(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “टेम पब्लिसिटी का भैये…” ।)
☆ तन्मय साहित्य #२९७ ☆
☆ मची हुई स्मृतियों में हलचल… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “चौथी सीट… “।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)
हां सच है भगवान भी पैसे वालों की ही मदद करता है उन्हीं को ज्यादा देता है।
लोग दुकानों से बिना मोलतोल के खरीद लेते हैं पर जब हम गरीबों के ठेले पर आते हैं तो बहुत मोल भाव करते हैं।
अब तो चौराहे पर खड़े होते हैं और गाड़ी के सामने जब लोग आ जाते हैं तो सब आगे निकल जाते हैं और वह कहते हैं कि तुमने नया तरीका भीख मांगने का निकाल लिया है कहते हैं, बाबूजी गाड़ी की सफाई कर दें।
तो वह कहते हैं कि अब सारा पैसा हम ही से कमाओगे क्या? एक बेटा था जिसको पढ़ाया लिखाया विदेश भेजा कर्ज लिया। आज उसी ने दाने-दाने को मोहताज किया है।
तभी कमल ने कहा भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं हैं। भगवान सब मदद करेगा अच्छे लोगों की बस।
तुम भगवान की बातें मत करो मेरा खून खोल जाता है।
अचानक किशोर जी बाहर जाते हैं और वह गिर जाते हैं।
उनकी पत्नी कमला मदद के लिए लोगों को बुलाती है।
तभी अचानक एक आदमी आता और कहता है – अरे! आंटी मैं आपके पास आया था कल हमारे घर में पार्टी है उसमें खाना बनाने के लिए चलिए।
अंकल को क्या हो गया मैं अस्पताल ले चलता हूं।
जब अस्पताल पहुंचता है तो वह देखता है कि उस अस्पताल में डॉक्टर दोस्त ही है। अस्पताल यह गुरुजी का है और उनके आश्रम भी है आप लोग वहीं पर क्यों नहीं रहते चलिए अकेले रहने से अच्छा है सबके साथ रहेंगे।
काम भी मिल जाएगा इससे कई लोगों को फिर फायदा होगा। ठीक है बेटा मैं यहां पर एक काउंटर लगा लूंगा और जो भी पैसा मिलेगा उससे तुम अस्पताल और इन बुजुर्गों की सेवा करना मेरा भी मन लगा रहेगा अब इस उम्र में पैसे का क्या करूंगा?
जीवन खिलौने ही तो है ।
उसे ऊपर वाले (भगवान) की खेल में हम सब अटक कर खेल रहे हैं।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५३ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ४
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “नये नये आरोप गढ़ा...”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “नये नये आरोप गढ़ा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य ““मूड” की बीमारी”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 13 ☆
☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूड” की बीमारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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दुनिया के सभी डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों, मनोवैज्ञानिकों और जादू – टोना जानने वालों से “मूड नामक बीमारी” से पीड़ित मुझ जैसे लाखों करोड़ों भाई – बहिनों का हाथ जोड़ कर निवेदन है कि वे जल्दी से जल्दी इस बीमारी का सस्ता और टिकाऊ इलाज ढूंढें। आज के युग में हृदय रोग और कैंसर की भांति “मूड” नामक बीमारी भी बड़ी तेज गति से फैलती हुई लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ रही है। इसके लिए लिंग और उम्र का बंधन नहीं है। बच्चे, जवान, बूढ़े सभी महिलाएं और पुरुष इसका शिकार हो रहे हैं। प्रेमी अथवा प्रेमिका के खराब मूड के कारण न जाने कितने प्रेमी जोड़े बिछुड़ के विरह गीत गाने लगते हैं तो अच्छा मूड लोगों को मिला भी देता है।
ख़िलाफ़-ए-मा’मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूं
फिर कभी मुझसे करते रहना ये भाव – ताव मुझे मनाओ
मजे की बात तो यह है कि मूड से जो पीड़ित हैं उन्हें तो नुकसान होता ही है, जो उनके संपर्क में आते हैं उन्हें भी नुकसान उठाना पड़ता है। घर के मुखिया का मूड खराब तो सारा घर परेशान, ऑफीसर का मूड खराब तो सारे कर्मचारी और यदि नेता का मूड खराब तो जनता परेशान। सब जानते हैं कि जनता का अच्छा/बुरा मूड यदि किसी को नेता बना देता है तो उसे गद्दी से उतार भी देता है। न जाने क्या बला है यह, कहां से आती है यह मूड की बीमारी और काम बनाकर अथवा बिगाड़ कर कहां चली जाती है।
कितनी भी कोशिश कर लो
खुश रहने की…..
