श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – समतल वृत्त…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “माह सितंबर और हिंदी…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆
आलेख ☆ माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
लो सितंबर का महीना भी आ गया। सितंबर का महीना मतलब हिंदी का महीना। आम जनता पर तो कोई अंतर नहीं पड़ता परंतु केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों पर पड़ता है और वे हिंदी मय हो जाते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगीं संस्थाओं में हिंदी के प्रति एक जागृति की भावना पैदा हो जाती है जो साल भर तक उन्हें अनुप्राणित करती रहती है। हिंदी के सुनामधन्य लेखक व कवि प्रतिस्फूर्त हो जाते हैं और स्वर्गीय लेखक कवि भी जीवन पा जाते हैं। क्या हिंदी और क्या हिंदीतर राज्य व क्षेत्र सभी हिंदीमय हो जाते हैं। किसी समारोह या कार्यक्रम में जिन्हें कोई स्थान नहीं मिल पाता वे हिंदी के साथ हो रहे छल के हिमायती बन जाते हैं। पर सितंबर माह हिंदी का माह तो होता ही है।
जहाँ जहाँ हिंदी विभाग हैं उनसे जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, प्राध्यापक व अध्यापक स्फूर्ति से भर उठते हैं। सभी किसी न किसी हिंदी के विद्वान को बुला कर अपने संस्थान के अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों में हिंदी के प्रति एक नया जोश भर देना चाहते हैं। कोई अपने संस्मरण सुनाते हैं हिंदी की गौरव गाथा व अधोमुखी गाथा के। वे अपने सामने उपस्थित वृंद को मोहित कर देना चाहते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण याद आता है। बात पुरानी है। हिंदीतर क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.फिल के विद्यार्थियों को प्रोफेसर साहब पढा रहे थे कि हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं कि 1936 में कांग्रेस ने हिंदी को अपने एक अधिवेशन में राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी। जब उनसे पूछा गया कि संविधान में हिंदी को भारत संघ की राजभाषा बनाया गया था लेकिन आप यह क्या बता रहे हैं तो वे प्रोफेसर साहब मायूस होकर बोले कि विभाग बना दिया, प्रयोजन मूलक हिंदी की उच्च शिक्षा भी प्रारंभ कर दी लेकिन उसका न तो कोई पाठ्यक्रम है और न ही पुस्तकें। हम जहाँ तहाँ से नोट्स बनाकर पढ़ाते हैं। संस्थान जो केवल सितंबर में हिंदी संबंधी कार्यक्रम करते हैं वे वक्ताओं से उच्च स्तर की नई बात जानना चाहते हैं।
वाक्पटु वक्ता वाह-वाही पाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और जो श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते वे ऐसे आमंत्रण से वंचित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि न वक्ता अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही श्रोता। हिंदी को मान्यता न देने के इच्छुक तो संविधान की ही आलोचना करते हैं कि संविधान में 15 वर्ष तक हिंदी को राजभाषा बनाया गया परंतु अंग्रेजी में काम करते रहने की छूट को अनिश्चितकालीन छूट दे दी तो हिंदी का राजभाषा पद अपने आप ही लुप्त हो गया। तमाम तर्क वितर्क प्रस्तुत होते हैं परंतु हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रुप में सम्मान नहीं देना चाहते। भारत संघ कोई स्थान या क्षेत्र विशेष नहीं है, संपूर्ण भारत है जिसमें सभी प्रदेश व क्षेत्र शामिल हैं और भारत का अस्तित्व उसके सभी मंत्रासय और उनसे संबद्ध अधीनस्थ कार्यालय, विभाग व उपक्रम आदि हैं चाहे वे कहीं भी स्थित हों। हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाएगा तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान कम नहीं होता।
विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली समझी जाती है और वह विश्व में दूसरे स्थान पर है लेकिन भारत में हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदी बोलना तक अपराध जैसा माना जाता है, ऐसा महसूस होता है। विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ राष्ट्रभाषा नहीं है और अनेक राजभाषाएं भी हैं, परंतु नफ़रत की भावना होने का कोई समाचार नहीं मिलता। भारत में यही अफ्सोस जताया जाता है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया जाता और राष्ट्रभाषा चाहते भी हैं।
प्रौद्योगिकी, कंप्यूटरीकरण और ए.आई. ने विश्व में भाषायी अंतर बहुत कम कर दिया है और एक भाषा न जानने वाला भी उस भाषा में काम कर सकता है। अब जरूरत है हर भाषा के प्रति प्रेम की। फिर भी जिस तरह विश्व के सभी देशों में भारत की भाषा हिंदी मानी जाती है वैसे ही भारत में भारत संघ की राजभाषा को हर नागरिक द्वारा माना जाए और उसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाए तो हिंदी को संविधान सम्मत स्थान व सम्मान अवश्य प्राप्त होगा। हिंदी का उत्थान चाहने वाले विद्वानों व संस्थाओं के प्रयासों को सम्मान दिया जाए। विश्व के हर देश में हिंदी का प्रचार प्रसार व उसका उत्थान करने वाली संस्थाओं व उनसे जुड़े विद्वानों को हृदय से सम्मान दिया जाए। फिर केवल सितंबर माह ही हिंदी मय नहीं होगा, पूरा वर्ष हिंदी मय होगा।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)
साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।
कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”
नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।
अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”
उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।
वह पलटा।
सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।
नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।
“पिहू… तुम?”
पिहू ने काँपते स्वर में कहा—
“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”
नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।
“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”
पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—
“मुझे विश्वास था।”
नीर ने पूछा—
“कैसे?”
पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—
“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”
कुछ पल दोनों मौन रहे।
फिर पिहू ने धीरे से पूछा—
“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”
नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—
“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”
“और अगर मैं चल भी न सकी?”
“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”
पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।
उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।
सूरज डूब चुका था।
नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।
और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट।)
☆ चुभते तीर # १३२ – व्यंग्य – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
वर्मा जी के घर में दिवाली की सफ़ाई किसी राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान से कम नहीं थी। इस अभियान के सेनापति थे वर्मा जी स्वयं, और उनकी एकमात्र सिपाही थीं उनकी पत्नी, जिनकी पारखी नज़र से सोफ़े के पीछे फंसी मकड़ी की जाली भी नहीं बच सकती थी। इस बार का मुख्य लक्ष्य था—ड्रॉइंग रूम का वह पुराना लाल सोफ़ा, जो पिछले दस सालों से एक ही जगह पर अंगद के पैर की तरह जमा हुआ था।
वर्मा जी ने गहरी सांस ली, अपनी धोती कसकर बांधी और सोफ़े को खिसकाना शुरू किया। सोफ़ा थोड़ा सा खिसका ही था कि उसके नीचे से धूल के बादलों के साथ लाल रंग का एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा बाहर निकला। वर्मा जी ने झट से झुककर उसे उठाया। वह दो सौ रुपये का एक पुराना नोट था। वर्मा जी के चेहरे पर ऐसी चमक आई जैसे किसी गोताखोर को समुद्र की गहराई में मोती मिल गया हो।
“अरे वाह! किस्मत हो तो ऐसी,” वर्मा जी ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा।
पत्नी ने तुरंत झाड़ू हाथ में संभाली और कड़क आवाज़ में बोलीं, “ज़्यादा खुश मत होइए, यह वही नोट है जो तीन महीने पहले आपके कुरते की जेब से गिरा था और आपने मुझ पर शक किया था कि मैंने चुरा लिया।”
वर्मा जी का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा, लेकिन सोफ़े के नीचे छिपे खज़ाने की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने सोफ़े को और ज़ोर से धक्का दिया। इस बार सोफ़े के कुशन के बीच की दरार से एक काला लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा।
माहौल में अचानक सन्नाटा छा गया। लिफ़ाफ़े पर किसी का नाम नहीं लिखा था। वर्मा जी ने पत्नी की तरफ देखा, पत्नी ने वर्मा जी की तरफ। दोनों की आंखों में जासूसी वाली चमक थी।
“इसे मत खोलना,” पत्नी ने चेतावनी दी, “हो सकता है यह तुम्हारे किसी दोस्त की उधारी का हिसाब हो, जो तुम मुझसे छुपा रहे थे।”
“या फिर हो सकता है कि तुम्हारी उस सुनारी की पर्ची हो, जिसकी किश्त तुमने गुप्त रूप से जमा की थी,” वर्मा जी ने पलटवार किया।
दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि दिवाली की सफ़ाई का युद्ध अब एक पारिवारिक अदालत में बदल चुका था। पड़ोस के शर्मा जी भी शोर सुनकर दरवाज़े पर आ खड़े हुए। मामला बहुत गंभीर हो चुका था। लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था और दोनों पक्ष उसे ऐसे घूर रहे थे जैसे वह कोई टाइम बम हो।
आखिरकार शर्मा जी को मध्यस्थ बनाया गया। शर्मा जी ने चश्मा सीधा किया, लिफ़ाफ़ा उठाया और कांपते हाथों से उसकी सील तोड़ी। अंदर से कागज़ का एक छोटा सा पन्ना निकला।
शर्मा जी ने पन्ना पढ़ा और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। वर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों एक साथ चिल्लाए, “क्या लिखा है उसमें?”
शर्मा जी ने कागज़ सीधा करके दिखाया। उस पर लिखा था: “यदि आप यह लिफ़ाफ़ा पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपने आखिरकार दस साल बाद इस सोफ़े को खिसकाने की ज़हमत उठाई है। धन्यवाद! – सोफ़ा बेचने वाला दुकानदार।”
पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। वर्मा जी और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे को देखा, अपनी मूर्खता पर मुस्कुराए और ज़ोरदार तालियां बजाने लगे। दिवाली का बोनस भले न मिला हो, लेकिन दस साल पुरानी सुस्ती का जवाब ज़रूर मिल गया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “ईमानदारी की अकड़ …“।)
अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ श्री प्रदीप शर्मा
मौन म्हणजे चूप राहणं, निशब्द असणं. मौन पाळणं, म्हणजे न बोलणं.
मौन पाळणं जर साधलं तर आपल्या जिभेवर आपला संयम राहतो. मौनात एक विलक्षण सामर्थ्य आहे. न बोलता खूप काही साधता येतं.
मौन राहून एखादं काम करताना एकाग्रता वाढते. वाढलेली एकाग्रता कामातली उत्कटता वाढवते. काम अधिक चांगले होतं.
कधी कधी बोलून सांगून न जमणाऱ्या गोष्टी मौन साधून साधता येतात. मौन साधणारा अंतर्मुख होतो. त्यामुळे तो आत्मपरीक्षण करू शकतो. वरवर सोपी, साधारण वाटणारी क्रिया; आत्मिक उन्नतीचा साधा मार्ग आहे. जसे पैसे वापरले की संपतात. वापर केल्याने वीज संपते, पाणी संपते आणि त्यातील ऊर्जा संपत्ती नष्ट होते. त्याचप्रमाणे आपण बोलून आपली ऊर्जा, आपली शक्ती नष्ट करतो. विजेचा संचय केल्यास ऊर्जा साठून राहते. अगदी त्याचप्रमाणं, मनाचं मौन पाळल्यास आपल्या अंतरीक ऊर्जेचा ऱ्हास थांबतो. आपली शक्ती वाढते.
योग्य वेळी शांत राहणं महत्त्वाचे असतं. मौनामुळं भांडणं, वादविवाद टाळता येतात. शांतता टिकून राहते.
तसं पाहिलं तर, वाणी ही मानवाला मिळालेली देणगी आहे. डोळे, नाक, कान, त्वचा आणि याबरोबरच जीभ हे देखील महत्त्वाचं ज्ञानेन्द्रिय आहे. जिभेचा उपयोग आपण बोलण्यासाठी आणि चव घेण्यासाठी करतो. दोन्हींचा अतिरेक घातकच ठरतो. मौनव्रत म्हणजे मानसिक तपच आहे. परंतु वाणीला विराम देणं इतकं सोपं नाही. सर्वांनाच ते जमत नाही. आपल्यामध्ये काहीजण असे असतात की, त्यांच्या तोंडात तीळही भिजत नाही. न बोलता राहणं अशक्यप्राय असतं बऱ्याच जणांच्यासाठी! त्यांची जीभ सतत चालू असते. विषय कोणताही असो, त्यातील काही माहिती नसली, तरी ते बोलत असतात. बोलण्यासाठी काही असो वा नसो पण त्यांच्या बडबडीत खंड पडत नाही.
समंजस लोक कमी बोलतात.त्यांना त्याचे काही फायदेही मिळतात. काही गोष्टी साध्य होतात.
मौन पाळणं म्हणजे तोंडानं न बोलणं एवढाच मर्यादित अर्थ नाही हं. खाणाखुणा करणं, लिहून दाखवणं, चेहऱ्यावर विविध भाव प्रगट करणं, मान हलवणं यातलं काहीही न करता राहणं म्हणजे खरं मौन. मौनकाळात व्यावहारिक गोष्टींचा विचार करायचा नसतो. कोणते; अगदी कोणतेच विचार मनात आणायचे नसतात. चित्ताची एकाग्रता वाढवण्याचा प्रयत्न मात्र करत राहायचं असतं. म्हणून चिंतन करण्याची कला मौनव्रतामुळे शिकून घेता येते. त्यामुळे विकारांवर ताबा मिळवता येतो. काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आणि मत्सर असे विकार मनात उत्पन्न होत असतात. मनातील विचारांनी या षड्रिपुंना खतपाणी घातलं जातं. विचारांमुळे शरीराची ऊर्जा खर्ची पडते. अस्वस्थता वाढते. केवळ वाणीनेच नाही तर, मनातल्या मनात बोलणेही बंद करता आलं पाहिजे. मग या षड्रिपुंना जिंकता येईल. म्हणून नेहमी नेहमी नाही तरी, प्रसंग परत्वे मौन पाळायला काय हरकत आहे? कारण मुद्देसूद प्रसन्नता देणारं, आनंद देणारं बोलणं ही एक संवाद कला आहे. शब्द चुकले की गोंधळ होतो.
शब्दामुळे दंगल, शब्दांमुळे मंगल|
शब्दाचे हे जंगल, जागृत रहावं||
जिभेवरी ताबा, सर्व सुखदाता |
पाणी, वाणी, नाणी नासू नये ||
तुकाराम महाराजांनी लिहिलेल्या या ओळी किती सार्थ आहेत! जिभेवर ताबा मिळवला पाहिजे हे खरंच आहे.
कधी कधी मौनातही संवाद असतो. म्हणून मौन हे एक असं साधन आहे, जे न बोलता ही सांगण्याचं काम करतं. अर्धा ओरडा करून जे सांगता येत नाही ते मौनात सांगता येतं. मौन म्हणजे स्वतःच्या गोंधळलेल्या भावनांचं संयोजनही असू शकतं. मौन ही एक सकारात्मक, विधानात्मक शैली आहे. शक्तिशाली शैली आहे. कारण, मौन पाळणाऱ्यांच्या आजूबाजूचे लोकही ही व्यक्ती का बोलत नाही, याचा विचार करता करता अंतर्मुख होतात आणि न बोलता प्रश्न सुटतात. म्हणूनच मौन म्हणजे विरोध नाही तर मौन एक परीक्षण आहे.