English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 63 – The Sovereignty of the Privet… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his Satire – The Sovereignty of the Privet 

☆ Witful Warmth# 63 ☆

☆ Satire ☆ The Sovereignty of the Privet… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

In the quiet cul-de-sac of Lower Willowbrook, where the grass is legally required to be exactly 2.5 inches tall, lived Arthur Pringle and Barnaby Fitch. They had been best friends for twenty years until the Great Encroachment of Tuesday morning.

The dispute began when Arthur noticed a single, rebellious twig from Barnaby’s privet hedge crossing the invisible, federally unmapped line of their property border. It wasn’t just a twig; it was a statement. To Arthur, that half-inch of leafy intrusion was a calculated land grab, akin to the annexation of a small European principality. Rather than speaking—which is what people with “too much free time” do—Arthur responded with Passive-Aggressive Landscaping. He installed a “No Trespassing” sign specifically facing Barnaby’s birdfeeder, a move Barnaby countered by aiming his industrial-grade leaf blower at Arthur’s driveway for forty-five minutes every morning at 7:01 AM.

By Thursday, three different land surveying companies were on the scene. They spent six hours squinting through transit levels to determine if the hedge was, in fact, 0.004 centimeters over the line. The results were inconclusive, mostly because the surveyors were distracted by the catered lunch Barnaby provided to influence the neighborhood’s court of public opinion.

The conflict reached its zenith at the Monthly Homeowners Association Meeting. The agenda usually consisted of “Why the Mailman Walks Too Fast,” but tonight, it was the Shrubbery Summit. Arthur presented a 42-slide PowerPoint presentation titled Sovereignty and Shrubbery, arguing that if Barnaby’s hedge was allowed to remain, the very fabric of the neighborhood would unravel. “Today it’s a twig,” Arthur whispered dramatically into the microphone, “tomorrow, it’s a communal fire pit in my breakfast nook!” Barnaby countered with a physical exhibit: a jar of “Dust and Debris” allegedly blown from Arthur’s unkempt porch onto Barnaby’s prize-winning petunias.

The HOA board, composed of three retirees who lived for this kind of high-stakes drama, delivered a Solomon-like verdict. The hedge would be trimmed by a neutral third party—a local teenager who didn’t care about borders—and both men were required to share a symbolic pitcher of lemonade on the disputed boundary.

As they sat on their folding chairs, exactly three feet apart, a single leaf from a nearby oak tree—owned by the city—drifted down and landed perfectly across both of their laps. They spent the next four hours discussing which one of them had the legal jurisdiction to move it.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२५ ⇒ जल तत्व और प्रेम तत्व ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जल तत्व और प्रेम तत्व।)

?अभी अभी # ९२५ ⇒ आलेख – जल तत्व और प्रेम तत्व ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जल बिच मीन प्यासी, हमें सुन सुन हांसी भले ही न आए, लेकिन मछली के लिए जल ही जीवन है, यह तो मछली भी जानती है।

मत्स्यावतार हुआ तो क्या, जीव: जीवस्य भोजनं, जल से बाहर आते ही इस इंसान के लिए वह एक भोज्य पदार्थ बन जाती है। आप हमें तारो, हम आपको तारें।

पंच तत्व में जल तो पहले से ही मौजूद है। पृथ्वी पर भी तीन चौथाई जल ही है, फिर भी हमारी प्यास है कि कभी बुझती ही नहीं। गला अक्सर सूखता ही रहता है। प्यास तो हमारी पानी से भी बुझ सकती है लेकिन हमारी रसेंद्रियों का क्या करें, जो कभी फलों का रस तो कभी शहद की आस करती है। प्याले पर प्याले पी लिए, लेकिन अगर प्रेम पियाला नहीं पिया, तो क्या पीया। क्या है यह प्रेम तत्व और कहां से प्रकट होता है यह।।

तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।

मिलाए, छल बल से नजरिया रे।।

मन को चंद्रमा की तरह चंचल माना गया है। यह मन पापी ही नहीं, चोर भी है। एक बृजवासी कृष्ण हैं, जो चितचोर हैं, बांसुरी बजाते हैं, माखन चुराते हैं, ग्वाल बाल संग गईया चराते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं और इंद्र के कोप से, केवल उंगली के बल पर, लोगों को बचाकर गिरधारी कहलाते हैं। कभी कंस को मारते हैं तो कभी द्रौपदी की लाज बचाते हैं। विदुर का साग और सुदामा के चावल खाते हैं और सारथी बन अर्जुन का रथ हांकते हैं। क्या यह सबसे ऊंची प्रेम सगाई नहीं।

पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा ? जवाब सभी जानते हैं। यही हाल प्रेम का है। प्रेम के भी हजार रंग हैं।

बस दृष्टि स्थूल नहीं, सूक्ष्म होनी चाहिए। हमारा प्रेम रिश्तों में बंट जाता है, माता पिता का प्रेम, भाई बहन का प्रेम, प्रेयसी, पत्नी, मित्र और पड़ोसी का प्रेम। जहां राग होता है, वहां द्वेष भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह प्रकट हो जाता है और प्रेम की वाट लग जाती है।।

हमने तुमको प्यार किया है जितना, कौन करेगा इतना। अगर वाकई इतना प्यार इस दुनिया में होता तो ये नफरत और बेवफाई तो शायद जन्म ही नहीं लेती।

क्यों इतने युद्ध होते, हिंसा होती, क्यों इतने अवतार होते। लगता है मनुष्य ने प्यार कर तो लिया, लेकिन प्यार का मतलब नहीं जाना।

प्रकृति बांटती है, समेटती नहीं ! पतझड़ हो या बहार, सर्दी, गर्मी और बरसात, प्रकृति सहनशील है, क्योंकि उसे वसुंधरा की गोद नसीब हुई है। वृक्ष फल देता है, खाता नहीं, नदियां अपना पानी नहीं पीती। बीज से वृक्ष बनता है, पर्यावरण की रक्षा करता है। प्रकृति देती ही देती है। इसीलिए प्रकृति में प्रेम है। कहने को हम भी प्रकृति प्रेमी हैं, पर्यावरण प्रेमी हैं।।

जल तत्व की तरह, आसानी से घुल मिल जाना ही प्रेम तत्व है। हमें तो गर्व है कि हमारे रोम रोम में राम है और हमारा मन हमेशा गंगा जमना और सरयू तीर जाने के लिए ही मचलता रहता है, तब तो जोत से जोत जलती रहनी चाहिए और हमारे देश में सतत, प्रेम की गंगा बहती रहनी चाहिए।

