हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३१ – इंटरव्यू की नीली टाई – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – इंटरव्यू की नीली टाई।)  

☆  चुभते तीर # १३१ – व्यंग्य  – इंटरव्यू की नीली टाई ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास के पास नौकरी का सिर्फ एक आखिरी मौका बचा था। ‘एपेक्स ग्रुप’ का इंटरव्यू शहर का सबसे कड़ा इंटरव्यू माना जाता था, जहाँ पैनल के लोग जवाब से ज़्यादा उम्मीदवार के जूते की पॉलिश और टाई की गांठ देखकर फैसला सुनाते थे। विकास ने अपनी अलमारी का कोना-कोना छान मारा, लेकिन उसे अपनी पुरानी नीली टाई कहीं नहीं मिली।

समय हाथ से रेत की तरह फिसल रहा था। सुबह नौ बजे का इंटरव्यू था और आठ बज चुके थे। मजबूरी में विकास ने अपने छोटे भाई की एक चमकीली रेशमी टाई उठाई, जिस पर छोटे-छोटे पीले कार्टून बने हुए थे। वह दिखने में किसी गंभीर कॉर्पोरेट अफ़सर की टाई कम और बच्चों के जन्मदिन की सजावट ज़्यादा लग रही थी।

विकास जब इंटरव्यू रूम के बाहर पहुँचा, तो वहाँ बैठे बाकी उम्मीदवारों को देखकर उसका बचा-कुचा आत्मविश्वास भी उड़ गया। सब काले सूट और गंभीर चेहरों के साथ ऐसे बैठे थे जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विलय करने आए हों। सब विकास की कार्टून वाली टाई देखकर मन ही मन हंस रहे थे।

कमरे के अंदर से बुलावा आया। विकास ने गहरी सांस ली, भगवान का नाम जपा और अंदर प्रवेश किया। सामने तीन पैनलिस्ट बैठे थे, जिनके चेहरों पर इतनी गंभीरता थी कि मानो उन्होंने आखिरी बार मुस्कुराहट दस साल पहले देखी हो।

मुख्य इंटरव्यूअर, मिस्टर मेहरा ने विकास की फ़ाइल देखी, फिर चश्मा नीचे करके उसकी टाई पर नज़र टिका दी। पूरे दो मिनट तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। विकास के दिल की धड़कन ऐसे चल रही थी जैसे किसी पुरानी बस का इंजनों चालू हो रहा हो।

मिस्टर मेहरा ने कड़क आवाज़ में पूछा, “विकास, यह इंटरव्यू देश की शीर्ष टेक कंपनी के लिए है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि इस गंभीर माहौल में ऐसी बचकानी टाई पहनकर आने के पीछे आपकी क्या रणनीति है?”

विकास जानता था कि सच बोलने पर उसकी नौकरी का पत्ता हमेशा के लिए कट जाएगा। उसने अपनी आंखें बंद कीं, एक पल सोचा और सीधा होकर बोला, “सर, आजकल की कॉर्पोरेट दुनिया तनाव से भरी पड़ी है। जब आपकी टीम रात को दो बजे तक काम कर रही होगी और हर तरफ़ दबाव होगा, तब मेरा काम सिर्फ़ कोडिंग करना नहीं होगा। जब भी मेरी टीम तनाव में मुझे देखेगी, इस टाई को देखकर उनके चेहरे पर एक सेकंड की मुस्कान आ जाएगी। यह टाई मेरी असफलता का डर भगाने का चिन्ह है।”

तीनों पैनलिस्ट ने एक-दूसरे की तरफ देखा। मिस्टर मेहरा धीरे से अपनी कुर्सी से उठे। विकास को लगा कि अब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। लेकिन मिस्टर मेहरा ने आगे बढ़कर विकास से हाथ मिलाया और बोले, “हमे ऐसे लोग चाहिए जो ज्ञान के साथ-साथ कठिन से कठिन स्थिति में भी तनाव कम करना जानते हों। यू आर हायर्ड!”

बाहर बैठे बाकी उम्मीदवार यह देखकर चौंक गए कि कार्टून वाली टाई पहनकर गया लड़का खुशी से झूमता हुआ बाहर आ रहा था। सबने विकास के इस अनोखे आत्मविश्वास के लिए ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८ ☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८

☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

रक्षाबंधन

सिर्फ धागों का नहीं

दिलों का बंधन है

इस पवित्र बंधन को

शत-शत वंदन  है

इसमें छुपा है

भाई बहन का प्यार

सदियों से गवाह है

यह सारा संसार

कितने स्नेहमय लगें

यह रेशम के धागें

जिनकी कोई बहन नहीं

वे हैं कितने अभागे

इसमें छुपी है

बचपन से

यौवन तक की

साथ बिताई बातें

भूखे प्यासे रहकर

साथ काटी रातें

अभाव में भी खुश रहकर

कैसे पड़ता है जीना

एक दूजे का सहारा बनकर

हर दुख पड़ता है जीना

बहन के सुख दुख में

शामिल होता है भाई

राखी बंधवाकर

रक्षा करने की

उसने कसम है खाई

काल का चक्र भी

यह खुशियां ना लूटें

भाई बहन का रिश्ता

जन्म जन्म तक ना टूटें

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८२ ⇒ बस्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बस्ता…।)

?अभी अभी # १०८२ ⇒ आलेख – बस्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अमीरों की टाउनशिप होती है, गरीबों की बस्ती ! बस्ती के बच्चे सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन और छात्रवृत्ति के लिए जाते हैं, और टाउनशिप के बच्चे आईपीएस और डीपीएस में एक अच्छा इंसान बनने। वे भी क्या दिन थे, जब सबके लिए एक ही स्कूल होता था, और एक जैसा ही बस्ता।

घर में हाथ से सिली हुई थैली ही बस्ता कहलाती थी, जिसमें एक पट्टी, पेम, पेंसिल और पढ़ने-लिखने की किताब होती थी।

कुछ सम्पन्न बच्चे तो पानी-पोता भी लेकर आते थे। कुछ गंदे बच्चे थूक से पट्टी पोंछ लेते थे, तो कुछ लट्ठे के कमीज से ही पट्टी साफ कर लिया करते थे। जिस रोज कोई राष्ट्रीय त्योहार होता था, बस्ती-पट्टे की छुट्टी हो जाती थी।।

समय के साथ बस्ता भी बड़ा होता चला गया। हर विषय की कॉपी किताब, परीक्षा के समय स्याही वाला पेन, स्केल, कंपास और न जाने क्या क्या ! जो बस्ता कभी हाथ में रहता था, अचानक वेताल की तरह कंधे पर आ बिराजा। खाने का टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी साथ में ही लद लिये।

कभी कभी रेलवे के हम्मालों के कंधों और सर पर बोझा लदा देखकर आज के स्कूली बच्चे निगाहों के सामने आ जाते हैं।

मोटी ताज़ी स्कूल की फीस के साथ बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ, सर पर पढ़ाई का बोझ, और माता-पिता पर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का बोझ।।

बस्ता बच्चे की पहचान है ! कभी किसी के बस्ते को लात लग जाती, तो उसको छूकर माफी माँगनी पड़ती थी। वह विद्या है। समय कितना भी बदल जाएबस्ते में विद्या है, ज्ञान का भंडार है, सरस्वती का वास है। बच्चों का भविष्य है, माता पिता के सपने इन्हीं बस्तों में बंद है।

यह बस्तों की बस्ती है। यहाँ दिन भर मेहनत है, पढ़ाई है, और आंखों में अच्छे नम्बरों से पास होने की, स्कूल में टॉप करने की उम्मीद बसती है। बच्चा है, तो बस्ता है, जिसमें से ज्ञान बरसता है। हर बस्ते में एक बच्चे का सुनहरा भविष्य बसता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२२ – भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता भारत मां का ये प्रहरी।)

☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆

☆ भारत मां का ये प्रहरी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

याद नहीं करते हम,

सीमा पर त्योहारों को.

अपने खून से होली खेलें,

बचा रहे परिवारों को.

*

स्त्रोत नहीं पूछा करते,

शूरों का और तारों का.

