(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चक्रवात…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कुछ नहीं, कुछ भी नहीं…‘।)
☆ कविता – कुछ नहीं, कुछ भी नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “मनीप्लांट , मैं और आप”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है , उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है , उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।
वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।
अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में , धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।
अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।
तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं ,,,आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भारत की आत्म-व्यथा…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ४
कविता – भारत की आत्म-व्यथा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पशुपतिनाथ मंदिर – भाग-६ ☆ श्री सुरेश पटवा
नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड पर आधारित स्थानीय किंवदंती के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले आये, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में अभी भी है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। उसी स्थान पर भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।
मंदिर में चार दरवाजे हैं, जो कार्डिनल दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पशुपति पुराण के अनुसार, नेमी द्वारा संरक्षित स्थान के रूप में, हिमालय के बीच में स्थित देश को नेपाल के रूप में जाना जाने लगा। नेपाल महात्म्य के अनुसार, नेमी पर पशुपति द्वारा देश की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया था। बौद्ध पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंजुश्री बोधिसत्व ने नेपाल घाटी बनाने के लिए नागों की एक प्राचीन झील को बहा दिया और घोषणा की, कि आदि-बुद्ध उस समुदाय की देखभाल करेंगे जो इसे बसाएगा। उसे नेपाल घाटी कहा जाएगा। गोपालराज वंशावली के अनुसार 1380 के दशक में, नेपाल का नाम नेपा द काउहर्ड के नाम पर रखा गया है, जो कि नेपाली वंशज के संस्थापक हैं। इस प्रकार नेपाल घाटी का सम्बंध हिंदू, जैन और बुद्ध परम्पराओं से जुड़ा है।
उसके बाद भरत शर्मा जी हमें पशुपतिनाथ और विशाल नंदी के विधिवत दर्शन करवा कर मुख्य भाट के निवास पर ले गए। मुख्य भाट जी एक छोटी सी बैठक में अपनी पालतू बिल्ली के साथ विराजमान थे। निवास के पीछे गाय बंधी थी। उन्होंने उसके ताजे दूध की चाय पिलाई। पूरे नेपाल में पशुओं को बड़े सम्मान से पाला जाता है। बिल्ली हमारी गोद में आ गई। हमने उसकी पीठ और गले पर सहलाया तो जब तक हम वहाँ रहे वह हमारी गोद में ही ज़मी रही। मुख्य भाट उसे बुलाते रहे परंतु वह टस से मस न हुई। सबके उठने पर वह भी चल दी। मुख्य भाट जी ने अपने निजी पूजा स्थल पर पशुपतिनाथ जी के दर्शन करवा कर हमारे गले में रुद्राक्ष माला पहना कर मंगलाचरण श्लोक पढ़ा। हम दर्शन करके आवास पर पहुँचे। वहाँ सादा जैन भोजन तैयार था। भोजन करके रात्रि विश्राम किया। इति 15 जून 2022 वृतांत।
