आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – दोहा सलिला।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९३ ☆
☆ दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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घाट लहर से कह रहा, दो पल की मेहमान।
लहर कहे- युग युग जिए, तू होकर बेजान।।
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दिल दिलवर के नाम कर, कहता है दिलदार।
दिल सुकून पाए बजा, जरा दिलरुबा यार।।
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नादां कली अनार की, हो गुलाब पर मुग्ध।
सावन की बरसात मेँ, हाय हो गई दग्ध।।
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पैंजन घुँघरू से कहे, मत कर तू झंकार।
गाँव न जागे पाँव से, पाँव मिले ले प्यार।।
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पगडंडी पग चूमकर, करती दूर थकान।
राज मार्ग पर बढ़ थके, पैर हुए बेजान।।
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गमले में पौधा हरा, झुलसा तरु सह घाम।
यह बारिश में गल गया, वह पनपा बेदाम।।
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मुझसे मुझको ले दिया, मुझको मुझको मौन।
जिसने उससे बढ़ कहो, कारीगर है कौन?
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खुदको खुद मुझको दिया, खुद होकर चुप दूर।
दूर उसे जो मान लें, आँखें रहते सूर।।
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तूतूमैंमैं कर थके, तू-तू मैं-मैं रोज।
तू मैं मैं तू हम हुए, है चहरे पर ओज।।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
६.९.२०२६
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