हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१५ ☆ “MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है Anand Gandhi और Zain Memon द्वारा लिखित  MAYA: Seed Takes Rootपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१५ ☆

“MAYA: Seed Takes Root” – लेखक : Anand Gandhi और Zain Memon ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

इन  दिनों चर्चित किताब – MAYA: Seed Takes Root 

लेखक – Anand Gandhi और Zain Memon

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ यह 2026 में प्रकाशित होने वाला एक महत्वाकांक्षी साइंस फिक्शन, फैंटेसी और दर्शन का मिश्रण है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किताब की मूल परिकल्पना

कहानी का संसार है Neh नाम का एक ग्रह। वहाँ Maya कोई सामान्य पेड़ या जंगल नहीं, बल्कि एक विशाल जीवित नेटवर्क है। पूरे ग्रह के लोग इन पेड़ों से जुड़ते हैं और उनके माध्यम से काम, मनोरंजन, शिक्षा, स्मृतियों और साझा स्वप्नों की दुनिया में प्रवेश करते हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि Maya हर व्यक्ति के बारे में जानती है। उसकी स्मृतियाँ, विचार और व्यवहार इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। इस विशाल डेटा के आधार पर वहाँ के शासक, जिन्हें Divyas कहा गया है, भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं और लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

अर्थात यह केवल भविष्य की काल्पनिक दुनिया नहीं है। इसके भीतर आज की दुनिया का इंटरनेट, सोशल मीडिया, बिग डेटा, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिखाई देता है।

कहानी का केंद्रीय पात्र Yachay, 19 वर्षीय युवक है। वह अपने बीमार दादा Daddu के साथ अलगाव में पला है और उसने कभी Maya नेटवर्क से जुड़कर जीवन नहीं बिताया।

इसका एक अप्रत्याशित परिणाम है।

Maya उसे देख नहीं सकती।

जिस समाज में हर व्यक्ति नेटवर्क से जुड़ा है, वहाँ Yachay का Maya से बाहर होना उसे लगभग अदृश्य बना देता है। उसके दादा चाहते हैं कि वह Divya Trials में भाग ले। यह ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें अरबों लोग भाग लेंगे और विजेता को लगभग देवत्व जैसी शक्ति और अमरता प्राप्त हो सकती है।

यहीं से कहानी एक बड़े प्रश्न में बदल जाती है, अगर किसी ऐसी व्यवस्था में जहाँ हर व्यक्ति को पूरी तरह देखा, समझा और भविष्यवाणी किया जा सकता हो, कोई व्यक्ति उस व्यवस्था की निगाह से बाहर हो जाए, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र हो सकता है?

विषय बहुत समकालीन है

मुझे लगता है कि इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी कथा से भी अधिक इसका वैचारिक आधार है।

लेखक स्वयं इसे systems fiction कहते हैं, अर्थात ऐसी कथा जिसमें केवल व्यक्ति या घटनाएँ नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था कहानी का पात्र बन जाती है।

पुस्तक कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।

हमारी सूचनाओं का मालिक कौन है?

हमारे डेटा से लाभ कौन कमाता है?

अगर कोई प्रणाली हमारे व्यवहार का अनुमान हमसे पहले लगा सके तो हमारी स्वतंत्र इच्छा कितनी स्वतंत्र रह जाएगी?

क्या भविष्य को जान लेना भविष्य को नियंत्रित करने के बराबर है?

आज जब सोशल मीडिया एल्गोरिदम यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि हमें क्या पसंद आएगा, कौन सी खबर हम पढ़ेंगे और कौन सा विज्ञापन हमें प्रभावित कर सकता है, तब Maya का विचार अचानक बहुत काल्पनिक नहीं लगता।

Anand Gandhi भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण प्रयोगधर्मी फिल्मकारों में हैं। उनकी फिल्म Ship of Theseus को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था और Tumbbad ने भारतीय मिथक, हॉरर और आधुनिक सिनेमा के मेल का एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया।

उनकी रुचि केवल फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं रही है। वे दर्शन, विज्ञान, तकनीक, गेम डिजाइन और वैकल्पिक कथा संरचनाओं में भी काम करते रहे हैं। यही पृष्ठभूमि इस उपन्यास में दिखाई देती है।

दूसरे लेखक Zain Memon गेम डिजाइनर और ट्रांसमीडिया क्रिएटर हैं। उनके प्रसिद्ध राजनीतिक रणनीति बोर्ड गेम SHASN और SHASN: AZADI ने राजनीति, खेल और सामाजिक शिक्षा को जोड़ने का प्रयोग किया है।

 यह पुस्तक दो लेखकों द्वारा लिखा गया सामान्य साइंस फिक्शन उपन्यास मात्र नहीं है। इसके पीछे फिल्म, गेम, मिथक, दर्शन और तकनीक का मिला-जुला रचनात्मक अनुभव है।

पुस्तक पश्चिमी साइंस फिक्शन की नकल करने के बजाय South Asian mythology को आधुनिक विज्ञान और तकनीकी कल्पना के साथ जोड़ती है। नामों में भी इसका संकेत मिलता है, जैसे Maya, Divya, Yachay, Kshar, Tarkash आदि।

इस तरह इसकी कल्पना कु छ ऐसी बनती है जिसमेंप्राचीन मिथकीय संसार, आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दर्शन और राजनीतिक सत्ता एक ही कथा संसार में आ जाते हैं।

यही शायद इस पुस्तक को भारतीय लेखकों द्वारा लिखे जा रहे समकालीन speculative fiction के संदर्भ में खास बनाता है।

