हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९५ ☆ गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९५ ☆

गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी☆ श्री संतोष नेमा ☆

लेकर हाथ कनक  पिचकारी |

होली   खेलें   कृष्ण   मुरारी ||

झूम-झूम   कर   नाचे   राधा,

निरखें  सखियाँ     बारी-बारी ||

लेकर हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

मिटी  सभी  आपस  की  दूरी।

हुई   कामना   सबकी  वी पूरी।

रँग    खुशी  के  बिखर  रहे  हैं, 

मिली   प्रेम   की   है   कस्तूरी।

 लगे न  युवती आज    कुँवारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

आज   शत्रु  भी  लगता  भाई।

होली    ने    दुश्मनी    मिटाई ।

पढ़ते  आज  सभी  मिल मानो,

सधे   प्रेम   के    अक्षर    ढाई।   

मन   भाए   हैं।  हृदय  बिहारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फूला     टेसू     भी    इतराये |

रंगों    का   मतलब  समझाये।

मन   भाती  फूलों   की  होली ,

रंग – रसायन     हमें  न   भाये।

गारी  आज  लगे  अति   प्यारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फागुन  बौरा  कर  ज्यों  आया |

रंग   प्यार   के  अद्भुत   लाया ||

ढोल – मृदंग  चंग   सब   बाजें,

सबका   हृदय    देख    हर्षाया।   

मिलता  है  “संतोष”  सभी  को,

आज    उड़ेलो    मस्ती    सारी ||

लेकर  हाथ  कनक   पिचकारी |

रँग    खेल   रहे   कृष्ण  मुरारी ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का..

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४२ ⇒ रेसिडेंसी एरिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया।)

?अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।

हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।

आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।

इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।

देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।

सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।

अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।

कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।

नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८५ – जास्वंद…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८५ – विजय साहित्य ?

☆ जास्वंद…!

(अक्षरछंद… पंधराक्षरी)

(शीर्षक – औषध खासे.)

ज्या सुमनाचे,‌ चित्र काढता

दिसतो देव

त्या मोरयाची,‌जास्वंद फुले,

पुजेत ठेव. १

*

पाच पाकळ्या, गर्भ रेशमी,

घेर अनोखा

तुरा शोभतो, फुलातुनी‌ ज्या,

झुलतो झोका. २

*

लाल,भगवा, छटा आगळ्या,

कातर पाने

रंगपंचमी, नाजूक कांती,

रंग दिवाणे.३

*

नको सुईने, हारात गुंफू,

वाहू‌ चरणी

जास्वंदीची, फुले अनोखी,

नाचे धरणी. ४

*

तेल औषधी,त्वचा निरोगी,

किती फायदे

केस त्वचेला, देई तजेला,

गोड वायदे.५

*

अर्क काढूनी, तेल करावे,

औषध भारी

चूर्ण करोनी, चहा करावा,

तो गुणकारी. ६

*

गजाननाच्या,शिरी शोभते,फुल जास्वंदी

निसर्गातले, औषध खासे,

करे आनंदी…७

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ द्वैत… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ द्वैत… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

आल भरुन आकाश

फक्त तुझ्यासाठी .

मी होईन पाऊस

फक्त तुझ्यासाठी .

मयूर मी नृत्यातुर

फक्त तुझ्यासाठी .

वारा होईन बेभान

फक्त तुझ्यासाठी .

वृक्ष होउन भिजेन

फक्त तुझ्यासाठी .

पक्षी होउन गायीन

फक्त तुझ्यासाठी .

मी झुूरेन मरेन

फक्त तुझ्यासाठी .

जन्मोजन्मी जन्म माझा

फक्त तुझ्यासाठी .

तुझ्या विना जगणे

सांग कशासाठी ?

द्वैत एवढेच आता

फक्त माझ्यासाठी .

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # सीनें में जलन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # सीनें में जलन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

