ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह का साप्ताहिक राशिफल

जय श्री राम! इस सप्ताह 2 अक्टूबर को हमारे राष्ट्र के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का जन्मदिन है। महात्मा गांधी जी अक्सर श्री राम जी का नाम लिया करते थे। रघुपति राघव राजा राम उनका सर्वप्रिय भजन था। हम यह भी जानते हैं कि श्री रामचंद्र जी को याद करने के पहले श्री हनुमान जी को याद करना आवश्यक है। श्री हनुमान जी को याद करने के लिए श्री हनुमान चालीसा का पठन पाठन भी जरूरी। इसी तारतम्य में इस सप्ताह की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है –

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |

होय सिद्धि साखी गौरीसा ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से भगवान शिव और मां पार्वती जी की कृपा होती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 28 सितंबर से 4 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। मगर इस राशिफल के पहले इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर पर नजर डाल लें।

इस सप्ताह सूर्य कन्या राशि में, मंगल और गुरु कर्क राशि में, बुध तुला राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। शुक्र प्रारंभ में तुला राशि में रहेंगे तथा 3 तारीख के 8:37 रात से वे तुला राशि में वक्री हो जाएंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए उत्तम रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। इस सप्ताह आपको धन लाभ का योग भी बन रहा है। गलत रास्ते से धन आने का भी संयोग भी हो सकता है। व्यापारियों का व्यापार उत्तम गति से चलेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे। अगर आप उनको समाप्त करने के लिए प्रयास करेंगे तो आप उनको समाप्त भी कर सकते हैं। इस सप्ताह 28, 29 और 30 तारीख को आपके सम्मान में वृद्धि हो सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 28 को दोपहर के बाद से लेकर 29 और 30 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 28 की दोपहर तक आपको सावधान रहना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आप को अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। आपके दुश्मन इस सप्ताह शांत रहेंगे। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह बाद विवाद में कम पड़ना चाहिए। आपको अपने सहयोगियों और अधिकारियों से इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 30 की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो तारीख विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए उचित हैं। 28, 29 और 30 की दोपहर तक का समय सचेत रहने का है। सप्ताह के बाकी दिन सामान्य है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी सामान्य रहेगा। अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को परीक्षा में सफलता प्राप्त होगी। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 अक्टूबर उपयोगी है। 30 सितंबर तथा एक और दो अक्टूबर को आपको सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। भाग्य से इस सप्ताह आपको सहयोग प्राप्त होगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। आपके माता जी को खून संबंधी कोई रोग जैसे ब्लड प्रेशर डायबिटीज आदि हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28, 29 और 30 सितंबर कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली हैं। 30 सितंबर 1 और 2 को अक्टूबर को आपको धन लाभ हो सकता है। तीन और चार अक्टूबर को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह प्रयास करने पर कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह बड़े आसानी के साथ, थोड़े से प्रयास से पराजित कर सकते हैं। धन प्राप्ति का योग बन रहा है। भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक ठाक रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 28 की दोपहर तक का समय आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग बन रहा है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको व्यापार में लाभ होगा। भाग्य भी इस सप्ताह आपका साथ देगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर एक और दो अक्टूबर को भाग्य से मदद मिलने की उम्मीद है। 3 और 4 अक्टूबर को आपको अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। 28, 29 और 30 सितंबर को आपको कार्यों को करने में बड़ी सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। मगर उनको अपने अधिकारियों से सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परन्तु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 28 की दोपहर के बाद से लेकर 29 और 30 तारीख की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर के कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर आपको सफलता प्राप्त हो सकती है। धन प्राप्त करने का भी योग है। भाग्य से आपको थोड़ी मदद मिल सकती है परंतु भाग्य के भरोसे इस सप्ताह आप ना रहे। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध इस सप्ताह सामान्य रहेगा अर्थात जैसा पहले था वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो अक्टूबर कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको अपने कार्यों को अत्यंत सावधानी से निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको धन लाभ की उम्मीद है। व्यापारियों को इस सप्ताह अपने व्यापार में लाभ होगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को भी धन लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से सावधान रहने चाहिए। लंबी यात्रा का योग है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 अक्टूबर लाभप्रद हैं। 30 सितंबर 1 और 2 अक्टूबर को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह कर्मचारियों अधिकारियों के लिए अच्छा है। उनको अपने कार्यालय में प्रशंसा प्राप्त हो सकती है। भाग्य से भी इस सप्ताह आपको थोड़ा बहुत मदद मिल सकता है। परंतु भाग्य के स्थान पर अपने कर्म पर विश्वास करना उचित रहेगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप अपने सहकर्मियों और अधिकारियों से किसी प्रकार की लड़ाई ना करें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 28, 29 और 30 सितंबर विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदाई है। 30 सितंबर एक और दो अक्टूबर को आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। अगर इस दिन किसी परीक्षा का रिजल्ट निकलता है तो उसमें आपको सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप तीन और चार अक्टूबर को सावधान रहकर अपने कार्यों को करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह भाग्य आपकी अपनी पूर्ण शक्ति से मदद करेगा। आपको कार्यों को करने का प्रयास करना है। ईश्वर की कृपा से आपको सफलताएं मिल सकती हैं। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह बड़े आसानी से थोड़े से प्रयासों से ही समाप्त कर सकते हैं। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर, एक और दो अक्टूबर कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेगा अर्थात जैसा चल रहा था वैसा ही रहेगा। संतान से आपको थोड़ा बहुत सहयोग मिल सकता है। इस सप्ताह आपको किसी भी तरह के दुर्घटना की आशंका नहीं है। दुर्घटनाएं आपसे पूरे सप्ताह भर दूर रहेंगी। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार सितंबर शुभ है। तीन और चार सितंबर को आपके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य सफल रहेंगे। 30 सितंबर, 1 अक्टूबर और 2 अक्टूबर को आपको भाग्य के स्थान पर अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ बुद्धी दाता आणि ज्ञान दाता! 🙏 ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

🙏 बुद्धी दाता आणि ज्ञान दाता! 🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

☆

साम्य वाटले मजला

PC आणि गणेशात,

सांगतो समजावून कसे

बघा येतंय कां ध्यानात!

 *

साऱ्या विश्वाची खबर

लंबकर्ण कानी आकळे,

साठवी माहिती जगातून

PCचे इंटरनेट जाळे!

 *

मोठी सोंड वक्रतुंडाची

करी दुष्टांचे निर्दालन,

अँटीव्हायरस करतो

स्व जंतूचे स्वतः हनन!

 *

ठेवी लंबोदर उदरात

भक्तांच्या पाप पुण्याला,

PCची हार्डडिस्क पण

येते ना त्याच कामाला?

 *

येई स्वारी गजाननाची

मूषक वाहना वरुनी,

PCचा माऊस पण चाले

एका चौकोनी पॅडवरुनी!

 पण,

भले भले भरकटती

PCच्या मोह जालात,

एकच गणेश बुद्धीदाता

ठेवा कोरून हृदयात!

ठेवा कोरून हृदयात!

☆

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “शिक्षण आणि शिक्षण पद्धती…” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

🌸 विविधा  🌸

☆ “शिक्षण आणि शिक्षण पद्धती…” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

शाळेचे माध्यम – 

तुमच्या मुलाला कोणत्या शाळेत घातलं? या प्रश्नामध्ये उत्सुकतेऐवजी ‘प्रतिष्ठा’शोधण्याची खोच दडलेली असते. शिक्षण विस्तारले… नवे प्रवाह आले… तरी ‘मुलाचे शिक्षण’या मुद्दय़ाशी जोडली गेलेली प्रतिष्ठा काही कमी झाली नाही. किंबहुना, शिक्षणाचे आयाम बदलण्यात हाच मुद्दा मोठा ठरत आहे. आता मूल कोणत्या शाळेत जाते, यावरून ते किती हुशार हे ठरवतात. एके काळी शिक्षणाचे माध्यम हा मुद्दाच नव्हता. कालांतराने इंग्रजी माध्यम की मराठी, असा प्रश्न उपस्थित झाला. अगदी थोडय़ाच दिवसांत इंग्रजी ‘माध्यम’ हे जवळपास गृहीतच धरले गेले आणि शाळा कोणत्या बोर्डाची? असा प्रश्न समोर येऊ लागला. आता मात्र प्राथमिक शिक्षण हे शाळा कोणत्या बोर्डाची, या प्रश्नालाही मागे सारून कोणती शिक्षण पद्धती? या प्रश्नाकडे प्रवास करत आहे.

एसएससी, सीबीएसई, आयसीएसईयांची चर्चा तर कधीचीच मागे पडली. कारण आता यांच्या स्पर्धेला आयजीसीएसई, आयबीसारखी आंतरराष्ट्रीय शिक्षण मंडळेही दंड थोपटून उभी ठाकली आहेत. पुणे-मुंबईसारख्या महानगरांमधून दिसणारे हे चित्र आता अर्धनागरीकरण झालेल्या छोटय़ा शहरांतही दिसू लागले आहे. अपवादात्मक ठिकाणी त्यामुळे शिक्षणाचा दर्जा वाढला आणि प्रयोगशील शिक्षणही मिळू लागले. मात्र बहुतांश ठिकाणी किमान सुविधा, प्रशिक्षित शिक्षकांअभावी कच्ची मडकी तयार करण्याचाच धंदा वेगाने सुरू आहे. ‘माय मरो अन् मावशी जगो’ असे म्हणतात. पण याचा अर्थ प्रत्यक्षात माय मारून मावशीला जगवायचे असा होत नाही. शिक्षणाच्या क्षेत्रात मात्र सर्वानी हाच अर्थ गृहीत धरलेला दिसतो. कधीकाळी जिल्ह्य़ाच्या ठिकाणी एखादी इंग्रजी माध्यमाची माध्यमाची शाळा असायची आणि आर्थिकदृष्टय़ा सक्षम असणाऱ्यांची मुले या शाळेत दिसायची. पण गेल्या दहा वर्षांत जिल्हा आणि तालुक्याच्या ठिकाणीही अशा शाळा वाढल्या. गेल्या चार-दोन वर्षांत तर गावपातळीवरही हे इंग्रजी शाळांचे पीक फोफावले आहे.

‘अ’ अननसाचाऐवजी ‘ए’ फॉर ‘अॅपल’ असे शब्द आता ऐकू येतात. जागोजागी चित्रविचित्र नावांचे ‘इंग्लिश स्कूल’ असे फलक लागलेले दिसतात. त्यांना शाळा तरी कसे म्हणावे? रस्त्यालगत टीनपत्र्याचे शेड ठोकलेले. कुठे लाकडी पार्टिशन आणि त्यावर रंगवलेले मिकी-माऊस किंवा ‘जॅक अँड जिल, वेंट अप द हिल’ यांसारख्या चार-सहा ओळी. समोर एक-दोन घसरगुंडय़ा. पण दर्जा सुमारच. एवढय़ा भांडवलावर हा धंदा चालतो. एक तर वसुली भरमसाट होते आणि कोणत्याच सरकारी नियंत्रणाची भीती नाही. जरा गांभीर्याने पाहिले तर ही फसवणूक आहे… अक्षरश: डोळे पांढरी करणारी हे लक्षात येते. गेल्या काही वर्षांत ग्रामीण भागात शिक्षणाच्या पार चिंध्या उडाल्या. जी माणसे गावपातळीवर नेतृत्व करणारी, त्यांची मुले तालुक्याच्या ठिकाणी असलेल्या शाळेत जातात. ती कधीच जिल्हा परिषदेच्या शाळेत जात नाहीत. त्यामुळे गावातल्या शाळेला कोणी वालीच नाही अशी परिस्थिती. नेमके याच काळात खासगी शाळांचे पेव फुटले आणि आता इंग्रजी शाळांचा बाजार सुरू झाला. आपला मुलगा किंवा मुलगी इंग्रजी शाळेत आहे याचे खेडय़ातल्या पालकांना कोण अप्रूप! जे आपल्याला मिळाले नाही ते आपल्या मुलांना मिळाले पाहिजे ही त्यापाठीमागची भावना. त्यातूनच इंग्रजी शाळेकडे वाढता कल. आपले लेकरू घरी आल्यानंतर आपल्याला मम्मी-पप्पा म्हणते, काकाला अंकल म्हणते, चारचौघांत विचारले तर त्याला वर्गात घोळून घोळून पाठ केलेली एखादी ‘पोएम’ म्हणता येते. अशा सगळ्या आभासी जगातच हे सर्व सुरू आहे.  

इंग्रजी शाळांचा ‘साहेबी’ थाट;

मराठी शाळांची लागली वाट…

गावातल्या जिल्हा परिषद शाळेचा एकच ड्रेस ठरलेला. पांढरे शर्ट, खाकी चड्डी. इथे शाळेगणिक पोशाखाचे रंग बदलतात. गळ्याला ‘टाय’ अडकवलेली, पायात ‘शूज’, पाठीवर ‘स्कूलबॅग’, सोबत ‘वॉटरबॅग’ असा सारा थाट असतो. आई शेताला निघाली असेल डोक्यावर टोपले घेऊन किंवा बाप शाळेच्या वेळेत बैलांना घेऊन निघाला असेल तर लेकरू ‘बाय’ करणार. तो काय शिकतो, हे पाहण्याकडे कोणालाही वेळ नाही किंवा त्याला काय शिकवले जाते हे पाहण्याची कोणाला गरजही वाटत नाही. अनेकांना बिचाऱ्यांना त्यातले काही कळतच नाही. लेकरांची वह्य़ापुस्तके पाहण्याऐवजी त्यांना सुटाबुटात पाहण्यातच ज्यांना आनंद होतो, अशा पालकांच्या अभावग्रस्त मानसिकतेचा अशा शाळांनी बरोबर फायदा उचलला. वेगवेगळ्या वाहिन्यांच्या मालिकांमधून टाय-बूट घालून शाळेत जाणारी मुले खेडय़ापाडय़ांतल्या पालकांच्या मनावरही ठसली. त्यातूनच आपले लेकरूही अस्सेच दिसले पाहिजे हा भाव दृढ झाला. गावात जिल्हा परिषदेच्या शाळेत एकही रुपया द्यावा लागत नाही, पण इथे वर्षांला दहा-बारा हजार रुपये मोजण्याची तयारी. सेमी इंग्लिश नावाचा प्रकार आणून लोकांना आणखीन संभ्रमित केले जात आहे.

इंग्रजीत जेमतेम पस्तीस मार्क्सही मिळत नाहीत म्हणून दहावी-बारावीच्या बऱ्याच वाऱ्या केलेले अनेकजण आज पालकांच्या भूमिकेत आहेत. आपली मुले इंग्रजी माध्यमांच्या शाळेत घालून त्यांना आपला जुना बदला घ्यायचा असतो. अर्थात हे समाधान आधीच्या न्यूनगंडातून आलेले असले तरी ते खरे मात्र नसते. लेकराला इंग्रजी आले म्हणजे ते कुठेच अडणार नाही असे वाटते, पण हे इंग्रजी कोणत्या काळाचे आहे हे सुद्धा समजत नाही. मुलांमधील क्षमतांचा विकास जागच्या जागीच थांबतो, मातृभाषेतून समजल्या जाणाऱ्या ज्ञान-विज्ञानाच्या संकल्पनांना स्वत:च्या हातांनीच बांध घातला जातो. एका अर्थाने रस्त्यालगत अशी खुराडी निर्माण करून बालकांच्या प्रतिभेचीच कत्तल केली जात आहे. अंगभूत क्षमता विकसित होण्याआधीच खुडण्याचे काम सुरू आहे.