शीर्षक: MAYA: Seed Takes Root

लेखक: Anand Gandhi और Zain Memon

श्रृंखला: MAYA, Book 1

भाषा: अंग्रेजी

विधा: Science Fiction, Fantasy, Dystopian Fiction, Epic Fantasy

 लगभग 416 पृष्ठ

प्रकाशक: Authors Equity

वितरण: Simon & Schuster

ISBN: 9798893311891

Foreword: Neuroscientist Anil Seth

Audiobook narrator: Hugo Weaving

पुस्तक का ऑडियो संस्करण 25 अगस्त 2026 से उपलब्ध होने की जानकारी प्रकाशक ने दी है, जबकि ब्रिटेन में हार्डकवर संस्करण की सूचीबद्ध रिलीज़ 8 अक्टूबर 2026 है।

इस किताब की चर्चा का एक बड़ा कारण इसका crowdfunding भी है। प्रकाशक इसे crowdfunding इतिहास का highest-funded debut novel बता रहा है।

यह अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि पाठक अब केवल पारंपरिक प्रकाशकों के माध्यम से आने वाली कहानियों का इंतजार नहीं कर रहे। किसी बड़े साहित्यिक प्रोजेक्ट के निर्माण में पाठक स्वयं शुरुआती निवेशक और समुदाय का हिस्सा बन रहे हैं।

 MAYA में भारतीय मिथकीय संकेतों को भविष्य की तकनीकी सभ्यता के प्रश्नों के साथ जोड़ा गया है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८६ ⇒ दोषारोपण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोषारोपण।)

?अभी अभी # १०८६ ⇒ आलेख – दोषारोपण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दोष एक ऐसा पौधा है, जिसे कभी अपने आँगन में लगाया नहीं जाता, इसके लिए किसी दूसरे के घर की मिट्टी तलाशी जाती है। वहाँ यह बहुत फलता-फूलता है। कौन कब किसी पड़ोसी के घर पौधारोपण करता है। हाँ, अगर दोष का पौधा हो, तो खाद मिट्टी की व्यवस्था भी की जाती है।

हम हरे भरे उपवन को उजाड़ कंक्रीट का जंगल बना देते हैं, खेती की जगह औद्योगिकरण को बढ़ावा देते हैं, मज़दूर की जगह मशीन से काम लेने लगते हैं, तो पर्यावरण दूषित होता है। अधिक सड़कें, मॉल और फ्लाईओवर बनाने पड़ते हैं। जब यह सब हो जाता है, तब हमें पौधारोपण का ख्याल आता है और हम भावुक होकर पितृ पर्वत की ओर दौड़ पड़ते हैं।।

दोष किसमें नहीं ! लेकिन जिस तरह आईना सिर्फ चेहरे को देखता है, गुण दोषों को नहीं, हमें भी स्वयं में दोष नज़र नहीं आते। कबीर इंसान नहीं थे ! उन्हें दूसरों में नहीं, स्वयं में दोष नज़र आते थे। वे कहते हैं;

बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय

लो जी ! कोई खुद पर भी दोषारोपण करता है ? दोषारोपण और करारोपण हमेशा दूसरों पर ही किया जाता है। सभी दोषमुक्त और करमुक्त होने की फिराक में रहते हैं।।

भारत रत्न सचिन जैसे क्रिकेट-रत्न पर लोग आरोप लगाते हैं कि झुमाकर द्वारा भेंट की गई फरारी वे करमुक्त करवाकर ले आए। लो जी ! ये भी कोई बात हुई। फर्राटा कार चलाने वाले झुमाकर ने फर्राटेदार रन बनाने वाले सचिन को सम्मान-स्वरूप जो फर्राटा-फरारी कार भेंट की, उस पर भी करारोपण ? घोर कलयुग ! सचिन कार कमाकर नहीं लाए, भेंट में लाए। केबीसी को छोड़कर बहुत से राष्ट्रीय पुरस्कार करमुक्त होते हैं। सम्मान और करारोपण कभी साथ साथ नहीं चलते। मनोजकुमार की अधिकांश देशभक्ति की फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त रहती थी। एक तो फ़िल्म में मनोरंजन नहीं, ऊपर से मनोरंजन कर। और जो इसका विरोध करे, उस पर दोषारोपण।

कुछ तो लोग कहेंगे ! लोगों का काम है कहना। आप तो करते रहिए, आपको जो करना। हाथी जब वन-वे में बाज़ार में चलता है, तब उसका चालान नहीं कटता। कोई ट्रैफिक का सिपाही अगर उसको देख सीटी बजाता है, तो लोग हँसते हैं।

हाथी को कानून सिखा रहा है। ज़रा उसके पास तो जाकर देख।।

हमारे देश में पिछले 70 वर्षों से विपक्ष, सत्ता-पक्ष पर दोषारोपण कर रहा था। दोष का वृक्ष इतना पनपा, कि विपक्ष ही सत्ता-पक्ष हो गया। आज सत्ता-पक्ष विपक्ष पर दोषारोपण कर रहा है। एक दूसरे पर दोषारोपण को हम आगे चलकर राष्ट्रीय दोषारोपण दिवस के रूप में मना सकते हैं।

अगर एक नेता और कुशल प्रशासक, विपक्ष के विरोध और दोषारोपण की ओर ध्यान देगा तो उसे कभी अनुच्छेद 370 और 35-ए नज़र नहीं आएँगे। अगर राजनीति में द्रोणाचार्य जैसा गुरु होगा तो अर्जुन को सिर्फ़ मछली की आँख ही नज़र आएगी। कश्मीर अब स्वर्ग हुआ है, Let opposition go to hell. द्रोणाचार्य उवाच।।

दोस्तों के साथ पौधारोपण हो, लेकिन अगर कभी दुश्मन के घर जाएँ, तो दोषारोपण अवश्य करके आएँ। इस मामले में आनंद बख्शी साहब कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ थे।

मेरे दुश्मन, तू मेरी दोस्ती को तरसे !