मगर कोई न कोई कुछ कह कर…..
मूड ऑफ कर ही देता है…..
मूड नहीं है तो आफत, मूड है तो आफत, दोनों तरफ से आफत। यदि मूड है तो पता नहीं आदमी क्या कर डाले, यदि मूड नहीं है तो भी पता नहीं आदमी क्या कर डाले। आजकल बिना मूड के कोई कुछ करना ही नहीं चाहता। काम तभी होगा जब मूड होगा।
प्रश्न उठता है कि मूड कब होगा, कैसे होगा ? कुछ लोग भाग्यवादी होते हैं। ऐसे लोग उस समय तक के लिए काम बंद कर देते हैं जब तक “मूड” नहीं आता, जब भूले भटके कहीं से मूड आता है और ऐसे लोगों के दिमाग की सांकल खटखटाता है तब ये लोग काम करते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो भाग्यवादी नहीं कर्मवादी हैं। ऐसे लोग मूड के आने का रास्ता नहीं देखते बल्कि तरह – तरह के उपायों से मूड बनाने का प्रयत्न करते हैं। कोई गीत – संगीत सुनकर, कोई चाय – कॉफी, सिगरेट पीकर, तमाखू खाकर, कोई एकांत में, कोई भीड़ में, तो कोई किसी बार में 2/4 पैग पीकर अपना मूड बनाते हैं। किसी का मूड किसी व्यक्ति विशेष, अपने परिजनों अथवा अपने पड़ोसियों या अधीनस्थों को डांटने – फटकारने, चीखने – चिल्लाने से ठीक हो जाता है तो कुछ लोगों का उछल – कूद करता मूड किसी से अपमानित होकर, जूते खाकर ठीक हो जाता है। कुछ बेचारे ऐसे भी हैं जिन्हें हर मानसिक परिस्थिति में काम करना पड़ता है –
जिंदगी ऐसी गुजर रही है कि
मूड ऑफ़ होने पर भी…..
हंसना पड़ता है ताकि किसी….
को पता न चले…..!!
जी हां भाईयो, इस कठिन जीवन में तमाम अवरोधों और तनावों के बाद भी यदि आपका मूड अच्छा है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि किसी कारण से आपका मूड खराब हो जाए तो अपनी मुख मुद्रा और वाणी से किसी को अपने खराब मूड का पता न लगने दें। सामने वाले को खुश और सामान्य दिखते हुए सहज व्यवहार करें। कहते हैं कि फायदा उठाने का मौका आने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं। चापलूस और चमचों से सीखना चाहिए वे कितना अपमान सहकर लातें खाकर भी अपना मूड ठीक रखते हैं और काम के व्यक्ति की चरण वंदना जारी रख कर अपनी सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हम और आप न जाने कितने ऐसे अयोग्य व्यक्तियों को जानते हैं जो अपने मूड को वश में करके शीर्ष पर पहुंच गए और इसके विपरीत न जाने कितने योग्य व्यक्ति मूड के वशीभूत होकर खाक में मिल गए। सावधान, यदि आप “मूड” के वश में आ गए तो नुकसान पक्का है और यदि “मूड” को वश में कर लिया तो सफलता की राह भी पक्की है।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अशोक विजयादशमी…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कैसे समझाओगी…‘।)
☆ तुका म्हणे – कळेल हे खूण … – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆
☆ तुका म्हणे ☆
*
कळेल हे खूण /
तरि दावी नारायण //१//
*
सत्य संतांपाशी राहे /
येरां भय आड आहे//२//
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अणुचिया ऐसे /
असे भरले प्रकाशें //३//
*
इंद्रियांचे धनी /
ते हे जाती समजूनि //४//
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तर्क कुतर्क वाटा /
नागवे घटापटा //५//
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तुका म्हणे ल्यावें /
डोळा अंजन बरवे//६//
– संत तुकाराम.