गेल्या दहा वर्षांत डी. एड्, बी. एड्. होऊन नोकरीच्या शोधात असणारे अनेकजण गावात आहेत. त्यातल्याच काहींना नाममात्र पैसे देऊन अशा शाळांमध्ये राबवून घेतले जाते. बहुतांशी स्वच्छतागृहे ही अस्वच्छतागृहे आहेत. प्रयोगशाळेत किमान सुविधा नाहीत, प्रशिक्षित किंवा तज्ज्ञ शिक्षक नाहीत. सगळी कच्ची मडकी तयार करण्याचाच धंदा वेगाने सुरू आहे. आपली फसवणूक होत आहे हे ज्यांना कळत नाही अशा पालकांच्या आकांक्षांचेच कंपोस्ट खत तयार केले जात आहे. त्यांच्या स्वप्नांशी हा जीवघेणा खेळ सुरू आहे. ना धड मराठीचे आकलन, ना धड इंग्रजीची समज. अशा कात्रीत ही सगळी उमलणारी पिढी उद्या शाळेतून बाहेर पडली तरीही हा सगळा माल कच्चाच राहणार. त्यांना फार उशिरा कळणार की आपल्याला आईचे प्रेम मिळालेच नाही आणि सावत्र मावशीची माया हा एक आभास होता. अशावेळी भवितव्याबद्दल अश्रू ढाळूनही काहीच उपयोग होणार नाही. शाळेच्या डामडौलाला भुलून आपल्या पाल्याचे आयुष्य बरबाद करू नका. तेव्हा वेळीच जागे व्हा, आपल्या पाल्याला मातृभाषेतून शिक्षण द्या. विचार तर कराल? 

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ दंवबिंदू… ☆ स्वप्ना मुळे (मायी) ☆

स्वप्ना मुळे (मायी)

? जीवनरंग ?

☆ दंवबिंदू… ☆ स्वप्ना मुळे (मायी) ☆

“या… उगवलात का आज?? नशीबच आमचं! ” असं रागानं म्हणत तिनं गुळण्या केल्या आणि खोलीत शिरून पलंगाखालची एक कळकट पिशवी ओढली. त्यातून ताडपत्री बाहेर काढली. सासूबाईंना म्हणाली, “मी पत्र्यावर चढून टाकून घेते नीट हे… आणि पाणी ओतून बघते. तुम्ही कुठे गळतंय ते लगेच सांगा मला. आज दिलंय सूर्यबाबानं दर्शन, तर करून घेऊ हे काम! चार दिवस मेल्या पावसानं संधी दिली नाही पत्र्यावर चढायची… आज करूनच टाकते. ”

सासुबाई म्हणाल्या, “अगं चहा तर घे सकाळचा…”

त्यावर चिडूनच आरती म्हणाली, “अहो, त्या निसर्गाचं डोकं फिरलं पाच मिनिटात, तर परत गोंधळ, आणि मग मला पोळ्या करायला निघायचंय. नंतर हे राहून जातं… तुमचे उगाच हाल. घरभर गळक्याखाली भांडी लावत बसायचं. गळक्या पाण्यानं आपल्या ऑर्डरच्या निवडलेल्या भाज्या सडून जातायेत. नकोच! आधी हे काम, मग चहा…” असं म्हणत ती खिडकीचा आधार घेत कसरत करत वर चढली. ते प्लास्टिक पूर्ण पत्र्यावर टाकलं. उडून जायला नको म्हणून जागोजागी त्यावर दगड ठेवले.

सासूबाईंनी कसंबसं करत, वर तिला कळशी दिली… जिथं जास्त गळत होतं, तिकडे पाणी टाकत सगळे धोक्याचे कोपरे तिनं पाणी टाकून तपासले. सगळं उरकून ती खाली उतरली. एकदम घामाघूम झाली होती ती आणि दमली पण होती. सुरकुतलेल्या हातांनी सासूबाईंनी वेलचीचा चहा समोर धरला, तशी ती सुखावली.

चहा घेताना सासुबाई डोळे भरून कौतुकानं आपल्या सुनेकडे पाहत होत्या… आजपर्यंत उपभोगत असलेलं सुख आपल्या लेकाच्या आजारपणानं हरवलं; त्यात लेकही हरवला… पण हिनं हिम्मत हारली नाही. खरंतर माहेरी निघून जाऊ शकत होती… पण गेली नाही. आपला हात डोक्यावर ठेवून म्हणाली, “तुम्ही फक्त आशीर्वादाची साथ द्या, आपण परत नव्यानं उभं राहू. ”

ह्या वर्षभरात खुप कष्ट केले… लोकांची देणी फेडली, खरंतर किती वैभवशाली जगणं होतं आम्हा दोघींचं. लेकाची चांगली नोकरी, छान फ्लॅट, दागिने… पण किती बदललं सगळं! आपण विचारही केला नव्हता आयुष्याचा शेवटचा टप्पा असा जाईल… पण ही पोरगी खरंच गुणाची आहे.

परवा समोरच्या रो हाऊसच्या रांगेत सुखवास्तुतल्या त्या डॉक्टरणीनं क्लिनिक फार चाललं नाही, म्हणून नैराश्य येऊन आत्महत्या केली. त्या दिवशी सगळ्या कॉलनीत हळहळ झाली, तेव्हा बरेच जण आपल्या सुनेविषयी किती सकारात्मक बोलले… 

‘आरतीकडून शिकायला हवं. जिथं अपार्टमेंटमध्ये सून म्हणून आली, त्याच कॉलनीत बंगल्यातली ही वरची छोटी पत्र्याची खोली भाड्यानं घेऊन राहते… परिस्थितीची लाज वाटून घेतली नाही आणि नैराश्याचं मळभ दाटू दिलं नाही. जोडीदार सुटला, ते दुःख तर केवढं! पण सगळं स्वीकारून आनंदी असते. लाज न बाळगता पोळ्यांची कामं सुरू केली. नाहीतर ह्या डॉकटरणीसारखी अशी असंख्य माणसं थोडंही अपयश पचवत नाहीत. इतकं सुखी आयुष्य असून असे निर्णय घेतात…’

‘अरे, जरा समाजात बघा… एक वेळ खायला मिळत नाही. हात, पाय, डोळे असे अवयव नसलेले हिमतीनं जगतात आणि हे धडधाकट लोक मनानं खचून असे जीव देतात… ना चिमुरड्या जीवांचे विचार, ना म्हाताऱ्या आई-वडील, सासु-सासऱ्यांचा विचार करतात…’

‘खरंच मालतीबाई, तुमची आरती कमाल आहे बरं! सध्या तिचं ते निवडलेल्या भाज्या देण्याची सर्विस तर किती मस्त… सगळे खूश आहेत तिच्यावर…’_

सगळ्या बायकांनी आरतीचं कौतुक केलं होतं. हे सगळं आठवून सासुबाईचं मन आताही सुखावलं.

आरतीनं सासूबाईंना हाक मारली, “आई, अहो कोणत्या विचारात हरवल्या? आई, मी आज पोळ्या झाल्या की जरा मार्केटमध्ये जाऊन येईन. तो शेतकरी ताज्या गवार शेंगा देईन म्हणालाय. आणून आपल्याला आज रात्रभरात त्या निवडायच्यात. एका कॅटरिंगवाल्याची ऑर्डर आहे…”

सासुबाई तिचा हात हातात घेत म्हणाल्या, “करू या गं… पण तू थोडी कमी दगदग कर. स्वतःची काळजी घे. ”

सासूबाईंचा हात दाबत ती म्हणाली, “आई माणसावर ना वेळ येत असते. त्याक्षणी त्यानं हिम्मत धरली आणि कष्ट केलं तर तो जिंकलेला असतो. अगदी ह्या तुळशीवर पडलेल्या दवबिंदूसारखं…”

“दवबिंदूसारखं…? म्हणजे कसं गं? ”_ सासुबाईंनी विचारलं.

तिनं त्यांचा हात धरत त्यांना गच्चीत कठड्यावर ठेवलेल्या तुळशीजवळ आणलं. त्यावर पडलेले थेंब दाखवत ती म्हणाली, “काल पावसामुळं हे पाणी त्याचं वहाणं सोडून इथं गोठलं ह्या पानांवर… पण त्यानं मनात हिम्मत धरली ना, सूर्याला स्वतःत पाहण्याची! वाहण्याचं अस्तित्व विसरलेला थेंब आज मोत्यासारखा दिसतोय ना आई? ही अशी चमकण्याची जिद्द घेऊन जगु या आपण दोघी… लवकरच आपण आपलं हरवलेलं जगणं परत जगायला लागू आई. फक्त तुम्ही साथ द्या…”

सासूबाईंच्या गालावरही दवबिंदू आले होते कारण सूर्याची किरणं सगळ्याच थेंबावर पडून सगळीकडे मोती चमकत होते. जगण्याची जिद्द सूर्याला स्वतःत पाहण्याचं दवबिंदूचं वेड आता दोघींच्या आसवांत स्पष्ट चमकत होतं.