तू फूल बने पतझड़ का,

तुझ पर बहार न आए कभी।

लगता था, मानो पाकिस्तान में दोषारोपण करके आए हों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३३ – वीआईपी पास का चक्कर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆  चुभते तीर # १३३ – व्यंग्य  – वीआईपी पास का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शहर में गज़ल गायक उस्ताद मुश्ताक अली का प्रोग्राम था। यह कोई आम महफ़िल नहीं थी; यहाँ प्रवेश का मतलब था कि आप शहर के संभ्रांत और ‘कलाप्रेमी’ वर्ग में गिने जाते हैं। गुप्ता जी के पास प्रोग्राम का कोई टिकट नहीं था, लेकिन उनकी मूंछों का सवाल था। उनके पड़ोसी शर्मा जी सुबह से ही अपने ‘वीआईपी गोल्ड पास’ का रौब झाड़ रहे थे।

गुप्ता जी ने ठान लिया कि वे न सिर्फ़ प्रोग्राम में जाएंगे, बल्कि शर्मा जी से आगे वाली रो (Row) में बैठकर दिखाएंगे। उन्होंने अपने पुराने मित्र और नगर निगम में क्लर्क, रामदीन को फोन घुमाया। रामदीन ने बहुत जुगाड़ बिठाकर गुप्ता जी को एक काले रंग का लिफ़ाफ़ा थमा दिया और कहा, “गुप्ता जी, यह पास सीधा आयोजकों के मुख्य दफ़्तर से आया है। इसे दिखाकर सीधे पहली पंक्ति में बैठना।”

प्रोग्राम की शाम गुप्ता जी कड़क कुरता-पाजामा पहनकर ऑडिटोरियम पहुंचे। दरवाज़े पर सुरक्षाकर्मियों की लंबी कतार थी। शर्मा जी भी अपनी पत्नी के साथ लाइन में खड़े थे। गुप्ता जी ने अपनी मूंछों पर ताव दिया, शर्मा जी को एक विजयी मुस्कान दी और सीधे ‘वीआईपी एंट्री’ गेट की तरफ बढ़ गए।

गेट पर तैनात बाउंसरों ने गुप्ता जी को रोका, “सर, अपना पास दिखाइए।”

गुप्ता जी ने बहुत ही शान से अपनी जेब से वह काला लिफ़ाफ़ा निकाला और बाउंसर के हाथ में थमा दिया। बाउंसर ने लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर रखा कार्ड देखा और उसकी आंखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसने तुरंत अपने साथी को इशारा किया। दूसरे बाउंसर ने आकर कार्ड देखा और मुस्कुराते हुए गुप्ता जी को सर झुकाकर प्रणाम किया।

“आइए सर, आपका ही इंतज़ार था,” बाउंसर ने बहुत ही इज़्ज़त के साथ कहा और उन्हें स्टेज के ठीक बगल वाले विशेष कमरे में ले गया।

गुप्ता जी का सीना चौड़ा हो गया। वे मन ही मन सोच रहे थे कि रामदीन ने ज़रूर किसी बड़े अफ़सर का पास दिलवा दिया है। दूर से खड़े शर्मा जी यह सब देखकर हक्के-बक्के रह गए थे।

दस मिनट बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पर्दा उठा, उस्ताद मुश्ताक अली मंच पर पधारे। पूरे हॉल में तालियां गूंज उठीं। तभी आयोजक माइक पर आए और बोले, “सज्जनों, उस्ताद जी की महफ़िल शुरू करने से पहले, हम अपने मुख्य प्रायोजक और इस शाम के विशेष मेहमान का स्वागत करना चाहेंगे, जिन्होंने कलाकारों के जलपान की पूरी व्यवस्था की है—श्रीमान गुप्ता जी! कृपया मंच पर आएं और उस्ताद जी को हार पहनाएं!”

गुप्ता जी के होश उड़ गए। रामदीन ने जो पास दिया था, वह दर्शकों का नहीं, बल्कि ‘कैटरिंग स्पॉन्सर’ (खान-पान के मुख्य ठेकेदार) का वीआईपी पास था, जिसका सारा बिल गुप्ता जी के नाम फटने वाला था!

गुप्ता जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। वे भारी कदमों से मंच पर गए, उस्ताद जी को हार पहनाया और माइक हाथ में लेकर बोले, “कला की सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं है। आज की शाम चाय और समोसे मेरी तरफ से आप सभी के लिए बिल्कुल मुफ़्त हैं!”

पूरा हॉल ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगा। शर्मा जी भी खड़े होकर ताली बजा रहे थे। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर मंच से हाथ हिलाया, यह सोचते हुए कि बैंक बैलेंस भले ही साफ़ हो गया हो, लेकिन मोहल्ले में इज़्ज़त का झंडा गाड़ दिया गया है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७६ – कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७६ ☆

🙏🪷कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – बाल कन्हैया छबि अति प्यारी 🪷🙏

🪷

नयन खोल देखें नट नागर, घर-घर सुंदर साज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

कोई साजे मोतियन माला, चौंक पुराये द्वार।

स्वर्ण कलश ले दीया बाती, पुष्प माल ले हार।।

सांवरिया की सूरत प्यारी, चरण पखारे काज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

छेड़े गोपी रास रचायें, मथुरा नगरी धाम।

गिरधर माधव कान्हा छलिया, माखन चोरी काम।।

वेणु अधर बजाये गोविंद, मधुर- मधुर आवाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

यमुना तट पर खेलें कान्हा, ग्वालन करती प्रीत।

मनमोहन की नटखट बातें, गाती सुंदर गीत।।

मटकी फोड़े माखन खायें, पिता नंद का राज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