#सीनें में जलन… ऑंखों में तूफ़ान… #

…. तो आला, त्यानं पाहिलं आणि त्यानं सगळ्या भारतीय सिनेसृष्टीला आणि लोकांच्या हृदयाला जिंकून घेऊन एक अनभिषिक्त सम्राटाचं पद अनेक दशकं गाजवतं राहीला….स्वप्नं बघायची… ती पूर्णत्वास नेताना संघर्ष करायचा… आणि ती स्वप्नं सत्यात उतरावयाची याचा वस्तुपाठच त्याने आजवर केलेल्या शेकडो सिनेमातून तरूणाईलाच नव्हे तर तमाम लोकांना दिला… अन्याय घडो कुठेही.. इट का जवाब पत्थरसे देना… आणि आपल्या साध्या सरळ मार्गी दैनंदिन व्यवहारात जर कुणी आडदांडपणा करून त्रास देत असेल व त्यास दादापुता करूनही ऐकत नसेल तर… खेल तुम्हने शुरू किया तो खत्म हम कर देंगे.. ही अन्यायाविरूद्धची , नाहक पिळवणूकी विरुद्धची लढाई एकट्या खांद्यावर कशी लढायची याचं प्रशिक्षण तो देत गेला… यंग अंग्रीमॅन हा त्याने अशा विविध पैलूंच्या भूमिका साकारून मिळवला तो उगाच नाही… त्याचे खदिरांगासारखे आग ओकणारे डोळे जेव्हा आपल्याला दिसतात तेव्हा आता अन्याय कर्ता, जुलूम कर्त्याची आता काही खैर नाही हे हाणामारी आणि दे दणादण मारपिट पटातून आपल्या दिसून येते…पूर्व सुरीचा हिंदी चित्रपटातील रोड रोमियो ची असलेली नायकाची प्रतिमा त्याने आपल्या कलेच्या अदाकरीने बदलून टाकताना… नायकातली नजाकत आणि शांत डोक्याचा मुत्सद्दी  खलनायक रंगवताना नकारात्मक नायकाचे गुणधर्म जास्त भावतात…काहीवेळा तर त्याच्या नायकाची प्रतिमा आपल्या रसिक मनावर इतकी बिंबली गेली असल्याने त्याने हा खलनायक रंगवला आहे हेच मुळी पचनी पडत नाही…राग जितका टोकाचा त्याला दाखवता आला तितकेच प्रेमाचे, मोहब्बतेचे, इश्काचे नजारे सुध्दा अगदी संयत दाखवून दिले… तो ज्या चित्रपटात असेल त्या चित्रपटातील नायिका त्याच्यावर फिदा होताना पडद्यावर वर दिसायच्या पण पडद्या बाहेर खाजगी जीवनात देखील त्या नायिका ‘ ‘हाय मैं मर  जावाॅं’ करत अपनी जिंदगी न्यौछावर करायला मागे पुढे पाहत नसत… किंबहुना काहींना तर  त्याच्या प्रेमाचा सिलसिला असाच अखंड चालू राहावा असचं वाटल्याने त्यां आजही अतुट प्रेमापोटी त्याच्यासाठी  ‘ नजर लागी सय्या तोरे बंगले पे’ आळवत मैं तुलसी तेरे ऑंगन की बनून राहिल्या… पण आपल्या मनातील ही होणारी चलबिचल मात्र त्याने चारचौघात कधीही चर्चेवर दिसणार नाही याची काळजी घेतली… अफवा, कंडम गाॅसिप के चर्चे तर हर जुबान पर होत राहीले… असा हा हरहुन्नरी  कलावंत आपल्या अभिनयाच्या जोरावर रसिकांच्या मनावर अधिराज्य गाजवत राहीला… उत्तुंग उंचीवर पोहचला आणि या सम हाच असा एकमेवाद्वितीय राहिला…निसर्गाच्या नि नियतीनेही तशात त्याला असे काही फटकारले तेव्हा तर तो काळाच्या पडद्याआड लुप्त होता होता त्याच्या सतीच्या पुण्याईने  तारले… कलावंताला घडवता येत नसते तर तो घडत जात असतो ,पैदाईशीच असतो..याला आपल्या अलौकिक कीर्तीच्या अंहकाराने छेद देत कलावंत निर्मितीची प्रशाळा आपले सगळे तनमन नि ओतून उभा केली… पण नियतीला ते साफ ना मंजूर होते आणि त्याला क्षणात होत्याचे नव्हते केले… चलती हुई गाडी दलदलमें फस गई… तोपर्यंत यंग अंग्रीमॅन चा करिष्माही संपलेला होता… बाजारू चलनी नाण्यांचा अभिनेत्यांचा  खणखणाट सुरू असल्याने त्याला रोड पतीची अवकळा आली होती… पण इथं  नियतीचे दान त्याला  अनुकूल  असे पडले.. कौन बनेगा.. च्या टि. व्ही.  छोट्या पडद्यावर तो आला.. आणि पुन्हा त्याने आपल्या कलेची झलक दाखवून द्यायला सुरुवात केली.. बघता बघता ती कलावती अधिक जोमाने दौडत निघाली… पुनश्च त्याला उत्कर्षाचे दिवस लाभले… आणि मग खऱ्या अर्थाने म्हणू लागला मेरे पास अब पहलेसे ज्यादा सबकुछ है.. बंगला है, गाडी है,ढेर सारा पैसा है, दौलत है, आज पहले जैसे क्या नही मेरे पास…तुमही बताओ…हां एक गोष्ट मात्र तुम्हाला सांगायची राहून गेली…माझा पहिल्या भरभराटीच्या काळातले अवतीभवतीचे माझे माझे म्हणणारे लोक मात्र माझ्या पडत्या काळात सोडून गेले आणि आता  मधूचा सुवास येताच  माशा पुन्हा घोंगावू लागल्यात… एक गोष्ट माझी मात्र अजूनही तशीच साथ देतेय ती तीस पैश्याची पुत्तूशेठ बीडी कालही होती तशीच आजही माझ्या ओठांवर शिलागावून बसलेली आहे… ना तिची चव बदलली ना तिला माझ्या श्रीमंतीने लाथाडले… म्हणूनच मी तिला जवळ ठेवले आहे… तिच्या मदतीनेच मी माझ्या नैराश्याचा धूर बाहेर सोडत असतो… आणि बीडीचे जळणारे लालचुटूक थोटूकाची ठिणगी मला जगण्याची सतत उर्मी देतं असतं…

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ … ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

अभंगांतून गीतेचे तत्वज्ञान

देह बुद्धी नष्ट होऊन भक्तिमार्गाने परब्रम्ह प्राप्त झाले, म्हणजे जन्म मरणाच्या चक्रातून माणसाची सुटका होते, हे तत्त्वज्ञान आहे. परंतु तुकाराम महाराजांना पांडुरंगाची अखंड भक्ती करून त्याची सेवाच करायची आहे. त्यांना मुक्तीची चाड नाही, म्हणून त्यांच्या एका अभंगात त्यांनी स्पष्ट म्हटले आहे,

आमुचे उचित/ हेचि उपकार/

आशपुलाची भार/ घालू तुज//

 आमच्या योगक्षेमाचा भार देवा तुझ्यावर घालून स्वस्थ बसणे हेच उचित आहे.

 मी भक्त व तू माझा हरी, अशी द्वैतभावना तुकाराम महाराजांच्या अभंगातून दिसत असली

 तरी अद्वैत झाल्याशिवाय, खरा भक्त असूच शकत नाही हे त्यांच्या अभंगातून दिसणारे गीतेचेच तत्त्व आहे. ते अभंगातून स्पष्ट सांगतात,

दुजेखंडे तरी/ उरला तो अवघा हरी/

आपण बाहेरी/ नलगे ठाव धुंडावा//

इतुले जाणावया जाणा/ कोड तरी मने मना/

पारधीच्या खुणा/ तेणेची जाणाव्या//

तुकाराम बुवा या अभंगात काय सांगतात? मनानेच मनाला जाणले पाहिजे. जो पारधी असतो तो शिकारीचा शोध कसा घेतो, हे दुसरा पारधीच जाणतो. आपला हरी हा आपल्या जवळच आहे, तो दुसऱ्या ठिकाणी शोधायची गरज नाही.