 

© स्वप्ना मुळे (मायी)

फक्त व्हाट्सअप संपर्क +91 93252 63233

छत्रपति संभाजी नगर महाराष्ट्र

≈संस्थापक् संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ”जगण्याचा दर्जा..” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “जगण्याचा दर्जा..“ ☆ संध्या बेडेकर ☆

” जगण्याचा दर्जा आपल्या विचारांवर अवलंबून असतो, परिस्थिती वर नाही. “

काल ताई कडे गणपती विसर्जन होते. म्हणून आम्ही पोचलो. आरती, त्यानंतर प्रसाद. नंतर ची आवाराआवर असतेच.

आठवडा खूप मजेत जातो. अगदी वेगळ्या विश्वातच असतात सर्व. आनंदी वातावरण असते. खाण्यापिण्याची रेलचेल असते. बाप्पा घरात विराजमान, म्हणजे दैनंदिन जीवनात, विचारांत थोडा बदलही होतोच. थोडे दिवस का होईना पण एका वेगळ्याच उर्जेचा संचार असतो. नंतर पुन्हा जैसे थे । बरे असो,

गणपती विसर्जनानंतर भाऊजीं चे पाच सहा मित्र आपल्या पत्नीसह, येथे ताई कडे एकत्र होतात. हा दरवर्षीचाच कार्यक्रम आहे. एकत्र होण्याचे एक कारण तर बाप्पाचे विसर्जन झाल्यामुळे घरात करमत नाही. सर्व आपापल्या घरचा प्रसाद व इतर पदार्थ घेऊन येतात. व दुसरे मुख्य कारण म्हणजे ताईच्या हातचे उकडीचे मोदक सर्वांना खायचेच असतात.

आज ही सर्व आलेच. सगळे आजी आजोबा मस्त ‘ festive dress ‘ म्हणजे आजोबा छान कुर्ता पायजमा मधे व आज्या जरीच्या साड्यांमध्ये खरंच खूप छान दिसतात. त्यांच्या गप्पा ऐकल्यावर तर त्यांच्या आयुष्याची कल्पनाही येते. त्यांचे वागणे बोलणे बघून ज्येष्ठत्व कसं जगावं??? हे कळत. वयामानाप्रमाणे विचारांत व वागण्यात ‘ ठहराव ‘ तर आला पाहिजे, बरोबर मिश्कीलपणा पण टिकवता आला पाहिजे. वय झाले म्हणून नेहमी गंभीर रहायची गरज नसते. अशी शिकवणं सहज मिळते.

आज कुलकर्णी काका फुलांचा गुच्छ घेऊन आले होते. व आमच्या भाऊजींना देत म्हणाले,

” देशपांडे, आज ही फुले खास तुमच्यासाठी. ” तुम्हाला आठवतंय का?? आज बरोब्बर एक वर्ष झाल.

सर्वांनी विचारलेच, कशाबद्दल बोलताय कुलकर्णी??

तेंव्हा कुलकर्णी काका म्हणाले,

मागच्या वर्षी याच दिवशी आपल्या गप्पांमध्ये ‘garrage sale’ ची कल्पना देशपांडयांनी सुचवली होती. आणि त्यानंतर या वर्षभरात आपण सर्वांनी मिळून बरंच काम केलं. आपल्या मुलांनीही मदत केली. आपला अनुभव व नवीन मुलांची कार्य कुशलता, नवीन टेक्नॉलॉजी ‘can give amazing results ‘. हे पुन्हा एकदा सिद्ध झाले.

” प्रत्त्येक नवीन कल्पना महत्त्वाचीच असते. ” म्हणून आज हा ‘ bouquet ‘ खास सर्वांसाठीच. आपल्या सर्वांच्या सौ. चेही योगदान विसरता येणार नाही. अभिनंदन सर्वांचे.

भाऊजी म्हणाले. ,

 हो आठवलं. तेंव्हा, आपण बाप्पा च्या विसर्जनानंतर, आता आपल्या ही विसर्जनाची वेळ आलीच आहे. असं सहज म्हणालो. तेंव्हा आपली पण आवाराआवर करायलाच हवी. जेवढं ओझं कमी असेल तेवढ छान. व त्यातच या विचाराने/कल्पनेने जन्म घेतला.

वास्तविकता नाकारता येत नाही. या सर्व गोष्टींचा विचार करायलाच हवा. सहसा आपण या गोष्टी बोलायचे टाळतो. पण यावर वेळेवर विचार केलाच पाहिजे.

ताई म्हणाली,

बऱ्याच जणांची मुलं अमेरिकेत आहेत. तेथील नागरिकत्व ही घेतले आहे. त्यांचे येथे येणे म्हणजे कधी कधीच होणार. तेंव्हा या घरातल्या वस्तूंचे काय करायचे??? . ठरवायला हवे. आपणच कौतुकाने घेतलेल्या या वस्तू, आपण त्यांचा पूरेपूर आनंदही घेतला. आता मात्र वापरणे होत नाही. सर्व वस्तू चांगल्या working condition. मधे आहेत. आता मोह आवारायला हवा. गेलेल्या/ घडलेल्या गोष्टींचा विचार करत बसण्यापेक्षा, भविष्याचा विचार करावा व वेळेवर निर्णय घ्यावे. म्हणूनच बहुतेक देवाने आपल्याला डोळे मागे न देता समोर दिले असावेत.

बरोबर आहे. ” जगण्याचा दर्जा आपल्या विचारांवर अवलंबून असतो. परिस्थिती वर नाही. “

 भाऊजी म्हणाले,

आता आयुष्याच्या या वळणावर थोडा वेगळा विचार करावा. एकीकडे खूप मुबलकता आहे तर दुसरीकडे गरज दिसतेय. एकीकडे बदलत्या फॅशन बरोबर घरच्या वस्तू बदलणारे लोक दिसतात, तर दुसरीकडे आवश्यक वस्तूंचा प्रचंड अभाव असणारे किती तरी परिवार आहेत. म्हणून सहज एक 

विचार मनात आला की अमेरिकेत जसा ‘garrage sale’ लावतात तसाच लावावा का???? आपल्या सारखी परिस्थिती असणारे बरेच लोक आहेत. घरातील किती तरी वस्तू आपण वापरत नाही. म्हणजे आता त्यांची गरजच नाही. घरात चार प्रेशर कुकर आता कशाला हवेत?? वस्तू् कमी करता येऊ शकतात. वेळेवर, आपल्या समोर योग्य गरजू लोकांना त्या मिळाल्या तर बरं. मुलांना हे करणं जमणार नाही. हे ही नक्की. कारण त्यांच्या जवळ तेवढा वेळच नाही.

अशाच चर्चेनंतर एक उपक्रम सुरू झाला. सर्वात आधी आमच्या कमला मावशींच्या बहिणीला मदत केली. तिचा नवरा कोविड मधे गेल्यावर, तिला खानावळ सुरू करायला आपण मदत केली. घरचाच मोठा कुकर, कढई, स्टील ची ताट, भांडी, वाट्या आपण आपाल्याच घरातून काढून दिल्या. व तिची खानावळ सुरू झाली. तिचे आयुष्य मार्गी लागले.

आपापल्या परीने सर्वांनी या उपक्रमाची जाहिरात केली. नवीन कोणत्याही चांगल्या कामाला लगेच सहकार्य मिळतेच असं नाही. प्रथम कोणत्याही नवीन कामाची चेष्टा होते, नंतर विरोध होतो. नंतर हळूहळू लोक त्याचे महत्त्व समजतात. त्यांना पटले की तेही मदतीचा हात पुढे करतात. एकमेकांना बघूनही किती तरी लोक समोर आले.

मागच्या वर्षी आपण दोनदा हा ‘event’ घडवून आणला. आतापर्यंत लोकांनी आपल्या घरच्यांच वस्तू, ताट, वाट्या, भांडी, कुकर, कढई सायकल, स्टील व प्लास्टिक चे डबे, शिवणाची मशीन, टेबल खुर्ची, प्लास्टिक च्या खूर्च्या, पुस्तक मिक्सर, चादरी, टेबल फॅन, अलमारी अशा कितीतरी गोष्टी स्वखुशीने आणून दिल्या. आपल्या बायकांनी त्याची व्यवस्थित नोंद केली. रेकॉर्ड ठेवला.

पाठक काका हसत म्हणाले,

“जेंव्हा बायका अशी कामं करायला तयार होतात ना, तेंव्हा ते नक्की चांगले होतेच. ” 

 काल तर पवार साहेबांचा फोन आला होता. म्हणाले, मला माझी स्कूटर द्यायची आहे. योग्य माणसाला द्यायचे काम तुमचे. या उपक्रमाबद्दल त्यांनी अभिनंदनही केले. म्हणाले,

” माणसाने कायम वेळेसोबत चालावे व काळाप्रमाणे बदलावे. “

सुरवातीला आपण एक सिस्टीम बनवली व काम सुरू केले. हे सर्व करताना नियम लक्षात ठेवणे आवश्यक आहे. योग्य व्यक्तीच्या हातात त्याच्या गरजेनुसार ती वस्तू देता आली पाहिजे. दोन्ही वेळेस जमलेल्या वस्तूंची लिस्ट आपण वेगवेगळ्या गृप वर कळवली व त्याप्रमाणे वस्तूंचे वाटप केले.

हळुहळु या उपक्रमाची चर्चा झाली. स्वागत झाले. अनेक लोक पूढे आली. हळुहळु बदल होतील. जास्त चांगली सिस्टीमही बनेल.

म्हणतात ना,

गरजवंताला दिलेले दान, प्रामाणिकपणे केलेले काम, पाठीवर ठेवलेला आधाराचा हात म्हणजेच देवपूजा. माणुसकी पेक्षा मोठी पूजा कोणतिही नाही. आपल्याला ही समाधान मिळते.

” There is nothing more beautiful than someone goes out of their way to make life beautiful for others. “

 

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ गण गण गणात बोते ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ गण गण गणात बोते ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

शेगांवचे श्री गजानन महाराज यांनी सर्व भक्त मंडळींना एकच मंत्र दिला होता आणि तो म्हणजे – गण गण गणात बोते.

महाराज स्वतः या मंत्राचा सतत जप करत असत आणि त्याप्रमाणे तो आचरणात आणत असत.

कुठलाही मंत्र म्हटला, कि, त्यामध्ये दोन भाग असतात. एक म्हणजे ध्यानस्थ बसून त्या मंत्राचा नित्यनियमाने जप करणे. आणि दुसरा महत्वाचा भाग म्हणजे, नित्य जप करण्याबरोबरच त्या मंत्राचा अर्थ समजवून घेणे आणि त्याप्रमाणे आपले आचरण बदलणे आणि ठेवणे.

आपण बरेच जण ‘गण गण गणात बोते’ या मंत्राचा नित्य जप करत असतो. असा जप केल्यामुळे आपलं चित्त एकाग्र होतं, आणि त्यामुळे जप करणाऱ्यांना मानसिक शांतता नक्कीच मिळते.

पण बऱ्याच जणांना या मंत्राचा अर्थ माहीत नसतो, त्यामुळे तो आचरणात आणणे दूर राहते. आणि त्यामुळे आपली वैचारिक पातळी / अध्यात्मिक पातळी उंचावण्याकरता या अतिशय साध्या आणि आचरणांत आणायला अतिशय सोप्या अशा मंत्राचा उपयोग करण्याला आपण मुकतो.

आपल्याला समजेल, असा या मंत्राचा अर्थ जर आपल्याला समजला, तर तो आचरणात आणणे सोपे असते. आणि मग आपण मनात तसं ठरवलं, तर आपली वाटचाल त्या दिशेनी सहजपणे होऊ शकते.

या मंत्राचा अर्थ सांगतात तो असा :- _जीव आणि ब्रह्म हे एकच आहेत आणि त्यांना निराळे समजू नये. भगवान सर्वत्र आहेत आणि सर्व सत्ता भगवंतात आहे. _ 

हा सांगितलेला अर्थ वाचून मला किंवा बऱ्याच जणांना समजेल असा अर्थ लक्षात येत नव्हता. आणि त्यामुळे मंत्र आचरणात कसा आणायचा हे लक्षात येत नव्हते.

म्हणून मी प्रत्येक शब्दाचा सर्व बाजूंनी अर्थ लक्षात घेऊन या मंत्राद्वारे महाराजांना काय सांगायचे असेल व ते सगळ्यांना कसे समजेल, असा या मंत्राचा अर्थ मी लिहून काढला. 

मला या मंत्राचा सोपा अर्थ दिसतो तो असा —

(पहिला) गण = कुणीही व्यक्ती, कुणीही प्राणी

(दुसरा) गण = शिव म्हणजेच ईश्वर म्हणजेच देव

गणात = हृदयात

बोते = बघा

म्हणजे सगळ्या व्यक्तींमध्ये / प्राण्यांमध्ये ईश्वर आहे हे लक्षात घ्या आणि ही जाणीव ठेवा. आणि मग त्याप्रमाणे आपली वागणूक ठेवा. सगळ्या व्यक्ती; म्हणजे आपण स्वतः पण त्या मधे येतो, म्हणून स्वतःमध्ये पण ईश्वर आहे, हे पण लक्षात ठेवणे गरजेचे आहे.

आपण ज्या व्यक्तीशी बोलतोय किंवा ज्या व्यक्ती विषयी बोलतोय, त्या व्यक्तीमध्ये ईश्वर आहे, हे जर आपल्या प्रत्येकाला उमगलं, तर आपण त्या व्यक्तीशी खोटं बोलू शकणार नाही / नाटकीपणाने बोलू शकणार नाही / त्याच्यावर आरडाओरडी करू शकणार नाही / त्याला घालून पाडून बोलू शकणार नाही / त्याला फसवू शकणार नाही / त्याला खोटी आश्वासने देऊ शकणार नाही / कुठेहि भेसळ करू शकणार नाही / भ्रष्टाचार करू शकणार नाही. यामुळे सगळेच नातेसंबंध / मैत्रीसंबंध आणि व्यवहार स्वच्छ होतील, आणि राहतील.

आपण अनेक मंदिरांची यात्रा करतो, देवांची पूजा करतो, देवांचे सण साजरे करतो, पण आपल्याला देवदर्शन कधीच होत नाही. कारण देवळातला देव म्हणत असेल, इथे तू माझ्यासमोर हात जोडतो आहेस / माझ्या आरत्या करतो आहेस आणि बाहेर गेल्यानंतर तू लोकांना म्हणजेच मला (कारण सगळ्याच व्यक्तींमधे देव आहे) फसवतो आहेस / लोकांना म्हणजेच मला शिवीगाळ करत आहेस, तुला मी कस काय दर्शन देणार आणि तुझ्यावर कसा प्रसन्न होणार!

समोरच्या व्यक्ती मधे देव आहे हे जर आपल्याला मनापासून पटलं, तर आपलं आचरण आपोआपच भक्तासारखं होईल आणि मग देव स्वतः आपल्या दाराशी दर्शन देण्याकरता येईल हे नक्की. पुराणकाळात अशी उदाहरणे भरपूर आहेत.

आता दुसरा भाग म्हणजे, स्वतःमधे देव आहे, हे जर आपल्या मनात रुजलं तर एक गोष्ट सहज लक्षात येईल, की, आपले स्वतःचे शरीर हेच त्या देवाचे मंदिर होते. देवाचे वास्तव्य जागृत ठेवायचे असेल तर ते मंदिर म्हणजेच आपण आपले शरीर आणि मन हे दोन्ही स्वच्छ आणि पवित्र ठेवायलाच पाहिजे. आणि हे अगदी सोपे आहे. आपण याकरिता काय करायला पाहिजे –

रोज आपल्या शरीराची बाहेरून स्वच्छता करायला पाहिजे. नियमित व्यायाम, नियमित फिरणे, नियमित प्राणायाम, आपल्या आवडी / छंद जपणे, चांगले खाणेपिणे, वेळेवर झोपणे आणि उठणे, हे करायलाच पाहिजे. आपली घरची / बाहेरची कामे, नोकरी, व्यवसाय, हे सगळे नेहेमीच मन लावून करायलाच पाहिजेत. सगळ्यांशी प्रेमानी बोलणे / वागणे / कायम चेहेरा हसरा ठेवणे, यामुळे मन स्वच्छ राहते. कुणाही कडून अपेक्षा न ठेवणे यामुळे पण मन स्वच्छ राहते.

तुकाराम महाराजांचं याच विषयावर एक सुंदर भजन आहे –

 देह देवाचे मंदिर, आत आत्मा परमेश्वर l 

 देव देहात देहात, का हो जाता देवळात l 

 तुका सांगे मूढ जना, देही देव का पहाना II

गजानन महाराजांच्या मंत्राचा सोपा अर्थ आता लक्षात आला असेलच. 

चला तर मग आपण सगळेच जण आजपासून आचरणात आणूया 

गण गण गणात बोते l

गण गण गणात बोते l

 © श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११३ आणि ११४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११३ आणि ११४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ११३ – –

जनीं हीत पंडित सांडीत गेले ।

अहंतागुणे ब्रह्मराक्षेस झाले ।

तयाहूनि वित्पन्न तो कोण आहे ।

मना सर्व जाणीव सांडूनि राहे ।।११३।।

अर्थ : मोठमोठया पंडितांनी आत्महिताचा जो योग्य मार्ग होता, तो सोडून दिला. त्यांच्यामध्ये (आपल्या ज्ञानाचा) अहंकार निर्माण झाल्याने ते मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षस झाले. खरे तर अशा लोकांपेक्षा विद्वान कोण असू शकेल? तेव्हा हे मना, आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगू नकोस.

(हीत सांडीत गेले – आत्मकल्याणाचा श्रेयस्कर मार्ग सोडला, अहंता- गर्व/अभिमान, वित्पन्न – विद्वान, जाणीव – अहंकार)

विवेचन : आपल्या ज्ञानाचा व्यर्थ अहंकार बाळगणाऱ्या विद्वान किंवा पंडितांची मरणोत्तर कशी अवस्था होते ते समर्थांनी या श्लोकात सांगितले आहे. समर्थांच्या या सांगण्याला त्यांच्या आणि त्यांच्या काळातील परिस्थिती कारणीभूत होती. १३ व्या शतकापासून ते अगदी समर्थांच्या काळापर्यंत बऱ्याच शास्त्री पंडितांना आपल्या ज्ञानाचा अतिशय अहंकार होता. काही ग्रंथांचे अध्ययन केले म्हणजे ते स्वतःला प्रकांड पंडित समजत. आपल्यापेक्षा अधिक ज्ञानी कोणी नाही असा अहंकार त्यांना होई. असे पंडित मग आपल्या विद्वत्तेचे प्रदर्शन करण्यासाठी देशोदेशी फिरत. तेथील विद्वानांना चर्चेत हरवून आपण श्रेष्ठ असल्याचे प्रशस्तिपत्रक मिळवीत आणि अभिमानाने ते मिरवीत. अशाच अभिमानी पंडितांनी साधुसंतांना त्रास दिला आहे. आयुष्यभर त्यांचा हाच विद्वत्तेचा अहंकार कायम राहिल्याने अंतकाळी देखील आपण वादात दुसऱ्याला हरवतो आहोत असे दृश्य त्यांना दिसत असे. ‘ अंते मती सा गती ‘ असे म्हटले जाते. असे विद्वान साहजिकच मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षस होत असत. आपल्याकडे अशी समजूत होती की अशा अभिमानी पंडितांना मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षसाची पिशाच्च योनी प्राप्त होते. समर्थ म्हणतात की खरं तर यांच्यापेक्षा विद्वान कोण असू शकत होतं? पण त्यांनी आपल्या ज्ञानाचा सदुपयोग आत्मकल्याणासाठी न करता आपले पांडित्य मिरवण्यासाठी केला.

संत ज्ञानेश्वरांनी आपल्या ग्रंथरचनेचे श्रेय आपले गुरु आणि ज्येष्ठ बंधू निवृत्तीनाथ यांना दिले. स्वामी विवेकानंदांनी आपल्या ज्ञानाचे श्रेय रामकृष्ण परमहंसांना दिले. समर्थ तर स्वतःला रामाचे दास म्हणवून घेत. कोणीही आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगला नाही किंवा श्रेय आपल्याकडे घेतले नाही. तुकाराम महाराज तर ‘ फोडिले भांडार, धन्याचा हा माल । मी तंव हमाल भारवाही । असे म्हणतात. एवढी नम्रता संतांकडे असते.

समर्थांच्या चरित्रात एक मजेशीर घटना वाचायला मिळते. समर्थांच्या काळी वामन पंडित म्हणून एक विद्वान होऊन गेले. त्यांचे संस्कृतवर प्रभुत्व होते आणि त्यांनी संस्कृतात ग्रंथरचना केली होती. परंतु सर्वसामान्यांना संस्कृत ग्रंथ वाचणे शक्य नसल्याने त्यांना समर्थांनी मराठीत लिहा म्हणून सांगितले. पण झाले उलटच! हे वामन पंडित समर्थांनाच नावे ठेवू लागले आणि तुम्हीच उलट संस्कृतमध्ये लिहा असे त्यांनी समर्थांना सांगू लागले. एक दिवस प्रवास करीत असताना वामन पंडितांना अंधार झाल्याने एका मोठया झाडाखाली मुक्कामासाठी थांबावे लागले.

त्या झाडाच्या एका फांदीवर एक ब्रह्मराक्षस बसला होता. थोड्याच वेळात तिथे एक दुसरा ब्रह्मराक्षस आला. तो पहिल्या ब्रह्मराक्षसाला म्हणाला, ” मी या शेजारच्या फांदीवर राहू शकतो का? ” तेव्हा तो ब्रह्मराक्षस म्हणाला, ” तू दुसरी जागा शोध. ही जागा मी वामन पंडितांसाठी राखून ठेवली आहे. ” हे ऐकताच वामन पंडितांना दरदरून घाम फुटला. पुढील जन्मी आपण ब्रह्मराक्षस होऊ या भीतीने त्यांची बोबडी वळली. सकाळी धावतच जाऊन त्यांनी समर्थांचे पाय धरले आणि क्षमा मागितली. त्यावेळी समर्थांची प्रशंसा करताना त्यांच्या मुखातून पुढील रचना बाहेर पडली जी आजही समर्थ संप्रदायात म्हटली जाते.

शुकासारिखे पूर्ण वैराग्य ज्याचे । वसिष्ठापरी ज्ञान योगेश्वराचे ।

कवी वाल्मिकीसारिखा मान्य ऐसा ।नमस्कार माझा तया रामदासा ।।

– तेव्हा आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगून आत्मकल्याणाचा हितकारक मार्ग सोडू नये, आपल्या ज्ञानाचा उपयोग लोककल्याणासाठी व्हावा हेच समर्थांना येथे सांगायचे आहे.

स्वसंवाद

१. माझ्याकडे असलेल्या पदव्या, ज्ञान किंवा माहितीचा मला वामन पंडितांसारखा ‘व्यर्थ अहंकार’ तर झालेला नाही ना?

२. मी माझ्या ज्ञानाचा उपयोग संतांसारखा समाजाच्या ‘आत्मकल्याणासाठी’ आणि हितासाठी करतो, की केवळ चर्चेत दुसऱ्याला हरवून स्वतःचे ‘पांडित्य मिरवण्यासाठी’ करतो?

३. तुकाराम महाराजांच्या उक्तीप्रमाणे, “मी केवळ एक हमाल असून हे सर्व ज्ञान त्या भगवंताचे आहे” अशी नम्रता माझ्या ठायी आहे का?