धराधाम पर भगवन आये, लेकर प्रेम अपार।

बने द्वारिकाधीश यहीं पर, गीता मुख है सार।।

युगों-युगों से कान्हा आयें, सुंदर बना रिवाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

*

हे गिरधारी कृष्ण मुरारी, नंद यशोदा लाल।

केशव माधव मोहन कान्हा, बनें कंस के काल।।

शीलू कहती हे नारायण, रखना मेरी लाज।

बाल कन्हैया छबि अति प्यारी, जन्मोत्सव है आज।।

🪷

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९१ – देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९१ ☆ देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत सप्ताह यूनाइटेड नेशन्स जिसको हम यू एन के नाम से भी जानते हैं, ने एक प्रस्ताव के जरिए विश्व का नया मानचित्र जारी किया है। पूर्व में बनाया गया मानचित्र यूरोप के इटली देश द्वारा सन 1600 से पूर्व काल का है।

अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक क्षेत्रफल से कम अनुपात में दिखाया गया है, ऐसी शिकायत के कारण, नए मानचित्र की आवश्यकता आन पड़ी है।

यू एन जैसी संस्था की बात आज के समय कोई मानता ही नहीं है। उसका हाल घर के सबसे बड़े बुजर्ग के समान है, जिसने परिवार के लिए सब कुछ निछावर कर साम्राज्य स्थापित कर, बच्चों के नाम कर दिया था, अब घर के उसके अपने बच्चे ही उसको पूछते ही नहीं है। वो कुछ भी बोले, उसकी बात अनसुनी ही रहती है।

नए मानचित्र को लेकर हमारे एक मित्र जिनका स्टेशनरी सामान का व्यापार है, से लम्बी वार्तालाप हुई, उनको ये शंका हो रही है, इस नए मानचित्र के चक्कर में उनके एक खाली प्लॉट की जमीन कहीं कम ना हो जाय। हमने उनसे कहा ऐसा कैसे हो सकता है, उनका ये मानना है, कि शहर के नए मास्टर प्लान में उनके प्लॉट का साइज एक चौथाई कम हो गया था, अब तो पूरी दुनिया का ही नक्शा बदल रहा है, सरकार इस नाम से उनकी जमीन का कुछ भाग, डकार जाएगी।

हमने उनके दर्द को कम करते हुए कहा, अब सभी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों आदि में दुनिया का नए मानचित्र लगाया जाएगा, बच्चे नए “ग्लोब”, गत्ते के स्टेंसिल आदि भी खरीदेंगे। आपकी तो दीवाली हो जाएगी।

इंतजार करें, हमें कब विस्तृत नया नक्शा देखने को मिलेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३९ ☆ झाडतो पायरी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३९ ?

☆ झाडतो पायरी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

नाही सोडून वागलो, माझी जाणतो पायरी

आधी खायचो हापूस, आता मागतो पायरी

*

पायरीच्या दगडामधे, होय भक्ती साठलेली

अनवाणी पायाने मी, पुढची चालतो पायरी

*

लाज वाटावी कशाला, मला देवाच्या दारात

जातो देवळात तेव्हा, तेथे झाडतो पायरी

*

छोट्या जागेत बंगला, झाल्या उंच या पायऱ्या,

मोठ्या कष्टाने तरिही, मी ही लांघतो पायरी

*

माणसाची जात आहे, राग येतो केव्हा तरी

तेव्हा काही काळ तरी, मीही सोडतो पायरी

*

आहे सत्तरी गाठली, थके पायाचा पाळणा

वाटे काळजी स्वतःची, तेव्हा टाळतो पायरी

*

पुढे जायची बाळाला, आता आगलेली ओढ

बाळराजाला उत्साह, तोही रांगतो पायरी

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हायकू… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ हायकू… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

भार मनाचा

धरा विलासा

ओला खुलासा.

*

कृष्णमेघ नभी

इंद्रधनू छबी

पापण्यांवर.

*

शोधताना वाट

दृष्टीपथा काठ

अस्थीप्रवाह.

*

रंगछटा हृदयी

स्पंदनांचे सवयी

समयसुची.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ श्रीकृष्णावरील भारुड ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? विविधा ?

☆ श्रीकृष्णावरील भारुड ☆ शालिनी जोशी

संत एकनाथांचे श्रीकृष्णावरील भारुड-पाखरू–

कृष्णा एक पाखरू आहे, ते मुखाविण चारा खाय रे l

डोळे नाही तरी ते पाहे, वाचेविण स्वये खाये रे l

सख्या त्यास नाव कान्होबा, कृष्ण म्हणती सर्व रे l

त्याचे वास्तव्य कोठे आहे, पर नाही परी ते उडे रे l

तिहेलोकी हिंडते, त्रिभुन त्याला थोडे रे l

त्याचे नखात आकाश बुडे, तो संमुख चहुंकडे रे l

हो त्याला मायबाप दोन्ही नाही रे l

एकवीण पाहती जनार्दनाचे पायी रे l

हे रूपक एक कोडे आहे. पेंद्याने श्रीकृष्णाला टाकलेला कुट प्रश्न आहे. याचे उत्तर श्रीकृष्णरूपी सगुण निर्गुण परमात्मा आहे. देवभक्त यातील हा विनोदी संवाद. श्रीकृष्णाच्या स्वरूपाचा यथार्थ भाव ‘पाखरू’ मधून व्यक्त होतो.

पेंद्या श्रीकृष्णाला एक कूट प्रश्न टाकतो. कृष्णा एक पाखरू आहे. ते तोंड नसताना चारा खाते. डोळे नसताना पाहते. वाचा नसताना खाते. श्रीकृष्ण समजून उमजून विचारतात, त्या पाखराचे नाव तरी काय?