 देह आधी काय खरा/ देहसंबंध पसारा/

 बुजगावणे चोरा/ रक्षणसे भासते//

 तुका करी जागा/ नको वासपू वाऊगा/

 आहेस तू अंगा/ अंगी डोळे उघडी//

तुकाराम महाराज निजरूप विसरून एक प्रकारे झोपी गेलेल्यास जागे करतात, आणि सांगतात की तू भिऊ नकोस. अद्वैत रूप हरी तुला सापडेल, कारण तू स्वतःच परमात्मरूप आहेस. तुझी आत्मदृष्टी उघडी ठेवशील तर तुला हा बोध होईल.

थोडक्यात महाराजांना इथे असे सांगायचे आहे, की संपूर्ण विश्वात, चराचरात जो परमात्मा भरलेला आहे, तो तुला तू जर डोळे उघडे ठेवलेस तरच दिसू शकेल. आपल्याला एखादा माणूस सहज कुठेतरी भेटतो, आणि आपली मदत करून जातो. परमेश्वराच्या रूपानेच आपल्याला मदत करण्यासाठी तो आलेला होता याची मात्र आपल्या देहधारी माणसाना जाणीव नसते.

भगवंताने अर्जुनाला काय सांगितले?

“तुझे सर्व कर्म मला अर्पण कर.” तुकाराम महाराजही मुमुक्षुंना हेच सांगत आहेत.

आहे ते सकळ/ कृष्णासी अर्पण/

नकळता मन/ दुजे भावी//

म्हणून पाठे/ लागतील भुते/

येती गिवसित /पाच जणे/

(पंचमहाभूते, ज्यापासून माणसाचे शरीर बनले आहे)

 ज्याचे त्या वंचले/ आठव न होता/

दंड हा निमित्त कारणे/ तुका म्हणे//

अर्थात सर्व कर्मे हरीची असून त्याची त्याला अर्पण करायची आठवण न ठेवल्यामुळे, माणूस जन्म मरणाच्या चक्रात सापडतो, त्याला दंड मिळतो.

तुकाराम महाराज पुन्हा पुन्हा गीतेत आलेल्या धर्म रक्षणाचे महत्त्व जीवनात का आहे ते त्यांच्या अभंगातून सांगतात, त्याचप्रमाणे शांत मनोवृत्तीचे महत्व ते समजावून सांगतात.

शांती परते नाही सुख/ येर अवघेची दुःख/

म्हणवुनी  शांती धरा/ उतराल पैलतीरा//

अंगी भरती आधी व्याधी/ तुका म्हणे त्रिविध ताप/ मग जाती आपोआप//

 मन जेव्हा शांत असेल, त्याचवेळी सर्व दुःखांचा नाश होऊन पैलतीरास जाणे सोपे होईल.

साळंकृत कन्यादान/ पृथ्वीदानाच्या समान/

परिते न कळे या मुढा/ येईल कळो भोग पुढा//

आचरता कर्म/ भरे पोट राहे धर्म/

सत्या देव साहे/ ऐसे करूनिया पाहे//

अन्न मान धन/ हे तो प्रारब्ध आधीन/

तुका म्हणे सोसे दुःख/ आता पुढे नासे//

गीतेतील कर्मयोग महाराजांनी या अभंगात भक्तांना सांगितला आहे. या ठिकाणी त्यांनी तत्कालीन वर्णाश्रमधर्माचे महत्त्व लक्षात घेतले आहे. प्रत्येकाने आपल्या धर्माला अनुसरूनच कर्म केल्याने दुःख राहत नाही असा या अभंगातून त्यांनी उपदेश केला आहे.ज्याप्रमाणे

कृष्णाने पार्थास त्याच्या क्षात्र धर्माचे पालन करण्यास सांगितले.

क्रमशः… 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ आत्मनिर्भर — भाग – २ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? जीवनरंग ❤️

☆ मुखवटे — भाग – २ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले 

(ड्रायव्हरने दिलेल्या पत्त्यावर बरोबर कार नेली. एका सोसायटीमध्ये रो हाऊसच्या रांगेत एका बंगल्यासमोर कार उभी राहिली. बाहेरची पाटी मात्र सांगत होती, हे कोणा कर्नल पाटणकर यांचे घर आहे. श्री व सौ पाटणकर.)

इथून पुढे – – 

भार्गवने पुढे होऊन बेल वाजवली. बऱ्याच वेळाने एका मध्यमवयीन बाईनी दार उघडलं. नीटनेटक्या. अंगावर भारी साडी आणि उत्तम रहाणीमान असलेल्या बाईनी दार उघडलं.

“कोण हवंय आपल्याला? मृदु स्वरात त्यांनी विचारलं. भार्गव म्हणाला मकरंद साने इथेच रहातात ना? पत्ता हाच दिलायआम्हाला. ’

हो हो. या ना आत या. ”बाईनी दोघांना घरात घेतलं. हॉलमध्ये बसवलं.

“कोण आलंय ग ममा? ”विचारत आतून पूर्ण दिवस भरत आले असावेत अशी मुलगी बाहेर आली. तिने ढगळ गाऊन घातला होता. साधीसुधी दिसायला अगदीच बेताची पण सरळ वाटणारी मुलगी त्यांना म्हणाली या ना. कोण आपण? ”

भावना चमकलीच तिला बघून”. तुम्ही लीना साने का? मकरंद ची मिसेस? आम्ही त्याच्या पुण्याच्या ऑफिसचे सहकारी. मी भावना वझे आणि हे भार्गव परचुरे”लीनाच्या आईने त्यांना पाणी दिलं.

“ मकरंद जरा बाहेर गेलाय. येईलच इतक्यात. लीनाचे रिपोर्ट्स आणायला गेलाय तो.

फार काळजी घेतो हो तो आमच्या लीनाची. मी आई लीनाची. हा बंगला आमचाच आहे. लीनाचे कर्नल बाबा आता हयात नाहीत. लीना आमची एकुलती एक मुलगी. मकरंदशी लीनाने प्रेमविवाह ठरवला.

मकरंद अनाथ होता गरीबच होता. लीनाच्या वडिलांना हे लग्न मान्य नव्हतं पण लेकीचा हट्ट.!

मग मकरंद घरजावई म्हणून इथे आला. लीना त्याच्या त्या चाळीतल्या एका खोलीत कशी राहू शकली असती? पण मुलगा चांगला आहे हो. ” ममा भडाभडा बोलत सांगत होत्या.

आता लीना म्हणाली, ”कधी बोलला नाही मकरंद मला, की इतकी सुंदर मुलगी त्याची कलिग आहे ते. ”

भावना संकोचून हसली.

लीना म्हणाली “मकरंदचं माझ्यावर जिवापाड प्रेम आहे. मला काही जरी झालं तरी तोच आधी कासावीस होतो. आत्ता सुद्धा स्वतः रिपोर्टस् आणायला गेलाय. म्हणूनच तर रजा घेतलीय त्यानं. फक्त माझ्यासाठी.

“मग लीना, तू कधी नोकरी नाही केलीस का? भावनाने विचारलं.

“ करत होते मी. पण मकरंदला मी नोकरी केलेली आवडत नाही. ‘तू घरी बस. मला बायकांनी बाहेर नोकऱ्या केलेल्या आवडत नाहीत. मी मिळवतोय ना भरपूर? ’ असं म्हणतो तो. ”अभिमानाने लीना म्हणाली.

भार्गव आणि भावनाने नकळत एकमेकांकडे बघितलं.

“ हाच मकरंद ऑफिसमध्ये तावातावाने वाद घालायचा. ‘घरी बायका नुसत्या बसतातच कशा? आपल्या शिक्षणाचा उपयोग नको का करायला? कसल्या या मुली हो. ’.. भावना, मला तुझं फार कौतुक वाटतं हं. आमच्या बरोबरीने पगार मिळवतेस तू. मला नवऱ्याच्या जिवावर आयते बसून खाणाऱ्या बायका अजिबात आवडत नाहीत. ”, मकरंदची सगळी वक्तव्ये आठवली भावनाला.

इथे लीना सांगत होती, मकरंदला तिने नोकरी केलेली आवडत नाही. तेवढ्यात मकरंद आला. त्याला बघूनही आश्चर्य वाटलं भावनाला.

ऑफिसमध्ये टिपटॉप असणारा मकरंद आत्ता गबाळ्या म्हणाव्या अशाच टी शर्ट पँट मध्ये होता.

“ममा, लीनाचे सगळे रिपोर्ट्स नॉर्मल आहेत हो. काळजीचे काहीच कारण नाही. मी डॉक्टरांना भेटून आलो. कारमध्ये पेट्रोल भरलं. आणखी काही आणायचं असलं तर यादी द्या. संध्याकाळी आणतो. ”

“मकरंद उरलेले पैसे ममाकडे दे”. लीना म्हणाली. रिपोर्ट्स आणि पैसे मकरंदने ममांच्या हातात ठेवले.

इतक्यात त्याचं लक्ष समोर सोफ्यावर बसलेल्या भार्गव आणि भावनाकडे गेलं. मकरंद दचकून उभाच राहिला.

… अत्यन्त खऱ्याखुऱ्या आश्चर्याने त्याने विचारलं “तुम्ही इथं कसे? ” त्याला शॉकच बसलेला दिसत होता. आता भार्गव म्हणाला,

“अरे. माझं आपल्या हेड ऑफिस मध्ये काम होतं. तू अशी मधेच अचानक का रजा घेतलीस काहीच समजलं नाही. तर म्हटलं भावनाला, चल भेटून येऊया मकरंदला. ”प्रांजलपणे भार्गव म्हणाला.

ममा म्हणाल्या “अहो. आता मकरंदला कसं जमेल ऑफिसला पुण्याला यायला? लाडक्या बायकोची डिलीव्हरी जवळ आली आता. मी तर म्हणते दे सोडून नोकरी” ममा म्हणाल्या. “काही गरज नाहीये त्याला नोकरीची. माझं ते सगळं लीनाचंच तर आहे. म्हणजे मकरंदचंच. अर्थात माझ्या पश्चात हं.. आत्ता नाही. ”

त्या घरात मकरंदची काय किंमत होती हे दिसलंच की मगाशी. लीनाने उरलेले पैसेही ममाना दे असं फर्मावलं तेव्हाच.

मकरंद घरजावई झाला होता. केवळ याच्या रूपावर भाळून लीनाने याच्याशी लग्न केलेलं दिसलं आणि मग ती म्हणेल, सासू म्हणेल तसं जगणं मकरंदने निमूट स्वीकारलेलं दिसलं भार्गवला आणि भावनाला.

एका नोकराने सगळ्याना चहा आणून दिला. मकरंदची अवस्था अत्यंत अवघड झालेली होती.

भावनाला त्याने सांगितलं होतं, “ माझी बायको दुर्मुखलेली आहे आमचं पटत नाही. मी घटस्फोट घेणार आहे. ”

… आणि आता प्रत्यक्ष चित्र वेगळंच दिसत होतं. चक्क दिवस गेलेले दिसत होते त्याच्या बायकोला.

म्हणे आमचा वर्षानुवर्षे संबंध येत नाही.

माय लेकींनी मकरंदचे अगदी पायपुसणे करून टाकलेले दिसले भावनाला. किती अपराध्यासारखं जिणं जगत होता मकरंद.

चहा संपवून भावना आणि भार्गव जायला निघाले.

“कळव ग लीना बाळ झालं की. ”… मकरंदकडे मुद्दाम बघत भावना खोचून म्हणाली.

“हो तर. येईलच की मकरंद पेढे घेऊन ऑफिसला. ” ममा म्हणाल्या. “ पण मला नाही वाटत तो नोकरी करील. नाही का ग लीना? ”

मकरंद गप्प उभा होता.

“बरंय मकरंद. छान वाटलं तुम्हाला भेटून. ”भार्गव म्हणाला.

त्यांना निरोप द्यायलासुद्धा मकरंद बाहेर आला नाही.

कार मध्ये बसल्यावर भावना आणि भार्गव निःशब्द होते.

भार्गवला मकरंदची दया आली

न राहवून तो भावनाला म्हणाला, ”काय ग हे. इतका चांगला मुलगा पण घरजावई होऊन सगळं गमावून बसलाय. किती सामान्य आहे ग ती लीना. दिसायला याच्या जवळपास तरी आहे का? मूर्ख आहे मकरंद. ”भावना काहीच बोलली नाही. येतानाचा तिचा उत्साह ओहोटीला लागला आता. अचानक भावनाला हसू आलं. ”भार्गव. किती रे गाढव असेन मी. पण मला आता सुटल्या सारखं का वाटतंय? म्हणजे मी खरी गुंतले नव्हतेच रे या मकरंदमध्ये.. ”

भार्गव म्हणाला”भावना, सहाजिकच आहे तुला हा शॉक बसणं. नशीब समज, थोडक्यात बचावलीस तू.

नाहीतर फसलीच असतीस या उनाड माणसाच्या जाळ्यात.

भावना म्हणाली” हो रे भार्गव. किती विश्वास ठेवला मी याच्यावर. काय वाटेल ते सांगत होता आपल्या बायकोबद्दल. प्रत्यक्ष तर ताटाखालचे मांजर आणि गुलाम झालाय त्या चढेल मायलेकींचा. बरं झालं मला तुझ्याबरोबर यायची बुद्धी झाली. म्हणे मी डिव्होर्स घेणार आहे. तोंड बघा. सोकावलाय तिथे रहायला. मग देतोय किंमत त्याची. त्या मायलेकींचा दास होऊन. हा कसला घेतोय डिव्होर्स. ”. भावना म्हणाली.

“भार्गव, मला पश्चाताप होतोय. अशी कशी मी याच्यात अडकले रे? तू परोपरीने सांगूनही माझा तुझ्यावर विश्वास बसला नाही. माझ्यावर विश्वास ठेवशील? मी त्याला मला आजपर्यंत हातसुद्धा लावू दिला नाहीये. बायकांना एक इनर सेन्स असतो, तो सावध करत होता मला, असं म्हण हवं तर. मला माफ कर भार्गव. ”खऱ्या खुऱ्या प्रांजलपणे भावना म्हणाली.

कार फूड मॉलला थांबली. ड्रायव्हर चहा प्यायला उतरला”. भावना चल कॉफी घेऊया मस्त पैकी”. भार्गव म्हणाला. भावना कॉफी टेबल जवळ बसली.

एक मिनिट. आलोच. तू ऑर्डर दे कॉफीची. भावना कॉफीची ऑर्डर देऊन आली.

भार्गव हातात गुलाबाच्या फुलांचा मोठा गुच्छ घेऊन आला. भर मॉल मध्ये गुडघ्यावर बसून तिच्या हातात तो गुच्छ देऊन म्हणाला will you marry me? ”

भावना लाजून लाल झाली. मॉल मध्ये एकच हशा उसळला आणि लोकांनी टाळ्या वाजवल्या.

भावना म्हणाली yes dear. i will, i will. ”

भावनाच्या डोळ्यातून अश्रू वाहू लागले. एक वृद्ध पारशी बाई म्हणाल्या “डिकरी लकी हायेस बाय. चांगला पोऱ्या आहे हा. बेस्ट लक. हो म्हणून टाक.”

लाजलेली भावना गाडीत जाऊन बसली. हसत हसत भार्गव मागून आला आणि म्हणाला”, माझी ऑफर कायम असणार म्हणालो होतो ना? आपलं पहिल्यापासून प्रेम आहे तुझ्यावर.. ”

त्याला घट्ट मिठी मारून भावना म्हणाली सॉरी. सॉरी माझ्या सगळ्या सगळ्या वेडेपणाबद्दल भार्गव. मला माफ कर मी चुकले. तुला ओळखलंच नाही रे मी. ”भार्गवने तिला जवळ घेऊन तिचे डोळे पुसले. चला आता घरी म्हणाला. कार घराच्या दिशेने धावू लागली.

समाप्त –

© डॉ. ज्योती गोडबोले

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ सौंदर्यदर्शनम्… ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

??

✦ सौंदर्यदर्शनम्… ✦ श्री दिवाकर बुरसे ☆

मी किचनकडे चाललो होतो तर बायको म्हणाली, ” चहा करणार असाल तर मला पण करा अर्धा कप, जास्ती नको. ” मी चहा करून तिला दिला. तिनं एक घोट घेतला अन् उद्गारली, ” वा, सुंदर, सुंदर झालाय! ” ” थँक्यू” माझी संयमित प्रतिक्रिया. तेवढ्यात दारावरची बेल वाजली म्हणून दार उघडले. घरात पाऊल टाकताच ऋद्धी उत्तेजित होऊन म्हणाली, ” आजोबा, काय सुंदर पिक्चर आहे हो ‘ दशावतार ‘. दिलीप काकांनी तर कमाल केलीय. सुंदर, अभिनय, सुंदर कोकण, सुंदर चित्रण, सुंदर दिग्दर्शन, व्वा! सुंदर भट्टी जमलीय. मजा आली. “

मला पंच्याहत्तर वर्षांपूर्वी पाठ्यपुस्तकात शिकलेली ग ह पाटलांची “देवा तुझे” ही सुंदर कविता आठवली…

देवा, तुझे किती, सुंदर आकाश

सुंदर प्रकाश सूर्य देतो ॥

सुंदर चांदण्या, चंद्र हा सुंदर

चांदणे सुंदर पडे त्याचे ॥

सुंदर ही झाडे, सुंदर पांखरे

किती गोड बरे गाणे गाती ॥

सुंदर वेलींची सुंदर ही फुले

तशी आम्ही मुले देवा तुझी ॥

इतुके सुंदर जग तुझे जर

किती तू सुंदर असशील!!

 

सौंदर्य—हे एक विलक्षण कोडं आहे!

जगाच्या प्रत्येक कणात, अणुरेणूत त्याचे अस्तित्व जाणवते, पण “हेच ते सौंदर्य” असे हातात घेऊन दाखवता येत नाही. अनुभवांच्या अनंत रंगपंचमीमध्ये विहरताना एकच प्रश्न मनात पुन्हा पुन्हा उगवतो, हे सौंदर्य म्हणजे नवकी आहे तरी काय? त्याची व्याख्या, त्याचे स्वरूपवर्णन, त्याची मिमांसा कशी करावी?

सूर्यास्ताची केशरी प्रभा, बाळाच्या चेहऱ्यावरची निष्पाप, निरागस स्मितरेषा, स्वरांच्या विलोभनीय विभ्रमातून झुळझुळणारा माधुर्यझरा, तरल कवितेतील भावाविष्कार, सद्गुणी माणसाच्या कृतीतून प्रकटणारे औदार्य, आर्तता, करुणा, या साऱ्यात अनामिक अशी एकच छटा असते, – ती म्हणजे सौंदर्याची अनुभूती. हे दृश्य नाही, वस्तू नाही; हे तर मनाच्या स्पर्शातून उमलणारे एक नाजूक भावतत्त्व आहे.

“सौंदर्य” हा शब्दच स्वतः अर्थपूर्ण आहे—

‘सु’ म्हणजे उत्तम आणि ‘अंदर्य’ म्हणजे रूप-गुणांचा संगम. त्यामुळे सौंदर्य केवळ बाह्य रूपांत नसून अंतर्गत लय, संतुलन, माधुर्य व समरसतेचा अविष्कार आहे.

पाश्चात्य तत्त्वज्ञानी आणि भारतीय आचार्यांनी या संकल्पनेला विविध कोनांतून उजाळा दिला आहे.

– – प्लेटो म्हणतो, “Beauty is the splendor of truth” —सत्याचा तेजस्वी झगमगाट म्हणजेच सौंदर्य.

– – अरिस्टॉटलच्या दृष्टीने सौंदर्य हे Order, Symmetry and Definiteness—क्रम, प्रमाण आणि स्पष्टतेत सामावलेले असते.

– –कांटच्या मते सौंदर्य म्हणजे disinterested pleasure—स्वार्थरहित, शुद्ध आनंद.

– – भारतीय परंपरेत भरतमुनींच्या नाट्यशास्त्रातील रससिद्धांत सौंदर्याच्या अनुभूतीचे केंद्रस्थान आहे. ‘रसोत्पत्ती’ म्हणजेच भावांचे सूक्ष्म स्पंदन मनात जागविणे; हेच कलात्मक सौंदर्याचे सर्वोच्च ध्येय.

✦ *सौंदर्याची वैशिष्ट्ये*

सौंदर्य हे केवळ पाहण्यात नसून जाणण्यात आहे. त्याची काही वैशिष्ट्ये—

१. संतुलन – जिथे अतिरेक नाही, तिथे सौंदर्य वसते. जसे स्वर-तालाची समतोल संगती.

२. लय – विश्वाचा नित्य प्रवाहातच लय आहे; पानांची हालचाल ते हृदयाची ठोके—सर्वत्र लय.

३. समरसता – विविध घटकांची एकात्मतेने झालेली सुंदर संगती.

४. माधुर्य – मनाला शांत करणारी, कोमल करणारी गोड, हवीहवीशी वाटणारी स्पंदने.

५. अहंकारशून्यता – जिथे ‘मी’ विरतो आणि अनुभवात मन पूर्णपणे लीन होते, तोच सौंदर्याचा परम क्षण.

 

भारतीय सौंदर्यमीमांसा

भारतीय चिंतनात सौंदर्य हे “सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्” या त्रिसूत्रीमध्ये दडलेले आहे. ‘सुंदर’ म्हणजेच ‘सत्य’ आणि ‘शिव’ यांचे तेजस्वी रूप. भरतमुनींचे नाट्यशास्त्र, आनंदवर्धनाचा ध्वन्यालोक, अभिनवगुप्तांचे अभिनवभारती—हे सारे ग्रंथ सौंदर्यदृष्टीची अंतरंगातील दिशा दाखवतात.

रससिद्धांतानुसार कला म्हणजे रसनिर्मिती—अलौकिक, शुद्ध आणि उत्कट आनंदाचा अनुभव. शृंगारातील प्रेम, करुणेतून उमटणारी विषादलहरी किंवा वीररसमध्ये जाणवणारा पराक्रम—ही सर्व सौंदर्याची विविध रूपे.

भारतीय तत्त्वज्ञान सांगते की सौंदर्य वस्तूत नसते, तर रसग्राही मनात जन्मते. म्हणूनच एकाच दृश्यात एखाद्याला सौंदर्य दिसते, तर दुसऱ्याला कदाचित नाही—अनुभूतीची क्षमता भिन्न असते.

 

पाश्चात्य सौंदर्यमीमांसा

पाश्चात्य विचारसरणीने सौंदर्याला स्वतंत्र तत्त्व म्हणून प्रतिष्ठा दिली आहे.

प्लेटो—सर्व दृश्य-सौंदर्य हे परम आदर्शरूपाचे प्रतिबिंब.

अरिस्टॉटल—कला म्हणजे वास्तवाचे सर्जनशील अनुकरण (Mimesis).

कांट व हेगेल—बुद्धी आणि भावनांच्या समतोलातून सौंदर्य प्रकटते.

टॉलस्टॉय—कला म्हणजे भावनांचा संवेदनांद्वारे प्रसार.

– – या सर्व उक्ती एकच सांगतात—सौंदर्य हे दिसण्यात नव्हे, तर भावना, अर्थ आणि अभिव्यक्तीच्या संगमात असते.

 

✦ *कलेतील सौंदर्य*

.. कला म्हणजे सौंदर्याचा मूर्त अविष्कार!

.. चित्रकलेत रंग-रेषांची नृत्यलय,

.. संगीतामध्ये स्वर-तालाची समरसता,

.. कवितेत शब्द-अर्थ-भावनांची रेशीमगाठ

… कलाकाराच्या अंतर्मनातील स्पंदन जेव्हा रूप घेतं, तेव्हा सौंदर्याचा जन्म होतो.

 

✦ *निसर्गातील सौंदर्य*

निसर्ग हे सौंदर्याचे शुद्धतम रूप!

पहाटेचा शीतल, आल्हाददायक, सुगंध, वाऱ्याची हलकीशी सळसळ, समुद्राच्या लाटांची नित्य लय, फुलांचा बहर, पावसाची रिमझिम—या प्रत्येक क्षणातून सौंदर्य अमृतधारेसारखे ओघळते. निसर्गच कलाकाराला प्रेरणा देणारा पहिला गुरू आहे.

 

✦ *मानवी जीवनातील सौंदर्य*

मानवी सौंदर्य हे देहात नाही, तर माणसाच्या वर्तनात, संस्कारांत, विचारांत असते.

नम्र वाणी, प्रामाणिकपणा, सहानुभूती, परदु:खात सहभागी होण्याची क्षमता—हेच खरे सौंदर्य. करुणा, रुजुता, कोमलता, त्याग, परोपकार या सद्गुणांत लपलेली दिव्यता कोणत्याही चित्रापेक्षा श्रेष्ठ.

 

✦ *सौंदर्य आणि अध्यात्म*

सौंदर्याचा सर्वोच्च अनुभव हा अध्यात्मिक आहे!

जेव्हा मन द्वैत-अद्वैताच्या सीमेपलीकडे जाऊन एकत्व अनुभवते, तेव्हा सौंदर्याचे गूढ स्वरूप उलगडते. भारतीय परंपरेत ब्रह्म हेच “सत्य-शिव-सुंदर” मानले आहे; म्हणूनच सौंदर्याचा शोध हा देवत्वाच्या शोधाशीच जोडलेला असतो.

 

✦ *सौंदर्याचे सार्वत्रिक अस्तित्व*

सौंदर्य अथांग आहे.

ते दगडातही असते आणि फुलातही, सागराच्या लाटात, मेघांच्या गडगडाटातही आणि श्रावणाच्या झडीतही. कधी हसण्यात उमलते, तर कधी अश्रूतून ओघळते. मातेला आपल्या बाळात दिसणारे सौंदर्य आणि वैज्ञानिकाला प्रयोगात जाणवणारे सौंदर्य—दोन्ही एकाच भावविश्वाचे रूप.

सौंदर्याला सीमा नाहीत; ते अखंड वाहणाऱ्या अस्तित्वाची दिव्य संगती आहे.

 

✦ *उपसंहार*

सौंदर्य ना केवळ डोळ्यांनी दिसते, ना केवळ बुद्धीने समजते—ते हृदयात स्पंदते. त्याचा अनुभव म्हणजे एक शुद्ध, नाजूक, परम आनंदाचा क्षण. सौंदर्य हे सत्याचे, शिवाचे, आणि जीवनाच्या मौलिकतेचे रूप आहे.

आपल्याकडे पाहण्याची दृष्टी असेल, तर जगातील प्रत्येक क्षणात, प्रत्येक श्वासात, प्रत्येक कणात सौंदर्य उमलत राहते.

कारण सौंदर्य म्हणजेच ईश्वराचे स्वरूप—

कणाकणात वास करणारे, ब्रह्मांड व्यापूनही अंगुष्ठमात्र उरलेले, अनंत असणारे—

सत्यं, शिवं, सुंदरम्!

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ भांड्याला भांडं लागणारच! ☆ सौ. ज्योती कुळकर्णी ☆

सौ. ज्योती कुळकर्णी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ भांड्याला भांडं लागणारच! ☆ सौ. ज्योती कुळकर्णी ☆

भांड्याला भांडं लागणारच! 

आणि… 

लागले की नाद होणारच! 

याचा सरळ अर्थ खरं म्हणजे असाच आहे, की तोंडाला तोंड लागलं म्हणजे वाद होणारच! पण हे सरळ कुणाला सांगितलं तर आणखी कितीही तोंडं तोंडाला लागू शकतील आणि किती वाद वाढतील याचा नेम नाही. म्हणून आपण म्हणतो भांड्याला भांडं लागलं की नाद होणारच! तसेही आपल्याला मधून नादमय बोलायची सवय असतेच नं! म्हणूनही आपण तसं म्हणतो.

आमच्या माहेरी मंजुळ नादा मध्ये बोलायची कोणाला सवय नव्हतीच! घर एवढं मोठं की अशा मंजुळ नादात बोललं तर कोणाला हाकाही ऐकू येणार नाहीत आणि दिलेलं उत्तरही ऐकू येणार नाही. खाली-वर आम्ही आणि काका असं राहत असू. काही निरोप द्यायचा असेल तर शंखनादासारखा आवाज करून बोलल्याशिवाय जागच्या जागून निरोप कसा देणार! थोडक्यात शंकराच्या डमरूमधून काय निघेल! अशा नादाची आम्हाला अतिशय सवय होती. कोणी हळू बोललं तर जेवलीस की नाही? अशी विचारणा व्हायची.

