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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – मेरे घर विश्व हिन्दी सम्मेलन  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव  मेरे घर विश्व हिन्दी सम्मेलन  (विश्व हिन्दी दिवस 2018 पर विशेष) (श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी का e-abhivyakti में स्वागत है। प्रस्तुत है श्री विवेक जी का विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे आयोजनों  पर एक सार्थक व्यंग्य।) इन दिनो मेरा घर ग्लोबल विलेज की इकाई है. बड़े बेटी दामाद दुबई से आये हुये हैं , छोटी बेटी लंदन से और बेटा न्यूयार्क से. मेरे पिताजी अपने आजादी से पहले और बाद के अनुभवो के तथा अपनी लिखी २७ किताबो के साथ हैं . मेरी सुगढ़ पत्नी जिसने हिन्दी माध्यम की सरस्वती शाला के पक्ष में  मेरे तमाम तर्को को दरकिनार कर बच्चो की शिक्षा कांवेंट स्कूलों से करवाई  है, बच्चो की सफलता पर गर्वित रहती है. पत्नी का उसके पिता और मेरे श्वसुर जी के महाकाव्य की स्मृतियो को नमन करते हुये अपने हिन्दी अतीत और अंग्रेजी के बूते दुनियां में सफल अपने बच्चो के वर्तमान पर घमण्ड अस्वाभाविक नही है.  मैं अपने बब्बा जी के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सेदारी की...
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English Literature – Poetry – The Guest – Ms Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra The Guest (The English version of Ms. Neelam Saxena Chandra's   poem revealing the truth of life  पाहुणा )   I am myself on this earth Like a guest, I don’t have the right To call the house as mine, To call the things as mine, To call the jewellery as mine!   Relationship is also not mine, Relatives are also not mine, You are also not mine, I am also not yours, Everything is but an illusion!   There is only one truth- We have come to this earth only for a little while And if we can spend it with love, It will be the best! © Ms Neelam Saxena Chandra...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – पाहुणा – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा पाहुणा (जीवन के कटु सत्य को उजागर करती सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी की  मराठी कविता।) मी स्वत: आली आहे या जगात एखाद्या पाहुण्या सारखी, मला कुठे हक्क आहे घराला आपलं म्हणण्याचा, सामानाला आपलं म्हणण्याचा, दागिन्यांना आपलं म्हणण्याचा?   संबंध पण माझे नाहीत, नातेवाईक पण माझे नाहीत, तू पण माझा नाही, मी पण तुझी नाही; फक्त एक भ्रामक कल्पना आहे!   सत्य एकच आहे, थोड्या वेळा साठी आपण आलो आहोत जगात, आणि त्यात जर असेल, फक्त प्रेम व स्मित हास्य, की मग मी भरून पावले!  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – मन तो सब का होता है – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ मन तो सब का होता है   मन तो सब का होता है बस, एक पहल की जरूरत है।   निष्प्रही, भाव - भंगिमा चित्त में,मायावी संसार बसे कैसे फेंके यह जाल, मछलियां खुश हो कर, स्वयमेव  फंसे, ताने-बाने यूं चले, निरन्तर शंकित  मन  प्रयास  रत है बस एक पहल की जरूरत है।   ये, सोचे, पहले  वे  बोले दूजा सोचे, मुंह ये, खोले जिह्वा से दोनों मौन, मुखर -भीतर एक-दूजे को तोले रसना कब निष्क्रिय होती है उपवास, साधना या व्रत है बस एक पहल की जरूरत है।   रूकती साँसे किसको भाये स्वादिष्ट लालसा, रोगी को रस, रूप, गंध-सौंदर्य, करे -मोहित,विरक्त-जन, जोगी को ये अलग बात,नहीं करे प्रकट वे अपने मन के, अभिमत हैं बस एक पहल की जरूरत है।   आशाएं,  तृष्णाएं  अनन्त मन में जो बसी, कामनायें रख इन्हें, लिफाफा बन्द किया किसको भेजें, न समझ आये नही टिकिट, लिखा नहीं पता कहाँ पहुंचे यह ,बेनामी खत है बस एक पहल की जरूरत है। © डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’...