पेंद्या म्हणतो त्याचे नाव कान्होबा. पण सर्व त्याला कृष्ण म्हणतात. पंख नसताना ते पाखरू उडते. त्रिभुवनही त्याला कमी पडते. आकाशही त्याच्यापुढे थोकडे. ते सर्वत्र असलेले. पण मायबाप नसलेले.

देहरूपाने अवतार कार्यात लीला करणारा श्रीकृष्ण, तसा नसून सर्वगत अद्वैत परमात्मा आहे. येथे पाखराच्या रूपकातून एकनाथ सांगतात, तो चैतन्य रूप त्रिभुवनाला व्यापून आहे.

त्याला रूपच नसल्याने मुख नाही .पण विश्वातील जीवांच्या मुखाने अन्न खातो म्हणून तो विश्वातोमुख आहे. मूळ ब्रह्म स्वरूपाला डोळे नसले तरी चैतन्यामुळे जगाचे डोळे त्याचेच. इतकेच नव्हे तर विश्वाच्या नेत्रांची दृष्टी तो आहे. डोळ्यांचा डोळा आहे. म्हणून तो विश्वातश्चक्षु आहे. चैतन्य रूपाने सर्वत्र आहे. स्थावर जंगमात भरून आहे. सर्वगत आहे. म्हणजेच पंख नसून सर्वत्र उडतो. त्याच्या आधारावर तीनंही लोकांची रचना असून त्याच्या पलीकडेही तोच इतका व्यापून आहे, जणू काही त्याच्या नखात आकाश गडप व्हावे. तिकडे पहावे तिकडे त्याचेच अस्तित्व. रिती जागा नाही. स्वयंभू असल्याने उत्पन्न करणारा कोणी नाही. म्हणून आई-बाप नाही. उलट त्याच्या आधारावरती विश्वाची निर्मिती. म्हणून तोच जगाचा आईबाप. असे हे परमेश्वराच्या निर्गुण रूपाचे वर्णन पाखराच्या रूपकाने एकनाथांनी सुरेख केले आहे. कूट प्रश्न आहे तोही प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण- सगुण रूपाला विचारलेला. यातून सगुण कृष्णाचे खरे रूप एकनाथांनी दाखवून दिले. रूपाशी नम्र झाले.

🙏  श्रीकृष्णार्पणमस्तु 🙏

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मन उधाण वार्‍याचे… ☆ डॉ. शैलजा करोडे ☆

डॉ. शैलजा करोडे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ मन उधाण वार्‍याचे… ☆ डॉ. शैलजा करोडे

आज दिवसभर ढगांमुळे अंधारलेलेचं होतं. गार वारे वाहात होते. धुळीचे लोट उठत होते. कोणत्याही क्षणी पाऊस कोसळणार होता. आईनं चूल पेटवून संध्याकाळच्या स्वयंपाकाला सुरुवात केली होती. गरम गरम ज्वारीच्या भाकरीचा सुगंध सुटला होता. पातेल्यात जिरे, मोहरी, कढीपत्ता, हिरवी मिरची, आलं, लसूणाची फोडणी तडतडली व तिने त्यात पाणी वगारलं तसा चर्र चर्र आवाज झाला. खमंग दरवळला तसं माझ्या तोंडाला पाणी सुटलं. ” माय, काय बनवते. ” ” पिठलं बनवतेय. मग गरम गरम पिठलं भाकरी खाऊन घेशील. ” इतक्यात पावसाच्या सरी कोसळू लागल्या. ” अरे, प्रकाश सपर्‍यात पाणी जाऊ नये म्हणून अंगणातला ओंडका आडवा लावून देशील. कपिलेला चारा दिलास ना

रे. ” होय माय दिला. ” ” आणिक एक कर बेटा, कोंबड्या खुराडात बंद कर. पाण्याची वडसाड लागू नये म्हणून ओट्यावर बारदानाचा पडदा ओढून घेशील. “
रात्री पावसानं बराच जोर धरला. तसा बाप काळजीत पडला. आता भरात हंगाम होता. जोंधळ्यात टपोरे दाणे भरले होते. जोडीला हरभरा पेरला होता. दोन्ही पिके अगदी निकोप व जोमानं वाढली होती. हा पाऊस थांबला नाहीतर ? मोठं नुकसान होणार होतं. हातातोंडाशी आलेला घास हिरावला जाणार होता.
बाप विमनस्कपणे पावसाकडे पाहात होता व हा पाऊस त्याच्या डोळ्यातून गालावर झिरपू लागला. ” शेवंता, मी शेताकडे जाऊन येतो. ” ” अहो, एवढ्या पावसात कसं जाता येईल. ? जाऊनही पिकांचं रक्षण कसं कराल ? ” शेवंता बोलतच होती कि पावसानं भिजल्यानं व पाण्याच्या लोंढ्यानं सपर्‍याची एक भिंत कोसळली. गाई, बैलं हंबरु लागली. बापानं ( महादेव ) त्यांच्या पाठीवर थोपटून शांत केलं, व कोसळलेल्या भिंतीचा मलबा फावड्यानं गोळा करून पाण्याच्या लोंढ्याला अटकाव केला.

रात्रभर पावसाचा जोर वाढतचं होता. अगदी खवळून रात्रभर बरसतंच होता. गावाजवळून वाहणार्‍या पूर्णा नदीलाही पावसामुळे प्रेमाची भरती आली होती. ती ही दुथडी भरुन वाहू लागली. सगळे गावकरी, शेतकरी आता धास्तावले. गावाच्या उत्तरेकडे असलेला तलावही आता ओसंडून वाहू लागला. पावसाचा जोर, वार्‍याचा जोर आणि पुराचाही जोर सगळीकडे हाहाःकार उडवू लागला. कोणाच्या छपराची कौले फुटली, कोणाच्या घरावरील पत्रे उडाली, कोठे भिंत कोसळली तर कोठे घरात पाणी शिरले. काय आज हा पाऊस वारा, वीजे समवेत एवढा उधाणला होता.

