हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆ लघुकथा – संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆

✍ लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास  पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है।  पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।

राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी।  दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे।  किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।

दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।    

महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व  सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।

राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शि‍ष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८७ ⇒ एम. फिल् की महफिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एम.फिल् की महफिल ।)

?अभी अभी # १०८७ ⇒ आलेख – एम.फिल् की महफिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एम फिल् की महफिल सजी है, चले आइए, आपकी बस कमी है, चले आइए! M.Phil. कोई बीमारी नहीं, मास्टर ऑफ फिलोसॉफी की डिग्री है, जिसे अब यूजीसी ने अमान्य कर दिया है। जो एम फिल हो गए, सो हो गए, खेल खतम, पैसा हजम।

डिग्रियों का खेल है ये, डिग्री पर डिग्री लिए जा रहे हो। खुद डॉक्टर होकर, अपनी नब्ज़ नहीं पहचान पा रहे हो। जी हां, एक ढूंढो हजार मिलेंगे, कोई डी लिट्, तो कोई पीएचडी, कोई एमबीबीएस तो कोई एमडी और एमएस! बेचारे दांत वाले की डिग्री अलग है, बीडीएस, मानो कोई बीएएमएस चला आ रहा हो। हमारे जमाने में तो एलएमपी भी डॉक्टर होते थे, यानी लोकल मेडिकल प्रैक्टिशनर। मेरा एक मित्र तो आज भी अपने आपको गर्व से L.M.P. ही कहता था, लोकल मिडिल पास।।

हमारे लिए केबीसी, केवाईसी और यूजीसी में कोई अंतर नहीं। हमें जीवन में ना तो कभी कोई ग्रांट अथवा स्कॉलरशिप मिली और ना ही कोई कमीशन। जब से उच्च शिक्षा में पदोन्नति के लिए पीएचडी अनिवार्य हो गया, सभी बड़े, बूढ़े पीएचडी की दौड़ में शामिल हो गए। पढ़ना और पढ़ाना सबके बस का नहीं होता। या तो हमसे पढ़वा लो, या फिर हमको पढ़ने दो। एक वेतन में दो दो दायित्व क्या तन और मन का शोषण नहीं।

हमें थीसिस, शोध, शोध प्रबंध, डिजर्टेशन अथवा पीएचडी की एबीसी भी नहीं आती क्योंकि हम कोई डिग्रीधारी बुद्धिजीवी भी नहीं। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा साहित्य में भी डॉक्टरों का बड़ा सम्मान है। पहले साहित्य रत्न और विशारद से ही काम चल जाता था, लेकिन डॉक्टरेट की एक अलग ही गरिमा है। अब तो साहित्य में आपको टू इन वन डॉक्टर भी मिलेंगे। यानी डिग्री चिकित्सा की और फितरत से साहित्यकार और व्यंग्यकार। ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं के आगे तो चार वेदों का ज्ञान भी फीका पड़ जाता है।।

डी लिट मतलब डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर, पीएचडी यानी डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी यहां तक तो आसानी से हजम हो जाता है लेकिन एमफिल यानी मास्टर ऑफ फिलोसॉफी कभी हमारे गले नहीं उतरी। वैसे ऐसी कई विवादित डिग्रियां हैं, जिन पर जनहित और देशहित में चुप रहना ही बेहतर है।

एक आयोजन प्रेमी हाल ही में एक संगीत के प्रोग्राम में जबरदस्ती टकरा गए, परिचय की लपेट में उन्होंने अपने आपको कवि, साहित्यकार, अभिनेता और एंकर के साथ एमफिल भी बता दिया। तब शायद पहली बार यह एमफिल की डिग्री हमारी नजरों से गिरी क्योंकि वे तो बहुत पहले से ही गिर चुके थे।।

जो शिक्षाशास्त्री हैं, शिक्षाविद् हैं वे ही इस मामले कुछ कहने का हक रखते हैं, हम तो मुंह नहीं चला पाए, इसलिए यूं ही कलम चला दी। दुख तो होता है, जब कोई विदा होता है। एमफिल की महफिल को हम दुखी मन से अलविदा कहते हैं ;

हम छोड़ चले हैं एमफिल को ;याद आए कभी तो मत रोना ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२८ – छत और छाता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छत और छाता।)

☆ लघुकथा # १२८ – छत और छाता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से लगातार बारिश हो रही थी। दोपहर तक सड़कें पानी से भर गईं। बाजार की अधिकांश दुकानें बंद थीं, फिर भी शांति सड़क किनारे सब्जियों की टोकरी लिए बैठी थी।

कमल जी ने उसे देखा तो रुक गए।

“शांति, तुम अभी तक यहीं बैठी हो?

इतनी तेज बारिश में भी?”

शांति मुस्कुराई, “क्या करूँ बाबूजी, बारिश देखकर पेट थोड़ी न रुकता है।”

“घर चली जाओ। आज कौन सब्जी खरीदने आएगा?”

“शायद कोई न आए।”

“फिर यहाँ बैठने का क्या फायदा?”

शांति ने कुछ क्षण उनकी ओर देखा, “फायदा नहीं है बाबूजी, जरूरत है।”

“ऐसी भी क्या जरूरत?”

“आज की कमाई नहीं हुई तो आज रात चूल्हा नहीं जलेगा।”

कमल जी चुप हो गए। फिर बोले, “तुम्हारे घर में और कोई कमाने वाला नहीं है?”

“पहले पति थे। अब बीमारी ने उन्हें बिस्तर दे दिया है। घर चलाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से में आ गई।”

“और बच्चे?”

“दो हैं। दोनों पढ़ते हैं।”

“इतनी मुश्किल में पढ़ा रही हो?”

शांति की आँखों में चमक आ गई।

“हाँ बाबूजी। मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे मेरी तरह बारिश देखकर अपना काम न रोकें। बड़ा कहता है—‘अम्मा, मैं बड़ा होकर ऐसा घर बनाऊँगा, जिसकी दीवारों से पानी नहीं टपकेगा।’”

कमल जी ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हारी अपनी इच्छा क्या है, शांति?”

वह हँसी, फिर बोली, “मेरी? बस इतनी कि एक दिन बच्चों के साथ बैठकर चैन से खाना खा सकूँ और ऊपर देखकर यह न सोचूँ कि अगली बूंद थाली में गिरेगी या सिर पर।”

कमल जी ने उसकी सारी सब्जियाँ खरीद लीं।

“अब घर जाओ।”

शांति ने पैसे सँभाले और चल पड़ी।

कुछ दूर जाकर कमल जी की नजर सरकारी होर्डिंग पर पड़ी -“हर बच्चे को शिक्षा, हर परिवार को सुरक्षित आवास।”

उसी क्षण शांति का बच्चा किताबें बचाते हुए दौड़ता दिखाई दिया।

कमल जी ने ऊपर देखा—होर्डिंग सुरक्षित थी, नीचे एक छात्र भीग रहा था।

शांति के हाथ में टूटा हुआ छाता था, उसके घर की छत फिर टपक रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – ई-अभिव्यक्ति संवाद ☆ संपादकीय – ई-अभिव्यक्ति — एक विशेष लेख ☆ संपादक मंडळ, ई – अभिव्यक्ति ☆

☆ संपादकीय – ई-अभिव्यक्ति — एक विशेष लेख ☆

आपल्या समूहाच्या सदस्या असलेल्या लेखिका सुश्री तृप्ती कुलकर्णी यांनी आपल्या ई-अभिव्यक्ती या समूहाबद्दल “सामना उत्सव पुरवणी” साठी लिहिलेला आणि प्रकाशित झालेला लेख “वाचककट्टा – समृद्ध साहित्यिक व्यासपीठ” (https://www.saamana.com/trupti-kulkarni-article-on-a-rich-literary-platform/) आपल्या सर्वांसाठी आज सादर करीत आहोत. हा लेख आपल्या सर्वांनाच आनंद आणि समाधान देणारा तर आहेच, पण त्याहूनही तो आपल्या लिखाणासाठी आणखी उर्मी आणि प्रेरणा देणारा ठरेल याची खात्री वाटते. आपल्या सर्वांतर्फे तृप्तीमॅडमचे विशेष आभार व्यक्त करून हा लेख सादर करत आहोत.👉 

तृप्ती कुलकर्णी 

ई-अभिव्यक्ती…

इंग्लिशमध्ये एक फार सुंदर वाक्य आहे… “ब्युटीफुल यंग पिपल आर अॅक्सिडेंटस ऑफ नेचर, बट ब्युटीफुल ओल्ड पिपल आर वर्क्स ऑफ आर्ट. ” हे वाक्य वाचनात आलं तेव्हा आवडलं होतंच पण एखाद्याला उद्देशून ते इतकं खरं वाटेल, असं कधी वाटलं नव्हतं. २०२२ साली ई-अभिव्यक्ती या वेबपोर्टलशी माझा प्रत्यक्ष संबंध आला आणि या वाक्याची खरी प्रचीती आली. ही जाणीव करून दिली ती ई-अभिव्यक्तीचे सर्वेसर्वा, निर्माते श्री. हेमन्त बावनकर सर आणि त्यांच्या संपादकीय सहकाऱ्यांनी. अनुभव, संवेदनशीलता, साहित्यप्रेम आणि सातत्याने घडत गेलेल्या या समवयस्क “ब्युटीफुल ओल्ड पिपल”च्या “वर्क्स ऑफ आर्ट”ची—म्हणजेच ई-अभिव्यक्ती या आगळ्यावेगळ्या डिजिटल वेबपोर्टलची (दैनिकाची) ही गोष्ट…

बँकेतून निवृत्त झाल्यानंतर सकारात्मक आणि इतरांनाही आवडेल, जमेल असे काहीतरी करावे, या विचारातून साहित्यप्रेमी हेमन्तजींनी १५ ऑक्टोबर २०१८ रोजी ई-अभिव्यक्तीची निर्मिती केली. सुरुवातीला यात हिंदी आणि इंग्लिश साहित्याचा समावेश होता. वयाने ज्येष्ठ असलेले, पण आपल्या ज्ञानाचा उपयोग करून लेखन-वाचनातून जीवन समृद्ध करणारे अनेक जण उत्साहाने या उपक्रमाशी जोडले गेले. बदलत्या तंत्रज्ञानाशी अनुभवाची सांगड घालत त्यांची अभिव्यक्ती या माध्यमातून होत राहिली. दोन वर्षांहून अधिक काळ यशस्वी वाटचाल केल्यानंतर १५ ऑगस्ट २०२० रोजी मराठी भाषेचाही यात समावेश झाला. आज या त्रिभाषिक ई-दैनिकाचे नववे वर्ष सुरू असून मराठी विभागाने सहाव्या वर्षात पदार्पण केले आहे. मात्र, केवळ वाढती वर्षे हेच ई-अभिव्यक्तीचे वैशिष्ट्य नसून, त्यापलीकडे जाऊन त्याने अनेकांना दिलेले समृद्ध साहित्यिक व्यासपीठ हे त्याचे खरे महत्त्व आहे.

विशेष म्हणजे श्री. हेमन्तजींनी स्वतःच हे डिजिटल वेबपोर्टल डिझाईन केले आहे. रोज ठराविक वेळी तिन्ही भाषांमधील विविध साहित्यप्रकार नियमितपणे प्रकाशित केले जातात. यातील प्रत्येक लेखाची स्वतंत्र लिंक, लेखकाचे नाव आणि छायाचित्र यांसह तो लेख ई-अभिव्यक्तीच्या व्हॉट्सअॅप समूहावर पाठवला जातो. सध्या या दैनिकात मराठीत कवितेचा उत्सव, विविधा, जीवनरंग, मनमंजुषेतून, इंद्रधनुष्य, वाचताना वेचलेले, चित्रकाव्य, काव्यानंद, कथा-लघुकथा, क्षण सृजनाचा, पुस्तक परिचय, प्रतिमेच्या पलिकडले, आलेख, संकीर्ण, ही सदरे सुरु आहेत. तर हिंदीमध्ये अध्यात्म, आलेख, कथा-कहानी, जीवनयात्रा, यात्रा संस्मरण, योगसाधना, परिचर्चा, रंगमंच, पुस्तक समीक्षा, व्यंग्य ही सदरे सुरु आहेत. आणि इंग्लिशमध्ये आर्टिकल्स, शॉर्ट स्टोरीज, बुक रिव्ह्यू, पोएट्री आणि जर्नी ऑफ लाईफ अशी सदरे सुरु आहेत. व्हॉट्सअॅप समूह थेट चर्चेसाठी खुला नसला, तरी लेखनावरील प्रतिक्रिया संबंधित भाषेच्या संपादकाकडे पाठवल्यास त्या नावासह समूहावर प्रकाशित केल्या जातात. तसेच आवडलेल्या लेखाच्या लिंकवर जाऊन थेट प्रतिक्रियाही नोंदवता येते.

या व्यतिरिक्त ई-अभिव्यक्तीचे वेगळेपण म्हणजे त्याचा दिवाळी विशेषांक. भारतातील आगळ्या डिजिटल होतो. यासाठी लेखक आणि संपादकांचेही मोठे योगदान आहे. तिन्ही विभागांतील सात संपादक गेली नऊ वर्षे साहित्यप्रेमातून विनामूल्य सेवा देत असून लेखकही विनामानधन लेखन करतात.

हे ई-दैनिक नवोदित आणि प्रस्थापित अशा सर्वांना सामावणारे आहे. कोणत्याही बातम्या, जातीय, राजकीय किंवा विवाद्य धार्मिक लेखनाला स्थान न देता केवळ निखळ साहित्य आणि सकारात्मक विचारांना वाहिलेले हे अपवादात्मक दैनिक आहे. आजवर येथे ३५, ८००हून अधिक साहित्यकृती प्रकाशित झाल्या असून ८, ४९, ३६२हून अधिक लोकांनी या पोर्टलला भेट दिली आहे.

विचारांना सकारात्मक आणि प्रभावी अभिव्यक्तीची संधी देणाऱ्या या उपक्रमाची दखल घेत हेमन्त सरांची नोंद “इंडिया बुक ऑफ रेकॉर्ड्स “मध्ये झाली असून Directory of Most Popular Blogs in India मध्येही ई-अभिव्यक्तीचा समावेश झाला आहे.

ई-अभिव्यक्तीचा प्रवास म्हणजे साहित्यप्रेम, सकारात्मकता आणि सर्जनशीलतेचा सुंदर संगम. अनुभव आणि तंत्रज्ञानाची सांगड घालत उभे राहिलेले हे व्यासपीठ आज असंख्य लेखक-वाचकांना जोडत आहे. विशेष म्हणजे ते तरुणांच्याही पसंतीस उतरले आहे. वय सर्जनशीलतेला मर्यादा घालत नाही, हेच ई-अभिव्यक्तीने सिद्ध केले आहे. https://www. e-abhivyakti. com ला इच्छुकांनी जरूर भेट द्यावी.

लेखिका : तृप्ती कुलकर्णी 

संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ति, मराठी विभाग. 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२९ ☆ गीत – प्रेमभावना… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२९ ?

☆ गीत – प्रेमभावना ☆  प्रभा सोनवणे ☆

स्वप्नात साजणा येऊ नको

अन साद मला तू घालू नको ॥धृ॥

*

ही अवखळ माझी प्रीत

कशी पाळू मी जनरीत

होईल बोभाटा नगरीत

बदनाम मला तू करू नको… १

*

हा कसा प्रीतीचा ध्यास

एक जीवघेणा हव्यास

चहूकडे तुझाच रे भास

हे वेड जीवाला लावू नको… २

*

विसरणे तुला अशक्य जरी

प्रीत तुझी अप्राप्य परी

ही प्रेमभावना धुमसते उरी

तू फुंकर त्यावर घालू नको… ३

*

मी जळून झाले खाक

मज माझाच वाटे धाक

राहिली चुकून ठिणगी एक

तू वणवा आता चेतवू नको… ४

*

स्वप्नात साजणा येऊ नको

अन साद मला तू घालू नको ॥

जुन्या डायरीतून… अप्रकाशित रचना

© प्रभा सोनवणे

२५ नोव्हेंबर १९९२

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मुक्काम दो घडीचा… ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ मुक्काम दो घडीचा ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

 

मुक्काम दो घडीचा, यात्रा परी निरंत

तो दूर दूर अजुनी, पांथा तुझा दिगंत

 *

पक्ष्यास ज्ञात माझ्या, घरटेच दैव त्याचे

पंखांस रोज चळवी, आकाश ते अनंत

 *

आभाळ फाटताही, ज्याचा ढळे न तारा

परदु:ख दुःख ज्याचे, तो एक भाग्यवंत

 *

तिमिरास तिमिर घेतो, कवटाळुनी उराशी

होतो जराजरासा, काळोख तेजवंत..

 *

रानात दाटलेली, हिमरात्र आरपार

सूर्योदयात एका, फुलतो कधी वसंत

 *

लावण्य जीवनाचे, घे भोगुनी मनस्वी

व्हावा तुझ्या व्यथांचा, शृंगार शोभिवंत

 *

अंतागणीक माझ्या, मी जन्मतो नव्याने

आरंभ हा नवा अन् आता नवीन अंत

  (आनंदकंद)

© श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ लहानपण, बालपण… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

?विविधा ?

लहानपण, बालपण… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

कशाचीच फिकीर नसते.

मजा असते सगळी, खेळण्यात,

मित्रांसोबत शिवारभर हुंदडण्यात,

निसर्गाच्या सानिध्यात.

छानछान खायला मिळतं. कोडकौतुक अमाप होतं, म्हणूनच लहानपण सगळ्यांनाच कायमच हवंहवंसं वाटत. पण त्याची मजा लुटता येण्यासाठी तुमच्या जवळ निसर्गाची आवड, मित्रपरिवार, घरच्यांचं पाठबळ, आणि तुमच्या तना मनातलं अमाप चैतन्य असावं लागतं. हे फार उशिरा म्हणजे बालपण निघून गेल्यावर कळतं. तेव्हा मन खट्टू होत. अपराधीपणाची भावना निर्माण होते मनात. एक छानशी संधी हकनाक हुकल्याची. तेव्हा कुठलाच पर्याय हातात नसतो… जुन्या आठवणीं आठवण्या शिवाय.

पण ज्यांनी आपलं बालपण घरच्यांचे पाठ शेकणारे धपाटे खाऊन ही मनसोक्त उपभोगलय, अनुभवलय ते भाग्यशाली ठरलेत.

कारण त्यांच्या जवळ आहे आठवणींचा जादुई पेटारा. तो उघडून ते कुठेही केव्हाही आपला स्वतःचा आनंदी कोश निर्माण करून तल्लीनतेने तेथे समधीस्त होऊन, गेल्या दिवसांच्या चित्रफितींचे अवलोकन करत असतात. अशा अनेकानेक चित्र फिती ज्यांच्या पोतडीत ठासून भरून ठेवल्या आहेत त्यांना एकांतवासाने कधीच छळले नाही. तर आनंदाचा पुनः प्रत्यय घेण्याची संधी वारंवार उपलब्ध करून दिली आहे. म्हणूनच आठवणीच्या इलाख्यातले हे मुसाफिर कायम हसतमुख राहून इतरांना ही हसमुख बनवण्यात तरबेज असतात.

प्रत्येकाला आपलं लहानपण आठवत असेल. त्यातला आपला मोलाचा वाटा त्यांच्यासाठी त्यांनी आपल्या काळजावर कोरून ठेवला असेल. त्यांच्यावर साठलेली वयाची धूळ जराशी झटकली की कुबेराला ही देता येणार नाही असा अविनाशी खजीना त्याच्या पुढ्यात अवतरतो.

मग त्यातला प्रत्येक दस्तऐवज त्याच्या गतकाळातील वैभवाला त्याच्या समोर प्रस्तुत करतो आणि आनंदी बनवून स्वप्नसश्रृष्टीची सफर घडवून आणतो. हे गतवैभव प्रत्यक्षात उपभोगता येणं दुरापास्त असलं तरी त्याला आठवून पंख लावून भुतकाळाची अविस्मरणीय सफर नक्कीच करता येते. म्हणूनच बालपणाला, लहानपणाला आपापल्या पासून कधीच दूर लोटून देवू नका. त्याच सतत चिंतन मनन तुम्हाला एक नवी ऊर्जा बहाल करून नवचैतन्य बहाल करील यात काही शंका नाही.

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ तिकीट प्रवासाचं.. एका आशेचं ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆

श्री मेघ:श्याम सोनावणे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ तिकीट प्रवासाचं.. एका आशेचं… लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆

 रेल्वे स्टेशनवर दररोज एक वृद्ध व्यक्ती एकच तिकीट खरेदी करायची… पण कधीच ट्रेनमध्ये बसायची नाही. २५ वर्षांनंतर त्याचे कारण समजले.

 सकाळचे ठीक ७ वाजून १० मिनिटे झाले होते. स्टेशनवर चहावाल्यांचा आवाज, हमालांची धावपळ, शिट्टीचा आवाज आणि याच गर्दीत पांढरा कुर्ता-पायजमा घातलेला एक वृद्ध माणूस तिकीट खिडकीवर सर्वात आधी उभा असायचा. “एक सिंगल तिकीट… शिवपूरपर्यंत. “

 क्लर्क तिकीट द्यायचा, वृद्ध माणूस खिशातून पैसे काढायचा, तिकीट अशा प्रकारे हातात धरायचा जणू ती कोणती मौल्यवान ठेव आहे…

 त्यानंतर प्लॅटफॉर्म नंबर दोनच्या सर्वात शेवटच्या बाकावर जाऊन बसायचा. ट्रेन यायची… दरवाजे उघडायचे… लोक चढायचे- उतरायचे… पण तो कधीच ट्रेनमध्ये बसायचा नाही. ट्रेन निघून जायची… तो तिकीट हळूच आपल्या खिशात ठेवायचा आणि शांतपणे घरी परतायचा.

 हा घटनाक्रम एक-दोन दिवस नाही… पूर्ण पंचवीस वर्षे सुरू होता. स्टेशनच्या प्रत्येक कर्मचाऱ्याने त्याला पाहिले होते. लोक त्याची थट्टा उडवायचे. ‘बाबांचे डोके फिरले आहे असे वाटते, ‘ कोणीतरी म्हणायचे, ‘एवढ्या पैशांत महिनाभराचे रेशन आले असते. ‘ पण त्याने कधीच कोणाला उत्तर दिले नाही.

 मग एक दिवस स्टेशन मास्टर बदलून नवीन अधिकारी आला. त्याचे नाव होते निखिल. पहिल्याच आठवड्यात त्याने त्या वृद्धाला पाहिले. दुसऱ्या दिवशी पुन्हा पाहिले. तिसऱ्या दिवशीही तेच. आता त्याच्याने राहवले नाही. ट्रेन निघून गेल्यावर तो त्या वृद्धाजवळ जाऊन बसला. “बाबा… जर वाईट वाटणार नसेल, तर एक गोष्ट विचारू? “

 वृद्ध हसले. “विचार बेटा. “

 “तुम्ही रोज तिकीट खरेदी करता… पण कधीच जात नाही. का? “

 वृद्ध काही क्षण शांत राहिले. त्यांचे डोळे प्लॅटफॉर्मच्या रुळांवर स्थिरावले. मग त्यांनी खिशातून जुन्या तिकिटांचे एक बंडल काढले. इतके जाड की हाताची मूठ भरून जावी. “यात प्रत्येक दिवसाचा हिशोब आहे… “

 निखिल थक्क झाला. “पण कसला हिशोब? “

 वृद्धांनी दीर्घ श्वास घेतला. “आजपासून पंचवीस वर्षांपूर्वी… याच प्लॅटफॉर्मवर माझा दहा वर्षांचा मुलगा रोहन माझ्यापासून दुरावला. त्या दिवशी स्टेशनवर खूप गर्दी होती. त्याने म्हटले होते- ‘बाबा, तुम्ही तिकीट घेऊन या… मी इथे बाकावर बसलो आहे. ‘

 मी पाच मिनिटांत परतलो… बाक रिकामे होते. पूर्ण स्टेशनवर शोधले. पोलीस आले. अनाउन्समेंट झाली. वृत्तपत्रांत फोटो छापले गेले. पण माझा मुलगा… कुठेच सापडला नाही. “

 वृद्धांचा आवाज थरथरू लागला. “त्या दिवशी जाताना त्याने मला एक गोष्ट सांगितली होती- ‘बाबा… जर मी कुठे हरवलो… तर तुम्ही मला घ्यायला नक्की या. ‘ 

 निखिलचे डोळे पाणावले.

 वृद्धांनी तिकीट छातीशी धरले. “बस बेटा… त्याच दिवशी मी स्वतःला वचन दिले की, मी रोज तिकीट खरेदी करेन… जेणेकरून जर माझा रोहन कधी परत आला… तर त्याला वाटावे की त्याचे बाबा आजही त्याला घ्यायला आले आहेत. मला असे वाटते की एक दिवस तो परत येईल… आणि मी तेव्हा तिथे नसेल असे होऊ नये. “

 पूर्ण प्लॅटफॉर्म जणू काही काळासाठी थांबला होता. दुसऱ्या दिवशी निखिलने स्टेशनचे जुने रेकॉर्ड्स तपासले. धुळीने भरलेल्या फाईल्स… पिवळे पडलेले कागद… एक बेपत्ता झाल्याची तक्रार. एक अंधूक फोटो. आणि खाली लिहिले होते- ‘रोहन… वय १० वर्षे. ‘

 निखिलने तो फोटो सोशल मीडियावर शेअर केला. त्याला स्वतःलाही अपेक्षा नव्हती की काही होईल. पण तीन दिवसांनंतर… स्टेशनच्या कंट्रोल रूममध्ये एक फोन आला. “काय… त्या मुलाचे वडील अजून जिवंत आहेत? “

 फोन करणारा माणूस स्वतः पंचावन्न वर्षांचा होता. त्याने सांगितले, “फोटोतील मुलगा माझ्याकडे आहे. ” 

 मग रोहने फोन घेऊन थरथरत्या आवाजात म्हटले – “माझ्या हातावर लहानपणापासून भाजल्याची एक खूण आहे… आणि मला फक्त इतकेच आठवते की, मी माझ्या बाबांना ‘बाबूजी’ म्हणायचो… आणि रेल्वे स्टेशनवर हरवलो होतो. “

 डीएनए टेस्ट झाली. रिपोर्ट आला. आणि सत्य समोर होते. तो खरोखरच रोहन होता.

 ज्या दिवशी दोघांची भेट झाली… संपूर्ण स्टेशन पाहण्यासाठी जमा झाले होते. रोहन हळूहळू वृद्धासमोर पोहोचला. दोघे एकमेकांकडे पाहत राहिले. पंचवीस वर्षे… डोळ्याचे पाते लवते न लवते तोच जणू परत आले. रोहन ढसाढसा रडू लागला. “बाबूजी… माफ करा… मी तुम्हाला शोधू शकलो नाही. “

 वृद्धांनी त्याला मिठीत घेतले. “वेड्या… चूक तुझी नव्हती… मला माहित होते… तू नक्की येशील. म्हणूनच मी रोज तिकीट घेऊन तुझी वाट पाहत होतो. “

 रोहने थरथरत्या आवाजात विचारले- “बाबूजी… ती सर्व तिकिटे कुठे आहेत? “

 वृद्ध हसले. “घरी एक लोखंडी पेटी आहे… त्यात तुझ्या प्रतीक्षेची पंचवीस वर्षे ठेवली आहेत. “

 काही महिन्यांनंतर वृद्धाचा मृत्यू झाला. रोहने ती पेटी उघडली. आत हजारो तिकिटे नीटनेटकी ठेवलेली होती. सर्वात वर एक चिठ्ठी होती. त्यावर लिहिले होते- “जर तू ही चिठ्ठी वाचत आहेस… तर समजून घे की तू परत आला आहेस. आता मला काहीही दुःख नाही. बेटा, मी तिकीट कधी प्रवासासाठी खरेदी केले नाही… मी ती आशा जिवंत ठेवण्यासाठी खरेदी केली होती.

 लक्षात ठेव… जगात सर्वात लांब प्रवास रेल्वेचा नसतो, तर कोणाची तरी वाट पाहण्याचा असतो. “

 त्या दिवशी रोहने ती सर्व तिकिटे आपल्या वडिलांच्या चितेसोबत जाळली नाहीत… तर स्टेशनवर एका काचेच्या फ्रेममध्ये लावली. खाली फक्त एक ओळ लिहिली होती- ‘काही लोक मजल गाठण्यासाठी तिकीट खरेदी करतात… आणि काही लोक आपल्या नात्यांना जिवंत ठेवण्यासाठी. ‘

 त्या फ्रेमसमोरून जाणारा प्रत्येक प्रवासी काही क्षण थांबतो… आणि न समजता आपले डोळे पुसून पुढे निघून जातो…

**

लेखक : अज्ञात.

प्रस्तुती : श्री मेघ:श्याम सोनावणे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ”Reverse Counting…” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “Reverse Counting… ☆ संध्या बेडेकर ☆

काल ताई कडे गेले होते. काहीही कारण नसताना, हक्काने जाण्यासाठी माझे एकमेव ठिकाण म्हणजे, माझ्या ताईचे घर. फोन करायची गरज नाही, काहीही संकोच न करता जाता येते. खरंतर ही माझ्यासाठी एक जमेची बाजू आहे.

“Count your blessings. ”

असं कोणी म्हंटल तर त्यात हे एक प्रमुख ‘blessing’ आहे. formalities नाही. मन हलकं करायला, काही सल्ला घ्यायला, काहीही न लपवता, रडायला, हसायला एक तरी हक्काची जागा असावी ना, ती माझ्या जवळ आहे. आजच्या जगात तर ही खूप मोठी जमेची बाजू आहे. नाही तर अकडून, आखडून जगून जगून थकायला होत. काय बोलायचे?? काय नाही?? याचे गणित मांडता मांडता घाबरायला होत. तसंही म्हणतातच ” नातं टिकवण्यासाठी गणित विषय कच्चाच असलेला बरा “. बरे असो.

काल भाऊजी खूप खुश होते. मी विचारलं आज काय विशेष?? खूप आनंदात दिसताय. ‘Sensex’ ने सत्तर हजार पार केले म्हणून का‌?? आज किती हजारांचा फायदा झाला तुम्हाला?

भाऊजी म्हणाले,  छे! ग!! आता ते सर्व मी काही करत नाही. आता दोनाचे चार करायला मी जात नाही. तसेच कोणाशी चार हात करायची पण आता हिम्मत नाही, म्हणण्यापेक्षा करायचे नाही. अशा कोणत्याही भानगडीत पडायचे नाही. हे मी ठरवलंय. वादविवादात पडायचेच नाही.

अग!! काल मला चालताना त्रास होत होता. आज सकाळी उठल्यावर अगदी व्यवस्थित चालता आले. आहे की नाही आनंदी रहायचे कारण. अग!! आता रोज सकाळी प्रत्त्येक अगांकडे लक्ष द्यावे लागते. इतके वर्ष यांच्या कडे लक्षच दिले नाही. सर्वांना गृहित धरले, आता चांगलाच बदला घेतायेत सगळे. मी पण काही कमी नाही. मी म्हणतो,  या! या!! मैदानात मी काही घाबरत नाही कोणाला??

आजकाल आनंदाची परिभाषा बदलली आहे ग.!! आता फक्त “अन्न, वस्त्र, निवारा आणि वायफाय ” एवढं मिळाले तरी खूप.. याच आवश्यक गोष्टी झाल्या आहेत.

झोप छान लागली, कार छान चालवली. जूना मित्र भेटला, फिरायला गेल्यावर चार ओळखीची माणसे भेटली. की तो दिवस आनंदात जातो.

आता ‘ Reverse counting ‘ सुरू झाले आहे ना.. तेंव्हा आता आयुष्याची व्याख्याच बदलली. ‘Priorities’ बदलल्या.

लहानपणी ‘ Reverse counting’ शिकताना १००, ९९, ९८ असं मोजत असू, पण आयुष्याचे तसे नाही ना. कोणता नंबर/ वर्ष /महिना / दिवस/वेळ आहे??? तो शेवटचा नंबर/ क्षण माहीत नाही.

म्हणून रोजचा दिवस उगवला की, अरे व्वा!!

‘Thank you God’ असं मी म्हणतो. आजचा दिवस काही तरी विशेष (चांगले) करायला देवाने दिला आहे. असं मी समजतो.

काल सकाळी फिरायला गेलो, तर ‘धुक’ (fog) होत. समोरचे काही स्पष्ट दिसत नव्हते. रस्त्याच्या त्या end वर काय आहे??? ते तर अजिबात दिसत नव्हते. रस्ता कुठे संपतोय??? हेही कळत नव्हते. तेंव्हा एक एक पाऊल पुढे टाकत गेलो, हळूहळू पूढचे दिसत गेले व मी चालत राहिलो..

आज धुक्याने एक गोष्ट शिकवली. खूप पूढचे दिसत नाही ना, तर मग जास्त विचार न करता एकेक पाऊल पुढे टाकावे. आता मी फक्त रोजच्या दिवसाचे ‘ planning’ करतो.

आयुष्यात प्रत्येक फेज मधे आपले ‘planning ‘ वेगळे असते. आता पुस्तकाचा शेवटचा चॅप्टर वाचायचा राहिला आहे. गोष्टींचा शेवट कसा होतो??? याकडे लक्ष आहे. मी आजकाल तीच पुस्तके वाचतो, ज्याचा शेवट हिंदी सिनेमा सारखा चांगलाच होईल, याची खात्री असते मला. जे होणार असेल ते होईल. पण गोष्ट तरी छान, आनंदी वाचावी नाही का??

” विनाकारण उदास खूपदा झालोय. आता विनाकारण आनंदी रहायला शिकतोय. ”

मागच्या वर्षीचा अनुभव खूप काही शिकवून गेला ग!! .

म्हणतात ना.

अनुभवाची एक ठोकर चांगल्या चांगल्या माणसांना सरळ करते.

हे बरोबर असले तरी,

“कोशिश ऐसे करनी चाहिए कि, हारते हारते भी कब जीत जाओ पता ही ना चले ।”

काल अजय म्हणाला,  बाबा सर्व गोष्टी ‘on line’ होतात. मग का बाहेर जाता तुम्ही??

मी म्हंटल,  अरे!! मला व्यवस्थित चालता फिरता येत. आपली काम करता येतात. स्कूटर चालवता येते. एकदा हे सर्व करण सोडलं, तर मात्र मग पुन्हा करता येणार नाही. तेंव्हा जाऊ दे मला. चार लोक भेटतात. बोलणं होतं. संपर्क राहतो. अरे! शेवटी चार माणसांचे महत्व नाकारता येत नाही. ते चार नेहमीच गरजेचे /महत्वाचे. नाही का??

ताई म्हणाली,  अग! आजकाल वेगळ्याच मोडमधे आहेत. आता सर्व ठिकाणी मला घेऊन जातात. काल बॅंकेत गेलो होतो.

परवा डॉक्टर कडे गेलो होतो. त्याला म्हणाले,  डॉक्टर साहेब, रात्री बेरात्री काही त्रास झाला, तर वेळेवर घेण्यासाठी काही औषध असेल का?? .

म्हणजे ‘first aid’ म्हणतात ना ते, द्या. अहो!! आम्हाला औषधांचे काही कळत नाही. वेळ सांगून येत नाही. आणि वेळेवर आम्हाला काहीही सुचणार नाही. हे पण नक्की. आम्ही दोघेच घरी असतो म्हणून विचारले.

मला भाऊजींचे कौतुक वाटले. आश्चर्य ही वाटले. जूने भाऊजी आठवले. त्यांचा नोकरीचा रूबाब, दबदबा आठवला. कोणाला त्यांच्या समोर बोलायची हिम्मत नव्हती. ताईला ही व्हायची नाही. भीती युक्त आदर होता सर्वांना.

मागच्या वर्षी एका आजारानंतर खूप बदलले भाऊजी. शरीरातील सर्व गाठी तर विरघळून गेल्याच. मनातील अहंकाराची, नोकरी तील पोझिशन ची गाठ तर पार नाहीशी झाली. आता बासरी सारखे आतुन पोकळ झालेत. आता एक वेगळेच व्यक्तिमत्त्व दिसतंय.

दहा चांगल्या गोष्टी कितीही वाचा, ऐका त्या लवकर समजत नाही. पण एक कठीण वेळ / अनुभव/ ठोकर उदाहरणासहित सर्व समजावून देते. आपला चेहरा, विचार, वागणे सर्व पार बदलते.

म्हणतात ना,

” अकड़ और अभिमान एक मानसिक बिमारी है। जिसका इलाज कुदरत और समय जरूर करते हैं ।”

भाऊजी म्हणाले,

अग! “चालता चालता कधी तरी ठेच लागणारच, जगायचं म्हंटल तर दुःख हे असणारच. ठेच लागणार म्हणून चालण सोडायचे का?? दुःखात ही आनंद शोधायचा.

भाऊजी पूढे म्हणाले,

काल मी माझ्या पायांना विचारले,

” काय रे?? इतके वर्ष माझा भार उचलून, चालून चालून थकला का तुम्ही??

पाय म्हणाले,

छे! छे! अजिबात नाही.

तू फक्त मनाने थकू नकोस. थोडे बदल कर. जे आवडतं ते कर. आयुष्यभर ‘perfection’ च्या मागे धावत राहिलास. आता मोकळेपणाने बिनधास्त जग. आम्ही आहोतच.”

So, Enjoy everyday as last day of life.

“प्रत्येक दिवस उत्सव म्हणून साजरा करा. ”

“जीवन एक पेन की भांति हैं।इंक खत्म हो उससे पहले अपनी कहानी लिख लो ।

लोग क्या कहेंगे???? ये सोचना बंद करो ।”

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ जीवनाचे नियम ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

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☆ जीवनाचे नियम ☆ श्री दिवाकर बुरसे

हे एक गंभीर चिंतन आहे. माझे नाही तर आजपर्यंतच्या अनेक संत माहात्म्यांनी, तत्वचिंतकांनी, विचारवंतांनी केलेले. मी केवळ त्यातले मला जे उमजले, ते माझ्या शब्दात मांडले आहे.

`फोडिले भांडार, धन्याचा तो माल। मी तो हमाल, भारवाहू।।”* येवढीच माझी भूमिका.

 हे चिंतन थोडे दीर्घ वाटेल, नव्हे आहेच, पण वाचकांना प्रार्थना की त्यांनी थोडी कळ सोसून हे अंतापर्यंत वाचावे. मला विश्वास आहे, तुम्हाला ते निश्चित काही देऊन जाईल.

जीवनाचे नियम ☆ 

जीवन दिसते तेवढे सरळ नाही

वाटते तेवढे सोपेही नाही.

करतो काही, घडते काही

असे का? समजत नाही.

नुसता त्रागा, चिडचीड होते

सारे आयुष्य यातच जाते!

याला काही उपाय आहे?

आहे, आहे, निश्चित आहे.

 *

जीवनाचे काही नियम आहेत.

ते समजून घ्यायला हवेत.

नियम बदलता येत नाहीत

तशा प्रयत्नांना यश नाही.

पण, जगायचे तर बदलायला हवे-

स्वतःला, नियमांना नव्हे!

आपल्या जीवनावर आपला अधिकार.

तूच तुझ्या जीवनाचा शिल्पकार “

ज्यांना हे कळते, त्यांचे जीवन कृतार्थ होते!

 *

पेराल तरच उगवेल

म्हणून आधी पेरायला हवे.

खडकावर पेरून कसे चालेल?

सुपीक भूमीत रुजवायला हवे.

जे पेराल तेच उगवेल.

धोत्र्याला केशर कसे लागेल!

 *

आधी कष्ट मग फळ

कष्ट नाही ते निर्फळ.

केले तर सारे होते

न केले तर तसेच राहते.

 *

गमावण्यासाठी असायला हवे.

सापडण्यासाठी शोधायला हवे.

समजण्यासाठी विचारायला हवे.

कुणी सांगितले, तर ऐकायला हवे.

 *

मोती, रत्ने हवी असतील

तर सागरतळ गाठायला हवा.

किना-यावर बसणा-याला

माती, रेती, खारी हवा!

 *

अंधार आहे? दिवा घ्यावा.

अवघड वाट? आधार घ्यावा.

मागे कुणी यायला हवे?

आपण पुढे व्हायला हवे!

 *

देणे-घेणे व्यवहार आहे.

नुसते घेणे बेकार आहे.

देणारा दानशूर होतो.

नुसते घेणारा भिकार ठरतो!

 *

यश हवे? अपयश पचवा.

शांति हवी? कलह मिटवा.

एकी हवी? बेकी तोडा.

अंतराळ हवे? भूतल सोडा!

 *

येत नसेल? शिकायला हवे.

जमत नसेल? साधायला हवे.

घडवायचे असेल तर करायला हवे.

मरायचे नसेल तर जगायला हवे!

 *

इथे कर्म करायलाच हवे.

त्याखेरीज सुटकाच नव्हे.

कर्मात दोष असुदे काही,

निर्दोष कर्मे शक्य नाही.

त्यातील दोष तेव्हाच जळतील

जेव्हा कर्मे यशस्वी होतील!

 *

सार काय? असार काय?

याचा विचार व्हायला हवा.

मी कोण? कोठून आलो? जाणार कोठे?

याचा शोध घ्यायला हवा.

 *

कर्मासाठी काया दिली.

ज्ञानासाठी इंद्रिये दिली.

भवनांसाठी मन आहे.

निर्णय करणारी बुद्धी आहे.

जन्मसिद्ध हा ठेवा

अहंकार मात्र दूर ठेवा!

 *

दिसेल ते नासेल, रचेल ते खचेल.

चढेल ते पडेल, पडेल ते चढेल.

वाढेल ते मोडेल, येईल ते जाईल.

पसरेल ते आक्रसेल, जन्मेल ते मरेल.

 *

या स्वाभाविक नियमांच्या चौकटीत

आपले जीवन बसवायला शिका.

आनंदाने जगता जगता

आत्माराम विसरू नका!

 *

संशय नको, नाश पावाल.

विश्वास ठेवा, ज्ञानी व्हाल.

जेव्हा जग सोडून जाशील

सारे काही इथेच राहील.

आलास तसाच निघून जाशील

कीर्ति परिमल पसरत राहील!

🙏🏻

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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