मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२९ ☆ उन्मात स्पर्श… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२९ ?

☆ उन्मात स्पर्श… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

येताच सूर्य ‘मे’चा ही पेटतेय काया

मित्रा तुझ्यात का ती, ती शोधतेय काया

*

हा सूर्य तापलेला करतोय सावळे मज

कृष्णा तुझ्याप्रमाणे ही शोभतेय काया

*

मी अर्घ्य रोज देतो आहे तुला तरीही

घामेजताच सारी का वाळतेय काया

*

स्नायू दुखावल्यावर रगडून अंग घेतो

तेलात ही सुखाने बघ खेळतेय काया

*

थंडी अशी गुलाबी झाली सुरू अचानक

नाजूक ओठ फुटती अन् फाटतेय काया

*

व्याधी व्यथा वयाच्या छळतात रोज आता

डोक्यास बाम रोजच ही मागतेय काया

*

स्पर्शात कालची ती अतृप्त ओढ नाही

उन्मात स्पर्श आता का टाळतेय काया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२ ✍

ये बाढ़ / अनोखी है / अजब है

अछोर महत्वाकाँक्षाओं की

क्षुद्र स्वार्थी और

सर्वनाशी बाढ़

में

मनुष्य और प्रकृति

दोनों घिर गये हैं

गिर गये हैं

इरादे

आदमी के ।

हम / ढो रहे हैं

आजादी का दंभ

और आम आदमी

आज भी बेबस है, मजबूर है

चन्द्रमा भले पास आ गया हो

रोटी अभी भी दूर है

जाने कितने शिशुमन

दफन हो जाते है

किसी नदी के तट पर

या किसी स्कूल के अहाते में

बहुत कम जगह है

सुविधा के छाते में।

है

मेरे खाते में

जमा है

कुछ 

घुटने चलती यादें

और कुछ असफल फरियादें

क्या करेंगें आप

और क्या करूँगा मैं

संकटों / यादों और फरियादों का

सिलसिला

अशेष है, असमाप्त है,

कविता अमर है

कविता समाप्त

है।

✍

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८५ – “मर्यादा को लाँघे था…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मर्यादा को लाँघे था...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मर्यादा को लाँघे था...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कम्बल एक चार लोगों

को जिसे ओढ़ सोना।

तिस पर हैं आश्वस्त एक

मिल जायेगा कोना ।।

 

रही पूस की रात और

मावठ  का भी गिरना।

तिस पर टपरे के कोने

से पानी का रिसना।

 

मर्यादा को लाँघे था

दुख, ब्यालू नहीं मिली।

चाट-चाट खा गये

प्रसादी में पाया दोना ।।

 

इधर कभी बेटी खींचे

तो पुत्र उघडता था ।

उधर खींच लेती मुनरी

तो बिरजू चिढ़ता था।

 

और कर्ज के सख्त तकाजे

सी थी शीत  लहर ।

हिला-हिला जाती

बिरजू को जो आधा- पौना।।

 

बोरा फटा बचा सकता

था थोड़ा बहुत इन्हें ।

गीला किया मावठे ने

संकट में डाल उन्हे ।।

 

सहने की क्षमता से

बाहर हुई ठण्ड बेहद।

सिसके माँ,ठिठुरे बापू

तय बच्चों का रोना।।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆

☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # श्री श्याम खापर्डे ☆

 ☆

बुझी बुझी आंखें

ना जाने

आकाश में क्या ढूंढती रहती है ?

मन ही मन बुदबुदाते हुए

ऊपर वाले से क्या पूछती रहती है ?

कब बदलेंगे हमारे हालात

कब होगी हम पर

सुखों की बरसात

कब बीतेगी यह काली रात

कब आएगी

जीवन में नई प्रभात

 

काल तो घात लगा कर बैठा है

अहंकार में अपनी गर्दन ऐंठा है

हमारे घर और

 हमारी झोपड़ियों को

बुलडोजर से मिटाया है

हमें खुले आकाश के तले

चिथड़ो में लिपटे

प्रचंड गर्मी में बैठाया है

परिवार और बच्चे

रो रहे हैं

महिलाओं संग वृद्ध

अपना आपा खो रहे है

मुंह में अन्न का

नहीं कोई निवाला है

पानी के लिए भी

नहीं कोई पूछने वाला है

पूरी बस्ती में

त्राहि त्राहि मचा है

विधाता तूने

यह कैसा खेल रचा है

हमारी उपासना का

क्या हमें यह मिला फल है ?