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16 जून 2022 को होटल येलो पेगोड़ा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय भाखा सम्मेलन में सम्मिलित होने दस बजे पहुँचना था। जैन भोजनालय में दो-दो आलू पराठा ताजे दही के साथ बरास्ते रसना उदर में उतारे। जवाहर जी ने बताया कि एक टैक्सी हमें लेने आ रही है। हम तैयार होकर जैन मंदिर में महावीर स्वामी के दर्शन उपरांत गेट पर टैक्सी का इंतज़ार करने लगे। एक घंटा इंतज़ार करने के बाद सम्मेलन के आयोजक गंगा प्रसाद शर्मा पहुँचे। उनके साथ होटल येलो पेगोड़ा पहुँचे। कार्यक्रम स्थल पाँचवें माले पर था। वहाँ तब तक कुछ भी तैयारी नहीं हुई थी। दस बजे से मुख्य अतिथि नेपाल के पूर्व शिक्षा मंत्री मोदा नाथ प्रश्री का इंतज़ार करने लगे। उन्हें आने में विलम्ब हो रहा था इसलिए आयोजकों ने उपस्थित साहित्यकारों से कविता-गीत-ग़ज़ल सुनाना शुरू कर दिया। हमने भी समय के साथ पति-पत्नी के रिश्ते में उतरते खुमार पर एक ग़ज़ल पढ़ी। जिसे लोगों ने पसंद किया। आप भी पढ़िए।
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बात तो होती है उनकी मगर वो बात नहीं होती,
वैसी दिलचस्प अब उनकी मुलाक़ात नहीं होती।
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बातों-बातों में भीग जाता था अश्कों से दामन,
स्याह बादल आते हैं मगर बरसात नहीं होती।
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पहले पूरी रात ही गुज़र जाती थी रानाइयों में,
ज़ुबान खुलती मगर मुहब्बत की रात नहीं होती।
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गिरह उनके बड़ी देर में बहुत मुश्किल से खुलते,
सब कुछ हो जाता है मगर मुलाक़ात नहीं होती।
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दिन कई बीत जाते बिना मतलब बतोले किए,
नज़रों नज़रों में भी अब कोई बात नहीं होती।
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जुबां तो कैंची सी चलती दोनों तरफ़ देर तलक,
अजीब है मगर क़ायदे की कोई बात नहीं होती।
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अब शाम की अंगड़ाई का आलम छोड़िए हुज़ूर,
जुदाई के वक्त भी नज़राना सौग़ात नहीं होती।
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पूर्णिमा गुज़र जाती है अमावस के इंतज़ार में,
रातें बहुत आती मगर चाँदनी रात नहीं होती।
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मसरूफ़ियत बनी शातिर अन्दाज़ की सौतन,
साथ रहकर जज़्बात की कोई बात नहीं होती।
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अब बदल चुकी हैं रिश्तों की रवायात इस क़दर,
किसी को ढाई हर्फ़ों की अता ख़ैरात नहीं होती।
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दोनो मुँह फुलाए बैठे हैं इश्क़ की महफ़िल में,
आतिश आहत मन से दिल की बात नहीं होती।
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मुख्य अतिथि महोदय बहुत विलम्ब से आने के कारण दस बजे शुरू होने वाला कार्यक्रम बारह बजे प्रारम्भ हो सका। प्रथम सत्र की अध्यक्षता नेपाली साहित्यकार ऋषभ देव धिमिरे ने की। मुख्य अतिथि- जवाहर कर्णावत, विशिष्ट अतिथि – दधि राज, जितेंद्र दहिया, पूनम मिश्रा इत्यादि ने सम्मेलन को सम्बोधित किया। पुस्तक लोकार्पण सत्र में हमारे कहानी संग्रह “प्रेमार्थ”, चंद्र भान राही के उपन्यास “मायानगरी के सम्राट” और डा.अनीता चौहान के कहानी संग्रह “टूटते इंद्रधनुष” का मुख्य अतिथि द्वारा लोकार्पण कराया गया। हमने तीनों कृतियों पर प्रकाश डाला। स्वागत उद्बोधन- गंगा प्रसाद शर्मा “गुणशेखर” ने दिया। उसके पश्चात सम्मान समारोह हुआ। डॉक्टर जवाहर कर्णावत भोपाल ने अपने उद्बोधन में भाषा की उपदेयता, ज्ञान का माध्यम, हिंदी पत्रकारिता, अवधि, भोजपुरी और हिंदी के प्रचार प्रसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा रामचरितमानस ने हिंदी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। फ़िजी, सूरीनाम, मारीशस, दक्षिण अफ़्रीका, गुयाना में हिंदी की वस्तुस्थिति बताई। मुख्य अतिथि ने टूटिफूटी हिंदी में सम्बोधित किया। तीन बजे दोपहर भोज हुआ।
बीच में फ़ुरसत के समय काठमांडू पर चर्चा होती रही। होटल की छत से काठमांडू को घेरे खड़ी पहाड़ियाँ हल्की बूँदाबाँदी के बीच धुँधली दिख रही थीं। दिमाग़ में विचार आया कि इन्ही पहाड़ियों से पाँच नदियाँ इस घाटी में उतरती हैं।
दूसरा सत्र चार बजे प्रारम्भ हो सका। कार्यक्रम संचालक महोदय खुद एक घंटा बोलते रहे। अंत में राम के ऊपर तीन मिनट का व्याख्यान बीस लोगों को देना था। कोई तीन मिनट तो कोई आठ, नौ और दस मिनट तक बोलते रहे। संचालक स्वयं अधिक बोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाए थे, तो दूसरों को क्या कहते? अंत के दो वक्ताओं के पूर्व हमको बोलने को कहा गया।
हमने कहा- हम लोग किस राम की बात कर रहे हैं। बाल्मीकी के राम, तुलसी के राम, कबीर के राम, गुरु रामदास के राम, लोहिया के राम, गांधी के राम, रामानन्द सागर के राम, वोट के राम या चोट के जय श्री राम। राम एक संस्कृति हैं, राम एक व्यक्ति हैं, राम एक दर्शन हैं। हम रामकथा की ऐतिहासिकता पर बात करेंगे। तुलसी दास का जन्म 1532 में हुआ था और देहत्याग 1623 में, उन्होंने अकबर का पूरा 49 वर्ष का शासन और जहांगीर के शासन के 18 वर्ष देखे थे। वे 91 वर्ष जीवित रहे थे। मुहम्मद गौरी के बाद के समूचे सुल्तानी काल से हिंदू जनता प्रताड़ित थी। वह बाहरी चीजों को छोड़कर अंतर्मुखी भक्ति की तरफ़ मुड़ी। तब भारतीय संस्कृति ने मीरा, सूरदास, कबीरदास, गुरु नानक और तुलसीदास जैसे संतों से हिंदी साहित्य का भक्ति काल आरम्भ करवाया। तुलसी दास जी ने राजपुर में पहला हनुमान मंदिर स्थापित कर रामकथा कहना आरम्भ किया। तभी से राममय लोक संस्कृति का विकास हुआ है। जो निर्गुण राम भारतीयों की आत्मा की ताक़त थे। अब सत्ता की सगुण कमजोरी बन गए हैं। हम राम की महान संस्कृति को किस तरफ़ ले जाना चाहते हैं। हमें विचार करना होगा। राम संस्कृति को जानना है तो तुलसी को जानो, अमृत लाल नागर की किताब “मानस का हँस” पढ़ो। रामधारी सिंह दिनकर की “भारतीय संस्कृति के चार अध्याय” पढ़ो।
अंत में शोध पत्र प्रस्तुति कार्यक्रम में हमने अपना व्याख्यान “उपन्यास का इतिहास” शोध पत्र पढ़ा।
“उपन्यास भारतीय विधा नहीं है। उपन्यास लेखन मध्यम वर्ग के विकास से जुड़ा है। उपन्यास विधा ने इंग्लैंड में सत्रहवीं सदी में शुरुआत, अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में विकास बीसवीं सदी में परिपक्वता प्राप्त की थी। एक उपन्यास लम्बा जटिलता पूर्ण गद्य कथा है जो मानवीय अनुभव के साथ कल्पनात्मक रूप में आकार लेता है। अंग्रेजी साहित्य में इसकी उत्पत्ति पारंपरिक रूप से 18 वीं शताब्दी में हुई है।