*
तुका म्हणे
आपणास जे कळत नाही, ज्याची उकल होत नाही, काय करावे ते सुचत नाही अशावेळी ते जाणून घेण्यासाठी शांतचित्ताने आपण परमेश्वर चरणी लीन झाल्यावर, त्याची मनोभावे भक्ती केल्यावर परमेश्वर आपणास योग्य तो मार्ग दाखविल. अशावेळी नेमके काय करावे याच्या स्वानुभवाचे खरे सत्य ख-या संताजवळच आहे. इतरांजवळ त्यांचा स्वानुभव नाही. जो संत नाही त्यांच्याकडे भय भ्रमाचा घोटाळच साठलेला आहे. येवढे मात्र नक्की. इथे आपल्या अवतीभवती असणारा अणू रेणू ही परमेश्वरी परमतेजाने आणि प्रखर प्रकाशाने भारावून ठेवलेला आहे. पण ज्यांनी आपल्या इंद्रियांच्या अधीन न होता इंद्रियानाच आपल्या ताब्यात ठेवले आहे, त्यांच्या वर विजय मिळवला आहे असे जे जाणकार आहेत तेच हे सगळे समजून उमजून घेऊन वागतात. व योग्य ते मार्गदर्शन करतात.
पण जे कोणी ही वाट सोडून तर्क कुतर्कांच्या मागे धावतात तेथे सगळ्याच भल्याभल्यांना ही नागवले जाते. फसवले जाते. हे कळण्यासाठी व जाणून घेण्यासाठी आपण आपल्या डोळ्यात भक्तीचे अंजन घालून त्याच्याकडे पाहिले तरच आपल्याला सारे कळून येईल. अन्यथा आपण ही भ्रमातच गुरफटले जाऊ. या अभंगातून तुकाराम महाराजांनी संतसहवासात राहिल्याने आपल्याला काय मिळेल ते स्पष्ट केले आहे. आणि ख-या भक्तीचा अगदी सरळ सोपा मार्ग ही दाखवून दिला आहे. सर्व सामान्य माणसाने याच मार्गाचा अवलंब करून परमेश्वराची भक्ती करावी असे सांगितले आहे.
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘अपराध‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०६ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ अपराध ☆
मेहता साहब रिटायर हो गये। अब ज़रुरी हो गया कि ज़िन्दगी का अपना अलग ख़ाका बनायें ताकि बाकी ज़िन्दगी ठीक से बसर हो सके। रिटायर होने से पहले ज़िन्दगी का नियोजन नहीं किया था, इसलिए सहसा दिक्कत महसूस हुई। दोनों बेटे जब काम पर चले जाते हैं तो उन्हें महिलाओं के बीच फालतू रहने में परेशानी होती है। शायद धीरे-धीरे आदत हो जाए।
सवेरे घूमने चले जाते हैं। रास्ते में दूसरे रिटायर्ड लोग मिल जाते हैं। बातें होती हैं। लेकिन बातें ज़्यादातर बुढ़ापे के रोगों पर केन्द्रित होती हैं— गठिया, रक्तचाप, अपच, आंखों की तकलीफ़। कभी राजनीति पर बातचीत हो जाती है। एक दो लोग ऐसे हैं जो अपने नाती-पोतों की चर्चा करके आल्हादित होते रहते हैं, या फिर बेटे- बहू की बुराइयों का पुराण खोलकर बैठ जाते हैं।
मेहता साहब अभी चुस्त हैं। उनका शरीर अभी थका नहीं है। वे अक्सर सोचते हैं सरकार को रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी चाहिए, या फिर आदमी की सेहत देखकर रिटायर करना चाहिए। जब देश में औसत आयु बढ़ गयी तो रिटायरमेंट की उम्र उतनी ही बनाये रखने में कोई तुक नहीं।
