बालगंधर्व, ” ‘लोकमान्य’ टिळक आणि ‘कट्यार काळजात घुसली’ या चित्रपटात भूमिका केलेल्या आणि दिग्दर्शन केलेल्या सुबोध भावे यांच्या दृष्टिकोनातून लिहिलेल्या लेखांचा संग्रह..
मराठी रंगभूमी आणि चित्रपट सृष्टीतील एक चतुरस्त्र अभिनेता म्हणून आपण सुबोध भावे यांना ओळखतो. या पुस्तकाचे शब्दांकनकार अभय अरुण इनामदार आहेत.
प्रकाशकाच्या मनोगतात पुस्तक ‘उस्ताद’ असतात, जसं ‘उस्ताद’ ठरलेल्या वेळी रियाज करतात आणि शागिर्द समोर बसून ऐकतात. तसे हे पुस्तक व्यक्तीकेंद्रित न करता विचारकेंद्रित आहे..
पुस्तकाच्या अंतरंगात पाच विभाग केलेले आहेत..
पहिल्या विभागात सुबोध भावे यांनी त्यांची वैयक्तिक जडणघडण कशी झाली यावर भर दिला आहे. बालपणापासून पुण्यात वास्तव्य असल्यामुळे नाट्य, साहित्य क्षेत्र चांगले माहिती होते. लहानपणी शाळेत असताना नाटकात फारसा सहभाग घेतला नव्हता. परंतु कॉलेजला गेल्यानंतर रंगमंचावर त्यांचे मन रमले. कसं बसं कॉमर्स कॉलेज चालू होतं, पण नाटकात अधिक इंटरेस्ट होता. पुरुषोत्तम करंडक हा मानाचा करंडक कॉलेजला मिळवून देण्यात त्यांचा मोठा हातभार होता. पुढे या क्षेत्रातच त्यांनी प्रगती केली. हळूहळू टीव्हीवरील मालिकांमध्ये प्रवेश केला. पुण्यात भरत नाट्यगृहाच्या कट्ट्यावर बसून नाटकाच्या चर्चा करणे चालू असे. त्यांचे मन नोकरीत रमले नाही. जिच्याशी त्यांनी लग्न केले त्या मंजिरीने घराची बाजू सांभाळून धरली. आणि सुबोध भावे नाट्य-चित्रक्षेत्रात पूर्णपणे शिरले!
बालगंधर्वांची व्यक्तिरेखा साकार करताना त्यांना अनेक गोष्टींची जाणीव झाली. नाटकासाठी किंवा त्या सिनेमासाठी स्वतःची तब्येत योग्य कशी करावी लागते, व्यक्तिरेखेशी एकरूप होण्याच्या दृष्टीने त्यावेळेचा काळ, त्या व्यक्तीची वैशिष्ट्यं, त्याचं सादरीकरण या सर्व गोष्टी किती महत्त्वाच्या असतात ते सुबोध भावे यांच्या पुस्तकांमधल्या लेखांवरून दिसून येते.
‘बालगंधर्व’ मधील स्त्री व्यक्तिरेखेसाठी त्यांना किती कष्ट घ्यावे लागले हे या पुस्तकात त्यांनी
विस्तृतपणे लिहिले आहे. लोकमान्य टिळकांची भूमिका करताना केस पूर्ण काढलेले आणि त्याचवेळी इतर कुठल्या सिनेमा नाटकाचे प्रयोग आले की होणारी कसरत त्यांनी छान व्यक्त केली आहे. “कट्यार काळजात घुसली” या सिनेमाबद्दल सुबोध भावे म्हणतात की, “हा सिनेमा म्हणजे माझी ध्येयपूर्ती होती. ” या सिनेमाबद्दल त्यांच्या मनात एक उदात्त भावना होती. ‘कट्यार काळजात घुसली’ या सिनेमात शंकर महादेवन आणि राहुल देशपांडे यांनी संगीताची बाजू सांभाळली. सचिन पिळगावकर यांनी खाॅ साहेबाची भूमिका साकारली. स्वतः सुबोध भावेंनी सदाशिवची भूमिका केली. या सिनेमाने सुबोध भावे यांना नावलौकिक मिळवून दिला.