उपन्यास ने अंग्रेजी गृहयुद्ध (1642) की शुरुआत में हुए धर्म सत्ता और उच्च-मध्यम वर्ग के बीच हुए संघर्ष को सबसे प्रभावी ढंग से चिह्नित किया। चार्ल्स प्रथम के बाद 1649 में हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा राजशाही और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के उन्मूलन ने प्यूरिटन कॉमनवेल्थ (1649-1660) के गठन और मध्यम वर्ग के राजनीतिक प्रभुत्व में पहली बार वृद्धि का संकेत दिया। 1688 की गौरवशाली क्रांति से घबरा कर जेम्स II (“ओल्ड प्रिटेंडर”) अपने बेटे चार्ल्स (“यंग प्रेटेंडर” या बोनी प्रिंस चार्ली) के साथ फ्रांस भाग गया। ब्रिटिश संसद ने विलियम ऑफ ऑरेंज और उनकी पत्नी, मैरी, (स्पेन कैथोलिक जेम्स द्वितीय की प्रोटेस्टेंट बेटी) को इंग्लैंड पर शासन करने के लिए आमंत्रित किया। 1715 के स्कॉटिश विद्रोह के बाद स्टुअर्ट राजशाही ने आंशिक रूप से 1745-1746 में इस सिद्धांत को स्वीकार किया कि अंग्रेजी मध्यम वर्ग संसद के माध्यम से अपना शासक चुन सकता है; इसे उस मध्यम वर्ग की शक्ति के विकास के दूसरे चरण के रूप में भी देखा जा सकता है। यह सब उपन्यास के माध्यम से हुआ।
इंग्लैंड ने फ्रांस के साथ 1689-1697 के सात वर्षीय युद्ध ने बर्बादी देखी। लेकिन सत्रहवीं सदी के अंत और अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत (विशेषकर रानी ऐनी के शासनकाल के दौरान, 1702-1714) में इंग्लैंड की भौतिक प्रगति, व्यापारिकता में वृद्धि, जनसंख्या में भारी वृद्धि और शहर में जनसंख्या का तीव्र और अपरिवर्तनीय स्थानांतरण का दौर चला। समाज औद्योगिक क्रांति के कगार पर था और समवर्ती वैज्ञानिक क्रांति ने इसे बढ़ावा दिया। मुक्त उद्यम फला-फूला और इसके साथ मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ। फलस्वरूप अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में इंग्लैंड एक व्यापारिक शक्ति बन गया। जबकि इंग्लैंड का शासन अभी भी अपेक्षाकृत कम संख्या के लॉर्ड्ज़ परिवारों के पास था। परंतु अब इंग्लैंड के वंशानुगत जमींदारों को उस युग के नए व्यापारी पूँजीपतियों के साथ सत्ता साझा करनी थी। अंग्रेज़ी उपन्यासों ने महती भूमिका निभाई।
लॉर्ड और कारोबारी पूँजीपति वर्ग-संघर्ष के इस परिवेश से आरंभिक अंग्रेजी उपन्यासों का उदय हुआ। वास्तव में, रॉबिन्सन क्रूसो, कर्नल न्यूपोर्ट और मोल फ़्लैंडर्स के रूप में गुमनाम पात्रों के “इतिहास” या “जीवन” और मिगुएल डे सर्वेंट्स ने ‘डॉन क्विक्सोट (1605) और छद्म ऐतिहासिक परंपरा में, डेनियल डेफो के उपन्यासों ने अपनी कल्पनाओं को उपन्यास में प्रस्तुत किया।
मिगुएल डे सर्वेंटिस का स्पैनिश उपन्यास “डॉन क्विक्सोट” (1605), अलेक्जेंड्रे डुमास के “द थ्री मस्किटियर्स” (1844), मार्क ट्वेन के “एडवेंचर्स ऑफ टॉम सायर और हकलबेरी फिन” (1884), में निहित प्रत्यक्ष संदर्भों का साहित्यिक समुदाय पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
पद्य-गद्य की पृथक प्रकृति और इतिहास का इतिहास रहा है। ग्रीक महाकाव्यों के महान लेखक होमर द्वारा लिखित इलियड और ओडिसी, भारतीय संस्कृति के वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत पद्य में लिखित ग्रंथ हैं। हिंदी गद्य का विकास अठारहवीं सदी से शुरू होता है। गद्य लिखना कठिन होता है।
भारतेंदु को गद्य के विकास का आरंभिक लेखक माना जाता है। उन्होंने उपन्यास नहीं लिखा। भारतेंदु हिंदी गद्य की शुरुआत के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने आजकल के शुद्धतावादियों की तरह उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों से परहेज़ नहीं किया। वे जानते थे कि एक नई भाषा का गद्य दूसरी भाषाओं के सहारे से आगे बढ़ता है। जैसे अंग्रेज़ी में अन्य भाषाओं लेटिन, ग्रीक, रोमन, फ़्रेंच संस्कृत के अनगिनत शब्द समाहित हो गए हैं। भारतेंदु युग में ऐतिहासिक दृष्टि से लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षा-गुरु’ (1882 ई.) हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है।
