डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘पेपर लीकेज का जिन्न‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

पेपर लीकेज के मसले ने सरकारों की नींद आराम कर दी है। पूरे देश में हंगामा बरपा है। सरकारों को लगता है ये आंदोलनकारी जेन-ज़ी नहीं, बोतल से निकले जिन्न जी हैं। अभी तक ये कहां छिपे बैठे थे? समझ में नहीं आता कि इन्हें वापस बोतल में कैसे बन्द किया जाए। ये चुपचाप पुलिस की लाठियां खाकर भागने वाले, किताबों में डूबे रहने वाले संस्कारी छात्र अचानक जिम्मेदार लोगों से आंख में आंख डालकर सवाल कैसे करने लगे? घोर कलियुग! उस पर तुर्रा यह कि इनके साथ जेन-अल्फ़ा भी कुसंस्कार सीख रहा है, यानी बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबहान अल्लाह।

देश के बहुत से सयाने लोग लड़कों के नारों और उनके द्वारा प्रदर्शित प्लेकार्डों से दुखी हैं। ‘हाय,हाय, ये नेताओं के लिए कितनी गन्दी भाषा लिख और बोल रहे हैं। इनके संस्कार कहां गये?क्या इनके मां-बाप ने इन्हें यही सिखाया था? न किसी की शर्म, न लिहाज। राम, राम।’

कुछ दूसरे सयाने जवाब देते हैं— ‘हमारी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को कौन से संस्कार सिखाये हैं? संसद में सांसद दूसरे दलों के सांसदों के लिए कैसी भाषा का उपयोग करते हैं? सभी बड़े मंदिरों में रोज़ चोरी की खबरें आती हैं, परीक्षाओं के पेपर लीकेज से छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है, पार्टियों को खुले आम तोड़कर सरकारें बनायी जाती हैं, बड़े-बड़े सन्त जेल की हवा खा रहे हैं, सिद्ध भ्रष्ट बड़ी कुर्सियों पर बैठे हैं, चतुर लोग बैंकों का हज़ारों करोड़ हज़म करके विदेश में मौज कर रहे हैं, हजारों करोड़ से बने पुल उद्घाटन से पहले गिर रहे हैं, नयी बनी एक्सप्रेस-वे चटक रही हैं, नये बने एयरपोर्ट पहली बरसात में चौधार आंसू टपका रहे हैं, महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की नयी बनी मूर्तियां हवा के झोंके से गिर रही हैं। यह सब नयी पीढ़ी देख रही है और समझ रही है, इसलिए उस पर हमारे नैतिकता के भाषणों से कोई असर नहीं होने वाला। ये कोई दूध-पीते बच्चे नहीं हैं। इस पीढ़ी के पास हमसे ज़्यादा समझ है। वह हमारी पीढ़ी के पाखंड को खूब समझ रही है।’

सुन कर संस्कारों की दुहाई देने वाले सयाने मौन साध लेते हैं।

सरकारों में भगदड़ मची है। इस लीकेज को कैसे बन्द किया जाए। कमेटियां बन रही हैं। कुछ पकड़-धकड़ भी हुई है। कमेटियों से सुझाव आता है कि  लीकेज के दोषियों के लिए सख़्त सज़ा का प्रावधान हो। दस साल की सज़ा और दस करोड़ जुर्माने पर सहमति बनती है।

एक मसखरा सवाल करता है, ‘अपराधी के पास दस करोड़ की संपत्ति नहीं हुई तो वसूली कैसे होगी?’

छात्र इन सुझावों पर आपत्ति करते हैं, कहते हैं, ‘ये सब लीकेज के बाद के उपाय हैं। इनसे छात्रों का नुकसान कैसे पूरा होगा? अंग्रेज़ी की कहावत के अनुसार घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल का दरवाज़ा बन्द किया जाएगा। सरकार यह बताये कि लीकेज रोकने के लिए क्या किया गया है।’

सरकारें फिर परेशान हैं। फिर कमेटियां बैठती हैं। फिर मगजमारी होती है। लीकेज रोकने के सुझाव मांगे जाते हैं। छात्रों की तरफ से सुझाव आता है कि परीक्षाओं का पूरा काम सौ प्रतिशत ईमानदार और कठोर निर्णय लेने वाले अधिकारियों को सौंपा जाए। अब सौ प्रतिशत ईमानदार अधिकारियों की खोज में दौड़भाग शुरू होती है। तुरन्त ‘ऑनेस्टी टेस्टिंग मीटर’ तैयार करवाए जाते हैं और सौ से ज़्यादा अधिकारी इन मीटरों से लैस होकर देश के कोने-कोने में निकल पड़ते हैं। उच्च अधिकारी सारे वक्त उनसे रिपोर्ट लेते हैं।

ज़्यादातर मामलों मैं रिपोर्ट मिलती है कि  ईमानदार तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन अब तक सौ प्रतिशत वाला बन्दा नहीं मिला है। उच्च अधिकारी माथे का पसीना पोंछते हैं, कहते हैं, ‘कोई बात नहीं। लगे रहो। कामयाबी ज़रूर मिलेगी।’

तो भाइयो, सौ प्रतिशत ईमानदार खोजने की कोशिश अभी ज़ारी है। हम भी दुआ करते हैं कि अधिकारियों को इस काम में जल्दी सफलता मिले। वैसे यह गांधी और बुद्ध का देश है। यहां सौ प्रतिशत ईमानदार आदमी नहीं मिला तो बड़ी नककटई हो जाएगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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