सवेरे उठकर वे सैर से पहले कमरा बन्द करके हल्की वर्जिश कर लेते हैं। शरीर के सब हिस्से-पुर्ज़े अभी ठीक काम करते हैं। बालों की सफेदी और चेहरे की हल्की झुर्रियों जैसी बाहरी तब्दीलियां ज़रूर हैं, लेकर भीतर से चुस्ती और काम करने की ताकत बरकरार है।
इसीलिए मेहता साहब दिन में पलंग पर कम ही लेटते हैं। घर में इधर-उधर घूमते रहते हैं। कमरे की सफाई कर लेते हैं। काम में पत्नी और बहुओं की मदद कर देते हैं। फूलों-पौधों की देखभाल कर लेते हैं।
लेकिन उन्हें महसूस होता है कि इतना सब काफी नहीं है। इस सब के बाद भी ऊब लगती है। भीतर से बेकारी का बोध होता है। शरीर बेकार होने तक नौकरी या व्यापार जैसा कोई काम करना ज़रूरी है। उन्हें अभी किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। आराम से कहीं भी आ-जा सकते हैं, बस में उतर-चढ़ सकते हैं, सड़कें पार कर सकते हैं। फिर घर में बैठे रहने का क्या मतलब?
उन्होंने घर के सदस्यों को बताये बिना विज्ञापन देखना शुरू किया। ज़्यादा खोज- बीन नहीं करनी पड़ी। उन्होंने देखा कि स्थानीय कंपनियों के बहुत से विज्ञापन रोज़ निकलते हैं— मैनेजर के लिए, एकाउंटेंट के लिए, क्लर्क के लिए। वे एकाउंट्स ऑफिसर के पद से रिटायर हुए थे, इसलिए उन्होंने महसूस किया कि एकाउंटेंट का काम पा जाना मुश्किल नहीं है। इतना अनुभवी आदमी भला कंपनी को कहां मिलेगा?
उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिये अर्ज़ी भेज दी। सोचा, नौकरी मिल गयी तो सब लोगों को ‘सरप्राइज़’ देंगे। जल्दी ही कंपनी से जवाब भी मिल गया। उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।
निश्चित तिथि पर मेहता साहब पुराने ऑफिस जाने का बहाना करके पुरानी नौकरी का प्रमाण-पत्र लेकर घर से निकल गये। साफ कमीज़ पैंट पर टाई लगाये वे इस उम्र में भी ‘स्मार्ट’ लग रहे थे।
कंपनी के दफ्तर में पहुंचे तो देखा वहां तीस चालीस लोग इकट्ठे थे। कुछ भीतर कमरे में बैठे थे, कुछ हाथ में फाइल लिए बाहर घूम रहे थे। मेहता साहब को आश्चर्य हुआ। एक जगह के लिए इतने उम्मीदवार। कमरे में देखा तो वहां उन जैसे पकी उम्र के तीन लोग और दिखे। बाकी सब नौजवान थे। बुज़ुर्गों में से एक ने खिसक कर उन्हें बैठा लिया। मेहता साहब ने बैठकर आसपास के लोगों पर नज़र फैलायी।
उन्होंने देखा, ज़्यादातर लोगों के चेहरे पर मायूसी का भाव था। लगता था वे पहले भी नौकरी के मोर्चे पर टकराकर शिकस्त खा चुके हैं। कई टाइयां लगाये थे, लेकिन साफ लगता था कि उन्हें टाइयां पहनने की आदत नहीं है। कई टाई बांथे थे, लेकिन उनकी कमीज़ों के कॉलर गन्दे और छिने हुए थे।
जल्दी ही इंटरव्यू शुरू हो गये और एक-एक कर उम्मीदवार अन्दर जाने लगे।
मेहता साहब के पास एक सांवले रंग का दाढ़ी वाला युवक बैठा था। वह मामूली कमीज़-पैन्ट और पैरों में सस्ते काले जूते पहने था। वह अपने आसपास के नौजवानों से लगातार ऊंचे स्वर में बात कर रहा था। मेहता साहब को उसके बात करने के ढंग से कुछ तकलीफ महसूस हुई क्योंकि उसमें उस शिष्टता और नफ़ासत का अभाव दिखता था जिसकी अपेक्षा वे हर आदमी से करते थे।
मेहता साहब के कानों में उसकी बातें पड़ीं। वह कह रहा था— ‘नौकरी मिलेगी ठेंगा। आपका कोई माई-बाप है क्या? अभी किसी का फोन आ जाएगा और बस, बाकी लोग अपनी फाइल झुलाते वापस। बस यही करते रहो। कोई साला बस का किराया देने वाला भी नहीं। नौजवान इस देश के भविष्य हैं न। हमीं इस देश के भावी कर्णधार हैं।’ वह व्यंग्य से हंसा।
मेहता साहब उसकी बात सुनकर सिकुड़ गये। वह बार-बार उन चारों रिटायर्ड लोगों पर नज़र डाल रहा था।
थोड़ी देर में वह उन लोगों से मुखातिब होकर बोला, ‘आप लोग भी इसी नौकरी के लिए आये हैं?’
मेहता साहब ने सिर हिलाया कहा, ‘हां।’
उसने उसी तरह बेलिहाज पूछा, ‘आप लोग रिटायर्ड हैं?’
मेहता साहब ने फिर सहमति में सिर हिलाया।
उस नौजवान के नथुने फड़कने लगे। सख़्त आवाज़ में बोला, ‘आप लोगों ने तो जिन्दगी भर नौकरी कर ली। सब सुख उठा लिये। बाल- बच्चों को नौकरी पर भी लगा दिया होगा। अब यहां हमारे पेट पर लात मारने क्यों आ गये आप? पेंशन तो मिलती होगी?’
मेहता साहब मिनमिना कर बोले, ‘बिज़ी रहना ज़रूरी है। जब तक शरीर ठीक है कुछ न कुछ काम तो करना होगा।’
नवयुवक उसी तेज़ी से बोला, ‘मुहल्ले के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दीजिए, समाज सेवा का काम कीजिए, घर में बागवानी कीजिए। पैसा तो मिला होगा ही। कोई फार्म खरीद कर खेती कीजिए।’
मेहता साहब के बगल में जो रिटायर्ड सज्जन थे उनका जाति-नाम तम्हाने था।अब तक मेहता साहब का परिचय सभी रिटायर्ड लोगों से हो चुका था। तम्हाने साहब नौजवान की बात पर उखड़ गये। अंग्रेजी में बोले, ‘यह हमारा निजी मामला है। तुम हमें उपदेश देने वाले कौन हो?’
नौजवान पलट कर बोला, ‘ठीक कहते हो। खा जाओ, पूरी नयी पीढ़ी को हजम कर जाओ। तुम सौ साल तक जिन्दा रहो और हमें पचास तक पहुंचना भी मुश्किल हो।’
फिर वह अपना हाथ घुमा कर बोला, ‘देख लो, इन नौजवानों में से कितने अभी से बूढ़े दिखने लगे हैं।’
मेहता साहब चुप्पी साधे बैठे थे। सौभाग्य से तभी उनका नाम पुकारा गया और वे बड़ी राहत महसूस करते हुए उठ गये।
भीतर काले कांच की टॉप वाली बड़ी मेज़ के पीछे तीन आदमी बैठे थे। बीच वाला पैंतीस-चालीस की उम्र का होगा। चेहरा गोल, चिकना और गोरा। सुनहरे फ्रेम का चश्मा उसके चेहरे पर फब रहा था। उसके दाहिने बायें के लोग अधेड़ वय के थे।
बीच वाले ने पूछा, ‘मिस्टर वी के मेहता?’
मेहता साहब ने विनम्रता से ‘जी’ कहा।
बीच वाला बोला, ‘आप एकाउंट्स ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए?’
