हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६९ ⇒ रिश्ते और फरिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और फरिश्ते ।)

?अभी अभी # ९६९ ⇒ आलेख – रिश्ते और फरिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रिश्ता क्या है तेरा मेरा !

मैं हूं शब, तू है सवेरा।।

कुछ रिश्ते हमें बांधते हैं और कुछ मुक्त करते हैं।

जो स्वयं मुक्त होते हैं, जब हम उनसे जुड़ते हैं, तो हमें भी मुक्ति का अहसास होता है लेकिन जिसे संसार ने जकड़ लिया है, और अगर हमने उसे पकड़ लिया है, तो वह हमारा भी बंधन का ही कारण सिद्ध होता है।

रिश्तों को बंधन का कारण माना गया है। बंधन में सुख है, थोड़ा प्रेम भी है, थोड़ी आसक्ति भी। कुछ बंधन इतने अटूट होते हैं जो टूटे नहीं टूटते, और कुछ बंधन इतने शिथिल और कमजोर होते हैं, कि संभाले नहीं संभलते। कहीं रिश्तों में गांठ आ जाती है तो कहीं तनाव

और कहीं सिर्फ एक प्रेम का धागा ही रिश्तों की बुनियाद बन जाता है।।

रिश्ता दर्द भी है और दवा भी। रिश्ते में कहीं फूल सी खुशबू है तो कहीं कांटों सी चुभन भी है। किसी की फुलवारी महक रही है तो कहीं घरों के बीच दीवार खड़ी हो रही है ;

रिश्तों में दरार आई

बेटा न रहा बेटा,

भाई न रहा भाई …

ऐसी मनोदशा में जब रिश्ते साथ नहीं देते, कहीं से एक फरिश्ता चला आता है। कहते हैं, फरिश्ते का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। वह तो बस फरिश्ता होता है। यह फरिश्ता हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हमें कभी नजर नहीं आता।

आप सड़क के बीच, कुछ अनमने से, कुछ खाए खोए से चले जा रहे हैं, पीछे से एक वाहन हॉर्न दे रहा है, कहीं से अचानक एक अनजान व्यक्ति फुर्ती से आता है और आपको पकड़कर सड़क के किनारे ले जाता है। आप कुछ समझ नहीं पाते। वह आपकी जान बचाकर वहां से चला जाता है। कोई जान ना पहचान। आप सोचते हैं, जरूर कोई फरिश्ता ही आया होगा आपकी जान बचाने।

जीवन में ऐसे काई अवसर आते हैं, जब संकट की घड़ी में कहीं से अनायास ही ऐसा कुछ घटित हो जाता है, जिससे हम राहत की सांस लेने लगते हैं।।

रिश्ता अच्छा बुरा हो सकता है, फरिश्ता कभी बुरा नहीं होता। कभी कभी हमें रिश्तों में भी फरिश्ते नजर आते हैं तो कुछ रिश्ते असहनीय दर्द और मानसिक पीड़ा के कारण रिसते नजर आते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी कोई फरिश्ता हमारा रहबर बनकर कहीं से प्रकट होता है और हमें उस पीड़ा से उबार लेता है।

फरिश्ते का भी क्या कभी नाम होता है, कोई पहचान होती है ! जी हां, कभी कभी हो भी सकती है।

हर नन्हा बच्चा एक नन्हा फरिश्ता होता है। कभी हमें अपनी मां ही फरिश्ता नजर आती है तो कभी बहन अथवा भाई। कृष्ण सुदामा तो दोनों ही फरिश्ते होंगे। राम लक्ष्मण जैसे भाई जहां हों, वहां तो फरिश्ते भी शरमा जाएं।।

हमें जहां भी भलाई और अच्छाई नजर आ रही है, वह सब उन फरिश्तों की बदौलत ही है। वे फरिश्ते हम आप भी हो सकते हैं। अच्छे रिश्तों को ही हमने फरिश्तों का नाम दिया हुआ है। किसी गिरते को थाम लेना, किसी मुसीबतजदा इंसान की मदद करना, यही तो एक फरिश्ते का काम होता है।

फरिश्ता स्वयं ईश्वर नहीं होता, लेकिन वह ईश्वर का दूत अवश्य होता है। फरिश्ते की ना तो आरती होती है और ना ही फरिश्ते का कोई मंदिर होता है। न आरती न अगरबत्ती, फिर भी कहीं से संकटमोचक की तरह प्रकट हो जाए, आपकी बिगड़ी बना दे, और गायब हो जाए।।

कितने फरिश्ते हमारे आसपास हैं, हमें मालूम ही नहीं। अच्छाई को महसूस करना ही फरिश्ते को पहचानना है।

जब रिश्तों में स्वार्थ और खुदगर्जी का स्थान प्रेम और त्याग ले लेगा। बुराई अच्छाई की चकाचौंध में कहीं नज़र नहीं आएगी, दूसरों का दुख हमें अपना लगने लगेगा, हर प्यासे तक कोई फरिश्ता कुआं बनकर आएगा, तब हम सब मिलकर यह तराना गाएंगे ;

फरिश्तों की नगरी में

आ गया हूं मैं,

आ गया हूं मैं …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २७ – कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रबोधन“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २७ ?

? कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

—-1—

कोई तो जन-नायक आए, जिसका यह उद्बोधन हो

शास्त्रों में भी संविधान-सा, अब समुचित संशोधन हो

—-2—-

अपने बँगले में जो कुत्ते-बिल्ली पाले बैठे हैं

वो हमसे कहते हैं ‘बिरझू’ तेरे घर में गोधन हो

—-3—–

अर्जुन-भीम-युधिष्ठिर पर भी, वैसा ही अभियोग लगे

चीर-हरण प्रकरण में दोषी, केवल क्यों दुर्योधन हो

—-4—–

बने तथागत मेरा अपना कोई यदि तुम सोच रहे

ख़ुद का तो अवलोकन कर लो, तुम कितने शुद्धोधन हो

        —5—

अग्नि परीक्षा दंश दहेज़ी, शोषण हर युग में सहती

तोड़ो अंध-मूक परिपाटी, नारी हित अनुशोधन हो

—6—–

अनपढ़-अपराधी न पहुँचें, संसद के गलियारों में

चयन के मानक मापदण्ड का, बहुमत से अनुमोदन हो

—-7—-

वादे उनके सच बनकर यदि, उतरें नहीं धरातल पर

फिर मुखिया का लाल किले से, क्यों झूठा सम्बोधन हो

—8—-

बेक़ारी महँगाई ग़रीबी, जात-पाँत के मुद्दों को

सुलझाने यह चले कारवाँ, ना कोई अवरोधन हो

—9—

चलो उड़ा दें ज्ञान के बल पे, पाखण्डों के परखच्चे

जन-जन में ‘राजेश’ मनन हो, चिंतन-तर्क प्रबोधन हो

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆ गीत – ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆

☆ गीत ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।विधा।।पद्य(छंद मुक्त)तुकांत।।

=1=

मैं राजनीति का मंच हूँ।

मैं लिये व्यंग का तंज हूँ।

मैं विरोधी  पर  पंच हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=2=

मैं भूख का निवाला  हूँ।

मैं मंदिर और शिवाला हूँ।

मैं देश का  रखवाला हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=3=

मैं सबकी सुनता कहता हूँ।

नहीं अपने में ही  रहता हूँ।

शीतल जल  सा बहता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=4=

मैं  एक शिकारी  भी हूँ।

मैं खुद   शिकार भी हूँ।

पर रहता खबरदार भी हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=5=

मैं रखता  हर  खबर हूँ।

मैं करता खबरदार भी हूँ।

मानो तो मैं अखबार ही हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=6=

मुझ से तेज़  धीमा नहीं है।

मेरे सा कोई नगीना नही है।

मेरी तो कोई सीमा नहीं है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=7=

मैं बच्चों  का  उत्पात हूँ।

मैं बड़ों का वादविवाद हूँ।

मैं बुजर्गों का आशीर्वाद हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=8=

मैं ऊपर ऊंचा   नभ  सा हूँ।

मैं कठोर  जैसे  थल सा हूँ।

मैं कलकल बहता जल सा हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=9=

में जीवन का मर्म हूँ।

मैं सख्त और नर्म हूँ।

मैं धर्म और  कर्म हूँ ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=10=

मैं गरीब की हाय हूँ।

नहीं मैं  असहाय हूँ।

मैं सर्वपंथ सुखाय हूँ।।

=11=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

मैं समाज का    दर्पण हूँ।

मैं ईश चरणों में  अर्पण हूँ।

मैं सूचनाओं को समर्पण हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=12=

मैं मन का   स्पंदन हूँ।

मैं राष्ट्र का    वंदन हूँ।

मैं सच का अभिनंदन हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=13=

मैं लिए हर शब्द भी हूँ।

मैं  निःशब्द   भी हूँ।

मैं सदैव उपलब्ध भी हूँ।।

=14=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

भूत,भविष्य,वर्तमान बात बतलाता हूँ।

लोगो को सचेत कर के भी जागता हूँ।

कलमआईने से हकीकत दिखलाता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=15=

मेरी दुर्गम  सी  डगर है।

मुझमे भी अगर  मगर है।

मेरी वाणी अजर अमर है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६३ ☆ कविता – श्रमिक… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – श्रमिक। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६३

☆ श्रमिक…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दुनियाँ वही धनी निर्धन की लेकिन बँटी बंटी

आपस के व्यवहारो में पर कभी न बात पटी

फिर भी धनिकों की सेवा में रहे गरीब डटे

*

धन ने श्रम को दिया प्रताड़ित कभी न स्नेह दिया

तब भी श्रमिकों ने धनियों का सेवा कार्य किया

कटीनाई आने पर भी कभी पीछे नहीं हटे

*

मन में साधे कल की आशा , सब दुख-दर्द सहे

करते मदद सदा धनिको की आगे रहे खड़े

मुँह को  बाँधे हाथ बढ़ाये पहने वस्त्र फटे

*

दोनों की आशा अभिलाषा में अन्तर भारी

मन को मारे मजदूरी में उम्र कटी सारी ॥

बीमारी में न बोले, वेतन भले कटे ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ खळाळ रक्ताचा… ☆ प्रा. भरत खैरकर☆

प्रा. भरत खैरकर

? कवितेचा उत्सव ?

खळाळ रक्ताचा ☆ प्रा. भरत खैरकर 

स्वप्नांची ओढूनी शाल

पाषाणाशी घेतली उरभेट

माथ्यावरचे आभाळ धरण्या

चढलो घाटांवर घाट!

 *

अखंड वेदना पेलतांना

झुंजायाचे बळ आले

तुटल्या पंखानी भरारतांना

पंखाखाली आभाळ निळे!

 *

शमता खळाळ रक्ताचा

पेलताना चढावाचे आव्हान

अधांतरी अंतरीचा झुला

तुटे कंठातील मधुतान!

 

© प्रा. भरत खैरकर

संपर्क – बी १/७, काकडे पार्क, तानाजी नगर, चिंचवड, पुणे ३३. मो.  ९८८१६१५३२९

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “आयुष्य बदलणारा क्षण ओळखा” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

☆ “आयुष्य बदलणारा क्षण ओळखा☆ श्री जगदीश काबरे ☆

“कॅलेंडर नेहमी तारीख बदलत राहते, पण एक दिवस अशी तारीख येते जी कॅलेंडरच बदलून टाकते. म्हणून संयम ठेवा, प्रत्येकाची वेळ येणार असते.” ही ओळ केवळ प्रेरणादायी वाक्य नाही, तर मानवी जीवनाच्या सामाजिक आणि मानसिक गतीमानतेचे अत्यंत सूचक रूपक आहे. माणसाचे दैनंदिन जीवन हे सवयी, दिनक्रम, आणि पुनरावृत्ती यांमध्ये अडकलेले असते. प्रत्येक दिवस सारखाच वाटतो, परिस्थिती बदलत नाही असे भासते, आणि त्यामुळे निराशा किंवा हताशा निर्माण होण्याची शक्यता वाढते. पण इतिहास आणि समाजजीवन आपल्याला सतत दाखवत असते की, या सतत चालणाऱ्या “तारीख बदलण्याच्या” प्रक्रियेतच एखादा क्षण असा येतो, जो संपूर्ण प्रवाह बदलून टाकतो. हा बदल वैयक्तिक स्तरावरही असू शकतो—जसे एखाद्या व्यक्तीचे आयुष्य एका निर्णयामुळे पूर्णपणे बदलते किंवा सामाजिक स्तरावरही, जिथे एखादी घटना संपूर्ण समाजाच्या विचारसरणीत परिवर्तन घडवते. येथे मला मोहनदास करमचंद गांधींच्या जीवनातील एका विविक्षित घटनेची आठवण होते. अजून ते महात्मा व्हायचे होते तेव्हाची गोष्ट आहे ही. गांधीजी दक्षिण आफ्रिकेत असताना एका खटल्यासाठी प्रिटोरियाला जात असताना डरबन रेल्वे स्टेशनवर एका गोऱ्या माणसाने गांधींकडे पहिल्या वर्गाचे तिकीट असूनही तो काळा माणूस आहे म्हणून त्यांच्या सामानासकट त्यांना प्लॅटफॉर्मवर धक्के मारून फेकले होते. तो क्षण गांधीजींच्या जीवनातला वळणबिंदू होता. कारण त्यानंतर त्यांनी इंग्रजांच्या विरोधात सत्याग्रहाचे हत्यार उपसून स्वातंत्र्याच्या लढ्यात झोकून दिले. हा क्षण म्हणजेच गांधीजींचा महात्मा होण्याचा क्षण होता. त्यांच्या जीवनात ती तारीख अशी होती की जिने कॅलेंडरच बदलून टाकले.

दुसरी गोष्ट अशी की, माणसाला जर यश मिळवायचे असेल तर त्याने संयम ठेवायची आवश्यकता असते. पण मानवी मन हे तात्काळ परिणामांची अपेक्षा ठेवते. मेहनत केल्यावर लगेच यश मिळावे, संघर्ष केल्यावर लगेच बदल दिसावा, अशी अपेक्षा असते. पण वास्तवात बदल हा संथ प्रक्रियेतून घडत असतो. ही संथता अनेकदा माणसाला खचवते, त्याचा आत्मविश्वास कमी करते. अशा वेळी “तुझीही वेळ येईल” हा आशावाद मनाला उभारी देतो. मात्र, या आशावादाची एक मर्यादाही आहे. केवळ वेळ येईल म्हणून निष्क्रिय राहणे, किंवा सर्व काही नशिबावर सोडणे, ही मानसिकता घातक ठरू शकते. तेव्हा संयम म्हणजे केवळ थांबणे नव्हे, तर सतत प्रयत्न करत राहण्याची तयारी आणि अपयशाला सामोरे जाण्याची ताकद होय.

समाजातील असमानतेमुळे अनेक लोक आर्थिक, शैक्षणिक किंवा सामाजिक कारणांमुळे मागे पडलेले असतात. त्यांच्यासाठी “एक दिवस येईल” ही कल्पना आशेचा किरण ठरते. पण दुसरीकडे, हीच कल्पना सत्ताधाऱ्यांकडून किंवा प्रभावशाली गटांकडून लोकांना शांत ठेवण्यासाठीही वापरली जाऊ शकते. “तुमची वेळ येईल” असे सांगून वर्तमानातील अन्याय, विषमता किंवा शोषण याकडे दुर्लक्ष केले जाऊ शकते. त्यामुळे या वाक्याकडे अंध आशावाद म्हणून न पाहता, त्यामागील वास्तव समजून घेणे गरजेचे आहे.

शेवटी, हे वाक्य जीवनातील परिवर्तनाच्या शक्यतेवर विश्वास ठेवायला शिकवते, पण त्याचबरोबर तो बदल घडवण्यासाठी आवश्यक असलेल्या कृतीची जाणीवही करून देते.

थोडक्यात काय तर, कॅलेंडर बदलणारी तारीख आपोआप येत नाही; ती घडवावी लागते. म्हणूनच संयम आणि प्रयत्न यांचा समतोल साधणे हीच या विचाराची खरी किल्ली आहे.

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ हास्य… ☆ सुश्री स्वप्ना मुळे (मायी) ☆

सुश्री स्वप्ना मुळे (मायी)

? जीवनरंग ?

☆ हास्य… ☆ सुश्री स्वप्ना मुळे (मायी)

“सायकल चालवता येते का?? “

त्याच्या प्रश्नाने ती गडबडली कारण नेमकं तिचं ‘स्वप्न काय’ त्याने विचारताच ती म्हणाली, “नवऱ्यासोबत टू व्हीलरवर बसून वेगात हुरर करत हिंडायचं… “

तिचं स्वप्न ऐकताच त्याचा हा प्रश्न… ती मग हळूच म्हणाली, “थोडी थोडी जमते.. “

तो म्हणाला, “हरकत नाही, आपल्याकडे प्रॅक्टीसला टू व्हीलर नाही, सायकल आहे म्हणून विचारलं… “

ती थोडी हिरमुसली, पण तो मात्र खळखळ हसला होता, कारण स्वतःला सायकल येत नाही पण त्याच्या मागे बसून हुरर करत हुंदडायचं स्वप्न ती बघत होती.

‘सायकल’ ऐकून बहुतेक ‘नकार’ हे समजून त्याचं रुटीन सुरू होतं. सायकलवर टांग मारून तो निघणार तेवढ्यात जोशी आजी गॅलरीतून ओरडल्या, “बंड्या होकार आलाय… उद्या येत आहेत ते तारीख काढायला… “

मन हवेत तरंगलं आणि सायकल सुध्दा हवेत चालली त्यादिवशी. पुढे सगळं स्वप्नासारखं घडत गेलं. कोणी नसलं तरी चाळीतल्या सगळ्यांनी सगळ्या भूमिका घेतल्या. जोशी आजी पुढाकाराला होत्याच, भाले मामा झाले, कोणी काका, कोणी करवल्या, असं करत गरिबीतलं कार्यही माणसांच्या प्रेमामुळे श्रीमंत झालं. बंड्याचे दोनाचे चार हात झाले तेंव्हा आजी म्हणल्याच, “नशिबात असलं की घडतच नाही, तर चांगले बंगल्यावाले पोरं बिनलग्नाचे बसलेत. बंड्याने नशीब काढलं. गुणी पोरगीं मिळाली… “

सगळं नवं स्वीकारत ती बंड्याशी नातं जपत होती. बंड्याही तसाच, परिस्थितीने गरीब असला तरी मनाने श्रीमंत असलेला… रोज गजरा चूकत नव्हता… ती ही सगळं स्वीकारणारी, फक्त एक खंत, टू व्हीलर डोळ्यासमोरुन जात नव्हती…

एकदा उगाच काहीतरी बिनसलं आणि तिने स्वप्न छेडलंच. “मी म्हणालेच होते बाबाला, तो सायकलवाला आहे… गाडी घोडी नाही त्याच्याकडे… “

तिच्या या वाक्याने तो हिरमुसला, डबा उचलून गपचूप निघून गेला. उगाच बोललो असं वाटून ती रडवेली झाली. जोशी आजीकडे जाऊन मुसमुसुन रडली. आजीला सगळं सांगितलं.

आजीने पाठीवर हात फिरवत जवळ घेतलं आणि म्हणाली, “बंड्याला कोणी नाही, ह्या चाळीचा जिना झाडून मिळालेल्या भाकरीवर मोठा झाला. माझ्या शिकवण्यांमध्ये येऊन बसायचा म्हणून त्याला शाळेत टाकलं. जिन्याखाली राहायचा. शिकला, ही छोटी नोकरी मिळाली, ही खोली भाड्याने घेतली, पै पै जमवून ही सायकल घेतली. आयुष्यात तू आलीस, आता आणखी दिवस बदलतील बिचाऱ्याचे… पण तू एक लक्षात ठेव, त्याचं आणि तुझं, दोघांच्या चेहऱ्यावरचं हास्य ज्या दिवसापासून ह्या वस्तूंसाठी हरवायला लागेल त्या दिवसापासून संसार फक्त एक कर्तव्य राहील, त्यातलं हास्य लोप पावेल… वस्तू येत राहतील, पण त्यासाठी लागणारा वेळ तुला सहन करावा लागेल, तरच खरी गंमत,.. “

तिलाही पटलं… ती घरी पळाली. त्याची येण्याची वेळ झालीच होती. आवरून जिन्यापाशी थांबली. तो दिसताच म्हणाली, “गाडीवर मागे नाही, तर सायकलवर समोर बसायचं आहे मला… तुला येते का तशी डबलसीट चालवता..? “

तो हसला. ती सायकलच्या दांडीवर बसली… त्याने गजरा तिच्या केसात माळला. सुगंधी वाऱ्यात.. एकदम जोरात… खळखळ हास्याच्या तालावर सायकल वेगात निघाली.

© सुश्री स्वप्ना मुळे (मायी)

फक्त व्हाट्सअप संपर्क +91 93252 63233

छत्रपति संभाजी नगर महाराष्ट्र

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “वो भी क्या दिन थे…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “वो भी क्या दिन थे…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

विदर्भामध्ये वाशिम या छोट्या गावात आम्ही होतो.

५ वी ते ११ वी म्हणजे मॅट्रिक पर्यंत सरकारी शाळेत शिक्षण झाले. शाळेची फी माझ्या आठवणी प्रमाणे 13 आणे होती. शाळा घरापासून बऱ्यापैकी लांब होती. शाळेत चालत जायचे आणि चालत परत यायचे. सायकल, रिक्षा हे आटोक्या बाहेरचे होते. व्हॅन हा प्रकार अस्तित्वातच नव्हता.

शाळेत जाण्याकरता दोन हाफ पॅन्ट आणि दोन बुशशर्ट, आणि इतर वापरण्याकरता एक जास्तीची हाफ पॅन्ट आणि शर्ट एवढेच कपडे असायचे.

बूट मोजे हा प्रकार आमच्या ऑटोक्या मधला नव्हता. साधी चप्पल असायची.

पण यामध्येच आम्ही मस्त असायचो आणि एन्जॉय करायचो. घराच्या आसपास राहणारे मित्र पण असेच मस्त एन्जॉय करायचे.

घरी कोणी पाहुणे आले तर जाताना ते खाऊ करता म्हणून चार आणे (आत्ताचे 25 पैसे) द्यायचे.

ते मी जपून ठेवायचो. आणि भाऊबीजे करता त्याच पैशांमधून मामे बहिणी करता छोटं खेळणं घेऊन यायचो.

तेव्हा टीव्ही नव्हता, मोबाईल नव्हता. आपापसांमध्ये संवाद असायचे, विनोद असायचे, फिरक्या घेणे असायचे. आणि त्यामध्ये एक वेगळीच मजा असायची आनंद असायचा.

अशा खूप मजेशीर आठवणी आहेत. खरा आनंद घरच्या सगळ्यांशी छान संवाद, योग्य शिस्त, घरचे जेवण, महिन्यात एखादा घरी केलेला गोड पदार्थ यातच असतो.

असं वाटतं अधून मधून त्या भूतकाळातून एक मस्त फेरफटका मारून यावा आणि तो आनंद पुन्हा पुन्हा घ्यावा.

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ नात्यांची वीण – – ☆ सुश्री सुरेखा चिखलकर ☆

सुश्री सुरेखा चिखलकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ नात्यांची वीण – – ☆ सुश्री सुरेखा चिखलकर

नात्यांची वीण ही रेशमाच्या धाग्यासारखी असते, जितकी मऊ आणि सुंदर, तितकीच नाजूक.

… आयुष्य जगत असताना अनेक माणसे भेटतात, काही मनात कायमचे घर करतात, तर काही जीवाभावाचे सोबती बनतात. पण कधी कधी काळाच्या ओघात किंवा परिस्थितीच्या फेऱ्यात हीच हवीहवीशी वाटणारी नाती अचानक दुरावतात. एखादा छोटासा गैरसमज, बोलता बोलता तोंडातून गेलेला एखादा चुकीचा शब्द किंवा केवळ एका क्षणाचा राग, वर्षानुवर्षांच्या प्रेमावर मिठाचा खडा टाकतो आणि सुरू होतो एक न संपणारा अबोला. खरे तर अशा वेळी मनाच्या एका कोपऱ्यात दोघांनाही एकमेकांची ओढ असते. जुन्या आठवणी आठवून मन भरून येतं, साध्या साध्या गोष्टींतून एकमेकांची उणीव भासते, पण संवाद मात्र खुंटलेला असतो. या दुराव्याचं सर्वात मोठं कारण असतं ‘अहंकार ‘म्हणजेच इगो. मी का वाकू? मी का आधी बोलू? मी वयाने मोठा आहे तर त्यानेच आधी यायला हवं, किंवा मी लहान असूनही मला सन्मान मिळाला नाही, अशा विचारांचे काहूर मनात माजलेले असते.

मोठेपण आणि लहानपण या तराजूत जेव्हा आपण नात्याला तोलतो, तेव्हा नात्याचं वजन आपोआप कमी व्हायला लागतं. आपण हे विसरतो की, नाते टिकवण्यासाठी कोणाचे तरी वयाने मोठे असण्यापेक्षा मनाचे मोठे असणे जास्त महत्त्वाचे असते.

कोणतेही नाते पुन्हा पूर्ववत करायचे असेल, तर अहंकाराची भिंत पाडावीच लागते. समोरचा माणूस आपल्यासाठी किती महत्त्वाचा आहे, याचा विचार केला की इगोची किंमत शून्य होऊन जाते. चूक कोणाचीही असो, पण जर ते नाते आपल्यासाठी अनमोल असेल, तर पुढाकार घेण्यात कसलीच लाज वाटायला नको. कधी कधी ‘सॉरी’ म्हणण्याने आपण लहान होत नाही, उलट ज्याला आपल्या सुखापेक्षा समोरच्या व्यक्तीची साथ जास्त महत्त्वाची वाटते, तोच खरा मोठा असतो.

अबोला हा नात्यातला सर्वात मोठा शत्रू आहे, तो केवळ अंतर वाढवतो. त्याऐवजी समोरासमोर बसून, मनमोकळेपणाने बोलल्यास मोठमोठे डोंगरही विरघळून जातात. नाती ही जपून ठेवायच्या वस्तू नसून ती जगण्याची अनुभूती आहे.

– – आयुष्याचा प्रवास तसा छोटा आहे, त्यात रुसवे-फुगवे आणि अहंकार घेऊन चालण्यापेक्षा प्रेमाची शिदोरी सोबत असलेली केव्हाही चांगली. जर तुम्हाला वाटत असेल की एखादं नातं तुमच्यासाठी महत्त्वाचं आहे, तर मग उशीर करू नका. ‘मोठा ‘ किंवा ‘छोटा ‘हा विचार बाजूला ठेवा आणि मनाच्या मोठेपणाने संवादाचा हात पुढे करा. कारण गेलेली वेळ आणि तुटलेली माणसं पुन्हा मिळवणं कठीण असतं. एखाद्याला गमावून पश्चात्ताप करण्यापेक्षा, स्वतःचा इगो बाजूला सारून त्या नात्याला पुन्हा एकदा फुलायला मदत करणं, हेच खऱ्या समृद्ध आयुष्याचं लक्षण आहे.

 © सुरेखा चिखलकर

 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २३ आणि २४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २३ आणि २४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. २३ – – – 

न बोले मना राघवेवीण काही ।

जनी वाऊगे बोलता सुख नाही ।

घडीने घडी काळ आयुष्य नेतो ।

देहांती तुला कोण सोडू पाहतो ।।२३।।

अर्थ : हे मना, एका राघवाशिवाय म्हणजेच भगवंताच्या नामाशिवाय दुसरे काही बोलू नकोस. तू इतर व्यर्थ बडबड केलीस तर तुला जे पारमार्थिक सुख अपेक्षित आहे ते मिळणार नाही. काळ क्षणाक्षणाला आपले आयुष्य कमी करीत असतो. जर या काळात परमेश्वराचे नामस्मरण करणे राहून गेले, तर अंतकाळी तुला कोणीही वाचवू शकणार नाही.

विवेचनमागील श्लोकात समर्थांनी आपल्या हितासाठी श्रीरामाचे नाव चित्तामध्ये दृढ धारण करावे असा उपदेश केला. या श्लोकात त्याच विचाराचा विस्तार करत ते आपल्या मनाला बजावतात की हे मना, एका रामाशिवाय तू दुसरे काही बोलू नकोस. कारण इतर गोष्टी बोलण्यात खरे सुख नाही. काळ कोणासाठीही थांबत नाही. तो कोणाचाही अपवाद करत नाही. क्षणाक्षणाला तो आपले आयुष्य कमी करीत असतो आणि एक दिवस असा येतो की अंतिम क्षणी तो आपल्यालाही सोडत नाही.

समर्थांना आपल्या कल्याणाची किती तळमळ आहे हे या श्लोकातून जाणवते. आपले जीवन म्हणजे परमेश्वराकडून मिळालेली एक अमूल्य भेट आहे. पण या जीवनामध्ये ज्याने आपल्याला ही सुंदर देणगी दिली त्या परमेश्वरालाच आपण विसरतो आणि निरर्थक बोलण्यात आपले आयुष्य वाया घालवतो.

बोलण्यात आपली मोठी शक्ती खर्च होत असते. अनेकदा बोलण्यामुळे जेवढा शीण येतो, तेवढा एखादे श्रमाचे काम केल्यामुळेही येत नाही. एखादा वक्ता जर दोन-तीन तास सतत बोलत राहिला तर त्याला किती थकवा येतो हे त्यालाच ठाऊक असते. शाळा-महाविद्यालयांमध्ये शिकवणाऱ्या शिक्षकांना आणि प्राध्यापकांनाही हा अनुभव वारंवार येत असतो.

परंतु समाजात आपण पाहतो की बरीच मंडळी व्यर्थ बोलण्यात वेळ घालवतात. चौकात उभे राहून गप्पा मारणारी तरुणांची टोळकी, कट्ट्यावर बसणारे लोक, कार्यक्रमांच्या निमित्ताने एकत्र जमलेली मंडळी या सगळ्यांच्या चर्चांना कोणताही विषय चालतो. एकदा बोलायला सुरुवात झाली की कोणत्याही विषयावर अखंड बोलत राहणे ही सवय बनते. यात वेळेचा आणि शक्तीचाही अपव्यय होतो.

अति बोलण्याची सवय वृद्धापकाळात त्रासदायक ठरू शकते. अशा वेळी घरातील लोकांनाही ती माणसे नकोशी वाटू लागतात. बोलायला कोणी नसते आणि त्यामुळे मनात निरर्थक दुःख साचत जाते. म्हणून वेळीच सावध होणे आवश्यक आहे. आजच्या काळात टीव्हीवरील चर्चा, भडक बातम्या किंवा निरर्थक वादविवाद यांकडे लक्ष देण्यातही आपला बराच वेळ खर्च होतो. परंतु साधकाच्या दृष्टीने त्यातून फारसे काही निष्पन्न होत नाही.

आपले खरे हीत साधायचे असेल तर भगवंताच्या नामाशिवाय दुसरा मार्ग नाही. त्या नामाला विसरून आपण कितीही इतर गोष्टी बोलत राहिलो, तरी ती व्यर्थ बडबडच ठरते. त्यामुळे खरे सुख मिळत नाही. येथे सुख म्हणजे परमेश्वर प्राप्तीच्या किंवा आत्मसाक्षात्काराच्या दृष्टीने होणारी आपली वाटचाल असे म्हणता येईल.

नाम घेण्याची सवय जर आयुष्यभर अंगवळणी पडली नाही, तर अंतकाळी ते सहजपणे आपल्या मुखात येणार नाही. संतांना माणसाचे कल्याण व्हावे याची प्रचंड तळमळ असते. म्हणूनच संत गोंदवलेकर महाराज देखील आपल्या प्रवचनांमध्ये वारंवार सांगतात की तुम्ही रामनाम घ्या.

समर्थ रामदासांचाही कळकळीचा हाच संदेश आहे. जीवनाचा एकही क्षण व्यर्थ घालवू नका; भगवंताचे नामस्मरण करा.

स्वसंवाद :: 

  • वेळ, शक्ती आणि आयुष्य वाया घालवणाऱ्या व्यर्थ चर्चांपासून मी स्वतःला दूर ठेवू शकतो का?
  • माझ्या दैनंदिन जीवनात भगवंताचे नामस्मरण कितपत आहे?
  • आयुष्याचा प्रत्येक क्षण अमूल्य आहे याची जाणीव ठेवून मी तो अधिक अर्थपूर्ण बनवण्याचा प्रयत्न करतो का?

– – – – 

श्लोक क्र. २४ – – 

रघूनायकावीण वाया शिणावे ।

जनासारिखे व्यर्थ का वोसणावे ॥

सदा सर्वदा नाम वाचे वसो दे ।

अहंता मनी पापिणी ते नसो दे |२४|

अर्थ: हे मना, एका रामाला सोडून केलेली सगळी कामे व्यर्थ आहेत. भगवंताला विन्मुख झालेल्या सामान्य माणसांप्रमाणे व्यर्थ बडबड (वोसणावे) करू नये. त्या बाष्कळ बडबडी ऐवजी भगवंताचे नाव मुखात असू दे. अहंकार हा अध्यात्मामध्ये फार मोठा शत्रू आहे. त्याला मनात थारा देऊ नकोस.

विवेचन: समर्थांना मानव जातीच्या कल्याणासाठी वाटणारी तळमळ ही एखाद्या मातेसारखी आहे. आपल्या मुलाचे कल्याण व्हावे म्हणून ती त्याला जरी आवडत नसले तरी एखादी गोष्ट पुन्हा पुन्हा सांगत असते. त्याचप्रमाणे समर्थ मागील श्लोकातीलच गोष्ट या ठिकाणी पुढे विस्तारून सांगतात. आधीच्या श्लोकात मनाला राघवाशिवाय काही बोलू नकोस कारण व्यर्थ बोलण्यामध्ये सुख नाही असे त्यांनी सांगितले आहे. या श्लोकात हीच गोष्ट ते वेगळ्या शब्दात आपल्याला सांगतात.

भगवंताच्या नामामध्ये अपार सामर्थ्य आहे. शिणलेल्या मनाला शक्ती देण्याचे, उभारी देण्याचे सामर्थ्य त्यात आहे. आपण जर खऱ्या सुखाचा शोध घेत असू तर भगवंताच्या नामाइतके सुख कशातच नाही. अन्य सुखे तात्पुरती आहेत आणि अंतिमतः दुःख देणारीच आहेत हेच समर्थ या श्लोकातून आपल्याला सांगण्याचा प्रयत्न करतात. म्हणून आपल्या जिभेवर नेहमी भगवंताचे नाम असावे असे त्यांचे सांगणे आहे.

शब्द किंवा भाषा बोलणे हे माणसाचे वैशिष्ट्य आहे. भाषेच्या माध्यमातून आपण आपले विचार व्यक्त करतो. शब्दांमध्ये किंवा भाषेमध्ये केवढी शक्ती असते हे जेव्हा आपण अधिकारी व्यक्तींच्या साहित्याचे वाचन करतो किंवा त्यांचे बोल ऐकतो तेव्हा लक्षात येते. बोलण्याला वाचाशक्ती असेही आपण म्हणतो. हे सरस्वतीचे वरदान आहे. पण सर्वसामान्य लोक बऱ्याच वेळा वायफळ बोलण्यात ही शक्ती व्यर्थ घालवत असतात.

पण ज्यांना साधना मार्गावर वाटचाल करायची आहे, भगवंत जोडायचा आहे, त्यांना अशी बाष्कळ बडबड करून चालणार नाही. आपल्या वाचेने त्यांनी भगवंताचे नाम घ्यायला हवे तशी सवय करायला हवी. उठत बसता, कार्य करता, सदा घेता देता… भगवंताचे नाम मुखात यायला हवे. मी जर साधक आहे आणि भगवंत प्राप्ती हे माझे ध्येय आहे असे जर आपण मनाशी ठरविले असेल तर जनांमध्ये मिसळताना सामान्य माणसांसारखी बडबड करून मला भागणार नाही. तसे केले तर मी माझ्या वाचेची शक्ती व्यर्थ घालवली असा त्याचा अर्थ होईल.

सुरुवातीला लोक मला नावे ठेवतील. माझी चेष्टा किंवा टिंगलटवाळी करतील पण मला भगवंत प्राप्तीसाठी ती सुद्धा सोसता आली पाहिजे. काही दिवसांनी लोकांना हे लक्षात येईल की ही व्यक्ती आपल्यासारखी नाही. ती साधक आहे. मग ते तुमच्याशी आदराने व्यवहार करतील. समर्थ या सगळ्या परिस्थितीतून गेले आहेत. ही परिस्थिती त्यांनी अनुभवली आहे आणि त्यातूनच त्यांचे हे अनुभवाचे बोल आले आहेत.

समाजात मिसळताना आपल्याला लोकांनी नावे ठेवू नये किंवा आपण कुठे कमी पडू नये म्हणून आपण त्यांच्यासारखे वागण्याचा प्रयत्न करतो. बरेचदा आपण जसे नसतो तसे दाखवण्याचा प्रयत्न करतो. मी विद्वान आहे, ज्ञानी आहे मला फार कळते अशा प्रकारचे मुखवटे धारण करतो. हा मुखवटा लोकांना दाखवण्यासाठी जरी असला तरी त्यातूनच अहंकार जन्म पावतो. अहंकार हे पापाचे मूळ आहे. रावणाला स्वतःच्या शक्तीचा, सामर्थ्याचा केवढा अहंकार झाला होता! जगामध्ये माझ्यासारखा कोणी नाही, मला कोणी हरवू शकत नाही हा त्याचा अहंकार त्याचे विनाशाला कारणीभूत ठरला. अहंकारातून अनेक नको असलेल्या गोष्टी घडतात. म्हणून समर्थ अहंतेला पापिणी असे म्हणतात.

म्हणून, हे मना, वाणीमध्ये भगवंताचे नाम ठेव आणि मनातून अहंकार दूर ठेव. यातच तुझे खरे कल्याण आहे.

स्वसंवाद :: 

  • माझ्या बोलण्यात भगवंताचे नाम कितपत आहे आणि व्यर्थ बडबड किती आहे?
  • भगवंताचे नाम घेण्याची सवय मी स्वतःला लावतो आहे का?
  • माझ्या मनात अहंकाराची छटा आहे का? ती ओळखून मी कमी करण्याचा प्रयत्न करतो आहे का?

क्रमशः श्लोक २३ आणि २४

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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