या तो हमारा हृदय इतना विशाल नहीं, या फिर प्रेम गली अति सांकरी। हम प्रेम में मीरा और राधा नहीं बनना चाहते। प्यास लगी तो पानी पी लिया, और प्यास बुझी तो ग्लास फेंक दिया। हमने कभी पानी का महत्त्व नहीं समझा, हम प्यार का मतलब क्या समझेंगे। जल और प्रेम जब एकरूप होता है, तब अंदर से प्रेम प्रकट होता है। वास्तविक प्रेम बंधनों को काटता है, जहर को अमृत बनाता है। मीरा जहर का प्याला पीकर भी यही कहती रहती है ;

अंसुवन जल सींचि सींचि

प्रेम बेली बाई।

अब तो बेलि फैल गई

आणंद फल होई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता चुप रहने की सजा पाई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆

☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆

हमने चुप रहने की सजा पाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

 

जब भी चाहा कि कुछ बोलें

जब भी चाहा कि मुंह खोलें

देखकर हवाओं का मंजर

चूभो  रही है जैसे खंजर

भावनाएं हो गई है बंजर

कशमकश है अंदर ही अंदर

जिव्हा में ताला लग गया है

मन में अंजाना सा डर जग गया है

आंखों के आगे धुंध छाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया

कलियों ने भंवरों का दिल तोड़ दिया

फूल भी बेरंग हो गए अब

बगीचे बेढ़ंग हो गए अब

पतझड़ श्रृंगार को लुट गया

बहार का मौसम रूठ गया

चमन पर वीरानी छाई है

यह कैसी रुत आई है

हर तरफ बस तबाही तबाही है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

भूख और प्यास की कहानी है

बड़ी बेरहम यह जिंदगानी है

भरी जवानी में हाथ कट गए

बेरोजगारी से हम पट गए

आंखों में बहता हुआ पानी है

डिग्रीयां  अब तो बस बेमानी है

उम्मीदें ना उम्मीदगी में ढल गई

इच्छाएं आकांक्षाएं देखते देखते जल गई

जिंदगी किस मुकाम पर लाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई हैं

 

क्या समय के साथ व्यवस्था बदलेगी ?

क्या कटरता की बर्फ पिघलेगी ?

हमारा दुख दर्द कोई समझ पाएगा ?

हमारे लिए कोई आवाज उठाएगा ?

क्या वाटिका में रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे ?

लोक कटुता भूलकर एक दूसरे के गले मिलेंगे ?

क्या  नई किरण खुशियों का संदेश लाएगी ?

क्या चुप्पी तोड़ जिव्हा कुछ कह पाएगी ?

नई सुबह ने हर दिल में उम्मीद की ज्योत जलाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९६ – सागर की लहरें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता सागर की लहरें।)

☆ अभिव्यक्ति # ९६ ☆ सागर की लहरें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

सागर की लहरें, लहर लहर,

कुछ उठती हैं, लहराती हैं,

कुछ धीरे से ही उठती हैं

कुछ जोर लगाकर उठती हैं,

उठती हैं, फिर गिर जाती हैं,

उठती अन्तस गहराई से,

उठती हैं, वो चतुराई से,

वो लहरों से कतराती हैं,

फिर लहरों पर गिर जाती हैं,

इनको देखो तो गिनना तुम,

कभी इनकी बातें, सुनना तुम,

बस शोर नहीं है इनका वो,

अंतर्द्वंद को सुनना तुम,

भागी आती हैं, किनारे पर,

तट पे सिमटती जाती हैं,

क्या कहा, कभी, कुछ तट ने था

कदमों में सर को पटकती हैं,

क्या कहा था तट ने न जाने,

लहरें बेचैन हुई क्यों हैं,

क्या रिश्ता है, तट से इनका,

क्यों सर को अब भी पटकती हैं,

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ घंटा… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ घंटा… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

(देव प्रिया / कालगंगा)

शांत होती तप्त झाली सूर्य येता सावली

शोधताना का तिला ही माणसे कंटाळली

*

कोणत्या हळव्या व्यथानी भंगलो मी आतुनी

काळजी वाटून माझी शांतता धास्तावली

*

नाव नाही गाव नाही ओळखी ना पाळखी

कोण होते भेटले ते वाट ज्यांनी दावली

*

फाटके आयुष्य होते सोसण्याला यातना

हात हाती घेत माझी लाज तू सांभाळली

*

अंतरी हव्यास होता जिंकण्याचा जिंदगी

वळणवाटा चालताना पावले घोटाळली

*

आठवांची खाण होती अंगणीचे चांदणे

बंद केले दार तेव्हा का मती वेडावली

*

लाभता एकांत थोडा तू कशाला यायचे

मागची घोटीव स्वप्ने विरघळाया लागली

*

सावराया तोल आलो चूक केली कोणती

पावलांना साथ देता ती खुशीने नाचली

*

हे कधी कळलेच नाही काय झाला मामला

आत्मशांती मिळवताना फक्त घंटा वाजली

*

ओठ झाले मूक माझे तेज डोळे बोलले

वाचताना काल पोथी आसवे तू गाळली

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – १ – डब्यातील डबे- – -☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – १ डब्यातील डबे — ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी

आज सकाळी मसाल्याचा डबा घासायला काढला आणि त्याकडे बघतच राहिले.कारण आपली महिलांची सवय! डब्यावरचे नाव वाचले, विशेष म्हणजे बाहेरच्या डब्यावर व आतील छोट्या डबीवर नाव वेगळे.मग डब्याकडेच बघत बसले आणि हळूच आठवणीची एक पुडी सुटली.बाहेरचा डबा मैत्रिणीने दिलेला तर आतील छोटे डबे माझ्या जुन्या डब्यातील होते, जो डबा पूर्वी चिरल्यामुळे मोडीत काढला होता.मग लक्षात आले महिलांचा जीव कुठे कुठे अडकलेला असतो.

अगदी आजचे उदाहरण बघायचे झाले तर डबे घरात बघितले तर किती विविध प्रकारचे डबे सांभाळून ठेवलेले असतात.आई कडे असतो तो पर्यंत याचे महत्व लक्षात येत नाही. पण एकदा स्वतः च्या संसाराला सुरुवात झाली की या डब्यात जीव अडकणे सुरु होते.लग्नात आहेरात आलेले डबे अगदी कायमची सोबत करतात.विविध आकाराचे डबे अगदी व्यवस्थित लावून ठेवणे, दर महिन्याला घासून चकचकित ठेवणे.घासून मगच त्यात सामान भरणे.व्यवस्थित साहित्य सापडावे म्हणून त्यावर छान स्टिकर्स लावणे.अशी उत्तम गृहिणीची कामे सुरु होतात.आणि त्या कामाचे सर्वांकडून कौतुक पण होते.अर्थात लेबल असलेल्या डब्यात तोच पदार्थ असेल याची मात्र खात्री नसते.आणि कोणी शेंगदाणे कुठे आहेत? याच्या उत्तरा दाखल “आहेत ना तिथेच, रवा लिहिलेल्या डब्यात.” हे वाक्य ऐकू येते.काय करणार, तात्पुरती सोय केलेली असते.पण कोणाला समजणार?