लोकमान्य टिळकांची भूमिका करताना प्रथम त्यांच्या मनावर दडपण होते. लोकमान्य टिळकांची करारी, कणखर, भारदस्त व्यक्तिरेखा आपण साकार करू शकू की नाही, याबद्दल सुरुवातीला मनात भीती होती.. परंतु एकदा भूमिकेत झोकून दिल्यावर मनापासून काम करणे हे सुबोध भावेचे वैशिष्ट्य त्यातून व्यक्त होते.
एकंदर पुस्तक वाचताना असं जाणवलं की ‘ *बालगंधर्व* ‘, ‘ *लोकमान्य टिळक’* आणि ‘ *कट्यार काळजात* *घुसली* ‘ हे तीनही पिक्चर्स आपण बघितले आहेत. तेव्हाही ते आवडले होतेच, पण हे पुस्तक वाचल्यावर सुबोध भावेंच्या दृष्टिकोनातून ते पुन्हा पहावेत असा विचार मनात आला.
कोणत्याही भूमिकेसाठी कलाकाराला किती कष्ट करावे लागतात हे या सुबोध भावे यांच्या कथनातून दिसून येते. तसेच जे जे घडलं ते प्रांजळपणे वाचकांच्या समोर त्यांनी उलगडून दाखवलेले आहे आणि ते अधिक सच्चे आहे.
सुबोध भावे म्हणतात, ‘ हा पुस्तक प्रपंच सर्वांच्या सहकार्याने घडून आला. शौनक अभिषेकींमुळे शास्त्रीय संगीत आयुष्यात आले. गवयाची नजर मिळाली आणि माझ्या आयुष्यातील हा महत्त्वपूर्ण टप्पा संगीतामुळे मला अनुभवता आला. ‘
सुबोध भावे मूळचे पुण्याचे, सदाशिव पेठी वातावरणात वाढलेले, स्वतःच्या कर्तृत्वाने पुढे गेलेला कलाकार म्हणून आपल्या मनात त्यांना कौतुकाचे स्थान आहे. हे पुस्तक वाचल्यावर ते कौतुक अधिकच मनात उतरते. अवश्य वाचावे असे हे पुस्तक ‘घेई छंद’
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा सन्नाटा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(शिक्षक दिवस पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुक्ता का भव्य सम्मान! ‘संभवम्’ संस्था ने किया सम्मान समारोह – हार्दिक बधाई अभिनंदन 💐🙏)
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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३७ ☆
☆ लघुकथा – सन्नाटा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
अब हमें यहां से चले जाना चाहिए। अपना घर अपना ही होता है। किस चीज़ की कमी है हमें? कम से कम हम उनके जीवन में बाधक तो नहीं बनेंगे? कहीं कल विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने के कारण एक-दूसरे से संवाद की स्थिति भी न बनी रहे और ताल्लुक़ बोझ बन जाएं; उस स्थान को छोड़ना ही बेहतर व श्रेयस्कर होता है।
– परंतु हम अकेले कैसे गुज़र-बसर करेंगे?
– जिनका कोई नहीं होता, वे भी जीवन जीते हैं।
– ऐसा मत कहो– बच्चे हैं, संभल जाएंगे। आज गुस्से में ग़ुबार निकाल लिया, अब शांत हो जाएंगे। तूफ़ान आने के पश्चात् व्याप जाती है…शांंति, अंतहीन मौन व सन्नाटा। चलो! भुला देते हैं यह सब… बचपन में ही तो बच्चे ग़लतियां करते थे और हम उनकी भूलों को सहज भाव से स्वीकारते थे। फिर आज ऐसा कठोर निर्णय क्यों?
