हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६९ – समतल वृत्त… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – समतल वृत्त।)

☆ हेमंत साहित्य # ६९ ☆

✍ समतल वृत्त… ☆ श्री हेमंत तारे  

पहले

एक हाथ थामता है,

और

दूसरा

सीखता है चलना।

 

फिर,

किसी दिन,

दोनों हाथों के बीच

दूरी नापता रहता है

समय।

 

बदलता है मौसम,

पर, स्नेह

बदलता नही नाम अपना

तथापि,

बदल जाता है

उच्चारण उसका।

 

मनुहार,

अब होती है उँगली पकड़कर

यदा- कदा

पर

होती है नियमित

मौन रहकर।

 

अपेक्षाएँ

छायाओं की तरह

बदलती है कद अपना

और

हो लेती है

लम्बी- नाटी

जब, बह रही हो बयार जैसी

 

फिर एक दिन

हो जाते हैं पहाड समाप्त

और

पैरों के तले

होती है धरती समतल

जहाँ

हो जाते हैं कद बराबर

 

तब,

धीमे पड़ते कदमों के पास

तेज़ चलने वाले कदम

अनायास

चल देते हैं आगे

छोड़कर,

सुस्त कदम पीछे

 

बस

एक वृत्त

चुपचाप होता है पूरा,

और

उसी क्षण

कहीं एक और वृत्त

हो जाता है आरम्भ।

 

रिश्ते चलते हैं यूँही

बिना घोषणा,

बिना विराम,

और अक्सर

बिना बताए

अपना अर्थ।

 

रिश्ते

बँधते नही उम्र से,

ये

थमते नही

बंद घडी के हाथों से।

वे बस

समय के वृत्त पर

बदलते रहते हैं जगह अपनी।

 

शायद,

प्रेम का,

यही

सबसे मौन

पर

शाश्वत रूप है।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆ आलेख – माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “माह सितंबर और हिंदी“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆

✍ आलेख ☆ माह सितंबर और हिंदी☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

लो सितंबर का महीना भी आ गया। सितंबर का महीना मतलब हिंदी का महीना। आम जनता पर तो कोई अंतर नहीं पड़ता परंतु केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों पर पड़ता है और वे हिंदी मय हो जाते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगीं संस्थाओं में हिंदी के प्रति एक जागृति की भावना पैदा हो जाती है जो साल भर तक उन्हें अनुप्राणित करती रहती है। हिंदी के सुनामधन्य लेखक व कवि प्रतिस्फूर्त हो जाते हैं और स्वर्गीय लेखक कवि भी जीवन पा जाते हैं। क्या हिंदी और क्या हिंदीतर राज्य व क्षेत्र सभी हिंदीमय हो जाते हैं। किसी समारोह या कार्यक्रम में जिन्हें कोई स्थान नहीं मिल पाता वे हिंदी के साथ हो रहे छल के हिमायती बन जाते हैं। पर सितंबर माह हिंदी का माह तो होता ही है।

जहाँ जहाँ हिंदी विभाग हैं उनसे जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, प्राध्यापक व अध्यापक स्फूर्ति से भर उठते हैं। सभी किसी न किसी हिंदी के विद्वान को बुला कर अपने संस्थान के अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों में हिंदी के प्रति एक नया जोश भर देना चाहते हैं। कोई अपने संस्मरण सुनाते हैं हिंदी की गौरव गाथा व अधोमुखी गाथा के। वे अपने सामने उपस्थित वृंद को मोहित कर देना चाहते हैं।  ऐसा ही एक उदाहरण याद आता है। बात पुरानी है। हिंदीतर क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.फिल के विद्यार्थियों को प्रोफेसर साहब पढा रहे थे कि हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं कि 1936 में कांग्रेस ने हिंदी को अपने एक अधिवेशन में राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी।  जब उनसे पूछा गया कि संविधान में हिंदी को  भारत संघ की राजभाषा बनाया गया था लेकिन आप यह क्या बता रहे हैं तो वे प्रोफेसर साहब मायूस होकर बोले कि विभाग बना दिया, प्रयोजन मूलक हिंदी की उच्च शिक्षा भी प्रारंभ कर दी लेकिन उसका न तो कोई पाठ्यक्रम है और न ही पुस्तकें। हम जहाँ तहाँ से नोट्स बनाकर पढ़ाते हैं। संस्थान जो केवल सितंबर में हिंदी संबंधी कार्यक्रम करते हैं वे वक्ताओं से उच्च स्तर की नई बात जानना चाहते हैं।

