हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कहानी – जो लौटकर नहीं आते।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कमरे की वो सीलन भरी गंध अब भी ठीक वैसी ही थी जैसी अविनाश के जिंदा रहते हुआ करती थी। अलमारी का वह पुराना आधा खुला पल्ला जैसे किसी टूटे हुए जबड़े की तरह चिढ़ा रहा था। मैं उसकी बिखरी हुई दुनिया को समेटने के लिए फर्श पर बैठ गया तो पैरों के नीचे धूल की एक मोटी परत चरमरा उठी। अविनाश के अचानक चले जाने के बाद इस घर में सन्नाटा इतनी जोर से चिल्लाता था कि कान के पर्दे फटने लगते थे। अलमारी के सबसे ऊपरी खाने में हाथ डालते ही उंगलियों से एक पुरानी डायरी टकराई जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसी डायरी के भीतर से एक मोड़ा हुआ कागज का टुकड़ा नीचे गिरा जिस पर लिखा था कि तुम्हें यह तब मिलेगा जब मैं बहुत दूर जा चुका हूँगा। दिल की धड़कन ने एक पल के लिए जैसे हड़ताल कर दी और फेफड़ों में हवा जम गई। उस कागज पर स्याही के कुछ ऐसे धब्बे थे जो आंसुओं के गिरने से फैल गए थे। मुझे लगा कि कोई अदृश्य हाथ मेरी गर्दन दबा रहा है और कमरे की खिड़की से आती धूप भी बर्फीली सुई की तरह चुभने लगी। मौत का यह कैसा क्रूर मजाक था कि जो इंसान जिंदगी भर अपनी हर बात को छुपाने का हुनर रखता था वह जाते-जाते एक ऐसा सुराग छोड़ गया जो मुझे जलती हुई भट्टी की तरफ खींच रहा था।

मैंने उस कागज को खोला तो अविनाश की वही कटी-फटी लिखावट सामने थी जो हमेशा किसी रहस्यमयी लिपि जैसी लगती थी। उसने लिखा था कि राहुल मुझे पता है कि तुम मुझे एक पत्थर दिल इंसान समझते रहे क्योंकि मैंने कभी तुम्हारी उम्मीदों का जवाब नहीं दिया। पर सच तो यह है कि मैं तुम्हें उस दलदल से बचाना चाहता था जिसका सिरा सीधे इस अलमारी के पीछे छिपे लॉकर से जुड़ता है। तभी बाहर लॉबी में किसी के जूतों की आहट हुई और मेरा पूरा बदन पसीने से तर हो गया। मैंने घबराकर पीछे मुड़कर देखा पर वहां केवल सन्नाटा अपनी लंबी उंगलियां फैलाए खड़ा था। तभी मां ने रसोई से आवाज दी “राहुल वहां क्या कर रहे हो इतनी देर से क्या तुम्हें कुछ मिला वहां।” मैंने अपनी कांपती आवाज को संभालते हुए कहा “नहीं मां यहां तो बस पुरानी रद्दी और धूल के सिवा कुछ भी नहीं है।” मां ने एक लंबी ठंडी सांस ली और बोली “उसकी चीजें जितनी जल्दी इस घर से बाहर चली जाएं उतना ही अच्छा है क्योंकि उसकी यादें अब इस घर को खाने लगी हैं।” मां की इस बात में छुपा हुआ दर्द और नफरत का वह अजीब मिश्रण मुझे झकझोर गया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर अविनाश ने ऐसा क्या गुनाह किया था जो मां भी उसे माफ नहीं कर पा रही थी।