काही मैत्रिणी तर डब्यांच्या समोर मुद्दाम सेल्फी काढून आपले वैभव दाखवत असतात.पूर्वी तर किचन मधील एक भिंत म्हणजे डब्यांची मांडणी असायची.आणि त्यात चढत्या किंवा उतरत्या डब्यांच्या उंचीच्या क्रमाने डबे लावलेले असायचे.जणू किचनचे वैभवच!

हळूहळू हळदीकुंकू, मिळालेले आहेर, भेटवस्तू अशा प्रसंगातून छोट्या, मोठ्या, विविध आकाराच्या, रंगाच्या डब्यांची बहीण, भावंडे घरात येतात आणि ऐटीत जुन्या डब्यांच्या समोर किंवा डोक्यावर जाऊन बसतात.त्यात अगदी सध्याच्या पार्सल मध्ये येणारे डबे पण अपवाद नसतात.अगदी टाकून द्यावेसे वाटले तरी “असू दे, वेळेला उपयोगी पडतील.” असे म्हणून ठेवले जातात.इतके डबे असून एखादा डबा आला नाही तर जीव हळहळतो.आणि दुकाना समोरून जाताना एखादा नवीन फॅशनचा डबा भुरळ घालतोच!

आणि हो आपला जीव अडकलेले डबे घरातल्यांच्या मात्र डोळ्यात खुपत असतात.मग मी एक युक्तीच केली आहे.एक बॉक्स घेऊन त्यात हे डबे छान ठेवले आहेत.काही दिवसांनी मात्र हे डबे त्यात मावत नाहीत.मग मी डबे एकात एक असे घालून जपून ठेवते.आणि छोट्या छोट्या डब्या मोठ्या डब्यांच्या पोटात लपून बसतात. अगदी कोणाची दृष्ट नको लागायला या तत्वाने! अजून एक गंमत सांगू का? हे झाले निवडक डब्यांचे अजून आठवणींचे डबे उघडलेच नाहीत.म्हणजे लहानपणीचे, आज्जीचे, कड्या कुलुपे असणारे, विविध घाटांचे ( आकार ).

आणि हो या डब्यांच्या मध्ये यांच्या बहिणी बरण्या राहूनच गेल्या आहेत.बरण्यांची गोष्ट पुन्हा केव्हातरी!

© सुश्री विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ संस्कारांचे बीज… (अनुवादित) – भाग – २ ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर ☆

श्री मकरंद पिंपुटकर

? जीवनरंग ❤️

☆ संस्कारांचे बीज… (अनुवादित) – भाग – २ ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर ☆

(किशनजी क्षणभर शांत राहिले, मग म्हणाले, “नाही. कारण मी अनेकांना भीतीने मरताना पाहिले आहे आणि अनेकांना श्रद्धेने जगताना. त्यातून मी शिकलो आहे— खरी श्रद्धा घाबरत नाही. ती सन्मानाने उभी राहते, ठाम, भीतीशिवाय. ”) 

इथून पुढे

म्होरक्याने आपला चहा संपवला. बसकडे पाहत. झोपलेली माणसं — वृद्ध, मुले, कुटुंबे.

म्होरक्या बसच्या मागच्या बाजूला गेला. लोक झोपले होते. एक मूल एका टेडी बेअरला बिलगले होते. एका वृद्ध महिलेच्या बोटात जपमाळ होती. कोणीतरी घोरत होते. सामान्य माणसे. त्याच्या गावातील लोकांसारखी, त्याच्या आईसारखी, मावशीसारखी, आजीसारखी.

तो किशनजींकडे परतला. “माझी आजी… ” तो थांबला.

“त्यांचं काय? ” किशनजींनी विचारले.

“ती दरवर्षी याच मार्गाने प्रवास करायची— खाटू, पुष्कर. ती म्हणायची की यामुळेच तिला शांती मिळते. तीन वर्षांपूर्वी तिचे निधन झाले. मी तिला शेवटच्या वेळी घेऊन जाऊ शकलो नाही. मी busy होतो. ” त्याचा आवाज दाटून आला.

किशनजींनी मान डोलावली. “तुम्हाला माहित आहे का, ” ते म्हणाले, “या मार्गाबद्दल मला सर्वात जास्त कशाचा त्रास होतो? चेकपॉइंट्सचा नाही. खराब रस्त्यांचा नाही. पण जेव्हा कोणी म्हणतं— “माझ्या अमुक अमुकला ही यात्रा करायची होती, पण ती होऊ शकली नाही. ”

म्होरक्याने डोळे मिटले.

“या बसमधील प्रत्येक व्यक्ती असा वेळ खर्च करत आहे, जो त्यांना कदाचित नंतर परत मिळणार नाही. ते असे पैसे खर्च करत आहेत, जे कदाचित अन्य काही कामासाठी वापरले जाऊ शकले असते. पण ते या प्रवासावर ते पैसे खर्च करत आहेत. का? कारण आतून काहीतरी त्यांना जाणवत आहे की त्यांनी आत्ता इथेच असायला हवे. ”

त्यांनी डॅशबोर्ड उघडला. एक जुनी, जीर्ण डायरी बाहेर काढली. “बघा, ” ते म्हणाले. “४० वर्षांहून अधिक काळातील प्रवाशांच्या सह्या. हजारो नावे. हजारो कथा. काहीजण आता या दुनियेत नाहीत, पण त्यांची श्रद्धा अजूनही इथे आहे. ”

म्होरक्याने ती डायरी हातात घेतली आणि पाने चाळू लागला. आणि तो थबकला. एक नाव वाचून. “मंजू देवी त्रिवेदी, १६ ऑगस्ट, २००३. खाटू श्याम यात्रा—नातवाच्या आरोग्यासाठी. ”

त्याचे हात थरथरू लागले. “ही… ही तर माझी आजी आहे. ”

किशनजींनी हळूच मान डोलावली. “मला माहित आहे. जेव्हा तू बसमध्ये चढलास तेव्हाच मी तुला ओळखले होते. तुझे डोळे अगदी तुझ्या आजीसारखेच आहेत. ती नेहमी म्हणायची, “माझा नातू एके दिवशी लोकांचे रक्षण करेल. ”

एक क्षणभर शांतता.

म्होरक्याने डायरी बंद केली. “तुम्हाला माझ्याकडून काय पाहिजे? ” त्याने जड आवाजात विचारले.