कितना भयानक

हमारा आने वाला कल है ?

 

कुछ सियासतदानों  ने

अपनी सियासत के लिए

हमें यहां बसाया था

क्या उन्हें हमारे आशियां को

उजाड़ते हुए

तरस नहीं आया था ?

 

किसी सरमायेदार की

यहां कॉलोनी

बनने वाली है

इसीलिए हमारी बस्ती

जबरदस्ती हमें

करनी पड़ी

खाली है

सब नियम कानून

ताक पर रखे हैं 

हम सब यहां पर

चिंतित और हक्के-बक्के हैं 

 

हम जानते हैं

इस सत्य को मानते हैं

उस कॉलोनी में

तुम्हारा भव्य मंदिर बनेगा

पूजा पाठ के लिए

एक पूजा स्थल तनेगा

तुम्हारा पुजारी और ट्रस्ट

बनेगा मालामाल

हम जैसे भक्त

सीढ़ियों पर बैठकर

हाथ में कटोरा लिए

भीख मांगते

सदा रहेंगे बेहाल

 

क्या हम और हमारी पीढ़ियां

भीख पर ही जिंदा रहेंगी ?

क्या अपने गरीब इंसान होने पर

शर्मिंदा रहेंगी?

क्या कभी होगा चमत्कार ?

क्या दूर होगा यह अंधकार ?

कब सुध लोगे  तुम पालनहार ?

क्या हमारे जीवन में कभी आएगी

झूमती हुई खुशियों की बहार ?

 

कभी यह इंतजार

अन्याय और अत्याचार

कोई सैलाब लायेगा

तो यह कॉलोनी

और तुम्हारा मंदिर भी

उस तूफान में

बह जाएगा /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०९ – ये दुनिया, ये दुनिया… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ये दुनिया, ये दुनिया।)

☆ अभिव्यक्ति # १०९ ☆

☆ ये दुनिया, ये दुनिया☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

ये दुनिया, ये दुनिया

कैसी है, ये दुनिया,

जैसी नज़र से देखोगे,

लगेगी वैसी ही दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

जन्म अकेला, पास न कोई,

सफ़र अकेला, साथ न कोई,

दूर है मंजिल, लंबा रास्ता,

कभी है, समतल, कभी चढ़ाई,

राह नहीं देती ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

कभी सुख, कभी दुख मिलता,

जीवन ऊपर नीचे चलता,

*

लोग मिलेंगे, और छूटेंगे,

जीवन भर का साथ न मिलता,

रंग बिरंगी दिखती है पर,

रंगीन नहीं है, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

सुख में ये, अपनी बन जाती,

दुख में, दूर नजर है आती,

सुख दुख हो या जीना मरना,

चलती रहती, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!! – मंदोदरी” – लेख क्र. ८ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!! – मंदोदरी” – लेख क्र. ८. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

लंकेच्या रणभूमीवर ची ती काळ रात्र! नजर जाईल तिथे शवांचा खच पडलेला, रक्ताचे पाट वहाताहेत, आणि अशातच… चतुर्वेद, सहा उपनिषदे, आयुर्वेद यांचं संपूर्ण ज्ञान असलेला ज्ञानी, विश्रवा ऋषींचा आणि उच्च दानव कुळातील माता कैकसी चा पुत्र… दशानन… रावण… रक्तरंजित अवस्थेत, धराशायी होत मृत होऊन पडलेला. तिन्ही मुलं ही युद्धात मारली गेलेली.

पतीच्या आणि पुत्रांच्या मृत्युची वार्ता कानी येताच, जीवाच्या आकांताने, दु:खावेगाने वेडीपिशी होत धावत गेली रणभूमीवर! पतीच्या शवाजवळ बसली… शोकमग्न मंदोदरी च्या मुखातून शब्द बाहेर पडले…

राम विमुख अस हाल तुम्हारा,

रहा न को कुल रोवन हारा!

उठली दु:खावेगाने आणि आक्रंदन करीत विचारती झाली… ” कुठे आहे तो, ज्याने माझ्या पतीला मारलं?? “

तिला अंगुली निर्देशाने दाखविले आणि सांगितले गेलेल्या दिशेला ती गेली.

