मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ नीलमणी ती मनमोहकशी… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? नीलमणी ती मनमोहकशी… ? रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

(वृत्त : सूर्यकांत (समुदितमदना)

(मात्रा :८+८+८+३=२७ यति ८ व १६ व्या मात्रेवर)

किती देखणी जांभुळलेली लतिका मज आवडे

नीलमणी ही मनमोहकशी भुरळ मनाला पडे ||ध्रु||

*

सदाहरित ही वेल बहरते खरखर पाने किती

अखंड पाने फुले बहरती कधी न होते रिती 

गगनभेदण्या भरभर भरभर उंच चालली गडे

नीलमणी ही मनमोहकशी भुरळ मनाला पडे ||||

*

हेमंत, शरद फुलव फुलवती वसंत झुलवी झुला

खार येउनी सरसर सरसर खाते साऱ्या फुला

मधमाशांना, चित्रपतंगा मधुघटची सापडे

नीलमणी ही मनमोहकशी भुरळ मनाला पडे ||||

*

खोड जणू हे पेड घातले वेणीचे साजरे

राणीचे पुष्पहार त्यावर लटकतात हासरे 

फांदीवरती लखलखणारे नीलख भरले खडे 

नीलमणी ही मनमोहकशी भुरळ मनाला पडे ||||

*

सुगंध त्यांचा मोहित करतो मन जाते ना तिथे

हरितांगावर नीलांबरसे पहा उतरले जिथे

समुदितमदना वृत्तामधले काव्य सुमंगल घडे 

नीलमणी ही मनमोहकशी भुरळ मनाला पडे ||||

© रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ – छकुला बालकृष्ण – ☆ सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे ☆

सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? – छकुला बालकृष्ण – ☆ सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे ☆

(वृत्त — पादाकुलक (८|८)

शांत झोपला कान्हा बाई 

डोक्याखाली++ हात घेतले

गोड गोजिऱ्या वदनावरती 

मुग्ध मनोहर हास्य दाटले ||

*

काळ्या कुरळ्या कुंतलातुनी 

मोरपीस हे साजिरे दिसे 

कान्हाच्या या बालरुपाचे 

प्रत्येकाला लागते पिसे ||

*

तलम रेशमी वसने लेई 

बाजूबंद अन् करी मनगटी 

शोभिवंत ते वदन साजिरे 

ललाटावरी केशरी वटी ||

*

गोकुळ सारे बने कृष्णमय 

वेड लावितो नटखट कान्हा 

बालकृष्ण जरि डोळ्यापुढती 

वाटे माझा छकुला तान्हा ||

*

कुंजवनीची सावळबाधा

मोहविते या अवघ्या जगता 

ओवाळुनिया कुरवंडी मी 

शरण जातसे त्या भगवंता ||

© सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५६ ☆ कुछ दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके “कुछ दोहे” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५६ ☆

☆ कुछ दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सावन रिमझिम लिख रहा, बूँदों का दीवान।

खेत सरोवर बन गए, डूबे सभी मचान।।

नदी उठाए घाघरा, पहुँची चढ़कर घाट।

बाढ़ बहा कर ले गई, घर की जूनी खाट।।

 *

आँगन को दिखला रही, छानी घायल पाँव ।

छप्पर के नीचे छिपा, बैठा बेबस गाँव।।

 *

जलधर वारधि मेघ घन, सब बादल के रूप ।

वारिश से भरते सभी, नदिया सरवर कूप।।

 *

बादल बैठा मेड़ पर, देह उघारे खेत।

बूँद बूँद की आस में, नदी हो गई रेत ।।

 *

विरही मन की पीर को, हरो मेघ बन दूत।

रातें जोगन हो गईं, दिन हो गए भभूत ।।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – श्री गणेश ☆ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ☆

श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार।  अभिरुचि साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्री गणेश।)

☆ लघुकथा ☆ श्री गणेश ✍ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ 

शाम ढलते ही गणेश पंडाल गेंदे के फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सज गया था। ढोल-मंजीरों की गूँज के साथ संध्या आरती हुई। सभी ने श्रद्धा से आरती की और प्रसाद लेकर अपने घरों की ओर मुड़े ही थे कि बाहर गाड़ियों का शोर गूँजा।

“अरे हटो, नेता जी आ रहे हैं!”

कार्यकर्ताओं के लावलश्कर के साथ स्थानीय नेता जी समर्थकों समेत पंडाल में दाखिल हुए। मुख्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत गणेश प्रतिमा के सामने ला खड़ा किया।

एक कार्यकर्ता ने पुजारी के हाथ से थाली लेकर नेता जी को थमा दी और जोर से बोला, “मुख्य अतिथि आ गए हैं, आरती दोबारा होगी!”

पुजारी ने असमंजस में भगवान की मूर्ति और फिर नेता जी की ओर देखा। इसके बाद भारी मन से घंटी उठाई और बोले, “ॐ जय गणेश देवा…”

नेता जी ने कैमरों की तरफ देखकर आरती शुरू की। जो लोग घर जा चुके थे, वे भी रुककर इस तमाशे को देखने लगे। बप्पा के दरबार में भक्ति पीछे छूट गई थी और प्रोटोकॉल का बोलबाला हो चुका था।

© श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ‘✍️

निवास – जबलपुर मध्यप्रदेश मो – 9329931303

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अशेष ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अशेष ? ?