इतना सुनते ही वे अलौकिक-असीम शांति में प्रवेश कर गए और घर में मातम-सा पसर गया।
हर दिन हमें जीवन की ओर से चौबीस घंटे का एक नया उपहार मिलता है।
लेकिन उन चौबीस घंटों में कुछ घंटे ऐसे होते हैं, जिनमें एक विशेष जादू छिपा होता है।
सुबह के पहले तीन घंटे।
रात और दिन के बीच का वह संधि-काल, जब आकाश धीरे-धीरे अपना रंग बदलता है, पक्षियों की आवाजें सुनाई देने लगती हैं, हवा में एक अनकही ताजगी होती है और संसार अभी पूरी तरह जागा नहीं होता।
भारतीय परम्परा ने ऐसे समय को ब्रह्ममुहूर्त के निकट का पवित्र समय माना है—वह समय जब वातावरण अपेक्षाकृत शांत और मन अपेक्षाकृत निर्मल होता है।
बुद्ध ने हमें स्मृति—अर्थात् जागरूक होकर जीने—का मार्ग दिखाया।
पतंजलि ने योग को चित्त की वृत्तियों के निरोध की दिशा में ले जाने वाली साधना कहा।
और हमारी प्राचीन जीवन-दृष्टि हमें बार-बार याद दिलाती रही है कि दिन की शुरुआत जैसी होती है, जीवन की दिशा भी अक्सर वैसी ही बनती जाती है।
तो क्यों न सुबह को केवल दिन की शुरुआत न मानकर—
अपने आप से मिलने का समय बनाया जाए? 🌿
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🌄 1. सूरज से पहले उठिए—दिन से पहले स्वयं से मिलिए
यदि सम्भव हो तो सूर्योदय से पहले उठिए।
उस समय उठना केवल जल्दी उठना नहीं है।
यह अपने लिए कुछ ऐसा समय बचाना है, जिस पर अभी दुनिया का कोई दावा नहीं है।
न फोन आपको बुला रहा है।
न ई-मेल आपका इंतजार कर रहा है।
न कोई मीटिंग सामने है।
न कोई समाचार आपको उत्तेजित कर रहा है।
कुछ देर के लिए—
आप और आपका जीवन आमने-सामने हैं।
बाहर निकलें।
धीरे-धीरे चलें या अपनी क्षमता के अनुसार जॉगिंग करें।
धरती को पैरों के नीचे महसूस करें।
आकाश को देखें।
सुबह की हवा को चेहरे से गुजरने दें।
🚶♂️ चलना केवल शरीर की गति नहीं है।
कभी-कभी यह मन को भी आगे बढ़ाता है।
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🤸 2. शरीर को जगाइए, केवल आँखों को नहीं
रात की निष्क्रियता के बाद शरीर को धीरे-धीरे गति दीजिए।
खींचिए।
झुकिए।
मोड़िए।
घुमाइए।
बलखाइए।
उछलिए।
योगासन करें, सूर्य नमस्कार करें, हल्की कसरत करें या अपनी उम्र और शारीरिक क्षमता के अनुसार कोई सहज व्यायाम करें।
लेकिन एक बात याद रखिए—
व्यायाम शरीर को दण्ड देने के लिए नहीं, उसे जीवन का उत्सव बनाने के लिए है। 🌿
जब शरीर गतिशील होता है और मन सजग रहता है, तब व्यायाम केवल शारीरिक क्रिया नहीं रहता।
वह एक प्रकार की साधना बन जाता है।
—
🌬️ 3. साँस को महसूस कीजिए
अब कुछ क्षण अपनी साँस के साथ रहिए।
गहरी, सहज साँस भीतर लीजिए।
धीरे-धीरे बाहर छोड़िए।
फिर से।
बिना किसी जल्दबाजी के।
🌬️ साँस भीतर—शान्ति।
साँस बाहर—तनाव।
साँस को बदलने की कोशिश करने से पहले उसे देखिए।
वह कैसे भीतर आती है।
कैसे बाहर जाती है।
कैसे एक साँस दूसरी साँस में बदल जाती है।
यही तो बुद्ध की स्मृति की सरल शुरुआत है—जो हो रहा है, उसे जागरूक होकर देखना।
कुछ मिनट अपनी साँस के साक्षी बनकर बैठिए।
आप पाएँगे कि साँस के साथ-साथ मन की गति भी धीरे-धीरे बदलने लगी है।
—
🌳 4. प्रकृति को देखिए—और इस बार सचमुच देखिए
हम प्रकृति के बीच रहते हुए भी प्रकृति को देखना भूल गए हैं।
सुबह एक बार कोशिश कीजिए।
पेड़ को देखिए। 🌳
पत्तियों की हलचल सुनिए। 🍃
पक्षियों का संगीत सुनिए। 🐦
आकाश के बदलते रंगों को निहारिए। 🌅
हवा के स्पर्श को महसूस कीजिए।
फूल को केवल “फूल” मत कहिए।
उसे देखिए।
उसका रंग देखिए।
उसकी सुगन्ध महसूस कीजिए।
उसकी नाजुकता देखिए।
कुछ क्षणों के लिए प्रकृति को नाम दिए बिना देखिए।
तब शायद आपको अनुभव हो कि प्रकृति केवल हमारे आसपास नहीं है—
हम स्वयं भी उसी विराट जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा हैं।
और तभी भीतर से कोई धीमी आवाज उठ सकती है—
🙏 “धन्यवाद!”