तिथे एका शीळेवर प्रभू श्रीरामचंद्र खाली मान घालून, दु:खी, उदास, हताश बसलेले. युद्धात झालेल्या जीव हानी ने किंकर्तव्यमूढ बसलेले. अचानक एक सावली दिसते पायाजवळ… लक्षात येते की कुणा स्त्री ची सावली आहे… लगेच उभे रहातात, वळून मोठ्या अदबीने म्हणतात, ” माते, प्रणाम ! कोण आहेस तू? “…….. मर्यादा पुरूषोत्तम राम तिच्या पुढ्यात, विनम्रपणे नतमस्तक झालेला… मंदोदरी ला परस्त्रीचे अपहरण करणा- या रावणाला हरविणा-याची खरी ताकद दिसली आणि कळली ही !! तिच्या पुढ्यात झुकून उभा होता… ब्रह्मा पुत्र, मांधाता ला आव्हान देणा-या, कुबेराला खाली आणणा-या, सा-या जगाला हरविणा-या रावणाला ठार मारणारा… श्रीराम!!! तिला तिच्या प्रश्नाचं उत्तर मिळतं. मर्यादा पुरूषोत्तमाच्या या… स्त्री च्या सावलीचं ही भान ठेवणा-या, पर स्त्री मातेसमान मानणा-या या पुरूषोत्तमाच्या उंची पुढे तिला… परस्त्रीचं अपहरण करून आणणारा तिचा लंकापती दशानन अगदीच थिटा वाटला. ती वरमून परतली.

मंदोदरी…. नित्य स्मरणीय अशा पंचकन्यांपैकी एक! पण ही येवढीच तिची ओळख नाही. याच्या पलिकडे ही तिच्या व्यक्तिमत्वाचे अनेक पैलू, कंगोरे आहेत जे अलक्षित राहिले आहेत. रामायण म्हणजे… राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान… हेच डोळ्यासमोर येतात लगेच! पण यां व्यतिरिक्त ही अशी व्यक्ती चित्रे आहेत ज्यांच्या बद्दल फारशी माहिती नाही अधोरेखित झाली. त्यातीलच एक आहे… रावणाची पत्नी मंदोदरी!! 

 मंदोदरी… असुरांचा राजा मयासुर आणि अप्सरा हेमा यांची कन्या. पुराणात तिच्या जन्माविषयी वेग वेगळ्या कथा आहेत. तरीही मान्यतेनुसार ती मधुरा नावाची शापित अप्सरांचे, जी बेडकीरूपातून पूर्व रूपात आल्यावर मयासुर आणि हेमा तिला दत्तक घेतात.

…. सुंदरता, बुद्धीमत्ता, आणि नैतिकता याचा अद्वितीय संगम म्हणजे मंदोदरी! अतिशय धर्मपरायण!! रावणाशी विवाह होऊन लंकेला येते आणि सोन्याच्या लंकेची महाराणी बनते. वेद, शास्त्र, विविध कला संपन्न असलेली मंदोदरी, अगदी ख-या अर्थाने…

.. कार्येषु दासी, करणेषु मंत्री, भोजेषु माता, रूपेषु लक्ष्मी, शयनेषु रंभा, क्षमायेषु धरित्री!

अशी… षट्कर्मयुता कुलधर्म पत्नी होती. तिचा भविष्याचा ही अभ्यास होता. असं म्हणतात की ती रावणाशी बुद्धिबळाचा खेळ ही खेळत असे. बुद्धिबळाची सुरुवात तिनेच केली असं म्हंटलं जातं! 

अशा या बुद्धी मान आणि भविष्य जाणणा-या मंदोदरी ला जेव्हा रावणाने सीताहरण केल्याचे कळते तेव्हा तिला अतिशय क्लेष होतात. पर स्त्री, तीही विष्णू चा अवतार असलेल्या प्रभु रामचंद्रांची पत्नी सीता… हिच्या विषयी असा काम आणि मोह भाव जागृत होऊन तिचं हरण करणा-या रावणाला विनाशकाले विपरीत बुद्धी सुचली आहे हे तिला लक्षात आले… रावणावर निरतिशय प्रेम आणि निष्ठा असलेल्या मंदोदरी ने त्याला वारंवार धर्माच्या मार्गावर चालण्यासाठी समजावले, सल्ला दिला. तिने लंकेची नीती आणि रावणाची चेतना शक्ती बनून राहण्याची सतत धडपड केली.

