(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९१ ☆
☆ सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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कहती हैं उज्ज्वल भविष्य पर, शिक्षक ही उपलब्ध नहीं।
जो हैं द्रोणाचार्य, एकलव्यों सा है प्रारब्ध यहीं।।
विश्वमित्र-संदीपनी गायब, राम-कृष्ण होंगे कैसे?
शोषित-पीड़ित शिक्षक जीवन बिता रहा जैसे-तैसे।।
धृतराष्ट्रों के वंशज पैलेट साध निशाना दे मारें।
शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।।
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गुरुकुल पूँजीपति के हाथों बेच, किया है बंटाढार।
सरकारी शालाएँ बंजर, छलें दिखा भोजन उपहार।।
हैं नियुक्ति में घपलेबाजी, ट्रांसफर में नीलामी है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिमटा संड्सी…“।)
अभी अभी # १०८१ ⇒ आलेख – चिमटा संड्सी श्री प्रदीप शर्मा
चिमटा और संड्सी का पूरा जीवन, किसी आदर्श गृहिणी की तरह चौके चूल्हे में ही गुजर जाता है। इन्हें भले ही पर्दे में नहीं रखा जाता हो, लेकिन इन्हें कभी रसोईघर छोड़ने की अनुमति नहीं मिलती। बैठक में तो इनकी परछाई भी प्रवेश नहीं कर सकती। इन्हें अक्सर आग से खेलना पड़ता है।
इनका रसोईघर में वही महत्व होता है जो पिंचिस, पेचकस(स्क्रूड्राइवर) और पाने(प्लायर) का एक मैकेनिक के लिए होता है।
रसोईघर भले ही कोई वर्कशॉप नहीं हो, लेकिन एक पाकशाला तो है ही।।
जब चिमटा छोटा होता है तो उसे चिमटी कहते हैं। अक्सर डिसेक्शन बॉक्स में और घड़ीसाजों के पास घड़ी के छोटे छोटे कलपुर्जों को पकड़ने के लिए चिमटियों का उपयोग होता है, जिसे forcep कहते हैं। बचपन में भाई बहन आपस में, और स्कूल में बच्चे एक दूसरे को च्यूंटी खोड़ते थे। यह एक ऐसी हरकत थी, जिस पर अक्सर किसी तीसरे व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता था।
नाम के अनुरूप इसमें चींटी काटने जितना ही दर्द होता था। इसकी शिकायत एक आम समस्या थी।
जहां तवा है, वहां चिमटा है। बिना चिमटे के आग पर रोटी नहीं सिकती। पापड़ भी बिना चिमटे के नहीं सिकता। कितनी बार उलटने पलटने पर पापड़ की बेदाग सिकाई होती है, यह सब कुशल गृहिणी के साथ चिमटे का भी तो कमाल है। शैतान बच्चों के लिए माता का यह प्रिय गर्म अस्त्र बन जाता था जिससे सिर्फ उन्हें डराया जाता था।।
जब चिमटा और बड़ा हो जाता है तो उसे सन्यास ग्रहण करना पड़ता है और वह बाबाओं के हाथ में चला जाता है, तवे की रोटी त्याग इसे अलख जगानी पड़ती है। अलख निरंजन।
संड्सी को कुछ लोग संडासी भी कहते हैं, जो गलत है। वे भूल जाते हैं, मराठी में संडास किसे कहते हैं। हमारी भारतीय महिलाओं का रसोईघर, पूजा घर जितना ही पवित्र और साफ सुथरा होता है। कच्चे घरों में तो रोज रसोई के साथ चूल्हे को भी लीपा जाता था। रसोईघर में जूते चप्पल निषेध थे। तपेली, भगोनी और चूल्हे पर चढ़े अन्य गर्म पात्रों को संड्सी की पकड़ ही कुशलता से उतार पाती है। अगर चूल्हे पर दूध उफन रहा हो और आसपास संड्सी नदारद हो तो घर में ही दूध की गंगा बह जाती है।
समय के साथ किचेनवेयर में भी बदलाव आने लगा है। तवे का स्थान हैंडल वाले नॉन स्टिक pan पैन ने ले लिया है। सभी बर्तनों में आजकल हैंडल लगे होते हैं। फिर भी चिमटे और संड्सी का महत्व कम नहीं हुआ है। कुशल गृहिणी है जहां, चिमटा संड्सी है वहां।।
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (31 अगस्त से 6 सितंबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। अगर आप श्री राम जी के भक्त हैं और उनकी कृपा आपको मिल रही है तो श्री हनुमान जी की कृपा आपको स्वयं ही प्राप्त हो जाएगी। जिस व्यक्ति पर श्री हनुमान जी की कृपा होती है उसको कोई भी व्यक्ति, विपत्ति, संकट पीड़ा, व्याधि आदि सता नहीं सकता है। हम सभी श्री हनुमान जी से अष्ट सिद्धि और नव निधि के अलावा मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। श्री हनुमान जी की सेवा करके हम सभी प्रकार के सुख अर्थात आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के सुख प्राप्त कर सकते हैं। श्री हनुमान जी की कृपा पाने के लिए सबसे अच्छी पुस्तक श्री हनुमान चालीसा है और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है –
और देवता चित्त न धरई |
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से सभी प्रकार के संकट स्वयं ही दूर हो जाएंगे। इस प्रकार श्री हनुमान जी के कृपा से आपके सभी संकट दूर हो जाएंगे। अतः किसी और देवता की आराधना करने की आपको आवश्यकता नहीं रहेगी।
“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 31 अगस्त से 6 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा। इस सप्ताह सूर्य और बुध सिंह राशि में, मंगल मिथुन राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि वक्री होकर मीन राशि में तथा राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।
शुक्र प्रारंभ में कन्या राशि में रहेंगे तथा 1 तारीख के 4:55 रात अंत से तुला राशि में प्रवेश करेंगे। आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको सफलताएं प्राप्त होंगी। संतान का बहुत अच्छा सहयोग भी आपको प्राप्त हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। उनको परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपकी प्रतिष्ठा उत्तम रहेगी। माता जी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के बहुत अच्छे प्रस्ताव आएंगे। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। पुराने प्रेम संबंधों में मजबूती आएगी। भाग्य इस सप्ताह आपका साथ दे सकता है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव होगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर अच्छे परिणाम दायक हैं। तीन और चार सितंबर को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। 31 अगस्त को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। धन आने के मार्ग में कुछ बाधा हैं। भाग्य से सामान्य मदद मिलेगी। विशेष मदद की उम्मीद ना करें। अपने कर्मों पर विश्वास करें। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 सितंबर सफलता दायक है। एक और दो सितंबर को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह भी आपके पास धन आने की उम्मीद है। यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको तरक्की मिल सकती है। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। संतान के सुख में वृद्धि होगी। भाग्य से इस सप्ताह आप कोई भी उम्मीद ना करें। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त और 5 तथा 6 सितंबर विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दिलाने वाले हैं। तीन और चार सितंबर को आपको थोड़ा सावधान रहकर अपने कार्यों को होशियारी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपको धन और प्रतिष्ठा दोनों मिल सकती है। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। इस सप्ताह आपका और आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। भाग्य से सामान्य मदद प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर उपयोगी हैं। पांच और छह सितंबर को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास उच्च कोटि का रहेगा। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध नरम और गरम रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधान रहकर कार्य करें। आपके माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से उपयोगी है। धन लाभ में कमी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार तारीख विशेष रूप से लाभदायक है। 31 अगस्त को आपको सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
कन्या राशि
कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर और धन खर्च करने पर सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके पास धन आने की अच्छी संभावना है। धन प्राप्ति का पूर्ण प्रयास करें। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर करके कार्य करना चाहिए। आपका और आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ भी संबंध ठीक रहेंगे। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त तथा 5 और 6 सितंबर फलदायक है। एक और दो सितंबर को आपको सचेत रहना चाहिए। तीन और चार सितंबर को आपको भाग्य से विशेष मदद प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन प्राप्त करने का पूर्ण प्रयास करें। अधिकारीयों और कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आप अपने कर्म पर विश्वास करें। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। छात्रों के पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर अनुकूल है। 31 अगस्त, तीन और 9 सितंबर को आपको होशियारी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृश्चिक राशि
कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। । पूर्ण प्रयास करने पड़ेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। कार्यालय में उनको सम्मान प्राप्त होगा। पिछले सप्ताह की भांति इस सप्ताह भी भाग्य आपकी मदद करेगा। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। अगर खराब है तो उनमें सुधार आएगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार सितंबर परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य से भरपूर मदद मिलेगी। आपके कई कार्य आपके थोड़े से प्रयास से ही पूर्ण हो जाएंगे। धन आने का अच्छा योग है। धन प्राप्ति हेतु पूर्ण प्रयास करें। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से ठीक रहेगा। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त तथा 5 और 6 सितंबर लाभप्रद हैं। तीन और चार सितंबर को आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अच्छा है। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। उनको सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं। भाग्य से मामूली मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से परास्त कर सकते हैं। आपका स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ भी संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर कार्यों को करने के लिए उचित है। तीन और चार सितंबर को आपके संतान को लाभ हो सकता है। छात्रों को परीक्षाओं में सफलता मिल सकती है। पांच और छह सितंबर को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना चाहिए। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
कुंभ राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको सफलताएं प्राप्त होगी। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में उन्नति होगी। धन भी प्राप्त होगा। भाग्य आपका साथ देगा। आप जितना कार्य करेंगे उससे बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे। आपके माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए सप्ताह सामान्य है। तीन और चार सितंबर कार्यों को करने के लिए उपयुक्त हैं। तीन और चार सितंबर को ही आपको प्रतिष्ठा मिल सकती है। अधिकारी और कर्मचारियों को तीन और चार सितंबर को थोड़ा सावधान रहकर अपने मनोस्थिति को ठीक रखना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो सकती है। आपकी संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। छात्रों को इस सप्ताह परीक्षाओं में सफलता प्राप्त हो सकती है। दुर्घटनाओं में आपको कष्ट नहीं होगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। इस सप्ताह 31 अगस्त और पांच तथा 6 सितंबर आपके लिए प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
साहित्यिक परिचय – साधारण इयत्ता १० वी पासून कविता लेखनाला सुरुवात झाली. कवितेच्या जगात जास्त रमलो. ललितलेखन, कथालेखन, चिंतनात्मक लेखन याचीही मुशाफिरी केली परंतु आतून ओढा नेहमी कवितेकडे, गीतरचनेकडे राहिला आहे. वृत्तबद्ध, छंदोबद्ध रचनांचा अभ्यास केल्यानंतर त्याची आवड निर्माण झाली. मुक्तछंद लिहिताना पण लयीत लिहिण्याची आवड कायम राहिली. कवितेत यमक अलंकार फार आवडता आहे. कवितेचे विषय निसर्ग, वैचारिक, चिंतनात्मक, प्रसंग चित्रणात्मक अशा प्रांतात वावरणारे जास्त आहेत. ग दि माडगूळकर, बा भ बोरकर, कुसुमाग्रज, गोविंदाग्रज, मंगेश पाडगावकर हे अत्यंत आवडते कवी आहेत. संत वाङमय, अभंग यांची आवड आहे. कवींच्या, संताच्या रचनांचा व्यासंग आणि अभ्यास करणे आवडते. विविध काव्यसंमेलने आणि काव्यस्पर्धांमध्ये सहभाग घेतलेला आहे.
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम् ।।५।।
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☆ सूर्य स्तोत्र ☆ भावानुवाद : डॉ. निशिकान्त श्रोत्री ☆
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प्रभाते स्मरितो श्रेष्ठ सविता रूप मी
ब्रह्माण्ड केंद्रवासी यज्ञकर्ता देहस्वामी ।
समप्रकाशी किरणे उत्पत्तीमूल अहंकार विना
ब्रह्मासमान पद्मशुद्ध सदैव चिंतनीय मना ॥१॥
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सकलांचा तारणहार सुंदरदेही मनप्रसन्न
ब्रह्मेंद्रादी देवता अर्चिती त्या प्रभाते नमन
त्रिगुणीपूर्ण वर्षाकारक संरक्षक नियंत्रक
सकलांचा पालनकर्ता त्रैलोक्याचा पालक ॥२॥
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प्रभाते भजितो सवितृदेव अनंत शक्तीचा
पापानाशक रोगहारक निवारक शत्रुभयाचा
मूर्तिमान कालस्वरूपी चक्षु समस्त लोकांचा
नमन आदिदेवासी हटवी पाश जसा गोकंठाचा ॥३॥
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ॐ देवतांस्तव उधळित उदय प्रकाशाचा
मित्राचा नेत्र स्वामी वरुणाचा अग्नीचा
धारयितो पृथ्वी अंतरिक्ष तथा भास्कराला
आत्मा हा विश्वाचा श्रवण करितो विश्वाला ॥४॥
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उषादेवी संगे प्रकाशमान सूर्य देदिप्यमान
अंत समयी नारीस देउन साथ करी रक्षण
प्रतिक्षा करिती जेथ मनुज पूजिती देवतांसी
शुभ कल्याण तेथ होई शुभ कल्याणासी ॥५॥
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॥ इति श्री महर्षि मयासूर रचित निशिकान्त भावानुवादित श्री सूर्यस्तोत्र संपूर्ण ॥
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जरी हे स्तोत्र सूर्य स्तोत्र म्हणून प्रसिद्ध असले तरी हे स्तवन सूर्यमालेतील सूर्याचे नसून ते विश्वकेंद्री सवितृ देवाचे म्हणजेच विश्वात्म्याचे आहे. विशेषतः हे पहिला व चौथ्या श्लोकांमधून स्पष्ट होते.
“आणि आपली बया बसलीये पाच वर्षांपासून घरी. किती अपेक्षा होत्या मला तिच्याकडून. कंप्युटर इंजीनियर झाल्याझाल्या तिला चांगल्या कंपनीत नोकरी लागेल, चांगला पगार मिळेल, चारचौघात अभिमानाने सांगता येईल की माझी मुलगी या नावाजलेल्या कंपनीत नोकरी करतेय. तिला एवढं पॅकेज आहे. पण नाही, एकही अपेक्षा पोरीनं पुर्ण केली नाही ” विनायक उद्विग्न होऊन म्हणाला
” जाऊ द्या. अशीही आपल्याला काही तिच्या पैशांची गरज नाहीये “
” पैशाचा इश्यूच नाहीये माधवी. इतकं चांगलं शिक्षण घेऊनही तुम्ही त्या शिक्षणाचा उपयोग करत नाहीये तर त्या शिक्षणाचा फायदाच काय? मग साधं बीए, बीकॉम केलं असतं तरी चाललं असतं. कशाला तिच्या शिक्षणासाठी आपण इतका पैसा खर्च केला असता? ” विनायक चिडून म्हणाला
” जाऊ द्या तुम्ही चिडू नका. शांततेने जेवून घ्या. आणि तिलाही काही बोलू नका. उगीच तुमचा बीपी वाढून जाईल “
” वाईट वाटतं गं! लोक विचारतात तेव्हा सांगायलाही लाज वाटते की माझी मुलगी घरीच बसलीये. कसलाच जाॅब करत नाहीये “
” मी परवाच तिला नोकरीबद्दल बोलले तर ती माझ्यावरच खवळली. ‘ तुम्हांला मी जड झाले असेन तर करुन टाका माझं लग्न ‘असं म्हणायला लागली “
” दुसरा पर्यायच काय ठेवलाय तिनं आपल्यासमोर? खरंच यावर्षी करुनच टाकतो तिचं लग्न ” विनायक उद्वेगाने म्हणाला
” नाहीतर काय! घरात बसूनही काय करते ती? सांगितल्याशिवाय कोणतंही काम करत नाही. सदोदित तो मोबाईल घेऊन बसलेली असते. काय करते कुणास ठाऊक! आपण काही बोललो तर रुसून बसते. चारचार दिवस बोलत नाही “
“उद्यापासूनच तिच्यासाठी स्थळं बघायला सुरुवात करुया. आताच ती सव्वीस वर्षाची आहे. जास्त उशीर केला तर नंतर लग्न जमणंही कठीण होऊन बसेल. खरंतर आपण अगोदरच तिचं लग्न उरकून टाकायला हवं होतं. उगीच तिला नोकरी लागण्याची
वाट बघत बसलो “
” तिच तर म्हणत होती की ‘नोकरी लागल्याशिवाय लग्न करणार नाही म्हणून ‘आजकालची मुलं म्हणे नोकरी करणारी मुलगीच पसंत करतात’असं तिचंच म्हणणं होतं “
“आता तिचं काहिही ऐकायचं नाही. चांगलं स्थळ आलं की उरकून टाकायचं ” विनायक ठामपणे म्हणाला
दुसऱ्या दिवसापासून खरोखरच त्यानं वेगवेगळ्या शहरातल्या विवाह संस्था, मंडळात नयनाचं नाव नोंदवायला सुरुवात केली. आपल्या नातेवाईक, मित्रांना फोन केले. ‘मुलीचं यंदा कर्तव्य आहे तेव्हा तुमच्या माहितीतलं चांगलं स्थळ सुचवा “अशी त्यांना विनंती केली.
काही दिवसांनी एक चांगलं स्थळ चालून आलं. मुलगा हैदराबादला एका चांगल्या कंपनीत नोकरीला होता. नऊ
लाखाचं पॅकेज होतं. फोटोवरुन तरी चांगला दिसत होता. विनायकनं त्याची माहिती आणि फोटो नयना आणि माधवीच्या मोबाईलवर पाठवले. पण दोघींकडून कोणताही प्रतिसाद मिळाला नाही म्हणून दोन दिवसांनी त्यानंच माधवीला विचारलं.
“मी ते स्थळ पाठवलं होतं ते तुम्ही दोघींनी बघितलं नाही का? “
” बघितलं. नयना नाही म्हणतेय “
” का? सगळं तर चांगलं आहे “
” तिचं नेहमीचंच कारण. नोकरी लागल्याशिवाय लग्न करायचं नाही म्हणे “
” बोलव तिला ” विनायक संतापून म्हणाला
माधवीनं नयनाला तीनचार हाका मारल्या पण तिनं प्रतिसाद दिला नाही. शेवटी माधवी उठून तिच्या खोलीकडे गेली आणि तिला घेऊन आली.
“काय बाबा? “
“काय करत होतीस? तुझ्या आईनं इतक्या हाका मारल्या. ऐकू नाही आल्या? “विनायकनं रागाने विचारलं
“काही नाही. गाणी ऐकत होते. कानात ईअर फोन होते म्हणून ऐकू आलं नाही “
” बरं. मी ते स्थळ पाठवलं होतं, त्याला तू नाही म्हणतेय म्हणे “
” हो. मी मागेही तुम्हांला सांगितलं होतं की मला नोकरी लागल्याशिवाय लग्नच करायचं नाही म्हणून “
“मला एक सांग. तू इथे नोकरी करुन काय उपयोग? मुलगा जर दुसऱ्या शहरात असेल तर तुला इथली नोकरी सोडावीच लागणार ना? “
” हो बरोबर. पण आजकालच्या मुलांनाच नोकरी करणारी मुलगी हवी असते. नोकरी करणाऱ्या मुली स्मार्ट, हुशार आणि जगासोबत चालणाऱ्या असतात असं त्यांना वाटतं. अशा मुलींना जास्त पॅकेजेसची मुलं मिळतात “
” पण या मुलाची तर मुलगी नोकरी करणारीच हवी अशी काही अट नाहिये “
” हो. पण मग त्याला पॅकेजही तर कमीच आहे “
“नऊ लाखाचं पॅकेज कमी आहे? “विनायकनं आश्चर्याने विचारलं “तुला माहित नसेल बेटा की मी जेव्हा नोकरीला लागलो तेव्हा मला फक्त तेराशे रुपये पगार होता. हातात फक्त नऊशे-साडेनऊशे रुपये पडायचे. आमचं लग्न झालं तेव्हाही मला फक्त साडेतीन हजार पगार होता. तुझी आई श्रीमंत घरातली होती तरीसुद्धा तिच्या वडिलांनी फक्त माझी सरकारी नोकरी आणि आमचं घराणं पाहून आमचं लग्न लावून दिलं. आणि नंतरही आम्हांला कधी पैशांची चणचण भासली नाही. आज तीस वर्षाच्या नोकरीनंतरही माझं पॅकेज सोळाच लाख आहे. त्यामानाने या मुलाचं पॅकेज सुरुवातीलाच एकदम छान आहे. आणि ते पुढेही वाढू शकतं “
” तुमचा काळ वेगळा होता बाबा. आता महिन्याला एक लाखही पुरत नाहीत “
” तुम्ही स्वतःवर कंट्रोल नाही ठेवला तर महिन्याला पाच लाखही पुरणार नाहीत. व्यवस्थित मॅनेज केलं तर तीसचाळीस हजारातही महिना आरामात पार पडतो. तुझ्या दिलीपकाकाचंच उदाहरण घे. फक्त चाळीस हजारात व्यवस्थित घर चाललंय. मुलं महागड्या काॅलेजमध्ये शिकताहेत. खाऊनपिऊन सुखी आहेत. कधी पैसा पुरत नसल्याची तक्रार नसते. बरं जाऊ दे तुला जर नोकरीच करायची होती तर तू आतापर्यत काय केलंस? पाच वर्षं झालीत तुला इंजीनियर होऊन. तुझ्या सगळ्या मैत्रिणी नोकरीला लागल्यात म्हणे. मग तुलाच का नोकरी लागत नाहिये? “
नयनाचा चेहरा पडला. हळू आवाजात ती म्हणाली
” करतेय मी प्रयत्न पण कुठे जागाच निघत नाहीये त. आणि बाबा मी दोनदा केलीये नोकरी. अगदीच काही घरात बसून नव्हते. “
“बरोबर. पण ती किती महिने केलीस? त्या सुप्रीम इंडस्ट्रीज मध्ये तीन महिने आणि सायबर सोल्यूशन्समध्ये दोन महिने. खरं ना? “
” मग काय करणार? तिथं एक तर पगार कमी आणि हॅरॅसमेंटच इतकी होती की एकेक दिवस काढणं मला मुश्कील झालं होतं “
” बेटा नोकरी म्हंटलं की तिथं थोडीफार हॅरॅसमेंट असणारच. माझंच बघ. सरकारी नोकरी असूनही माझी ऑफिसमधून यायची वेळ नक्की नसते. बारा बारा तेरातेरा तास ड्युटी होऊन जाते. कधीकधी रविवारी, सुटीच्या दिवशीही ऑफिसला जावं लागतं. सततच्या मिटिंग्स्, काॅन्फरन्सने जीव वैतागून जातो. वरुन सिनीयर्सच्या शिव्या खाव्या लागतात त्या वेगळ्या च. सगळ्याच ठिकाणी थोड्याफार प्रमाणात असंच असतं कारण सगळ्यांवरच प्रेशर असतं. मलाही बऱ्याच वेळा वाटतं की सोडून द्यावी नोकरी. मस्त आराम करावा पण मी तसं करु शकत नाही ” विनायक तिला समजावत म्हणाला
” तुमची गोष्ट वेगळी आहे बाबा. तुम्ही कुटुंब प्रमुख आहात. तुम्हांला नोकरी सोडून कसं चालेल? आणि माझं चालू आहे नोकरी बघणं. नोकरी लागली की बघा मला मोठमोठ्या पॅकेजेसच्या मुलांची स्थळ चालून येतील “
” फक्त पॅकेजच महत्वाचं असतं का बेटा? मुलाचं घराणं, त्यातली माणसं, मुलावरचे संस्कार हे तुला महत्वाचे वाटत नाही का? आणि फार श्रीमंत घर कधीच नको. तिथे बऱ्याचदा बायकांना बरोबरीने वागवलं जात नाही. त्यांच्या मताला किंमत दिली जात नाही “
” असेलही तसं. पण आजकालच्या मुलींना हँडसम आणि श्रीमंत मुलगाच नवरा म्हणून हवा असतो “
” चुकीचं आहे ते. बरं जाऊ दे. मला तुझ्याशी वाद घालायचा नाहिये. महिनाभर आम्ही थांबतो. तोपर्यंत तुझ्या नोकरीचं जमलं तर ठिक नाहीतर चांगलं स्थळ आलं तर तुला लग्न करावंच लागेल “
” बाबा एका महिन्यात मला कशी नोकरी लागेल? एक वर्ष तरी थांबा “नयना काकुळतीने म्हणाली
” नाही. तुझ्या नोकरीची वाट बघताबघता पाच वर्षं निघून गेली आहेत. जास्त उशीर केला तर तू थोराड दिसायला लागशील. आणि मग थोराड दिसणाऱ्या मुलाशीच तुला लग्न करावं लागेल “
” मला कुणी समजूनच घेत नाही ” नयना संतापून रडायला लागली “ती आई तशीच आणि तुम्हीही तसेच
. सारखे मागे लागतात. मनासारखं काही करुच देत नाहीत “
☆ “जबाबदार कोण? पालक की मुले?” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆
भारतीय समाजात विवाह ही केवळ दोन व्यक्तींची वैयक्तिक निवड नसून ती कुटुंब, परंपरा, प्रतिष्ठा आणि सामाजिक मान्यतेशी घट्ट जोडलेली संस्था आहे. म्हणूनच “मला लग्न करायचं आहे की नाही, कधी करायचं आहे, कुणाशी करायचं आहे” हे प्रश्न वैयक्तिक असले तरी त्यांची उत्तरं अनेकदा व्यक्तीपेक्षा कुटुंब आणि समाज ठरवतात. ही मानसिकता इतकी खोलवर रुजलेली आहे की अत्यंत उच्चशिक्षित, परदेशात काम करणारे किंवा आर्थिकदृष्ट्या सक्षम असलेले तरुणसुद्धा विवाहासारख्या निर्णयात पूर्ण स्वायत्तता घेत नाहीत. यामागे केवळ परंपरेचा दबाव नाही, तर भावनिक, आर्थिक आणि सामाजिक सुरक्षिततेचे घटकही गुंतलेले आहेत. भारतीय कुटुंबव्यवस्थेची रचना ही सामूहिक आहे. म्हणजेच व्यक्तीपेक्षा कुटुंबाचे हित, सन्मान आणि एकात्मता यांना प्राधान्य दिले जाते. त्यामुळे मुलगा किंवा मुलगी लग्नाचा निर्णय घेताना “माझं आयुष्य” यापेक्षा “आपल्या घरचं काय? ” हा विचार अधिक महत्त्वाचा ठरतो. लग्न म्हणजे दोन कुटुंबांची सांगड अशी धारणा असल्याने, निर्णय प्रक्रियेत पालकांचा हस्तक्षेप ‘हक्काचा’ मानला जातो. अशा वातावरणात स्वतंत्र निर्णय घेणे बंडखोरी वाटू शकते. परिणामी, मुलं स्वतःहून लग्न ठरवण्याऐवजी कुटुंबाच्या मान्यतेची वाट पाहतात किंवा त्यांच्यावरच जबाबदारी सोपवतात.
यात आर्थिक मानसशास्त्राचाही मोठा वाटा आहे. लग्न हा भारतीय संदर्भात केवळ सोहळा नसून तो एक मोठा आर्थिक प्रकल्प असतो. हॉल, जेवण, कपडे, दागिने, पाहुणचार, या सर्वांचा खर्च प्रचंड असतो. परंपरेने हा खर्च पालकांनी उचलायचा असतो, आणि अनेक वेळा तो “प्रतिष्ठेचा प्रश्न” बनतो. त्यामुळे मुलगा-मुलगी आर्थिकदृष्ट्या सक्षम असले तरी “हे आई-वडिलांचं कर्तव्य आहे” ही धारणा त्यांच्या मनात कायम राहते. स्वतःच्या लग्नाचा संपूर्ण खर्च उचलणे म्हणजे केवळ पैसे देणे नाही, तर त्या खर्चामागील सामाजिक अपेक्षा, नातेवाईकांचे समाधान, प्रतिष्ठेचे गणित यांची जबाबदारी घेणे होय; आणि ही जबाबदारी घेण्यास अनेक जण मानसिकदृष्ट्या तयार नसतात. याशिवाय भावनिक अवलंबित्व हा एक महत्त्वाचा घटक आहे. भारतीय समाजात मुलांना लहानपणापासूनच “तुमच्यासाठी आम्ही आहोत” अशी शिकवण दिली जाते. त्यामुळे निर्णय घेताना स्वतःवर विश्वास ठेवण्यापेक्षा पालकांच्या अनुभवावर अवलंबून राहण्याची सवय लागते. लग्नासारख्या मोठ्या निर्णयात चूक झाली तर त्याचे परिणाम आयुष्यभर भोगावे लागतील, ही भीतीही असते. म्हणूनच “आई-वडिलांनी ठरवलेलं सुरक्षित” अशी मानसिकता तयार होते. हा केवळ भीतीचे परिणाम नसून, ती एक प्रकारची सामाजिक कंडिशनिंग आहे.
सामाजिक दबाव आणि सामाजिक प्रतिष्ठेचे राजकारणही या प्रश्नाच्या मागे दडलेले आहे. “लोक काय म्हणतील? ” हा भारतीय मानसिकतेचा केंद्रबिंदू आहे. मुलगा किंवा मुलगी स्वतः लग्न ठरवतात, विशेषतः आंतरजातीय किंवा आंतरधर्मीय, तर कुटुंबावर टीका होण्याची शक्यता वाढते. त्यामुळे अनेक वेळा पालक स्वतः पुढाकार घेतात आणि मुलांनाही तसेच करण्यास भाग पाडतात. परिणामी, व्यक्तीची स्वायत्तता दुय्यम ठरते आणि सामाजिक मान्यता प्राथमिक ठरते. मुलं स्वतःहून लग्न का ठरवत नाहीत याचे आणखी एक कारण म्हणजे निर्णयक्षमता विकसित न होणे. आपल्या शिक्षणपद्धतीत करिअर, स्पर्धा, नोकरी यावर भर दिला जातो; पण जीवननिर्णय, नातेसंबंध, भावनिक परिपक्वता याबाबत मार्गदर्शन कमी असते. त्यामुळे एखादी व्यक्ती तांत्रिकदृष्ट्या अत्यंत सक्षम असली तरी वैयक्तिक आयुष्याचे निर्णय घेण्यात ती गोंधळलेली असू शकते. यामुळे “कुटुंब ठरवेल” हा सोपा मार्ग निवडला जातो.
ही परिस्थिती बदलण्यासाठी केवळ आर्थिक स्वावलंबन पुरेसे नाही, तर मानसिक स्वातंत्र्य आणि जबाबदारीची जाणीव आवश्यक असते. जेव्हा व्यक्ती “माझ्या आयुष्याचे निर्णय मी घेईन आणि त्याचे परिणामही मी स्वीकारेन” अशी भूमिका घेते, तेव्हा खऱ्या अर्थाने बदल सुरू होतो. काही शहरी भागात, विशेषतः नव्या पिढीत, हा बदल दिसू लागला आहे. लव्ह मॅरेज, साधे विवाह, कोर्ट मॅरेज, स्वतः खर्च उचलणे यासारख्या प्रवृत्ती वाढत आहेत. पण हा बदल अजूनही मर्यादित आहे, कारण परंपरा आणि सामाजिक अपेक्षा अजूनही मजबूत आहेत. शेवटी, हा प्रश्न मुलं जबाबदारी का घेत नाहीत, इतकाच नाही तर समाज त्यांना तसे करू देतो का, हाही आहे.
अन्यायाची होण्याची जाणीव असताना व्यक्ती स्वतःच्या आयुष्यातील निर्णायक टप्प्यांवर, विशेषतः विवाहासारख्या निर्णयात, स्वतःची जबाबदारी का घेत नाही? हा प्रश्न केवळ स्त्रियांसाठीच नव्हे तर संपूर्ण समाजाच्या मानसिक रचनेवर प्रकाश टाकणारा आहे. कारण येथे “जबाबदारी घेतली नाही” हा निष्कर्ष जितका महत्त्वाचा आहे, तितकाच “घेऊ दिली गेली का? ” हाही प्रश्नही महत्त्वाचा आहे. या दोन स्तरांमधील ताण समजून घेतल्याशिवाय संपूर्ण चित्र स्पष्ट होत नाही. पुरुषप्रधान व्यवस्थेत स्त्रियांची सामाजिक घडण अशी झाली आहे की, आज्ञाधारकता, कुटुंबनिष्ठा आणि समायोजन हाच त्यांच्या चांगुलपणाचा निकष ठरवले गेला. त्यामुळे विवाहाच्या बाबतीत स्वतःची निवड मांडणे हा केवळ वैयक्तिक निर्णय नसून, कुटुंबाच्या अपेक्षांना आव्हान देणारे पाऊल ठरते. अशा वेळी “आई-वडिलांसमोर काही चाललं नाही” ही फक्त सबब नसून, ती एक सामाजिक वास्तवाची अभिव्यक्ती आहे. निर्णय घेण्याची क्षमता आणि त्यासाठी लागणारा आत्मविश्वास ही गोष्ट केवळ वैयक्तिक इच्छेवर अवलंबून नसते; ती दीर्घकाळाच्या संस्कारातून, संधींमधून आणि सामाजिक पाठबळातून विकसित होते. म्हणूनच अनेक स्त्रिया उच्चशिक्षित असूनही, निर्णायक क्षणी स्वतःची भूमिका ठामपणे मांडू शकत नाहीत.
सामाजिक बंधनांमध्ये अडकलेली व्यक्ती अनेकदा त्या बंधनांना स्वीकारून बसते आणि आपल्यावर अन्याय सहन करत असते. यालाच मानसशास्त्रात संस्कारातील गुलामी मान्य करणे म्हणतात. म्हणजेच बाह्य दडपण हळूहळू व्यक्तीच्या आतल्या विश्वासाचा भाग बनते. परिणामी, ती स्वतःच्या क्षमतेबद्दल शंका घेते, स्वतःच्या निवडीवर विश्वास ठेवत नाही आणि सुरक्षिततेच्या नावाखाली पारंपरिक मार्ग स्वीकारते. येथे अन्याय केवळ बाहेरून होत नाही, तर तो आपल्या अंतर्गतही होत राहतो. तथापि, सावित्रीबाई फुले आणि महर्षी कर्वे यांसारख्या समाजसुधारकांनी स्त्रीला स्वओळख, शिक्षण आणि स्वातंत्र्याची जाणीव करून देण्याचा जो प्रयत्न केला, तो पूर्णपणे समाजात झिरपला नाही, हेही वास्तव आहे. यामागे केवळ स्त्रियांची उदासीनता कारणीभूत नाही, तर त्या विचारांना प्रतिकार करणारी सामाजिक रचना अजूनही टिकून आहे. शिक्षण मिळालं तरी निर्णयस्वातंत्र्य मिळेलच असं नाही, कारण घरातील सत्तासंबंध, आर्थिक अवलंबित्व, आणि कुटुंब तुटेल या भीतीमुळे अनेक स्त्रिया तडजोडीचा मार्ग स्वीकारतात. त्यामुळे स्वातंत्र्याची जाणीव आणि स्वातंत्र्याची अंमलबजावणी यामध्ये मोठी दरी निर्माण होते.
आजची पिढी अशा लग्नाला “डिसफंक्शनल मॅरेज” म्हणून ओळखू लागलेली आहे, ही एक सकारात्मक बाब आहे. कारण आधी जे ‘नॉर्मल’ मानलं जात होतं ते भावनिक तुटलेपण, संवादाचा अभाव, केवळ सामाजिक बंधन म्हणून टिकवलेलं नातं आता प्रश्नांकित होत आहे. त्यामुळेच अनेक तरुण-तरुणी विवाहाबद्दल अधिक सजग झाले आहेत आणि “आपण हा अन्याय स्वतःवर होऊ देणार नाही” अशी भूमिका घेऊ लागले आहेत. या बदलामुळेच घटस्फोटांचे प्रमाण वाढताना दिसते. पण वाढते घटस्फोट हा कुटुंब संस्थेच्या अपयशाचा निर्देशक आहे की असमानतेला नकार देण्याचा प्रयत्न आहे, याचा विचार व्हायला हवा. त्यामुळे फक्त आजच्या पिढीला दोष देणं सोपं असलं तरी ते अपुरं आहे. कारण जेव्हा पिढ्यानुपिढ्या असमानतेवर आधारलेली विवाहसंस्था उभी केली जाते, तेव्हा तिच्या परिणामांना सामोरं जाताना संघर्ष अपरिहार्य असतो. आजचे तरुण-तरुणी समतेची अपेक्षा करतात, भावनिक सुसंवाद शोधतात आणि स्वतःची ओळख जपण्याचा प्रयत्न करतात. जर ही अपेक्षा पूर्ण होत नसेल, तर ते नातं तोडण्याचा निर्णय घेतात. हा केवळ ‘अधीरपणा’ नाही, तर ते मूल्यांमध्ये झालेल्या बदलाचे लक्षण आहे.
मग विवाहसंस्थेचा सुकाणू पारंपरिक असमानतेकडून समतेच्या आणि मानवतेच्या मूल्यांकडे वळवायचा का? याचे उत्तर समाजाच्या सामूहिक इच्छाशक्तीवर अवलंबून आहे. जर पालक अजूनही मुलांच्या आयुष्याचे निर्णय स्वतः घेण्याचा आग्रह धरत राहिले, तर नवीन पिढीशी संघर्ष वाढणारच. उलट, जर त्यांनी मुलांना निर्णयक्षम बनवले, त्यांच्या निवडीचा आदर केला, आणि समतेच्या मूल्यांना पाठिंबा दिला, तर विवाहसंस्था अधिक सुदृढ आणि अर्थपूर्ण होऊ शकते. म्हणून प्रश्न दोषारोपाचा नसून जबाबदारीच्या पुनर्वाटपाचा आहे. स्त्रिया, पुरुष, पालक आणि समाज, सर्वांनी मिळून विवाहाच्या संकल्पनेचा पुनर्विचार करण्याची गरज आहे. समता, स्वातंत्र्य आणि परस्पर सन्मान या मूल्यांवर आधारित नातेसंबंध निर्माण झाले, तरच विवाहसंस्था टिकाऊ आणि समाधानकारक ठरेल. अन्यथा, असमानतेवर उभी असलेली कोणतीही रचना कितीही परंपरेच्या आधारावर टिकवण्याचा प्रयत्न केला, तरी ती आतून पोखरलेलीच राहील. जोपर्यंत कुटुंब आणि समाज व्यक्तीच्या निर्णयक्षमतेवर विश्वास ठेवत नाहीत, तोपर्यंत मुलं पूर्ण स्वायत्ततेने लग्न ठरवतील आणि पार पाडतील अशी अपेक्षा वास्तववादी ठरणार नाही. ज्या प्रमाणात व्यक्ती स्वतःच्या आयुष्याची जबाबदारी स्वीकारेल आणि कुटुंब त्या स्वातंत्र्याला मान्यता देईल, त्या प्रमाणात भारतीय विवाहसंस्थेची मानसिकता बदलत जाईल, हेच खरे नाही का?
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०१ आणि १०२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. १०१ – –
जया नावडे नाम त्या येम जाची ।
विकल्पे उठे तर्क त्या नर्क ची ची ।
म्हणोनी अति आदरे नाम घ्यावे ।
मुखे बोलता दोष जाती स्वभावे ।।१०१।।
अर्थ :ज्या व्यक्तीला भगवंताचे नाम आवडत नाही अशा व्यक्तीला यम त्रास देतो. नामाबद्दल शंका आणि नाना प्रकारचे तर्क कुतर्क ज्याच्या मनात येतात अशा व्यक्तीला तिरस्करणीय नरक प्राप्त होतो. म्हणूनच अत्यंत आदराने भगवंताचे नाम घ्यावे. जो भगवंताचे नाम घेतो त्याच्या स्वभावातील दोष हळूहळू नाहीसे होऊ लागतात.
विवेचन – एखादी गोष्ट कर असे वारंवार सांगूनही जर कोणी ऐकत नसेल, तर त्या व्यक्तीला तसे न करण्याचे काय परिणाम होतील असे आपण समजावून सांगतो. विशेषतः लहान मुलांना एखाद्या गोष्टीतले धोके आपण समजावून सांगतो आणि मग तरी त्यांनी ती करावी अशी अपेक्षा करतो. तसेच समर्थ इथे आपल्याला नामस्मरणाचे महत्व समजावून सांगताना करत आहेत. वारंवार सांगूनही आपण जर नामस्मरण केले नाही तर अंतकाळी आपल्याला यम त्रास देतील, आपल्या मनात नामाबद्दल नको त्या कल्पना आणून जर आपण नाम घेतले नाही, तर लोकांमध्ये आपली छी थू होऊन आपल्या वाट्याला नरक ठरलेलाच आहे. म्हणूनच अत्यंत आदराने भगवंताचे नाम घ्यावे.
आपल्या धर्मशास्त्रात मृत्यूनंतरच्या जीवनासाठी स्वर्ग आणि नरक अशा कल्पना आहेत. पुण्यवान माणसाला स्वर्गप्राप्ती होते आणि पापी मनुष्य नरकात जातो अशी साधारण त्यातील कल्पना आहे. ज्याने पाप केले असेल, भगवंताचे नाम घेतले नसेल अशा व्यक्तीला यमदूत त्रास देतात. नाम न घेणाऱ्याला अशा प्रकारची स्थिती प्राप्त होते असे समर्थ सांगतात. समर्थांच्या काळात अशा कल्पनांवर लोकांचा जास्त विश्वास होता म्हणून समर्थांनी त्या प्रकारे समजावून सांगितले आहे. आज आपण ज्या काळात जगतो आहोत, त्या काळातील लोक स्वर्ग, नरक, यम इ. कल्पनांवर विश्वास ठेवणारे नाहीत. म्हणूनच या गोष्टींचा अर्थ आपण वेगळ्या प्रकाराने घ्यायला हवा.
आज जरी बरेचसे लोक स्वर्ग, नरक, यम इ. गोष्टींवर विश्वास ठेवत नसले तरी बरेचसे लोक हे मानतात की आपल्या बऱ्यावाईट वागण्याची फळं आपल्याला या ठिकाणीच भोगावी लागतात. सर्व संतांनी एकमुखाने भगवंताच्या नामाचा महिमा सांगितला आहे. संतांचे वागणे आणि बोलणे यात एकवाक्यता असते. ते जे बोलतात, त्यामागे स्वानुभवाचे सामर्थ्य असते. गोंदवलेकर महाराज आपल्याला जेव्हा रामनाम घ्यायला सांगतात, तेव्हा त्या नामाची महती त्यांनी स्वतः अनुभवलेली असते. ‘ आधी केले मग सांगितले ‘ असा हा रोकडा व्यवहार असतो. म्हणून निदान संतांच्या सांगण्यावर तरी आपण विश्वास ठेवून नाम घ्यायला हवे.
नाम घेण्याची ही सवय जर लावून घेतली नाही तर अंतकाळी देखील सवयीनुसार नाम न येता दुसऱ्याच गोष्टीत जीव अडकेल. प्राण जाताना त्यामुळे जीवाला वेदना होतील. ऐहिक गोष्टीतच जीव अडकेल. पुन्हा मग जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यात आपण अडकू. हाच यमदूतांनी दिलेला त्रास आहे असे आपण मानायला हरकत नाही. संतांनी एवढया कळकळीने सांगूनही जर नामाबद्दल विश्वास नसेल आणि त्याच्या खरेपणाबद्दल भलतेच विचार मनात येत असतील, तर मन नामाकडे वळणारच नाही. अशा वेळी माणूस मग दुसऱ्या आकर्षणात अडकतो. कसले नाम, कसला स्वर्ग आणि नरक? मरणानंतर जे काही होईल ते कोणी पाहिले आहे? तेव्हा मौजमजा करून या जीवनाचा उपभोग घेऊ असा विचार करून माणूस नको त्या गोष्टीत अडकतो. नको त्या गोष्टी करण्यात वाहवत जातो. मग समाजात अशा व्यक्तीची छी थू होते. त्याची प्रतिष्ठा राहत नाही. लोकांच्या दृष्टीने अशी व्यक्ती तिरस्करणीय बनते. असे जगणे म्हणजे एक प्रकारचा नरकच आहे.
तेव्हा मनात कोणतीही शंका न ठेवता भगवंताचे नाम घ्यावे. अति आदराने ते नाम घेत जावे. भगवंताच्या नामाचे सामर्थ्य असे आहे की जो कोणी ते नाम घेईल त्याचे दोष हळूहळू कमी होत जातात. जे गुण भगवंताला प्रिय आहेत, असे गुण व्यक्तीच्या स्वभावात वास करतात. त्याच्या हातून अनुचित गोष्टी घडत नाहीत. व्यक्ती अंतिमतः सुखी आणि समाधानी असते.
स्वसंवाद
१. मरणानंतरच्या नरकाची भीती बाळगण्यापेक्षा, मी आजच्या माझ्या चुकीच्या प्रवृत्तींमुळे माझे चालू आयुष्यच ‘नरकप्राय’ करून घेत नाहीये ना?
२. संतांनी स्वानुभवातून सांगितलेल्या नामस्मरणाच्या ‘रोकड्या व्यवहारावर’ विश्वास ठेवण्याऐवजी, माझे मन अजूनही ‘तर्क-कुतर्कात’ आणि संशयात वेळ वाया घालवत आहे का?
३. “अंतकाळी सवयीनुसार नाम मुखात यावे” यासाठी मी माझ्या दैनंदिन जीवनात आजपासूनच नामस्मरणाची सवय लावून घेण्यास किती प्राधान्य देतो?
४. नाम घेतल्याने जर स्वभावातील दोष ‘स्वभावे’ (सहजच) गळून पडणार असतील, तर मी माझ्या अहंकाराचा आणि रागाचा त्याग करून नामस्मरणाचा आश्रय का घेत नाही?
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श्लोक क्र. १०२ – –
अती लीनता सर्वभावे स्वभावे ।
जना सज्जनालागी संतोषवावे ।
देहे कारणी सर्व लावीत जावे ।
सगूणी अति आदरेंसी भजावे ।।१०२।।
अर्थ :आपल्यामध्ये स्वभावतःच अतिशय नम्रता असावी. अशा सहज नम्रतेने सत्पुरुषांना आनंद द्यावा. आपला देह सर्व चांगल्या कामांसाठी झिजवावा. अतिशय आदरपूर्वक सगुण भक्ती करावी.
(लीनता – नम्रता, सर्वभावे – अगदी मनापासून, कारणी – चांगल्या गोष्टींसाठी)
विवेचन – भक्ताच्या अंगी कोणते गुण असावेत ते या श्लोकात समर्थ आपल्याला सांगत आहेत. भगवंताचा भक्त लीन म्हणजे नम्र असतो. अध्यात्मात लीनता हा अतिशय मोठा गुण मानला गेला आहे. ज्या व्यक्तिजवळ लीनता नसेल, त्याच्या ठायी अहंकार निर्माण होतो. हे मी केले, ते माझ्यामुळे झाले अशा प्रकारचा अहंकार निर्माण होतो. साधकासाठी अहंकार हा प्रगतीतील मोठा अडथळा आहे. त्यामुळे आपल्या स्वभावात नम्रता असणे आवश्यक आहे. ती सुद्धा मनापासून असावी. आतून उमलून आलेली असावी. एखाद्या हसतमुख व्यक्तीच्या चेहऱ्यावर असणारे हास्य आतून उमलून आलेले असते. हास्याचा कृत्रिम मुखवटा त्याला धारण करावा लागत नाही. तशीच नम्रता देखील आतून यावी. ती स्वभावाचाच एक भाग असावी असे समर्थांना सांगायचे आहे. हल्ली कार्पोरेट जगतात आपले काम साधून घेण्यासाठी लोक कृत्रिम नम्रतेचा आश्रय घेतात. निवडणुका जवळ आल्या म्हणजे मते मागण्यासाठी नेते मंडळी अति नम्र होतात. पण ही खरी नम्रता नसून तो काही काळापुरता धारण केलेला एक मुखवटा असतो.
अहंकारी व्यक्ती कोणालाच आवडत नाहीत. नम्रतेने वागणाऱ्या व्यक्ती समोरच्याचे मन सहज जिंकून घेतात. फळांनी लगडलेले झाड वाकलेले असते. ज्याला साधक व्हायचे त्याने तर नम्र असलेच पाहिजे. आपल्या हातून घडणाऱ्या चांगल्या गोष्टींचे श्रेय भगवंताला किंवा गुरूंना दिले पाहिजे. दोष असतील तर ते आपले अशी भावना हवी. कर्तेपण भगवंताकडे देतो तो खरा साधक. अशा प्रकारची नम्रता किंवा लीनता अंगी बाणली की सत्पुरुषांना संतोष होतो. गर्विष्ठ किंवा अहंकारी व्यक्ती त्यांना आवडत नाही. ज्ञानेश्वरांसारख्या महान संतांनी आपल्या हातून जे काही कार्य घडले त्याचे श्रेय आपल्या गुरूंना दिले आहे.
आपला हा नरदेह सर्व चांगल्या कारणांसाठी झिजला पाहिजे. केवळ देहाचे भरणपोषण केले तर आपल्यात आणि पशूत फरक काय? समाजात अनेक चांगली कार्ये होत असतात. अशा कामांना पैशाने नाही तरी शरीराच्या माध्यमातून श्रम करून हातभार लावला पाहिजे. शेगावला गजानन महाराजांच्या मंदिरात, गोंदवल्याला गोंदवलेकर महाराजांच्या मठात अनेक भक्त स्वेच्छेने सेवा देत असतात. अशी उदाहरणे अनेक ठिकाणी पाहायला मिळतात. यातून भगवंताची सेवा तर घडतेच पण देह भगवंताच्या कारणाने झिजतो. माणसाला जो देहाभिमान असतो, तो नष्ट व्हायला मदत होते. देहबुद्धी कमी होत जाते.
सर्व संतांनी सगुण भक्ती केली आहे. परमेश्वराच्या सेवेत आपला देह झिजवला आहे. संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत एकनाथ यांनी पांडुरंगाची सगुण भक्ती केली. रामकृष्ण परमहंस कालीमातेची सेवा करीत. मीराबाईंनी श्रीकृष्णाची भक्ती केली. परमार्थात प्रगती करायची असेल तर सगुणाकडूनच निर्गुणाकडे जावे लागते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात ‘ सगुणी अति आदरेसी भजावे ‘ सगुणात प्रेम निर्माण झाले नाही तर ते निर्गुणात कसे येणार?
स्वसंवाद
१. माझ्या रोजच्या वागण्या-बोलण्यात असणारी नम्रता ही केवळ माझे ‘काम साधून घेण्यासाठी’ घातलेला मुखवटा आहे, की ती माझ्या अंतःकरणातून आलेली खरी ‘लीनता’ आहे?
२. ज्ञानेश्वर माऊलींप्रमाणे, माझ्या आयुष्यातील यशाचे श्रेय मी देवाच्या आणि गुरूंच्या चरणी अर्पण करतो, की ‘मी केले’ या अहंकाराचा फुगा फुगवत बसतो?
३. भगवंताने दिलेला हा सुंदर नरदेह मी केवळ स्वतःच्या उपभोगासाठी आणि देहभरणासाठी वापरतो आहे, की कधी सामाजिक व सत्कार्यात ‘श्रमदान’ करून तो कारणी लावतो?
४. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, मी माझ्या आराध्य दैवताची भक्ती केवळ ‘वरवरची’ करतो, की मनात अथांग आदर आणि प्रेम बाळगून सगुण स्वरूपात त्या परमेश्वराला शोधतो?
☆ एकाच स्त्रीच्या प्रेमात… सात वेळा… – मूळ इंग्रजी लेखक : अज्ञात – मराठी अनुवादक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे☆
एका १८ वर्षांच्या नातवाने आपल्या ८० वर्षांच्या आजोबांना विचारले:
“आजोबा… तुम्ही ६० वर्षे एकाच स्त्रीच्या प्रेमात कसे राहू शकलात? “
“परस्परांना समजून घेणे गरजेचे असते… “
“मोकळेपणाने संवाद साधला पाहिजे… “
“तडजोड आणि जुळवून घेणे आवश्यक असते… “
नातवाला अशा उत्तरांची अपेक्षा होती.
पण आजोबा हसले, क्षणभर आजीकडे पाहिले आणि म्हणाले:
“मी ६० वर्षे एकाच स्त्रीच्या प्रेमात होतो, असे तुला कोणी सांगितले? “
नातवाला आश्चर्य वाटले.
आजोबा पुढे म्हणाले…
“वयाच्या २० व्या वर्षी, मी तिच्या सौंदर्याच्या आणि तिच्या उत्साही स्वभावाच्या प्रेमात पडलो.
ते माझे ‘पहिले प्रेम‘ होते.
वयाच्या ३० व्या वर्षी, ती आई झाली. रात्री जागून आपल्या बाळाला हळुवारपणे झोपवणाऱ्या त्या स्त्रीच्या मी प्रेमात पडलो.
ते माझे ‘दुसरे प्रेम‘ होते.
वयाच्या ४० व्या वर्षी, मी त्या धाडसी स्त्रीच्या प्रेमात पडलो जिने चेहऱ्यावर हास्य ठेवून आपल्या कुटुंबाची जबाबदारी पेलली.
ते माझे ‘तिसरे प्रेम‘ होते.
वयाच्या ५० व्या वर्षी, मी त्या स्त्रीच्या प्रेमात पडलो जिने आपल्या मुलांच्या भविष्यासाठी स्वतःची स्वप्ने आणि इच्छांचा त्याग केला.
ते माझे ‘चौथे प्रेम‘ होते.
वयाच्या ६० व्या वर्षी, तिच्या चेहऱ्यावर सुरकुत्या पडल्या होत्या, पण मी त्या सोबतीण स्त्रीच्या प्रेमात पडलो जी केवळ एका नजरेने माझ्या चिंता समजू शकत होती.
ते माझे ‘पाचवे प्रेम‘ होते.
वयाच्या ७० व्या वर्षी, मी त्या स्त्रीच्या प्रेमात पडलो जी मला दररोज विचारायची:
‘तुम्ही तुमचे औषध घेतले का? ‘
तिची ती काळजी माझ्या मनाला भिडली.
ते माझे ‘सहावे प्रेम‘ होते.
आणि आता, वयाच्या ८० व्या वर्षी, मी त्या स्त्रीच्या प्रेमात आहे जी माझ्या शेजारी हळू चालते, मला आपल्या जुन्या आठवणी पुन्हा पुन्हा सांगते आणि माझ्यासोबत हसते.
ते माझे ‘सातवे प्रेम‘ आहे. “
नातू गप्प राहिला.
आजोबा हसले आणि शेवटी म्हणाले:
“लग्न म्हणजे केवळ आयुष्यभर एकाच व्यक्तीसोबत राहणे नव्हे”…
तर, आयुष्य बदलत असताना त्याच व्यक्तीच्या वेगवेगळ्या रूपांच्या प्रेमात पुन्हा पुन्हा पडायला शिकणे, म्हणजे लग्न होय. “
सौंदर्य बदलते.
वय बदलते.
शरीर बदलते.
परिस्थिती बदलते.
पण या सर्व बदलांमधूनही, जर तुम्ही तुमच्या जोडीदाराकडे पाहून असे म्हणू शकत असाल की…
“तूच ती व्यक्ती आहेस जिच्यावर मी प्रेम करतो/करते. “
तर हेच दीर्घ आणि आनंदी वैवाहिक जीवनाचे खरे गुपित आहे.
कारण…
प्रेम म्हणजे केवळ एकदाच प्रेमात पडणे नव्हे.
खरे प्रेम म्हणजे आयुष्याच्या प्रत्येक टप्प्यावर, पुन्हा पुन्हा त्याच व्यक्तीच्या प्रेमात पडणे.
खरे प्रेम म्हणजे
‘जैसे थे‘ राहणे नव्हे तर ते आहे एकत्रितपणे बदलणे…
आणि
तरीही, प्रत्येक दिवशी एकमेकांचीच निवड करणे.
☆
मूळ इंग्रजी लेखक : अज्ञात
मराठी अनुवादक : अज्ञात
प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