पूर्ण से

पूर्ण जाने के बाद

पूर्ण रहता है शेष,

पूर्ण होता है अशेष..!

इच्छाओं में से

सारी इच्छाएँ

पूरी होने के बाद

इच्छाएँ रहती हैं शेष,

इच्छाएँ होती हैं अशेष…!

?

© संजय भारद्वाज   

(रात्रि 9:21 बजे, 2022)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 103 – Tea Leaves and the Government File… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire Tea Leaves and the Government File 

☆ Witful Warmth# 103 ☆

☆ Satire ☆ Tea Leaves and the Government File… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

On Mr. Gupta’s office desk, a file had been sleeping for the past three months like someone pulling a pillow over their head on a Sunday morning after the alarm goes off. The file was titled ‘Public Interest Litigation 402’. Mr. Gupta was extremely fond of tea. For him, tea was not just a beverage, but the most sacred tool for procrastination. Whenever a file came before him, he would lift his clay cup of tea (kulhad), take a deep breath, and say, “The matter is serious; it needs a little more brewing.”

Everyone in the office thought Mr. Gupta was a very honest and diligent officer who examined the finest details of every document. But the reality was that Mr. Gupta had never found the key to unlock that file—the main page hidden inside it was missing. If this secret ever got out, it would spoil the comfortable routine of his job. So, every day, he would write a new note on the file and slide it into the deepest corner of the cabinet.

One day, out of nowhere, came a summons from the Big Boss. The Boss’s anger was like boiled tea made without ginger—it ruined your mood the moment it went down your throat. The Boss slammed his fist on the table and said, “Gupta, the decision on Public Interest Litigation 402 must be on my desk by 4:00 PM today. The Minister himself is keeping an eye on this.”

The ground slipped out from under Mr. Gupta’s feet. Drops of sweat began to glisten on his forehead like dew on leaves after rain. The file was opened, but the missing page was still missing. It was already three in the afternoon. The hands of the office clock were racing against Mr. Gupta’s heartbeat. He immediately called out to his peon, Ramdeen, “Ramdeen, make a strong cup of tea. Today it’s a matter of life and death!”

Ramdeen brought a fresh kulhad of tea. Mr. Gupta picked up the cup with trembling hands. As soon as he took the first sip, he noticed a small piece of paper stuck to the bottom of the clay cup. It was the very missing page—months ago, Ramdeen had pulled it out from the file to use as a coaster for the tea cup on the table.

Mr. Gupta breathed a sigh of relief, completed the file, and placed it on the Boss’s desk. The Boss looked at the file, smiled, and said, “I hand it to you, Gupta Ji! No truth can hide from your discerning eye.”

The entire office broke into applause. Mr. Gupta smiled, took the final sip of his tea, and thought to himself that in this country, files don’t move forward through hard work, but through tea leaves found at just the right time.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा

कार में धीमी आवाज़ में गीत बज रहा था – “घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…”

“मम्मी, आप रो रही हो?” बेटी ने पूछा।

उसने जल्दी से शीशे की तरफ़ देखा – “नहीं बेटा, आँख में कुछ चला गया।”

“आप हमेशा यही कहती हो।”

वह चुप हो गई।

गीत की पंक्तियाँ जैसे वर्षों पुराना हिसाब खोल रही थीं।

कभी पति की पसंद, कभी परिवार की उम्मीदें, कभी बच्चों की जरूरतें – वह सबकी ताल पर चलती रही।

कभी टूट गई, कभी तोड़ी गई। कभी बिखरी, फिर रात के अँधेरे में खुद ही अपने टुकड़े समेटती रही।

किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उन टुकड़ों को जोड़ते-जोड़ते उसके हाथ कितनी बार लहूलुहान हुए थे। शायद इसलिए कि खून दिखाई नहीं देता था।

बेटी ने धीरे से पूछा – “मम्मी, आपको क्या पसंद है?”

वह जवाब नहीं दे पाई।

इतने वर्षों में शायद वह अपनी पसंद ही भूल चुकी थी।

गीत खत्म हो गया।

लेकिन कार में खामोशी बनी रही।

बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने शीशे में खुद को देखा, फिर बेटी को।

होंठ कुछ कहने के लिए खुले… मगर आवाज़ नहीं निकली।

रेडियो पर अगला गाना शुरू हो चुका था।

और वह फिर चुपचाप सुनने लगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६३ ☆ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जिधर भी जाती है “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६३ ☆

✍ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जिधर भी जाती है फ़्ह्मो-नज़र तबाही है