बंकिम चंद्र बंगाली के, देवकी नंदन खत्री आरम्भिक उपन्यासकार और प्रेमचंद हिंदी के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। ये तीनों अंग्रेज़ी भाषा के अच्छे जानकार थे। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य से गद्य लिखना सीखा। उसके बाद मातृ भाषा में लेखन शुरू किया था।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित दुर्गेशनंदिनी के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी। रवींद्रनाथ टैगोर, माणिक बंदोपाध्याय, ताराशंकर बंदोपाध्याय और शरत चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा गद्य का ‘नया’ प्रयोग उनके कार्यों के माध्यम से ‘परिपक्व’ में बदल गया। लगभग ये सभी साहित्यिक गतिविधियाँ कोलकाता में जोरों पर चल रही थीं।
देवकीनन्दन खत्री ने ‘चन्द्रकांता’, ‘चन्द्रकांता-संतति’ तथा ‘भूतनाथ’ नामक तिलस्म और ऐयारी के रोचक उपन्यास कई भागों में प्रकाशित किए। लोगों ने उनके उपन्यास पढ़ने के लिए हिंदी लिखना-पढ़ना शुरू किया था।
हिंदी में आधुनिक सामाजिक उपन्यासों का सूत्रपात प्रेमचंद (1880-1936) से हुआ। उन्होंने ऐनातोले फ़्रैंक के थायस (Thayas) उपन्यास का अहंकार नाम से अनुवाद किया था जो भोग-अध्यात्म द्वन्द पर सर्वोत्तम कृति मानी जाती है। उन्होंने जस्टिस (Justice) नाटक का न्याय नाम से अनुवाद किया। इस तरह वे उपन्यास विद्या से परिचित हुए।
प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। “सेवासदन’, “रंगभूमि’, “कायाकल्प’, “गबन’, “निर्मला’, “गोदान’, आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के “हृदयपरिवर्तन’ के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनका रुझान समाजवाद की ओर भी हुआ, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे उपन्यास सम्राट कहलाते हैं।
प्रेमचंद उत्तरोत्तर युग के प्रमुख उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, जैनेंद्रकुमार, वात्स्यायन “अज्ञेय’, इलाचंद्र जोशी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, वृंदावनलाल वर्मा थे।
जयशंकर प्रसाद के “कंकाल’ और “तितली’, भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ “टेढ़े मेढ़े रास्ते’ और “भूले बिसरे चित्र’ प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की “गिरती दीवारें’ का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रांकन में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की “बूँद और समुद्र”, “मानस का हँस”, “खंजन नय”’, नाच्यो बहुत गोपाल, यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर श्रेष्ठ आंचलिक उपन्यास हैं।
जैनेंद्रकुमार के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले “परख’, “सुनीता’, “कल्याणी’ आदि से भी अधिक उनके “त्यागपत्र’ ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। वात्स्यायन “अज्ञेय’ ने अपने मनोविश्लेषण में “शेखर : एक जीवनी’, “नदी के द्वीप’, “अपने अपने अजनबी’ में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। इलाचंद्र जोशी के “संन्यासी’, “प्रेत और छाया’, “जहाज का पंछी’ आदि में सामाजिक विकृतियों पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का “सूरज का सातवाँ घोड़ा’ और नरेश मेहता का “वह पथबंधु था’ उत्तम उपलब्धियाँ हैं।
ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का “बाणभट्ट की आत्मकथा’ एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के “महारानी लक्ष्मी बाई’, “मृगनयनी’ आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यात्मकता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (1895-1963), रांगेय राघव (1922-1963) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।
उपन्यास अपने जन्म से स्वतंत्रता की संतान है। इसलिए वह इतिहास में दबी चीखों, हँसने और रोने को भी दर्ज करता है जो अनसुना रह जाते हैं। जिस दौर में इतिहास एक आतंक के रूप में उपस्थित किया जा रहा है और फिल्म से लेकर उपन्यास तक इतिहास खेलने की वस्तु है, ऐसे समय में सामाजिक स्मृति के समानांतर निजी स्मृति को इतिहास की आवाज बनाना अर्थपूर्ण माना जा सकता है। उपन्यासकार को स्मरण रखना होगा कि भारत वह धरती है जहां कहीं भी कुदाल चलाओ, उसकी नोक एक मूर्ति से टकराती है। कुदाल की नौक कई मूर्तियों को गढ़ रही और कई मूर्तियों को ध्वस्त कर रही है।
नेपाल में भारत से अधिक महंगाई है। रात्रि को भोजन की इच्छा नहीं थी। इसलिए ब्रेड सेवन का निश्चय किया। भारत में ब्रेड पच्चीस रुपए की मिलती है जो काठमांडू में पचास रुपए की मिली। यदि विनिमय दर से समायोजित करें तो 100 भारतीय रुपए 160 नेपाली मुद्रा के बराबर होते हैं। उस हिसाब से 25 रुपए की ब्रेड 40 नेपाली रुपयों में मिलनी चाहिए जबकि वह 50 रुपयों में अर्थात् भारतीय तुलना में 25% महँगी मिली। मारुति की जो कार भारत में चार लाख में मिलती है वह नेपाल में बारह से चौदह लाख में मिलती है। नेपाल में बचत दर बहुत कम है इसलिए विनियोग नहीं होने से उत्पादन भी कम होता है। यह देश अधिकांश चीजों के लिए भारत और चीन पर निर्भर है। इसके पास स्वतंत्र अर्थनीति नहीं है। भारत और चीन की अर्थनीतियों का सीधा प्रभाव नेपाल पर पड़ता है। चीन यहाँ एक बहुत बदा दांव लगा रहा है। वह ल्हासा (तिब्बत) से काठमांडू रेललाईन डालने की जुगत में है। यदि वह कामयाब हो गया तो वह दिन दूर नहीं जब नेपाल चीन का आर्थिक उपनिवेश बन जाएगा। उसकी भारत पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। चीन तिब्बत में यही दाव चल चुका है। दुनिया में सर्वाधिक लम्बी सीमा चीन की भारत से साझा होगी। फिर उसका दाव सिक्किम और भूटान के बीच चिकन नेक से होकर बंगला देश पहुँचना होगा। वह पाकिस्तान से मिलकर ग्वादर बंदरगाह से अरब सागर पहुँच चुका है। इस तरह दोनों तरफ़ से भारत को घेर लेगा। यह चीन का एक मिशन है।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “आरती – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २४१ ☆
☆ आरती – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆
दर्शन के लिये , पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो
मन में श्रद्धा विश्वास लिये , मां का करते जयकार चलो !!
जय जगदम्बे , जयजगदम्बे !!
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है डगर कठिन देवालय की , माँ पथ मेरा आसान करो
मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू ,इतना मुझ पर एहसान करो !!
जय जगदम्बे , जयजगदम्बे !!
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उँचे पर्वत पर है मंदिर , अनुपम है छटा, छबि न्यारी है
नयनो से बरसती है करुणा , कहता हर एक पुजारी है !!
जय जगदम्बे , जयजगदम्बे !!
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मां ज्योति तुम्हारे कलशों की , जीवन में जगाती उजियाला
हरयारी हरे जवारों की , करती शीतल दुख की ज्वाला !!