“काही नाही, ” किशनजी म्हणाले. “फक्त तू कोण आहेस हे ठरव. लोकांचे रक्षण करणारा मंजू देवीचा नातू की प्रोटेक्शन मनीच्या नावाखाली हप्ता गोळा करणारा एक गुंड. ”

म्होरक्या बसमधून खाली उतरला, आपल्या माणसांमध्ये उभा राहिला.

आकाश मंदपणे उजळत होते.

“चला, ” तो म्हणाला, “रस्ता मोकळा करा. बसला जाऊ द्या. ही बस आज जाईल. प्रत्येक वेळी. “

वाहने बाजूला झाली. रस्ता मोकळा झाला. म्होरक्या परत आला.

“धन्यवाद, ” किशनजी म्हणाले, “तुम्हाला नाही, तुमच्या आजीला. तिने तुमच्यावर केलेल्या संस्कारांना. “

बस पुढे सरकली. प्रवासी जागे होत होते पण पहाटे काय झाले होते, हे किशनजींनी कोणाला कधीच सांगितले नाही.

पण पुढच्या शनिवारी, जेव्हा ते त्याच मार्गाने पुन्हा जात होते— ४७ व्या किलोमीटरवर, वाहने तिथे रस्ता अडवून होती. पण यावेळी, जेव्हा बस जवळ आली, ते फक्त बाजूला झाले. कोणताही इशारा नाही. कोणतेही प्रश्न नाहीत. थांबवणे नाही. आणि त्या वाहनांपैकी एकाच्या खिडकीवर, कोणीतरी खाटूश्यामजींचे एक छोटे चित्र चिकटवले होते.

किशनजींच्या ते लक्षात आलं, ते हलकेच हसले. त्यांनी हॉर्न वाजवला आणि बस पुढे काढली.

त्या सकाळच्या सहा महिन्यांनंतर, त्यांच्या घरी, दारात एक पाकीट पडलेलं त्यांना दिसलं. कोणताही पत्ता नाही. पाठवणाऱ्याचे नाव नाही. फक्त हाताने लिहिलेले होते— किशन यादव. आत दोन गोष्टी होत्या. पहिली— एक ५०० रुपयांची नोट, त्यासोबत एक छोटा कागदाचा तुकडा— “बसच्या आणि भक्तांच्या देखभालीच्या निधीसाठी. ” — एक हितचिंतक आणि दुसरी गोष्ट— एक जुना फोटो. त्या फोटोमध्ये, मंजू देवी त्रिवेदी किशनजींच्या बससमोर उभ्या होत्या. वर्ष २००३ होते. त्या हसत होत्या. त्यांच्या मागे, सुमारे १० वर्षांचा एक मुलगा उभा होता, बसकडे पाहत होता.

फोटोच्या मागे, थरथरत्या अक्षरात लिहिलेले होते— “आजीचे म्हणणे खरे होते. तिचा नातू आता खरंच लोकांचं रक्षण करतो. धन्यवाद. ” मला आठवण करून दिल्याबद्दल धन्यवाद. —मंजू देवीचा नातू”

किशनजींनी तो फोटो आपल्या जुन्या डायरीत ठेवला— अगदी त्याच पानावर जिथे मंजू देवीची सही होती.

नंतर जेव्हा जेव्हा ते तो किलोमीटर ४७ वरून जायचे तेव्हा तेव्हा तिथे, त्या मैलाच्या दगडाशी ते बसचा हॉर्न वाजवायचे.

लोकांनाही ४७ किलोमीटरच्या मैलाच्या दगडाशी घडलेली घटना आता ठाऊक झाली होती.

किशनजी आणखी सात वर्षे त्याच मार्गावरून चालले. मग डोळे आणि हात साथ द्यायला कमी पडू लागल्यावर ते थांबले. त्यांच्या शेवटच्या प्रवासाच्या दिवशी, किलोमीटर ४७ वर, काहीतरी वेगळे होते. तिथे कोणतीही वाहने नव्हती. तिथे फुले होती— शेकडो फुले, रस्त्याच्या कडेला.

आणि एक फलक— “श्रद्धेचे रक्षण करणाऱ्याचे आभार. “

किशनजींनी बस थांबवली. त्यातले एक फूल सोबत घेतले – खाटूश्यामला वाहण्यासाठी.

काळ वहात राहिला. किशनजी राहिले नाहीत. ते खाटूश्यामजींच्या चरणी विलीन झाले.

पण तो मार्ग तसाच आहे. नवीन चालक त्यावर गाडी चालवतात. नवीन यात्रेकरू त्यावरून चालतात.

आणि प्रत्येक वेळी जेव्हा बस ४७ व्या किलोमीटरवरून जाते— तेव्हा चालक तीनदा हॉर्न वाजवतो. यात्रेकरू हात जोडतात. आणि प्रत्येकजण एक मिनिट मौन पाळतो.

त्या चालकासाठी – जो घाबरला नाही.

त्या माणसासाठी – ज्याला आठवले की तो कोण आहे.

आणि त्या आजीसाठी – जिने श्रद्धेचे आणि संस्कारांचे बीज पेरले.

– समाप्त –  

© श्री मकरंद पिंपुटकर 

चिंचवड, पुणे.  मो 8698053215

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “महिलांचे मायक्रो फायनान्स…” ☆ सुश्री शीला पतकी ☆

सुश्री शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ “महिलांचे मायक्रो फायनान्स…” ☆ सुश्री शीला पतकी 

महिलांचे मायक्रो फायनान्स

 – – हिंग डबी ते बचत गट महिलांचे मायक्रो फायनान्स……..