४. मृत्यूच्या अंतापर्यंत जर मी माझा ज्ञानाचा किंवा पदाचा अहंकार सोडला नाही, तर माझ्याही वाट्याला वैचारिक किंवा शापयुक्त ‘ब्रह्मराक्षसाचे’ जिणे तर येणार नाही ना?

====

 श्लोक क्र. ११४ – – 

फुकाचे मुखीं बोलता काय वेचे ।

दिसेंदीस अभ्यंतरी गर्व सांचे ।

क्रियेवीण वाचाळता वेर्थ आहे ।

विचारे तुझा तूंचि शोधून पाहें ।।११४।।

अर्थ : उगीचच बडबड करून व्यर्थ ज्ञान पाजळल्याने काहीच साधत नाही. मनातील अहंकार मात्र दिवसेंदिवस वाढतो. आचरण न करता केलेली बडबड व्यर्थ आहे. म्हणून हे मना, ही गोष्ट खरी आहे की नाही हे तू स्वतः शोधून काढ.

(काय वेचे – काही साधत नाही, अभ्यंतरीं – अंतरात, साचे – साठत जातो)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगणाऱ्या विद्वानांची अंती काय गत होते ते समर्थांनी आपल्याला सांगितले. या श्लोकात ते व्यर्थ पोकळ बडबड करून आपल्या ज्ञानाचे प्रदर्शन करणाऱ्या दांभिक लोकांवर कोरडे ओढतात. ‘ उथळ पाण्याला खळखळाट फार ‘ अशी आपल्याकडे म्हण आहे. थोडाफार अभ्यास केलेली माणसे आपल्याला फार कळते म्हणून व्यर्थ बडबड करीत असतात. कीर्तन, प्रवचने किंवा सभा संमेलनात अशी अनेक माणसे आपण पाहतो. त्यांच्याजवळ उत्तम वक्तृत्व असते. आपल्या वक्तृत्व कौशल्याच्या जोरावर ते श्रोत्यांवर प्रभाव टाकण्यात यशस्वी होतात. त्यातून त्यांचा अहंकार फुलत जातो. त्यांना कोणी काही सांगितले तरी त्यांची ऐकून घेण्याची तयारी नसते. आपल्या पांडित्याच्या जोरावर आपलेच म्हणणे कसे बरोबर आहे हे ते दुसऱ्यांना पटवून देण्याचा प्रयत्न करतात.

आजकाल ज्ञान देणारी खूप साधने उपलब्ध झाली आहेत. दूरदर्शन, वृत्तपत्रे, समाजमाध्यमे यातून दररोज निरनिराळी माहिती आपल्यापर्यंत पोहोचत असते. पण त्यातील खरी किती आहे, त्याला खरोखर अनुभवाची जोड आहे का हे पारखून घेणे महत्त्वाचे असते. जो तो माझेच म्हणणे कसे बरोबर असे सांगून आपले मत लोकांच्या माथी मारण्याचा प्रयत्न करीत असतो.

व्यवहारात आपण अशी अनेक माणसे पाहतो की जी व्यासपीठावरून बोलतात एक आणि करतात वेगळेच. वैयक्तिक जीवनात त्यांच्या वागण्यात विसंगती आढळते. हा शुद्ध दांभिकपणा आहे. आपण जे काही सांगतो, त्यामागे काही एक तपश्चर्या किंवा साधना असणे आवश्यक असते. जे ज्ञान आपण प्राप्त केलेले असते, ते आचरणात आणणे ही पहिली पायरी आहे. नंतरच ती गोष्ट लोकांना सांगण्याचा अधिकार आपल्याला प्राप्त होतो. ‘अभ्यासोनि प्रकटावे ‘असे समर्थांचे सांगणे आहे. एखादी गोष्ट केवळ आपल्याला माहीत आहे पण आपण स्वतः ती कधी आचरणात आणली नाही अशी गोष्ट दुसऱ्यांना सांगू नये. आपल्या बोलण्याला तेव्हाच वजन प्राप्त होते, जेव्हा आपण ती गोष्ट आचरणात आणतो. नाहीतर ती केलेली बडबड व्यर्थ आहे. म्हणूनच समर्थ म्हणतात, ‘ क्रियेवीण वाचाळता व्यर्थ आहे. ‘ 

स्वतःचे मन हा आपले प्रतिबिंब पाहण्याचा एक उत्तम आरसा आहे. आपण बोललो आहे ते कितपत बरोबर आहे, आपण स्वतः ते आचरणात आणतो का हे आपले मन आपल्याला सांगत असते. म्हणून प्रत्येकाने आत्मपरीक्षण करून आपल्या वागण्याबोलण्याविषयी विचार करावा. म्हणूनच समर्थ या श्लोकातील शेवटच्या चरणात म्हणतात, ‘ विचारे तुझा तूंचि शोधूनि पाहे. ‘ प्रत्येक श्लोकाच्या शेवटी दिलेले स्वसंवादाचे प्रश्न देखील असेच आत्मपरीक्षण आपल्याकडून व्हावे यासाठी आहेत.

स्वसंवाद : 

१. मी चारचौघांत किंवा समाजमाध्यमांवर जे मोठे विचार मांडतो, ते मी केवळ ‘वक्तृत्वाचा प्रभाव’ पाडण्यासाठी मांडतो की प्रत्यक्षात आचरणातही आणतो?

२. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, माझ्या व्यर्थ बडबडीतून किंवा वाद घालण्यातून माझ्या अंतरात केवळ ‘गर्व’ साठत चालला आहे का?

३. माझ्याकडे येणारी कोणतीही माहिती किंवा ज्ञान पुढे सांगण्याआधी मी ‘अभ्यासोनि प्रकटावे’ या सूत्राचा अवलंब करतो का?

४. ‘क्रियेवीण वाचाळता व्यर्थ आहे’ हे ओळखून, मी माझ्या स्वतःच्या मनालाच आरसा बनवून माझ्या ‘कथनी आणि करणीतील’ फरकाचे आत्मपरीक्षण करण्यास तयार आहे का?

– क्रमशः श्लोक ११३ आणि ११४

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ चला पुन्हा एकदा निसर्गाकडे वळू या.. – लेखक : श्री गजानन गाडेवार ☆ प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ चला पुन्हा एकदा निसर्गाकडे वळू या.. – लेखक : श्री गजानन गाडेवार ☆ प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

☆

ला पुन्हा एकदा निसर्गाकडे वळूया…

ऋषी कपूर – कर्करोग

सोनाली बेंद्रे – कर्करोग

अजय – लॅटरल एपिकॉन्डिलायटिस (खांद्याचा गंभीर आजार)

इरफान खान – कर्करोग

मनीषा कोईराला – कर्करोग

युवराज सिंग – कर्करोग

सैफ अली खान – हृदयविकाराचा झटका

हृतिक रोशन – मेंदूतील रक्ताची गुठळी

अनुराग बसू – रक्ताचा कर्करोग

मुमताज – स्तनाचा कर्करोग

शाहरुख खान – ८ शस्त्रक्रिया (गुडघा, कोपर, खांदा, इत्यादी)

ताहिरा कश्यप (आयुष्मान खुरानाची पत्नी) – कर्करोग

राकेश रोशन – घशाचा कर्करोग

लिसा रे – कर्करोग

राजेश खन्ना – कर्करोग

विनोद खन्ना – कर्करोग

नर्गिस – कर्करोग

फिरोज खान – कर्करोग

टॉम ऑल्टर – कर्करोग…

– – हे असे लोक आहेत/होते ज्यांच्याकडे पैशांची कमतरता नव्हती!

ते नेहमी आहारतज्ज्ञांनी सांगितलेलेच अन्न खातात.

ते वातानुकूलित जागेत राहणाऱ्या गायी किंवा म्हशींचे दूध पितात आणि बिस्लेरीचे पाणी पितात.

ते व्यायामशाळेत जातात.

ते नियमितपणे संपूर्ण शरीराच्या वैद्यकीय तपासण्या करून घेतात.

प्रत्येकाचे स्वतःचे उच्चशिक्षित डॉक्टर असतात.