जय जगदम्बे , जयजगदम्बे !!
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जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है
जिस पर करती तुम कृपा वही , जग में सुख का अधिकारी है !!
जय जगदम्बे , जयजगदम्बे !!
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तुम सबको देती हो खुशियाँ , सब भक्त यही बतलाते हैं
जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!
☆ तुका म्हणे – बरे झाले आली ज्याच्या त्याच्या घरा… – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆
☆ तुका म्हणे ☆
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बरे झालें आलीं ज्याचीं त्याच्या घरा /
चुकला पान्हेरा ओढाळांचा //१//
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बहु केलें दु:खी त्याचिया सांभाळे/
आतां तोंड काळे तेणें लोभें //२//
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त्यचिया अन्यायें भोगा माझे अंग /
सकळही लाग घ्यावा लागे//३//
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नाही कोठें स्थिर राहो दिलें क्षण/
आजिवरि सिण पावलों तो //४//
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वेगळल्या खोडी केली तडातोडी /
सांगावया घडी नाहीं सुख //५//
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निरवूनि तुका चालिला गोवारें /
देवापाशी भार सांडवूनि //६//
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– संत तुकाराम.
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तुका म्हणे
तुकाराम महाराज या अभंगात परमेश्वरानी आपल्याला दिलेली इंद्रिये, आणि त्याना दिलेली शक्ती व बुद्धी याच्या विषयी सांगत आहेत. देवाने मला दिलेल्या या नाठाळ इंद्रियांचा संग आता संपला. ही सगळी देवानेच मला दिली होती. ती मी ज्यानी मला दिली होती त्याच्या घरी पोहचवली. मी त्यांचा लोभचं सोडून दिला आहे. त्यांनी आपापले तोंड काळे करून माझ्यापासून दूर जायचे ठरवले आहे. त्यांनी माझ्यावर खूप अन्याय केले. पण त्याचे सारे भोग मात्र माझ्या देहाला भोगावे लागले. मला त्यांनी कोठेही स्थिर होवू दिले नाही. आजवर त्यानी मला खूप त्रास दिला. क्षणभराचीही कधी विश्रांती घेवून दिली नाही. त्याचा मला खूप शिणवटा झाला आहे. मी त्यांचा सांभाळ केल्यानेच त्यांनी अनेक खोड्या केल्या. माझ्या जगण्याची तोडफोड करून त्याची वाट लावली. कुणाला सांगण्या पुरतेही सुख त्यांनी माझ्याजवळ ठेवले नाही. आता मीच ह्याचा सहवास संपवण्याचा विचार करून त्यांना देवाकडे परत करून मोकळा झालो आहे. यातून बाहेर पडलो आहे.
देवाने अनेक इंद्रिये दिली. त्याना चालवण्याची बुद्धीही देवानेच दिली. पण मला हे कळले की हे सर्व देवाचेच आहे. मग मी त्यांचा अवखळपणा ओळखून, त्यांचा हुडपणा पाहून ते सर्व ज्याचे त्याला म्हणजे परमेश्वरालाच देवून टाकले. पण हे माझ्या ध्यानी येईपर्यंत त्यानी मला फार भंडावून सोडले. त्यांचा मोहाने सांभाळल्या मुळेच किती तरी दु:खे मला भोगावी लागली. त्यांच्या मुळेच माझ्या कडे पापे जमा होते गेली. किती तरी चांगल्या गोष्टींची ताटातूट झाली. मला क्षणभर सुद्धा शांतपणे जगता आले नाही.
आता मला सारे काही कळून चुकले आहे. म्हणून देवाने मला जे जे दिले होते ते सर्व देवांचे देवालाच देऊन मोकळा झालो आहे. म्हणूनच मला आता कसलीच अडचण उरली नाही.
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९४ ☆
☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆
‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/ ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/ ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।
‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।
भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’
सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।
दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।
महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों, नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।
संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।
काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।
वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।
तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।