मेहता साहब ने फिर ‘जी’ कहा।
वही आदमी बोला, ‘हम आपकी सर्विसेज़ का फायदा ज़रूर उठाना चाहेंगे। आप एक्सपीरिएंस्ड हैं । नये लोगों को तो काम सिखाने में ही दो महीने लग जाते हैं। मैंने आपके पेपर्स देखे हैं।’
मेहता साहब ने चेहरे पर कृतज्ञता का भाव लाकर सिर हिलाया।
बीच वाला आदमी हंस कर बोला, ‘रिटायर्ड लोगों को काम पर रखने का एक और बड़ा फायदा होता है। वे हड़ताल नहीं करते। नौजवानों का हाल तो यह है कि कंपनी में थोड़े पैर जमे नहीं कि हड़ताल शुरू। कंपनी की तरफ उनका कोई कमिटमेंट नहीं होता।’
मेहता साहब को उसकी बात पर झटका लगा। तो वह आदमी उन्हें बिलकुल सुरक्षित, हानिरहित समझता है। दूसरे शब्दों में मृत, अंतरात्माहीन, चलता फिरता ‘रोबो’।
गोरा आदमी अपनी तर्जनी से चश्मा पीछे धकेलते हुए, उनके चेहरे पर नज़र गड़ा कर बोला, ‘मेहता साहब, हमारी कंपनी अभी स्ट्रगल ही कर रही है। जमने में वक्त लगेगा। अभी हम आपको बीस हज़ार ही दे पायेंगे। एक साल बाद फिर सोचेंगे। आपको पेंशन तो मिलती ही होगी।’
मेहता साहब के दिमाग़ में कई बातें आ जा रही थीं। वे खोये हुए से बोले, ‘हां’।
वही आदमी बोला, ‘आपको मंजूर हो तो रुकिएगा। मैं दुबारा आपसे बात करूंगा।’
मेहता साहब बाहर आ गये, लेकिन अब उनके मन में कोई उत्साह नहीं था। दाढ़ी वाले नौजवान का नंबर अभी तक नहीं आया था। जिन नौजवानों का इंटरव्यू हो चुका था वे जा चुके थे, लेकिन रिटायर्ड लोग सभी हाज़िर थे।
मेहता साहब ने सुना दाढ़ी वाला कह रहा था, ‘ये प्राइवेट कंपनियों वाले हमारी मजबूरी जानते हैं, इसलिए अगर नौकरी मिल भी जाए तो दस्तखत होगा पचास हजार पर और मिलेंगे बीस हजार। न जीने देंगे,न मरने देंगे। ड्यूटी आठ घंटे, दस घंटे। खून की एक एक बूंद चूस लेंगे। काम करना हो तो करो नहीं तो मुंह काला करो। तुम जैसे हजार मिल जाएंगे। सरकार इनका कुछ नहीं उखाड़ सकती।’
मेहता साहब अपराधी जैसे बैठे उसकी बातें सुनते रहे।
जल्दी ही उसका भी नंबर आ गया और वह भीतर चला गया। तम्हाने साहब मेहता साहब से बोले, ‘आपको भी रुकने को कहा है?’