सीतेला सन्मानाने श्रीरामाकडे परत पाठविण्यातच लंका आणि लंकाधिपतीचं भलं आहे हे ती पुन:पुन्हा समजावत राहिली, विनवत राहिली…..

 विनंती करी मंदोदरी|

वाया आणिली जानकी घरी|

 *

लाज झाली तिहीं लोकी||

 *

मज पाहता हे विवसी|

क्षय आणिला कुळासी||

 अभिलाषिता पर सती|

हे तो नव्हे राजनीती|

 ज्याते ध्यानी ध्याती योगी|

तो मज येतो भेटीलागी|

 तया रामासी विन्मुख होणे 

जळो जीणे लाजिरवाणे||

 – – संत नामदेव.

संत नामदेवांनी सुद्धा मंदोदरीच्या, रावणाला समजावण्याची, तिच्या पत्नी धर्माची, दखल घेतली आहे हे विशेष!! अधर्मात ही धर्म सांभाळण्याची पराकाष्ठा आणि निकराचे प्रयत्न करणा-या मंदोदरी चे पती प्रेम आणि विवेक ; रावणाच्या अहंकार आणि क्रोधापुढे हारलं!! 

तिला पतीची हार, रक्तरंजित शेवट दिसत होता, पण तरीही या पतीला प्रेरित करणा-या, पतीची चेतना बनलेल्या समिधेचं तेज, सामर्थ्य, चेतना निस्तेज झाली, स्फुल्लिंग मंदावलं पतीच्या क्रोधाहंकाराच्या धगधगत्या होमकुंडापुढे!! आणि तिच्या नशिबी आलं ते एकटेपण!! एकटीने जळत रहाणं!!

…. जळो जिणे हे लाजिरवाणे!!…. हाच सल, हाच चटका, हाच डाग उरी घेऊन ही समिधा जळत राहिली!! 

– लेख क्र. ८.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३६ ☆ कथा-कहानी – अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘अपना आकाश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३६ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सुकुमार की नौकरी और कमाई अच्छी है। स्थानीय म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में इंजीनियर है। अच्छी तनख्वाह के अलावा खासी ऊपरी आमदनी है। घर में उसके अलावा छोटा भाई दिनकर है, जो कॉर्पोरेशन में  ही क्लर्क है। वह भी खाने पीने लायक कमा लेता है। एक छोटी बहन नंदिनी है, जो शादी के लायक हो रही है।

कमाई बढ़ाने के साथ सुकुमार की पत्नी शोभा को उड़ने की इच्छा होती है। अब इस घर में मन नहीं लगता। नया फर्नीचर, नये पर्दे लेने की इच्छा होती है। अपनी नर्सरी और लॉन बनाने की इच्छा होती है। यह भी इच्छा होती है कि मिलने जुलने वाले आएं तो उसका वैभव देखकर प्रभावित हों। मुख़्तसर यह कि वे सब इच्छाएं  सिर उठाती हैं जो समृद्धि के साथ पैदा होती हैं। अपना अलग आकाश हो और उसमें परवाज़ भरने की पूरी स्वतंत्रता हो।

नंदिनी के विवाह की ज़िम्मेदारी सामने है, लेकिन सुकुमार और शोभा के लिए यह बड़ी अड़चन है। इस काम में ज़्यादा सहयोग देने के लिए अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाना पड़ेगा, अपने कुछ सपने स्थगित करने पड़ेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि घर से जल्दी से जल्दी निकल जाया जाए। उसके बाद जो सहयोग बने, देकर मुक्ति पाई जा सकती है।

अब घर छोड़ने के लिए बहाने ढूंढ़े जा रहे हैं। जिसे घर छोड़ना ही है उसके लिए बहानों की क्या कमी? शोभा, सास और ननद को सुना कर अपने असंतोष को ज़ाहिर करती रहती है ताकि घर छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। कभी बच्चों का स्कूल दूर होने का रोना रोया जाता है, कभी ज़रूरत के हिसाब से जगह कम होने की शिकायत की जाती है। सुना सुना कर परिवार वालों को उनकी विदाई के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है।