वाक्पटु वक्ता वाह-वाही पाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और जो श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते वे ऐसे आमंत्रण से वंचित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि न वक्ता अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही श्रोता। हिंदी को मान्यता न देने के इच्छुक तो संविधान की ही आलोचना करते हैं कि संविधान में 15 वर्ष तक हिंदी को राजभाषा बनाया गया परंतु अंग्रेजी में काम करते रहने की छूट को अनिश्चितकालीन छूट दे दी तो हिंदी का राजभाषा पद अपने आप ही लुप्त हो गया। तमाम तर्क वितर्क प्रस्तुत होते हैं परंतु हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रुप में सम्मान नहीं देना चाहते। भारत संघ कोई स्थान या क्षेत्र विशेष नहीं है, संपूर्ण भारत है जिसमें सभी प्रदेश व क्षेत्र शामिल हैं और भारत का अस्तित्व उसके सभी मंत्रासय और उनसे संबद्ध अधीनस्थ कार्यालय, विभाग व उपक्रम आदि हैं चाहे वे कहीं भी स्थित हों।  हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाएगा तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान कम नहीं होता।

विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली समझी जाती है और वह विश्व में दूसरे स्थान पर है लेकिन भारत में हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदी बोलना तक अपराध जैसा माना जाता है, ऐसा महसूस होता है।  विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ राष्ट्रभाषा नहीं है और अनेक राजभाषाएं भी हैं, परंतु नफ़रत की भावना होने का कोई समाचार नहीं मिलता। भारत में यही अफ्सोस  जताया जाता है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया जाता और राष्ट्रभाषा चाहते भी हैं।

प्रौद्योगिकी, कंप्यूटरीकरण और ए.आई. ने विश्व में भाषायी अंतर बहुत कम कर दिया है और एक भाषा न जानने वाला भी उस भाषा में काम कर सकता है। अब जरूरत है हर भाषा के प्रति प्रेम की। फिर भी जिस तरह विश्व के सभी देशों में भारत की भाषा हिंदी मानी जाती है वैसे ही भारत में भारत संघ की राजभाषा को हर नागरिक द्वारा  माना जाए और उसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाए तो हिंदी को संविधान सम्मत स्थान व सम्मान अवश्य प्राप्त होगा। हिंदी का उत्थान चाहने वाले विद्वानों व संस्थाओं के प्रयासों को सम्मान दिया जाए।  विश्व के हर देश में हिंदी का प्रचार प्रसार व उसका उत्थान करने वाली संस्थाओं व उनसे जुड़े विद्वानों को हृदय से सम्मान दिया जाए। फिर केवल सितंबर माह ही हिंदी मय नहीं होगा, पूरा वर्ष हिंदी मय होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)

☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।

कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”

नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।

अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”

उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।

वह पलटा।

सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।

नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।

“पिहू… तुम?”

पिहू ने काँपते स्वर में कहा—

“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”

नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।

“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”

पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—

“मुझे विश्वास था।”

नीर ने पूछा—

“कैसे?”

पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”

कुछ पल दोनों मौन रहे।

फिर पिहू ने धीरे से पूछा—

“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”

नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—

“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

“और अगर मैं चल भी न सकी?”

“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”

पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।

उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।

सूरज डूब चुका था।

नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।

कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।

और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३२ – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट)  

☆  चुभते तीर # १३२ – व्यंग्य  – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

वर्मा जी के घर में दिवाली की सफ़ाई किसी राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान से कम नहीं थी। इस अभियान के सेनापति थे वर्मा जी स्वयं, और उनकी एकमात्र सिपाही थीं उनकी पत्नी, जिनकी पारखी नज़र से सोफ़े के पीछे फंसी मकड़ी की जाली भी नहीं बच सकती थी। इस बार का मुख्य लक्ष्य था—ड्रॉइंग रूम का वह पुराना लाल सोफ़ा, जो पिछले दस सालों से एक ही जगह पर अंगद के पैर की तरह जमा हुआ था।

वर्मा जी ने गहरी सांस ली, अपनी धोती कसकर बांधी और सोफ़े को खिसकाना शुरू किया। सोफ़ा थोड़ा सा खिसका ही था कि उसके नीचे से धूल के बादलों के साथ लाल रंग का एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा बाहर निकला। वर्मा जी ने झट से झुककर उसे उठाया। वह दो सौ रुपये का एक पुराना नोट था। वर्मा जी के चेहरे पर ऐसी चमक आई जैसे किसी गोताखोर को समुद्र की गहराई में मोती मिल गया हो।

“अरे वाह! किस्मत हो तो ऐसी,” वर्मा जी ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा।

पत्नी ने तुरंत झाड़ू हाथ में संभाली और कड़क आवाज़ में बोलीं, “ज़्यादा खुश मत होइए, यह वही नोट है जो तीन महीने पहले आपके कुरते की जेब से गिरा था और आपने मुझ पर शक किया था कि मैंने चुरा लिया।”

वर्मा जी का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा, लेकिन सोफ़े के नीचे छिपे खज़ाने की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने सोफ़े को और ज़ोर से धक्का दिया। इस बार सोफ़े के कुशन के बीच की दरार से एक काला लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा।

माहौल में अचानक सन्नाटा छा गया। लिफ़ाफ़े पर किसी का नाम नहीं लिखा था। वर्मा जी ने पत्नी की तरफ देखा, पत्नी ने वर्मा जी की तरफ। दोनों की आंखों में जासूसी वाली चमक थी।

“इसे मत खोलना,” पत्नी ने चेतावनी दी, “हो सकता है यह तुम्हारे किसी दोस्त की उधारी का हिसाब हो, जो तुम मुझसे छुपा रहे थे।”

“या फिर हो सकता है कि तुम्हारी उस सुनारी की पर्ची हो, जिसकी किश्त तुमने गुप्त रूप से जमा की थी,” वर्मा जी ने पलटवार किया।

दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि दिवाली की सफ़ाई का युद्ध अब एक पारिवारिक अदालत में बदल चुका था। पड़ोस के शर्मा जी भी शोर सुनकर दरवाज़े पर आ खड़े हुए। मामला बहुत गंभीर हो चुका था। लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था और दोनों पक्ष उसे ऐसे घूर रहे थे जैसे वह कोई टाइम बम हो।

आखिरकार शर्मा जी को मध्यस्थ बनाया गया। शर्मा जी ने चश्मा सीधा किया, लिफ़ाफ़ा उठाया और कांपते हाथों से उसकी सील तोड़ी। अंदर से कागज़ का एक छोटा सा पन्ना निकला।

शर्मा जी ने पन्ना पढ़ा और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। वर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों एक साथ चिल्लाए, “क्या लिखा है उसमें?”

शर्मा जी ने कागज़ सीधा करके दिखाया। उस पर लिखा था: “यदि आप यह लिफ़ाफ़ा पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपने आखिरकार दस साल बाद इस सोफ़े को खिसकाने की ज़हमत उठाई है। धन्यवाद! – सोफ़ा बेचने वाला दुकानदार।”

पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। वर्मा जी और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे को देखा, अपनी मूर्खता पर मुस्कुराए और ज़ोरदार तालियां बजाने लगे। दिवाली का बोनस भले न मिला हो, लेकिन दस साल पुरानी सुस्ती का जवाब ज़रूर मिल गया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “ईमानदारी की अकड़ ।)

?अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ऐसा क्या हो गया

जो तुम्हारी कमर झुक गई

क्या ईमानदारी,

तुम्हारी अकड़ निकल गई ?

एक ज़माना था

ईमानदारी का रुतबा बुलंद था !

आवाज़ में जोश था

बाजुओं में ज़ोर था।

कोई बेईमान, ईमानदारी

से आँख नहीं मिला सकता था !

ईमानदारी का बोलबाला था

बेईमान का मुँह काला था।।

ईमानदारी कड़क थी, सख्त थी

बेईमान उसके आगे

थर थर काँपता था !

ईमानदारी के डर के आगे

बेईमान उल्टे पाँव भागता था।

ईमानदारी निडर थी, निर्भय थी

बेईमान डरपोक था, कायर था !

ईमानदारी सड़क पर शान से,

सीना तानकर चलती थी।

ईमानदारी की इज़्ज़त थी

बेईमान बेइज़्ज़त होता था।।

कैसी समय ने पलटी खाई

ईमानदारी ने मुँह की खाई

बेईमान की बन आई !

आज ईमानदारी की आँख में

जब बेईमान झाँकता है,

ईमानदारी शर्म से आँख

नीची कर लेती है।

ईमानदारी आज घरों में

दुबकी हुई है !”

बेईमान शान से रथ पर

हो रहा सवार।

ईमानदारी को सब रहे धिक्कार

बेईमान की हो रही जय-जयकार।।

ईमानदारी !

आखिर तुम्हें हो क्या गया है ?

क्या तुम्हारा ईमान खो गया है

या ये बेईमान कुछ कुछ

ईमानदार हो गया है !

ऐसा कुछ नहीं है भाई !°

ईमानदारी फरमाई।

ईमानदारी की परिभाषाएं

बदल गई हैं।

जैसे हो, वैसे मत दिखो !,

बेईमान से कुछ सीखो।

बाज़ार में कई मुखोटे मिलते हैं

मुख में राम, बगल में छुरी रखो।

लोग तुम्हें ईमानदार समझें

तुम बेईमानी का दामन

थामे रखो।।

बस इसी तरह ईमानदारी

पिटती चली गई

उसकी पकड़ ढीली होती

चली गई और

बेईमान अकड़ता चला गया

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२८ ☆ साजण… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२८ ?

☆ साजण ☆  प्रभा सोनवणे ☆

निशेच्या देहावर

पुनवेचं चांदणं

गेला साजण दूरदेशी

माझं उदास अंगण!

*

किती?किती वाट पाहू?

डोळी आसवाचं शिंपण

जीव तिळ तिळ तुटे

साक्षी मेंदीचं शिंपण !

*

सोबतीला हातावर

त्याच्या नावाचं गोंदण

कपाळीच्या कुंकवाला

त्याच्या प्रीतीचं कोंदण !

*

चांदराती एकली मी

माझं रडणं कुढणं

कसं समजेल त्याला

दूरदेशी गं साजण!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चटके… ☆ नीलांबरी शिर्के ☆

नीलांबरी शिर्के

? कवितेचा उत्सव ?

 ☆ चटके नीलांबरी शिर्के 

 जीवनभर चटके मिळता

चटक्यांचे भय ना उरते

हे सोसुन सारे आता

सरणाचे भय कुठले ते!!

*

मी छिन्न नयनबाणांच्या

कायेच्या जखमा शिवते

शब्दांनी विदीर्ण ह्रदया

हळू फुंकर घालत बसते!!

+

मी कणभर गंधासाठी

अनवाणी पावली फिरले

तळपायीच्या फोडांना

अश्रुंनी चुंबीत बसले!!

*

गगनाला भिडण्यासाठी

पंखाची फडफड केली

झेपाऊन उडण्या आधी

मी पंख गमाऊन बसले!!

©  सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मौन… ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

दीपा नारायण पुजारी

?विविधा ?

☆ मौन…  ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

मौन म्हणजे चूप राहणं, निशब्द असणं. मौन पाळणं, म्हणजे न बोलणं.

मौन पाळणं जर साधलं तर आपल्या जिभेवर आपला संयम राहतो. मौनात एक विलक्षण सामर्थ्य आहे. न बोलता खूप काही साधता येतं.

मौन राहून एखादं काम करताना एकाग्रता वाढते. वाढलेली एकाग्रता कामातली उत्कटता वाढवते. काम अधिक चांगले होतं.

कधी कधी बोलून सांगून न जमणाऱ्या गोष्टी मौन साधून साधता येतात. मौन साधणारा अंतर्मुख होतो. त्यामुळे तो आत्मपरीक्षण करू शकतो. वरवर सोपी, साधारण वाटणारी क्रिया; आत्मिक उन्नतीचा साधा मार्ग आहे. जसे पैसे वापरले की संपतात. वापर केल्याने वीज संपते, पाणी संपते आणि त्यातील ऊर्जा संपत्ती नष्ट होते. त्याचप्रमाणे आपण बोलून आपली ऊर्जा, आपली शक्ती नष्ट करतो. विजेचा संचय केल्यास ऊर्जा साठून राहते. अगदी त्याचप्रमाणं, मनाचं मौन पाळल्यास आपल्या अंतरीक ऊर्जेचा ऱ्हास थांबतो. आपली शक्ती वाढते.

योग्य वेळी शांत राहणं महत्त्वाचे असतं. मौनामुळं भांडणं, वादविवाद टाळता येतात. शांतता टिकून राहते.

तसं पाहिलं तर, वाणी ही मानवाला मिळालेली देणगी आहे. डोळे, नाक, कान, त्वचा आणि याबरोबरच जीभ हे देखील महत्त्वाचं ज्ञानेन्द्रिय आहे. जिभेचा उपयोग आपण बोलण्यासाठी आणि चव घेण्यासाठी करतो. दोन्हींचा अतिरेक घातकच ठरतो. मौनव्रत म्हणजे मानसिक तपच आहे. परंतु वाणीला विराम देणं इतकं सोपं नाही. सर्वांनाच ते जमत नाही. आपल्यामध्ये काहीजण असे असतात की, त्यांच्या तोंडात तीळही भिजत नाही. न बोलता राहणं अशक्यप्राय असतं बऱ्याच जणांच्यासाठी! त्यांची जीभ सतत चालू असते. विषय कोणताही असो, त्यातील काही माहिती नसली, तरी ते बोलत असतात. बोलण्यासाठी काही असो वा नसो पण त्यांच्या बडबडीत खंड पडत नाही.

समंजस लोक कमी बोलतात.त्यांना त्याचे काही फायदेही मिळतात. काही गोष्टी साध्य होतात.

मौन पाळणं म्हणजे तोंडानं न बोलणं एवढाच मर्यादित अर्थ नाही हं. खाणाखुणा करणं, लिहून दाखवणं, चेहऱ्यावर विविध भाव प्रगट करणं, मान हलवणं यातलं काहीही न करता राहणं म्हणजे खरं मौन. मौनकाळात व्यावहारिक गोष्टींचा विचार करायचा नसतो. कोणते; अगदी कोणतेच विचार मनात आणायचे नसतात. चित्ताची एकाग्रता वाढवण्याचा प्रयत्न मात्र करत राहायचं असतं. म्हणून चिंतन करण्याची कला मौनव्रतामुळे शिकून घेता येते. त्यामुळे विकारांवर ताबा मिळवता येतो. काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आणि मत्सर असे विकार मनात उत्पन्न होत असतात. मनातील विचारांनी या षड्रिपुंना खतपाणी घातलं जातं. विचारांमुळे शरीराची ऊर्जा खर्ची पडते. अस्वस्थता वाढते. केवळ वाणीनेच नाही तर, मनातल्या मनात बोलणेही बंद करता आलं पाहिजे. मग या षड्रिपुंना जिंकता येईल. म्हणून नेहमी नेहमी नाही तरी, प्रसंग परत्वे मौन पाळायला काय हरकत आहे? कारण मुद्देसूद प्रसन्नता देणारं, आनंद देणारं बोलणं ही एक संवाद कला आहे. शब्द चुकले की गोंधळ होतो.

शब्दामुळे दंगल, शब्दांमुळे मंगल|

शब्दाचे हे जंगल, जागृत रहावं||

जिभेवरी ताबा, सर्व सुखदाता |

पाणी, वाणी, नाणी नासू नये ||

तुकाराम महाराजांनी लिहिलेल्या या ओळी किती सार्थ आहेत! जिभेवर ताबा मिळवला पाहिजे हे खरंच आहे.

कधी कधी मौनातही संवाद असतो. म्हणून मौन हे एक असं साधन आहे, जे न बोलता ही सांगण्याचं काम करतं. अर्धा ओरडा करून जे सांगता येत नाही ते मौनात सांगता येतं. मौन म्हणजे स्वतःच्या गोंधळलेल्या भावनांचं संयोजनही असू शकतं. मौन ही एक सकारात्मक, विधानात्मक शैली आहे. शक्तिशाली शैली आहे. कारण, मौन पाळणाऱ्यांच्या आजूबाजूचे लोकही ही व्यक्ती का बोलत नाही, याचा विचार करता करता अंतर्मुख होतात आणि न बोलता प्रश्न सुटतात. म्हणूनच मौन म्हणजे विरोध नाही तर मौन एक परीक्षण आहे.

© दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ नात्यांची खरी किंमत – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – शीतल कुलकर्णी ☆

शीतल कुलकर्णी

🌸 जीवनरंग🌸

☆ नात्यांची खरी किंमत – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – शीतल कुलकर्णी 

ज्या बहिणीची राखी सर्वात स्वस्त होती… तिच्यासाठी भावाने घेतलेला निर्णय सगळ्यांच्या डोळ्यात पाणी आणणारा होता!

रक्षाबंधनाच्या दिवशी एका बहिणीने भावाला फक्त वीस रुपयांची राखी पाठवली होती…

पण त्या राखीच्या मागे दडलेली तिची वेदना कळताच भावाने जे केलं, ते पाहून संपूर्ण कुटुंबाला नात्यांची खरी किंमत समजली. 

साताऱ्याजवळच्या एका छोट्याशा गावातल्या जुन्या घराच्या ओसरीवर मंदा शांतपणे बसली होती.

अंगावरची साडी जुनी आणि अनेक ठिकाणी विरलेली होती. चेहऱ्यावर काळजीच्या रेषा होत्या आणि डोळ्यांत मात्र एकच आशा होती…

यंदा तरी भाऊ मला विसरणार नाही ना?

रक्षाबंधनाला फक्त दोन दिवस बाकी होते.

मंदाने घरातल्या जुन्या पेटीतून तीन रेशमी राख्या काढल्या. त्यासोबत थोडं कुंकू, अक्षता आणि वीस रुपयांची एक जुनी नोट ठेवली.

तिने ते सगळं एका साध्या पांढऱ्या लिफाफ्यात ठेवलं.

लिफाफा बंद करताना तिच्या ओठांवर हलकंसं हसू आलं.

“माझ्या भावाच्या मनगटावर माझी राखी पोहोचली, तरी पुरे…” 

तिला ठाऊक होतं की भावाच्या घरात आता पैशाची कमतरता नव्हती.

पण तिच्याकडे भावाला देण्यासाठी महागडं घड्याळ नव्हतं…

महागडी मिठाई नव्हती…

होता तो फक्त आपुलकीने बांधलेला एक रेशमी धागा आणि वीस रुपयांचा आशीर्वाद. 

तिकडे पुण्यात मंदाचा मोठा भाऊ माधव आपल्या प्रशस्त घरात रक्षाबंधनाची तयारी करत होता.

टेबलावर मोठमोठे पार्सल ठेवले होते.

नागपूरला राहणारी बहिण वंदनाने महागडी मिठाई आणि सुंदर घड्याळ पाठवलं होतं.

कोल्हापूरला राहणाऱ्या सविताने सुंदर साडी आणि महागडी राखी पाठवली होती.

तेवढ्यात माधवची पत्नी स्नेहा स्वयंपाकघरातून चहा घेऊन आली.

ती सहज म्हणाली,

“माधव, बाकी सगळ्या बहिणींच्या किती छान भेटवस्तू आल्या आहेत. पण मंदाताईंचा नेहमीसारखा साधा लिफाफा आलाय. त्यात फक्त राखी आणि वीस रुपये आहेत.”

माधवने काहीही उत्तर दिलं नाही.

त्याने तो लिफाफा अलगद हातात घेतला.

लिफाफ्यावर बहिणीची ओळखीची अक्षरं पाहताच त्याचे डोळे पाणावले. 

कारण त्याला माहीत होतं…

त्या वीस रुपयांची किंमत बाकीच्या सगळ्या भेटवस्तूंपेक्षा कितीतरी मोठी होती.

मंदाचं लग्न दहा वर्षांपूर्वी सांगली जवळच्या एका कुटुंबात झालं होतं.

सुरुवातीला संसार ठीक होता.

पण काही वर्षांतच तिच्या सासऱ्यांच्या व्यवसायात मोठं नुकसान झालं.

घरची परिस्थिती ढासळली.

नंतर घरातील मालमत्तेवरून भावांमध्ये भांडणं झाली आणि मंदाच्या नवऱ्याला घर सोडावं लागलं.

या सगळ्या धक्क्यांमुळे त्यांची मानसिक अवस्था बिघडली.

ते एका छोट्या किराणा दुकानात मिळेल ते काम करू लागले.

मंदाने मात्र परिस्थितीसमोर हार मानली नाही.

तिने मुलगा ओंकारला शिकवलं.

स्वतः घरकामं केली.

कधी शेतात मजुरी केली, कधी दुसऱ्यांच्या घरची भांडी घासली…

पण माहेरच्यांना आपली परिस्थिती सांगितली नाही.

कारण तिला भीती होती—

“माझ्यामुळे माझ्या भावावर ओझं पडू नये.” 

माधवला हे सगळं माहीत होतं.

पण गेल्या काही वर्षांत कामाच्या व्यापात त्याच्याकडूनही बहिणीकडे पुरेसं लक्ष गेलं नव्हतं.

आज त्या वीस रुपयांच्या नोटेने त्याला स्वतःचीच चूक जाणवून दिली.

त्याने स्नेहाकडे पाहिलं.

“स्नेहा… यावेळी रक्षाबंधन आपण इथे साजरं करणार नाही.”

“मग? ”

माधव म्हणाला,

“यावेळी आपण सगळे मंदाकडे जाणार. आणि तिला न सांगता जाणार.”

स्नेहा काही क्षण शांत राहिली.

“पण अचानक आपण गेलो तर ती आपली व्यवस्था करण्याच्या चिंतेत पडेल…”

माधव हळूच म्हणाला,

“आपल्यासाठी ती व्यवस्था करणार नाही… आपण तिच्यासाठी काहीतरी करणार आहोत.”

रक्षाबंधनाची सकाळ…

माधव, स्नेहा आणि त्यांचा मुलगा अथर्व साताऱ्यातील मंदाच्या गावात पोहोचले.

घरासमोर उभे राहिल्यावर माधव काही क्षण स्तब्ध झाला.

मंदा अंगणात बसून कपडे धुत होती.

अंगावर जुनी साडी होती.

केस विस्कटलेले होते.

चेहरा थकलेला होता.

भावाला पाहताच तिच्या हातातून कपडा खाली पडला.

“दादा… तुम्ही? ”

तिच्या आवाजात आनंदापेक्षा आश्चर्य जास्त होतं.

जणू तिला विश्वासच बसत नव्हता की तिचा भाऊ खरंच तिच्या दारात उभा आहे.

माधवने पुढे होऊन तिला मिठी मारली.

“हो गं वेड्या… यावेळी मला तुझ्याकडून राखी बांधून घ्यायची होती.”

मंदाच्या डोळ्यांत पाणी आलं.

“पण दादा, आधी सांगितलं असतंस तर घर नीट केलं असतं…”

माधव तिचं वाक्य पूर्ण होऊ न देता म्हणाला,

“मला तुझं घर बघायला नाही… माझी बहीण बघायला यायचं होतं.” 

स्नेहाने मंदाला बाजारात नेलं.

तिच्यासाठी नवीन साडी घेतली.

ओंकारसाठी नवीन कपडे घेतले.

घरासाठी महिनाभराचं किराणा, औषधं, चादरी, पडदे आणि आवश्यक सामान घेतलं.

मंदा वारंवार म्हणत होती,

“वहिनी, एवढं कशाला? ”

स्नेहा हसून म्हणाली,

“गप्प बस. आज तुझं काही ऐकणार नाही.”

कित्येक वर्षांनी त्या घरात पुन्हा चैतन्य आलं होतं. 

मंदाच्या डोळ्यांत आनंद होता…

पण माधवच्या लक्षात एक गोष्ट आली.

मंदा अधूनमधून छातीकडे हात नेत होती आणि थोडा वेळ शांत बसत होती.

“काय झालं गं? ”

“काही नाही दादा… थोडा थकवा आहे.”

ती हसली.

माधवने जास्त विचार केला नाही.

संध्याकाळ झाली.

मंदाने राखीची थाळी सजवली.

तिने माधवच्या कपाळावर कुंकू लावलं.

राखी हातात घेतली…

तेवढ्यात माधव म्हणाला,

“थांब जरा…”

मंदा आश्चर्याने त्याच्याकडे पाहू लागली.

“का? ”

माधव हसला.

“तुझ्या दोन्ही बहिणी अजून आलेल्या नाहीत.”

मंदाला काहीच कळेना.

तेवढ्यात बाहेर गाडी थांबण्याचा आवाज आला. 

दार उघडलं…

आणि समोर वंदना आणि सविता आपल्या कुटुंबासह उभ्या होत्या.

मंदाच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. 

तिने धावत जाऊन दोन्ही बहिणींना मिठी मारली.

काही दिवसांपूर्वी माधवने बहिणींना म्हटलं होतं,

“आपण दरवर्षी फिरायला जातो. यावेळी कुठेतरी तीर्थयात्रेला जाऊया.”

तेव्हा तोच हसून म्हणाला होता,

“यावेळी आपली चारधाम यात्रा म्हणजे आपल्या मंदाचं घर.”

दोन्ही बहिणींनी त्याच क्षणी होकार दिला.

त्यांनी ठरवलं होतं—

मंदाला पैशांची मदत करायचीच, पण त्याहून आधी तिला हे जाणवून द्यायचं की ती एकटी नाही. 

त्या रात्री सगळे जवळच्या हॉटेलमध्ये जेवायला गेले.

मंदा फारसं बोलत नव्हती.

ती फक्त सगळ्यांकडे पाहत होती.

कधी भावाकडे…

कधी बहिणींकडे…

कधी आपल्या मुलाकडे…

आणि पुन्हा तिच्या डोळ्यांत पाणी येत होतं. 

पण यावेळी त्या अश्रूंमध्ये दुःख नव्हतं.

ते अश्रू होते—“माझी माणसं अजून माझीच आहेत” या समाधानाचे. 

रात्री सगळे घराच्या अंगणात गाद्या टाकून झोपले.

जुन्या आठवणी निघाल्या.

सगळे हसत होते.

मंदा मात्र शांतपणे माधवच्या खांद्यावर डोकं ठेवून पडली होती.

“दादा…”

“काय गं? ”

“आज खूप वर्षांनी मला माझं माहेर मिळाल्यासारखं वाटतंय.”

माधवने तिच्या डोक्यावरून हात फिरवला.

“माहेर कधी संपत नसतं गं… फक्त आपण एकमेकांपासून दूर जातो.” 

मंदाने डोळे मिटले.

तिच्या चेहऱ्यावर समाधान होतं.

रात्री बराच वेळ गप्पा सुरू होत्या.

अचानक माधवला जाणवलं की मंदाचा हात खूप थंड झाला आहे.

“मंदा…? ”

त्याने तिला हलवलं.

“मंदा, उठ गं…”

काहीच प्रतिसाद नव्हता.

सगळे घाबरून उठले.

दिवा लावला.

पण…

मंदाचे डोळे कायमचे मिटले होते. 

तिच्या चेहऱ्यावर मात्र एक शांत, समाधानाचं हास्य होतं.

सगळ्यांच्या लक्षात आलं की ती काही महिन्यांपासून आजारी होती.

पण तिने कुणालाही सांगितलं नव्हतं.

कदाचित तिला औषधांपेक्षा एका गोष्टीची जास्त गरज होती…

आपल्या माणसांची.

आणि कदाचित म्हणूनच ती त्या दिवसापर्यंत थांबली होती.

ज्या दिवशी तिची राखी भावाच्या मनगटावर बांधली जाणार होती…

ज्या दिवशी तिच्या अंगणात पुन्हा बहिणींचं हसू येणार होतं…

ज्या दिवशी तिला पुन्हा एकदा “माझं माहेर माझ्यासोबत आहे” असं वाटणार होतं. 

 

मंदा या जगातून निघून गेली…

पण यावेळी ती एकटी गेली नाही.

तिच्या शेवटच्या क्षणी तिच्या आजूबाजूला तिची माणसं होती.

तिच्या डोक्यावर भावाचा हात होता.

आणि तिच्या चेहऱ्यावर समाधान होतं. 

कधी कधी महागड्या भेटवस्तूंपेक्षा एखाद्या माणसाची वेळ, त्याचा हात आणि “मी आहे ना” हे चार शब्द आयुष्यभर लक्षात राहतात.

म्हणूनच…

नाती फक्त सणाच्या दिवशी आठवू नका.

कदाचित कुणीतरी तुमच्या एका भेटीची वाट पाहत असेल… आणि तुम्हाला त्याची कल्पनाही नसेल. 

 

लेखक : अज्ञात

प्रस्तुती : शीतल कुलकर्णी

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “मैत्रीतली लक्ष्मणरेखा” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “मैत्रीतली लक्ष्मणरेखा…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

झालं असं की,

गाडी गेटसमोर आल्यावर दोन-तीनवेळा हॉर्न वाजवूनही सिक्युरिटीनं दार उघडलं नाही.साहेब प्रचंड चिडले.ड्रायव्हर गाडीतून उतरणार इतक्यात घाईघाईनं दार उघडलं.गाडी आत गेली.काही वेळातच साहेबांनी बोलवल्याचा निरोप आला.गार्डला दरदरून घाम फुटला.ड्युटीच्या पहिल्याच दिवसाची सुरवात वाईट झाली. 

“दार उघडायला उशीर का झाला”साहेब. 

“माफ करा.पुन्हा असं होणार नाही”गार्डनं हात जोडले तेव्हा साहेबांनी केबिनमधल्या इतरांना बाहेर जायला सांगितलं. 

“इथं कधीपासून कामाला आहे? ”साहेब 

“आजचा पहिलाच दिवस”

“बस.चहा घेणार”साहेबांनी विचारल्यावर गार्डनं नको म्हणाला.

“चहा का नको.”

“इथं नको.आता ड्युटीवर आहे”

“ड्यूटी संपल्यावर भेट”निरोप घेऊन गार्ड केबिनच्या बाहेर पडला.ऑफिसमधल्या नजरा टाळत गार्ड गेटवर आला.

—-

संध्याकाळी टपरीवर चहा घेताना साहेबांनी विचारलं “भल्या माणसा कुठे होतास.तीन वर्षांनी भेटतोयेस.”

“माझ्या आयुष्यात बऱ्याच घडामोडी झाल्या त्यामुळे कोणाच्याच कॉटॅक्टमध्ये नव्हतो.नंबर पण बदलला.”

“एकदम सिक्युरिटी लाइन मध्ये..”

“अचानक कंपनी बंद पडली.काहीतरी हातपाय चलवावे लागणार होते.म्हणून मग…”

“मी काही मदत..”

“नाही नको.आता व्यवस्थित चाललयं.थँक्स.”

“ऑफिसमध्ये चहा नको का म्हणालास”

“ते बरोबर नव्हतं”

“म्हणजे, ”

“तिथं तू मालक मी कामगार”

“आणि इथं?? ”

“मित्र तेही लहानपणापासूनचे”

“तरीही असं बोलतोस.चहा घेतला असता तर आभाळ कोसळलं नसतं.मैत्री अशी ठिकाणानुसार बदलत नाही.”

“खरंय!! पण परिस्थितीनुसार वागावं लागतं.आपल्या मैत्रीतली ‘लक्ष्मणरेखा’ मला ओलांडायची नव्हती.”

“एकदम असं का बोलतोयेस.”

“आपल्यातल्या अंतराची जाणीव आणि मर्यादाही मला माहितीये”

“पैसा, हुद्दा, प्रतिष्ठा, ईगो या गोष्टी आपल्यात कधीच नव्हत्या.”

“आताही नाहीत.हेच बघ ना माझ्यासोबत टपरीवर चहा घेतोयेस यातच सगळं काही आलं.तू बदलला नाहीस.”

“आणि बदलणारही नाही.”साहेब.

“करेक्ट!! ”

“तरीही तू असा विचार करतोस.आपली मैत्री जगाला कळली तरी काय फरक पडणार आहे”

“मलाही तेच म्हणायचयं.”

“काय? ”

“आपली ‘मैत्री’ जगाला दाखवायचीच कशाला?? लोकांना विनाकारण चर्चेसाठी विषय द्यायची गरज नाही.”

“हे पण बरोबर आहे, आणि आता भेटत राहू.” चियर्स म्हणत दोघांनी चहाचे ग्लास भिडवले.तेव्हा एफएम वर मन्नादा आणि किशोरदा गात होते “ये दोस्ती, हम नही तोंडेगे…”

— 

पैसा, हुद्दा, प्रतिष्ठा, ईगो असल्या गोष्टींना मैत्रीत स्थान नसलं तरी एक लक्ष्मणरेखा मात्र असते.

 

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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