 

आता प्रश्न असा निर्माण होतो की: आपल्या शरीराची इतकी काळजी घेऊनही, त्यांना अचानक इतके गंभीर आजार कसे झाले?

– – कारण ते नैसर्गिक गोष्टींचा वापर खूप कमी करतात—किंवा त्याचा अजिबात विचार करत नाहीत.

 

निसर्गाने आपल्याला जे काही दिले आहे, त्याचे मूळ स्वरूपातच सेवन करा; ते तुम्हाला कधीही हानी पोहोचवणार नाही.

तुम्ही कितीही फ्रुटी प्या, ती तुमच्या शरीराला खऱ्या आंब्याचे फायदे देऊ शकत नाही.

 

– – जर आपण या पृथ्वीला प्रदूषित केले नसते, तर थेट जमिनीतून काढलेले पाणी बाटलीबंद पाण्यापेक्षा लाखो पटीने चांगले असते.

– – जर तुम्ही नवजात बालकाला पूर्णपणे जंतूमुक्त ठिकाणी ठेवले आणि मोठे झाल्यावर त्याला सामान्य वातावरणात राहू दिले, तर ते बाळ साधा तापसुद्धा सहन करू शकणार नाही!

 

कारण त्यांच्या शरीराच्या मज्जासंस्थेला/रोगप्रतिकारशक्तीला जंतूंविरुद्ध प्रतिकारशक्ती विकसित करण्याची संधीच मिळाली नाही.

 

कंपन्यांनी लोकांना इतके घाबरवले आहे, की जणू काही एक दिवस साबणाने अंघोळ न केल्यास तुमच्याभोवती जंतू पसरतील आणि संध्याकाळपर्यंत तुमचा मृत्यू निश्चित आहे.

– आपण कुठे जगत आहोत हे समजणे कठीण आहे. आपण पाहतो की लोक कोणाशी तरी हस्तांदोलन केल्यावर लगेच हँड सॅनिटायझर लावतात.

 

माणसाला वाटते: आपण केवळ पैशाच्या जोरावर जीवन जगू शकतो.

तुमच्या कधी लक्षात आले आहे का? शहरांमध्ये पिझ्झा आणि बर्गर खाणाऱ्या लोकांना हलका ताप येतो आणि ते गरगरू लागतात.

– त्याच वेळी, दूध, दही आणि ताक आवडणारे गावातील वृद्ध लोक त्याच तापातून कोणत्याही औषधाशिवाय बरे होतात.

– – कारण निसर्ग हा त्यांचा डॉक्टर आहे.

कारण त्यांनी नेहमीच साधे अन्न खाल्ले आहे.

 

नैसर्गिक गोष्टींचा अवलंब करा!

विज्ञानाने प्रयोगशाळेत तयार केलेली प्रत्येक वस्तू शरीरासाठी हानिकारक आहे!

पैशाने आरोग्य आणि आनंद कधीही विकत घेता येत नाही.

चला पुन्हा एकदा निसर्गाकडे वळूया…

***

लेखक : गजानन गाडेवार

प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ ‘नाही’ची शिकवण… – लेखक : श्री रविंद्र दातार ☆ रमा मोडक ☆

रमा मोडक

📖 वाचताना वेचलेले 📖

☆ ‘नाही’ची शिकवण… – लेखक : श्री रविंद्र दातार ☆ रमा मोडक ☆

ध्रुव सिएटलमधील Costco स्टोअरमध्ये गेला होता.

स्टोअरच्या बाहेर त्याला एक छोटा मुलगा दिसला, जेमतेम पाच वर्षांचा. हातात चिप्सची पाकिटं आणि एक छोटा बोर्ड – त्यावर लिहिलं होतं, “स्काऊट चॅरिटी फंडसाठी – एक पाकीट $20”

लोक त्याच्या बाजूने जात होते.

पाच वर्षांच्या मुलाच्या निरागसतेने आणि आत्मविश्वासाने तो एक-एकाला थांबवत होता:

“तुम्हाला एक पाकीट हवंय का? “

काही जण घेत होते.

बरेच जण हसून नम्रपणे म्हणत होते, “नको, थँक्यू. “

पण तो छोटा मुलगा निराश दिसत नव्हता.

तो फक्त हसायचा, पुढच्या व्यक्तीकडे वळायचा आणि पुन्हा प्रयत्न करायचा.

ध्रुव थांबला आणि त्याच्याकडून एक पाकीट विकत घेतलं.

मुलगा आनंदाने हसला आणि म्हणाला, “थँक्यू! “

कुतूहलाने ध्रुवने त्याला विचारलं,

“अजून किती पाकिटं विकायची आहेत? आणि तू इथे किती वेळ थांबणार आहेस? “

त्याचं उत्तर ध्रुव आणि कदाचित आपण सगळेच कायम लक्षात ठेवू.

“100 जण ‘नाही’ म्हणतील तोपर्यंत. “

ध्रुवला आश्चर्य वाटलं.

तेव्हा त्याच्या शेजारी उभ्या असलेल्या शिक्षिका म्हणाल्या:

“त्याने किती पाकिटं विकली हे महत्त्वाचं नाही. महत्त्वाचं हे आहे की, या वयात त्याने ‘नाही’ ऐकायला शिकावं… ते स्वीकारायला शिकावं… आणि तरीही पुढच्या व्यक्तीला विचारायचं धाडस ठेवावं. “

काय धडा होता हा!

आपण आपल्या मुलांना यशस्वी कसं व्हायचं, हेच शिकवण्यात किती वेळ घालवतो.

मन लावून अभ्यास कर.

पहिला नंबर आण.

स्पर्धा जिंक.

सिलेक्ट हो.

अजून जास्त मिळव.

पण कदाचित आपण त्यांना देऊ शकणारी सगळ्यात मोठी भेट म्हणजे त्यांना अपयश कसं पचवायचं, हे शिकवणं.

आत्मविश्वास न गमावता ‘नाही’ कसं ऐकायचं.

हरल्यासारखं न वाटता नकाराला कसं सामोरं जायचं.

पडूनही पुन्हा उठायला न घाबरणं.

एक नकार म्हणजे आपली किंमत संपली नाही, हे समजणं.

कारण आयुष्य नेहमीच ‘हो’ म्हणणार नाही.

कधी परीक्षा नापास होऊ, कधी संधी हुकतील, कधी मुलाखतीत नाकारले जाऊ, नाती तुटतील आणि स्वप्नांना वेळ लागेल.

यश आपल्याला आनंदी करतं.

पण अपयश हाताळायला शिकणं आपल्याला मजबूत करतं.

तो पाच वर्षांचा छोटा मुलगा Costco बाहेर फक्त चिप्स विकत नव्हता.

तो धाडसाचा सराव करत होता.

तो ‘नाही’ गोळा करत होता.

तो जिद्द शिकत होता.

तो आयुष्यासाठी तयार होत होता.

म्हणून आपल्या मुलांना फक्त,

“तू जिंकलास का? ”

असंच न विचारता, कधी तरी हेही विचारूया,

“तू अपयशानंतर पुन्हा प्रयत्न केलास का? “

फक्त यशासाठी तयार असलेलं मूल घडवू नका.

अपयशाला न घाबरणारं मूल घडवा.

त्या शिक्षिकेला सलाम.

त्याच्या आई-वडिलांना सलाम.

आणि त्या छोट्या मुलाला सलाम, ज्याने मोठ्या जगाला खूप मोठा धडा शिकवला:

कधी कधी, एका ‘हो’ पेक्षा शंभर ‘नाही’ जास्त शिकवून जातात.

 

लेखक: श्री रविंद्र दातार

प्रस्तुती : रमा मोडक

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ जगणे आपसुक होई सोने!!… ☆ नीलांबरी शिर्के ☆

नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

 

☆ जगणे आपसुक होई सोने!! ☆ नीलांबरी शिर्के ☆

☆

निर्मळ पाणी

वाहे खळखळ

धुवून टाकी

वस्त्रातील मळ!!

*

तसेच हसऱ्या 

त्यांच्या संवादी

होते आपसुक

मनही निर्मळ!!

*

शुभ्र वसन

अन शुद्ध मनाने

जगणे आपसुक

होई सोने!!

☆

©  सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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