हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५७ – इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – इतना बेबस भी न हो।)

☆ हेमंत साहित्य # ५७ ☆

✍ इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे  

कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी

अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा

*

फिज़ा में तहलील महक का इशारा है

तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा

*

सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से

तू गर वफ़ादार है, तो ईश्क में क़ामियाब होगा

*

लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे

किया है ईश्क, तो ऐतिमाद भी  रखना होगा

*

मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा

चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा

*

इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,

यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा

*

तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही

बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा

बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण , तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित, ऐतिमाद = भरोसा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ☆ गजल… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ?

☆ गजल ☆ प्रभा सोनवणे ☆

सोसला  दुष्काळ हा, आता तरी,

पावसाच्या बरसु दे झरझर सरी

*

जातिधर्माचे कशाला दाखले

वाढते आहे विषमतेची दरी

*

तू किती नाकारल्या काळ्या मुली

भांडते रात्रंदिनी गोरी परी

*

कष्ट करणे टाळले वरचेवरी

देत आहे कोण भाजी भाकरी ?

*

ना इथे ना राहते आहे तिथे

भेटला मज विश्वव्यापी तो हरी

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २६ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २६ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

नाटककार रविंद्रनाथ (१)

वैश्विक काव्य जगतात मानाचं स्थान प्राप्त केलेल्या रविंद्रनाथांनी नाट्य जगताला लहान मोठ्या अशा जवळपास ५०-५५ उत्कृष्ट नाटकांनी समृद्ध केले आहे. परंतु दुर्दैवाने हे सत्य कुठेच अधोरेखित झालेलं नाही. त्यांच्या नाटकांमधील डाकघर, रक्त करबी, विसर्जन, राजा ही नाटके तसेच चित्रांगदा, श्यामा, नटीरपूजा, चंडालिका, ताशेर देश या नृत्यनाटिका जास्त चर्चिल्या गेल्या आहेत. पण त्यांची छोटी छोटी नाटकं, आपल्या वगनाट्य सदृश नाटिका, प्रहसनं, नाट्यछटा देखील समाजमनावर छाप सोडणाऱ्या आहेत. तसेच त्या थट्टा विनोदाच्या अंगानं सामाजिक, धार्मिक व राष्ट्रीय जीवनातील विसंगतीवरही प्रकाश टाकणाऱ्या आहेत. रविंद्रनाथांची नाटके कलात्मक सौंदर्याचा अनुभव देता देता सामाजिक प्रबोधनही करतात. त्यांच्या कवितांप्रमाणेच त्यांची नाटके देखील त्यांच्या अंतरात्म्याचा आवाज आहेत. आत्ताच्या भाषेत आपण ज्यांना प्रायोगिक नाटके म्हणतो तशी प्रायोगिक नाटके देखील त्यांनी प्रायोगिकतेचं कसलेही अवडंबर न माजवता लिहिली, बसवली व प्रस्तुत केली.

परंतु त्या काळातली मेलोड्रॅमॅटिक नाटके बघण्याची सवय असलेल्या बंगाली प्रेक्षकांना रविंद्रनाथांच्या नाटकांतील तरलता, अस्फुट संघर्ष लक्षात येत नसल्यामुळे म्हणा किंवा धार्मिक, सामाजिक व्यंगावर भाष्य असल्यामुळे म्हणा रविंद्रनाथांना नाटककार म्हणून जे स्थान कलाजगतात मिळायला हवं होतं ते कांही मिळालं नाही. अर्थात टागोरांनीही हे मान्य केलं होतं. ते म्हणत, “मला नाटक लिहिता आलं नाही. एक मध्यवर्ती कल्पना घेऊन त्यावर नाटक तोलण्याची कला माझ्यात नाही. ” अर्थात त्यांच्या नाटकांकडे पाहिलं असता लक्षात येतं की, हा त्यांचा विनय होता. त्यांच्या मधला कवी त्यांच्या नाटकांतही डोकावतो, हे मात्र खरे आहे. त्यांची कांही नाटकं तर गद्य काव्य असल्यासारखी वाटतात.

वयाच्या बाराव्या वर्षी त्यांनी शेक्सपिअरच्या ‘मॅकबेथ’ नाटकाचं बंगालीत भाषांतर केलं होतं. त्या काळात इंग्रजी नाटकांच्या अनुकरणाचं वारं होतं. त्यामुळे पारंपरिक बंगाली नाट्यकला व नवदरबारी लोकांची नाट्यकला यात मोठं अंतर आलं होतं. रविंद्रनाथांनी लोकरंगमंचातली शक्ती ओळखून, त्यावर आपले संस्कार करून हे अंतर कमी करण्याचा प्रयत्न केला. नाटकाविषयी त्यांच्या मनात कोणतेही व्यावसायिक विचार नसल्यामुळे त्यांनी कुठल्याही नाटक कंपनीसाठी नाटक लिहिले नाही.

(अपूर्ण–पुढील भागात)

—–

गीत : ७६

DAY after DAY, O lord of my life, shall I stand before thee face to face? With folded 

hands, O lord of all worlds, shall I stand before thee face to face? 

Under thy great sky in solitude and silence, with humble heart shall I stand before thee 

face to face? 

In this laborious world of thine, tumultuous with toil and with struggle, among hurrying crowds shall I stand before thee face to face? 

And when my work shall be done in this world, O King of kings, alone and speechless shall I stand before thee face to face? 

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७६

*

हे परमेशा, नित्य, प्रतिदिन

मला भेटशील का रे?

कर दोन्ही जोडूनि उभा मी

मला भेटशील का रे?

*

गगनाखाली निळ्या, अथांग, अतल

नतमस्तक मी शांत, एकाकी, निर्मल

मला भेटशील का रे?

*

दुष्कर जीवन, संकटे कितीक आली

या गर्दीत ना उसंत क्षणाची मिळाली

मला भेटशील का रे?

*

जीवनी, कर्तव्ये सारी पुरी करुनी

येतो मूकपणे, एकांताचे बोट धरुनी

मला भेटशील का रे?

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत : ७७

I KNOW thee as my God and stand apart ⎯ I do not know thee as my own and come 

closer. I know thee as my father and bow before thy feet ⎯ I do not grasp thy hand as 

my friend’s.

I stand not where thou comest down and ownest thyself as mine, there to clasp thee to 

my heart and take thee as my comrade.

Thou art the Brother amongst my brothers, but I heed them not, I divide not my earnings 

with them, thus sharing my all with thee.

In pleasure and in pain I stand not by the side of men, and thus stand by thee. I shrink to give up my life, and thus do not plunge into the great waters of life.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७७

 *

तुज काय म्हणू मी, कोण म्हणू?

न कळे नाते काय आपुले

पिता, बंधु की सखा म्हणू?

*

जेथे तव पदचिन्हें रमणीय

ती भूमी मज असे पूजनीय

तू माझा समजुनि मी तेथे

उभा कसा राहू?

*

पिता म्हणू, तर जवळ न जाईन

नतमस्तक तव सामोरी होईन

आदर ठेवी दूर जरा मज,

हात कसा तव हाती धरू?

*

सखा सोबती, तू माझा जर

जवळी तुझ्या राहू का निरंतर

कवटाळुनि मम हृदयापाशी 

तुला कसा घेऊ?

*

बंधु तुला जर मानत असतो

तव आज्ञेचे पालन ना करतो

संचित माझे तुझिया सोबत 

वाटुनि का घेऊ?

*

दुःखाचे क्षण, सुखाची पखरण

अनुभवता ये, तुझी आठवण 

जीवन नौका वल्हविसी का,

भवसागर हा पार करू?

*

तू परमात्मा, तुज जीवन अर्पिन

नश्वर या जगती, पुन्हा न येईन

एकरूप तुजसवे होउनि 

मुक्ती का पावू?

 

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत ७८

WHEN the creation was new and all the stars shone in their first splendour, the gods 

held their assembly in the sky and sang “Oh, the picture of perfection! The joy 

unalloyed!” 

But one cried of a sudden ⎯ “It seems that somewhere there is a break in the chain of light and one of the stars has been lost. ” 

The golden string of their harp snapped, their song stopped, and they cried in dismay ⎯

“Yes, that lost star was the best, she was the glory of all heavens!” 

From that day the search is unceasing for her, and the cry goes on from one to the other that in her the world has lost its one joy! 

Only in the deepest silence of night the stars smile and whisper among themselves ⎯

“Vain is this seeking! Unbroken perfection is over all!” 

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७८

*

तारे गगनी चमकत होते

जेंव्हा झाली विश्वनिर्मिती

वैभव पाहून देवांच्या तर

आनंदा ना राहिली मिती

*

तुटली ताऱ्यांची साखळी

एक तारा कुठे हरवला

मोजीत बसला होता रात्री

कोणी एक रडू लागला

*

घाबरले देवही, गीत थांबले

सुवर्ण तारच तुटली वीणेची

हरवला ताराच म्हणती

शान होता स्वर्गाची

*

सारे होते शोधत अविरत

इकडे तिकडे, तिकडे इकडे

आनंद हरवून बसले विश्व

समजून असे मूढ रडे

*

शांत, गर्द रात्रीच्या डोही

हसती तारे अन् कुजबुजती 

व्यर्थ शोध हा वेदनेचा 

परिपूर्णता आहे जगती

– क्रमशः भाग २६

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५० – बुन्देली कविता – ”जिनको खादी को लिबास है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जिनको खादी को लिबास है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५० ☆

☆  बुन्देली कविता – जिनको खादी को लिबास है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जिनकी खादी कौ लिबास है

उनके हाँतों में विकास है

इतै रैत पतझर कौ मौसम

उतै खिलो मधुमास खास है

 *

हमें मिलत हैं नीम, करेला

उन्हें संतरा, अनानास है

 *

महलों सें उन्नति नें आँकौ

बहुमत में तौ भूख-प्यास है

 *

बे गमलों में मुरझाउत हैं

खिलत जंगलों में पलाश है

 *

इक तरफा हो रई तरक्की

इतै गरीबी सर्वनास है

 *

भगवतहैं नीची करतूतें

भले उँचाई में निवास है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०५ ☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  “बिट्टूपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०५ ☆

☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक – ‘बिट्टू’ 

लेखक डॉ. संजीव कुमार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ मातृत्व की  पावन तपस्या पर अभिनव उपन्यास – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

डॉ. संजीव कुमार का  ‘बिट्टू’ कालजयी और शाश्वत साहित्यिक मूल्यों को रेखांकित करता नया रोचक उपन्यास है। वे विविध नवाचारी विषयों, और विधाओं में इतना सारा मौलिक रच चुके हैं कि रिकॉर्ड बुक्स में लगातार दर्ज होकर साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं।

हिंदी उपन्यास साहित्य का मूल उद्देश्य मानव मन की अतल गहराइयों को छूना और समाज को एक संवेदनशील आईना दिखाना है। यह कृति इस साहित्यिक मानक पर शत प्रतिशत खरी  है।

उपन्यास  एक बंधी-बंधाई कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, उसकी अदम्य जिजीविषा और मर्मस्पर्शी त्याग का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह समाज को करुणा और संवेदना के शाश्वत मूल्यों से जोड़ता है। उपन्यास की नायिका ‘बिट्टू’ एक शांत, विनम्र और बेहद हँसमुख स्त्री है, जिसका जीवन विवाह के शुरुआती दिनों में किसी मधुर गीत की तरह खुशियों से भरा हुआ था। किंतु, कहानी का मुख्य साहित्यिक द्वंद्व ‘माँ बनने की अभिलाषा’ से शुरू होता है। दस वर्षों का लंबा और मरुस्थल जैसा इंतज़ार, समाज के तीखे ताने और पारिवारिक दबाव के बीच बिट्टू का संघर्ष पाठक को भावनात्मक रूप से अपने साथ बहा ले जाता है।

लेखक ने यहाँ बड़ी कुशलता से दिखाया है कि कैसे एक स्त्री का मातृत्व केवल उसकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाता, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का एक क्रूर प्रश्न बना दिया जाता है।

इस कथा-प्रवाह में बिट्टू का चरित्र अटूट विश्वास और संकल्प के एक ऊंचे शिखर की तरह प्रस्तुत किया गया है। जहाँ एक ओर बिट्टू का पति उसके मातृत्व को लेकर मौन धारण कर लेता है और रूढ़िवादी समाज उसे ‘दोषी’ ठहराने लगता है, वहीं बिट्टू अपनी आस्था की लौ को बुझने नहीं देती।

