हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ – पर्यावरण संरक्षण ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

☆

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८२ – देश-परदेश – ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

करीब आठ दशक पूर्व,  अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।

“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।

विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।

अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।

सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।

हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।

हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३२ ☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३२ ?

☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

बालपणीचा काळ सुखाचा

आजोबांना असं वाटतंय

सेड्यूल माझं पाहिल्यावर

कुठं आहे मला पटतंय

* 

झोप होतच नाही आमची

सात वाजता असते शाळा

शाळेमधल्या बाकावरती

अचानकच लागतो डोळा

 *

छडी वाजता बाकड्यावर

झोपच उडते खाडकण

कुठे आहोत आपण स्वतः

कळतच नाही काही क्षण

 *

जेवण होता थोड्या वेळात

क्लासकडे वळतात पाय

नाहीच चालत कंटाळून

तुम्हीच सांगा ना करू काय

 *

खरंच सांगा आता आजोबा

कुणाचं जीवन सुखी आहे

रिक्षामध्ये कोबलंय मला

ईश्वर तुमच्या मुखी आहे

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८९ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆

☆ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 गुड़ियों से खेल रही है

‘भावना‘,

मिट्टी खा रही है

‘कामना‘

और

धनुष साध रहा है ‘हर्ष’–

इन्हें क्या मालूम

कि आज

कम हो गये हैं

मेरे जीवन के कितने वर्ष।

हाय! जिन्दगी कट रही है

किराये की छत में,

क्या दे पाऊँगा विरासत में?

अखबारों की कतरनें

बासी चिट्ठियाँ

और लाटरी की निर्जीव टिकिटें

भला 

किस काम आयेंगीं?

‘संभावना की फसल‘ की

पुरानी प्रतियाँ

इन्हें क्या दे पायेंगी?

सच तो ये है-

दुहरी जिन्दगी जीने वाले

मास्टर का

जीना मरना बराबर है,

ये मँहगाई

जीवित शव पर लगा हुआ ‘कर‘ है।

 क्रमशः अगले अंक में

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८७ – “रोज यही दोहराती घडियाँ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “रोज यही दोहराती घडियाँ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “रोज यही दोहराती घडियाँ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

बेटा पंखा लगवाये

उपहार नहीं लेंगे

बाहर खटिया पर सोये

बाबा सब सहलेंगे

 

“संस्कार के नाम, त्याग

क्या किया पिताजी ने

मुश्किलात अब क्या हैं

उनको यह जीवन जीने”

 

कहकर बेटा तुरत फुरत

बाहर का रुख लेकर

निकल चुका होता कहता

हम क्या क्या कर लेंगे ?

 

उधर पूज्य माता जी

बैठीं चढ़ा चढ़ा पारा

अपनी बहू पवित्रा का

कर शापित भिनसारा

 

नाती की पसलियाँ पकड़

बैठीं सूखी खांसी

रोग इसी गर्मी में क्या

सब इंतकाम लेंगे

 

छोटीबहिन बागवाले

मंदिर के कोने से

टपर टपर बतियाती

किससे कई महीने से

 

बेटा सोच नहीं पाता

इस विकट परिस्थिति में

और पिता का कहना कि-

ऐसा , तो मर लेंगे

 

एक अनौखी कथा चला

करती है इस घरकी

रोज यही दोहराती घडियाँ

टिक-टिक दिनभर की

 

और चल रहा ढर्रा इनका

स्वाभिमान ढोते

हम यों लिख सकते यह

किस्सा बस क्या  करलेंगे?

 

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-06-2023

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९ – हास्य-व्यंग्य – “नायक नहीं खलनायक है तू” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “नायक नहीं खलनायक है तू”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९ ☆

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “ट्रम्प, मेलोनी और ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

हाल ही में फ्रांस में संपन्न जी 7 शिखर सम्मेलन में इटली की लोकप्रिय, खूबसूरत प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर मुंह चलाने की बुरी आदत से लाचार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मेलोनी को दुखी और नाराज कर दिया। ट्रंप के बयान ने मेलोनी सहित दुनियाभर की महिलाओं के स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने का काम कर दिया कि “मेलोनी मेरे साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांग रही थी। मैं समझता था कि ट्रंप भले ही राजनीतिक रूप से परिपक्व न हो किंतु वे राजनीति से पहले लम्बे समय तक ग्लैमर की दुनिया से जुड़े रहे हैं अतः महिलाओं की मानसिकता और प्रशंसा पसंद प्रकृति से अच्छी तरह परिचित होंगे, किंतु मेरी धारणा गलत निकली, उनकी समझ भी भारत के एक युवा नेता के जैसी ही है।

यदि वे यह कहते कि मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर उन्हें गर्व की अनुभूति हुई वे जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ हैं उतनी ही सहृदय भी हैं, यदि वे कहते कि मेलोनी जी मैं आपकी फोटो देखकर तनाव मुक्त हो जाता हूं, तो शायद मेलोनी भी खुश होकर ट्रंप की प्रशंसक बन जातीं, लेकिन ट्रंप इस मामले में भी अनाड़ी साबित हुए।

भाइयों, मुझे तो ट्रंप के बयान से मेलोनी और भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मधुर संबंधों के प्रति जलन की बू आ रही है। वे शायद मोदी जी सहित सारी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि जिसको मोदी टॉफियां देकर खुश करते हैं और मुस्कुराते हुए क्लोजअप फोटो खिंचवाते हैं वह उनके साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांगती है, लेकिन मोदी की बात निराली है। ट्रंप क्या दुनिया का कोई भी नेता किसी भी मामले में मोदी की बराबरी नहीं कर सकता। मोदी उस देश के हैं जहां मित्रों के लिए कहा जाता है “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे ” और महिला मित्रों की प्रशंसा में कहा जाता है “चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल। ” ट्रंप और मोदी में भला क्या मुकाबला ? दुनिया जानती है कि “मोदी है तो मुमकिन है”। उधर अमेरिका के 80 वर्षीय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान को मेलोनी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और अप्रिय बयानबाजी का युद्ध छेड़ दिया है। लोग सच ही कहते हैं कि बढ़ती उम्र कई लोगों की बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। ट्रंप मेलोनी की नजरों में भी खलनायक बन गये। “नायक नहीं खलनायक है तू, जुल्मी बड़ा दुखदायक है तू”।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बांझ…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆

☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

वह सुकुमार सी कली

जो नाजो से थी पली

जो चिड़ियों सी चहकती थी

जो मोगरे की खुशबू सी महकती थी

जिसके पायल की आवाज से

सुबह खिलखिलाती थी

जिसके आरती के बाद

रात जवान हो जाती थी

जिसकी सांसों को सुनकर

पुरवाई चलती थी

उसकी मुस्कान से

उसकी गृहस्थी की

ज्योत जलती थी

 

वह आज गुमसुम

चुपचाप शांत है

शायद कोई बात है

जिससे भयाक्रांत है

उसकी आंखों में वेदना

झलक रही थी

आंसू की धार

उसके पलकों से छलक रही थी

अपने हृदय में कोई पीड़ा

वह छुपाए जा रही थी

ससुराल में उसकी उपेक्षा

 उसे अंदर ही अंदर

खाए जा रही थी

घर का हर सदस्य उससे

 एक सवाल पूछ रहा था

जिसका जवाब

उसे नहीं सूझ रहा था

 

उसने कठोर नियम का पालन किया

हर विधि को पवित्रता से पूर्ण किया

हर पूजा स्थल के

चौखट पर माथा टेका

चमत्कार की आशा से

सब की तरफ देखा

हर बड़े चिकित्सक से मिली

पर उसके मन की कली नहीं खिली

उसने आधुनिक आईवीएफ का भी प्रयास किया

पर यहां पर उसने भी

उसे निराश किया

पति और घर वाले

 उसकी उपेक्षा करने लगे

वह तो एक बांझ है

सब तिरस्कार से कहने लगे

बांझ शब्द उसके कानों में

पिघले शीशे सा लगने लगा

उसके नारीत्व का अपमान

चोट खाए नागिन सा धीरे-धीरे जगने लगा

वह लोगों के तानों से टूट गई

उसकी खुशी उससे

 सदा के लिए रूठ गई

 

उसने आत्मबल से

एक कठोर निर्णय लिया

अपने पति को

उसमें सम्मिलित किया

वह एक बाल आश्रम में

अपने पति संग गई

वहां पर एक बच्ची को

गोद लेने की बात कही

सारी कागजी कार्रवाई के बाद

कुछ माह पश्चात

उन्हें किया गया याद

वह बच्ची उन्हें

गोद दी गई

उनकी कानूनी रजामंदी

अधिकारी के समक्ष ली गई

 