पाऊस चोवीस तास झाले तरी थांबत नव्हता. सगळेच आता हतबल झाले होते. दुसर्‍या दिवशीही पावसाचा जोर कायम होता. अवघ्या अठ्ठेचाळीस तासात 1000 मि. मी. एवढी पावसाची नोंद झाली. नद्यांनी धोक्याची पातळी ओलांडून शेतात प्रवेश केला होता. दोन्ही तिन्ही दिवस हिच परिस्थिती होती. डोंगर माथ्यावरुन येणारे पाणी नद्यांमध्ये येऊन पाणी धोक्याच्या पातळीच्या कितीतरी वर चढले होते. पाऊस जरी थांबला तरी नदीतील वाढलेले पाणी, धरणातील पाण्याचा विसर्गाने पुराचे पाणी ओसरण्याचा वेग मंदावला. जवळ जवळ 96000 हेक्टर जमिनीवरील पिके आठ ते दहा दिवस पाण्याखाली होती. माती, चिखलात असल्याने सडली होती. कुजली होती.

घरा दारातही पाणी शिरल्यानं अन्न धान्य, कपडालत्ता, सामानाची वाट लागली होती. आता सरकारी यंत्रणा कार्यरत झाली होती. लोकांना सुरक्षित स्थळी हलविले होते. कॅम्प उभारले होते. खाण्याची पाकिटे वाटली जात होती. आरोग्य यंत्रणा कार्यरत झाली होती. सर्दी, पडसं, ताप व साथरोगाने डोके वर काढले होते.

बापाच्या डोळ्यातील अश्रू खंडत नव्हता. दोन वर्षाचा कोरडा दुष्काळ आणि हा आताचा ओला दुष्काळ, वाया गेलेलं बि बियाणं, लागवडीचा खर्च, त्यासाठी काढलेलं कर्ज, त्याचं तर जणू या ओझ्यानं कंबरडंच मोडलं होतं. या उधाणलेल्या बेधुंद पावसानं होत्याचं नव्हतं केलं होतं. भरीस आलेला हंगाम, दाण्यांच्या राशि, त्यातून हाती येणारा पैसा, फिटलेलं कर्ज, खाऊन पिऊन हाती उरलेले दोन पैसे, त्याचं असं उधाणलेलं मन क्षणात उंचावरुन खाली कोसळलं होतं.

“बाबा, रडू नका ना तुम्ही, मी बाबांच्या गळ्यात पडलो होतो. बापाला अधिकच भडभडून आलं. त्याचे उष्ण श्वास व हुंदक्यांनी धपापणारी छाती मला तीव्रतेनं जाणवत होती. माय आमच्या दोघांच्याही अंगावरुन हात फिरवत होती.

” प्रकाश, खूप शीक माझ्या लेकरा, मोठा हो. आॅफीसर हो, इंजिनियर हो पण या बिन भरवशाच्या शेती व्यवसायात नको राहशील “

बाहेर वारा उधाणला होता. पाणी उधाणलं होतं आणि आत बापाचं मन उधाणलं होतं चिंतेनं, फिकीरीनं.

बाबा माझ्या शिक्षण्यासाठी पै पै जमवित होते. मला शैक्षणिक साहित्य व इतर अत्यावश्यक गोष्टी स्वतः अर्धपोटी राहून पुरवित होते.

शेती करतांना जमिनीचा पोत, त्याची तपासणी, त्यानुसार त्यावरील उपाय व मार्गदर्शन, सेंद्रिय शेती, त्याचे फायदे, जैविक खतांचा वापर, सुधारीत व संकरीत बि बियाणे, शेताच्या एका बाजुला शोषखड्डा, त्यात पावसाळ्यात जल पुनर्भरण, त्यायोगे रब्बी पिकाला होणारा फायदे, सहकार तत्वावरील धान्य गोदामांची व्यवस्था, त्यायोगे धान्याचे रक्षण, आधुनिक यंत्र सामुग्रीचा वापर इ. इ. कृषी पदवी अभ्यासक्रमात मी शिकलो. आणि गावी परतलो. आधुनिक तंत्रज्ञानाची जोड देऊन सेंद्रिय शेती करू लागलो.

बाबा थोडे नाराज झाले, ” शेतीच करायची होती तर एवढं शिक्षण कशासाठी घेतलं ” ” बाबा रागावू नका, शिक्षणही मी आपल्या शेती व्यवसायाचंच घेतलंय. जेणे करून आपल्या याच शेत जमिनीतून भरघोस पिक निघेल. मी आपली तर शेती प्रगत तंत्रज्ञानाचा वापर करून कसेनच पण गावातील माझ्या कृषिमित्रांनाही हे प्रगत तंत्रज्ञानाची माहिती देऊन शेती कसण्यास मदत करीन. ” ” विचार चांगला आहे तुझा पण लहरी निसर्गाचं काय ?

बाबा त्यावरही उपाय आहे, शेतीत ठिबक सिंचन, पावसाळ्यात शेततळ्यांची निर्मिती, विहीर पुनर्भरणाने कोरड्या दुष्काळावर मात करता येते.

कमी पाण्यात येणार्‍या व कमी कालावधीत पिके तयार होणार्‍या वाणांची निवड करता येते. एकाच पिकावर अवलंबून न राहाता मिश्र पिके किंवा आंतरपिक घेता येतं. पारंपारीक पिकात बदल करून पेरू, डाळींब, सिताफळ यासारख्या हवामान सहन करणार्‍या फळबागाही लावता येतात.