फिर ‘क्लाइमेक्स’ की तैयारी की जाती है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े किये जाते हैं, कभी ननद के द्वारा भाभी का साबुन इस्तेमाल कर लेने पर, कभी देवर द्वारा सब्ज़ी-भाजी न लाने पर। जिसे विवाद करना है उसके लिए मुद्दों की क्या कमी? सुकुमार ने बिना किसी को बताये एक  घर किराये पर ले लिया था। जब सब तैयारी हो गयी तो शोभा ने एक दिन बात का बतंगड़ बनाकर घर सिर पर उठा लिया और फिर गुस्से के नाटक के साथ फटाफट घर छोड़ दिया। बात सिर्फ इतनी थी कि ननद ने उसके छोटे बच्चे को शरारत करने पर थप्पड़ लगा दिया था। घर से बाहर निकल कर शोभा को खूब राहत और खुशी महसूस हुई। अब उड़ान भरने के लिए सामने खुला आकाश है।

पिता के घर से निकल कर सुकुमार और शोभा अपना घोंसला सजाने में लग गये। नया फर्नीचर आया, नये पर्दे, नया फ्रिज। अब अपने और अपने बच्चों के लिए खाने पीने का सामान बेहिचक लाया जा सकेगा, किसी के साथ बांटने की समस्या नहीं रहेगी। शोभा के लिए साड़ी लाते वक्त मां या बहन का ख़याल उलझन पैदा नहीं करेगा। अब  सुकुमार-शोभा को लगता कि उनका कोई वजूद है, उनकी भी कोई हस्ती है। परिवार के साथ रहने पर ऐसा गहरा संतोष, ऐसी तृप्ति कहां मिलती है?

परिवार से अलग होने पर सुकुमार के लिए कई बंदिशें भी ख़त्म हुईं। अब देर रात तक कहीं रुकने पर मां-बाप के परेशान सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा। पहले सुकुमार कभी-कभी दोस्तों के साथ थोड़ी शराब ले लेता था। अब लड़खड़ाने की हद तक भी पी जा सकती थी। शोभा से उसे डर नहीं लगता था क्योंकि उसने शोभा को समझा दिया था कि शराबख़ोरी अब हर ऊंचे समाज में आम है और बिना शराबख़ोरी ऊंचे समाज में गुज़र नहीं हो सकती।

इस सारे सुख के बावजूद शोभा को कभी-कभी अड़चन होती है। अब तबियत ख़राब होने पर भी बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर सारे काम निपटाने पड़ते हैं। समय से खाना न मिले तो सुकुमार चिड़चिड़ाने लगता है। पहले अस्वस्थ होने पर सास और ननद से मदद मिल जाती थी। अब किसी का सहारा नहीं है। पड़ोसियों से सलाम-दुआ से ज़्यादा संबंध नहीं हैं। इन दिक्कतों के बावजूद शोभा के लिए अपनी गृहस्थी की मालकिन होने का सुख और गर्व बहुत बड़ा है। उस सुख के सामने सभी दिक्कतें छोटी पड़ जाती हैं।

अब सुकुमार और शोभा उस घर में मेहमानों की तरह जाते हैं। अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं। अब माता-पिता, भाई-बहन के लिए थोड़ा बहुत जो कर दिया, उस पर कोई सवालिया निशान  नहीं लगता। माता-पिता स्वाभिमानी हैं, वे बेटे बहू से कुछ मांगते नहीं। सुकुमार-शोभा जब उस घर में जाते हैं तो अपनी दिक्कतों का ऐसा दफ्तर खोलते हैं कि किसी दूसरे को अपना दुख प्रकट करने की हिम्मत नहीं होती।

सुकुमार अब रात को देर से सोता है और सवेरे देर से उठता है। पहले देर से और देर तक सोने पर पिताजी की बातें सुननी पड़ती थीं। अब रोकने वाला कोई नहीं। नये घर में आकर उसकी तोंद बढ़ गयी है। खर्च बढ़ने के साथ वह ऊपरी आमदनी के नये-नये साधन ढूंढ़ रहा है। आमदनी बढ़ने के साथ उसकी आदतें बिगड़ती जा रही हैं।