हथियार उठाते हैं जब,

ख्याल नहीं है वारों का.

*

खुद के अरमाँ, खुद के सपने,

दूर हो गए, सारे अपने.

बच्चों की किलकारी भी,

लगती जैसे हों सपने.

*

देश की पावन मिट्टी का,

माथे पर तिलक लगाता हूं.

भारत माता की पुकार पर,

हाथों पर शीश, सजाता हूं.

*

देश की सीमा को अपने,

खून से अपने सजाया है.

दुश्मन कैसे भी आया हो,

हमने उसे दूर भगाया है.

*

सर्दी हो या गर्मी की लू,

दिन हो या, रातें गहरी.

सजग सतर्क हमेशा है,

भारत मां का ये प्रहरी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ संवाद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ संवाद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

खोटा विचार आहे ह्या राजकारण्यांचा

त्यानीच मांडला हो बाजार माणसांचा

मग्रूर आणि लोभी झालेत हे पुढारी

केलाय आज त्यानी कचराच कायद्य्यांचा

का ही निमूट झाली जनता इथे कळेना

डोळे मिटून बघते अन्याय बावळ्यांचा

या आंधळ्या प्रजेला येईल जाग तेंव्हा

उडवील बोजवारा सगळ्याच धोरणांचा

 *

कमजोर लोकशाही होतेय रोज येथे

उरलाच धाक नाही कुठल्याच संस्कृतीचा

पैसा कुठून कोठे पळतोय ते कळेना

देवासही तडाखा बसलाय चोरट्यांचा

 *

अंधार दाटलेले दिसते भविष्य येथे

होईल रोज सौदा आभाळ चांदण्यांचा

शास्त्रौक्त वेद तेव्हा धरतील मौन सारे

होईल काय सांगा‌ उपयोग मांत्रीकांचा

 *

स्वातंत्र्य मिळवलेले जपणे जरूर आहे

ठेवा विचार ध्यानी आता नव्या पिढ्यांचा

सांभाळण्यास त्याना घेऊ जबाबदारी

त्यांच्या सवे करूया संवाद जीवनाचा

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “फाटणं आणि फाडणं…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “फाटणं आणि फाडणं…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

फाटणं आणि फाडणं…

लहानपणी ज्या काही गोष्टींबद्दल प्रसाद (हातावर, गालावर, आणि पाठीवर) मिळाला असेल तो या दोन गोष्टींबद्दल जास्त असेल. (देवाचा) प्रसाद हा प्रेमाने तळहातावर ठेवला जातो व तो खाल्ला जातो. पण फाटणं आणि फाडणं यामुळे मिळणारा प्रसाद हा तळहातापासून पाठीपर्यंत अंगावर पडला होता. त्यासाठी जागेचं म्हणजे शरीराच्या भागाच, आणि जागेच म्हणजे कुठे आहोत याच बंधन नव्हत. आणि गोडवा… त्याचा तर संबंधच नसायचा.

फाटणं यात वस्तूच नुकसान असत. तर फाडणं बहुतेक वेळा मुद्दाम केल जात. फाटणं यात दुर्लक्ष, निष्काळजीपणा असतो. तर फाडणं यात काळजीपूर्वक करायचं कांहीही नसत. फाटणं यात दु:ख असत, तर फाडण्यात दु:खाचा संबंध असेलच अस नाही.

हा कागद कोणी फाडला… किंवा कसा फाटला… अथवा हे कागद काही कामाचे नसतील तर फाडून टाकू… फाडणं हा शब्द साधारण अशाच प्रकारच्या वाक्यात ऐकायला येतो. किंवा यात जे घडलं तीच क्रिया फाडणं यात अपेक्षित असते.

फाडणं याला व्यवस्थितपणा लागत नाही. यासाठी कोणतही मोजमाप नसत. याला कोणतही शास्त्र, किंवा सुत्र नाही. सुसूत्रता तर मुळीच लागत नाही. ऊलट व्यवस्थितपणे केलेला अव्यवस्थितपणाच यात अपेक्षित असतो. मनाला येईल तसे आणि तेवढे तुकडे करणं यालाच आपण फाडणं म्हणतो.

पण फक्त याच अर्थाने हा शब्द वापरतो का… तर मुळीच नाही. बर्‍याच चांगल्या गोष्टींसाठीसुध्दा फाडणं हा शब्द वापरतो, आणि त्यात बोलणारा आणि ऐकणारा यांना गैर वाटत नाही.

वर्गणी किंवा इतर चांगल्या ठिकाणी पैसे मिळाल्यावर दिली जाणारी पावती. याला पावती फाडणं असच म्हणतात. चांगल्या मनाने, चांगल्या कामासाठी दिलेल्या पैशांची पोचपावती देतांना त्या पावतीचा फाडणं असा ऊल्लेख होतो.

लग्न ठरल्यावर केली जाणारी कपड्यांची खरेदी. याला कपडा फाडायचा आहे असाच ऊल्लेख खान्देशात तरी सहज केला जातो. परत हा शब्द वापरतांना उत्साह जाणवतो. अशा कपडे फाडण्याच्या कार्यक्रमाला काहींना मानाने यायला सांगितल जातं. बर्‍याचदा तर अशा वेळी पंधरावीस जणं असल्याच मी पाहिलं आहे. काहीतर दुकानाच्या बाहेरच असतात. दुकानात साडी फाडली जाते आहे का शर्ट पीस आणि पॅट पीस हे त्यांना दिसतही नाही. पण कपडा फाडायच्या कार्यक्रमास ते हजर असतात.

एखादी गोष्ट घडल्यानंतर त्याच्या चांगल्या किंवा वाईट गोष्टींच श्रेय, यश, अपयश कुणाच्या नावावर असेल, याला सुध्दा याचं बील कोणाच्या नावावर फाडायचं असाच प्रश्न मनात असतो. काही तर या यशासाठी आपणच असल्याचा दावा करतात. तर अपयशाच खापर कोणावर फोडाव याचा घाट घालतात.

असच बील फाडणं वस्तूच्या खरेदीनंतर सुध्दा असतं. आपल्या नांवाने जे बील फाडलं जात ती वस्तू आपण आनंदाने घेतलेली असते, बर्‍याचदा त्याचं बील संभाळून सुध्दा ठेवतो, पण वस्तू घेतांना त्याच बील मात्र फाडल जात.

दुध नासणं याला सुध्दा काही ठिकाणी दुध फाटलं असच म्हणतात. द्रवरूप पदार्थ नासतो, सांडतो. पण दुध मात्र फाटतं. दुधाचा चक्का करायचा असेल तर मात्र दुध मुद्दाम फाडलं जात. पण मला दुध फाटलं या शब्दाची गंमत वाटते.

पण या शब्दांमुळे काही गोष्टींना ऊजाळा मिळाला.

 

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जाणीव… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ जाणीव… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी

(“मला कुणी समजूनच घेत नाही” नयना संतापून रडायला लागली “ती आई तशीच आणि तुम्हीही तसेच. सारखे मागे लागतात. मनासारखं काही करुच देत नाहीत” रागारागाने ती उठली आणि तिच्या रुमकडे निघून गेली.) 

इथून पुढे – –  

“अशीच करते ही आजकाल. थोडंसं काही बोललं की लगेच रडायला लागते. तिच्याशी कसं वागावं तेच कळेनासं झालंय ” माधवी हताश होऊन म्हणाली.

” साहजिकच आहे माधवी. सध्या तिला डिप्रेशन आलंय. तिच्या बहुतेक मैत्रिणी नोकरीला लागल्यात. ज्यांना लागल्या नाहीत त्यांची लग्नं होऊन गेलीत. ही एकटीच अशी घरात रिकामी बसलीये. जिच्याजवळ भावना मोकळ्या करता येऊ शकतील अशी कुणी व्यक्तीच सध्या उरलेली नाहिये. साहजिकच तिला डिप्रेशन येणार. एकट्या मुलांचा हाच प्राॅब्लेम असतो. ती लवकर डिप्रेशनमध्ये जातात. याकरिता कमीतकमी दोन मुलं तरी हवीत “

” हो. नाही झालं आपल्याला दुसरं मुल. काय करणार. पण ही ही गोष्ट खरी की तिच्या डिप्रेशनला तीच स्वतः जबाबदार आहे. तिच्या अपेक्षा तर खुप आहेत पण तिला स्वतःला काहिच करायला नको असतं “

” हो. तेही खरंच. पण ते ती ॲक्सेप्ट करत नाहीये. याच्यावर एकच उपाय आहे तो म्हणजे तिचं लवकरात लवकर लग्न लावून देणं “

” ठिक आहे. सुरुवात केलीच आहे आपण स्थळं बघायला”

दोनच दिवसांनी रोजचा पेपर वाचतांना एल. आय. सी. च्या व्हेकंसीजची जाहिरात विनायकच्या पहाण्यात आली. त्यानं नयनाला हाक मारुन बोलावलं

” तू आजचा पेपर वाचलास? “त्यानं विचारलं

” नाही. मी पेपर वाचत नाही “

” का? का पेपर वाचत नाहीस? कमीतकमी नोकरीच्या जाहिरातीसाठी तर वाचत जा “

” अहो बाबा इतके जाॅब पोर्टल आहेत. त्याच्यावर हजारोंनी जाहिराती येत असतात. त्याच्यासाठी पेपर वाचायची काय गरज आहे? “

” मग एल. आय. सी. ची जाहिरात वाचलीच असशील तू?  “

” वाचली असेल. शक्यता आहे. पण त्यांनी कंप्युटर इंजीनियर कुठे मागितलेत? ” जाहिरात बघत ती म्हणाली

” पण त्यांना कोणतेही ग्रॅज्युएटस् चालणार आहेत “

” बाबा मी कारकून बनून काय करु? मागेही तुम्ही कुठल्यातरी बँकेची जाहिरात दाखवली होती. मला अशा जाॅबमध्ये इंटरेस्ट नाहिये बाबा. मला माझ्याच फिल्डमधला जाॅब हवाय ” ती वैतागून म्हणाली.

” बेटा नोकरीच करायची म्हंटलं तर कुठलीही चालू शकते. फिल्ड वेगळं असलं तरी शिकतो माणूस. आणि सरकारी नोकरी केव्हाही चांगली. पगारही चांगला असतो. जाॅब सिक्युरिटी असते आणि लग्न झाल्यावरही तू तिथे बदली करुन जाऊ शकतेस “

” हो पण जाॅब सॅटिसफॅक्शनच काय? ते मला या सरकारी नोकरीत मिळणार थोडीच आहे. आणि मला त्या सरकारी नोकऱ्या अजिबात आवडत नाहीत. राहू द्या. मी पुण्यातल्या एका कंपनीत अप्लाय केलाय. पुढच्या आठवड्यात इंटरव्ह्यू आहे “

विनायकला चुप बसण्याव्यतिरिक्त पर्यायच उरला नाही. तो माघार घेत म्हणाला

“ठिक आहे. मात्र या वेळी तरी तुझं सिलेक्शन व्हायला पाहिजे “

“मी प्रयत्न तर करणारच आहे ” ती म्हणाली आणि रुममध्ये निघून गेली. ती गेल्यावर माधवी विनायकला म्हणाली

“तुम्ही नोकरीसाठी तिच्या इतकं मागे लागता पण नोकरीला लागल्यावर ती कशी वागते ते माहित आहे ना? घरातल्या एकाही कामाला ती हात लावत नाही वरुन तिच्याच तैनातीत मला रहावं लागतं. असा रुबाब दाखवते की जणू घरात कमावणारी ती एकटीच आहे आणि आपण तिच्याच कमाईवर अवलंबून आहोत “

” माहितेय मला. पण अशी रिकामी बसलेलीही मला सहन होत नाही. पण तू काळजी करु नकोस. तिला नोकरी लागणं कठीणच दिसतंय कारण इंटरव्ह्यूला जातांना ती कधी तयारीच करुन जात नाही “

दुसऱ्या आठवड्यात नयना पुण्याला जाऊन इंटरव्ह्यू देऊन आली तेव्हा तिचा चेहरा पडलेला होता. संध्याकाळी विनायकनं घरी आल्यावर तिला विचारलं.

“काय झालं? कसा झाला इंटरव्ह्यू? “

” चांगला झाला पण माझं काही सिलेक्शन झालं नाही “

“का? “

” आजकाल वशिला लागतो बाबा सगळ्या ठिकाणी. आणि आपण तिथेच तर कमी पडतो. साक्षी जाॅबला लागली ती तिच्या मामाच्या ओळखीमुळे. समीर टिसीएस मध्ये त्याच्या बाबांच्या ओळखीमुळे लागला. नेहा पण तिच्या बाबांच्याच वशिल्यामुळे आयबीएम मध्ये लागलीये”

” याचा अर्थ तू मलाच ब्लेम करतेय. माझ्या जिथे ओळखी आहेत त्या एल. आय. सी. मध्ये आणि बँकेमध्ये तर तू नोकरी करायला तयार झाली नाहीस. सगळ्याच ठिकाणी माझी ओळख कशी असणार? आणि फक्त ओळखीमुळे नोकऱ्या लागत नाहीत. इंटरव्ह्यूमध्ये आपली हुशारीही दाखवावी लागते. मी पाहिलंय की इंटरव्ह्यूला जातांना तू कधीच तयारी करुन जात नाहिस. आज पाच वर्षं झाली तुला इंजीनियरींग सोडून. काय शिकलीस तेसुद्धा तुला आठवत नसेल तर इंटरव्ह्यूमध्ये तू काय बोंब पाडणार आहेस? तू पुण्याला गेलीस खरी पण काय होणार आहे हे आम्हांला अगोदरच माहित होतं “

“तुमचीच नाट लागली माझ्या इंटरव्ह्यूला ” ती रडत रडत म्हणाली

“वा रे वा! तू स्वतः तयारी करुन जायचं नाही. इंटरव्ह्यूत चांगली उत्तरं द्यायची नाही आणि सिलेक्शन झालं नाही तर आईबापालाच दोष द्यायचा. ही कोणती पद्धत? आम्ही काय वैरी आहोत का तुझे? ” माधवी चिडून म्हणाली

” जाऊ द्या मला काही बोलायचंच नाही या विषयावर “ती उठली आणि रडतरडत आपल्या रुममध्ये निघून गेली.

तिच्या पाठमोरी आकृतीकडे बघत माधवी म्हणाली

“बघा. अशी करते ही. गरीब आणि अशिक्षित आईवडिलांची मुलं काय ओळखीने लागतात का नोकरीला? “

” खरंय माधवी तुझं. गरीब आणि अशिक्षित आईवडिलांच्या मुलांमध्ये परिस्थितीला सामोरं जाण्याची आणि कसंही करुन यश मिळवण्याची जिद्द असते. त्यांना आपल्यालाच प्रयत्न करुन पुढे जायचं आहे याची जाणीव असते. कितीतरी यशस्वी आणि प्रसिद्ध व्यक्तींचे आईवडील अशिक्षित आणि गरीबच होते. कोणत्याही सुखसुविधा मुलांना ते देऊ शकले नाहीत तरीही मुलांनी यशाचं शिखर गाठलं. आणि आपली मुलं पहा. आपलंही चुकलंच. आपण नको तितके तिचे लाड केले. ती म्हणेल ते आपण तिला देत आलो. त्यामुळे तिला कधी गरिबीची जाणीवच झाली नाही. आईवडिलांनी आपल्याला शिकवलंय तर आपण स्वतःहून धडपड करुन नोकरी मिळवली पाहिजे, त्यांच्या आपल्याकडून ज्या अपेक्षा आहेत त्या आपण पुर्ण केल्या पाहिजेत असं तिला कधी वाटलंच नाही “

“खरंय तुमचं पण आपलंही काही चुकलं असं मला वाटत नाही. आपल्याला ज्या सुखसोयी मिळाल्या नाहीत त्या आपल्या एकूलत्या एक मुलीला मिळाव्या असं आपल्यालाही वाटणं साहजिकच होतं. आता तिलाच या गोष्टींची जाणीव नाही तर आपणही काय करणार?

त्यात एवढंच सुख म्हणावं की तिनं प्रेमाबिमाच्या काही भानगडी नाही केल्या. नाहीतर आपल्या डोक्याला अजून ताप झाला असता “

“खरंच. ही देवाचीच कृपा समजायची कारण कितीही चांगले संस्कार केले तरी या मुली कधी भरकटतील सांगता येत नाही. पहातेय ना कसं मुलींना फसवून मग त्यांना मारुन टाकलं जातंय ते “

माधवीच्या अंगावर शहारे आले. ती म्हणाली

“असं काही घडण्याच्या आतच नयनाचं लग्न उरकून टाकलं पाहिजे “

 

एक महिना असाच गेला. त्यात नयना दोन ठिकाणी इंटरव्ह्यूला जाऊन आली पण दोन्ही ठिकाणी तिची निवड झाली नाही. या दरम्यान बंगलोरचं एक स्थळ चालून आलं. मुलगा एकुलता एक होता, देखणा होता. बारा लाखाचं पॅकेज होतं. आणि सहा महिन्यांनी ते सोळा लाख होणार होतं. फक्त लग्न झाल्यावर मुलीने नोकरी करावी अशी मुलाकडच्यांची अट होती. त्यात विनायक आणि माधवीलाही काही गैर वाटलं नाही. मुलामध्ये दोष काढण्याकरीता कोणतेच मुद्दे नसल्याने नयनाही नाही म्हणू शकली नाही. शेवटी तीन महिन्यांनी नयनाचं लग्न थाटामाटात पार पडलं.

एक महिन्याने माधवीनं नयनाला सहजच फोन केला.

“कशी आहेस बेटा? “

“आई तशी मी मजेत आहे. सासूबाई आणि नवरा दोघंही स्वभावाने चांगले आहेत पण इथे खुप कामं करावी लागतात. सकाळी सहा वाजताच उठावं लागतं “

” का? “

” अगं माझ्या नवऱ्याला फिटनेसचं वेड आहे म्हणून तो सकाळी पाच वाजताच जिमला जातो. सासूसासरेही सकाळी साडेपाचलाच माॅर्निंग वाॅकला जातात. सुरुवातीला मी माझ्या सवयीने एकटीच नऊ वाजेपर्यंत झोपलेली असायचे. तसं मला कुणी बोलत नव्हतं पण त्यांच्या चेहऱ्यावरुन माझं असं उशीरापर्यंत झोपणं त्यांना आवडत नाहिये असं माझ्या लक्षात आलं. मग नाईलाजाने मलाही सकाळी सहा वाजता उठावं लागतं. नवरा, सासूसासरे सकाळी घरी आले की त्यांना लगेच चहा करुन द्यावा लागतो. मग नाश्त्याची तयारी. माझी झोपच होत नाही आजकाल. वरुन घरात सतत लोकांचं येणं जाणं असतं. दिवसभर चहापाणी करुन मी थकून जाते. त्यातून आता नवरा आणि सासू दोघंही माझ्या मागे लागलेत मी नोकरी करावी म्हणून. सासूबाई म्हणतात ‘तू इतकी शिकली आहेस त्याचा उपयोग तुझ्या आईवडिलांना नाहितर आम्हांला तरी होऊ दे “

“काय चुकीचं म्हणताहेत त्या? मिळत असेल तर कर नोकरी “

” हो पण घरातली कामंही मलाच करावी लागणार ना? सासूसासऱ्यांना थोडीच कामं सांगता येतील! “

माधवीला हसू आलं. माहेरी नोकरी करतांना जो रुबाब नयना दाखवायची तो आता तिला सासरी दाखवता येणार नव्हता.

“ठरव मग काय करायचं ते “आपलं हसू दाबत ती म्हणाली.

“तू बोल ना जरा माझ्या सासूबाईंशी. त्यांना म्हणा कमीत कमी लग्नाचं एक वर्ष तरी तिला एंजॉय करु द्या “

“नाही गं बाई! मी तुझ्या संसारात अजिबात ढवळाढवळ करणार नाही. तू आणि तुझ्या सासरचे काय ठरवायचं ते ठरवा. तुमच्या घरात भांडणं लावायची माझी अजिबात इच्छा नाही “

“बरं “

– क्रमशः भाग दुसरा 

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9209763049

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ खोपा शिडीला टांगला ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

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☆ खोपा शिडीला टांगला ☆ श्री दिवाकर बुरसे

‘टाटा मोटर्स’चा, म्हणजे पिंपरी आणि चिंचवडच्या कारखान्याचा परिसर मोठा निसर्गरम्य आहे. पिंपरी वाघिरे भागातला एकेकाळी ओसाड, माळरान, खडकाळ, ओबडधोबड, दगडगोट्यांनी आणि काटेरी झुडुपांनी व्यापलेला सुमारे अठराशे एकरांचा हा परिसर आता वड, पिंपळ, औदुंबर, कदंब, कांचन, पांगार, बहावा, टबुबिया, कशिया, स्पथोडिया, ग्लिरिसिडिया, जकरेंडा, पेल्टाफोरम, बाटलब्रश, निरगिरी इ. कितीतरी बहुगुणी आणि पर्यावरण समृद्ध करणाऱ्या वृक्षांची लागवड केल्याने आता नंदनवन झालाय. नानाविध पक्षांचा तिथे मुक्त संचार असतो. पिंपरीच्या कारखान्याच्या परिसरात तर चक्क एका वाघोबानेही काही काळ तिथे निवास केल्याचे ऐकले असेल!  जगविख्यात पक्षिनिरीक्षक डा. सलीम अली सुद्धा इथे पक्षी पाहण्यासाठी आवर्जून येत असत कधी कधी.

चिंचवडचा प्लँट म्हणजे पूर्वीची ‘इन्व्हेस्टा मशीन टूल्स कंपनी. ‘ ‘टेल्को’ कंपनीने ती ताब्यात घेऊन तिथे आपली ‘ मशीन टूल डिव्हिजन’ सुरू केली. कालांतराने फौंड्री, ए पी डी इ. विभाग सुरू केले. तर या चिंचवडच्या कारखान्यात, उत्तरेला ‘स्टडर्स बिल्डिंग’ नावाची, इंग्रजी ‘सी’ च्या आकाराची एक बैठी एकमजली वातानुकूलित इमारत आहे. तिला ऐसपैस पडवी आहे. इतर शॉप्स आणि इमारतींपासून ती जरा दूर आहे. तिच्या मागे उत्तरेला दाट झाडी आहे. त्यामुळे तिथे अनेक पक्षांचा राबता असतो. या परिसरात मानवाची फारशी वर्दळ नसते. या इमारतीत ‘आर अँड डी १’, ‘मेकनिकल अँंड हायड्रॉलिक लॅब अँड टेस्टिंग’ आणि मेट्रोलॉजि’ हे विभाग आहेत. त्यावेळी काही काळापुरती माझी नियुक्ती या हायड्रॉलिक लॅब विभागात झाली होती.

ते पावसाळ्याच्या सुरुवातीचे दिवस होते. दुपारी तीन-चारची वेळ होती. आकाश झाकळून आले होते. सर्वत्र अंधार पडला होता म्हणून बिल्डिंगमधले दिवे लावले. जेव्हा इमारत विद्युत प्रकाशाने उजळून निघाली, तेव्हा लक्षात आले की कॉरिडॉर मात्र अंधारात आहे. तिथल्या ट्यूबलाईट्स लागत नाहीयेत. मी लगेच सी पी ई डीला (सेंट्रल प्लांट इंजिनियरिंग डिव्हिजन) फोन करून कळविले आणि सर्व नवीन ट्यूबलाईट्स बसवायची विनंती केली. पाच वाजता जनरल शिफ्ट संपल्यामुळे मी घरी निघून गेलो.

दुसऱ्या पाळीतील सी पी ई डी च्या कर्मचाऱ्याने तत्परतेने येऊन कॉरिडॉरमधील सर्व दिवे बसवले. त्याचे हे काम होईतो जेवणाची सुट्टी झाली. त्याने बरोबर आणलेल्या शिडीची घडी घालून ती पडवीच्या एका कोपऱ्यात भिंतीला टेकवून उभी केली आणि तो गेला. शिडी तशी तिथेच राहिली. ती परत न्यायची तो विसरला आणि पुढे सात-आठ दिवस ती तशीच पडून राहिली.

एक दिवस माझ्या दृष्टीस ती शिडी पडली. मी सी पी ई डी ला फोन करून ती शिडी त्वरित घेऊन जायला सांगितले. मला कर्मचाऱ्याच्या निष्काळजीपणाचा रागही आला. काही वेळाने शिडी न्यायला एक जण आला पण त्याने शिडीला हातही लावला नाही. नुसताच तिच्याकडे बघत बघत, आला तसा परत गेला. शिडी तिथे कोपऱ्यात होती तशीच उभी!

दुसऱ्या दिवशी मी जरा तणतणतच फोन केला. म्हटलं, “काय चाललंय हे?  ती शिडी का नेत नाही तुम्ही?  आता आठ दिवस होऊन गेले इथले काम करून. काम झाल्यावर पुढचे निस्तरायला नको वेळच्यावेळी? ” पलीकडून मलाच प्रश्न झाला, “काय?  अजून नाही नेली?  कमाल आहे. मी कालच सांगितलं होतं आणायला. इथे आमच्या डिपार्टमेंटचं कामही अडून राहिलंय त्यामुळे. मी आत्ता लगेच पाठवतो कोणालातरी आणि उचलून आणतो. ” मी तरीही जरा जोरातच बोललो, “आत्ताच्या आत्ता हलवा इथून. आहो, म्हणजे आम्ही फाईव्ह एस ची डिसिप्लिन काटेकोरपणे पाळायची, त्यासाठी परिश्रम घ्यायचे आणि तुम्ही ही अशी गलथान कामं करायची?  ते काही नाही. त्वरित उचला इथून. “

तो कर्मचारी परत आला पण शिडी उचलायच्या ऐवजी सरळ माझ्या केबिनमधे शिरला आणि अजिजीने म्हणाला, “एक्स्ट्रिमलि सॉरी सर. काईंडली एक्स्यूज मी. सर, खरं म्हणजे मी परवा शिडी न्यायला आलो होतो. शिडी उचलायला तिच्या जवळ गेलो तो माझ्या लक्षात आले की त्या शिडीच्या वरच्या एका पायरीच्या सांदीत एक पक्षांची जोडी आपले घरटे करत्येय. ते अर्धेअधिक झालंय करून. पुढच्या चार-पाच दिवसात बांधून पूर्ण होईल बहुतेक. ते पाहून मनात विचार आला, बिचाऱ्यांनी काडी काडी गोळा करून घर बांधायला घेतलंय. दिवसभर आळीपाळीने हेलपाटे मारतायत दोघही. समजा, मी ही शिडी नेली तर त्याचे घरटे तुटेल. दोघांनी केलेले काम वाया जाईल. त्यांचे घरट्याचे स्वप्न अर्धवट राहील. त्यांनी घेतलेल्या साऱ्या कष्टांवर पाणी पडेल. पुन्हा त्यांना दुसरी सुरक्षित जागा शोधावी लागेल. परत काड्या, कापूस, चिंध्या शोधून आणाव्या लागतील. यात किती वेळ जाईल साहेब. त्यांचा सगळा शेड्यूल डिस्टर्ब होईल. पक्षांचा अंडी घालण्याचा हा सिझन आहे. म्हणून तर त्यांची लगबग चाललीय येवढी. अशात एखाद्याचे घर असे विनाकारण उध्वस्त करणे बरे दिसते का आपल्याला, तुम्हीच सांगा. असे पाप नको व्हायला हातून म्हणून मी शिडी नेत नाहीए. त्यातून जर तुमचा हट्टच असेल तर नेतो. पण मनाला पटत नाही हे. सांगा काय करू?  नेऊ का राहू देऊ तिथेच?  महिन्याभाराचा प्रश्न आहे. एकदा त्यांच्या पिलांना पंख फुटले की जातील भुर्रssकन् उडून. प्लीज कोआँपरेट करा सर. “

त्या कर्मचाऱ्याच्या भावना इतक्या प्रामाणिक होत्या, त्याच्या बोलण्यात येवढे आर्जव होते की मला काय करावे हेच सुचेना. तो माझ्याशी बोलत असताना इतर मशीनवर काम करणारे दोन-तीन आपरेटरही भोवती गोळा झाले. सर्वांना त्या कर्मचाऱ्याचे म्हणणे पटले असावे. खरे म्हणजे मलाही त्याचे म्हणणे पटले होते. त्याच्या या उदात्त विचारांना दाद द्यावीशी वाटत होती. त्याचे कौतुक करावसे वाटत होते.

तरीही मी म्हणालो, ” अरे असे कसे करता येईल. पुढचे दीड-दोन महिने ही शिडी अशीच ठेवायची कोपऱ्यात अडगळीसारखी, त्यावर धूळ, कोळिष्टकं जमायला!  त्या भागाची झाडलोट, स्वच्छता होणार नाही. इट विल लुक अग्लि, अन्-टायडी, इनडीसेंट अँड विच इज नाट अक्सेप्टेबल”.

यावर माझ्याच शॉपमधला एक पुढे आला आणि म्हणला, ” सर, त्याची काळजी आम्ही घेऊ, इथे काम करणारे सगळे. ” “काळजी घेऊ म्हणजे नक्की काय करणार?  जे दिसायला कुरूप आहे त्याला कसे रूप देणार तुम्ही?  उगीच काहीतरी आपलं. ” मी तरीही विरोध दर्शविला.

त्यावर दुसरा म्हणाला, “सर, ते आमच्यावर सोपवा ना. एक दिवस जाऊ द्या. उद्या करू काहीतरी व्यवस्था. आम्ही केलेली व्यवस्था आवडली तर ठेवा. नाही तर हा त्याची लडर घेऊन जाईल. ही पाखरं दुसरा आश्रय शोधतील. आपण फाईव्ह एस च्या आग्रहासाठी आपल्या आश्रयाला आलेली पाखरं उडवून लावू. फाईव्ह एस चे आडिट होईल, आपल्याला सर्टिफिकेट मिळेल. मग आपण त्याला फ्रेम करून इथेच, या कोपऱ्यातल्या भिंतीवर टांगून ठेऊ. साऱ्या जगाला दाखवू आपले कर्तृत्व. ” 

हा शेवटचा उपरोध अतिशय तीक्ष्ण आणि मर्मभेदी होता. विषय भावनिक झाला होता. औद्योगिक परस्पर संबंधांत ताण निर्माण करू पहात होता. कामगारांच्या म्हणण्यात सुसंस्कृतता, सहृदयता, भूतदया, पर्यावरणाचे भान, जबाबदारीची जाणीव इ. अनेक जीवनमूल्ये व व्यवसायमूल्ये डोकावीत होती. त्यांचा आदर करणे आवश्यक वाटले मला.

क्षणभर कोणीच काही बोललं नाही. मग मीच म्हणालो, “ठीक आहे. तुम्ही म्हणताय तर राहू दे शिडी तिथे. बघू नंतर. ” माझा निर्णय सगळ्यांना आवडला. “थक्यू सर. आम्ही काळजी घेऊ. ” असे म्हणत सगळे पांगले, आपापल्या मशीनवर जाऊन कामाला लागले. मी ही मिटिंगला निघून गेलो.

दुसऱ्या दिवशी सकाळी नेहमीप्रमाणे ऑफेसमधे आलो. दिवसाच्या कामाचे शेड्यूल सहकाऱ्यांना समजून सांगितले. कामाच्या सूचना दिल्या आणि टेबलावर येऊन पडलेले टपाल पहायला सुरवात केली. तेवढ्यात एक कर्मचारी टेबलाजवळ आला आणि म्हणाला, “सर, तुमचं हे हातातलं काम झालं की जरा कॉरिडॉरमध्ये याल का?  बघा कसं झालंय ते. ” त्याचा विषय माझ्या लगेच लक्षात आला आणि मी म्हणालो, “नंतर कशाला?  हा आलोच, चल, तुझ्याबरोबर लगेच येतो. ” 

बाहेर येवून बघतो तो काय!  शिडी कोपऱ्यात पूर्वीसारखीच भिंतीला रेलून उभी होती. वरती गवताचे घरटे आकार घेतच होते. पण शिडीभोवती काही अंतरावर वर्तुळाकारात सुंदर फुलांच्या कुंड्या मांडल्या होत्या. त्याच्या बाहेर साखळीचे कुंपण उभारले होते. शेजारी एक स्टँड उभा करून त्यावर सुवाच्य अक्षरात एक पाटी लावली होती. त्यावर लिहिले होते, “please don’t disturb. Work in progress”.

जवळच्या एका झाडाच्या फांदीवर दोन पत्र्याची लहान डबडी लटकवली होती. एका डब्यात पाणी आणि दुसऱ्या डब्यात मुठभर राळे ठेवले होते. कामगारांची ही संवेदनशीलता, कल्पकता आणि योजकता पाहून मी थक्क झालो!

 विशेष म्हणजे ज्या ‘फाईव्ह एस’ या जपानी व्यवस्थापनतंत्राचा अवलंब करण्याचे धोरण कंपनी आपल्या दैनंदिन व्यवहारात राबवू इच्छित होती, ज्याचे प्रशिक्षण प्रत्येक कर्मचाऱ्याला दिले होते त्या तंत्रातील सूत्रांचे तंतोतंत पालन या कर्मचाऱ्यांनी करून दाखविले होते!

त्यांना हे तंत्र इथे अवलंबायला कोणी सांगितले?  कोणी शिकवले?  निसर्गातील सर्व जीवजंतू, वनस्पती, भूमि, जल, वायू, पर्यायाने आपले पर्यावरण या विषयी आमचे कर्मचारी इतके जागरूक, दक्ष आहेत?  ‘हो, आहेत’, हेच या प्रश्नाचे उत्तर. समोर दिसतंय हे त्याचे एक उत्तम उदाहरण!

निसर्गातील सर्व प्रकारच्या जीवनशृंखला जपण्याविषयी ते पुरेसे जागरुक आहेत, गंभीर आहेत हे पाहून धन्य वाटले. कारखान्यातील तंत्रज्ञान, कौशल्ये इ. विषयात त्यांना प्रशिक्षित केले जाते. ती व्यवसायिक गरज असते. तसे आरोग्य, पर्यावरण, सामाजिक कर्तव्ये, सुरक्षितता, समाज विकास इ. विषयी सुद्धा त्यांना प्रशिक्षित केले जाते हे आमच्या टाटा मोटर्सच्या प्रशिक्षण धोरणाचे वैशिष्ठ्य. हे त्यांना शिकवलेले ज्ञान खालपर्यंत झिरपत आहे हे सिद्ध करणारा हा प्रत्यक्ष पुरावा. प्रत्येकाला, पावलोपावली जे ज्ञान आणि भान दिले जाते, त्या ज्ञानाचा त्यांनी व्यवहारात केलेला हा उपयोग खरंच कौतुकास्पद होता.

 मी त्यांचे मनापासून कौतुक केले. त्यांचे आभारही मानले कारण माझ्या विनंतीला मान देऊन त्यांनी त्यांच्या या अनोख्या उपक्रमात मलाही सहभागी होण्याची संधी दिली म्हणून!

पुढील दोन महिने माझे सर्व उत्साही सहकारी एखाद्या पहिलटकरीण लेकीची काळजी तिचे आई-वडील जशी घेतात तशी काळजी घेत होते त्या विहगयुगुलाची!  त्या जोडप्याला कोणाचा जराही व्यत्यय होऊ नये म्हणून इतरांना तो रस्ताही तात्पुरता बंद केला त्यांनी. चक्क सूचनाच लावली त्या मार्गावर ” Entry prohibited”. ते स्वतःही सारे लांब उभे राहूनच काळजी घ्यायचे.

यथावकाश पक्षिणीने त्या घरट्यात चार अंडी घातली. दोघांनी आळीपाळीने ती उबवली. त्यातील तीन अंड्यातून पिले बाहेर आली. एक अंडे वाऱ्यामुळे खाली पडून फुटले. पुढील पंधरा-वीस दिवस हे पिलांचे भरण-पोषण-शिक्षणात गेले. काही दिवसात पिलांना पंख फुटले आणि एका रम्य सुप्रभाती चिवचिवाट करीत ती पिले घरट्यातून आकाशात आत्मविश्वासाने झेपावली!

ज्यांनी अथक परिश्रम घेऊन घरटे बांधले, त्यात आपला संसार थाटला, तीन पिलांना जन्म दिला, त्यांचे संगोपन करून जगायला सक्षम बनवले ते पक्षाचे जोडपे मात्र दुसऱ्या दिवसापासून अचानक दिसेनासे झाले. आम्ही कर्मचारी मित्रांनी दोन-तीन दिवस त्यांची वाट पाहिली. पण कोणीच फिरकले नाही!

साप्ताहिक सुटीनंतर कामावर आलो आणि आफीसमधे प्रवेश करताना सवयीप्रमाणे कॉरिडॉरच्या ‘त्या’ कोपऱ्याकडे लक्ष गेले. पण आता तर तो कोपराही रिकामा होता. शिडी आणि त्यावर उभारलेले घरटे अदृष्य झाले होते. फुलांच्या कुंड्या, साखळीचे कुंपण, जवळचा स्टँड, हे सारे उचलले गेले होते. खालची जमीन धुऊन पुसून स्वच्छ केली गेली होती. भिंतीवर एक नवीन पोस्टर चिकटवले होते. त्यावर लिहिले होते…

Project completed successfully!  

Thanks to all team members for their active support and participation.”

Birdees.

🙏🏻

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ व्यसन – तसे आणि असे ☆ डॉ मकरंद पिंपुटकर ☆

डॉ मकरंद पिंपुटकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ व्यसन – तसे आणि असे ☆ डॉ मकरंद पिंपुटकर 

साक्षी शहरात लहानाची मोठी झालेली, पण तरीही बऱ्यापैकी orthodox मुलगी. गावातल्या शेती सांभाळून नोकरी करणाऱ्या मुलाशी लग्न झालं, आणि साक्षी अधून मधून शेतावरही जायला लागली.

दिवसभर शेतात काम करणाऱ्या बायका पाहिल्या की राहून राहून तिला प्रश्न पडायचा – यांची बाळं दिवसभर आयांशिवाय कशी राहत असतील?

न राहवून एके दिवशी तिने हा प्रश्न शेतात काम करणाऱ्या एका बाईला विचारलाच. आणि तिचं उत्तर ऐकून अवाक झाली. “तुला माहितीये की ती बाळं आयांशिवाय दिवस – दिवस कशी राहतात ते?  अग, त्या बायका त्या एवढ्याश्या मुलांना कप कप ताडी (दारू) पाजतात. मग काय दिवसभर ती लेकरं झिंगलेल्या गुंगलेल्या अवस्थेत रहातात.

जसजशी मुलं मोठी होतात, तशी आणखीन आणखी ताडी रिचवतात. बरं, आई वडिलांनी चार उपदेशाचे सल्ले सांगावेत, तर ते स्वत:च मुलांसमोर – आज काय आनंद झाला आहे म्हणून, तर उद्या दु:ख झालं म्हणून, नि परवा सहज म्हणून दारू पितात. मुलांना काय आदर्श रहाणार?

ही व्यसनं मुलांची आयुष्यं बरबाद करत आहेत. “

काळ वाटचाल करत राहिला.

नवऱ्याची नोकरी बदलल्यावर साक्षी त्याच्याबरोबर शहरात आली होती. तिलाही एक गोजिरवाणा मुलगा झाला होता आणि तो आता तेरा वर्षांचा – म्हणजे इंग्रजी परिभाषेत teen ager झाला होता. आज साक्षी, त्याच मैत्रिणीला, मुलगा सदैव कसा मोबाईल घेऊन बसला असतो ही तक्रार करायला फोन करत होती.

“अग, आल्या गेल्याशी सोड, आम्हा आई बाबांशीही बोलणं नाही. धड अभ्यासाकडे लक्ष नाही की खाण्याकडे. शाळेत जातो हे आमच्यावर उपकारच समज. घरी आला की मोबाईल सुरू.

रात्री कधी उठून पाहिलं तरी हा मोबाईलमध्ये डोस्कं खुपसून बसलेला असतो. रात्री झोपायला उशीर म्हणून सकाळी उठायला उशीर. चष्मा लागला आहे, मान दुखते म्हणतो.

या सगळ्याला तो जळला मोबाईल कारणीभूत आहे. आम्ही दोघंही त्याच्या कानीकपाळी ओरडत असतो – ठेव तो मोबाईल, जरा मैदानी खेळ खेळायला जा, जरा घाम तर येऊ दे. पण उपयोग शून्य. “

मैत्रिणीला साक्षीचेच जुने डायलॉग आठवले.

लहानपणी या मोबाईलचं व्यसन साक्षीनेच मुलाला लावले. त्याला दोन घास भरवायचे असले की ती त्याला मोबाईलवर व्हिडिओ लावून द्यायची. आपल्याला सीरिअल पहायची असली की त्याला मोबाईल गेम चालू करून द्यायची.

तोंडाने सांगायचं मोबाईल वापरू नकोस, पण या ना त्या कारणाने स्वतः साक्षी आणि नवरा, दोघेही खूप मोबाईल वापरायचे.

मग करोना काळात तर मुलांना, शाळेच्या बहाण्याने, मोबाईल वापरायचं परमिटच मिळालं. लेकाला स्वतंत्र मोबाईल घेऊन दिला गेला आणि मग तो जास्तच वहावत, जास्तच गुरफटत गेला.

“माझं ऐकशील का? , ” मैत्रीण साक्षीला विचारत होती. “पहिलेप्रथम तुम्ही दोघं नवराबायको आपला मोबाईल वापर मर्यादित करा. मुलं तुमचं अनुकरण करतात. तुम्ही तोंडाने त्यांना उपदेश करत असाल पण स्वतःच त्यात आकंठ बुडाले असाल, तर ही विसंगती मुलं पटकन ओळखतात.

मोबाईलच्या अतिवापराचे दुष्परिणाम त्याला सांगा, समजावून द्या. त्याच्या झोपेची गणितं कशी बिघडली आहेत, आणि त्याने आरोग्य कसं बिघडलं आहे, ते दाखवून द्या.

Family time ठरवा, त्यात कोणी मोबाईल वापरणार नाही, एकमेकांशी गप्पा मारू असं ठरवा आणि अंमलात आणा.

हे सगळं एका दिवसात होणार नाही, पण सुरुवात तर करा. दारूचं व्यसन असो वा मोबाईलचं, ते सोडलं पाहिजे असं व्यसनी माणसाला स्वतःहून वाटलं पाहिजे.

पण याची सुरुवात स्वतःपासूनच केली पाहिजे. लहान मुलाला गूळ खाऊ नकोस म्हणून उपदेश करण्यापूर्वी, स्वतः रामकृष्ण परमहंसांनी आठवडाभर गूळ खाणं सोडलं होतं, आणि मगच उपदेश केला होता.

व्यसन, मग ते दारूचं असो वा मोबाईलच्या अति वापराचं, दोन्हीही घातकच. ” समेवर येत मैत्रीण म्हणाली आणि साक्षीच्या विचारांना आणि तदनुसार कृतीला चालना देत, तिनं फोन ठेवला.

© डॉ. मकरंद पिंपुटकर 

 चिंचवड

मो ८६९८०५३२१५   

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ताकदीने जगलेला विचार, प्रेमाने घडवलेले कार्यकर्ते – भाग १ – लेखक : प्रसाद चिक्षे ☆ प्रस्तुती – अंजली दिलीप गोखले ☆

अंजली दिलीप गोखले

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ताकदीने जगलेला विचार, प्रेमाने घडवलेले कार्यकर्ते – भाग १ – लेखक : प्रसाद चिक्षे ☆ प्रस्तुती – अंजली दिलीप गोखले

विवेकानंद केंद्र -एकनाथजी रानडे -ए. बालकृष्णन

 – मा. श्री. ए. बालकृष्णन… विवेकानंद विचार आणि पूर्वांचलाशी आयुष्यभर नातं जोडणाऱ्या एका विलक्षण कर्मयोग्याला श्रद्धांजली… मृत्यू दि. २७/८/२६.

१९६२च्या चीन युद्धानंतर भारतीय मानस पूर्णपणे खचून गेलेलं होतं. त्या युद्धानंतर ईशान्य भारतातून अनेक सैनिक परत येऊ लागले. त्यांनी सांगितलेल्या कहाण्या ऐकून अंगावर काटा यायचा. आजही यूट्यूबवरील काही व्हिडिओ पाहिल्यानंतर त्या चिनी आक्रमणाची दाहकता लक्षात येते.

एकीकडे चीनचं आक्रमण आणि दुसरीकडे देशाच्या मनात निर्माण झालेली निराशा—या परिस्थितीत देशाला अधिक सामर्थ्यवान, अधिक आत्मविश्वासपूर्ण बनवण्यासाठी काय करता येईल, याचा विचार सुरू झाला. याच काळात भारतभर स्वामी विवेकानंद जन्मशताब्दी वर्ष मोठ्या प्रमाणावर साजरं करण्याची तयारी सुरू झाली.

१९६३ हे स्वामी विवेकानंदांचं जन्मशताब्दी वर्ष.

स्वामीजींना त्यांच्या आयुष्याचं ध्येय ज्या कन्याकुमारीच्या शिलेवर सापडलं, त्याच शिलेवर त्यांचं भव्य स्मारक उभं करावं, असा संकल्प करण्यात आला. पण हे काम काही केल्या पुढे सरकत नव्हतं. त्या स्मारकाला दक्षिण भारतातील काही ख्रिश्चन मिशनऱ्यांचा आणि त्यांच्या समर्थकांचा प्रचंड विरोध होता. त्या शिलेबद्दल वेगवेगळे दावे करण्यात येत होते.

आणि अशा वेळी एका जबरदस्त व्यक्तिमत्त्वाची एंट्री झाली—एकनाथजी रानडे.

एकनाथजींच्या अथक प्रयत्नांनी आणि सर्व भारतीयांच्या सहकार्याने अखेर कन्याकुमारीचं भव्य विवेकानंद शिलास्मारक उभं राहिलं. ’

पण एकनाथजींना केवळ दगडाचं स्मारक उभं करायचं नव्हतं.

त्यांना विवेकानंदांचं जिवंत स्मारक उभं करायचं होतं.

विवेकानंदांचं जिवंत स्मारक म्हणजे त्यांच्या विचारांनी भारावून जाऊन आपलं संपूर्ण आयुष्य राष्ट्रकार्यासाठी समर्पित करणारी माणसं—महिला, पुरुष, युवक, युवती. One Life, One Mission या भावनेने जगणारे कार्यकर्ते.

– – यातूनच विवेकानंद केंद्राची निर्मिती झाली. विवेकानंद केंद्राचा कणा असणारा कार्यकर्त्यांचा वर्ग म्हणजे जीवनव्रती. जीवनव्रती प्रशिक्षणात एकनाथजींनी तरुणांना आवाहन केलं—

या राष्ट्रकार्यासाठी तुम्ही सहभागी व्हा.

– – या आवाहनाला प्रतिसाद देणाऱ्या तरुणांमध्ये एअरफोर्समधला एक तडफदार, विलक्षण ऊर्जावान युवक होता—ए. बालकृष्णन.

अफाट ताकद. मनात काहीतरी करून दाखवण्याची प्रचंड इच्छा. मनाची विलक्षण शुद्धता. तीव्र इच्छाशक्ती. कोणत्याही परिस्थितीचं तुफान विश्लेषण करून निर्णय घेण्याची क्षमता. आणि त्याला जोडलेली अफाट पॅशन.

… हा तरुण विवेकानंद केंद्राचा जीवनव्रती कार्यकर्ता झाला. एकनाथजींच्या सहवासात त्याच्या या अफाट ऊर्जेला दिशा मिळाली.

त्या काळात पूर्वांचल—ईशान्य भारत—हा अत्यंत महत्त्वाचा विषय होता. चीनपासून असलेला धोका तर होताच; पण त्याचबरोबर तिथल्या सांस्कृतिक वैविध्यालाही मोठं आव्हान होतं.

निसर्गाने निर्माण केलेली सृष्टी, मानवी जीवन आणि समाजव्यवस्था इतकी वैविध्यपूर्ण आणि सुंदर आहे की तिची विविधता टिकवणं, त्या विविधतेतलं सौंदर्य टिकवणं आणि त्या विविधतेच्या मुळाशी असलेली अंतर्निहित एकात्मता टिकवणं ही काळाची गरज होती.

याच पूर्वांचलाच्या कामाची जबाबदारी घेणाऱ्या कार्यकर्त्यांमध्ये पुढे अग्रस्थानी आले—बालकृष्णनजी.

विवेकानंद केंद्राच्या पूर्वांचलातील कामाचे ते प्रमुख संघटक झाले.

पहिली भेट

बालकृष्णनजींना मी पहिल्यांदा कन्याकुमारीमध्ये पाहिलं.

सकाळची वेळ होती. आम्ही काही जीवनव्रती कार्यकर्ते भोजनगृहातून ‘नचिकेता’कडे जात होतो. आपल्याच मस्तीत होतो. एकमेकांची हसी-मजाक सुरू होती.

अचानक समोरून एक व्यक्ती आली… आकाशी निळ्या रंगाचा शर्ट, पांढरी धोती, पांढरीशुभ्र आणि भरीव दाढी, पांढरेशुभ्र केस आणि डोळ्यांवर चष्मा. एका हाताने धोतीचा पदर सावरत ते आमच्याकडे चालत आले.

अचानक एक भारदस्त आवाज कानावर पडला—

“ए, कम हिअर!  व्हॉट्स युवर नेम? ”

विवेकानंद केंद्रात ‘तुझं नाव काय? ’, ‘कुठून आलास? ’ असे प्रश्न सहज विचारले जातात, याचा मला अनुभव होता. मी लगेच उत्तर दिलं—

“आय अॅम प्रसाद. ”

पण पुढचा क्षण वेगळाच होता.

त्या व्यक्तीने थेट माझ्या खांद्यावर हात ठेवला आणि विचारलं—

“कसा आहेस?  ठीक आहेस ना?  बरं वाटतंय का इथे?  काही त्रास तर नाही? ”

मी अचंबित झालो.

पाठीवर थाप देत त्यांनी आमच्याशी गप्पा मारायला सुरुवात केली.

आवाजात जरब. व्यक्तिमत्त्वात भारदस्तपणा. पण बोलण्यात प्रचंड प्रेम.

हे काहीतरी वेगळंच कॉम्बिनेशन होतं.

आम्ही नंतर शांतपणे ‘नचिकेता’कडे परत आलो. मी रमणमूर्तीजींना विचारलं—

“हे कोण? ”

उत्तर मिळालं—

“बालकृष्णनजी! ”

बालकृष्णनजींबद्दल मी आधी खूप काही ऐकलं होतं. त्यामुळे माझ्या मनात त्यांचं एक वेगळंच चित्र तयार झालं होतं—अतिशय ताकदीचा माणूस, एअरफोर्समधला माणूस, नॉर्थ-ईस्टच्या कुठल्याही अवघड परिस्थितीत फिरणारा माणूस, कोणतंही आव्हान स्वीकारून ते पूर्ण करणारा माणूस.

अखंड पूर्वांचलाचा चप्पा-चप्पा माहीत असलेला माणूस.

प्रत्येक कार्यकर्त्याचं नाव माहीत असलेला आणि त्यांच्याशी थेट संपर्क ठेवणारा माणूस.

प्रचंड इच्छाशक्ती आणि दुर्दम्य आशा असलेला माणूस.

पण हा एवढा जबरदस्त माणूस आपल्याशी इतक्या प्रेमाने बोलू शकतो, ही अनुभूतीच विलक्षण होती.

“Purity is important…”

पुढे सलग पंधरा दिवस बालकृष्णनजींचा सहवास मिळाला.

गुरुपौर्णिमेच्या दिवशी आम्हाला विवेकानंद केंद्राच्या जीवनव्रती प्रशिक्षणाची दीक्षा देण्यात आली. आमचं प्रशिक्षण आणि काम सुरू झालं.

त्या वेळी बालकृष्णनजींनी केलेलं भाषण आजही माझ्या कानात घुमतं—

“Purity is important.

Dedication is important.

Character is important.

Willpower is important.

Learning is important. ”

– – एकामागून एक ते वाक्य फेकत होते, जणू काही बंदुकीतून गोळ्या सुटाव्यात!

पण त्या प्रत्येक वाक्यामागे त्यांचा स्वतःचा अनुभव होता.

ते आम्हाला केवळ विचार सांगत नव्हते… ते स्वतः जगलेला विचार आमच्यासमोर ठेवत होते.

कन्याकुमारीमध्ये त्यांच्यासोबत अनेक क्षण घालवता आले. प्रशिक्षणात त्यांनी आम्हाला केंद्र प्रार्थना समजून सांगितली. केंद्र प्रार्थनेचा एक वेगळाच आयाम त्यांच्या तोंडून ऐकायला मिळाला.

यानंतर ते पूर्वांचलाच्या दौऱ्यावर निघून गेले.

… पूर्वांचल म्हणजे त्यांचा जीव की प्राण!  आणि तिथले कार्यकर्ते म्हणजे त्यांच्यासाठी लाखमोलाची ठेव.

अरुणाचलमध्ये खरा सहवास

माझी पोस्टिंग अरुणाचल प्रदेशमध्ये ‘अरुण ज्योती’च्या कामासाठी झाली. त्यानंतर बालकृष्णनजी अरुणाचलमध्ये आले आणि त्यांच्याबरोबरचा माझा खरा सहवास सुरू झाला.

बालकृष्णनजींची झोपण्याची व्यवस्था जिथे केली होती, त्याच्या बाजूलाच मी झोपायचो. कॉटवर बालकृष्णनजी आणि खाली बाजूला मी… आमच्या खूप साऱ्या गप्पा व्हायच्या.

आमच्या दोघांच्या वयामध्ये जमीन-अस्मानाचं अंतर होतं. पण एवढा मोठा माणूस आपल्याशी अगदी लहान भाऊ किंवा मुलगा असल्यासारखा प्रेमाने वागतो, ही अनुभूतीच दिव्य होती.

त्यांची पॅशन जबरदस्त होती. बोलण्यात नेमकेपणा होता. पण त्याचबरोबर ते प्रचंड विनोदीही होते.

एकदा सकाळी उठल्यानंतर काही वेळाने मी उठलो. बालकृष्णनजी माझ्याकडे पाहून हसायला लागले.

म्हणाले—

“अरे प्रसाद, तू तो नींद में बहुत बात करता है!  मुझसे बात कर रहा था—‘मुझे घर जाना है, घर जाना है. ’ सही में घर जाना है क्या? ”

मी चकित झालो.

माझ्या आयुष्यात पहिल्यांदाच कुणीतरी मला सांगत होतं की मी झोपेत बोलतो!

नंतर मी त्यांना विचारलं—

“मी खरंच झोपेत बोलतो का? ”

तेव्हा ते म्हणाले—

“नाही, तू बोलत नाहीस. मी तुझी मजा करत होतो. ”

इतके अफाट विनोद मी बालकृष्णनजींबरोबर अनुभवले आहेत.

– क्रमशः भाग पहिला

लेखक : प्रसाद चिक्षे

ज्ञान प्रबोधिनी

प्रस्तुती : अंजली दिलीप गोखले 

मोबाईल नंबर 8482939011

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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