बाबा महावेध’ किंवा इतर सरकारी हवामान ॲप्सचा वापर करून पावसाचा अंदाज घेता येतो आणि त्यानुसार पेरणी/कापणीचे नियोजन करणेही आजकाल शक्य झाले आहे. शिवाय भाजीपाला आणि फुलांच्या शेतीसाठी हरितगृह (Greenhouse) किंवा शेडनेटचा वापर करून पिकांचे वादळ-पावसापासून रक्षण करणे सुलभ झाले आहे. तसेच जमिनीतील ओलावा टिकवून ठेवण्यासाठी आणि तण नियंत्रणासाठी मल्चिंग तंत्रज्ञान वापर केल्यास फायदा होतो.

बाबा यदा कदाचित निसर्गाची साथ नाही मिळाली तरी कुटुंबाचा खर्च चालविण्यासाठी शेतीला जोडधंदा म्हणून दुग्धव्यवसाय, शेळीपालन आणि कुक्कुटपालन (Poultry) सुरू करता येते. बाबा आजकाल

नैसर्गिक आपत्तीमुळे होणारे आर्थिक नुकसान भरून काढण्यासाठी ‘पंतप्रधान पीक विमा योजना’ (PMFBY) शासनाने सुरू केली आहे. तसेच हवामानावर आधारित फळपीक विमा योजनेचा लाभ घेता येतो ज्यायोगे आर्थिक नुकसान भरुन निघते.

यावर्षी मी डाळिंब व सीताफळाची लागवड सुधारीत तंत्रज्ञानाने केली होती. चार एकरातील फळांनी लगडलेली बाग पाहून आई बाबा खुश होते. डोळे भरुन आपली बाग न्याहाळत होते. यासाठी महाराष्ट्र ग्रामीण बँकेतील कृषी अधिकारी नयनाचीही मला खूप मदत झाली होती. कृषी क्षेत्रातील नयनाचे ज्ञानही वाखाणण्याजोगे होते.

बाबा पुढच्या आठवड्यात फळांचा पहिला हप्ता मी मार्केटला नेईन. ” होय बेटा, आता आपली सगळी आर्थिक चणचण मिटेल.

आज पावसाचा भर बराच होता. घरी आलो. ओट्यावर छत्री ठेवली. व बाथरूम मध्ये हातपाय धुवून कपडे बदलले. ” केस पूस रे प्रकाश, अर्धा भाग पूर्ण ओला झाला आहे. आणि उद्या तिला मला भेटायला सांग जिच्यामुळे तू अर्धा ओला झाला आहेस. आता आयुष्याची जवाबदारीही अशी अर्धी अर्धी वाटून घ्या. ” ” काय आई, तुझं भलतंच ” ” भलतंच तर भलतंच, मला सून हवीय रे बाबा. आता उशीर नको “.

एका शुभ मुहूर्तावर नयनाने माझ्या जीवनात प्रवेश केला. उधाणलेल्या या वारा व पावसानं माझ्या जीवनातही प्रेमाला उधाण आणलं होतं.

© डॉ. शैलजा करोडे

नेरुळ नवी मुंबई मो. 9764808391

ईमेल – karodeshailaja@gmail.com 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मी.. एक अपघाती शिक्षक ☆ शीला पतकी ☆

शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ मी.. एक अपघाती शिक्षक ☆ शीला पतकी 

वरील शीर्षक वाचून अपघाती शिक्षक म्हणजे काय? हा प्रश्न मनामध्ये सहजच निर्माण झाला असेल पण खरच मी अपघाती शिक्षक आहे.

– – झालं काय की लहानपणापासून जरा अभ्यासात हुशार असल्यामुळे आपण पुढे जाऊन डॉक्टर व्हायचं हे ठरवलं होतं आणि त्या काळात ते शक्य पण होतं आणि अभ्यास करून मार्क मिळवले तर पैशाचा फारसा प्रश्न नव्हता अर्थाचा प्रश्न मला नव्हता पण पालकांना असणार आहे लहानपणीचे हे स्वप्न एफ वाय बी एस सी नंतर भंग पावलं कारण जानेवारी 23 पर्यंत मी माझ्या बहिणीच्या लग्नासाठी पैशाची जमवाजमव आणि लग्न पार पडणे यातच होते 135 रुपयाच्या शिकवण्या घरोघरी जाऊन मी घेत असे त्यातून अभ्यासाला जो मिळेल तो वेळ आणि ग्रंथालयात मिळतील ती पुस्तके त्यामुळे आमची गाडी जमतेम 58% अर्थात त्याकाळी 59- 60% ला मिरज मेडिकलला मिळत होते पण परगावी ठेवून शिकण्याची ऐपत नव्हती तो विषय तिथेच संपला.

मग सरळ B.Sc. केलं शिक्षक होण्याचा विचार मनात नव्हता मग ठरवलं वकील व्हावे पण नेमके बीएससी झाल्यावर मला सेन्सेक्स टॅबयुलेशन येथे नोकरी लागली ती सरकारी होती पुढे सरकारी नोकरीत सामील करून घेतले. त्याच वर्षात मी एल एल बी ला ऍडमिशन घेतली ऑफिस सहा सहा वाजता सुटत असे चार किलोमीटर अंतरावरच्या कॉलेजमध्ये जायचे रात्री नऊला कॉलेज सुटायचे सकाळी परत दहाला ऑफिस.. पगार फक्त दीडशे रुपये.

