मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – मुफ़लिस, मज़हब और भूख…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
मुफ़लिस (निर्धन, दरिद्र) की का कोई,
मज़हब नहीं होता।
उसे मज़हब से कोई गुरेज,
कोई परहेज़ नहीं होता।
लंगर, “सुलेमान” का हो या “घनश्याम” का,
“गुरबचन” का हो या “अब्राहम” का।
हर जुलूस के पीछे चल देता है वह,
हर रंग का झंडा थाम लेता है वह
उसे मिले दोने में..
एक ही मजहब होता है,
“इंसानियत” का,
जो उसके पेट की भूख मिटा दे।
उसकी तृप्त आत्मा, वहीं शीश झुका देती हैं।
क्षुधा की शांति, मोक्ष प्राप्ति से
कम नहीं लगती उसे।
जो उसका पेट भर दे,
उसी मज़हब को मान लेता है वह…!!
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





