(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बाप की व्यथा…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆
☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆
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सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर
हमारे एक पुराने मित्र से मुलाकात हुई
हाय हेलो के बाद बैठकर बात हुई
हमने पूछा-
यह क्या हाल बनाया है ?
क्या कोई बीमारी का तुम पर साया है ?
वह बोला यार
क्या बताऊं?
कैसे जी रहा हूं ?
रोज जी रहा हूं
और रोज मर रहा हूं ?
भाई पत्नी के बिना जीना
लोहे के चने चबाना है
रोज जीना है रोज मरना है
छोटे बेटे के परिवार के साथ रहने लगा,
उनको ही अपना कहने लगा
कहने को तो तीन बेटे है
पर वह दोनों अपने परिवार में मस्त है
अपने आप में ही व्यस्त है
कुछ दिनों बाद परिवार में अचानक कलह हो गई
घर और संपत्ति वजह हो गई
दोनों बेटे आकर अपना हक मांगने लगे
हम कशमकश में रात भर जागने लगे
समझाने पर भी वह दोनों नहीं माने
रोज बहू बेटे आकर मारने लगे ताने
थक हारकर
हमने घर और संपत्ति बेचकर
तीनों में बराबर बांट दिया
अपना हिस्सा नहीं लिया
मैंने पूछा-
मैं कहां रहूंगा ?
कैसे जिऊंगा ?
उन्होंने चार-चार महीने के लिए मुझे आपस में बांट दिया
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘विभीषिका युद्ध की…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १०२ ☆ विभीषिका युद्ध की… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
☆ व्यंग्य – व्यंग्य भाषण: बेहोशी का लोकतंत्र☆ श्री रमाकांत ताम्रकार☆
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भाइयों और बहनों…
आज मैं डॉक्टर बनकर आपके सामने आया हूँ. घबराइए मत इंजेक्शन नहीं लगाऊँगा बस एक बीमारी बताऊँगा
जो आप सबको है. अरे ऐसा नहीं है कि मुझे नहीं है, मुझे भी है मैं भी उससे अछूता नहीं हूं.
इस बीमारी का नाम है सुविधानुसार बेहोशी जो कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक है. वैसे हमारे देश में आदमी मरने से नहीं डरता केवल और केवल जिम्मेदारी से डरता है!आपने भी देखा होगा बिजली का बिल भरने जाओ तो जो लोग लाइन में खड़े हैं उनमें से कई लोग 5 से 10 मिनट बाद ही कहने लगते हैं भाई साहब, चक्कर…आ…आ और… धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ते है
लेकिन…यदि उन्हीं आदमियों को राशन की दुकान पर देखिए… सुबह 6 बजे से लाइन में दोपहर 2 बजे तक खडे रहेंगे तब ना चक्कर… ना दर्द…ऊपर से कहेगा देश तरक्की कर रहा है इसलिए कि उसके खून में फ्री की आदत जो हो गई है. हमारे यहाँ एक ही मेडिकल टेस्ट को पब्लिक में मान्यता हैं—
ECG को नहीं पर ेक्ग जैसा टेस्ट RCG को अर्थात राशन कार्ड ग्राफ!
अब तो गाँव गाँव में नया योग शुरू हो गया है फ्री-योग. जिसकी कल्पना सपने में भी किसी बाबा ने भी नहीं की होगी. इस फ्री योग में आदमी—धूप में तपेगा धक्का भी खाएगा फिर भी खुश रहेगा क्योंकि उसे फ्री योग की आदत जो लग गई है लेकिन जैसे ही कोई कहे – भाई, टैक्स तो भरिए… बस… फिर क्या है उसका BP डाउन होगा और वह आँखें बंद कर लेगा और सीधा बेहोशी की हालत में चला जाएगा …यही राष्ट्रीय बेहोशी है.
इस देश में अब दो ही लाइनें बची हैं—
एक जहाँ लोग खड़े रहते हैं और दूसरी जहाँ लोग गिरते रहते हैं.
आज की जनता बहुत ही स्मार्ट हो गयी है उसे सब पता है कि कहाँ क्या फ्री मिलेगा, कब मिलेगा और कैसे मिलेगा
लेकिन…उसे यह नहीं पता देश कैसे चलता है क्योंकि…कर्तव्य सुनते ही… उसका दिमाग एयरप्लेन मोड में चला जाता है.
हमारे देश में अब नेटवर्क नहीं जाता, लेकिन जिम्मेदारी आते ही दिमाग का सिग्नल चला जाता है.
अब देश दो लाइनों में बंट गया है-
पहली लाइन – अधिकार की हैं, यहाँ भीड़ है…जोश है…सेल्फी है… नारे हैं…शक्ति है.
दूसरी लाइन – कर्तव्य की हैं, यहाँ केवल पिन पटक सन्नाटा है…
और बीच-बीच में कोई कोई जमीन पर भी पड़ा मिल जाता है. लोग पूछते हैं – क्या हुआ बेचारे को?
तब जवाब मिलता है – भाई… इसे जिम्मेदारी का अटैक आया हैं.
देश में अब कोरोना नहीं फैलता… कर्तव्य रुपी बीमारी फैलती है… और जिसे लग जाती है वह तुरंत गिर जाता है.
हम सब चाहते हैं कि सड़क अच्छी हो, बिजली आए,अस्पताल ठीक हों, रहन सहन अच्छा हो प्रदूषण न हो दारु भी फ्री मिले और बीमार हो जाओ तो इलाज भी, नोकरी भी मिले मोटी तनख्वाहें वाली लेकिन टैक्स कोई और दे,नियम कोई और माने ईमानदारी कोई और दिखाए.
देश में अब नया सर्वे होना चाहिए –
कितने लोग टैक्स देते हैं और कितने लोग सिर्फ फ्री का लाभ लेते हैं अब तो सरकार भी समझदार हो गई है उसे पता है जिम्मेदारी दोगे तो जनता धड़ाधड़ गिर जाएगी और सरकार गिरा देगी और यदि फ्री योग वाली सुविधा दोगे तो जनता एक टांग पर खड़ी रहेगी. इसलिए तो देश में लोकतंत्र नहीं चल पा रहा हैं. केवल और केवल सुविधातंत्र चल रहा है. अब देश में नागरिक नहीं बन पाते सिर्फ लाभार्थी बनते हैं.
तो भाइयों और बहनों, समस्या यह नहीं है कि लोग बेहोश हो रहे हैं. समस्या यह है कि लोग सही जगह पर होश में नहीं हैं. इस देश में अब नागरिक नहीं रहते. यहाँ मौके के हिसाब से होश में आने वाली जनता रहती है. अधिकार दिखते ही उन्हें होश आ जाता है और कर्तव्य दिखते ही केवल आदमी नहीं गिरता…उसका चरित्र गिर जाता है… जिम्मेदारी गिर जाती है और पहले तो कभी-कभी देशभक्ति भी बेहोश हो जाती थी अब तो पूर्ण रूप से देश भक्ति जिम्मेदारी की बीमारी से बेहोश होकर रसातल में चली गई. जनता फ्री का योग कर रही है तो वहीं नेता, अफसर घर भरने का योग कर रहे हैं. देश जाए… भाइयों और बहिनों.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फटे कपड़े…“।)
अभी अभी # ९६४ ⇒ आलेख – फटे कपड़े श्री प्रदीप शर्मा
कुछ कपड़े फट जाते हैं, तो कुछ कपड़े फाड़ दिए जाते हैं। हमारा जमाना कपड़े पहनकर फाड़ने का था। बाजार से पहले कपड़ा आता था, फिर खुशी खुशी दर्जी को नाप दिया जाता था। शादी, जन्मदिन अथवा पास होने की खुशी में ही नए कपड़े नसीब होते थे। तब दीवाली भी मिठाई और नए कपड़ों से ही मनाई जाती थी।
बड़े भाई के कपड़े आगे चलकर छोटे भाई के काम आते थे और बड़ी बहन के, छोटी बहन को। तब कहां टेरीकॉट और टेरिलिन के कपड़ों का चलन था। सूती कपड़ों को घर में वाशिंग मशीन में नहीं, मोगरी से कूटा जाता था। बरसात में कई दिनों तक कपड़े नहीं सूखते थे।।
मुझे अच्छी तरह याद है, मेरी सूती पैंट साइकिल अधिक चलाने के कारण अक्सर पीछे से ही फटती थी। बाकी सब जगह तो रफू हो जाता था, लेकिन तशरीफ के साथ मजाक नहीं चलता था। अगर पैंट पीछे से फटी, तो किसी काम की नहीं। कालांतर में फटी शब्द का अर्थ ही बदल गया।
कुछ फटे पुराने कपड़ों की मां मजबूत थैली बना लेती थी। तब कहां कैरी बैग चलते थे। घर घर में सिलाई मशीन थी। पुराने कपड़ों का कायाकल्प घर में ही हो जाता था।।
बच्चों की फ्रॉक, झबले और महिला सदस्यों के ब्लाउज घर पर ही सिलते थे। एक मशीन आती थी जिससे बटन के लिए कमीज में सूराख किए जाते थे, जिसे काज कहा करते थे। काज बटन संस्कार किसी नए परिधान के तैयार होने का अंतिम चरण था। कपड़ों में मशीन से काज बटन लगवाने का काम मेरा था।
तब हम लोग इतनी चैरिटी अफोर्ड नहीं कर सकते थे कि पुराने कपड़े किसी गरीब को दे दें। मोहल्ले में कुछ औरतें पुराने कपड़ों के बदले बर्तन दे जाती थी। मधुर तान में जब वह आवाज लगाती थी, तो लगता था, संगीत की कोई नई धुन सुन रहे हैं। कपड़ों की पूरी जांच परख होती थी। फटे कपड़े और होली के रंगे कपड़े, हिकारत से निकाल दिए जाते थे। केवल साबुत कपड़े ही एक्सचेंज ऑफर में स्वीकार्य थे। किचन के कई पुराने बर्तन आज भी हमारे पुराने कपड़ों के त्याग का ही प्रतिफल है।।
वैसे अंदर की बात कौन बताता है। लेकिन जब सबकी फटी फिर रही है तो हम भी क्यों पीछे रहें।
हम लक्स अंडरवियर, डोरा बनियान और बंबइया चड्डी की बात कर रहे हैं। इन्हें होजियरी कहते हैं। अगर बनियान में एक छेद हो गया तो वह बहुत जल्द एक गड्ढे में परिवर्तित हो जाता है। रबर की तरह समय के साथ बनियान लंबा होता चला जाता है। कभी कभी तो शर्ट छोटी और बनियान लंबी हो जाती है। आधी बांह का बनियान, आधी बांह की शर्ट से बाहर ऐसा नजर आता है जैसे जनता चौक पर दूर से ही राजवाड़ा।
मर्दों में भी आजकल लंबी चड्डी पहनने का फैशन चल गया है। ना वह हॉफ पैंट है, ना फुल पैंट। फैशन आती रहती है जाती रहती है। टीवी सीरियल के महिला पात्रों की पीठ, ढंकी रहने के बावजूद इतनी उघाड़ी रहती है कि ब्लैक बोर्ड की तरह उस पर गणित के कुछ प्रश्न भी आसानी से हल हो जाएं। इस्स ! हमें तो शर्म आती है भाई। कपड़े तो ठीक, हमें तो दूध भी फटा हुआ अच्छा नहीं लगता। काश फटी जीन्स का भी फटे दूध की तरह पनीर बन जाता।।
ब्रह्म वाक्य आहे हे असं जर मी म्हटलं तर अतिशयोक्ती ठरणार नाही याची खात्री आहे!
मुळात हे आत्मचिंतन असल्याने स्व वर केंद्रित आहे. बुद्धी ही दोन प्रकारची आहे.
१ देहबुद्धी (अज्ञान, मर्यादित बुद्धी)
२: आत्मबुध्दी (ज्ञान, अंतिम सत्य)
मग पहिला स्व जाणणारी बुध्दी समजून उमजून बदलवून दुसऱ्या स्व मध्ये प्रतिष्ठित करणे सोपं कसं असेल? म्हणून सगळा गोंधळ, अस्वस्थता, अस्पष्टता असते हे खरे, हे “जीवाचे” लक्षण आहे. पण
जीव जीवच राहून सुखी झाला असता तर सगळे प्रश्न मिटले असते. मर्यादित रुप हे अमर्याद स्वरूपाचा अंश असल्याने त्याची तळमळ शांत होत नाही व खरे समाधान मिळत नाही, जोपर्यंत तो स्वतः अमर्याद होत नाही. हाच अमर्याद स्व म्हणजे दुसरा स्व!
दुसरा स्व ही आपणच आहोत फक्त पहिला स्व ओळखून नव्या स्व ची ओळख धारण करणे ही ” घटना घडणे” म्हणजे खरा चमत्कार आहे.
देह रूपाने जन्म मिळाला हाही चमत्कारच आहे पण तो दृश्य आहे. या देहाचा आधार, चैतन्य म्हणजे आत्मा त्या आत्म्याचे स्वरूप परमात्म्याचा अंश आहे, हे जाणवणे म्हणजे “जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा” या महावाक्याचा स्वानंद अनुभवणे आहे! म्हणून हा खरा “दैवी चमत्कार” आहे!
मर्यादित रुपात स्वतः प्रतिष्ठित झालेला आत्माराम ओळखण्यासाठी त्याचीच माया अडथळा करते, परीक्षा घेते, जे आवश्यक आहे सगळे मनाचे खेळ उघड करते व मनाला स्व कडे वळवते. जीवनानुभव घेत घेत, सत्संग, सत्संगती, सद्ग्रंथ सापडणे ही सद्गुरू कृपा आहे. मार्गदर्शन मिळाल्याशिवाय मार्ग कळणार कसा?
वेगवेगळ्या पध्दतीने दुसऱ्या स्व ची ओळख व्हावी असा प्रयत्न स्वतः सद्गूरु करतात हीच त्यांची कृपा आहे. आत्मनिष्ठ सद्गूरु च आत्म्याची ओळख करून देतात. मग मर्यादित स्व अमर्याद स्व मध्ये परिवर्तित होतो. महादेव हे देवांचे देव आहेत. त्याच्या मुखातून आलेली कथा पार्वती मातेसोबत शुकाने श्रवण केली व अमरत्व प्राप्त झाले. अश्या गोष्टी जीवनाचा आधार ठरतात.
रामाशिवाय शिव नाहीत
शिवाशिवाय राम नाहीत…
भगवान शंकरांचे जीवन बघितले तर..
भगवान शंकरांना ‘देवाधिदेव’ महादेव म्हटले जाते. महादेवांचे एक रूप तांडव करणाऱ्या ‘नटराजा’चे आहे, तर दुसरे रूप एका महान ‘महायोगी’चे आहे. ही दोन्ही रूपे रहस्यांनी भरलेली आहेत. शिवशंभूंना ‘भोलेनाथ’ असेही म्हणतात. जिथे एकाच व्यक्तिमत्त्वात इतके विविध पैलू आहेत, तिथून आपण आपल्या जीवनासाठी प्रेरणा नक्कीच घेऊ शकतो.
वाईटाचा नाश करणे
ब्रह्मा हे उत्पत्तीसाठी आणि विष्णू हे सृष्टीच्या रचनेसाठी ओळखले जातात, तर शिव हे विनाशासाठी ओळखले जातात. शिवाचे हे रूप कदाचित भीतीदायक वाटू शकते, परंतु प्रगतीसाठी एखाद्या वाईट गोष्टीचा किंवा अनिष्ट प्रथांचा नाश होणे अत्यंत आवश्यक असते. शिव याच परिवर्तनासाठी ओळखले जातात.
शांत राहून स्वतःवर नियंत्रण मिळवणे
शिवापेक्षा मोठा कोणीही योगी झालेला नाही. एखाद्या परिस्थितीत स्वतःला गुंतवून न घेता, अलिप्त राहून त्या परिस्थितीवर पकड ठेवणे सोपे नसते. महादेव एकदा ध्यानाला बसले की संपूर्ण जग इकडे-तिकडे झाले तरी त्यांचे ध्यान कोणीही भंग करू शकत नाही. शिवाचे हे एकाग्र रूप आपल्याला जीवनातील गोष्टींवर नियंत्रण ठेवण्यास शिकवते.
नकारात्मक गोष्टींना सकारात्मकतेने स्वीकारणे
समुद्रमंथनातून जेव्हा विष बाहेर आले, तेव्हा ते पिण्याची कोणाचीही तयारी नव्हती. अशा वेळी महादेवांनी स्वतः ते विष (हलाहल) प्राशन केले आणि त्यांना ‘नीलकंठ’ हे नाव मिळाले. या घटनेतून हा मोठा धडा मिळतो की, आपणही जीवनातील नकारात्मक गोष्टी पचवून घ्याव्यात, पण त्याचा परिणाम ना स्वतःवर होऊ द्यावा, ना इतरांवर.
जोडीदाराबद्दल आदर
हिंदू मान्यतेनुसार महादेव हे एक आदर्श जोडीदार मानले जातात. जर पार्वतीने त्यांना प्राप्त करण्यासाठी वर्षानुवर्षे तपश्चर्या केली, तर शिवानेही त्यांना आपली ‘अर्धांगिनी’ बनवून पूर्ण सन्मान दिला. म्हणूनच ३३ कोटी देवांमध्ये केवळ शिवांनाच ‘अर्धनारीश्वर’ म्हटले जाते.
सदैव समान भाव ठेवणे
शिवाचे संपूर्ण रूप पाहिले तर असा संदेश मिळतो की, ज्या गोष्टी आपण साध्या डोळ्यांनी पाहणेही टाळतो, त्या त्यांनी सहज स्वीकारल्या आहेत. म्हणूनच त्यांच्या लग्नाला भूतांची टोळी आली होती आणि अंगाला राख लावलेल्या भोळ्यानाथांच्या गळ्यात साप लटकलेला असतो. वाईट कशातच नसते, फक्त एकदा तुम्हाला ते स्वीकारता आले पाहिजे.
तिसरा डोळा उघडणे
शिवांना ‘त्र्यंबक’ म्हटले जाते कारण त्यांना तिसरा डोळा आहे. तिसरा डोळा म्हणजे बोध किंवा अनुभूतीचा एक वेगळा आयाम (Dimension) खुला होणे. दोन डोळे फक्त भौतिक जग पाहू शकतात, पण तिसरा डोळा अंतर्मनात पाहतो. या ज्ञानामुळे तुम्ही जीवनाकडे पूर्णपणे वेगळ्या दृष्टिकोनातून पाहू शकता. त्यामुळे कोणत्याही ठरवलेल्या वाटेवर चालण्यापूर्वी स्वतः विचार करा आणि गोष्टी समजून घ्या.
स्वतःचा मार्ग स्वतः निवडणे
शिवांची जीवनशैली असो वा त्यांचे कोणतेही अवतार, ते प्रत्येक रूपात पूर्णपणे वेगळे आहेत. मग ते तांडव करणारे नटराज असोत, विष प्राशन करणारे नीलकंठ असोत, अर्धनारीश्वर असोत किंवा लवकर प्रसन्न होणारे भोलेनाथ असोत. ते प्रत्येक रूपात जीवनाला एक योग्य दिशा दाखवतात.
आपली ग्रंथसंपदा अथांग आहे! त्यातील एखादा कण जरी वेचता आला व त्याची प्रचिती घेण्यासाठी बुद्धी चा निश्चय झाला व तसे आचरण करता आले तर आणि तरच मानवी जीवनाचे कल्याण आहे म्हणून च चिंतन केले
मनकवडा राम… आत्माराम त्याचच खरा आधार व साक्षीदार ही तोच!
जे घडतंय व घडेल ते त्याच्या कृपेने घडणार तर मायिक शब्दांना काय स्थान?
☆ प्रायव्हसी – – लेखक : श्री कैलास मोरे ☆ प्रस्तुती – सुश्री सुनीला वैशंपायन☆
आमच्या समोरच्या एका आलिशान फ्लॅटमध्ये मीनाक्षी काकू राहायला आल्या, तेव्हा त्यांच्या डोळ्यांत खूप स्वप्नं होती. मुलगा ‘अमित’ आणि सून ‘सोनल’ दोघेही आयटी क्षेत्रातील मोठे अधिकारी. सुरुवातीचे काही दिवस खूप छान गेले. सोनल कौतुकाने त्यांना मॉलमध्ये फिरायला न्यायची, नवीन साड्या घ्यायची. पण जसजसा काळ लोटला, तसतसं ‘शहरी वास्तव’ समोर येऊ लागलं.
एके दिवशी दुपारी मीनाक्षी काकूंनी सोनलच्या बेडरूमचा दरवाजा उघडला—फक्त विचारण्यासाठी की संध्याकाळी काय बनवू? सोनल लॅपटॉपवर मीटिंगमध्ये होती. तिने रागाने काकूंकडे पाहिलं आणि मीटिंग संपल्यावर म्हणाली,
“आई, प्लीज… तुम्ही दरवाजा नॉक केल्याशिवाय आत नका येत जाऊ. ही माझी प्रायव्हसी आहे. कामात व्यत्यय येतो. “
मीनाक्षी काकूंना ते ‘नॉक करणं’ पचनी पडलं नाही. त्यांना वाटलं, पोटच्या लेकाच्या खोलीत जायला आता परवान्याची गरज लागणार? तिथूनच नात्यात एक अदृश्य भिंत उभी राहिली.
दिवसेंदिवस सोनल आणि अमित आपल्या कॉर्पोरेट आयुष्यात इतके गुंतले की मीनाक्षी काकू त्या घरात फक्त ‘मुलाला सांभाळणाऱ्या’ आणि ‘स्वयंपाक करणाऱ्या’ व्यक्ती उरल्या. संवादाची जागा मोबाईलच्या मेसेजेसनी घेतली.
एके रात्री घराच्या बाल्कनीत मीनाक्षी काकू एकट्याच बसल्या होत्या. सोनल बाहेर आली, पण तीही फोनवर बोलत होती. मीनाक्षी काकू म्हणाल्या,
“सोनू, आज तुझ्या आवडीची पुरणपोळी केलीये गं, ये लवकर जेवायला. ” सोनलने चिडून उत्तर दिलं,
“आई, मी डाएटवर आहे आणि मला खूप कॉल्स आहेत. तुम्ही जेवून घ्या, माझं मला कळतं. “
त्या रात्री जेवणाचं ताट समोर असूनही मीनाक्षी काकूंच्या घशाखाली घास उतरला नाही. ज्या मुलाला आणि सुनेला त्यांनी आपलं जग मानलं, त्यांच्याच जगात आज त्यांना स्थान उरलं नव्हतं.
काही दिवसांनी मीनाक्षी काकूंनी निर्णय घेतला की त्या गावी परत जाणार. अमितने विचारलं,
“का आई? इथे काय कमी आहे? एसी आहे, गाडी आहे, सगळं सुख आहे. “
तेव्हा मीनाक्षी काकूंच्या डोळ्यांतून पाणी आलं. त्या शांतपणे म्हणाल्या,
“बाळा, या घराच्या भिंती चकचकीत आहेत, पण त्या बोलत नाहीत. इथे एसीची थंडी आहे, पण मायेची ऊब नाही. सोनलला तिची ‘स्पेस’ हवीय आणि मला माझं ‘अंगण’. काळ बदलला म्हणून माणसांनी एकमेकांकडे पाहायची दृष्टी इतकी बदलावी, की रक्ताचं नात्याचं ही ओझं वाटावं? “
सोनल दारात उभी राहून हे सगळं ऐकत होती. तिला तिची चूक उमजली होती, पण तोपर्यंत मीनाक्षी काकूंनी आपली बॅग भरली होती. काळ बदलला होता आणि त्या काळाच्या ओघात एक सुंदर नातं ‘प्रायव्हसी’ आणि ‘व्यस्तते’च्या नावाखाली कायमचं दुभंगलं होतं.
मीनाक्षी काकूंची बॅग भरलेली होती. कपाट अर्धवट उघडं, आतल्या साड्यांच्या घड्या जणू काही त्यांनाच थांबवण्याचा प्रयत्न करत होत्या. सोनल दाराशी उभी होती—पहिल्यांदाच तिच्या हातातला फोन शांत होता आणि मनातला आवाज मोठा.
त्या रात्री घरात कोणीच जेवलं नाही. अमित ऑफिसच्या मेल्सकडे पाहत बसला होता, पण अक्षरं धूसर दिसत होती. आईच्या डोळ्यांतलं पाणी त्याला सतत आठवत होतं.
“एसीची थंडी आहे, पण मायेची ऊब नाही…” हे वाक्य त्याच्या कानात घुमत राहिलं.
पहाटेच्या सुमारास सोनल हळूच मीनाक्षी काकूंच्या खोलीत आली. काकू जाग्याच होत्या. त्यांच्या हातात जुन्या फोटोचा अल्बम होता—अमितच्या लहानपणीच्या आठवणी, शाळेचा पहिला दिवस, वाढदिवस, त्याच्या बाबांच्या छायाचित्रासमोरचा दिवा…
सोनल शांतपणे त्यांच्या पायाशी बसली.
“आई… माफ करा मला. ” तिचा आवाज थरथरत होता. “मी माझा ‘स्पेस’ मागत होते, पण तुम्हाला मनातून दूर करत होते हे मला कळलंच नाही. मी करिअर, डेडलाईन्स, प्रायव्हसी यांच्यात इतकी गुंतले की… तुमच्या मनातलं ऐकलंच नाही. “
मीनाक्षी काकूंनी काही क्षण तिच्याकडे पाहिलं. त्या नजरेत राग नव्हता—फक्त खोल दुखावलेपण होतं.
“सोनू, मला तुमच्या आयुष्यात अडथळा व्हायचं नव्हतं गं. फक्त एवढंच वाटायचं की, या मोठ्या घरात कुणीतरी मला दोन मिनिटं बसून विचारावं—‘आई, कशी आहेस? ’”
तेवढ्यात अमितही आत आला. त्याच्या डोळ्यांत अपराधाची जाणीव स्पष्ट होती.
“आई, चूक माझी आहे. मीच दोघींमध्ये दुवा व्हायला हवा होता. ऑफिसच्या नावाखाली मी जबाबदारी टाळली. तु कधी काही मागितलंच नाही… म्हणून आम्ही देणंही विसरलो. “
क्षणभर खोलीत शांतता पसरली. बाहेरून पहाटेचा हलका उजेड आत शिरत होता—जणू काही नव्या सुरुवातीची चाहूल देत.
सोनल उठली, बॅग उघडली आणि कपडे परत कपाटात ठेवू लागली.
“आई, तुम्ही कुठेही जाणार नाही. पण एक वचन द्या—तुम्हाला जे खटकतं ते मला थेट सांगा. आम्हीही शिकलो पाहिजे. या घरात तुमचा ही हक्क असू दे… पण मनावर ओझं नको. “
मीनाक्षी काकूंच्या ओठांवर हलकंसं हसू उमटलं.
“ठीक आहे. मी दरवाजा नॉक करीन… पण तुम्हीही कधीमधी माझ्या अंगणात या. माझ्या गोष्टी ऐका. “
त्या दिवशी संध्याकाळी वेगळंच चित्र होतं. तिघंही एकत्र बसून जेवत होते. सोनलने स्वतःहून पुरणपोळीचा छोटासा तुकडा घेतला.
“आई डाएट उद्यापासून, ” ती हसत म्हणाली.
अमितने आईचा हात हातात घेतला.
“आई, घर मोठं आहे म्हणून माणसं दूर असायला नकोत. आपण नियम बनवू—रोज किमान एकत्र चहा. फोन बाजूला ठेवून. “
बाल्कनीत पुन्हा तेच तिघं उभे होते. पण आज वातावरण वेगळं होतं. एसीची थंडी होतीच, पण त्यात मायेची ऊब मिसळली होती.
कधी कधी नातं दुभंगत नाही—आपणच त्याकडे पाहणारा आरसा धुळीने झाकतो. ती धूळ साफ करायला थोडं धैर्य, थोडी कबुली आणि थोडं प्रेम पुरेसं असतं.
त्या घरात आता ‘प्रायव्हसी’ होती, पण त्याहून मोठं ‘आपलेपण’ होतं.
आणि दुभंगलेला आरसा… पुन्हा एकदा अखंड झाला होता.
त्या दिवसानंतर घरातले नियम बदलले होते—रोजचा एकत्र चहा, आठवड्यातून एकदा बाहेर फेरफटका, आणि सर्वात महत्त्वाचं म्हणजे मनातलं न भिता बोलायचं. काही दिवस सगळं खरंच सुरळीत चाललं.
पण आयुष्य नेहमीच सरळ रेषेत चालत नाही.
एक दुपार अचानक मीनाक्षी काकूंना चक्कर आली.
स्वयंपाकघरातल्या उकळत्या आमटीचा वास सर्वत्र पसरलेला होता, गॅस चालूच होता आणि त्या खाली बसल्या होत्या. सोनलने धावत जाऊन त्यांना सावरलं. अमितला फोन केला. दोघांनी मिळून त्यांना हॉस्पिटलमध्ये दाखल केलं.
डॉक्टरांनी शांतपणे सांगितलं, “वय झालंय… शरीर थकायला लागतं. काळजी घ्या. त्यांना ताण नको. ”
त्या रात्री हॉस्पिटलच्या पांढऱ्या भिंतींमध्ये बसून सोनल पहिल्यांदाच स्वतःला पूर्णपणे असहाय्य समजत होती. लॅपटॉप नव्हता, मीटिंग नव्हती, डेडलाईन नव्हती—फक्त आईच्या श्वासांचा मंद आवाज होता.
तिने हळूच काकूंचा हात हातात घेतला. तो हात उबदार होता, पण थरथरत होता.
“आई… तुम्हाला बरं व्हायलाच पाहिजे. अजून मला तुमच्याकडून पुरणपोळी शिकायची आहे. अजून तुमच्या गोष्टी ऐकायच्या आहेत. ”
“सोनू… मी आहे गं इथेच. पण एक सांगू? त्या दिवशी मी जायला निघाले होते ना… तेव्हा मनात खूप भीती होती. वाटलं, माझं लेकरू माझ्याशिवाय जगायला शिकलंय. मी उगाचच ओझं झालेय. ”
अमित बाजूलाच उभा होता. त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू ओघळले.
“आई, आम्ही मोठे झालो म्हणून तुझी गरज कमी झाली असं नाही. उलट… आम्हाला समजायला वेळ लागला. ”
काही दिवसांनी काकू घरी परतल्या. पण त्या पूर्वीसारख्या राहिल्या नाहीत. शरीर कमकुवत झालं होतं. आता स्वयंपाक सोनल करत होती. सकाळी ऑफिसला जाण्यापूर्वी ती काकूंच्या खोलीत डोकवायची, त्यांच्या केसांवरून हात फिरवायची. अमित रोज त्यांच्या शेजारी बसून जुने फोटो पाहायचा.
एक संध्याकाळी बाल्कनीत तिघं बसले होते. आकाशात सूर्य मावळत होता. मीनाक्षी काकूंनी शांतपणे म्हटलं,
“माझं अंगण आता इथेच आहे. गावी परत जायची गरज नाही.
कारण अंगण मातीचं नसतं रे… माणसांचं असतं. ”
सोनलने त्यांच्या खांद्यावर डोकं टेकवलं.
“आई, तुम्ही आम्हाला उशिरा का होईना, पण शिकवलंत—घर फक्त चार भिंतींचं नसतं. ते स्पर्शाचं, वेळेचं आणि शब्दांचं असतं. ”
काही महिन्यांनी, एक पहाट मात्र वेगळीच उजाडली. मीनाक्षी काकू शांत झोपेतच निघून गेल्या. चेहऱ्यावर समाधान होतं—जणू काही अपूर्ण राहिलेलं काहीच नव्हतं.
घर पुन्हा एकदा शांत झालं. पण यावेळी ती शांतता रिकामी नव्हती—ती आठवणींनी भरलेली होती.
स्वयंपाकघरात सोनल पुरणपोळी करत उभी होती. डोळ्यांत पाणी होतं, पण ओठांवर हलकंसं हसूही होतं. अमितने मागून येऊन तिला मिठी मारली.
“आई असती तर म्हणाली असती—‘गोड जरा कमी पडलंय. ’”
दोघंही हसले… आणि रडलेही.
बाल्कनीत उभं राहून अमित म्हणाला,
“एसीची थंडी आहे… पण आता मायेची ऊब नाही. कारण आईने ती आपल्या सोबत घेऊन गेली. ”
कधी कधी नातं तुटत नाही—ते वेळेआधी समजून घेतलं नाही तर हातातून निसटतं.
पण जेव्हा समज येते, तेव्हा जरी माणूस सोबत नसला… तरी त्याचं प्रेम आयुष्यभर साथ देत राहतं.
त्या घरात आता एक फोटो होता—हसऱ्या मीनाक्षी काकूंचा.
आणि त्या फोटोसमोर रोज दिवा लावला जायचा… फक्त प्रकाशासाठी नाही, तर त्या मायेच्या ऊबेसाठी, जी शेवटी घराला खरं घर बनवून गेली.
लेखक : श्री कैलास मोरे
प्रस्तुती : सुनीला वैशंपायन
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