किसे?
जिसे आप ईश्वर कहें, प्रकृति कहें, ब्रह्म कहें, अस्तित्व कहें या जीवन—
नाम कोई भी हो।
कृतज्ञता का अनुभव अपने आप में एक आध्यात्मिक अनुभव है।
—
🧘 5. कुछ देर मौन में बैठिए
चल लिया।
शरीर को गति दे दी।
साँस को महसूस कर लिया।
प्रकृति को देख लिया।
अब—
कुछ मत कीजिए।
बस बैठिए।
आँखें बन्द कर सकते हैं।
अपनी साँस के साक्षी बनिए।
विचार आएँ तो आने दीजिए।
उन्हें पकड़िए मत।
उन्हें भगाइए भी मत।
वे बादलों की तरह आएँगे और चले जाएँगे।
आप आकाश की तरह बने रहिए। ☁️
यही ध्यान की एक सरल दिशा है।
धीरे-धीरे आप समझ सकते हैं कि मन में विचारों का होना समस्या नहीं है; हर विचार के पीछे भागते रहना समस्या हो सकता है।
मौन में मन को विश्राम मिलता है।
और जब मन थोड़ा शांत होता है, तो भीतर की सूक्ष्म आवाजें सुनाई देने लगती हैं।
🕊️ ध्यान मन को ठहराता है।
मौन मन को गहराई देता है।
और सजगता जीवन में गरिमा लाती है।
—
😊 6. सुबह को शब्दों से नहीं, मुस्कान से शुरू कीजिए
सुबह की सैर में कोई परिचित मिल जाए तो मुस्कुरा दीजिए।
एक हल्का-सा अभिवादन।
सिर का एक छोटा-सा इशारा।
हाथ हिलाकर नमस्कार।
हर सुबह बातचीत से भर देना आवश्यक नहीं।
कुछ समय ऐसा भी हो जब मौन आपकी भाषा हो और मुस्कान आपका अभिवादन।
😊 एक मुस्कान बहुत कुछ कह सकती है—
मैंने तुम्हें देखा।
मैं तुम्हें पहचानता हूँ।
तुम्हारा दिन शुभ हो।
इतने से भी दुनिया थोड़ी अधिक मानवीय हो सकती है।
—
💧 7. शरीर को जल, मन को शान्ति दीजिए
सुबह पर्याप्त पानी पीजिए।
एक गिलास या अपनी आवश्यकता के अनुसार अधिक।
💧 शरीर को उसकी आवश्यकता का जल दीजिए और इसे भी एक सजग कर्म बनाइए।
जल पीते समय कहीं और मत भागिए।
कुछ क्षण वहीं रहिए।
कभी-कभी जीवन की बड़ी खुशियाँ बड़ी चीजों में नहीं—
छोटी चीजों को पूरी तरह जीने में छिपी होती हैं।
—
🍋 8. अपने लिए एक शांत प्याला
यदि आपको पसन्द हो तो अदरक, नींबू और शहद वाली गरम चाय का प्याला लीजिए।
🍋🫚🍯
लेकिन इस बार इसे केवल चाय मत समझिए।
इसे एक छोटा-सा सुबह का अनुष्ठान बना दीजिए।
धीरे-धीरे चुस्की लीजिए।
उसकी गर्माहट महसूस कीजिए।
उसकी सुगन्ध महसूस कीजिए।
और कुछ क्षणों के लिए बस उसी अनुभव में रहिए।
सजग होकर पी गई साधारण चाय भी ध्यान बन सकती है।
—
📵 9. सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुशासन—मोबाइल से दूरी
और अब आती है सबसे महत्वपूर्ण बात।
सुबह के इन तीन घंटों में मोबाइल को हाथ मत लगाइए। 📵
न व्हाट्सऐप।
न सोशल मीडिया।
न समाचार।
न ई-मेल।
न अनन्त स्क्रॉलिंग।
सोचिए—
आपकी आँख अभी-अभी खुली है।
आपका मन अभी रात की शान्ति से निकला है।
और आप उसे सबसे पहले क्या दे रहे हैं?
किसी की राजनीतिक बहस।
किसी की शिकायत।
किसी की चिन्ता।
किसी की सफलता।
किसी की उत्तेजना।
किसी की तस्वीर।
किसी का संदेश।
क्यों?