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English Literature – Book-Review/Abstract – Layers of flickering lights – Ms. Neelam Saxena Chandra

Layers of flickering lights A poetry collection by Authorspress India, written by Ms. Neelam Saxena Chandra Poetry collection of 101 wonderful poems which try to describe the voyage to the ultimate equilibrium between the mind and heart through poetry. Excerpts from the book –Layers of flickering lights THE WIND AND THE LEAF Puff! Puff! Puff! Blew the wind. It was not only harsh, but ruthless too… destroying everything that came its way. A little leaf had just sprouted and it was also full of hope… it made everything optimistic that came its way. The vindictive wind learnt about the buoyant leaf and began gusting and raging around it, surrounding it with fury and frenzy. It intimidated it, It unsettled it, It threatened it. And yet, the leaf kept smiling, undeterred. Seeing the audacity of the leaf, the wind finally blustered so raucously that the leaf could no longer survive and it gave up, ah! so bravely. Optimism and hope does lose at times, but then the fact that it persisted and flourished brings a smile on the lips of all positive seekers. Amazon Link : Layers of flickering lights ...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – आंख है भरी भरी – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय आंख है भरी भरी (श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी यह व्यंग्य  आपको  आँख मारने की कला  एवं  बीमारी  के परिणाम और दुष्परिणाम  दोनों की तह तक ले जाएंगे । ) गंगू बेचारा पोस्ट आफिस के काउंटर की लाइन में चुपचाप खड़ा है एक घंटे से। गंगाजल की बोतल खरीदने आया है। अचानक एसडीएम साहब की सुंदर सी बीबी बिना लाइन में लगे, काउंटर पर हाथ डाल देती है, एक घंटे से लाइन में लगे गंगू का नंबर आया और ये सुंदर सी महिला ने  लाइन में लगे गंगू का हाथ बाहर कर अपना हाथ डाल दिया। गंगू ने गुस्से से देखा तो आंख फड़क गई, महिला और उसके साथ आये गार्ड को लगा कि गंगू ने जानबूझकर आंख मारी है। मामला गड़बड़ा गया, महिला ने पति को फोन कर दिया और आंख मारने की बात बता दी। पति एसडीएम था अहंकार से चूर तुरंत पुलिस फोर्स भिजवा दी। इस देश में यही खराबी है कोई बड़ा आदमी आंख मार देता है...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – माझा मॉर्निंग वॉक – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस माझा मॉर्निंग वॉक (प्रस्तुत है  सुश्री ज्योति हसबनीस जी  का "मॉर्निंग वॉक "पर आधारित  एक मनोरंजक आलेख।) उशिर झालाच शेवटी निघायला असं पुटपुटत भराभर बगिचा गाठला आणि गोल गोल चकरा मारायला सुरूवात केली , तीन चार चकरांनंतर पावलांचा वेग आपोआपच थोडा मंदावला , आणि नजरही अगदीच नाकासमोर  चालायचं सोडून चुकार मुलासारखी आजूबाजू भिरभिरायला लागली , एव्हाना अगदी गडीगूप असलेले कानही भवतालचे आवाज टिपण्यात अगदी गुंतून गेले कुहूकुहू चा गोड आवाज कानी साठवून घेतांना आज भारद्वाज दिसावा असं मनात येतंय तेवढ्यात  मी एकदम दचकलेच .....केवढं गडगडाटी हास्य कानावर आदळलं कुठूनतरी ..कुठल्या दिशेने हा गडगडाट होतोय याचा वेध घेतेय तर काय ..दोन्ही हात कंबरेवर ठेवून मागे झुकून आकाशाच्या दिशेने आ वासत एक हाफ चड्डी t shirt मधलं महाकाय धूड एकटंच हास्याची आवर्तनांवर आवर्तनं पार पाडत होतं ..! बापरे ...केवढी एकरूपता , तन्मयता , आजूबाजूच्यांचा विसर पाडणारी ! आणि केवढी ही अघोरी तपश्चर्या ...आजूबाजूच्यांना हादरवून सोडणारी गडगडाटी वातावरणाचे जराही तरंग चेहऱ्यावर उमटू न देता न डगमगता एक सुशांत मूर्ती अत्यंत स्थितप्रज्ञपणे समोरच्याच बाकावर सुखासनात बसलेली आणि ओंकाराच्या...