सुधा मूर्तींच्या मुलाखतीमध्ये त्या बोलत होत्या त्या म्हणाल्या “नारायण मूर्ती ने जेव्हा नविन कंपनी काढायचे ठरवले तेव्हा काही रक्कम कमी पडत होती मग ती माझ्याकडे आहे का? अशी विचारणा झाली. माझ्या तांदळाच्या डब्यातून साडेसातशे रुपये मी त्यांना दिले आणि सांगितले की ही रक्कम मला परत करावयाची आहे “…. हा किस्सा ऐकल्यानंतर माझ्या लक्षात आले की बायका अशा तऱ्हेने घरात बचत करून पैसे जमा करीत असत आणि घरच्या कर्त्या माणसाला संकटकाळी त्या पैशाचा खूप उपयोग होई आणि मला आठवण झाली आमच्या घरच्या हिंगाच्या डबीची…..! साठ वर्षापूर्वीची गोष्ट आहे…. त्याकाळी नागछाप हिंगाच्या पत्र्याच्या डब्या असत. त्या डब्या रिकाम्या झाल्यावर त्या व्यवस्थित धुवून पुसून उन्हात वाळवून त्यांचा वापर इतर कामासाठी होत असे. त्याच्या झाकणाचा उपयोग साल काढण्यासाठी म्हणजे बटाट्याचे साल दोडक्याचे साल…. तोपर्यंत अजून साल काढण्याची ते छोटे यंत्र आले नव्हते. म्हणजे हिंगाची डबी नंतर साल काढण्याचे यंत्र होई आणि त्यानंतर नवऱ्यापासून एकेक पैसा वाचवून तो गोळा करून जतन करावयाचा ती तिजोरी म्हणजे हिंगाची डबी…! . हिंगाच्या डबीत सगळी चिल्लर असायची. पैसा, दोन पैसे, आणा… 16 आणे जमले की त्याचा बंदा रुपया व्हायचा! … मग हा रुपया त्यापेक्षा मोठ्या बँकेत जायचा तो म्हणजे फिरकीच्या तांब्याचा पेला…! फिरकीच्या ताब्यात आत मध्ये एक छोटा पेला असायचा. रुपया रुपया साठवून बायका वाड्यातल्या वाड्यात चाळीत भिशी करत असत. भिशी असायची शंभर रुपयाची.. त्या काळात शंभर रुपये म्हणजे खूप मोठी गोष्ट झाली. दहा बायका भिशीमध्ये असत. जमा झालेले दहा, दहा रुपये एकत्र करून मग त्याची ज्या बाईला भिशी लागायची ती बाई त्या शंभर रुपयात घरासाठी कधी कॉट खरेदी करायची कपाट घ्यायची अशा संसार उपयोगी वस्तूची खरेदी होत असे किंवा घरात अडीअडचणीला धान्य भरण्याला त्याचा वापर व्हायचा असा बचतीतून संसाराला हातभार लावणे हे काम ह्या हिंगाच्या डबीने खूप केले.

मला वाटतं हेच मायक्रो फायनान्सचे तत्व बंगाल मधल्या नंतर येणाऱ्या मायक्रो फायनान्स कंपन्यानी वापरले असावे, जे पुढे एका अर्थतज्ज्ञाच्या प्रयोगात सामील झाले आणि त्याला नोबेल पारितोषिकही मिळाले (असे म्हणतात मला नक्की माहिती नाही हे ऐकीव माहितीवर मी लिहिते आहे यापुढील माहिती मात्र सत्य आहे) यामध्ये कलकत्त्यामधील समुद्रकिनाऱ्यावरच्या लोकांना शंभर रुपये या कंपन्या सकाळी देत असत दहा रुपये कट करून 90 रुपये हाती ठेवायचे म्हणजे त्या माणसाला शंभर रुपयाचे कर्ज दिले जायचे. तो माणूस त्यातून मासे खरेदी करायचा, खोबरे घ्यायचा कोथिंबीर आले हे सगळे तुकडे माशासकट विक्रीला एका साध्या पुठ्ठ्यावर किंवा कापडावर ठेवले जायचे. तेच त्याचे दुकान! संध्याकाळपर्यंत दीडशे रुपये त्याच्या हाती लागायचे तो फायनान्स कंपन्यांमध्ये 100 रुपये भरून उरलेला नफा घरी घेऊन जात असे असा मायक्रो फायनान्स च्या शंभर रुपयांच्या कर्जावर व्यवसाय चालत असे. कर्ज घेणारे हजारो लोक होते त्या कंपन्यांनाही चांगला फायदा मिळत असे. लोकांना चांगला रोजगार उपलब्ध झाला…. म्हणजे रोजगाराला कर्ज मिळाले छोट्या छोट्या हातांना काम मिळाले मायक्रो फायनान्स ची ताकद अनेकांनी ओळखली होती… आता तो काळ पैशाना किंमत असण्याचा होता. तिथंपासून आज तागायत बायका बचत करीत आहेतच. बायका त्या काळात घरात असायच्या. नवऱ्याने दिलेले रुपये दोन रुपये त्यातून आणा दोन आणि वाचवून केलेली हिंगाचे डब्यातली ती बचत तुम्हाला कल्पना येणार नाही इतकी मोठी ठरली. त्याचा एक उदाहरण देते…. माझी आई अशा बचतीमधून अर्धा तोळे सोने घेत असे. कारण तिला वाटायचं आपल्याला चार मुली आहेत, नवऱ्याला नोकरी नाही, काहीतरी तरतूद करायला हवी ना? बरं सगळे शिकणारे… त्या पद्धतीने तिने 25 तोळे सोने जमा केले होते तेव्हा सोन्याचा भाव १५० ते १६० दरम्यान होता कोणत्याही मुलीला सोने द्यावे लागले नाही त्यामुळे पुढे साधारण75 ते 80 स*** त्याची किंमत वाढत गेली ती आठशे रुपये पर्यंत गेली…. ती घर बांधताना खूप मोठी ठरली. हिंगाच्या डबीतील ही बचत संसाराला अनेक वेळा उपयोगी तर ठरलीच. त्याशिवाय कुणी आजारी पडलं, कुणाची फी भरावी लागली, घरात एखादी वस्तू घ्यावी लागली, वर्षभरासाठी धान्य भरावं लागलं तर या रकमेचा आधार पुरुष माणसांना खूप मिळत असे. कोणतेही आधार कार्ड नाही कुठेही बँक खाते नाही कुठलेही पासबुक नाही त्यावरचे कर्ज नाही जामीनदार नाही पण या हिंगाच्या डबीतील आणि फिरक्याच्या तांब्यातील, तांदळाच्या डब्यातील, बचत बँकेने त्या काळाच्या मध्यमवर्गीय माणसाला त्याच्या अडचणीच्या काळात तसेच त्याच्या काही प्रापंचिक गरजा पुरवण्यात किंवा थोडीशी वस्तुरूपी हौसमौज करण्यात खूप मोठा वाटा उचलला आहे. बायका कदाचित बाहेर मिळवायला गेल्या नाहीत पण आपला संसार उत्तम सांभाळून मुलांवर संस्कार करून सासू- सासऱ्याचा सांभाळ करून काटकसरीने पैसा दोन पैसे वाचूनत्यानी हिंगाच्या डबीत पतपेढी उभी केली, बचत गट उभे केले, भिशीगट उभे केले, मायक्रो फायनान्स कंपन्या उभ्या केल्या आणि बँका सुद्धा उभ्या केल्या…! मला त्या काळाच्या या चतुर बायकांच खूप कौतुक वाटतं. आज परिस्थिती अशी आहे घरातल्या चार बायका असतील तर सहा हजार रुपये सरकार मदत द्यायला लागले. घरातल्या महिला कामाला जात असल्यामुळे त्याच्या मदतनीस म्हणून अव्वाच्या सव्वा पगार घेऊन बायका काम करतायेत प्रसंगी अडवणूक करतायेत. चार पोळ्या लाटायचा पगार हजार रुपये मागतात. कारण त्यात व्हिजिट फी