 वह मंदिर, मन्नत, व्रत और डॉक्टरों के चक्कर काटकर भी हार नहीं मानती। यहाँ तक कि अपनी जान दांव पर लगाकर सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाना, उसके इसी संकल्प को दर्शाता है कि वह अपने मातृत्व को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

लेखक की भाषा सरल होते हुए भी गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है। पूरी रचना में प्रतीकों और उपमाओं का बहुत ही सुंदर और ललित प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, जब बीमारी की रिपोर्ट आती है, तो लेखक उसे “वज्रपात” के समान बताते हैं। यह ललित शैली पाठक के हृदय में आदि से अंत तक करुणा का संचार करती चलती है।

उपन्यास में संतान हीनता पर सामाजिक प्रताड़ना के यथार्थ को चित्रित करते हुए लेखक लिखते हैं कि, “शुरू-शुरू में घरवाले उसे समझाते, लेकिन धीरे-धीरे ताने और फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं। कोई कहता- ‘शायद इसी में कोई दोष है।’ कोई कहता- ‘इतने साल हो गये, अब क्या उम्मीद!'”, यह अंश हमारे समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ बाँझपन का सारा दोष केवल और केवल स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता है। लेखक ने यहाँ सीधे प्रहार के बजाय “फुसफुसाहटों” शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उस मानसिक पीड़ा को दर्शाता है जो किसी सीधे वार से भी अधिक गहरी और जानलेवा होती है। परंतु, इस घने अंधकार के बाद मातृत्व की उपलब्धि और परम तृप्ति का वह उजला क्षण भी आता है, जब वह पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेती है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकलती हैं और वह मन ही मन कहती है,  “हे भगवान, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए… तूने मुझे माँ बना दिया।”, यहाँ बिट्टू के दस वर्षों के तप और संघर्ष का एक सुखद अंत होता है। “अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” का यह भाव यह सिद्ध करता है कि एक भारतीय स्त्री के लिए जीवन का चरम लक्ष्य और उसकी संपूर्णता मातृत्व की प्राप्ति ही है।

परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी का सबसे कारुणिक मोड़ तब आता है जब वह ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इस काल के सामने भी बिट्टू टूटती नहीं है, बल्कि वह नियति और मृत्यु पर अपनी ममता से विजय प्राप्त करती है। अपने अंतिम दिनों में, वह काँपते हाथों से अपने मासूम बच्चे के सिर पर हाथ रखती है और कहती है,  “बेटा, मज़बूत बनना। माँ ने तेरे लिए बहुत इंतज़ार किया था… अब तू ही मेरा संसार है।” मृत्यु के द्वार पर खड़ी होकर भी अपने बेटे के भविष्य की यह चिंता और उसके चेहरे की शांति यह संकेत देती है कि उसने अपनी जीवन-साधना पूरी कर ली है। अब उसे मृत्यु का कोई भय नहीं है।

साहित्यिक मानकों की कसौटी पर यदि हम इस कृति को परखें, तो ‘बिट्टू’ बांझपन की सामाजिक विसंगति पर एक अत्यंत सफल, प्रौढ़ और श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है। अरस्तू के प्रसिद्ध ‘विरेचन सिद्धांत’ के अनुसार, जो साहित्य पाठक के मन के विकारों को धोकर उसे करुणा से पवित्र कर दे, वही उत्तम साहित्य है। यह उपन्यास पाठक के भीतर इसी पवित्र करुणा का संचार करता है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों वस्तु,  अर्थात् पात्र-चित्रण, रस और उद्देश्य के कड़े मानकों पर यह रचना पूरी तरह सुदृढ़ और संतुलित है। इसका शिल्प और इसका कथ्य दोनों ही उच्च कोटि के हैं। डॉ. संजीव कुमार ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कृति हिंदी साहित्य को सौंपी है, जो पाठकों को पुस्तक बंद करने के बाद भी देर तक सोचने पर विवश करती है। यह उपन्यास दुःख की राख से अपनी खुशियों का संसार बुनने वाली एक साधारण स्त्री के असाधारण और कालजयी महागाथा बनने की अमर कहानी है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२२ – है जीवन क्षण भंगुर प्यारे… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२२ ☆

☆  है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

है जीवन क्षण भंगुर प्यारे।

बन कर जियो बहादुर प्यारे।।

*

सद्भावों के बीज बोइए।

निकस पड़ें सद्-अंकुर प्यारे।।

*

जीवन में घिर आते संकट।

कभी न होना आतुर प्यारे।।

*

होती आत्म परीक्षा निशिदिन।

कभी न बनना निष्ठुर प्यारे।।

*

आएँगें शादी के दिन जब।

गूँजेंगे मंगल सुर प्यारे।।

*

छल-छद्मों की है यह दुनिया।

कहे जगत से माहुर प्यारे।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

29/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ – 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा 2 जून रोटी समारोह ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆

🌻लघु कथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ 

एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।

सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।

जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।

एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।

नया होटल खुला है क्या?

एक जोरदार ठहाका–

किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।

महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।

धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।

दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७९ – देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७९ ☆ देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सोशल मीडिया अपने आप को समाज का बहुत बड़ा शुभचिंतक मानता है। इसकी पैरवी करने वाले तो ये तक कह देते हैं, कि “सोशल मीडिया ही समाज का वास्तविक आईना है”।

दिल को बहलाने के लिए ख्याल बुरा नहीं है, ग़ालिब! अलग अलग तरह के आईने भी आपकी शक्ल को विभिन्न  आकारों में दिखा देते हैं। पतले व्यक्ति को मोटा और मोटे व्यक्ति को पतला बताने वाले आईने हमने भी बहुत देखें हैं।

आज प्रातःकालीन भ्रमण पर एक परिचित के घर के सामने से निकलते हुए, एक पेशे से सेवानिवृत वकील साहब मिल गए, उनके चाय के आग्रह को मना नहीं करते हुए, हम उनके घर चले गए।

उनकी पत्नी टीवी के सामने कापी पेन लेकर बैठी थी। वो बोली अभी दस मिनट सब शांत बैठे रहें, उसके बाद ही चाय की व्यवस्था करूंगी।

टीवी के किसी समाचार चैनल पर भविष्य वक्ता कुछ जानकारी दे रहे थे, वो कॉपी में लिखती जा रही थीं। वकील साहब भी अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। दस मिनट बाद बड़ी कठिनाई के बाद काग़ज़ के छोटे से कप में एक बड़ी चम्मच की मात्रा के बराबर चाय प्राप्त कर, हम अपने होठ ही गीले कर पाए।

वकील साहब की पुत्री एक बड़े हॉस्पिटल में महिला चिकित्सक हैं। भाभी जी भविष्य वक्ता द्वारा “सिजेरियन ऑपरेशन” के लिए अच्छे समय की जानकारी नोट कर रही थी। उनकी पुत्री उस समय किए जाने वाले ऑपरेशन का अधिक/ विशेष चार्ज, वसूल सकें। वकील साहब भी मुकदमा दायर करने का सबसे बढ़िया समय कौन सा है, की जानकारी बार काउंसिल को प्रतिदिन देते है, ताकि वकील उस विशेष समय के लिए अतिरिक्त राशि फीस के नाम पर लूटी जा सके।

चाय के समय वकील साहब बोले, कल ही बिटिया की सगाई टूट गई है। हमें भी आश्चर्य हुआ,  तब वो बोले लड़के वाले कहते है, किसी भी वकील की बेटी से विवाह नहीं करेंगे, वर्ना भोपाल वाली त्रिशा जैसा कुछ हो ना जाए। वो बहुत दुखी मन से बोले, समाज में लोग वकीलों से पारिवारिक संबंध जोड़ने से मना करने लगे हैं। आगे बोले पड़ोस में रहने से भी लोग डरते हैं। वकील के घर के आस पास जमीन भी तो सस्ती मिल जाती है।

बहुत देरी से मुंह में रखे हुआ गुटखा थूकने का समय आ गया है। इसलिए लेखनी को विराम देता हूँ।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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