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रंगमंच नाटिका – “राह” – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नाटिका राह (स्मरण महीयसी महादेवी वर्मा जी: १)  संवाद शैली में संस्मरणात्मक लघु नाटिका   १. राह एक कमरे का दृश्य: एक तख़्त, दो कुर्सियाँ एक मेज। मेज पर कागज, कलम, कुछ पुस्तकें, कोने में कृष्ण जी की मूर्ति या चित्र, सफ़ेद वस्त्रों में आँखों पर चश्मा लगाए एक युवती और कमीज, पैंट, टाई, मोज़े पहने एक युवक बातचीत कर रहे हैं। युवक कुर्सी पर बैठा है, युवती तख़्त पर बैठी है। नांदीपाठ: उद्घोषक: दर्शकों! प्रस्तुत है एक संस्मरणात्मक लघु नाटिका 'विश्वास'। यह नाटिका जुड़ी है एक ऐसी गरिमामयी महिला से जिसने पराधीनता के काल में, परिवार में स्त्री-शिक्षा का प्रचलन न होने के बाद भी न केवल उच्च शिक्षा ग्रहण की, अपितु देश के स्वतंत्रता सत्याग्रह में योगदान किया, स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण कार्य किया, हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व श्रीवृद्धि की, अपने समय के सर्व श्रेष्ठ पुरस्कारों के लिए चुनी गयी, भारत सरकार ने उस पर डाक टिकिट निकाले, उस पर अनेक शोध कार्य हुए, हो रहे हैं और होते रहेंगे। नाटिका का नायक एक...
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हिन्दी साहित्य- कविता – गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा – डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल

डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल   गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा  (e-abhivyakti पर डॉ उमेश चंद्र शुक्ल जी का स्वागत है। गंगा-जमुनी तहजीब को याद दिलाती सामयिक रचना को सादर नमन। )   अपने हर एक दर्द का, खुद ही दवा हो जाऊंगा, लफ्जों से तुम बाँट दो, फिर से खड़ा हो जाऊंगा ॥1॥   आईने को कितना तुम छलते हो, यूँ छलते रहो, जिंदगी के रास्ते पर, चल खरा हो जाऊंगा ॥2॥   सब्ज बागों के कसीदे, नारों से संवाद हैं, अपने हर एक लफ्ज का, खुद आईना हो जाऊंगा ॥3॥   उर्धगामी चेतना, संस्कार की थाती सजो, तुम गिराने पर तुले हो, तुल बड़ा हो जाऊंगा ॥4॥   हम न हिन्दू-सिक्ख-मुस्लमा, गंगा-जमुनी तहजीब हैं, खींच न दीवार, सवालों में सजा हो जाऊंगा ॥6॥   माँ के आँचल पर, न स्याही-खून के छींटे ‘उमेश’ गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा ॥7॥   ©  डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल...
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मराठी साहित्य – कथा/लघुकथा – बीज अंकुरे अंकुरे – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस बीज अंकुरे अंकुरे (प्रस्तुत है  सुश्री ज्योति हसबनीस जी  की मानवीय सम्बन्धों पर आधारित व्यावहारिक लघुकथा 'बीज अंकुरे अंकुरे')  'चालव रे, चालव सपसप हात जरा, तोंड आवर आता ! '  घामाच्या धारांनी निथळत असलेला माळी त्याच्या सहकाऱ्यावर डाफरला ! आकाशात ढगांची जमवाजमव झाली होती , हलकं वारं आणि सळसळती पानं जणू  पावसाच्या आगमनाची वर्दीच देत होती . माती, खत , साऱ्याचा एक मोठ्ठा ढेपाळलेला ढिगारा  , वाफ्यातल्या उपटलेल्या शेवंतीचा बाजूला पडलेला भारा , कीटकनाशकाचं भलं मोठं बोचकं , आणि ह्या साऱ्या अस्ताव्यस्त पार्श्वभूमीवर सारं वेळेवारी आटपेल ना ह्या विवंचनेत ओढगस्त चेहऱ्याने बागेत अस्वस्थपणे येरझारा घालणारी मी ! जवळ जवळ प्रत्येकच मान्सूनमध्ये हे चिरपरिचित दृष्य आमच्या बागेत हमखास बघायला मिळतं . सगळ्या बागकामाचा फडशा एकट्याने पाडणारा आमचा माळी मात्र आताशा एका सहकाऱ्याला बरोबर आणायला लागला होता. त्यांचं मातीखतात बरबटणं, झाडांना सुबक कापून शिस्तीत वाढवणं, रोपं लावणं, फुलवणं, निगा राखणं, अधून मधून आपला कसबी हात बागेवरून फिरवत तिचा चेहरा मोहरा पाsर बदलवणं, वर्षभर किती विविध कामं सफाईदारपणे पार पाडतात ही मंडळी ! अगदी हातावरचं...
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