मुश्किल यह है कि सुख के घी में कभी न कभी मक्खी पड़ती ही है। कई दिनों से सुकुमार रात को देर से लौटता था और अक्सर वह नशे की हालत में होता था। शोभा उसका इंतज़ार करते-करते सो जाती थी। एक रात लौटते वक्त कॉलोनी के छोर पर सुकुमार का स्कूटर लुढ़क गया। ख़ासी चोट खाकर वह बेहोश हो गया। सौभाग्य से कॉलोनी के कुछ लड़कों की नज़र उस पर पड़ गयी। वे उसे लाद-फांद कर घर ले आये।

ज़िन्दगी में पहली बार शोभा को इतने बड़े संकट का सामना अकेले करना था। वह बदहवासी की हालत में थी। सुकुमार ख़ून से सना पलंग पर पड़ा था और दोनों बच्चे नींद में ग़ाफ़िल थे। सुकुमार के सिर और चेहरे में चोट थी। कमीज़ फट गयी थी और शरीर कई  जगह से छिल गया था। कॉलोनी के लड़के भले थे, दौड़कर डॉक्टर को बुला लाये। डॉक्टर ने आंखों की जांच की, हाथ- पांव  की दुरुस्ती देखी और घावों को साफ कर उनमें  दवा लगायी। फिर कहा, ‘हेड इंजरी हो सकती है। इन्हें दो दिन के लिए किसी नर्सिंग होम में रख दीजिए। मैं चिट्ठी लिख देता हूं।’

अब और बड़ा संकट था। कॉलोनी के लड़के सुकुमार को नर्सिंग होम ले जाने के लिए तैयार थे, लेकिन शोभा के सामने समस्या यह थी कि कौन रात भर बच्चों के पास रहे और कौन सुकुमार के साथ नर्सिंग होम जाए। रात के बारह बज चुके थे और पूरी कॉलोनी नींद में डूबी थी। किसी परिवार से ऐसे संबंध नहीं बन पाये थे कि किसी को बच्चों की देखभाल के लिए बुलाया जा सके।

अंत में वही विकल्प चुनना पड़ा जो सबसे ज़्यादा भरोसेमंद था और जिसमें सबसे कम धर्मसंकट था। उसने ससुराल को फोन लगाकर सारी जानकारी दी।

खबर पाते ही ससुर, सास, ननद और देवर हाज़िर हो गये। शोभा को बड़ी देर के आत्मनियंत्रण के बाद रोने को कंधा मिला। परिवार के इन चारों सदस्यों को देखकर उसकी जान में जान आयी। अब न सुकुमार की देखभाल की चिन्ता रही, न बच्चों की देखभाल की। बड़ी देर से उसे जकड़े रखने वाला अकेलापन एक झटके में छंट गया।

ससुर को साथ लेकर वह सुकुमार को नर्सिंग होम ले गयी। कॉलोनी के लड़कों ने इसमें पूरी मदद की। नर्सिंग होम पहुंचने के बाद शोभा ने लड़कों को भरे दिल से विदा किया। नर्सिंग होम में जल्दी ही सुकुमार की हालत काबू में आ गयी, लेकिन अड़तालीस घंटे ऑब्ज़र्वेशन में रखना ज़रूरी था।

थोड़ी देर में सुकुमार को नींद आ गयी और शोभा ज़मीन पर उसकी बगल में कंबल बिछाकर सो गयी। सुकुमार के पिता बाहर बरामदे में सोने चले गये।

सवेरे सुकुमार पूरी तरह होश में था। ससुर को उसकी देखभाल के लिए छोड़कर शोभा घर आ गयी। उस दिन बच्चे स्कूल नहीं गये थे। वे  बुआ और दादी से मां और पिता की अनुपस्थिति के बारे में पूछताछ में लगे थे। दादी और बुआ उन्हें गोलमोल जवाब देकर बहला रही थीं।

घर आकर शोभा ने देवर को चाय नाश्ता लेकर नर्सिंग होम भेज दिया। अचानक आये संकट ने उसके स्नायुओं को बिल्कुल थका दिया था। वह पस्ती की हालत में पलंग पर लेट गयी। थकान ज़रूर थी, लेकिन अब चिन्ता दूर हो गयी थी।

पलंग पर आंखें बन्द किये लेटी शोभा भीतर से बच्चों जैसी बेचारगी महसूस कर रही थी। उसे किसी ऐसे हमदर्द की ज़रूरत महसूस हो रही थी जो उसके सिरहाने बैठकर उसके उद्विग्न  माथे पर हाथ रखे और उसे सुकून दे। वह बीच बीच में आंखें खोलकर बड़ी उम्मीद से अपनी सास की तरफ देख रही थी। उधर सास, उसकी हालत  से  बेख़बर, बच्चों को नहलाने धुलाने में मशगूल थी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०८ – अनिवार्य निर्णय… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३७ – क्रोध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३७ क्रोध… ?