मेहता साहब कुछ चिढ़कर बोले, ‘जी’।
तम्हाने साहब उत्साह में बोले, ‘मुझे भी कहा है। लगता है सिर्फ रिटायर्ड लोगों को ही रोक रहे हैं।’
उनकी बात से मेहता साहब के चेहरे पर गुस्सा उभर आया, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।
दाढ़ी वाला नौजवान बाहर निकला। निकलते ही व्यंग्य के स्वर में बोला, ‘इंटरव्यू की औपचारिकता समाप्त।’ फिर किसी की नकल करता हुआ बोला, ‘जेंटिलमैन, वी विल इनफॉर्म यू बाई पोस्ट।’
फिर रिटायर्ड लोगों की तरफ आकर बोला, ‘शायद आप लोगों को रुकने के लिए बोला है।’
मेहता साहब ने सिर झुका लिया। तम्हाने साहब ने ‘हां’ कहा।
नौजवान बोला, ‘मैं जानता था। आप ही लोगों में से किसी को नौकरी मिलेगी। जिसे भी मिले उसे बधाई। इसी तरह भावी पीढ़ी की जगह पर बैठकर जिन्दगी भर मलाई खाते रहिए और हमें आशीर्वाद और शुभकामनाएं देते रहिए।’
वह लंबे-लंबे हाथ फेंकता, लापरवाही दिखाते हुए चला गया। जल्दी ही सारे नौजवान गायब हो गये। सिर्फ रिटायर्ड ही बचे।
मेहता साहब का दुबारा बुलावा हुआ। वही चश्मे वाला बोला, ‘हम आपको लेना चाहेंगे, मेहता साहब। अगर आपको हमारे टर्म्स मंजूर हों तो आप कल से काम पर आ जाएं।’
मेहता साहब ने जवाब दिया, ‘मुझे अफसोस है, मैं यह नौकरी नहीं कर सकूंगा।’
वे तीनों विस्मित हुए। चश्मे वाला बोला, ‘वी आर सॉरी। हम तो समझे थे कि आप हमारे साथ काम करेंगे। हम आपको हज़ार दो हज़ार ज़्यादा दे सकते हैं।’
मेहता साहब ने सिर हिलाया, कहा, ‘पैसे वाली बात नहीं है। मुझे आपसे एक रिक्वेस्ट करनी है।’
चश्मे वाला आगे की तरफ झुक कर बोला, ‘कहिए।’
मेहता साहब बोले, ‘आप यह नौकरी रिटायर्ड लोगों को मत दीजिए। किसी नौजवान को ही मौका दीजिए। उनमें बहुत से ब्रिलिएंट होते हैं।’
चश्मे वाले के चेहरे पर अप्रसन्नता का भाव आ गया। बोला, ‘हमें अफसोस है, मिस्टर मेहता, इन मामलों में हम बाहर वालों की सलाह नहीं लेते। हम कंपनी के इंटरेस्ट्स के हिसाब से काम करेंगे। थैंक यू। आप जा सकते हैं।’
मेहता साहब बाहर आ गये। उनके मन से एक बोझ हट गया था, लेकिन फिर भी सारे दिन उन्हें उदासी घेरे रही।
दो-तीन महीने बाद एक दिन बस स्टॉप पर उन्हें तम्हाने साहब मिल गये। सलाम-दुआ के बाद मेहता साहब ने पूछा, ‘कहां जा रहे हैं?’
तम्हाने साहब ने जवाब दिया, ‘काम पर। उस दिन आपने शायद मना कर दिया तो मुझे अपॉइंटमेंट मिल गया।’
मेहता साहब बोले, ‘कितना दे रहे हैं?’
तम्हाने साहब कुछ शर्मा कर बोले, ‘बीस हजार। पेंशन के साथ बुरा नहीं है।’
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद तम्हाने साहब बोले, ‘मालूम है? पांच छः दिन बाद दफ्तर में वही दाढ़ी वाला लड़का आया था, वही जो इंटरव्यू के टाइम ‘भासन’ मार रहा था। कंपनी ने ‘रिग्रेट’ का लैटर भेजा था, उसी को लेकर आया था। खूब हंगामा किया। मैनेजर से पूछता था हम में कौन सी कमी है जो हमें नौकरी नहीं दी। मेज पर मुट्ठियां पटकता था। फिर मैनेजर ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने दो तीन झापड़ लगाकर बाहर धकेल दिया, फिर लौट कर नहीं आया। एकदम इंडिसिप्लिंड लॉट।’
वे ‘ही ही’ करके हंसने लगे और मेहता साहब के पेट में मरोड़ सी उठी। इतने में बस आ गयी। तम्हाने साहब बोले, ‘आइए।’
मेहता साहब बोले, ‘आप निकल जाइए। मुझे जल्दी नहीं है। दूसरी बस से जाऊंगा।’