मैं वापस उस अलमारी के सामने घुटनों के बल बैठ गया और उस भारी लकड़ी के ढांचे को पूरी ताकत से एक तरफ खिसकाया। दीवार के उस हिस्से पर सचमुच एक छोटा सा लोहे का दरवाजा था जो बरसों से बंद रहने के कारण जंग खा चुका था। चाबी कहां होगी यह सोचते ही मुझे अविनाश के गले का वह काला धागा याद आया जिसे वह सोते समय भी कभी अपने जिस्म से अलग नहीं करता था। वह धागा अब मेरे पास उसकी आखिरी निशानी के रूप में मेरे हाथ में बंधा हुआ था जिसमें एक छोटी सी पीतल की चाबी लटक रही थी। जब मैंने उस चाबी को ताले में घुमाया तो एक तीखी चरचराहट के साथ वह छोटा दरवाजा खुल गया और उसके अंदर एक मखमली डिब्बा रखा हुआ था। डिब्बे को खोलते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उसके अंदर किसी की मेडिकल रिपोर्ट और कुछ कानूनी कागजात थे। तभी अचानक खिड़की का पल्ला जोर से टकराया और मुझे लगा जैसे अविनाश मेरे ठीक पीछे खड़ा होकर मेरे कान में फुसफुसा रहा हो। उस बंद कमरे में हवा का एक ऐसा झोंका आया जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए और मुझे अपनी ही परछाई से डर लगने लगा।

कागजों को पढ़ते हुए मेरी आंखों से आंसू बहकर उस रिपोर्ट पर गिरने लगे जिससे वहां लिखे शब्द धुंधले होने लगे। उस रिपोर्ट के मुताबिक अविनाश को ब्लड कैंसर था और वह अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ा था पर उसने यह बात पूरी दुनिया से छुपा कर रखी थी। चिट्ठी का अगला हिस्सा मेरे हाथ में था जिसमें लिखा था कि राहुल अगर मैं तुम्हें बताता कि मैं मरने वाला हूँ तो तुम अपनी पढ़ाई छोड़कर मेरे इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाते। मैं तुम्हारी आंखों में अपने लिए तरस की वह भीख नहीं देखना चाहता था जो अक्सर बीमार लोगों को मिलती है। मैंने जानबूझकर तुमसे लड़ाई की ताकि तुम मुझसे नफरत करने लगो और मेरे जाने के बाद तुम्हें ज्यादा दुख न हो। यह पढ़कर मेरा सीना फट गया और मैं पागलों की तरह उस खाली कमरे में रोने लगा जहां अब कोई सुनने वाला नहीं था। मैंने हवा में हाथ मारते हुए कहा “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया अविनाश क्या मैं इतना पराया था कि तुमने मुझे अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सच से भी दूर रखा।” कमरे का सन्नाटा मेरे इन सवालों को निगल गया और दीवारों पर टंगी उसकी हंसती हुई तस्वीर मुझे और ज्यादा रुलाने लगी।

तभी उस चिट्ठी के आखिरी पन्ने पर मेरी नजर पड़ी जहां कुछ ऐसा लिखा था जिसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसका दी। वहां लिखा था कि राहुल तुम्हें लगता होगा कि बीमारी ही मेरी मौत की वजह बनी पर सच यह है कि मुझे बचाने के लिए डॉक्टर ने जिस डोनर का इंतजाम किया था वह कोई और नहीं बल्कि तुम्हारे असली माता-पिता का सुराग था। इस घर में जिसे तुम अपनी मां समझते हो वह दरअसल मेरी सगी मां हैं पर तुम इस परिवार का हिस्सा कभी थे ही नहीं। मैंने तुम्हें गोद लिया था जब तुम्हारे माता-पिता एक हादसे में मारे गए थे और मैंने यह बात हमेशा छुपाए रखी ताकि तुम्हें कभी अनाथ होने का अहसास न हो। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा और सिर चकराने लगा क्योंकि जिस पहचान को मैं अपनी जिंदगी मान रहा था वह एक पल में ताश के पत्तों की तरह ढह गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अविनाश की मौत पर रोऊँ या अपनी इस नई और खोखली हकीकत पर जो मेरे सामने नंगी खड़ी थी।

तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और मां अंदर आईं जिनके हाथ में पानी का एक गिलास था। उन्होंने फर्श पर बिखरे कागजों और मेरी रोती हुई आंखों को देखा तो उनके हाथ से वह गिलास छूटकर गिर गया और पानी फर्श पर फैल गया। मां ने कांपते हुए होठों से कहा “तो आखिरकार तुम्हें पता चल ही गया जो अविनाश अपनी आखिरी सांस तक छुपाना चाहता था।” मैंने उस आखिरी कागज को मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा “मां क्या यह सच है कि मैं आपका बेटा नहीं हूँ और अविनाश ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।” मां ने घुटनों के बल बैठकर मुझे गले से लगा लिया और रोते हुए बोलीं “अविनाश तुमसे बहुत प्यार करता था राहुल उसने अपनी बीमारी के सारे पैसे तुम्हारी विदेश की पढ़ाई के लिए जमा कर दिए और खुद बिना इलाज के मर गया ताकि तुम एक शानदार जिंदगी जी सको।” उस अधूरी चिट्ठी का अंत अविनाश की मौत से नहीं बल्कि मेरी उस पहचान की मौत से हुआ था जिसे मैं सच समझता रहा और अब उस सूने कमरे में केवल दो लाचार इंसान थे जो एक ऐसे शख्स के लिए रो रहे थे जो नफरत का मुखौटा पहनकर दुनिया का सबसे बड़ा प्यार दे गया था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५५ ☆ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रूह परिंदा तन में तड़पे“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५५ ☆

✍ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जब जब मुझको याद करोगे

तन्हाई में शाद करोगे

 *

 जंगल जैसे काट रहे हो

बंजर भी आबाद करोगे

 *

अपनी सरपंची की खातिर

दुनिया क्या बर्बाद करोगे

 *

मौत बरसती है अंबर से

क्या क्या तुम ईज़ाद करोगे

 *

जोर बिना कब हक़ मिलता अब

नाहक ही फ़रियाद करोगे

 *

रूह परिंदा तन में तड़पे

कब तक रब आज़ाद करोगे

 *

इश्क़ न कर जब अच्छी सेहत

क्या तबियत नाशाद करोगे

 *

दुनिया से बातें दुनिया की

खुद से कब संवाद करोगे

 *

मक़्ता दोस्त ग़ज़ल का आया

आखिर कब इरशाद करोगे

 *

रब्त अरुण शक़ करते बिगड़े

क्या तुम इसके बाद करोगे

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५९ – वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – वजूद।)

☆ हेमंत साहित्य # ५९ ☆

✍ वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे  

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

 

हीना = मेहंदी, शै = वस्तु, मानिंद = जैसा, रूह = आत्मा, वजूद = अस्तित्व, फौत = मृत्यू, ख़ला की जानिब = शून्य की तरफ, इनायत = कृपा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मन की शुद्धि“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मन की शुद्धि  चाहो तो, अपने भीतर झाँको तुम,

दोष न खोजो औरों के, अपना ही मन आंकों तुम।

*

क्रोध, कपट, अभिमान, ईर्ष्या, मन के ही रोग हैं,

प्रेम, दया, संतोष, क्षमा ही मन के सच्चे योग हैं।

*

सत्संग की पियो सुधा, सत्य प्रेम का दीप जलाओ,

हरि-नाम की मधुर तान से अंतर्मन को महकाओ।

*

सेवा रत रह जो जीवन बीते, तो निर्मल होता  मन,

परहित में जो सुख को ढूंढ़े, पाता वही है सच्चा धन।

*

लोभ-मोह का जाल छोड़कर सत्य मार्ग अपनाना है,

हर प्राणी में प्रभु को देखो, मन को यही समझाना है।

*

प्रति दिन थोड़ी देर बैठकर, अपने कर्म निहारो तुम,

क्या खोया, क्या पाया जग में, इसको भी विचारो तुम।

*

जब मन निर्मल, भाव पवित्र, तब ईश्वर का वास मिले,

अंतर के इस पावन मंदिर में आनंद का  प्रकाश मिले।

*

मन की शुद्धि कोई कठिन नहीं, बस इतना उपाय करो,

प्रेम, दया और हरि सुमिरन से जीवन को साकार करो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२१ ⇒ फ़जी़हत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ़जी़हत…।)

?अभी अभी # १०२१ ⇒ आलेख – फ़जी़हत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

फजीहत अरबी शब्द है !