चैनल पर समाचार देख रहा हूँ। दुकानदार द्वारा दस रुपये मांगने पर क्रोधित युवक ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। समाचार सुनकर हतप्रभ हूँ, अवाक हूँ। कुछ लोग विचार कर सकते हैं कि केवल दस रुपए के लिए कोई इतनी हिंसा कैसे कर सकता है? मेरे सामने प्रश्न दस रुपये या दस लाख या दस करोड़ का नहीं, मनुष्य के क्रोध के पारावार का है। जो मारा गया वह मनुष्य था, जिसने मारा, वह मनुष्य है। सत्यस्थिति तो पुलिस की विवेचना से सामने आएगी तथापि प्रथम दृष्टया यह षड्यंत्रपूर्वक की गई हत्या नहीं लगती। इसके मूल में क्रोध के चलते अपना आपा खो देना दिखता है।

क्रोध मनुष्य की प्राकृतिक भावना है। मनुष्य के भावनात्मक विरेचन के लिए भी क्रोध अनिवार्य है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए। क्रोध का अतिरेक सामान्य विवाद को हिंसक दुर्घटना में बदल सकता है।

प्रश्न है कि क्रोध क्यों उपजता है? मनोविज्ञान कहता है कि सामान्यत: अपेक्षा-भंग, असंतोष, असहिष्णुता, असफलता, असुरक्षा, असहायता के चलते क्रोध उपजता है।

योगेश्वर, श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें श्लोक में क्रोध के संबंध में कहते हैं,

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

योगेश्वर उवाच अगले श्लोक में इसी विषय को विस्तार देता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहत्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से, अपनी मनुष्यता से गिर जाता है।

क्रोध के चलते मनुष्यता से गिरा मनुष्य, कैसे अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है, इसका उल्लेख अपनी एक लघुकथा ‘क्रोध में किया था। लघुकथा इस प्रकार है-

“…दोनों में बहस होने लगी थी। विवाद की तीक्ष्णता बढ़ती गई। आक्रोश में दोनों थे पर पहला मनुष्य था, दूसरा क्रोधी था। क्रोध, तर्क का पथ तज देता है, मर्म को चोट पहुँचाने की राह चलता है। इस राह के एक विनाशकारी मोड़ पर तिलमिलाहट टकराती है।

तिलमिलाहट में क्रोधी ने एक बड़ा पत्थर मनुष्य के सिर पर दे मारा। मनुष्य की मौत हो गई। क्रोधी को फाँसी चढ़ना पड़ा।

यश, संपदा, नेह, संबंध, अंततः समूचे अस्तित्व की बलि ले लेता है क्रोध।”

आज के मनुष्य का अनुभव बताता है कि बदलती जीवन शैली में अब अहंकार से भी क्रोध उपजने लगा है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स या श्रेष्ठता बोध, अहंकार के मूल में होते हैं।

इस लघुकथा को लेख के आरंभ में उल्लेखित घटना से जोड़ें। जिसकी हत्या हुई, उसका जीवन असमय नष्ट हो गया। जिसने हत्या की, उसका जीवन भी नष्ट होने की स्थिति में आ गया है।

लोकोक्ति है कि क्रोध वह अग्निकुंड है जो आपके हाथों स्वयं आपकी आहुति करवा देता है।

अपनी आहुति या अपने क्रोध पर नियंत्रण? निर्णय हरेक को अपने स्तर पर लेना है।

© संजय भारद्वाज 

(16:55 बजे, 30 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८१ – दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला – आम खास का खास है)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८१ ☆

☆ दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आम खास का खास है, खास आम का आम.

सलिलदाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

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आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

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पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

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दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

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छककर खाँय अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

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लँगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिना बदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

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चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

सलिलआम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

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तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ‘, तोते जैसा चाम..

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हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

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लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

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आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़ा देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

सलिलआम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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