं का अंत नहीं होता, वैसे ही ज़रूरी नहीं हर अपेक्षा पूर्णता को प्राप्त हो। यह सच्चाई नहीं है, यह तो ज़िंदगी का क्रूर मज़ाक है! अपेक्षा पूरी न हो, तब भी हम सीधी पीठ करके खड़े रहें। क्यों? क्योंकि हमें अपने आप को ऐसा बनाना चाहिए कि किसी बात से कभी निराश नहीं होना चाहिए! यह असंभव है! यह तो ऐसा है जैसे किसी भूखे आदमी से कहो कि तुमको खाना नहीं मिलेगा, पर तुम खुश रहो, क्योंकि खुशी में ही सुखी जीवन की कुंजी है!

अरे भैया, निराशा का दामन न थामना वीरता नहीं है, यह तो आत्म-वंचना है! जो आदमी निराशा का दामन नहीं थामता, वह असल में कुछ भी नहीं थामता! वह बस बहता जाता है, जैसे सेप्टिक टैंक का पानी। उसे लगता है कि वह सुखी जीवन जीने की कुंजी हासिल कर लेगा? हा हा हा! उसे मिलती है अमरता का फंदा! वह हमेशा खुश रहने की एक्टिंग करता है, और इसी एक्टिंग में वह इतना थक जाता है कि अंततः वह मनुष्य नहीं रह जाता, वह एक खाली, खोखला ढोल बन जाता है।

सुखी जीवन की कुंजी यह नहीं है कि आपकी अपेक्षाएँ पूरी हों। सुखी जीवन की कुंजी यह भी नहीं है कि आप निराशा से दूर रहें। सुखी जीवन की कुंजी तो यह है कि जब आपकी अपेक्षाएँ धूल में मिल जाएँ, जब आपके अपने आप को धोखा दें, जब दुनिया आपको ठुकरा दे, तब आप ज़ोर-ज़ोर से रोएँ! आप चिल्लाएँ! आप अपनी अंदर की पीड़ा को बाहर आने दें! लेकिन नहीं, हमारा समाज हमें यही सिखाता है—मुस्कुराओ, क्योंकि रोने वाला आदमी कमज़ोर होता है। इस झूठी मुस्कान के पीछे जो अश्रु-सागर छिपा है न, वही इस व्यंग्य की सबसे मार्मिक और पीड़ादायक सच्चाई है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३० ⇒ तत्व प्रेम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तत्व प्रेम…“।)

?अभी अभी # ८३० ⇒ आलेख – तत्व प्रेम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मरहूम किशोर कुमार गांगुली अपनी फिल्म हम सब उस्ताद हैं, में, कह गए हैं, प्यार बांटते चलो ! अब प्यार कोई सुबह का अखबार तो है नहीं, कि घर घर बांटते चलो। ना ही प्रेम कोई रेवड़ी है, जो आंख मूंदकर अपने अपनों में निपटा दी जाए।

एक गीत में रफी साहब शर्तिया प्यार सिखाने की बात करते हैं !

आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ !

गोया प्यार नहीं, कार चलाना सिखा रहे हों। और सीखने वाली भी झट से हां कर देती है, सिखला दो ना। काश, वाकई ऐसा हो जाता, तो जगह जगह इश्तहार पढ़ने को मिलते, 30 दिनों में प्यार करना सीखिए। प्यार का भी लाइसेंस होता, पहले लर्निंग, बाद में परमानेंट। शायद सगाई लर्निंग और शादी पक्का लाइसेंस ही हो।।

कितना अच्छा हो, लोग प्यार में पी एच डी करें। संत महात्मा प्यार में डॉक्टरेट बांटें। प्यार का भी परीक्षा में एक प्रश्न-पत्र हो। प्यार कितने प्रकार के होते हैं ? प्यार के बुखार का कैसे इलाज किया जाता है। और एक अनिवार्य प्रश्न 20 अंक का प्रेम-पत्र। फिर कहाँ नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या के लिए जगह। लोग दुश्मनी ही भूल जाएँ।

प्रेम कहीं सिखाया नहीं जाता, प्रेम की कोई पाठशाला नहीं, कोई विश्वविद्यलय नहीं, फिर भी पशु-पक्षी तक प्रेम करना जानते हैं।