क्या अपने मन को दिन की पहली खुराक के रूप में शोर देना आवश्यक है?
नहीं।
सुबह के इन कुछ घंटों में अपने मन को दूसरों की दुनिया से पहले अपनी दुनिया से मिलने दीजिए।
मोबाइल बाद में देख लीजिए।
दुनिया कहीं जा नहीं रही।
लेकिन सुबह का वह निर्मल मन—
एक बार चला गया तो लौटकर उसी रूप में नहीं आएगा।
📵 सुबह की पहली दृष्टि स्क्रीन पर नहीं, आकाश पर पड़ने दीजिए।
—
🍎 10. भोजन को भी ध्यान बना दीजिए
अब स्वस्थ और संतुलित नाश्ता कीजिए।
🥣🍎🌾
भोजन करते समय मोबाइल सामने न हो।
टीवी न चल रहा हो।
समाचारों का शोर न हो।
धीरे खाइए।
भोजन को देखिए।
उसका स्वाद महसूस कीजिए।
और मन ही मन उस अन्न के लिए कृतज्ञ हो जाइए, जो खेत से आपकी थाली तक पहुँचा।
भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं; वह जीवन को आगे ले जाने वाली ऊर्जा है।
इसलिए भोजन करते समय भी उपस्थित रहिए।
—
🌞 फिर देखिए—दिन कैसे बदलता है
अब तीन घंटे बीत चुके हैं।
लेकिन ये तीन घंटे केवल बीते नहीं हैं।
उन्होंने आपको भीतर से तैयार किया है।
आपने शरीर को जगाया।
साँस को महसूस किया।
प्रकृति को देखा।
मन को शांत किया।
मौन का स्वाद लिया।
कृतज्ञता को छुआ।
मोबाइल से दूरी बनाई।
और अपने शरीर को प्रेमपूर्वक पोषण दिया।
अब दिन आपके सामने है।
ट्रैफिक भी होगा। 🚗
ई-मेल भी आएँगे। 📧
लोग असहमत भी होंगे।
काम का दबाव भी होगा।
कुछ अप्रत्याशित भी होगा।
लेकिन आपके भीतर एक शान्त केन्द्र बन चुका होगा।
और शायद यही सबसे बड़ी साधना है—
परिस्थितियों को बदलना नहीं, परिस्थितियों के बीच अपने भीतर की शान्ति को बचाए रखना।
—
🌿 सुबह की सुगन्ध दिन भर साथ रखिए
सुबह की शान्ति कोई ऐसी चीज नहीं जिसे ध्यान समाप्त होते ही कमरे में छोड़ दिया जाए।
उसे अपने साथ लेकर चलिए।
बात करते समय थोड़ी सजगता।
काम करते समय थोड़ी एकाग्रता।
चलते समय थोड़ी जागरूकता।
खाते समय थोड़ी कृतज्ञता।
और कठिन परिस्थिति में—
एक गहरी साँस।
बस।
शायद यही छोटी-छोटी बातें जीवन को धीरे-धीरे बदल देती हैं।
—
✨ तीन घंटे स्वयं को दीजिए
कल सुबह एक प्रयोग कीजिए।
अलार्म बजने पर मोबाइल उठाने के बजाय—
खिड़की खोलिए।
आकाश देखिए।
एक गहरी साँस लीजिए।
और अपने आप से कहिए—
“आज का पहला समय मेरा है।”🙏
फिर बाहर जाइए।
🌅 सूर्योदय देखिए।
🚶 चलिए।
🤸 शरीर को जगाइए।
🌬️ साँस को महसूस कीजिए।
🌳 प्रकृति से मिलिए।
🧘 ध्यान कीजिए।
🕊️ मौन में बैठिए।
😊 मुस्कुराइए।
💧 पानी पीजिए।
🍋 अपने लिए कुछ स्वस्थ लीजिए।
📵 मोबाइल को दूर रखिए।
🍎 शान्ति से नाश्ता कीजिए।
🙏 और उस अदृश्य शक्ति के प्रति कृतज्ञ हो जाइए, जिसने आपको एक और सुबह दी है।
फिर दिन में प्रवेश कीजिए।
सिर्फ जागे हुए नहीं—
बल्कि जागरूक होकर।
सिर्फ जीवित नहीं—
बल्कि जीवन्त होकर।
सिर्फ ऊर्जावान नहीं—
बल्कि शान्त और प्रसन्न होकर।
—
🌅 एक अन्तिम बात…
हो सकता है आपकी समस्याएँ सुबह की इन तीन घंटों में समाप्त न हों।
लेकिन शायद आप उनके साथ अपना सम्बन्ध बदल सकें।
हो सकता है जीवन आसान न हो जाए।
लेकिन शायद आप जीवन को अधिक सहजता से जीने लगें।
हो सकता है दुनिया न बदले।
लेकिन दुनिया को देखने वाली आपकी आँखें बदल सकती हैं।
और जब दृष्टि बदलती है, तो अक्सर वही जीवन—
कुछ अधिक सुन्दर दिखाई देने लगता है। 🌿
**सुबह के ये तीन घंटे केवल समय नहीं हैं।
ये जीवन द्वारा आपको दिया गया एक मौन निमंत्रण हैं—**
“आओ, आज दुनिया से मिलने से पहले थोड़ी देर स्वयं से मिल लो।”🙏🌅
सुबह को बचाइए।
अपने मन को बचाइए।
अपनी शान्ति को बचाइए।
क्योंकि—
🌞 जिसने अपनी सुबह सँभाल ली, उसने अक्सर अपने दिन को सँभालने की दिशा भी पा ली। ✨
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.
His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.
His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.
Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.
Key Accolades and Works
Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his satire The Mysterious Whiteboard.
☆ Witful Warmth# 113 ☆
☆ Satire ☆ The Mysterious Whiteboard… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆
In the main conference room of Nexus Financials, the giant glass whiteboard was considered sacred territory. Every Monday, the Chief Strategy Officer, Mr. Varma, would draw complex trend lines, confusing pie charts, and random interconnected circles that nobody understood, but everybody nodded at with profound fake wisdom.
One Tuesday evening, after everyone had left, the night shift janitor, Suresh, was wiping down the board. While stretching his arm to reach the top corner, his marker eraser accidentally left a strange, curvy streak across a cluster of financial terms. To balance the shape, Suresh took a blue dry-erase marker and casually drew a giant triangle with three little dots inside, right next to the words ‘Risk Assessment’.
He thought nothing of it and packed his cleaning cart.
The next morning, the board of directors gathered for an urgent emergency meeting regarding a sudden dip in quarterly profits. As Mr. Varma stood near the glass board, his eyes fell on Suresh’s random triangle and three dots.
Mr. Varma stopped mid-sentence. He adjusted his glasses, leaned within three inches of the glass, and stared at the triangle for two solid minutes. The room went dead silent. The CEO leaned forward, whispering, “Varma… what is that dynamic structural model on the right?”
Varma, not wanting to admit he had no idea where it came from, stroked his chin thoughtfully. “Ah! This is the… Triangular Tri-fold Pivot Strategy. I drew this late last night. Notice how the three dots represent Risk, Liquidity, and Customer Retention, all contained within the geometric boundary of fiscal restraint!”
The CEO hit his fist on the table in pure admiration. “Genius! Absolute genius! Why didn’t we implement this three quarters ago?”
Within forty-eight hours, the ‘Triangular Pivot Strategy’ became the company’s core operational mantra. Corporate decks were redesigned, new training sessions were scheduled, and the shares of Nexus Financials shot up by twelve percent simply because the press loved the name of the new strategy.
On Friday afternoon, the CEO called an all-hands town hall meeting to celebrate the miraculous turnaround. He invited Mr. Varma to the stage to explain the inspiration behind the legendary diagram.
Varma took the microphone, beaming with pride. “Inspiration comes to a true strategist in the darkest hours of deep reflection,” Varma proclaimed dramatically.
Just then, Suresh walked into the back of the auditorium with his mop bucket. The CEO pointed toward the glass board displayed on the projection screen and asked, “Varma, tell us, what do those three dots inside the triangle truly symbolize?”
Varma hesitated. Truth was, he hadn’t figured out what the third dot was supposed to mean.
Suresh, standing near the back door, innocently called out in a loud voice, “Sir, those three dots are just tea stains that didn’t come off with the glass cleaner, so I drew a triangle around them so it wouldn’t look dirty!”
The entire auditorium froze for three painful seconds. Then, the CEO burst into a loud roar of genuine laughter, followed by the executive board, and soon all two hundred employees were standing on their feet, clapping and laughing uncontrollably.
Varma smiled awkwardly, realizing that sometimes the most revolutionary corporate strategies are literally born out of a tea stain and a mop.
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – सौदाई..।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – साधना।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक बुंदेली पूर्णिका – खूब करो विस्वास… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१८ ☆
☆ एक बुंदेली पूर्णिका – खूब करो विस्वास… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्टॉप वॉच…“।)
अभी अभी # १०८९ ⇒ आलेख – स्टॉप वॉच श्री प्रदीप शर्मा
समय रुकता नहीं, कभी किसी के लिए ठहरता नहीं! घड़ी रुक सकती है, ठहर सकती है, खराब हो सकती है। जो घड़ी रुक सकती है, उसे स्टॉप वॉच कहते हैं। आप घड़ी को रोक सकते हो, जब तक चाहो, उसे रोके रख भी सकते हो, क्योंकि वह सिर्फ घड़ी है, समय नहीं।
आपके पास आज समय है, घड़ी भी है, और आपकी घड़ी में स्टॉप वॉच भी है। अगर आपका मोबाइल बोलता होता तो शायद यही कहता, मैं ही समय हूँ, मैं ही घड़ी और मैं ही कैमरा। मैं ही कलयुग का संजय हूँ, महाभारत का ही नहीं, पूरे विश्व का आँखों देखा हाल आप तक पहुंचाने की दिव्य-दृष्टि मुझे प्राप्त है।।
दौड़ते समय को रुकते हुए देखना कैसा लगता है! सुबह सवेरे जब मैं साँसों का हिसाब रखता हूँ, तो स्टॉप वॉच मेरी साँसों की निगरानी करती है। मैं अपनी मर्ज़ी से स्टॉप वॉच शुरू करता हूँ, अपनी मर्ज़ी से ही उसे रोक भी सकता हूँ। कुछ सेकंड के लिए साँस रोककर, मैं यह खुशफहमी पाल लिया करता हूँ, कि मैंने इतने समय तक, समय को रोक लिया। साँस को रोका नहीं जाता, थामा जाता है। साँस है तो जिंदगी है। घड़ी की सुई मेरी साँसों का आना जाना देखती रहती है। कुछ मिनिट का योगासन करने में स्टॉप वॉच मुझे सहयोग करती है। प्राण ही समय है, साँसों का चलना ही ज़िन्दगी है। कुछ समय के लिए साँसों को थामिए, और देखिए! स्टॉप एंड वॉच।
साँसों का ठहराव ही समय का ठहराव है। गिनती की साँसें लेकर हम इस संसार में आए हैं, और गिनती के ही पल। जल्दी खर्च करें, या आराम से। स्वास्थ्य ही वह धन है, जिस पर नोटबन्दी का असर नहीं होता, सीबीआई का छापा नहीं पड़ता।।
वॉच को हम घड़ी भी कहते हैं! ज़िन्दगी की न बीते घड़ी। वॉच का एक अर्थ निगरानी भी होता है। एक वॉचमैन होता है जो पी एम भी हो सकता है और एक वॉच होती है, जिसमें am और pm दोनों होते हैं। वॉच-मेकर कभी घड़ी सुधारा करता था। घड़ी भी एक तरह का साज ही तो है। शायद इसीलिए वॉच-मेकर को घड़ीसाज भी कहते हैं। एक घड़ीसाज ने तो अपनी दुकान का नाम ही, समाज सुधारक की तर्ज पर, घड़ी-सुधारक रख लिया था।
स्टॉप वॉच की तरह अपने समय पर हमें ही निगरानी रखनी पड़ेगी। जिसे हम पल कहते हैं, वह कीमती है! बेशकीमती घड़ियाँ क्या कीमती समय बताया करती हैं ? ज़िन्दगी की रेस 100 मीटर भी हो सकती है, और 1000 मीटर भी। यह वह मैराथन है, जिसमें वक्त ठहरता नहीं। रेडी, स्टेडी एंड गो के साथ ज़िन्दगी की दौड़ शुरू होती है। हर कोई आगे भी निकलना चाहता है, प्रथम भी आना चाहता है, लेकिन दौड़ से कभी बाहर नहीं होना चाहता। स्टॉप वॉच स्टॉप होती है, और आपका स्टॉप आ जाता है।
घड़ी को रुकने न दें, लंबी रेस का घोड़ा है इंसान, कभी थकता नहीं, थमता नही।।