आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२५ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २५ ☆ आचार्य भगवत दुबे
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नष्ट जहाँ संस्कृति समूल हो,
जहाँ ताक पर हर उसूल हो,
वहाँ पुलिस, कानून, न्याय में
परिवर्तन आमूल-चूल हो।
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आजादी की अर्ध सदी का,
लेखा, नेकी और बदी का,
हाल राष्ट्र का वैसा ही है
ज्यों कीचड़ से भरी नदी का।
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पुत्रों को, टकसाल पिता है,
होता रहा हलाल पिता है,
जो था पूज्य, वृद्ध होने पर
अब जी का जंजाल पिता है।
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भूखे श्रम की पीर वही है,
फटे हाल तस्वीर वही है,
चापलूस चमचमा गये हैं,
पर, पद दलित कबीर वही है।
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कोई दृश्य ललाम न आया,
मन-वाँछित परिणाम न आया,
कितना भटकाया तृष्णा ने
मन का तीरथ धाम न आया।
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© आचार्य भगवत दुबे
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बेहतरीन अभिव्यक्ति