इंसानों में कितना प्रेम व्याप्त है, आप नहीं समझ सकते। कोई किताबों से प्रेम कर रहा है, तो कोई लिखने से। किसी को कविता से प्रेम है तो किसी को शायरी से। लोगों में प्रकृति प्रेमी भी हैं, और पशु-प्रेमी भी। अब गुटका और चाय से प्रेम की बात पर सुबह-सुबह मेरा मुँह मत खुलवाएं।।

आइए, आज हम भी प्रेम की बातें करें ! एक होता है व्यावहारिक प्रेम, जिससे हम whatsapp और फेसबुक वालों से रोज वास्ता पड़ता है। नमस्ते, सुप्रभात, वाला अभिवादन। दफ्तर में, स्कूल कॉलेज में, गुड मॉर्निंग का रिवाज़ है। आप चाहें तो इसे औपचारिक प्रेम भी कह सकते हैं।

परिवारों में भी प्रेम होता है ! मां बेटे का, भाई बहन का, दोस्तों का, प्रेमी-प्रेमिकाओं का, रिश्तेदारों का, और above all पति पत्नी का। यह सब भावनात्मक प्रेम है। आप इसे दिल का मामला भी कह सकते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि

” अब जी के क्या करेंगे,

जब दिल ही टूट गया। “

प्रेम गाय से भी हो सकता है और अपने पालतू कुत्ते से भी। वसुधैव कुटुंबकम् कहने वाले अपने विरोधियों और दुश्मनों को इस प्रेम के दायरे में नहीं आने देते।।

एक प्रेम स्थूल नहीं, सूक्ष्म होता है, यह दिल का मामला नहीं, मन के अधिकार क्षेत्र का मामला है। मीरा और कृष्ण का प्रेम सांसारिक नहीं, स्थूल नहीं, तात्विक प्रेम था। जिस रास का जिक्र होता है, वहां स्थूल सूक्ष्म में समा जाता है। कृष्ण भक्त राधे राधे का जाप करते हैं, और राम भक्त सीताराम सीताराम का।

ईश्वर तत्व, गुरु तत्व और प्रेम तत्व एक ही हैं, इन्हें आप अलग नहीं कर सकते। जिस प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती, वही तत्व प्रेम है। ज़र्रे ज़र्रे में बस रहा है वो, जैसे मुरली में तान होती है। चैतन्य महाप्रभु को वह तत्व प्रेम सारे जगत में व्याप्त दिखता था। नारद भक्ति सूत्र इसी तत्व प्रेम की बात करता है।।

प्रेम गली अति सांकरी ! विराट प्रेम के लिए गोकुल और वृंदावन की गलियों में भटकना क्या ज़रूरी है। जो लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं, वे शायद भक्ति और तत्व प्रेम के अधिक करीब हों, क्योंकि वे प्रकृति के साथ हैं, बहती नदी की तरह उनका प्रेम कहीं ठहरता नहीं, बहता रहता है। जो जहां है, चाहे तो वहीं, उसी स्थान पर इस तत्व प्रेम के सरोवर में स्नान कर सकता है। धारा सतगुरु, लेत नहाय क्यों न।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १ – कविता – पूजनीय वृक्ष… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘पूजनीय वृक्ष…‘।)

? कविता – पूजनीय वृक्ष…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

ईश् पर ही खिला था पुष्प,

मंदिर जा, शीश पर चढ़ा दिया,

नगण्य  हुआ सौंदर्य भी,

जीवन भी कमतर हुआ,

एक बूंद अश्रु की,

पाषाण से, नीचे को ढलक गई,

भावना तो दिखी नहीं,

सुंदर रचना भी मिट गई,

… स्वत: ही बीज बनकर,

नव अंकुर को पोषता,,

उफ़!! यह सारी संभावना,,

सिरे से खत्म हो गई…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७२ ☆ बाल कविता – तोड़ गगन से तारे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७२ ☆ 

☆ बाल कविता – तोड़ गगन से तारे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

चमचम तेरी चोंच चिरइया

तोड़ गगन से तारे।

अँधियारा धरती पर फैला

कर घर-घर उजियारे।

* 

गीत सुना तारों को बढ़िया

खुश हो जाएँ सारे।

खुशियाँ-खुशियाँ घर-घर बरसें

निश्छल मन हों प्यारे।

 *

फूल खिलें धरती भी महके

बचपन हमें पुकारे।

खेल-खेल में पढ़ना सीखें

खेल करें हम न्यारे।

 *

चंदा जी को जाकर कहना

रोज चाँदनी लाएँ।

लुकना-छिपना बन्द करें वे

सदा – सदा मुसकाएँ।

  ☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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