बच्ची को गोद लेकर

वह खुशी-खुशी घर आई

घर के हर कोने को सजाया

मिठाई लोगों में बटवाई

उसके जीवन में नई सुबह हुई

दूर हुई दुःख भरी सांझ

बच्ची को गोद में लेकर

वह नाच उठी

उसकी भावनाओं की

सभी सीमाएं टूटी

और पूछ बैठी

ऐ बेदर्द जमाने

बता-

अब मुझे कौन कहेगा बांझ ? /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११२ – आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ११२ ☆

☆ आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

हम फिर से लौट चलें, सुरमई बचपन में,

सुप्त हुई बचपन की भावना, अब तो जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

नाव बनाकर कागज की, पानी में तैरा दें,

बच्चों के संग, बच्चे बन, फिर मुस्कान दिखा दें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

छत पर जाकर, पतंग उड़ाएं, कटी पतंगें लूटें,

जल्दी से मान भी जाएं, जल्दी से फिर रूठें,

समय के पीछे न चलकर, समय के आगे भागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

निष्कलंक हो, निश्छल हो, निष्कपट हो जाएं,

बच्चों जैसे, बच्चों के संग, बच्चों के हो जाएं,

क्षणभंगुर जीवन का सपना, सपनों से अब जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२६ ⇒ वर्क इज़ वर्शिप ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वर्क इज़ वर्शिप…“।)

?अभी अभी # १०२६ ⇒ आलेख – वर्क इज़ वर्शिप ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शीर्षक अंग्रेज़ी में और निबंध हिंदी में ! जी हाँ, कुछ ऐसा ही होता था हमारे ज़माने में। जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती थी, वह भी इस मुहावरे का बड़े आत्म-विश्वास के साथ प्रयोग करता देखा जा सकता था। बर्क इज बर्शिप एंड लव इज ब्लाइंड, यू नो।

यह अंग्रेजों का मुहावरा है, जिसका आज़ादी के बाद भारतीयकरण कर दिया गया। वर्क को हिंदी में कर्म कहते हैं। प्रेम की तरह ये दोनों ही ढाई आखर के हैं। इन दोनों हिंदी अंग्रेज़ी शब्दों की केमिस्ट्री देखिये, कितनी मिलती जुलती है। वर्क मने कर्म ! यही हिंदी अंग्रेज़ी प्रेम है, जिसके हम आज भी कायल हैं।।

अंग्रेज़ चले गए, नेहरू छोड़ गए, जिन्होंने वर्क इज़ वर्शिप को आराम हराम है, कर दिया। वे पूजा में नहीं, काम में विश्वास रखते थे। कर्म को ही काम भी कहते हैं। काम ही पूजा है। अगर विश्वास न हो तो खजुराहो का एक ट्रिप मार आएँ, जहाँ रजनीश के अनुसार सभी मूर्तियाँ समाधि अवस्था में हैं।

अंग्रेज़ भारत में पहले कर्म अर्थात् व्यापार करने आए। धंधा अच्छा चल निकला तो कर्म को पूजा से जोड़ दिया। खुद साहब बन बैठे और देश को गुलाम बना दिया। प्रसाद स्वरूप कुछ सिविल सर्वेंट भी बँटवारे के समय भारत में छोड़ गए। जो काम पूजा था, वह सेवा हो गया। आज़ादी के बाद सेवा ही पूजा हो गई।।

हम बड़े धार्मिक लोग हैं। जो सेवा करता है, उसके बदले दान दक्षिणा तो बनती ही है। एक शब्द और, टिप के रूप में, अंग्रेज़ हमें दे गए, बख्शीश ! हमारे आदर्श संस्कारों ने इसे बहुत ज़ल्द मान्यता भी दे दी। करोगे सेवा तो पाओगे मेवा। कर्म ही पूजा है, कर्म ही सेवा है। गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं, हम बिना गीता पढ़े कह सकते हैं, अनासक्त कर्म कर, फल की चिंता तू मत कर। तू मत कर। अरे भोले, अर्जुन सदाशिवराव मतकर !

एक कर्म की दूकान भी होती है, जहाँ कर्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे वर्कशॉप भी कहते हैं। केवल पाठशाला ही नहीं होती, कार्यशाला भी होती है। महिलाओं की शॉपिंग से बढ़कर कोई कर्म नहीं ! ख़ाली दिमाग़ को शैतान का प्रशिक्षण केंद्र अर्थात devil’s workshop भी कहा जाता है। कर्म में कुशलता ही workmanship कहलाती है।।

सेवा ही पूजा है ! हम कितने भी उन्नत और प्रगतिशील क्यों न हो जाएं, लता जी का गीत तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, ही हमारा आदर्श रहेगा। हम पूजा और सेवा को अलग नहीं कर सकते। कर्म को पूजा समझें, या सेवा को पूजा, बात एक ही है।

सच तो यह है कि खाली पेट न तो सेवा होती है, और न ही पूजा। समय, काल और परिस्थिति अनुसार कभी रोटी और प्याज़ तो कभी बर्गर-पिज़्ज़ा ! पेट पूजा काम दूजा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “शहर बदलतंय, पण” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “शहर बदलतंय, पण…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

झालं असं की,

सकाळी रोजच्याप्रमाणे फिरणं झाल्यावर कट्ट्यावर गप्पांची मैफिल रंगलेली. राजकारण, टीव्ही सिरियल, क्रिकेट या नेहमीच्या विषयांवरुन चर्चेची गाडी बेफाम वाढणाऱ्या शहरांवर आली.

“आपलं शहरसुद्धा फार मोठं झालयं”

“मोठं???? चारही बाजूंनी बेसुमार वाढलयं. ”

“हो ना. कित्येक नवीन जागा तर माहितीही नाहीत. ”

“हे सगळं गेल्या वीस वर्षात घडलं”

“नवीन येतेय पण जुन्या वास्तु एकेक करून आठवणीत जातायेत. वाईट वाटतं. ”

“इट्स ओके, जे होतंय चांगल्यासाठीच होतंय. डोन्ट बी इमोशनल, ”डॅडींच्या बोलण्यानं वादाला तोंड फुटलं. स्वतःला आधुनिक विचारांचे समजणाऱ्या डॅडींचे टोकाचे विचार अनेकदा वादाचं कारण व्हायचे. आजही तेच झालं.

“फ्रेंडस जगा बरोबर बदलत रहा. बी प्रॅक्टिकल” डॅडी वदले.

“गपा हो, जेव्हा बघावं तेव्हा प्रॅक्टिकल, प्रॅक्टिकल जप करता. तुम्ही भावनाशून्य असलात तरी जग नाही”आप्पा एकदम उसळले.

“आप्पा, पर्सनल जायचं काम नाही. मी जनरल बोललो आणि मान्य करा किवा करू नका बदल होणारच. आठवणींचे कढ काढण्यापेक्षा नव्याबरोबर अडजेस्ट करणं हेच शहाणपणाचं आणि फायद्याचं होईल” डॅडी.

“या शहरात आयुष्य घालवलं. खूप बदल पाहिले, अनुभवले पण आताचा बदल फारच वेगळायं. ”आप्पा.

“वेगळा वगैरे काही नाही. आता आपलं शहर महानगर झालयं. माय डियर, धिस इज डेव्हलपमेंट, आय लाइक धिस ग्रोथ” बोलताना डॅडींच्या चेहऱ्यावर चमक होती.

“वी ऑल्सो लाइक ग्रोथ, बट अँट व्हॉट कॉस्ट”

“म्हणजे, समजलं नाही. ”डॅडी.

“खूप नवीन गोष्टी आल्या आणि अजूनही येतायेत. मोठाले रस्ते, अवाढव्य इमारती, शिक्षण संस्था, ब्रॅंडेड दुकानं, हॉटेल्स आणि आणखी बरंच काही.. ”

“मग चांगलचं आहे की… आरामदायी जगण्यासाठी हेच तर पाहिजे. ”

“फार एकांगी विचार करता. तुम्हांला मुद्दाच लक्षात येत नाहीये. ”आप्पा.

“ओके, समजावून सांगा. ” 

“नवीन शहरात आपलेपणा वाटत नाही. सगळं अनोळखी वाटतं. शोरूम आणि घर यात जो फरक आहे तोच.. ”

“म्हणजे”

“खूप चकचकीत, डोळे दिपवणारं शोरूम कितीही आकर्षक, चांगलं असलं तरी परकं वाटतं याउलट घराविषयी मात्र जिव्हाळा असतो. प्रेम असतं. ”

“यू आर राईट” डॅडी 

“आठवणींच्या ढिगाऱ्यावर उभं असणारं नवीन शहर खूप मोठं, आधुनिक, व्यवहारी आणि दिखाऊ आहे. आमच्यासारख्यांना अजूनही शहराविषयी प्रेम, अभिमान आहे पण आता “आपुलकी” मात्र वाटत नाही. ”आप्पा बोलायचे थांबले. कट्टयावर एकदम शांतता. आपल्या शहराविषयी वाटणारी परकेपणाची भावना ही प्रत्येकाचीच वेदना.

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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