नोकरी संपली वर्ष संपले मी सुट्टीमध्ये वैजापूर या ठिकाणी आले तिथे माझी बहीण शाळेत शिक्षिका होती त्यांच्या शाळेत गणित शिकवायला कोणी नव्हते सरकारी शाळा, सरकारी नोकरी ताबडतोब नोकरी लागली आणि गणित विषया असल्यामुळे मी सकाळपासून शिकवण्या घेत होते 17 नंबर फॉर्म भरलेल्या दहावीच्या विद्यार्थ्यांना सगळेच विषय शिकवत होते त्यामुळे माझे उत्पन्न हजारापर्यंत गेले 150 रुपये तोळा सोना होते त्यावेळेला माझे हजार रुपये म्हणजे खूप झाले नवनवीन प्रयोग करता येत होते विद्यार्थिनींची शाळा होती मुली जवळपास माझ्यापेक्षा दोन तीन वर्षांनी लहान होतया खेडेगावात शिक्षण उशिरा सुरू होते. माझ्यापेक्षा अनेक शिक्षक वरिष्ठ होते त्यामुळे माझ्या प्रत्येक उपक्रमाचे कौतुक कामाला खूप प्रोत्साहन मिळाले आणि मग शिक्षकी पेशा आवडायला लागला पण त्याला आवश्यक आपल्याकडे डिग्री नाही परत सोलापूरला आले आणि दयानंद महाविद्यालयात प्रवेश घेतला b. ed चे वर्ष पूर्ण केले त्या काळात आमचे शिक्षक शिक्षण क्षेत्रातील गुरू आदरणीय डॉक्टर सुरेश करंदीकर यांचे मोलाचे मार्गदर्शन लाभले आणि दुसऱ्या विभागात विद्यापीठात पहिल्या येण्याचा मान मला मिळाला माझ्या शाळेत अर्थात सेवासदन मध्ये मला नोकरी मिळाली कारण त्यावेळेला बीएससी बीएड शिक्षक मिळत नसे त्यामुळे नोकऱ्यांना काही कमी नव्हते माझ्या शिक्षकी पेशाची अशी अपघाती सुरुवात झाली…

… आणि मला एका घटनेची आठवण झाली मी सेवा सदन मध्ये असताना इयत्ता दहावी मध्ये मी एक छोटी कविता केली कवितेचे नाव होते आमची हि सर्विस करते आणि आमच्या मराठीच्या बाईंना दाखवली त्यांचं नाव होतं आदरणीय प्रतिभा बाई देव! बाई कौतुकाच्या त्यांनी माझी कविता आमचे मुख्याध्यापक नानासाहेब पाठक यांना दाखवली वरंड्यात उभे राहूनच ती कविता वाचली आणि मला म्हणाले माझ्याबरोबर चल मी त्यांच्या मागोमाग गेले ऑफिसमध्ये त्या ठिकाणी असलेल्या भिंतीवर श्री स्वामी समर्थांचा फोटो लावलेला होता. आजही आमच्या ऑफिसमध्ये तो आहेच त्यांनी मला सांगितले तू यांना नमस्कार कर मी फोटोला नमस्कार केला नानानाही नमस्कार केला त्यांनी माझ्या डोक्यावर हात ठेवला “खूप मोठी होशील माझा तुला आशीर्वाद आहे समर्थ पाठीशी आहेत आणि या शाळेला तुझा खूप उपयोग होणार आहे. ” दहावी म्हणजे शिंगं फुटायचे दिवस कशाला आम्ही शाळेत परतुन येतोय पण आपण मोठे होणार मग शाळेला मोठी देणगी देणार कारण त्या काळात देणगी देणाऱ्यांचे आमच्या शाळेत खूप मोठे सत्कार होत असत कदाचित त्यासाठी आपण परत येऊ असे वाटले होते मी ती गोष्ट फार गांभीर्याने घेतली नव्हती माझ ते ध्येय सुद्धा नव्हते.

नानासाहेब हे शंकर महाराजांच्या शिष्याचे शिष्य त्यांनाही काही सिद्धी प्राप्त होत्या पुढे पुढे तर ते आलेल्या माणसाचे मनातले ओळखत होते. आचार्य अत्रे अत्यावसथ आपल्या गुरूंच्या आज्ञावरून ते त्यांना भेटावयास गेले त्यांनी त्यांना घट्ट मिठी मारली आणि आचार्य अत्रे उठून बसले कारण त्यांच्या गुरुने एक शक्ती त्यांना प्रदान केलेली होती ही घटना मी अनेक पुस्तकात वाचली आहे. एकूण काय तर नानासाहेबांना सिद्धी प्राप्त झाली होती. माझे काहीही ठरले नसताना आणि सेवा सदन शाळेतच तिथेच माझ्या आयुष्याची कारकीर्द घडली नानासाहेब बसत त्याच खुर्चीवर मी बसले तोच स्वामींचा फोटो माझ्याही मागे होता यशाची कवाडे खुली झाली सामाजिक कार्याला दिशा मिळाली आणि कार्यामुळे नावलौकिक वाढला तो माझ्या शाळेचा आणि माझाही.

आजच्या शिक्षक दिनाला माझ्या शिक्षकी पेशाबद्दल विचार करताना मला हे जाणवतं की इथे सुद्धा मला खूप संघर्ष करावा लागला अनेकदा स्वतःला सिद्ध करावे लागलं बरीच आव्हान पेलावी लागली शिक्षकाची नोकरी साधी नव्हती विद्यार्थिनींना घडवताना अनेक प्रसंगातून मी सुद्धा तावूनसुलाखून पार पडत होते.

अपघाती घडले असले तरी मनापासून मी या क्षेत्रात रमले स्वतःला शिक्षक म्हणून शोधत गेले अर्थात अजूनही हा शोध सुरू आहे माझ्या सर्व शिक्षक मित्रांना शिक्षक दिनाच्या खूप खूप शुभेच्छा!!

©  शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका, सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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