असते. पण त्यांच्या बचत गटाने मात्र आता मोठे मोठे उद्योग आणि बँका उभारल्या आहेत. मध्यमवर्गीयाला घरामध्ये दोन खुर्च्या एखाद टेबल एखादा टेबल फॅन एखादी कॉट दही दुधाचे कपाट, हळदी कुंकवाला घालण्यासाठी एखादा गालीच्या ही स्वप्न पुरी करायला ती हिंगाची डबी नक्कीच कारणीभूत ठरली आहे. मी बरेच दिवस अशी हिंगाची डबी जपून ठेवली होती कारण त्यात तत्कालीन महिलांनी आपली स्वप्न साठवली होती आणि पूर्ण केली होती खूप शोधली पण ती हिंगाची डबी आता हरवली ती हिंगाची डबी नव्हती तर मध्यमवर्गीय सामान्य कुटुंबातल्या बाईंच्या स्वप्नाची जादुई डबी होती. ति डबी हरवली आणि हिंगाच्या डबीत बचत करणारी आणि पैशाचं मोल असणारी ती माणसंही काळाच्या ओघात हरवून गेली…!

© सुश्री शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका, सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग २ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग २ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ प्रस्तुती – श्री सुनील देशपांडे

बाबा आमटें ना मिळालेल्या आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कारादरम्यान घडलेला किस्सा…

स्थळ : राष्ट्रपती भवन. दरबार हॉल.

(२०१३ च्या जूनमध्ये मी आणि माझा मुलगा कौस्तुभ एका कामासाठी पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंग यांना भेटायला दिल्लीला गेलो होतो. महाराष्ट्र भवनातून आम्ही दोघं ऑटोरिक्षा घेऊन ७, रेस कोर्स रोडला पोहोचलो. आता ऑटोरिक्षामधनं ७, रेस कोर्स रोडला येणारी माणसं कदाचित विरळाच असतील. कारण गेटवरच्या सुरक्षारक्षकांच्या चेहऱ्यावर तरी तेच भाव होते!

‘‘क्या है? ’’ असं विचारताच मी माझं व्हिजिटिंग कार्ड दिलं. कार्ड आत काय गेलं, मिनिटभरातच सगळे पहारे खटाखट बाजूला झाले आणि काय चाललंय याचा थांगपत्ता लागण्याआधीच आम्ही पंतप्रधानांच्या ‘Special Protection Group’चे प्रमुख चतुर्वेदी यांच्या कार्यालयात पोहोचलोसुद्धा!)

इथून पुढे – – 

चतुर्वेदी मला विनंतीवजा शब्दांत म्हणाले, ‘‘विकासजी, आपको यदी कोई परेशानी ना हो तो क्या आप मुझसे दस मिनिट बात कर सकते है? ’’

मला झेपलंच नाही. मी म्हणालो, ‘‘जी हाँ, क्यूं नहीं? ’’

गप्पा सुरू झाल्या. चतुर्वेदी म्हणाले, ‘‘बाबांचं ‘भारत जोडो अभियान’ सुरू असताना मी विद्यार्थीदशेत होतो. अभियानादरम्यान बिहारमध्ये बाबांचं भाषण मी ऐकलं होतं. त्याच्या नोंदी आजही माझ्या डायरीत आहेत. बाबांच्या ‘ज्वाला और फूल’ (‘ज्वाला आणि फुले’चा हिंदी अनुवाद) या काव्यसंग्रहातल्या कविता मला तोंडपाठ आहेत! ’’

हे ऐकून आम्ही चाटच पडलो. पहारे का बाजूला झाले याचं उत्तर मिळालं. अर्थात आम्हाला बसणारे धक्के अजून संपले नव्हते. काही मिनिटांनी चतुर्वेदींच्या कार्यालयातून आम्ही प्रधानमंत्र्यांच्या निवासस्थानाकडे गेलो. वाटलं, आता तपासतील, मग तपासतील. पण कुणीच आमची झडती वगैरे घेतली नाही. पाच मिनिटं एका रूममध्ये बसलो.

एवढ्यात बाजूच्या खोलीचा दरवाजा उघडला गेला आणि आवाज आला, ‘‘आईये. ’’ *दरवाजा खुद्द पंतप्रधानांनी उघडला होता! *

आम्ही आत गेलो. सुमारे अर्धा तास मनमोहन सिंगजींशी विविध विषयांवर चर्चा झाली. मी त्यांना आनंदवन भेटीचं निमंत्रण दिलं आणि उभा राहून त्यांच्या पाया पडणार एवढयात ते खाली वाकत चक्क माझ्याच पाया पडले!

मी गडबडून गेलो. ओशाळत त्यांना म्हणालो, ‘‘ये आपने क्या किया? ’’

मला जवळ घेत ते म्हणाले, *‘‘ये बाबा के लिये है, उनको पहुँचा देना! ’’*

मी सद्गदित झालो. आम्ही परत निघतानाही खोलीचं दार पुन्हा त्यांनी स्वत:च उघडलं होतं!

‘पंजाब केसरी’ दैनिकाचे मुख्य संपादक *विजयकुमार चोपडम* पंजाबातल्या घुमान येथे आयोजित अ. भा. मराठी साहित्य संमेलनात बाबांचा गौरवपूर्ण उल्लेख करताना म्हणतात,

*‘‘संत नामदेवांनंतर पंजाबशी उत्कटतेने जुळलेली बाबा आमटे ही एकमेव मराठी व्यक्ती आहे! ’’*

गाडीवर आनंदवनाचं नाव वाचून वाहतूक पोलीस कधी कधी आनंदवनाची गाडी अडवत. (आजही अडवतात.) आणि ‘का अडवली? , ’ असं विचारलं की म्हणत,

*‘‘बाबांना, साधनाताईंना कधी पाहू किंवा भेटू शकलो नाही, निदान आनंदवनातील माणसांना भेटून ती अपूर्ण इच्छा पूर्ण झाल्याचं समाधान लाभावं म्हणून थांबवली गाडी!’’*

यावर आपण काय बोलणार?

बाबांच्या भूमिकेशी फारकत घेणारेही अनेक होते, पण बाबांनी आपल्या भूमिकेशी तडजोड केली नाही. आणि महत्त्वाचं म्हणजे टीकाकारांचा त्यांनी कधीही दु:स्वास केला नाही. त्यामुळे बाबांपासून दूर गेलेली माणसंही पुन्हा त्यांच्याशी जोडली गेली.

इंदिराजींचा आणि बाबांचा परिचय साठीच्या दशकापासूनचा. बाबांनी आणीबाणीविरोधात व काही शासकीय धोरणांविरोधात भूमिका घेतल्याने यात तणाव निर्माण झाला असला तरी इंदिराजींच्या मनातला बाबांविषयीचा आदर कमी झाला नव्हता. १९८३ साली त्यांनी आनंदवनाला भेट दिली होती. काही मिनिटांची ही प्रस्तावित भेट चक्क एक तास लांबली!

बाबा म्हणत,

*‘‘Great heroes of history are nothing to me. The ‘Uncommon determination’ in the ‘Common man’ is my ideal. I do not want to be a great leader. I want to be a man who goes around with an oil-can, offering help wherever needed. To me, the man who does this is greater than any holy man in a saffron robe. The mechanic with the oil-can is my ideal in life… ’’*

याच तत्त्वाने बाबा आयुष्य जगले. त्यामुळे जी सगळी माणसं त्यांच्याशी जोडली गेली त्याचं हेच कारण होतं, की बाबा आमटे हा *‘साधा’* माणूस होता, सर्वासाठी ‘Accessible’ आणि ‘Approachable’ होता. प्रत्येकाला आपलासा वाटणारा होता. सामान्य माणसांतल्या असामान्यत्वाचं मूल्य जाणणारा आणि जपणारा होता. बिघडलेल्या यंत्रास तेलपाणी करून ठीक करत पुढे वाटचाल करणारा ‘मेकॅनिक’ बाबांसाठी आदर्श होता.

न्याय्य हक्कांसाठी लढत अंधाराकडून उजेडाकडे प्रवास करणाऱ्यांबद्दल आपण नेहमी भाष्य करत असतो. पण *‘बाबांचा प्रवास हा उजेडाकडून अंधाराकडे जाणारा आहे, ’* असं कुणीतरी म्हटलं होतं. मलासुद्धा ही मीमांसा चपखल वाटते, याचं कारण समाजाने नाकारलेल्या कुष्ठरुग्ण बांधवांना बाबांनी अंध:कारातून प्रकाशाकडे आणलं आणि पुन्हा पुन्हा नवे अंधारे कोपरे धुंडाळून सामाजिक न्यायाची प्रकाशवाट उजळ करण्यासाठी ते सतत कार्यमग्न राहिले.

देवाविषयी त्यांच्या मनात विलक्षण करुणा! ते म्हणत, *‘‘ईश्वर माझा पेशंट आहे. तो आजारी आहे. कारण तो चालत नाही, बोलत नाही, दीनदुबळ्यांचं त्याला ऐकू येत नाही. उपचारांची गरज त्याला आहे! शिवाय तो प्रचंड बिझी आहे. अंतरिक्षात एवढया सूर्यमालिका आहेत. त्यांची जबाबदारी त्याच्यावर आहे. तेव्हा त्याचं काम त्याला करू द्यावं, आपलं आपण करावं. ’’*

एकूणात काय, तर ‘देव’ या व्यवस्थेकडे सगळं सुपूर्द करून आपली जबाबदारी झटकत निष्क्रिय आयुष्य जगणं त्यांना अमान्य होतं.

बाबा आमटे हा ‘घाईतला’ माणूस होता. त्यांना टेबल, ऑफिस असं काहीच नव्हतं. त्यांनी कधी जांभई दिल्याचं माझ्याच काय, कुणाच्याच स्मरणात नाही! तसंच पुनर्जन्म वगैरे गोष्टींवर बाबांचा विश्वास नव्हता.

‘‘मी एका आयुष्यात अनेक आयुष्यं जगलो. I am affluent in affection which society has showered on me. जगाचा निरोप घेताना मी पूर्णपणे समाधानी आहे, ’’ असं ते म्हणत.

बाबांना *‘अफाट नैतिक शक्तीचं धगधगणारं बलाढ्य इंजिन’* असं संबोधणाऱ्या *कवी कुसुमाग्रजांनी* बाबांवर *‘संत’* नावाची कविता केली होती. त्यातला काही अंश..

 

सोमनाथच्या सूर्यद्रोही जंगलात…

भूमीच्या गर्भात पाय खोचणाऱ्या

विराट वृक्षावर

अपराजित कुऱ्हाड मारणारा तू –

 

वणव्याच्या समोर

घनघोर पाऊस होणारा

दु:खाच्या समोर

फक्त निर्भेळ माणूस होणारा

 

दुबळ्या दयेच्या चिखलातून

माणुसकीला बाहेर काढणारा तू –

 

अरे आम्ही आहोत असे करंटे

 

की आमच्या पेठेत लागतात पताका

फक्त मंत्री आले तर

 

सोनेरी अंबारीचे ऐरावत

जेव्हा रस्त्याने झुलू लागतात

 

तेव्हा आमचे हिशेबी हात

जुळून येतात छातीवर

 

आणि तुझ्यासारखे संत

 

ऐहिकाच्या प्रपंचातील

ईश्वरी अंशाचे रखवालदार

निघून जातात

गस्त घालीत अंधारात

 

उद्ध्वस्त मनांच्या मोहल्ल्यातून

आसवांच्या दलदलीतून

दु:खानं उसवलेल्या दुनियेवर

अमृताचं सिंचन करीत…

 

हे यात्रिका,

विस्कटलेल्या शरीरांचा

चुरगळलेल्या आत्म्यांचा जत्था घेऊन

तू तुझ्या मार्गानं जा

 

मागे वळून पाहू नकोस

 

जो हिशेब कधी केला नव्हतास

तो यापुढेही करू नकोस

 

तुला साथसोबत आम्ही करणार नाही

 

आमच्या दिवाणखानी दिव्यांचा प्रकाश

तुझ्या रात्रीवर पडणार नाही

 

तुझ्या अलौकिक वेदनेसाठी

आम्ही रडणार नाही

 

आमच्या जयघोषांच्या जमावातही

तू राहणार आहेस एकटा

 

दक्षिण ध्रुवावरील बर्फासारखा

अगदी एकटा

 

पण असेच एकाकीपण

लाभले होते ख्रिस्ताला

 

ज्याच्या हाताचा ठसा

मला दिसतो आहे तुझ्या हातावर

 

असेच एकाकीपण

लाभले होते बुद्धाला

 

ज्याच्या प्रज्ञेचे किरण

मला दिसताहेत तुझ्या पथावर

 

हीच तुझी सोबत

आणि हेच तुझे संरक्षण…

 

‘जेथे जाशी तेथे..