जौहरि की गति जौहरी जाने, की जिन जौहर होय, की तरह जब तक किसी की फजीहत नहीं होती, वह इसका दर्द नहीं जान सकता। आप चाहें तो इसे शारीरिक संत्रास कह सकते हैं, और चाहें तो मानसिक भी। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी पल, कोई भी

इस अवस्था का शिकार हो सकता है।

जहां सभी सुविधा, सावधानी और सूझ बूझ काम नहीं आती तब अचानक ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है, जिसे आप फजीहत कह सकते हैं। इस अवस्था में कोई भी सर्व गुण संपन्न व्यक्ति लाचार और असहाय, परेशान सा, केवल उसे झेलता रहता है, लेकिन परिस्थिति सामान्य होने पर अपनी उस स्थिति का बखान करना नहीं भूलता, क्योंकि फजीहत में हमारा नुकसान कम, झल्लाहट अधिक होती है।।

किसी जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलना, द्वि – चक्र वाहन को पंक्चर देखना, चार पहिया वाहन की चाबी नहीं मिलना, साइकिल तक में हवा नहीं होना, और किसी तरह ऑटो करके उस काम को सम्पन्न करने की कोशिश करना, लेकिन उसमें भी, अगर किसी अप्रत्याशित घटना के कारण, सफलता हाथ ना लगे, और खाली हाथ वापस घर आना पड़े, तो इसे क्या कहेंगे। चलो, कोई बात नहीं, अगली बार देखेंगे !

जब हमारा मूड अच्छा होता है, तो विपरीत परिस्थितियां भी रास आती हैं, लेकिन अगर हम किसी कारण पहले से ही परेशान हैं, और उसमें अगर ऐसी स्थिति निर्मित होती है, तो हम असहज होकर भड़क उठते हैं। सिस्टम, समय, परिस्थिति और मानसिक संतुलन, सब गड़बड़ा जाता है।।

जब हालात बुरे होते हैं तो समय भी खराब चल रहा होता है। पिछले दस बारह सालों से हमारा समय अच्छा चल रहा है। क्या दिन थे वो भी। गर्मी की उमस भरी रातों में, किसी फॉल्ट के कारण, रात रात भर के लिए बिजली चली जाती थी। इन्वर्टर, इमरजेंसी लाइट, चार्जर और मोबाइल भी कब तक कम करते। परेशान हो, बिजली विभाग को कोसते हुए लोग सड़कों पर निशाचर की तरह, हवा खाने निकल पड़ते। आप क्या जानो डिजिटल इंडिया वालों, फजीहत क्या होती है।

गर्मी के मौसम में देसी खट्टे मीठे आमों से एक स्वादिष्ट मसालेदार व्यंजन बनता है, जिसे फजीता कहते हैं। इसमें आम तो आम, गुठलियों के दाम भी वसूल हो जाते है। इतना शानदार फजीता, कि समझ में ही नहीं आता, पहले गुठलियां चूसें अथवा पहले उंगलियां चाटें। अब गुठली तो आप चम्मच से नहीं चूस सकते ना। हेल्थ, हाइजीन वाले फजीते से बचें, वर्ना उनका फजीता भी बन सकता है।।

फजीहत और फजीते के परिवार में एक सदस्य और है जिसे फालूदा कहते हैं। खाने में यह स्वादिष्ट लगता है। मीठी रसभरी सिवैंया का जब ठंडी, रबड़ी – मलाईदार कुल्फी से मेल होता है, तब फालूदा का जन्म होता है।

नीमा जी की फालूदा कुल्फी खाएं, खुद जान जाएं।

लेकिन परेशानी तब होती है जब किसी की इज्जत का फालूदा निकल जाता है। किसी की फजीहत हो, चलेगी, फजीता बन जाए वहां तक भी ठीक है, लेकिन इज्जत का फालूदा ? ना बाबा ना ! Never, पक्का नको। आई शप्पथ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ☆ घर… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ?