त्यातून आमच्या घरातही दुकानं आणि घरासमोरही दुकान ओळी. मग काय! माझे वडील प्रेस वाल्यालाही पापाराऽऽम कपडे घेऊन जा. असे मोठ्ठ्या आवाजात सांगायचे. दुसऱ्या दुकानदाराला, दाढीचं ब्लेडही खर्जाच्या आवाजात मागूनच बोलावून घ्यायचे. अशी भांड्याच्या नादापेक्षा तोंडाच्या नादाचीच आम्हाला फार सवय होती. त्यामुळे नादमय भांडे काय असतात हे माहितीच नाही. एकदा आमच्या घरात भाड्याने राहणारी कुमुद नावाची बहिणी सारखीच एक मुलगी आली घरी. माझ्या हाताने दोन भांड्यांना भांडे लागले. आवाज झालाच! ती अगदी त्रासिक चेहरा करून म्हणाली, ‘ए तो नाद थांबव. ‘ मी तिला ठामपणे म्हटले, ”असा काय भांड्यांचा झालेला नाद थांबवता थोडाच येतो! ” मग तिने मला सांगितले की त्या भांड्याला हात लाव म्हणजे नाद थांबतो. तेव्हा मला कळले, खऱ्या भांड्याला भांडे लागणे आणि लागल्यावर नाद होणे म्हणजे काय असते ते.

असेच आमच्या बहिणींचे तोंडाला तोंडं लागणे की भांड्याला भांडे लागणे असे वाद आणि नाद नेहमीच व्हायचे कधी रडा रड व्हायची तर कधी आम्ही त्याची मजा पण घ्यायचो. एकदा आम्ही सर्वांनी घरी आणलेली केळी खाल्लीत. पण माझ्या लहान बहिणीने एक केळ जास्त घेतले. तर मी लगेच तिच्याशी भांडायला लागले एक केळ जास्त का घेतलं म्हणून! तेवढ्यात वडील आले. आणि मला म्हणाले घेऊ दे घेतलं तर ती का तुझ्या बापाचं खाते. मी मनातच म्हटलं ‘माझ्या बापाचं नाही तर कोणाचं खाते आहे? मी आधी आली आहे नं! ‘ पण तेवढं काही म्हटलं नाही बरं मी. तेवढं सौजन्य होतं म्हटलं माझ्यात! पण तरी अकलेचे तारे तोडलेच मी! माझे वडील जमदग्नीचा अवतार असूनही धाडस करून त्यांना म्हटलंच. ती माझ्यापेक्षा लहान आहे म्हणजे माझ्यापेक्षा जास्त काळ जगणार आहे. म्हणून ती माझ्यापेक्षा भरपूर जास्त केळं जास्त खाईल. यावर त्यांना अक्षरशः हसावे, की रडावे, की आपल्या या दिव्य पोरीवर पंचारती ओवाळून टाकाव्यात असेच झाले असावे. मी मात्र बोलून टाकूनही स्थितप्रज्ञ वृत्तीने त्यांच्याकडे बघत होते. शेवटी त्यांनीच माझा नाद सोडला.

असे नाद नेहमीच काही भांड्याला भांडे किंवा तोंडाला तोंड लागूनच होतात असे नाही. तर कधी कधी एकाचेच तोंड वाजत राहते. आमच्या आजीने माझ्या आईला कामात थोडा आधार व्हावा म्हणून माहेरची एक बाई कामासाठी पाठवली होती. त्यांना आम्ही सगळे नानीबाई म्हणत असूं. तेव्हा अशा बऱ्याच विधवा आणि सोवळ्या बायका असायच्या. कामही करायच्या बिचाऱ्या. त्यांच्या काही अपेक्षाही नसायच्या फारशा. त्या एक दिवस मला कॉफी द्यायला विसरल्या. त्या गेल्या नंतर किती वेळा कॉफी प्यायले पण कॉफी पिताना नेहमी आईला म्हणायचे की नानीबाईच्या वेळची माझी कॉफी शिल्लकच राहिलेली आहे. एक दिवस तिने दोन कप कॉफी दिली मला आणि सांगितलं ही नानीबाईच्या वेळी ची कॉफी घे आणि ही आताची कॉफी घे आणि तुझा एका भांड्याने-तोंडाने वाजणारा नाद संपव एकदाचा! तरी हळूच पुटपुटलेच मी! एकाच वेळेला दोन कप कॉफी घेऊन मागची थोडीच भरून निघते. पण आईला आपली लेक माहिती असल्यामुळे कळलं की हिच्याकडे आता जास्त लक्ष देण्यात अर्थ नाही!

असो. असा एका तोंडाने होणारा वाद एकदा मी सासूबाईं सोबतही केला. त्या दर गुरुवारी सगळ्यांना उपास असतो म्हणून भाजी संध्याकाळी आणायच्या. सकाळी माणसांमधून जेवायला हे एकटेच म्हणून त्या सकाळी काही भाजी आणायच्या नाहीत. माझ्या मनात असायचंच. ह्यांना त्या दिवशी दोनदा भाजी मिळेल म्हणूनच त्या आणत नाहीत. बरं सासरी आल्यावर तरी चुपचाप बसावं की नाही? एकदा मी म्हटलंच. हळूच पुटपुटले बरं. तरी त्यांना ऐकू गेलंच. ह्यांना गुरूवारी दोनदा भाजी मिळेल नं! म्हणून गुरुवारी सकाळी भाजी आणल्या जात नाही. त्या काही आई थोडीच होत्या! सरळ कमरेला पदर खोचून दोन भांडे समोरासमोर आले होते. पण जाऊ दे म्हणून मी माझं भांडं गप्पच ठेवलं त्यांचं वाजलेलं ऐकत राहिले.

असे भांड्याला भांडे किंवा तोंडाला तोंडे लागतांना कधी नाद होतो तर कधी वाद! अशा नादातूनच शंकराच्या डमरूतून निघाले तसे अ ई ऊ ण ऋ ऌ क निघाले तर सुंदर बोलण्याची भाषा आणि लिपी तयार होते नाही का? …

(ता. क. : अजून शिल्लक असलेले पुन्हा केव्हातरी…)

© सौ. ज्योती कुळकर्णी

अकोला

मोबा. नं. ९८२२१०९६२४

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares