हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत भोला ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है  श्री मनजीत भोला जी की पुस्तक उजाले हर तरफ़ होंगे पर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत भोला ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

किताब – उजाले हर तरफ़ होंगे

कवि/शायर – मनजीत भोला

समीक्षाकर्ता- मनजीत सिंह

प्रकाशक – सत्यशोधक फाउंडेशन, कुरुक्षेत्र

कीमत –80 रूपये भारतीय

पृष्ठ संख्या –64

☆ समाज को आइना दिखाता ग़ज़ल संग्रह उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत सिंह

मनजीत भोला की ग़ज़ल-कृति “उजाले हर तरफ़ होंगे” समकालीन समाज की उन दरारों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर रोशनी, आस्था और नैतिकता के नाम पर ढक दिया जाता है। किताब की पहली ग़ज़ल के अशआर यह स्पष्ट कर देते हैं कि कवि समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण वस्तुओं में नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिक मूल्यों के उस दुरुपयोग में देखता है, जिसे ताक़तवर वर्ग अपने स्वार्थ के लिए करता है। रोशनी स्वयं किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है, तो अँधेरा बना रहता है और सच ओझल हो जाता है।कवि उस आस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जो संवेदना और विवेक से कटकर मात्र पत्थर बन जाती है। ऐसी इबादत, जो इंसान को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि अपराध को पवित्र शब्दों में ढकने का माध्यम बन जाती है, समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मासूमों की हत्या को “शहादत” कहकर प्रस्तुत करना इसी नैतिक पतन का उदाहरण है, जहाँ भाषा का इस्तेमाल सच को छुपाने के लिए किया जाता है।किताब की अगली ग़ज़लों में कवि गरीब बस्तियों के यथार्थ को सामने लाता है। वहाँ दिन तो किसी तरह धूप के सहारे गुजर जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं। मज़दूर स्त्री का शरीर थकान से झुलसा हुआ है, फिर भी उसे काम पर जाना पड़ता है—आराम उसकी पहुँच से बाहर है। सरकार की घोषणाएँ रोटियों का विकल्प नहीं बन पातीं, बल्कि अक्सर वे गरीबों को ही बदनाम करने का कारण बन जाती हैं। लेबर चौक पर चाय पीता मज़दूर दूध के दाम नहीं जानता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में बुनियादी ज़रूरतें भी विलास बन चुकी हैं।शिक्षा को लेकर कवि का स्वर और तीखा हो जाता है। जिन बच्चों के लिए स्कूल के दरवाज़े ही बंद हैं, उनके लिए योजनाएँ बेमानी हैं। अगर समाज एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकता, तो झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिख देना केवल दिखावा है—विचारों के साथ एक क्रूर मज़ाक।पिछले समय की याद दिलाती ग़ज़ल में कवि बताता है कि यह सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। कभी सामाजिक जीवन में संयम था, धार्मिक सहिष्णुता थी और शिक्षा घर से शुरू होती थी। मंटो जैसी सच्ची आवाज़ें असहज करती थीं, लेकिन औरत की इज़्ज़त सुरक्षित थी। मक़तब और स्कूल सबके लिए खुले थे, ताकि कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे।कवि तथाकथित रहबरों पर भी सवाल उठाता है—वे जो रास्ता दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन डर पैदा करते हैं। तपती रेत पर बने कदमों के निशान की तरह उनकी साख भी मिट जाती है। हर गली में पैदा हुए “गिरधर” उस धार्मिक अराजकता का प्रतीक हैं, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को सत्य का ठेकेदार समझने लगता है।

अंतिम ग़ज़ल में कवि लोकतंत्र और राजनीति की विडंबना पर सीधा प्रहार करता है। खौफ़ की दुकानें चलाने वाले लोग फूलों की बात होते ही गायब हो जाते हैं। शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे असली मुद्दों के बजाय लहू से लिखे नारों की माँग की जाती है, क्योंकि आज वोट विकास से नहीं, डर और हिंसा से हासिल किए जाते हैं।

इस प्रकार “उजाले हर तरफ़ होंगे” केवल गजल-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का नैतिक दस्तावेज़ है—जो यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम सचमुच उजालों की ओर बढ़ रहे हैं, या अँधेरे की राजनीति को ही रोशनी मान बैठे हैं।मनजीत भोला की किताब उजाले हर तरफ़ होंगे के पहली ग़ज़ल के कुछ अशआर जो इस प्रकार से हैं

चरागों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है

अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है‌।

 *

जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्थर है

इबादत से बड़ी गाफ़िल यहाँ पर शय नदामत है।

बहाना मत ज़रा आँसू समझ लेना मेरे बाबा

क़त्ल मेरा करेंगे वो बताएंगे शहादत है।

समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण चीज़ों में नहीं है, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिकता को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों में है। रोशनी अपने आप में किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है तो अँधेरा बना रहता है।

कवि कहता है कि लोग जिस आस्था को पूज रहे हैं, वह कई बार सिर्फ़ एक निर्जीव पत्थर बनकर रह जाती है, क्योंकि सच्ची इबादत—जो इंसान को बेहतर बनाए—उसकी जगह दिखावा और खोखली नदामत ले लेती है। यहाँ भावना है, समझ नहीं।मासूमों की हत्या को बड़े शब्दों और पवित्र नामों से ढक दिया जाता है। क़त्ल को “शहादत” कहकर पेश किया जाता है ताकि अपराधी अपने अपराध से बरी दिखें और समाज भ्रम में रहे।

इसके बाद कवि सत्ता की ओर उँगली उठाता है—वह कहता है कि हुकूमत का नशा इंसान को अंधा कर देता है। शासक जिस कुर्सी पर बैठा है, वह उसकी निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि जनता की अमानत है, जिसे वह भूल जाता है।अंत में कवि इस नैतिक विडंबना पर चीख़ उठता है कि जिनके हाथ खून से रंगे हैं, वही अगर दान और भलाई का ढोंग करें तो यह पूरे समाज के लिए क़यामत जैसी स्थिति है—जहाँ सही और ग़लत की पहचान ही मिट जाती ‌।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

धूप को दिन रखा गया है बेचरागां शाम है

तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर

 कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है

 *

ये दिया है वो दिया है रोटियां पर हैं कहाँ

 घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है

 *

चाय जाकर वो पिए है रोज़ लेबर चौक पर

क्या पता मज़दूर को किस दूध का क्या दाम है

गरीब बस्तियों में अभाव और अँधेरा होना कोई नई बात नहीं है। वहाँ दिन को तो किसी तरह धूप के सहारे गुज़ार लिया जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं, यानी जीवन में रोशनी और सहारा नहीं है। एक मज़दूर स्त्री का शरीर थकान और धूप से झुलस चुका है, फिर भी वह काम पर जाने को मजबूर है। मन और तन दोनों आराम चाहते हैं, पर गरीबी में विश्राम एक सपना ही रहता है।

सरकार की तरफ़ से योजनाओं और सुविधाओं की घोषणाएँ तो बहुत होती हैं, पर ज़मीन पर लोगों के पास रोटियाँ तक नहीं हैं। ये खोखली घोषणाएँ उल्टा गरीबों को ही बदनाम करती हैं।मज़दूर रोज़ लेबर चौक पर चाय पीता है, पर उसे दूध के दाम तक का सही अंदाज़ा नहीं, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में मूलभूत चीज़ें भी उसकी पहुँच से बाहर हैं।जो बच्चे स्कूल के गेट के भीतर तक नहीं जा सकते, उनके लिए आपकी सारी योजनाएँ बेकार हैं, क्योंकि शिक्षा तक पहुँच ही नहीं है।अगर समाज और सरकार बच्चों को एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकते, तो फिर झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिखना केवल दिखावा है, विचारों का सम्मान नहीं।अब यह शहर मज़हब के नाम पर इतना हिंसक और पाखंडी हो गया है कि यहाँ रहना मुश्किल लगता है—जिसके मुँह में राम का नाम है, उसी के हाथ में दूसरों को चोट पहुँचाने की छुरी है।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

 पीते न थे वो हाफ़ अभी कल की बात है

 आता नज़र था साफ अभी कल की बात है

 *

शामिल सबा में थी यहाँ खुशबू अजान की

 कोई न था खिलाफ अभी कल की बात है

 *

बारह खड़ी के साथ में वालिद ज़नाब के

 पढ़ते थे काफ गाफ अभी कल की बात है

 *

मंटो की बू के साथ अदालत में जो गया

 आपा तेरा लिहाफ़ अभी कल की बात है

यह सब बहुत पुराने ज़माने की बात नहीं है, बस कल तक ही ऐसा था। लोग खुलेआम शराब नहीं पीते थे और समाज में एक तरह की साफ़गोई और संकोच मौजूद था।

हवा में अज़ान की खुशबू घुली रहती थी और किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होती थी। धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान सामान्य बात थी।पिता अपने बच्चों के साथ बैठकर बारहखड़ी पढ़ाते थे, अक्षरों की पहचान कराते थे। शिक्षा घर और परिवार का हिस्सा हुआ करती थी।मंटो जैसे लेखक की सच्ची और कड़वी रचनाओं को लेकर अदालत तक जाया जाता था, लेकिन औरत की इज़्ज़त और मर्यादा सुरक्षित मानी जाती थी।रात में अगर किसी का कंधा तकिये की तरह इस्तेमाल हो भी जाए, तो उसमें कोई अश्लीलता या संदेह नहीं खोजा जाता था—नियत पर शक नहीं होता था।मक़तब और स्कूलों के दरवाज़े सबके लिए खुले थे और पढ़ाई की फीस भी माफ़ रहती थी, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

राह में हमको मिले रहबर कई

दिल से डर कई हो गए हैं दूर

हैं निशाँ कदमों के तपती रेत पर

 गुम गए लेकिन यहाँ पे सर कई

 *

आज मीरा बावली को क्या पता

 हर गली पैदा हुए गिरधर कई

ज़िंदगी की राह में हमें कई ऐसे लोग मिले जो खुद को रहबर कहते थे, लेकिन उनसे दिल में डर पैदा होता था। ऐसे लोग अब दूर हो चुके हैं, पर उनका असर रह गया है।

तपती हुई रेत पर पैरों के निशान तो दिखाई देते हैं, लेकिन आगे चलकर वे मिट जाते हैं। यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके सिर तो हैं, पर दिशा और सोच खो चुकी है।

आज अगर मीरा को बावली कहा जाता है, तो उसे यह भी नहीं पता कि अब हर गली में अपने-अपने गिरधर पैदा हो गए हैं—हर कोई खुद को ईश्वर या सत्य का प्रतिनिधि मानने लगा है।राजधानी में एक ही महल को रोशनी चाहिए थी, लेकिन उसकी इस चाह में कई घर जलकर खाक हो गए—सत्ता की चमक आम लोगों की बर्बादी बन गई।अब स्वाभिमान और आत्मसम्मान सिर्फ़ शहरों में ही नहीं बिकता, बल्कि गाँवों में भी उसके दफ़्तर खुल गए हैं—यानी समझौते और सौदेबाज़ी हर जगह फैल चुकी है।

अंतिम ग़ज़ल के कुछ अशआर  

दुकानें खौफ की बेशक यहाँ पर वो चलाते हैं

चले जो बात फूलों की कहीं पे खो से जाते हैं

 *

हवा आ ही गई है तो भला मायूस क्यों करना

 धरो तुम चाक पर माटी कोई दीपक बनाते हैं

 *

यहाँ पर लोग रावण से बुरे भी हैं जलाने को

 मगर हर साल पुतला हम बनाते हैं जलाते हैं

 *

पढ़ाई की, कमाई की, दवाई की न बातें हों

 लिखो नारे लहू से तुम, लहू से वोट आते हैं

यहाँ कुछ लोग डर और भय का कारोबार खुलेआम करते हैं। वे समाज को खौफ़ में रखकर अपना स्वार्थ साधते हैं, लेकिन जैसे ही प्रेम, करुणा और फूलों जैसी कोमल बातों की चर्चा होती है, वे लोग चुपचाप गायब हो जाते हैं।

कवि कहता है कि जब बदलाव की हवा चल ही पड़ी है, तो निराश होने का कोई कारण नहीं। अगर इरादा और उम्मीद मौजूद हो, तो साधारण मिट्टी को भी चाक पर रखकर एक दीपक बनाया जा सकता है—यानी छोटे साधनों से भी रोशनी पैदा की जा सकती है।समाज में ऐसे लोग भी हैं जो रावण से भी अधिक क्रूर हैं और सच में जलाए जाने योग्य हैं, लेकिन विडंबना यह है कि हम हर साल केवल रावण का पुतला बनाकर जला देते हैं, जबकि असली बुराइयों को हाथ तक नहीं लगाते।

अंत में कवि राजनीति की क्रूर सच्चाई उजागर करता है—यहाँ शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे ज़रूरी मुद्दों पर बात नहीं की जाती। इसके बजाय खून से लिखे नारे गढ़े जाते हैं, क्योंकि आज वोट समझ और विकास से नहीं, बल्कि हिंसा, डर और लहू के सहारे जुटाए जाते हैं। अंत में मैं यही कहता हूं –

 उजालों की नुमाइश में अँधेरा पल रहा है

हर इक चिराग़ बिकता है, अँधों का शहर रहा है

 *

जो सच कहे वही अक्सर सलीबों पर चढ़े है

यहाँ झूठ के दरबार में इनाम ही बड़ा है

 *

किताबों से जो डरते हैं वही तख़्तों पे बैठे

कलम का इक इशारा भी उन्हें खटका हुआ है

 *

वो भूखे पेट से पूछे हैं क्या होता है वादा

क़लम से लिख दिया जिसने कभी देखा न खाया

 *

मज़हब की ओट में नफ़रत की खेती हो रही है

भगवान के ही नाम पर इंसान कट रहा है

**

समीक्षक : श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२१ ⇒ मेहनत की लकीर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेहनत की लकीर ।)

?अभी अभी # ९२१ ⇒ आलेख – मेहनत की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उद्धयेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

 न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

लकीर को हम रेखा भी कहते हैं। जन्म के साथ ही हमारे भाग्य को भी जोड़ दिया जाता है, ग्रह, नक्षत्रों और रेखाओं से। आज जन्म लिए बालक का भविष्य फल कई वर्षों से नियमित रूप से दैनिक अखबारों की जगह घेरता चला आ रहा है। कुछ लोग तो “आपका आज का भविष्य फल ” पढ़कर ही आंखें खोलते हैं। वर्तमान में भविष्य खोजना ही कुछ लोगों का पुरुषार्थ होता है। वे हमेशा किसी अच्छे मुहूर्त की ताक में ही बैठे रह जाते हैं, और मौका हाथ से निकल जाता है।

हस्त रेखा अथवा ज्योतिष में जिनकी रुचि होगी वे शायद यह भली भांति जानते होंगे कि हमारे हाथ में मेहनत और पुरुषार्थ की भी शायद कोई रेखा होती हो। लेकिन लोग अक्सर नौकरी धंधा, शादी, बीमारी और बाल बच्चों की आस में ही किसी ज्योतिषी के आगे हाथ फैलाते देखे जाते हैं और व्रत उपवास, पुखराज, मूंगा और दान दक्षिणा के बिना बात बनते नजर नहीं आती।।

नेपोलियन का हाथ देखकर एक ज्योतिषी ने कह दिया था कि आपके जीवन में तो भाग्य रेखा ही नहीं है, आप सफल नहीं हो सकते। और सुना है कि नेपोलियन ने अपनी तलवार निकाली और अपनी हथेली चीरकर चुनौती दी, भाग्य की लकीर ऐसे बनती है पुरुषार्थ से। हाथ पर हाथ धरकर बैठने से नहीं।

जिनके हाथ में मेहनत की लकीर होती है, फिर उसके आगे सभी लकीरें फीकी पड़ जाती हैं, क्योंकि परिश्रम और पुरुषार्थ के आगे तो भाग्य भी नहीं टिक पाता।।

अब एक तरफ हमारा चार्वाक दर्शन भी है जो कहता है, कर्ज़ करो और घी पीयो जिसे लोग आजकल कोलोस्ट्रॉल घटाते हुए, कर्ज़ लेकर विदेशों में, चैन से जीयो के सिद्धांत के साथ अमल में ला रहे हैं। और अगर उनका हार्ट फेल भी हो गया, तो कौन सा दुनिया में प्रलय आ जाएगा। उधर हमारी आधी आबादी भाग्य, ईश्वर और मलूकदास की आस्तिकता और आशावाद के गुणगान करती नजर आ रही है ;

अजगर करे ना चाकरी

पंछी करे ना काम।

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम।।

 जय श्रीराम

याद आती है, पुराने दौर की फिल्म नया दौर, जिसमें साहिर का एक गीत था, “साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। ” मेहनत जब संगठित होती है, तब मुट्ठी मजबूत होती है, एकता में सफलता और संपन्नता के दर्शन होते हैं। लेकिन संगठित मजदूर पूंजीवाद के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए मजदूर हो या जनता, इनके बीच नेता को लाया जाए। वह आपको नारा देगा, नई नई मांगें देगा, आपके लिए पूंजीपतियों के साथ सौदा करेगा और संसद में आपकी आवाज बुलंद करेगा। देखिए मेहनत की लकीर किधर जाती दिखाई दे रही है।।

मेहनत के बिल्कुल करीब ही, एक गरीबी रेखा भी है

जिसे आजकल वोट बैंक भी कहते हैं। जो मेहनती लोग इस गरीबी रेखा से नीचे होते हैं, उनके क्रेडिट कार्ड को बीपीएल कार्ड कहते हैं, अंग्रेजी में बोले तो below poverty line हितग्राही। पानी बिच मीन प्यासी ! बस यही हाल होता है इस गरीबी रेखा का। सुरसा का मुंह है यह गरीबी रेखा। इन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए क्या क्या नहीं कर रही सरकार। उज्जवला, आयुष्मान, मान या ना मान। और बीपीएल वाली यह मीन इस रेखा के नीचे इतनी सुरक्षित है कि अब इस लकीर से ऊपर आना ही नहीं चाहती। आज भी याद है वह मछली वाला गीत ;

मछली जल की रानी है

जीवन इसका पानी है।

हाथ लगाओ, डर जाती

बाहर निकालो, मर जाती।।

मेहनत तो घोड़ा गधा भी कर लेता है। आजकल मेहनत के साथ साथ स्किल डेवलपमेंट भी जरूरी है। व्यर्थ पसीना बहाने से क्या फायदा। कहीं वायदा सौदे में फायदा तो कहीं शेयर मार्केट में जबरदस्त उछाल। कई नटवरलाल घर बैठे हर्षद मेहता और चार्ल्स शोभराज बन गए। जिनका भाग्य अच्छा था, आगे बढ़ गए, जिनका भाग्य खराब था, जेल में चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग।।

काश, हमारे हाथ में संतान योग, सफलता, संपन्नता, राजयोग, और वैभव लक्ष्मी की जगह, कुछ रेखाएं मेहनत, लगन, परिश्रम, आशा, विश्वास, आत्म विश्वास और इमानदारी की भी होती तो कितना अच्छा होता। हम आपस में हाथ से हाथ मिलाते, एक दूसरे का हाथ चूमते, एक ऐसी दुनिया बनाते जहां पत्थर की लकीर से भी मजबूत मेहनत की लकीर होती।

उद्यम ही मेहनत है, सूझ बूझ है। बुद्धि ज्ञान और विवेक उसके वाहन हैं। अपनी प्रतिभा को पहचानना और उसको अमल में लाना ही पुरुषार्थ है। श्रम और परिश्रम के बीच की दूरियों को कम करना है। आलस्य को विराम और श्रम को सम्मान ही हमारे हाथ की वह लकीर है जो हमें गीता के निष्काम कर्म के करीब ले जा सकती है। कोई है ऐसा हस्त रेखा विशेषज्ञ, जो हाथ में मेहनत की लकीर भी बता दे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८६ ☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८६ ☆ 

☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

झूले का पुल झूल – झूल कर

मुश्किल को आसान बनाएँ।

जाते हम स्कूल हमेशा,

रस्सा से सरिता उतराएँ।।

 *

अपना लक्ष्य रहा है पढ़ना

हँसते – हँसते काम करेंगे।

ज्ञान और विज्ञान समझकर

जग में अपना नाम करेंगे।।

 *

खुशियाँ ही जीवन की कुंजी

सबसे ही हम प्रेम बढ़ाएँ।

* *

सोच – समझ कर काम करें हम

बाधाओं से हम लड़ते हैं।

हम हैं पूरे शाकाहारी,

योग हमेशा हम करते हैं।।

विश्वासों को कभी न तोड़ें

मस्ती करें और हर्षाएँ।।

 **

पावन है सच्चा है मन भी

देते नहीं किसी को गच्चा।

ज्योति ज्ञान की जलती अंतस

मुस्काता हर बच्चा – बच्चा।।

 *

मूल्य समय का हम पहचानें

मिले सफलता वंदन गाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४० – बाल कहानी — जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी बाल कहानी — जबान फिसली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४०

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप मुझे जानते हो ? मैं कौन हूं ?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ” आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो, ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ” जबान ने कहा, ” आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहींनहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा, ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया. उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

—–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “शब्द, देह, रोमांच!” ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

☆ 🕺 शब्द, देह, रोमांच! 🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

जड बोजड शब्दांचा

नको कवितेत पसारा,

साध्या सोप्या शब्दांनी

फुलू दे तिचा पिसारा!

*

यमक वृतांचा उगीच

हवा कशास अट्टाहास,

भावार्थ त्यात दडला

हृदयी भिडावा खास!

*

अर्थ भिडता हृदयाला

डोळे भरून यावेत,

तिला उचलून प्रेमाने

हळूच घ्यावी कवेत!

*

संपता अर्थगर्भ रचना

काटा अंगावरी फुलावा,

होता रोमांचित अंग अंग

सारा देहची शब्द व्हावा!

सारा देहची शब्द व्हावा!

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- प्रकाशन समारंभाची सांगता झाली पण त्या आठवणी मात्र इतकी वर्ष उलटून गेल्यानंतर मनात आजही तितक्याच ताज्या आहेत! कारण त्या कार्यक्रमाचं चोख नियोजन जसं, तसंच या समारंभाच्या निमित्ताने माझ्या उर्वरित आयुष्याला मिळालेलं एक अनोखं वळणसुद्धा! ते वळण म्हणजे त्या दिवशीच्या पहाटे मला पडलेल्या स्वप्नाचं ‘त्या’च्या कृपेने अकल्पितपणे सत्यात होणारं परिवर्तनच होतं!!)

आणि याला सुरूवात होणार होती मी सोमवारी बॅंकेत पोचल्यानंतर लगेचच!

सोमवारी मी बँकेत गेलो तेव्हा याच सर्क्युलरच्या संदर्भात सविस्तर चर्चा करण्यसाठी वखरेसाहेबांनी मला आणि माझ्या असिस्टंटना तातडीने केबिनमधे बोलावून घेतलं. मी डायरीत सर्व महत्त्वाचे मुद्दे त्या रात्री व्यवस्थित लिहून ठेवले होतेच. त्यामुळे सुरूवातीलाच मी या योजनेचे सर्व नियम व अटीं यांची थोडक्यात माहिती सांगितली. या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेला प्रतिसाद म्हणून स्वेच्छानिवृत्ती साठी आता स्टाफमेंबर्सकडून येणाऱ्या अर्जांची अक्षरश: रीघ लागणार होती. त्यामुळे मुदत संपेपर्यंतचा पुढचा संपूर्ण महिना आम्ही याच कामाच्या चक्रात फिरत रहाणार होतो!

या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेतून मिळणारे आर्थिक लाभ आणि त्यामुळे उर्वरीत आयुष्यात मिळणारी निश्चिंतता यांचा विचार केला तर कुणालाही मोह पडावा अशीच ही योजना होती. कमीतकमी वीस वर्षे सर्व्हिस झालेलं कुणीही या योजनेचा लाभ घेऊ शकणार होतं. आर्थिक लाभ म्हणजे उर्वरीत सर्व्हिस मुदतीच्या ५०% मुदतीचा पगार अतिरिक्त लाभ म्हणून मिळणार होता!

असं असूनही ज्यांच्या कौटुंबिक जबाबदाऱ्या अद्याप पूर्ण झालेल्या नाहीत ते मात्र इच्छा असूनही या योजनेचा लाभ घेण्याचं धाडस करणं शक्य नव्हतं. तसंच ज्यांच्या विरूध्द कामामधील अनियमिततांमुळे अंतर्गत चौकशी सुरू आहे तेही या योजनेच्या लाभापासून वंचित रहाणार होते. अशा केवळ नाईलाजाने मागे रहाणाऱ्यांना अचानक निर्माण होणारं स्टाफ शाॅर्टेज, बॅंकांमधे लगेचंच सुरू होणाऱ्या काॅम्प्युटरायझेशनमुळे नवीन भरतीची फारशी शक्यता नसणे या सगळ्यामुळे बॅंकेतलं रूटीन मॅनेज करण्यासाठीही तारेवरची कसरत करावी लागणार होती! आणि अर्थातच माझी तेव्हा अजून नऊ वर्षे सर्व्हिस शिल्लक असल्याने मीही मागे रहाण्यातलाच एक असल्याने मलाही त्या तारेवरच्या कसरतीची मानसिक तयारी आत्तापासूनच करायला हवी होती,.. पण त्याचं आत्तापासून दडपण घेण्यात अर्थ नव्हता.

या सर्क्युलरबद्दलची आमची चर्चा पुढे तासभर सुरू होती आणि मग चहा येईपर्यंत आपल्या प्रत्यक्ष झोनल आॅफिसमधून कोण कोण स्वेच्छानिवृत्ती स्विकारू शकेल याविषयीचे अंदाज बांधणं सुरू झालं. कारण त्याचा थेट नकारात्मक परिणाम आमच्यापैकी मागे रहाणाऱ्या मोजक्या स्टाफलाच सहन करावा लागणार होता! याचं दडपण आमच्यापैकी इतर कुणाला त्याक्षणी फारसं जाणवलं नसलं तरी संपूर्ण झोनल आॅफिसचे सर्वेसर्वा म्हणून वखरे साहेबांना जाणवलं असणारच. कारण याच अनुषंगाने त्यांची आलेली प्रतिक्रिया प्रथमदर्शनी तरी मला बुचकळ्यात टाकणारीच होती.

“खरं सांगू कां? .. मला शक्य असतं ना, तर या योजनेनुसार पहिला अर्ज मी स्वत:च केला असता… ” ते वरवर हसत गंमतीने बोलावं तसं म्हणाले होते!

मीटिंग संपवून मी केबिनमधे आलो ते मनात तरंगत राहिलेले हे सगळे विचार सोबत घेऊनच. अर्थात मी त्यात फार वेळ गुंतून पडणं योग्य नव्हतं. समोरच्या कामांचा निपटारा अधिक महत्त्वाचा होता!

त्यादिवशी सगळी कामं आवरून मी ड्राॅवर लॉक केला आणि ऑफिसमधून बाहेर पडलो तेव्हा मात्र दुर्लक्ष करून मी दूर सारलेले तेच सगळे विचार मनात पुन्हा डोकावू लागले. त्या विचारांचं दडपण नव्हतं, फारशी उत्सुकता नव्हती, चलबिचल नव्हती, तरीही ते विचार झटकून टाकावेत असंही वाटेना. ‘मला शक्य असतं तर स्वेच्छानिवृत्ती स्वीकारण्यासाठी मीच पहिला अर्ज केला असता.. ‘ असं वखरे साहेब म्हणाले होते. पण आपल्याला ते त्यांच्याइतकं अशक्य कुठं आहे? आजवर मी आणि आरती दोघांनीही आमच्या संसाराची गरज म्हणून तिची नोकरी कधीच गृहीत धरलेली नव्हती. जेव्हा जेव्हा वेळ आली, तेव्हा आरती नोकरी सोडून त्या क्षणीच्या कर्तव्यभावनेने घरी राहिली होतीच. आता यावेळी तिची नोकरी आहे म्हणून स्वतः स्वेच्छानिवृत्ती घेणं मलाच योग्य वाटत नव्हतं. अर्थात या योजनेमुळे निर्माण झालेल्या असंख्य व्हेकन्सीज् पैकी थोड्या फार जागा तरी तातडीने भरण्याची निकड निर्माण होणार असल्यामुळे पुढचं प्रमोशन प्रोसेस तात्काळ सुरू व्हायची शक्यता होतीच. आणि अर्थातच प्रत्येक स्टेटमधे उच्चाधिकार पदांच्या जागा मोजक्याच असल्याने आऊट ऑफ स्टेट पोस्टिंग देखील अपरिहार्यच होतं! थोडक्यात आमच्यापैकी मागे रहाणाऱ्या जवळजवळ सर्वच अधिकाऱ्यांच्या आयुष्यांत या आकर्षक स्वेच्छानिवृत्ती योजनेमुळे प्रचंड उलथापालथ होणार होती!!

मनातले हे सगळे उलट सुलट विचार दूर सारून मी दारावरची बेल वाजवली. घरी आई होतीच आणि आरती आणि सलिलही प्रकाशन समारंभाला येताना दोन-तीन दिवसांची सवड घेऊनच आले होते. दार सलिलनेच उघडले. जेवायला बसण्यापूर्वीपर्यंत गप्पांचे सगळे विषय कालच्या प्रकाशन समारंभाबद्दलचेच होते आणि ते अपेक्षितही होतं. या तिघांसाठीही तो एक वेगळा आणि आनंददायी अनुभव होताच!

रात्रीची जेवणं आवरली. गप्पागोष्टी झाल्यावर आई झोपायला गेली. आरती/सलिलला आता लवकरच घडू शकणाऱ्या महत्त्वाच्या घडामोडींची अंधूक कां होईना कल्पना देणं मला आवश्यक वाटलं.

“तुम्हा दोघांशी एका महत्त्वाच्या विषयावर बोलायचंय.. ” मी म्हणालो. दोघांनीही प्रश्नार्थक नजरेने माझ्याकडे पाहिलं.

“कां? काळजी करण्यासारखं आहे कां कांही? ” आरतीनं विचारलं.

“आज नाही पण पुढं लवकरच थोडं फार काळजी करण्यासारखं घडू शकेल.. “

“तुम्ही क.. कशाबद्दल बोलताय? “

“बँकेत बरेच फेरबदल होऊ पहातायत. कोणत्याही क्षणी कांहीही घडू शकेल. माझ्यापुरतं बोलायचं तर आमचं प्रमोशन प्रोसेसही लवकरच सुरू होईल आणि त्यानंतरचं पोस्टिंग मात्र आऊट ऑफ स्टेटच असणार हे ठरलेलंच आहे. मला कुठेही जावं लागेल आणि त्यासाठी आपल्या तिघांचीही तयारी हवी. म्हणूनच आज बँकेत याविषयी बोलणं सुरू झाल्यापासून एकच विचार माझ्या मनात येतोय. त्याबद्दलच बोलायचंय. तशीच वेळ आली तर आरती, तू जॉब रिझाईन करून माझ्याबरोबर येशील? ” मी विचारलं. याआधी प्रत्येक वेळी मी कांहीं दिवस एकटा राहून निभावत आलो होतो पण यापुढे वय आणि जबाबदाऱ्या वाढत जातील तेव्हा मला ती ओढाताण नको होती. तिला सौम्य शब्दांत मी कल्पना दिली ती यासाठीच.

आरतीने चमकून माझ्याकडे पाहिलं. तिचा चेहरा खरकन् उतरलेला होता न् नजरेत हातून कांहीतरी निसटून जात असल्याची भावना!

” तुम्हाला लगेच कुठं जावं लागणार नाहीये ना? तशीच वेळ आली, तर तेव्हा ठरवूया ना आपण. आत्ताच त्याची चर्चा कशाला? ” बोलतानाही तिचा आवाज भरून आला होता.

” कां? तुला कंटाळा नाही आला नोकरीचा? ” मी विचारलं.

“नाही. मला आवडतो हा जाॅब. पण तरीही वेळ येईल तेव्हा सोडेन ना मी. ” ती त्याच भिजल्या आवाजात म्हणाली.

“पण मला कंटाळा आलाय आता नोकरीचा. मी सोडू? ” मी दोघांचा अंदाज घेत गंमतीने विचारलं.

” होs.. कंटाळा आला असेल तर खरंच सोडा. ” आरतीचा चेहरा खुलला. ती अगदी मनापासून म्हणाली.

आता मात्र त्यांना अधांतरी ठेवणं मला योग्य वाटेना. मी त्यांना नवीन स्वेच्छा निवृत्ती योजनेची सविस्तर माहिती दिली. ते ऐकून तोवर कांही न बोलता लक्षपूर्वक सगळं ऐकत राहिलेला सलिल म्हणाला, “बाबा, तुम्ही ही चांगली संधी खरंच सोडू नका. तुमचं सगळं व्यवस्थित आर्थिक नियोजन आहे, त्यामुळे निवृत्त व्हायचं ठरवलंत तर पुढं तुमचे आत्तापर्यंत शक्य न झालेले सगळे छंद जोपासत रहायचं आणि अर्निंग साठी कांहीही करायचं नाही. तसं असेल तरच.. ” तो म्हणाला. ते ऐकलं आणि मी पूर्ण निश्चिंत झालो. आता जे कांही करायचं ते आरतीची नोकरी आणि पगार गृहीत न धरता जे शक्य असेल तेच करायचं. आणि तेही पूर्ण विचारांती..!

हे मी मनाशी ठरवलं आणि पुढं अल्पावधीतच जे कांही घडलं ते आपसूकच घडत जावं तसंच सगळं.. आणि मी कधी कल्पनाही केली नव्हती अशा अनपेक्षित वळणापर्यंत मी येऊन थबकलो! इथे वळायचं कीं आहे त्याच रस्त्याने पुढं चालत रहायचं? .. माझी क्षणकाळाची ही द्विधा मनोवस्था ओळखल्या सारखा ‘तो’ स्वत:शीच हसत उभाच असणार तिथंच कुठंतरी.. माझ्याजवळ. कारण पुढं जे जे घडत गेलं ते सगळं त्यानेच घडवल्यासारखं! प्रत्येकवेळी मला दिलासा देणारं आणि बरंच कांही एरवी मी कधी कल्पनाही केली नसती असं सगळं..!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “बालिशपणा…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “बालिशपणा…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

रविवारची निवांत संध्याकाळ, हवेत गारठा होता. मस्त आलं घातलेल्या चहाचा आस्वाद घेत मी खिडकीत उभी होते. सोसायटीतल्या मंदिराजवळ काहीजण गप्पा मारत बसलेले. बाजूला मुलांचा आरडाओरडा चाललेला… 

“मार, मार”

“सोडू नकोस. ”

“ए तिकडं नको. इकडे बघ”

“क्या कर रहा है. उडा दे”

“इडियट”

“अक्कल है के नही”

“अबे xxxxx” 

“मेलो, मेलो”

“संपलं, फिनिश”

“ए xxx खेळता येत नाही तर येतो कशाला? ”

शाळकरी वयातली मुलं मोबाइलवर गेम खेळत होती. खरं सांगायचं तर त्यांचं बोलणं इतकं भयानक होतं की ते सगळं लिहिणं शक्य नाही. आश्चर्य म्हणजे तिथल्या मोठ्या लोकांना याबद्दल काहीच वाटत नव्हतं किवा जाणीवपूर्वक ते दुर्लक्ष करत होते.

… सध्या हे दृश्य बऱ्याच ठिकाणी दिसतं. तसंही मारधाडीच्या गेम खेळताना भान राहत नाही. सर्रास शिवीगाळ केली जाते त्यात लहान-मोठे सगळेच आले. फोन स्मार्ट झाला पण वापरणाऱ्यांचा बावळटपणा वाढतोय. एवढं मात्र खरं…

पूर्वीचं आणि आत्ताचं ‘बालपण’ याबद्दल विचार डोक्यात असताना तिथंच बाजूला असलेल्या छोट्या मुलीनं लक्ष वेधलं. मान खाली घालून ती हातातला थर्माकोलचा तुकडा कठड्यावर घासत होती. बारीक बारीक भुसा खाली पडत होता. प्रचंड एकाग्रतेनं काम चाललेलं. बाजूला अजून दोन चार थर्माकोलचे तुकडे पडलेले. एक झालं की दुसरं असा उद्योग चाललेला. तल्लीन झालेल्या छोटीला आजूबाजूच्या जगाशी देणं घेणं नव्हतं. गुंग झालेल्या छोटीचं फार कौतुक आणि हेवा वाटला. मोबाइलनं जग व्यापलं असताना छोटीचं ‘बालपण’ अजूनही शिल्लक होतं.

– – त्या तिच्यासारखेच बिनकामी उद्योग मी, तुम्ही, सर्वांनीच केलेत. उदाहरण द्यायचं झालं तर पुस्तकं, पेपरमधल्या फोटोंना दाढी-मिशा काढणं, धूळ बसलेल्या गाडीवर चित्र काढणं, अभ्यास करता करता पेनानं वहीमध्ये गोल गोल काढत राहणं. गोष्ट ऐकून कल्पनेत हरवणं हे सर्व डोळ्यासमोर आलं. त्या रम्य आठवणीत हरवले असताना लेकीची हाक आली.

“ममा एवढं काय बघतेस” सोनूनं विचारलं.

“इकडे ये. गंमत बघ” खेळणाऱ्या मुलांकडे बोट दाखवत मी म्हणाले.

“ईsssss, मोबाइल गेम तर खेळतायेत. सो कॉमन”

“ती बाजूची मुलगी बघ. ” छोटी अजूनही त्याच कामात हरवलेली.

“ए, ती काय करतीये ” सोनू आश्चर्यांनं म्हणाली.

“खेळतीये”

“हे असं”

“भारी ना”

“त्यात काय भारी”

“तुला त्यातली मजा कळणार नाही. ”

“मजा??? .. व्हॉट फन इन टू धिस. काहीही काय? मी असलं काही कधी केलं नाही. ”

“कारण प्रत्येक गोष्टीत लॉजिक शोधायची तुझी सवय. बुद्धिबळ सोडून तर दुसरं काही खेळली नाहीस. लहानपणापासून सोफिस्टीकेटेड. ”

“येस्स. त्यात काहीच चुकीचं नाही. ”

“गप बस. ही कौतुकाची गोष्ट नाहीये. प्रत्येक ठिकाणी लॉजिक लावायचं नसतं. काही गोष्टी आनंदासाठी करायच्या. ’

“व्हॉट डू यू मीन”

“फक्त बालपणीच मनाला वाटेल ते करता येतं. वागता येतं. जबाबदारी नसते की बंधनं नसतात आणि लोक काय म्हणतील याचीही चिंता नसते. व्यवहार या शब्दाबरोबर ओळख व्हायच्या आधीचा सुवर्णकाळ. फक्त एंजॉयमेंट!! ”

“आणि एकदम हॅप्पी!! नो टेंशन, नो वरी. ”

“बरोब्बर, आताच्या मुलांविषयी वाईट वाटतं. फार लवकर मोठी होतायेत. नको ती आणि नको इतकी माहिती सहज मिळत असल्यानं समज वाढतेय आणि निरागसता मात्र कमी होतेय. तसंही अनेक निखळ आनंद मोबाईलच्या राक्षसानं खाऊन टाकलेत. ”

“चांगलं आहे की… नाहीतरी असल्या खेळण्याचा गोष्टींचा पुढच्या लाईफमध्ये उपयोग नाही. ” सोनू.

“बाळा, बालपण फार थोड्या काळासाठी आणि मोठेपण मात्र आयुष्यभर सोबत असते. ”

“ममा, पसंद अपनी अपनी. ती मुलगी जे करतीये. दॅट इज वेस्ट ऑफ टाइम. “

‘बालिशपणा’. ”

“करेक्ट, माय डियर!! हाच ‘बालिशपणा’ आपण विसरलोय. फायदा-तोट्याचा विचार न करता स्वतःला पूर्णपणे हरवणं दुर्मिळ झालंय. एकाग्रता कमी होऊन बेचैनी वाढलीये. ”

“नो चॉइस!! आजची लाईफस्टाइलच तशीये. ” सोनू 

“म्हणूनच सदासर्वकाळ दिखाऊपणाची झूल पांघरून फिरतो. वागणं-बोलणं सगळंच नाटकी. आपसातला संवाद आणि विश्वास कमी झालाय. त्यातही एखादा मोकळं ढाकळं वागणारा, बोलणारा, खळखळून हसणारा भेटला तर ऑकवर्ड वाटतं. स्वतःचे छंद, आवड हेच तर केव्हाच विसरले. माणसांची यंत्र झालीत. ” मी भान हरपून बोलत होते तेव्हा सोनू एकटक पाहत होती.

“असं काय पाहतेस”

“ममा, खूप छान बोलतेयेस. मी यावर विचार करीन. आपण पत्ते खेळायचे”

“हो, चालेल की, काय खेळायचं”

“रमी” सोनू.

“त्यापेक्षा भिकार-सावकार खेळू. ” 

“मला येत नाही”

“सोप्पंयं, मी शिकवते. जाम मजा येते. ”

– – मग काय मायलेकीत पत्त्यांचा डाव बेफाम रंगला. हसणं खिदळणं, धमाल चाललेली. तेव्हा आमचा आवाज ऐकून नवरोबा कडाडले… “काय ‘बालिशपणा’ चाललाय”

“अय्या!! खरंच!! , ” मोठ्यानं म्हणत सोनू आणि मी हसलो.

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ चुस्कीत… ☆ सौ राधिका – माजगावकर- पंडित ☆

सौ राधिका – माजगावकर- पंडित

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☆ ‘चुस्कीत…’ ☆ सौ राधिका -माजगावकर- पंडित

अ बाले-अ मालेची गोड पोरगी… चुस्कीत‘..

” आता तुमीच सांगा ताई हिला, कार्टी साळंला जायाचं नाई म्हणतीया. हीचा बाप जाताना मला बजावून गेलाय, पोरीला खूप शिकव आनी शानी कर म्हणून. पण ही बया रोज काईनाकाई कारण सांगून, दांडी मारतीया. साळा जवळ तर हाय ” सावित्रीची तक्रार चालूच होती.

सुंद्रीचे गाल फुगले, नाक उडवून ती म्हणाली, “मला चालायचा लई म्हणजे लई कंटाळा येतो बाई.”

सावित्रीचा स्फोट आणि सुंद्रीची पळवाट ऐकून, मी तेव्हां काहीच बोलले नाही. पण दुपारी शेजारच्या उनाडक्या करणाऱ्या पोरांना मी म्हणाले, “चला रे पोरांनो मी तुम्हांला एक गोष्ट सांगते.” 

टाईमपास करणाऱ्या सुंद्रीने कान टवकारले आणि ती पळतच मुलांच्या घोळक्यात येऊन बसली. काऊचिऊ, भोपळा म्हातारी गोष्टी ऐकण्याचं वय सरलं होतं मुलांच.

काल वाचनात आलेली ‘चुस्कित’ माझ्या मनांत रेंगाळत होतीच.

“ऐकताय ना मुलांनो? मी तुम्हांला चुस्कीत नावाच्या, तुमच्या एवढ्या मुलीची गोष्ट सांगणार आहे. नऊ वर्षाची चिमूरडी गोड पोरगी आहे ही.. पण-पण-आपल्या सारखे पायच नाहीत हो तिला ” 

हे ऐकल्यावर गंभीर झालं बालमंडळ. प्रत्येकाच्या चेहऱ्यावर भलं मोठं प्रश्नचिन्ह उभं राहिलं.

“ अरेरे! असं कसं झालं? मग ती चालणार कशी? शाळेत जाणार कशी? “ नीरज कळवळला.

 माझं गुऱ्हाळ मी पुढे चालूच ठेवलं. “ असं बघा, तुम्ही आम्ही सुंद्री सगळे धडधाकट आहोत. हातपाय दिलेत देवानी आपल्याला. दुर्दैवाने चुस्कितला जन्मतःच पाय नव्हते. ‘अ मची’कडे म्हणजे तिबेटी वैद्याकडे लेह मधल्या डॉ. कडे पण तिचे आई-बाबा तिला घेऊन गेले होते.

“मग झाले कां बरे तिचे पाय? “ मकुची उत्कंठा वाढली होती.

“नाही रे बाळा! उपचाराच्या पलीकडची केस होती ती” माझ्या उत्तरातही दुःख होतं.

दिवसामागून दिवस चालले होते. चुस्कीत बाळ मोठी होत होती. तिच्या दुःखी मनाला तिचे ‘अ बाले’ म्हणजे तिचे बाबा दिलासा देऊन म्हणायचे, ” बेटा चित्र किती सुंदर काढतेस तू, तुझ्या ‘अ मालेने, ‘ आईने शिकवलेली शिवणकला आहे नां तुझ्या अंगात.. ती तू वाढव. ” 

बाबांच्या प्रोत्साहनाने तिची उमेद वाढली. तिच्या मनाने पुढचं पाऊल उचललं. खिडकीतून दिसणारं आभाळ, आकाशपक्षी तिला खुणाऊ लागले आणि ओहोळाचं नितळ पाणी तिच्या निळ्या डोळ्यात सळसळू लागलं. उत्साहाचं वारं अंगात शिरलं आणि चुस्कीतने पेन्सिल उचलली. मग काय! कागदावर चित्ररेषा उमटू लागल्या. आणि बोलबोलता निसर्ग चित्र तयार झाली. टाईमपास करीत, इकडे तिकडे वेळ न घालवता त्या पोरीने उत्साहाने आपल्या बोटातली कला कागदावर साकारली.

– – हे सांगताना माझी नजर सुंद्रीकडे गेली. तिची मान खाली गेली होती. “समझनेवाले समझ गये थे l”

मी तिच्याकडे बघत गालांतल्या गालांत हसून म्हणाले, ” मला कुठे देवानी पाय दिलेत असं म्हणून रडत न बसता या पोरीने वेळ वाया न घालवता, शिक्षणही घेतलं आणि आपल्या अंगातले, कलागुण वाढवून उमद्या मनाने ती पुढेपुढे चालतच राहिली. बाबांनी आणलेल्या व्हीलचेअरवर बसून ती आसमंतातला आनंद घेत असताना मे-लेले म्हणजे तिच्या आजोबांकडे येणारा अब्दुल तिचा जिगरी दोस्त झाला होता. कारण त्याने शाळेच्या मुख्याध्यापकांना भेटून चुस्कीतची शाळेत जाऊन शिकण्याची, परीक्षा देण्याची स्वप्नकहाणी सरांना सांगितली. शालेय जीवनाची चुस्कीतची ओढ अब्दुलने जाणली. त्या हुशार मित्रानी तिच्या मार्गातले अडथळे दूर करण्याचे उपायही शोधले.

.. अब्दुलची आणि तिची निर्मळ मैत्री म्हणजे नितळ निसर्गझराच होता. शालेय जीवनाची चुस्कीतची ओढ अब्दुल जाणून होता त्या हुशार मित्रानी तिच्या मार्गातले अडथळे दूर करण्याचे नुसते उपायच शोधले नाहीत तर काय सांगू तुम्हाला! तिच्या वर्ग मित्रांनी सळसळत्या उत्साहाने हा उपक्रम, यशस्वी रीतीने, शिक्षकांच्या मार्गदर्शनाने, पारही पाडला होता बरं का मित्रांनो!

ओवीने विचारले, ” म्हणजे काय केलं हो बाई त्यांनी? “

“ सांगते ना! हंसतखेळत ही बालमंडळी म्हणजे तिचे वर्गमित्र एकत्र आले. चुस्कीतच्या घरासमोरच्या ओहोळाच्या बाजूचे दगड धोंडे साफ करून त्यांनी सपाट रस्ता तयार केला. हो! त्यांची गोड मैत्रीण त्या सपाट रस्त्यावरून सहजपणे व्हीलचेअर वरून शाळेत जाणार होती ना! आणि शाळेचं, शिक्षणाचे तिचं स्वप्न पूर्ण करणार होती. सपाट रस्त्यावरून सहजपणे तिला जाता यावं म्हणून, “साथी हाथ बढाना” हे गाणं म्हणत मित्रांनी तिला ही सप्रेम भेटच दिली होती.

कोपऱ्यातली एक चिमणी चिवचिवलीच.. ” पण बाई तो ओहोळ! व्हीलचेअर घेऊन पाण्यावरून कशी काय जाणार चुस्कीत? ”

तिचा प्रश्न ऐकून माझ्या मनाने कौल दिला, ‘ रंगतीय! रंगतीय चुस्कीतची गोष्ट चांगलीच रंगतीय ‘. कारण मुलं कान देऊन ऐकत होती. माझ्या लक्षात आलं बालश्रोतृवर्ग पोहोचलाय चुस्कीतच्या जगात.

सुजाता पद्मनाभन आणि अनुवादक उत्कर्षा महाजन यांना मनोमन हात जोडले. कारण त्यांनीच तर ही सुंदर बालकथा आपल्या कसदार लेखणीतून उतरवलीय.

ती मी वाचली म्हणून तर मला मुलांपुढे मांडता आली होती. सुजाताताईंची कथा सांगताना मला आणखीनच हुरूप आला.

चिवचिवणाऱ्या चिमणीला जवळ घेऊन मी म्हणाले,

“बरं का चिमणे, तुझं म्हणणं बरोबर आहे रस्ता तर छान तयार झाला. एक काम पूर्ण झाले पण ओहोळावरून जायला लाकडी पूल सुद्धा तयार केला तिच्या दोस्तांनी. ”

हे ऐकून सगळ्या चिमुकल्यांनी टाळ्यांचा कडकडाट केला.

“ आणि बरं का मित्रांनो! मे-लेलेच्या मदतीने अशा प्रकारे चुस्कितचा शालेय प्रवास महाराणीसारखा व्हीलचेयरवर बसून सुरू झाला. पण दोस्तांनो! आधी मला सांगा मे-लेले म्हणजे कोण हो? “

मुद्दामच मी प्रश्न विचारला होता. मुलांची स्मरणशक्ती जागृत करून ही मंडळी किती गोष्टीशी समरस झाली आहेत हे मला बघायचं होतं. तर काय दणदणीत कोरस आवाज आला… “मेमे -ले म्हणजे आमच्या आजोबांसारखे चुस्कितचे आज्जोबा, हो नां बाई?

– – – मी धन्य झाले, ‘ सुजाता पद्मनाभन’ ह्यांच्या कसदार लेखणीतून, ‘उत्कर्षा महाजन’ ह्यांच्या अनुवादातून सादर झालेली ही भावस्पर्शी बालकथा बालकांच्या नसानसांत भिनली होती. माझ्या सांगण्याचे सार्थक झालं कारण माझ्याजवळ येऊन सुंद्री माझ्या कानांत कुजबजली, “बाई मी पण उद्यापासून शाळेत जाईन.

तिला जवळ घेत मी म्हणाले, ” सुंद्राताई पटलं ना तुम्हाला शाळेचं महत्त्व? अगं शाळा नुसती साक्षर नाही तर परिपूर्ण खऱ्या अर्थाने शहाणं करते. नुसती माहिती नाही तर आपल्या रोजच्या आणि पुढच्या आयुष्याचं महत्त्व पटवून देते. मनातली भीती जाऊन आपल्यात आत्मबळ आणि आत्मविश्वास निर्माण करते. ” 

सुंद्रीच्या डोक्यावरून प्रेमाने हात फिरवत मी पुढे म्हणाले “बेटा खूप शिक. ज्ञानाने मनाने मोठी हो. वडिलांचं शिक्षणाचं स्वप्न पूर्ण कर आणि आईचे पांग फेड “ 

कोपऱ्यात उभी राह्यलेली सावित्री पुढे येऊन माझ्या कानाची लागून म्हणाली, “बाई तुमची मात्रा बरोबर लागू पडली बघा! बाकी सोनारानं कान टोचलेले बरे पडतात म्हणायचे. चला आता आणखी नवीन काम शोधते. तेवढेच चार पैसे मिळतील, पोरीला शिकवाया पदर बांधायाच हवा मला. ” 

तिची लगबग, उमेदबघून माझ्याही नजरेत कौतुक उमटलं. मी चुस्कीतचे मनोमन आभार मानले.

© सौ राधिका -माजगावकर- पंडित

पुणे – 51  

मो. 8451027554

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ रंग प्रेमाचा… ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? मनमंजुषेतून ?

☆ रंग प्रेमाचा… ☆ श्री सुनील देशपांडे

“माझा चॉईसच चुकला”

‘प्रेमा तुझा रंग कसा’ या वसंत कानेटकारांच्या नाटकामध्ये बबडी जेव्हा स्वतःच्या वडिलांना असे म्हणते तेव्हा ते उत्तरतात..

“रोमियो ज्युलीयटने सुद्धा लग्न करून संसार थाटला असता तर त्यांनाही असंच वाटलं असतं की आपला चॉईसच चुकला” 

जगातील अनेक मोठमोठ्या प्रसिद्ध प्रेमकथा सांगितल्या जातात त्या बहुतेक प्रेमकथांमध्ये त्या दोन्ही प्रेमिकांचे लग्न आणि संसार झाल्याचा त्यात उल्लेख नाही.

… आम्ही ४८ वर्षे आमच्या आयुष्याचा सहप्रवास एकत्रितपणे केला. हुssश्शsss…

जवळपास पहिली चाळीस वर्षे आमची (अर्थात दोघांचीही) सुद्धा बबडीच्या मानसिकतेमध्येच गेली.

चाळीसाव्या वर्षानंतर हळूहळू बदल घडत गेला. आता आम्हाला सहवासाची, एकमेकांच्या बरोबरच रहावे अशी जाणीव प्रकर्षाने होऊ लागली… प्रेमाचा साक्षात्कारच झाला म्हणा ना!

बहुधा अजून दोन वर्षे अशीच प्रेमाच्या साक्षात्कारात जातील.

.. त्यापेक्षा जास्त प्रेम उचंबळून येऊ नये म्हणूनच बहुतेक ५० व्या वर्षानंतर, त्याच दोन्ही नवरा बायकोने पुन्हा लग्न करण्याची पद्धत असते असे म्हणे!

ठीक आहे.

… वाट पाहू अजून चार वर्ष.

… मग पुन्हा चॉईस चुकल्याची भावना आणि भांडणे यांना तोंड द्यायचं आहे? नवीन लग्न झाल्यासारखं?

ठीक आहे. त्याआधी लग्नापूर्वीच्या प्रेमामध्ये आकंठ बुडून घेऊ!

© श्री सुनील देशपांडे 

 फोन :९६५७७०९६४०

 ई मेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “नाहीतर मला तुझ्याकडे बोलावून घे!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

? इंद्रधनुष्य 

☆ “नाहीतर मला तुझ्याकडे बोलावून घे!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके

एकाच वेलीवर फुललेली दोन फुलं एकमेकांशी आयुष्यभर नातं सांगत राहतात पण दुसरं फूल कोमेजून जाईतोवरच… पण कोमेजून गेलेल्या, मातीच्या कुशीत विरून गेलेल्या फुलाची सय सल म्हणून मनात जागवत दुसरं फूल जेंव्हा सुगंधाविना जगत राहतं… तेंव्हा त्या लतेने तिच्या सर्वच फुलांत तिचे स्वप्राण गुंफलेले आहेत.. असं समजावं!

आजच्या दिवशी मोग-याचा एक फुलोरा निमाला! सुगंधाला फुलांपेक्षा जास्तीचे श्वास देऊन निसर्गाने आपल्यावर मोठेच उपकार केलेले आहेत. सुकलेली सुमनेही कितीतरी वेळ मने उल्हसित करीत राहू शकतात… फक्त ती जपून मात्र ठेवता आली पाहिजेत.

पण काही वेदना, काही दु:खं कधीच जुनी होत नाहीत. सावली निघून गेल्यानंतर भाजणारं ऊन सदोदित प्रखर होत जातं… बाळासाहेबांचं असंच झालेलं आहे!

दीनानाथ, माई, लता, आशा, उषा, मीना आणि हृदयनाथ… या एकमेकांशी एका अखंड सूत्रात बांधल्या गेलेल्या फुलांची संख्या स्वरांच्या संख्येएवढी असावी हा निव्वळ योगायोग म्हणता येणार नाही!

लतेच्या देहातून कळ्या प्रकट होतात… आणि फुलत जातात… पण लताच कोसळून पडली की कळ्यांनाही माती जवळ करावीच लागते. या कळ्यांतील हृदयनाथ नावाची कळी पुढे स्वत:च्या सामर्थ्यावर फूल झाली… पण या फुलाने लतेचा हात काही सोडलेला नाही… अगदी आजच्या क्षणापर्यंत.

दीदी आपल्याला सोडून गेल्या त्यापेक्षा त्या हृदयनाथ यांना जास्त सोडून गेलेल्या आहेत… हे बाळासाहेबांचे शब्द सांगून जातात. गेल्या काही महिन्यांपासून दैनिक सकाळच्या रविवार पुरवणीत बाळासाहेब आणि दीदी यांच्यातील संवाद वाचायला… नव्हे ऐकायला मिळतो आहे. एक भाऊ आपल्या बहिणीशी एवढा तादात्म्य पावू शकतो हे अनुभवणे ही एक वेगळीच अनुभूती आहे. आई आणि मूल हा स्नेहसंबंध आपल्याला ज्ञात असतो… पण भावा-बहिणीमधली ही भावसरगम दुर्मिळ म्हणावी अशी. मुख्य म्हणजे ही सरगम गद्यात व्यक्त केली जाते आहे.

आपण या संवादात जणू आगंतुक आहोत… वाटतं… हृदयनाथ जगाला काही सांगायला जात नाहीत… ते स्वत:लाच सर्वकाही सांगत आहेत. ते केवळ त्यांच्या दीदीशीच बोलत आहेत… तिच्या आठवणींच्या खोल डोहात अगदी तळापर्यंत जाऊन भावसमाधी लावून बसलेत… बाळासाहेबांचं विदीर्ण झालेलं हृद्य प्रत्येक शब्दात ठळक दिसत राहतं… हे असं प्रेम लाभलेली माणसं असतात… हे जाणवत राहतं.

मायाजाल हे असंच तर असतं… पण त्याची स्वत:चीही एक गोडी आहे. लता दीदी आणि बाळ हृदयनाथ या भावा-बहिणीच्या नात्याची उकल हृदयनाथ मंगेशकर यांच्या लिखाणातून थोडी थोडी होत जाते आहे… पण अजूनही खुद्द हृद्यनाथ यांना सर्वकाही सर्वांशाने व्यक्त करता आलेलं आहे… असं दिसत नाही. फुले वेचू जाता तिकडे दुस-या कळ्यांना बहर आलेला आहे असं होत जातं. मोगरा फुलला या माऊली ज्ञानोबारायांच्या अजरामर शब्दकळ्या सुरात गुंफताना लता-हृद्य यांच्यात झालेला संवाद जणू ज्ञानोबा आणि निवृत्तीनाथांचा संवाद वाटतो… इथं दीदी जणू निवृत्ती!

दीदी गेल्या… आणि त्यांचे हृदय मागे राहिले आहे… या हृदयाला आता पुन्हा लतेच्या अंतरंगात शिरून तिच्याशी एकरूप होऊन जाण्याची आस लागलेली आहे…

“तू परत ये… परत येऊ शकणार नसशील… तर मला तुझ्याकडे बोलावून घे… ” हे हृदयनाथांचे शब्द मन हेलावून जातात!

लता मंगेशकरांनी जेवढे आपल्याला दिले तितकेच हृदयनाथ यांनीही दिलेले आहे. अभंगवाणी, मीरेची भजने यांच्या सुरावटी त्यांनीच तर रेखल्या आहेत… त्यांच्या सुरांवरच लता दीदीच्या स्वरांतून मोगरा फुलला आहे! बाळासाहेबांनी दीदीच्या आठवणी सांगत राहाव्यात… शब्दबद्ध करीत राहाव्यात… कारण फूलच लतेचे अंतरंग जाणत असते!

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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