☆ घर ☆  प्रभा सोनवणे ☆

घरातली सगळीच घड्याळे

बंद पडली,

त्यांची टिकटिक ऐकू येत नाही!

 

बाहेर वाहनांची वर्दळ!

सवयीचे आवाज, हाॅर्नस्…

रिक्षा,बस, अँब्युलन्स…!!

सणावारी डी.जे.चं ध्वनिप्रदूषण!

 

आतल्या जगापेक्षा खूप वेगळं

बाहेरचं जग !

बाहेरच्या कोलाहलाने

काहीच बिघडत नाही,

आतल्या शांततेचं!

किती मूकं झालंय घर…

तुझ्या नसण्याने!

तू असताना—-

घड्याळे कधीच बंद

पडायची नाहीत,

इतका वेळ!

सदा टिकटिकत राहायची!

जिवंत असल्यासारखी!!!

 

कालचक्र थाबलंय जणू,

माझ्यापुरतं!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गाणे… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ गाणे… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

गाणे जे ह्रदयातून

मग कंठातून

आणि ओठातून येते.

देहातून देहाचे होते.

देह गाण्याचे देहभान विसरते.

रक्तातून शब्दशब्द वाहते.

नि:शब्द करते

कधीकधी नीरवतेचे आक्रोश होते.

संयमाचे काठ मनाचे सांभाळीत

धीर होउन नदीच होते.

देहातून, रक्तातून, मनातून

पापणी पाशी थेंब होउन येते.

शहाणे होउन मग ते

बंद डोळ्यात राहते.

गाणे हे असेच असावे

गाणे हे असेच असते.

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ औदुंबर… बालकवी ☆ रसग्रहण – राधिका भांडारकर ☆

राधिका भांडारकर

? काव्यानंद ?

☆ औदुंबर… बालकवी ☆ रसग्रहण – राधिका भांडारकर ☆

☆ औदुंबर ☆

ऎल तटावर पैल तटावर हिरवाळी घेऊन

निळासांवळा झरा वाहतो बेटाबेटातुन.

 *

चार घरांचे गांव चिमुकले पैल टेकडीकडे

शेतमळ्यांची दाट लागली हिरवी गरदी पुढे.

 *

पायवाट पांढरी तयांतुनि अडवीतिडवी पडे

हिरव्या कुरणामधुनि चालली काळ्या डोहाकडे.

 *

झांकळुनी जळ गोड काळिमा पसरी लाटांवर

पाय टाकुनी जळांत बसला असला औदुंबर.

– बालकवी 

बालकवींच्या “औदुंबर” कवितेचे रसग्रहण.

मराठी साहित्यात निसर्गाचे अत्यंत कोमल, चित्रमय आणि भावस्पर्शी वर्णन करणाऱ्या कवितांमध्ये “औदुंबर” या कवितेचे स्थान विशेष आहे. बालकवींनी अवघ्या काही ओळींत एक जिवंत निसर्गचित्र वाचकांच्या डोळ्यांसमोर उभे केले आहे. ही कविता वाचताना आपण एखाद्या शांत नदीकाठी उभे आहोत आणि त्या दृश्याकडे तल्लीन होऊन पाहत आहोत, असा अनुभव येतो.

कवितेच्या सुरुवातीलाच कवी म्हणतात की झऱ्याच्या दोन्ही तीरांवर हिरवीगार वनराई पसरलेली आहे. निळसर पाणी बेटाबेटांतून संथपणे वाहत आहे. या वर्णनामुळे मनात शांत, प्रसन्न आणि रमणीय वातावरण निर्माण होते. पुढे पाण्यातील काळसर डोह, त्यातील पांढऱ्या पायवाटा, हिरव्या कुरणांवर चरणारी जनावरे अशा तपशीलांमुळे दृश्य अधिक सजीव बनते.

बालकवींची एक मोठी ताकद म्हणजे शब्दांतून चित्र निर्माण करण्याची क्षमता. हिरवे, निळे, काळे, पांढरे अशा रंगछटांचा अत्यंत प्रभावी वापर त्यांनी केला आहे. त्यामुळे कविता केवळ वाचली जात नाही, तर ती डोळ्यांसमोर उभी राहते.

मात्र या कवितेचे खरे सौंदर्य शेवटच्या ओळीत दडलेले आहे—

“पाय टाकुनी जळात बसला असला औदुंबर.”

येथे औदुंबर वृक्षाचे मानवीकरण केले आहे. तो एखाद्या समाधानी, चिंतनशील ऋषीसारखा पाण्यात पाय सोडून शांत बसला आहे, असे वाटते.ही फक्त झाडाची प्रतिमा नाही. आयुष्याच्या धावपळीतून निवृत्त झालेला, जगाकडे शांत नजरेने पाहणारा एखादा ज्ञानी मनुष्यही त्या औदुंबरात दिसतो. सभोवताली हिरवळ, पाणी, पशुपक्षी, जीवनाची हालचाल सुरू आहे; पण औदुंबर मात्र निर्विकार, समाधानी  स्थिर आहे.ही प्रतिमा केवळ निसर्गचित्र राहत नाही, तर ती जीवनदृष्टी बनते. जगातील गोंधळ, धावपळ आणि अस्थिरतेच्या मध्यभागी स्थिर, शांत आणि समाधानी राहण्याचा संदेश या प्रतिमेतून सूचित होतो.

या कवितेचा स्थायीभाव शांत रस आहे. निसर्गाच्या सान्निध्यात मिळणारी प्रसन्नता, निवांतपणा आणि अंतर्मुखता यांचा अनुभव कविता देते. अलंकारांच्या दृष्टीने मानवीकरण, अनुप्रास आणि चित्रमयता यांचा सुंदर उपयोग आढळतो.

“औदुंबर” ही केवळ एका वृक्षाची किंवा नदीकाठची कविता नाही. ती निसर्गाशी एकरूप होण्याची, क्षणभर थांबून जीवनाकडे शांत नजरेने पाहण्याची प्रेरणा देते. म्हणूनच ही कविता आजही वाचकांच्या मनात तितकीच ताजी आणि जिवंत राहिली आहे.

थोडक्यात, “औदुंबर” ही निसर्गसौंदर्य, शांतता, स्थैर्य आणि समाधानी जीवनदृष्टी यांचे अत्यंत प्रभावी कलात्मक दर्शन घडवणारी बालकवींची अजरामर कविता आहे.

© राधिका भांडारकर

ई ८०५ रोहन तरंग, वाकड पुणे ४११०५७

मो. ९४२१५२३६६९

radhikabhandarkar@yahoo.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ – नकार पचविता आला पाहिजे… – ☆ अलका ओमप्रकाश माळी ☆

अलका ओमप्रकाश माळी

?  विविधा ?

☆ – नकार पचविता आला पाहिजे… – ☆ अलका ओमप्रकाश माळी ☆

रोज न्यूज पेपर उघडला की अगदी सहज दोन चार तरी बातम्या सहज वाचायला मिळतात.. प्रेमात नकार.. आयुष्य संपवले.. , परिक्षेमध्ये मिळालेल्या अपयशा मुळे विद्यार्थांनी उचलले टोकाचे पाऊल.. , मुलाना हवे ते खेळणे न मिळाल्यामुळे अल्पवयीन मुलाने जीवन संपवले.. , आयुष्यात मिळालेला नकार आणि प्रेमिकाचे टोकाचे पाऊल.. आपल्या मित्राची मैत्रिणीची हत्या.. अशा अनेक बातम्या वाचल्या की मन सुन्न होत.. नकार, अपयश न स्वीकारता आल्यामुळे टोकाची भूमिका घेतली जाते.. यातून येणारे नैराश्य स्वतःचे किंवा समोरच्याच्या मृत्यूचे कारण बनते, अपयश, नैराश्य ह्याने अहंकार दुखावतो आणि त्याचे परिणाम समाजाला, कुटुंबाला भोगावे लागतात.. छोट्या छोट्या नकारांमुळे मनावर परिणाम होतो आणि टोकाची पाऊले उचलली जातात.. आजकाल सगळ्यानाच इन्स्टंट सुख यश हव असत वाट बघण कोणालाच मंजूर नाही आणि याच मानसिकतेमुके अनेक अपराध घडतात अशा बातम्या विचार करायला भाग पाडतात.. काय चूक काय बरोबर ह्यातला फरक न कळल्यामुळे अहंकार निर्माण होतो आणि आयुष्याची गाडी वळणावरून कधी घसरते आणि चुकीच्या मार्गावर कधी जाते हे कळत सुद्धा नाही.. हे सगळं टाळण्यासाठी आपल्या मनावर असणारा संयम आणि स्वतःवरील विश्वास फार महत्वाचा असतो.. नकार, अपयश ह्याकडे एक संधी म्हणून पाहिले तर आयुष्याच्या गाडीला योग्य दिशा मिळते आणि ही गाडी आपोआप ध्येयापर्यंत पोहचतेच गरज असते ती संयम आणि विश्वासाची..

नकार पचविता आला पाहिजे…

जीवनात प्रत्येक वेळी आपल्या मनासारखं घडतंच असं नाही. कधी नोकरीत, कधी व्यवसायात, कधी नात्यांमध्ये तर कधी आपल्या स्वप्नांच्या वाटेवर आपल्याला नकाराचा सामना करावा लागतो. नकार मिळाला की मन दुखावतं, आत्मविश्वास डळमळतो आणि आपण स्वतःलाच दोष देऊ लागतो. पण खरं तर नकार हा अपयश नसतो; तो पुढे जाण्याचा आणि स्वतःला अधिक सक्षम बनवण्याचा एक टप्पा असतो.

नकार स्वीकारण्याची क्षमता माणसाला अधिक परिपक्व बनवते. प्रत्येक नकार आपल्याला काहीतरी शिकवून जातो—आपल्या चुका दाखवतो, सुधारण्याची संधी देतो आणि नवीन मार्ग शोधायला प्रेरित करतो. ज्याला नकार पचविता येतो, तोच संकटांवर मात करून यशाच्या दिशेने वाटचाल करू शकतो.

जीवनातील अनेक यशस्वी व्यक्तींना सुरुवातीला अनेकदा नकार मिळाले होते. पण त्यांनी त्या नकारांना शेवट न समजता नव्या सुरुवातीची संधी मानली. म्हणूनच नकार मिळाला तर खचून न जाता त्यातून शिकण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे..

नकार हा आपल्या किमतीचा मापदंड नसतो. तो फक्त त्या क्षणी मिळालेला एक प्रतिसाद असतो. त्यामुळे नकार स्स्वीकारून त्यातून धडा घेतला पाहिजे आणि नव्या उमेदीने पुन्हा प्रयत्न केले पाहिजेत कारण कधी कधी एक नकारच आपल्याला अधिक मोठ्या यशाकडे घेऊन जात असतो.

नकार हा प्रत्येकाच्या आयुष्यात येणारा अपरिहार्य अनुभव आहे. परंतु नकार मिळणे जितके महत्त्वाचे आहे, त्यापेक्षा तो कसा स्वीकारला जातो हे अधिक महत्त्वाचे असते. अनेकदा आपण नकाराला आपल्या व्यक्तिमत्त्वाचा, कर्तृत्वाचा किंवा अस्तित्वाचा नकार समजतो. त्यामुळे मन दुखावते, अहंकार जखमी होतो आणि आत्मविश्वास कमी होतो. पण वास्तवात नकार हा व्यक्तीचा नसतो; तो एखाद्या परिस्थितीचा, निर्णयाचा किंवा त्या क्षणाच्या गरजेचा असतो.

नकार स्वीकारणे म्हणजे पराभव मान्य करणे नव्हे. उलट, वास्तव स्वीकारण्याचे धैर्य दाखवणे असते.. जीवनातील प्रत्येक गोष्ट आपल्या इच्छेनुसार घडेल, अशी अपेक्षा ठेवणे हेच दुःखाचे मूळ आहे. जेव्हा आपण आपल्या अपेक्षांवर नियंत्रण ठेवायला शिकतो, तेव्हा नकाराचे दुःखही कमी होते. कारण आपल्याला समजते की प्रत्येक गोष्ट मिळवणे हेच यश नाही; काही गोष्टी न मिळणेही आपल्या भल्यासाठी असू शक तात..

नकार माणसाला अंतर्मुख करतो. यशाच्या क्षणी आपण स्वतःकडे फारसे पाहत नाही; पण नकार मिळाल्यावर आपण स्वतःला प्रश्न विचारतो. माझ्यात काय कमी पडले? मी आणखी काय सुधारू शकतो? हा आत्मपरीक्षणाचा प्रवास माणसाला अधिक सक्षम आणि प्रगल्भ बनवतो. म्हणूनच नकार हा अनेकदा व्यक्तिमत्त्व घडवणारा सर्वोत्तम शिक्षक असतो.

अहंकाराला नकार सहन होत नाही. कारण अहंकाराला नेहमी स्वीकार, कौतुक आणि मान्यता हवी असते. परंतु जीवन प्रत्येक वेळी आपल्याला मान्यता देईलच असे नाही. ज्याने स्वतःची किंमत इतरांच्या स्वीकारावर अवलंबून ठेवली आहे, तो प्रत्येक नकाराने तुटत जातो. पण ज्याला स्वतःची ओळख आणि स्वतःवरील विश्वास आहे, तो नकाराने ढासळत नाही. कारण त्याला माहीत असते की इतरांचा निर्णय माझ्या यशाची व्याख्या असू शकत नाही.

नकार पचविणे म्हणजे मनातील कटुता सोडणे असते अस मला वाटतं. अनेक जण नकार मिळाल्यानंतर राग, द्वेष किंवा सूडभावना बाळगतात. पण अशा भावना सर्वात जास्त नुकसान स्वतःचेच करतात. ज्या गोष्टी बदलता येत नाहीत त्या स्वीकारणे आणि पुढे जाणे हीच खरी मानसिक ताकद आहे. नदीला दगड आडवा आला म्हणून ती थांबत नाही; ती नवीन मार्ग शोधते. तसेच जीवनातही अडथळे आणि नकार यांच्यावर अडकून न पडता पुढे वाहत राहणे गरजेचे असते.

खरे तर प्रत्येक नकारामध्ये एक संदेश दडलेला असतो. काही नकार आपल्याला अधिक मेहनत करण्याची आठवण करून देतात. काही नकार चुकीच्या दिशेने जाण्यापासून वाचवतात. तर काही नकार आपल्या संयमाची परीक्षा घेतात. त्या संदेशाला समजून घेतले तर नकार ओझे राहत नाही; तो मार्गदर्शक बनतो.

ज्याला नकार स्वीकारता येतो, त्यालाच खऱ्या अर्थाने स्वीकार मिळतो. कारण नकारातूनच सहनशीलता, नम्रता, संयम आणि आत्मविश्वास यांचा जन्म होतो. यश माणसाला प्रसिद्धी देऊ शकते, पण नकार माणसाला गहन विचार करायला मदत करतो. यश तुमची ओळख निर्माण करते; नकार तुमचे व्यक्तिमत्त्व घडवतो.

म्हणून आयुष्यात जेव्हा नकार भेटेल तेव्हा त्याला शत्रू समजू नका. त्याच्याकडे शिक्षक म्हणून पाहा. कारण प्रत्येक नकार हा तुमच्या प्रवासाचा शेवट नसतो; तो तुम्हाला अधिक सक्षम, अधिक शहाणा आणि अधिक मजबूत बनवणारा एक महत्त्वाचा टप्पा असतो.

“ज्याला नकार पचविता येतो, त्याला जीवनातील कोणतीही परिस्थिती पचविता येते. कारण नकार स्वीकारणे म्हणजे वास्तवाशी मैत्री करणे होय. ”

“नकार हा शेवट नसतो; तो नव्या सुरुवातीचा पहिला टप्पा असतो.”

© अलका ओमप्रकाश माळी

मोब. 8149121976

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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