ये कैसी आग की बरसात या इलाही है

सभी के सामने करते हो तुम ज़लील मुझे

ज़फ़ा की बात नहीं ये तो कम- निगाही है

 *

वतन के वास्ते सरहद पै जो खड़ा मुस्तैद

वो देशभक्त है इस देश का सिपाही है

 *

यहाँ पै शाहो-गदा में नहीं है कोई फ़र्क़

ये मयकदा यहाँ इक जाम इक सुराही है

 *

करूँ मैं जुर्म से कैसे बरी भला तुझको

फ़्ररेबकारों की इस जा भी बादशाही है

 *

हक़ीक़तों पै अमल कर रहा है कौन यहाँ

फ़ुज़ूल होठों पै लोगों के वाह- वाही है

 *

न बात दीन-धरम की “अरुण” अभी कर तू

ख़िलाफ़ तेरे बज़िद दिह्र की गवाही है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६७ – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े।)

☆ हेमंत साहित्य # ६७ ☆

✍ बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे  

दिल ने कहा था

जिस दिन उमड़ेंगे बादल,

घिरेंगे घनघोर,

बरसेंगे झमाझम,

उसी दिन तलेंगे पकौड़े

और होगी चाय के साथ

कुछ जुगत, कुछ चुहल

और नई पुरानी यादों की जुगाली

 

बेसन, हरी मिर्च, धनिया, प्याज़, आलू

सभी को कर दिया ताकीद

कि

हो जाए मुस्तैद,

एक आवाज पर कटने

खौलते तेल में गिरने के लिए

 

बादल आए भी कई बार,

काले-काले,

रोबदार,

सूरज की रोशनी को कर गए गटक,

और माहौल बनाया ऐसा

कि बस अब बरसे

कि तब बरसे।

 

मैंने भी खिड़की से पूछा—

भाई साहब, शुरू करें?

बादल गरजे

हाँ… हाँ… अभी आते हैं।

और फिर…

हो गए लापता यूं

कि ढूंढो हमे, गर खाना है पकौडे

 

बारिश भी नेताओं से कम नही,

घोषणा जोरदार,

अमल नदारद!

पकौड़ों का सामान

मुँह ताकता रहा,

तेल बेचारा ठंडा पड़ा रहा,

और मेरा मन

बारिश की राह देखता रहा।

 

लेकिन आज

दिल और दिमाग—

दोनों की छुट्टी कर दी मैंने।

 

सोचा,

बारिश आए तो भी पकौड़े,

न आए तो भी पकौड़े!

आखिर पकौड़ों का

बारिश से क्या लेना-देना?

और तभी याद आई

हुकूमत में बैठे

उस नेता की वह

अमर अर्थव्यवस्था,

जिसमें नौकरी न मिले,

काम न मिले,

तो नौजवानों से कहा गया था

पकौड़े तलो!

 

तेल चढ़ाया,

बेसन घोला,

प्याज़ डाला,

आलू मिलाए,

हरी मिर्च ने थोड़ी बहादुरी दिखाई

और मैंने…

 

तल डाले पकौड़े.

 

आज पहली बार

उस महान दर्शन की

गहराई समझ में आई।

बारिश नहीं आई

कोई बात नहीं,

रोजगार, हाथ न आए

कोई बात नही

पकौड़े तलो और

कर लो जुगाड

लल्ला – लल्ली के दूध की

मेहरारू की बिंदी, टिक्की लाली की

 

आज तल लिये हैं पकौड़े मैंने

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆ कविता – प्रेम गीत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण  कविता – “प्रेम गीत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆

✍ कविता ☆ प्रेम गीत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

गाते जाओ, गाते जाओ, प्रेम के गीत गाते जाओ,

जो भी मिले दीन-दुखियारा, गले उसे लगाते जाओ।

*

नफरत की हर एक चिंगारी, मिलकर आज बुझानी है,

प्रेम-सुधा की गंग बहाकर, दुनिया नई सजानी है।

*

जो बाँटें मानव-मानव को, वे बंधन टूट जाने दो,

दिल से दिल का सेतु बनाकर, प्रेम-ध्वजा लहराने दो।

*

भूखे के घर रोटी पहुँचे, प्यासे को जल भी मिल जाए,

रोती हुई हर माँ की आँखों में,  नया तराना फिर से आए।

*

जिसके तन पर वस्त्र न हों, अपना आँचल बिछा देना

जिसके मन में दर्द भरा हो, अपना ही दिल  थमा देना।

*

मंदिर मस्जिद बाद में जाना, पहले मन को मंदिर कर,

ईश्वर वहीं विराजेगा जहाँ, प्रेम बहे निष्कलुष निर्झर।

*

पत्थर में भगवान खोजने वालों, इतना याद रख लेना,

रोते हुए इंसान के आँसू, पहले हँसकर पोंछ सुखा देना।

*

तलवारों से जग जीता है, यह इतिहास तो पुराना है,

प्रेम से जो दिल जीत सके, वही सच्चा वीर सयाना है।

*

क्रोध अगर अंगार बने तो, प्रेम उसे शीतल कर देगा

करुणा का एक दीप अकेला, युग का तम भी हर लेगा।

*

आओ ऐसा युग रच डालें, जहाँ रहे  न कोई पराया हो,

हर आँगन में प्रेम खिले, और हर चेहरा मुस्काया हो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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