तो तुझा सांगाती

चालवील हाती- धरोनिया.. ’

– समाप्त – 

लेखक : श्री विकास आमटे

प्रस्तुती : सुनील देशपांडे

ईमेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ फक्त दोन पैसे?? – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे ☆

श्री सुनीत मुळे

 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ फक्त दोन पैसे?? – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे 

फक्त दोन पैसे????

जे काम करोडोंच्या जाहिराती करू शकत नाहीत, ते काम दोन पैशांची श्रद्धा_आणि_परंपरा करून दाखवते.

कुंभमेळ्याचं ‘२ पैशांचं’ मार्केटिंग सिक्रेट; जेव्हा मालवीयजींनी इंग्रज व्हाईसरॉयलाच बुचकळ्यात टाकलं!

मंडळी, आजच्या काळात एखादा इव्हेंट गाजवायचा असेल, तर काय लागतं? तगडा ‘मार्केटिंग बजेट’, सोशल मीडिया इन्फ्लुएन्सर्स, गुगल ॲड्स आणि बरंच काही. पण तुम्हाला माहितीये का, जगातील सर्वात मोठ्या मानवी समूहाला एकत्र आणण्यासाठी फक्त ‘दोन पैसे’ पुरेसे होते? हो, तुम्ही बरोबर ऐकलंत, फक्त दोन पैसे!

ही गोष्ट आहे १९४२ सालची. जग दुसऱ्या महायुद्धाच्या आगीत होरपळत होतं. तिकडे ब्रिटनने भारतीयांना त्यांच्या संमतीशिवाय युद्धात ढकललं होतं, ज्यामुळे देशात संतापाची लाट होती. याच काळात अलाहाबादमध्ये (आताचं प्रयागराज) कुंभमेळ्याचं आयोजन करण्यात आलं होतं. इंग्रजांना कुंभमेळ्यात प्रचंड रस होता, पण तो श्रद्धेपोटी नाही, तर त्यातून मिळणाऱ्या ‘करा’मुळे (Tax). त्यांनी कुंभला एक ‘महान जत्रा’ म्हटलं होतं आणि तिथून मोठ्या प्रमाणावर पैसे कमावण्याचा त्यांचा प्लॅन होता.

अशातच भारताचे तत्कालीन व्हाईसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो कुंभमेळ्याला भेट देण्यासाठी आले. त्यांच्यासोबत होते महामना पंडित मदन मोहन मालवीय. मालवीयजींचं प्रयागवर आणि कुंभवर अतोनात प्रेम होतं. कुंभमध्ये जमलेली ती अथांग गर्दी, लोकांची अढळ श्रद्धा आणि शिस्त पाहून व्हाईसरॉय पार थक्क झाले. त्यांच्या डोक्यात एकच विचार चक्रावत होता — एवढ्या लोकांना इथे कसं काय आणलं गेलं?

व्हाईसरॉयनी आश्चर्याने मालवीयजींना विचारलं, “पंडितजी, या जत्रेसाठी तुम्ही किती मार्केटिंग केलं? एवढ्या मोठ्या संख्येने लोक जमवण्यासाठी प्रसिद्धीवर नक्की किती पैसा खर्च झाला असेल? ” मालवीयजींनी शांतपणे उत्तर दिलं, “फक्त दोन पैसे! “

लिनलिथगो यांना वाटलं मालवीयजी थट्टा करतायत. त्यांनी पुन्हा विचारलं, “काय म्हणालात? फक्त दोन पैसे? हे कसं शक्य आहे? ” तेव्हा मालवीयजींनी आपल्या खिशातून एक छोटं ‘पंचांग’ काढलं आणि व्हाईसरॉयच्या हातात ठेवलं. ते म्हणाले, “हे पंचांग फक्त दोन पैशांना मिळतं, जे प्रत्येक भारतीयाच्या घरात असतं. यात कोणत्या वर्षी, कोणत्या तारखेला कुंभ होईल आणि कोणत्या मुहूर्तावर स्नान असेल, हे स्पष्ट लिहिलं असतं. लोक ही तारीख पाहतात आणि आपोआप घराबाहेर पडतात. त्यांना बोलावण्यासाठी कोणत्याही जाहिरातीची किंवा सरकारी निमंत्रणाची गरज नसते. “

खरं सांगायचं तर, हे उत्तर ऐकून व्हाईसरॉय निरुत्तर झाले. ज्या काळात दळणवळणाची साधनं कमी होती, रेडिओ-टीव्हीचा पत्ता नव्हता, त्या काळात एका छोट्या पंचांगाने कोट्यवधी लोकांना एका ठिकाणी आणलं होतं. हाच तो ‘सांस्कृतिक अल्गोरिदम’ आहे, जो आजही जगाला बुचकळ्यात टाकतो.

आज २०२६ मध्ये आपण जेव्हा मागे वळून पाहतो, तेव्हा परिस्थिती किती बदलली आहे, नाही का? नुकताच २०२५-२६ चा महाकुंभ पार पडला, जिथे ६६ कोटींहून अधिक लोकांनी श्रद्धापूर्वक डुबकी लावली. आजही तिथे डिजिटल तंत्रज्ञान, AI चॅटबॉट्स आणि हाय-टेक सुरक्षा आहे, पण मूळ आधार मात्र तेच ‘पंचांग’ आणि तीच ‘श्रद्धा’ आहे. अगदी अलीकडे, फेब्रुवारी २०२६ मध्ये केरळच्या ‘कुंभ’वरून (महामघम उत्सव) वाद सुरू झाला, तिथल्या पुलाच्या बांधकामावर बंदी आली, पण भाविकांची ओढ मात्र तसूभरही कमी झाली नाही.

मंडळी, मदन मोहन मालवीयजींची ही गोष्ट आपल्याला एक खूप मोठा धडा शिकवते. जेव्हा तुमची संस्कृती आणि परंपरा लोकांच्या मनाशी जोडलेली असते, तेव्हा तुम्हाला महागड्या ‘ब्रँडिंग’ची गरज उरत नाही. इंग्रजांनी कुंभवर कर लावून पैसे कमावण्याचा प्रयत्न केला, पण भारतीयांनी मात्र पंचांगाच्या बळावर आपली परंपरा जिवंत ठेवली.

आजच्या ‘व्हायरल’ जगात आपण अनेकदा मूळ गोष्टी विसरतो. पण लक्षात ठेवा, जे काम करोडोंच्या जाहिराती करू शकत नाहीत, ते काम दोन पैशांची श्रद्धा आणि परंपरा करून दाखवते.

तुम्हाला काय वाटतं? आजच्या हाय-टेक युगातही आपली ही पंचांग आणि मुहूर्ताची परंपरा तितकीच प्रभावी आहे ना?

लेखक : अज्ञात  

प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares