हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य #81 ☆ आलेख – भजनं नाम रसनं ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक विचारणीय एवं सार्थक आलेख  ‘भजनं नाम रसनं’. इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 81 ☆

☆ आलेख भजनं नाम रसनं ☆

प्रमुखतः शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और लोक संगीत के रूपों में भारतीय संगीत की व्यापक विवेचना की जाती है.  सुगम संगीत की एक शैली भजन है जिसका आधार शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत ही होता है. उपासना की प्रायः भारतीय पद्धतियों में भजन को साधन के रूप में  प्रयोग किया जाता है. तय है कि भजन के स्वरो के जादू से कई मंदिरो में युगो युगो तक कई साधको को परमात्मा प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता रहेगा.

भजनं नाम रसनं, भजन का अर्थ होता है स्वाद लेना.  ‘भजनं नाम आस्वादनम’ मतलब स्मरण करके आनंद लेना, यह भी भजन का ही एक प्रकार है. दरअसल भजन का गूढ़ अर्थ होता है,  प्रीति पूर्वक सेवा.  प्रीति मन से होती है. यह और बात है कि कौन कहां मन लगा पाता है.

चाहे हाथ से पूजा करें, चाहे पाँव से प्रदक्षिणा करें, चाहे जीभ से स्तुति करें, चाहे साष्टांग दण्डवत करें और चाहे मन में ध्यान करें,  भजन दरअसल प्रीति है.  प्रीति का व्यापक अर्थ होता है तृप्ति. मंदिर मंदिर, तीरथ तीरथ भ्रमण, भगवान् के नाम, धाम, रूप, भगवान की लीला, भगवान की सेवा, भगवान के दर्शन से जो आत्मिक शांति और तृप्ति मिलती है वही वास्तविक भजन है. नेता जी तीर्थ करवा कर वोट लेने को  ही भजन मानते हैं. चमचे नेता जी को दण्डवत कर उन्हें ही अपना इष्ट मानते हैं. सबके अपने अपने देवता होते हैं.

“संभोग से समाधि तक” लिखकर दार्शनिक चिंतक रजनीश ने इसी तृप्ति से भगवान को अनुभव करने की विशद व्याख्या की है.  वे सारी दुनियां में चर्चित रहे. रजनीश ने भी कोई नई विवेचना नहीं की थी. खजुराहो के मंदिरों की दार्शनिक विवेचना की जाये तो यही समझ आता है कि परमात्मा तो भीतर है, बाहर महज वासना है. काम, क्रोध, को बाहर छोड़कर मंदिर के छोटे दरवाजो से जब,  आत्म सम्मान को त्याग कर, सर झुकाकर हम मंदिर के अंदर प्रवेश कर पाते हैं तभी हमें भीतर भगवान की प्राप्ति हो पाती है. जिसने ऐसा कर लिया वह ज्ञानी, वरना सब अहंकारी तो हैं ही.

गजल भी मूलतः खुदा की इबादत में कही जाती थी, शायर खुदा के प्रेम में ऐसा तल्लीन हो जाता है कि न भिन्नं.  माशूका से  एकाकार होने जैसा एटर्नल  लव  गजल को जन्म देता है.  कालान्तर में परमात्मा से यह एकात्म किंचित वैभिन्य का स्वरूप लेता गया और अब गजल बिल्कुल नये प्रयोगो से गुजर रही है. रब से शराब की गजल यात्रा अब शबाब के सैलाब से गुजर रही है.

कृष्ण और राधा के एटर्नल लव के कांसेप्ट से हम ही नहीं पाश्चात्य जगत भी असीम सीमा तक प्रभावित है, इस्कान के मंदिरो में भारतीय पोशाक में विदेशियो की भीड़ वही आत्मिक प्रेम ढ़ूंढ़ती नजर आती है. किसी को प्रेम मिलता है किसी को भगवान, किसी को जीवंत तो किसी को आभासी प्रेम मिलता है. कोई राधा के चक्कर में रुक्मणी से ही उलझ जाता है.

यू दीवाने हमेशा से उलटी ही राह चलते हैं. वे सनम के दीदार के लिये आंखो को बंद करते हैं. जरा नजरो को झुकाते हैं और हृदय में देख लेते हैं अपने आशिक को. जिसने राधा भाव से इस आशिकी में कृष्ण के दर्शन कर लिये वह संत हो जाता है, वरना मेरे आप की तरह लौकिक प्रेम के भौतिक प्रेमी हाड़ मांस में ही परम सुख ढ़ूढ़ते जीवन बिता देते हैं. और यही कहते रह जाते हैं कि “मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो.” वास्तव में “मेरे मन में राम मेरे तन में राम, रोम रोम में राम रे” होते तो हैं पर उन्हें ढ़ूढ़कर मन मंदिर में बसा सकना ही भजन का वजन है.

कोई सफेद चोंगे में चर्च में भगवान की जगह नन ढूंढ लेता है कोई भगवा में भक्तिनो को धोखा देता है, कोई बुर्के को तार तार कर रहा है. जन्नत की हूरों की तलाश में जमीन पर आतंक फैला रहा है.

भगवान करे सबको उनके लक्ष्य ही मिले. जैसे बच्चा माँ के बिना, प्यासा पानी के बिना रह नहीं सकता, ऐसे ही जब हम भगवान के बिना रह न सकें तो इस प्रक्रिया का ही नाम भजन होता है. करोड़पति पिता से कुछ हजार रूपये लेकर अलग होकर बेटा, पिता की सारी सत्ता से जैसे वंचित रह जाता है ठीक उसी तरह परम पिता भगवान से कुछ माँगना उनसे अलग होना है, उनसे एकात्म बनाये रहने में ही हम भगवान की सारी सत्ता के हिस्से बने रह सकते हैं. परमात्मा में विलीन होना ही जीवन मरण के बंधन से मुक्ति पाना है. बच्चा  माँ पर अधिकार अपनेपन से करता है, तपस्या, सामर्थ्य या योग्यता से नहीं.  तपस्या से सिद्धि और शक्ति भले ही प्राप्त हो जावे प्रेम नहीं मिल सकता. निष्काम होने से मनुष्य मुक्त, भक्त सब हो जाता है. भगवान के साथ सम्बन्ध रखें तो सांसारिक कामनायें स्वतः ही शांत हो जाती हैं. यह भजन का वजन है. संसार में आसक्ति का अर्थ है, भगवान में वास्तविक प्रेम की अनुभूति का अभाव. किंतु यह सत्य जानकर भी हममें से ज्यादातर इसे समझ नही पाते.

जो भी हो पर हम आप जो रोटी, कपड़ा और मकान के चक्कर में ही आजीवन उलझे रह जाते हैं,  वे बेचारे आम आदमी भगवान को पाने के चक्कर में कईयो को सिद्ध बाबा बना देते है. जनता के लिए “भूखे भजन न होंहि गोपाला ” का सिद्धांत और सवाल ही सबसे बड़ा बना रह जाता है लेकिन जिस दिन लगन लग जायेगी मीरा  मगन हो जायेगी यही भजन का वास्तविक वजन है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 41 ☆ बदलापुर की गाथा ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “बदलापुर की गाथा”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 41 – बदलापुर की गाथा ☆

बड़े घमंड के साथ, प्रचार – प्रसार द्वारा लगभग लाखों सब्सक्राइबर बना लिए,  पर जब भी कोई पोस्ट करते तो बस दस पन्द्रह लाइक ही झोली में आते हैं, अब तो बदलू जी परेशान रहने लगे। हद तो तब हो गयी जब वे बदलापुर के लिए निकल पड़े तो उनके दो अनुयाई भी उनका साथ न देकर,  नए नेता की ओर चल दिये। लोटा और पेंदी का साथ बहुत अच्छी बात है,  पर जब दोनों अलग हो जाएँ तो बिन पेंदी का लोटा लुढ़कता ही है।

इसी सब में क्षमा के गुणों की चर्चा भी चल निकली। ‘क्षमा वीर आभूषण’ होता कहना और सुनना तो सरल होता है पर जब किसी को क्षमा करना हो तो अहंकार आड़े आ ही जाता है। वो तो भला हो वीरचंद्र का जो सबको संमार्ग  ही दिखाते हैं। उन्होंने ने न जाने कितने लोगों को माफ किया और आगे बढ़ चले। सच ही कहा गया है। सिर पर ज्यादा बोझ हो तो चलना मुश्किल होता है ।

मजे की बात ये है कि अधिकांश लोग पूर्वाग्रही होते हैं। वे एक ही रंग का चश्मा पहन कर दुनिया को बदलने चल पड़ते हैं। अरे भई जब तक स्वयं को नहीं बदलोगे तब तक कुछ भी बदलने से रहा। कब तक कुएँ के मेढ़क की तरह उछल कूद करते रहोगे। कभी नदी का सफर भी करो। कैसे वो प्रपात बनाती हुई चलती है। तट का पहरा अवश्य ही उसके ऊपर रहता है। पर अपने लक्ष्य को साधकर आगे बढ़ने में उसे महारत हासिल होती है। सागर में समाहित होकर भी अपना अस्तिव व पहचान बनाए रखती है। उद्गम से चलते हुए न जाने कितनी बाधाओं को पार करना पड़ता है। कई छोटी – बड़ी नदियों के साथ संगम बनाती हुई,  रास्ते के कूड़े- करकट, नालियों का पानी सबको आत्मसात कर निरंतर चरैवेति – चरैवेति के सिद्धांत पर अड़िग होकर बढ़ती जाती है ।

सिक्के के एक पहलू से दूसरे पहलू की मित्रता कभी हो ही नहीं सकती ये तो दिन- रात की भांति दिखते हैं। कभी हेड तो कभी टेल बस जिस नज़र से दिखेंगे वही दिखेगा। यहाँ फिर से बात नजरिए पर आ टिकी,  सोच बदलो जीवन बदल जायेगा। ये बदलाव भी आखिर क्या चीज है। बदलू जिसे अपनाकर इतिहास रच रहा है। बदला लेने के लिए लोग क्या- क्या नहीं कर बैठते। औरंगजेब को देखिए उसने तो बदले की सभी हदें पार कर दी थीं । अपने पिता शाहजहां को बूंद- बूंद पानी के लिए तरसा दिया था। जरा सोचिए हमारी परंपरा तो प्याऊ लगवाने की रही है वहाँ ऐसा घोर अनाचार,  आखिर ये भी तो बदलापुर की बदलागिरी ही लगती है ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 48 ☆ गीत – चन्दनवन वीरान हो गए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक गीत “चन्दनवन वीरान हो गए.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 48 ☆

☆ गीत – चन्दनवन वीरान हो गए ☆ 

 

नीरवता ऐसी है फैली

चन्दनवन वीरान हो गए।

जो उपयोगी था उर-मन से

लुटे-पिटे सामान हो गए।।

 

झाड़ उगे, अँधियारा फैला

सूनी हैं दीवारें सब

अर्पण और समर्पणता की

खोई कहाँ बहारें अब

कौन किसी के साथ गया है

किसको कहाँ पुकारें कब

 

गठरी खोई श्वांसों की सच

सब ही अंतर्ध्यान हो गए।।

 

कितने सपने, कितने अपने

खोई है तरुणाई भी

भोग-विलासों के आडम्बर

लगते गहरी खाई – सी

बचपन के सब गुड्डी- गुड्डन

छूटे धेला पाई भी

 

वक्त, वक्त के साथ गया है

मरकर सभी महान हो गए।।

 

अर्थतन्त्र के चौके, छक्के

गिल्ली से उड़ गए चौबारे

साथ और संघातों के भी

आग उगलते हैं अंगारे

प्यार-प्रीति भी राख हो गई

दिन में भी कब रहे उजारे

 

जोड़ा कोई काम न आया

सारे ही शमशान हो गए।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य – वेध दिवाळीचे ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

☆ विजय साहित्य – वेध दिवाळीचे ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

( मुक्तछंद )

मांदियाळीचे

वेध दिवाळीचे

भाव काव्य मनीचे.. . . !

प्रकाश सण

दिवाळीचे क्षण

ठेवी जपोनी मन….!

आकाश दिवा

आठवांचा थवा

उत्साही रंग नवा ….!

दिवा पहिला

त्या एकादशीला

प्रारंभ दिवाळीला. . . . !

धेनू मातेचा

दिन बारसेचा

प्रेमळ गोमातेचा…!

धन तेरस

तिसरा दिवस

यश कीर्ती कलश….!

नरकासूर

विघ्ने सर्वदूर

निर्मळ अंतःपूर . . . . !

लक्ष्मी पूजन

समृद्धी सृजन

सुख, शांती, चिंतन.. . !

येई पाडवा

आनंद केव्हढा ?

मनोमनी गोडवा ….!

दिस बीजेचा

भाऊ बहिणीचा

मांगल्य वर्धनाचा.. . !

दिवाळी रंग

परंपरा बंध

भावमयी सुगंध …..!

दीप ज्योतीचा

सण दिवाळीचा .

ओलावा अंतरीचा.. . !

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ निसर्गाची ‘दीपावली’ ☆ श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ निसर्गाची ‘दीपावली’ ☆ श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी ☆ 

हिरवळीच्या अंगणात या

सोनपावले अवतरली

मेघमुखातून समृद्धीच्या

गर्जत आली दीपावली…

 

तृणा डोई तेजोमयी ते

आकाशपाळणे लखलखती

दवबिंदूंपरी आळवित जाते

गीत चराचे मनातूनी…

 

पंख जाहलो फुलपाखरांचे

स्नेह स्फुरले तनातूनी

रंग तयाचे गेले रेखीत

ह्रदयावरी या रंगावली…

 

अतिथीसम इंद्रधनु हा

पहा गृही मज डोकावितो

चैतन्याची कमान दारी

मोद अखंडित पाझरतो…

 

डोंगर उंची सद्गुणांची

अशी भिडते आकाशी

प्रकाश लेणी दीपसणाची

उजळीत जाते काळीजकुशी…

 

©  श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

मिरज, जि. सांगली

मोबाईल : 9922048846

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अगतिक-भाग 4 ☆ सौ. सुनिता गद्रे

☆ जीवनरंग ☆ अगतिक-भाग 4 ☆ सौ. सुनिता गद्रे☆ 

‘दिवस’ झाले. नातेवाईक”सांभाळून रहा… काही मदत लागली तर आम्हाला ताबडतोब बोलवा. अर्ध्या रात्रीतनं पण आम्ही यायला तयार आहोत… वगैरे म्हणत आपल्या आपल्या परीने त्यांना धीर देत आपापल्या घरी परतले.

सगळं घरच जणू निष्प्राण झालं होतं. घरावर आलेली अवकळा अन् दुःखाची छटा काही कमी होत नव्हती. पुढच्या आठ दहा दिवसात इब्राहिम चाचा विजयला बरोबर घेऊन या-त्या ऑफिसच्या चकरा मारत होते. आवश्यक सर्टीफिकीटं, कागदपत्रं, दाखले हे सगळं  त्यांनी मिळवलं. त्यानंतर दुसरं महत्त्वाचं काम सुरू झालं. पोलीस मुख्यालय, मानवाधिकार आयोग… महीला आयोग… विधवा सहायता कोष.. या सगळ्यांची ऑफिसं आणि ज्यांनी ज्यांनी मदतीचं आश्वासन दिलं होतं ती मोठी माणसं… सगळ्यांकडे हेलपाटे सुरू झाले. पण प्रत्यक्षात ताबडतोब योग्य ती मदत कुठूनच मिळत नव्हती.पोलिस खात्यातून आश्वासन दिलेले दोन लाख रुपये पण मिळत नव्हते. सगळीकडून गुळमुळीत उत्तरं, चार-पाच महिन्यानंतरचे वादे, संस्थेचे नियम… मिटिंग सध्या घेता येत नाही अशी अगतिकता. दोन महिन्याच्या काळात हेच सगळं पदरी पडलं होतं . सदानंदनं मंडईतल्या गाळ्या साठी भरलेला ऍडव्हान्सही परत मिळणार नव्हता. हेलपाटे घालून घालून दोघांचे पाय तुटायची वेळ आली.

सगळ्या गोष्टींचा त्यांना वीट आला. चाचा तर कामाची खोटी करून त्याला मदत करत होता. शेवटी एके दिवशी सकाळी सकाळीच तो त्यांच्या घरी आला.

“विजऽय” त्यांनं हाक मारली. सुशीला ची चाहूल लागताच तो म्हणाला,”भाभीजी, बुरा मत मानना… पण आता आपल्याला इतरांवर अवलंबून राहून चालणार नाही. एक महत्वाची बाबा तुम्हाला सांगतो… मनापासून… बघा पटतंय का! तशी मी आणखी कोशिश चालूच ठेवणार आहे. पण काय आहे, सोळा वर्षाच्या विजयला आता नोकरी नाही मिळणार .! बरं, मुलांच्या शाळा सकाळी असतात का दुपारी?

“दुपारी” विजय म्हणाला.

“ठीक आहे. सध्या तर सुट्टी चालू आहे. विजयला मोठ्या मंडईत घेऊन जातो. गाडीवर फळ घालून विकायचं काम तो करेल.”

“गाडी…. फळं…….”मायलेक हादरलेच.

“तुम्हाला धक्का बसेल…. मी समजू शकतो. पर क्या करे… आपल्याला जरा धाडस दाखवावंच  लागेल.”

                           क्रमशः … भाग- 5

© सौ. सुनिता गद्रे,

माधव नगर. मो – 960 47 25 805

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ वसुबारस ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

☆ विविधा ☆ वसुबारस ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे  ☆ 

? दिन दिन दिवाळी—१ ?

आज पासून दिवाळीचा सण सुरू होतो आहे. गेल्या सात-आठ महिन्यातील सणांप्रमाणे दिवाळी सणावर सुध्दा करोनाच्या साथीचे सावट आहे. उत्सवाला धास्तीची किनार आहे. पण सर्व नियम पाळत, स्वच्छता राखत, अगदी साधेपणाने आपण हा सण साजरा करणार आहोत. सामाजिक अंतर राखत पण  मनामनातलं अंतर कमी करत नाती जास्त सुदृढ करणार आहोत. कारण प्रत्येक सणाचे हेच तर प्रयोजन असते. हा तर ‘दिवाळीचा सण’

दिवाळी हा फक्त एकच उत्सव नाही बरं का ! तर हे उत्सवांचे स्नेहसंमेलन आहे.  हा फक्त एकाच देवतेचा उत्सव नसून तो लोकव्यवहाराशी जास्ती जोडलेला आहे. मुख्य म्हणजे हा प्रकाशाचा उत्सव, नात्यांचा उत्सव, लक्ष्मीचा उत्सव, निसर्गाचा उत्सव,  विजयाचा उत्सव असे  अनेकरंगी पदर असणारा उत्सव आहे.

अश्विन कृष्ण द्वादशी ते कार्तिक शुद्ध द्वितीया असे सहा दिवस हा उत्सव साजरा होतो. त्यातला पहिला दिवस म्हणजे ‘गोवत्स द्वादशी’.  यालाच “वसुबारस ” असेही म्हणतात.  आपल्या संस्कृतीत गाय फार पवित्र मानली जाते.  लक्ष्मीच्या अंशापासून उत्पन्न झालेली सवत्स धेनु म्हणजे “सुरभि”. हीच गोमातांची अधिदेवता आहे.  दिवाळीत हिचे पूजन केले जाते. एरवी सुद्धा ‘गो-ग्रास’ म्हणून पोळी-भाताचा नैवेद्य काढून ठेवला जातो.  वसुबारस तर  काय गायींचाच उत्सव त्यामुळे या दिवशी तिचे विशेष कौतुक होते.

यानिमित्ताने प्राण्यांचे रक्षण करणे, निसर्गाच्या प्रती ऋण  व्यक्त करणे हा मुख्य  संदेश दिलेला आहे. हाच या सणामागचा मुख्य उद्देश आहे. अनेक उपकारक प्राण्यांचे ऋण आपण व्यक्त करतो , त्यातलाच हा एक दिवस. या दिवशी गायींचा गोठा स्वच्छ करून रंगवतात. तिथे पणत्या लावतात.  मुख्य म्हणजे गायींना ओवाळून नैवेद्य देतात.  त्यांच्या प्रती कृतज्ञता व्यक्त करतात. ग्रामीण भागात या दिवसाला विशेष महत्त्व आहे. या दिवशी गायीसमोर गाणी म्हटली जातात. गाण्यांमधून गाईच्या गुणांचे,  शेतीच्या कामांचे वर्णन केलेले असते. या गाण्यांमधून एकमेकांना कोडी घालण्याचा खेळ खेळला जातो.

कृतज्ञता व्यक्त करणे हा आपल्या भारतीय संस्कृतीचा स्थायीभाव आहे. वेगवेगळ्या सणांच्या निमित्ताने निसर्गाचे पूजन करून त्याच्या प्रती ऋण व्यक्त केले जाते. आपला देश हा कृषिप्रधान देश आहे आपल्या संस्कृतीत गाई-वासरांना अनन्यसाधारण महत्त्व आहे. आपल्या निसर्गातील प्राणिमात्रांचे रक्षण केले पाहिजे. कोणत्याही कारणाने,  कोणत्याही प्रकारे निसर्गाला हानी पोहोचवायची नाही.  ध्वनी-वायू प्रदूषण रोखले पाहिजे. निसर्गाचे रक्षण, संवर्धन केलं पाहिजे. हा संदेश या सणातून घ्यायचा आहे. निसर्ग संवर्धन मोहीम,  वसुंधरा महोत्सव या अभियानांचे हेच उद्दिष्ट आहे.  “निसर्ग धरतीचे लेणे हो ! त्यांचे रक्षण करणे हो !!” हे कायम स्मरणात ठेवायला हवे.

तेव्हा या निमित्ताने आपण पुन्हा निसर्गाच्या जास्ती जवळ जाऊ या. त्याच्याशी आपले नाते पुन्हा घट्ट करू या.  दिवाळीची सुरुवात आनंदाची करू या.

शुभ दीपावली.  ?

© सौ. ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ जीवनगाणे गातच रहावे ☆ डॉ मेधा फणसळकर

डॉ. मेधा फणसळकर

☆ विविधा ☆ जीवनगाणे गातच रहावे ☆ डॉ मेधा फणसळकर

परवा पुस्तकांच्या कपाटातून सारखी खुडबुड ऐकू येऊ लागली. मनात म्हटले ,“एवढा बंदोबस्त करुनही खारुताईने आपल्यावर कुरघोडी केलेली दिसतेय. पुन्हा घरटे बांधले वाटते.” असे म्हणून त्या बाजूचे दार उघडले तर खारुताई ऐवजी उंदीरमहाशयांनी दर्शन दिले. मी घाबरून पटकन दार बंद करुन घेतले. आमच्या  कपाटाच्या मागच्या बाजूला खिडकी आहे.   ती एका बाजूने कायम थोडीशी उघडी राहते आणि त्याच चोरवाटेने प्रवेश करुन या खारुताईनी दोन वर्षे आपले बस्तान बसवले होते. बिचारी मोठ्या कष्टाने घरटे बनवते आणि तेव्हा लेकुरवाळी पण असते. म्हणून मी पहिल्या वर्षी तिचे बाळंतपण संपेपर्यंत धीर धरला. नंतर सर्व बाजूनी कडेकोट बंदोबस्त केला. पण बाईसाहेब माझ्यापेक्षा हुश्शार निघाल्या. अगदी लहान राहिलेल्या फटीतून त्यांनी पुढच्या वर्षी पुन्हा आपला कार्यभाग साधला. यावर्षी मग मी अधिक जोमाने बंदोबस्त केला. आणि बाईसाहेब तिकडे फिरकल्या नाहीत. मी एकदम आनंदात होते. आणि एक दिवस दुसऱ्या बाजूचे कपाट उघडले तर बाईसाहेब दिमाखात घरट्यात बसून माझ्याकडे “ जितम् मया।” अशा अविर्भावात बघत होत्या. तिच्या जिद्दीला मी सलाम केला आणि बाईसाहेब निघून गेल्यावर त्यांच्या घरात आश्रय घेतलेल्या या  मूषकमहाशयांनी दर्शन दिले. आता यांचा बंदोबस्त कसा करायचा या विवंचनेत मी असतानाच आणखी एक समस्या उद्भवली. आमच्या बाथरूमचे आउटलेट तुंबू लागले होते. आणि चाचपणी केली असता लक्षात आले की बाथरूमच्या बाहेरच्या बाजूला उगवलेल्या झाडाच्या मुळ्यांनी पाण्याशी मैत्री करत त्या पाईपमध्ये हात- पाय पसरले होते. ते बघितले आणि मनात विचार आला ,“शेवटी  प्रत्येक जीवाची ही जगण्याचीच तर धडपड आहे. जगण्याची हीच उर्मी त्याची संजीवनी देत असते.”

मध्यंतरी  परदेशातील एक व्हीडिओ व्हायरल झाला होता. एका तीन ते चार वर्षाच्या  मुलाचे आई- वडील एका विघातक घटनेत मृत झाले होते आणि ‛मृत्यू’ या शब्दाचाही अर्थ माहीत नसलेला  आणि आपल्या आईच्या आठवणीने  रडणारा तो चिमुरडा बघून वाटले,“ कसे जगणार हे पिल्लू ?” पण तरीही तो जगतो आहेच की! आपल्या आजूबाजूला पण अशी अनेक उदाहरणे आपल्याला दिसतात. आपण त्यावेळी हळहळतो आणि काही दिवसांनी विसरून पण जातो. पण त्या जीवांची जगण्याची धडपड आणि उर्मी तशीच असते. म्हणूनच जीवनप्रवाहसुद्धा अविरत चालू राहतो.

आज अनेकदा पर्यावरणप्रेमी- अभ्यासक सतत आपल्याला म्हणजेच मानवाला जाणीव करुन देत आहेत की आम्ही पर्यावरणाचा ऱ्हास करत आहोत आणि पर्यायाने तेथे निवास करणाऱ्या जीवसृष्टीचा पण! गोष्ट शंभर टक्के खरीच आहे. पण एका दृष्टीने हीसुद्धा माणसाची जगण्याचीच धडपड नाही का? पण त्यात मूलभूत फरक हा आहे की बाकीची जीवसृष्टी आपल्या गरजेपुरताच निसर्गाचा विनियोग करते. आम्ही मात्र आमच्या भौतिक सुखाच्या हव्यासापोटी त्या संपत्तीचा हवा तसा उपयोग करुन घेत आहोत आणि म्हणूनच ही केवळ जगण्याची उर्मी न राहता हाव बनली आहे. म्हणूनच कदाचित बाकीच्या सजीवांना जगण्यासाठी नवनवीन मार्ग शोधावे लागत आहेत. सिंधुदुर्गमध्ये उद्भवलेला हत्तींचा प्रश्न , हल्ली वारंवार ऐकू येणाऱ्या मानववस्तीतील बिबट्याचा वावर, माझ्या घरात घरटे बांधणारी खारुताई किंवा भिंतीत मूळे रुजवणारी वनस्पती हे त्याच समस्येतून निर्माण झालेले प्रश्न आहेत. जगण्यासाठी त्यांनी शोधलेले हे नवीन पर्याय आहेत.अर्थात सजीवांची खासियत हीच आहे की आहे त्या परिस्थितीला तोंड देत जीवन चालू ठेवायचे. आधार शोधून घेऊन नवीन मार्ग निवडायचा! तर काहीवेळा आमच्यातीलच सहृदय व्यक्ती स्वतःहून आधाराचा हात पुढे करतात.म्हणूनच अनाथ मुलांचे आश्रयस्थान एखादी सिंधुताई सकपाळ बनते, तर आमच्याच सिंधुदुर्गातील संदीप परब वृद्धांना सहारा देणारा आधारवड  बनतो. दिव्यांगाना आपल्या मायेची ऊब देत एखादी नसीमादीदी स्वतःच्या शारीरिक मर्यादांवर मात करत त्यांना नवीन पंख देते. एखादी तमक्का  आयुष्यभर वृक्षांना मुले मानून त्यासाठी देशभरात बिया रुजवत फिरते आणि लाखो वृक्षांना जन्म देऊन त्यांची आई बनते. तर जंगल अधिवास  नष्ट होऊ नये म्हणून एखादा आसाममधला मोलाई अख्खे जंगल निर्माण करतो.  तात्पर्य काय तर प्रत्येक सजीवाला जगण्याचा अधिकार आहे आणि  जगण्याची उर्मी हा त्याचा स्रोत आहे.

 

©️ डॉ. मेधा फणसळकर

मो 9423019961.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – सूर संगत ☆ सूर संगीत  3 – भीमपलासी ☆ सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

☆ सूर संगत ☆ सूर संगीत  3 – भीमपलासी ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर☆ 

“मेल न हर प्रिय चतुर मिलावत

रागनि भीमपलासि कहावत।

आरोहनमे रि ध न लगावत

सुर वादी मध्यमको बनावत

समय तृतीय दिन प्रहर कहावत ।।”

भीमपलासि या रागाचे थोडक्यांत वर्णन करणारे हे गीत. शास्रीय संगितात अशा गीतांना लक्षणगीत अशी पारंपारिक संज्ञा आहे.

मागील लेखांत काफी थाटांतील काफी या जनक रागासंबंधी विवेचन केल्यानंतर त्याच थाटांतून उत्पन्न झालेल्या भीमपलासि या रागाविषयी काही सांगावेसे वाटते.

शास्राःनुसार काफी थाटाचे  सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) असे स्वर असतात, त्यामुळे भीमपलासि राग कोमल गंधार व निषाद घेऊनच सादर करायचा असतो. सहाजिकच अनभिज्ञ व्यक्तीस प्रश्न पडेल असे असतांना काफी आणि भीमपलासि हे दोन राग भिन्न कसे? त्याचे उत्तर असे की वर लक्षणगीतांत सांगितल्याप्रमाणे भीमपलासीच्या आरोहांत रिषभ व धैवत वर्ज्य आहेत. म्हणजे

नि(मंद्र कोमल) सा ग(कोमल) म प नि(कोमल)सां ~ आरोह

सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा ~ अवरोह.

याप्रमाणे आरोहांत पांच व अवरोहांत सातही स्वर असल्यामुळे या रागाची जाति ओडव संपूर्ण आहे. मानव निर्मित जातींप्रमाणेच शास्रकारांनी स्वरांच्या संख्येनुसार रागांच्या जाति ठरविल्या आहेत. पांच स्वरांचा राग ओडव, सहा स्वरांचा षाडव आणि सात स्वरांचा संपूर्ण.

वादी मध्यम आणि संवादी षडज.पंचम हा स्वर ह्या रागाचे बलस्थान आहे. हा राग सादर करतांना कलावंत ह्या तीन स्वरांभोवती करामत करून आपले नैपुण्य रसिकांपुढे प्रदर्शित करीत असतो. वानगी दाखल हे काही स्वरसमूह पहावेत.

प(मंद्र)नि(कोमल)सा~ प(मंद्र)नि(कोमल) सा ग(कोमल) रे सा~

नि(मंद्र कोमल)सा ग(कोमल) म प~~

ग(कोमल) म प नि(कोमल) ध प~~

ध म प ग(कोमल) म ग रे सा~~

अतिशय विस्ताराने पेश करण्यासारखा हा राग असल्यामुळे बडा ख्याल, छोटा ख्याल,अशा प्रकारे मैफीलीत हा राग प्रस्तूत केला जातो.

अब तो बडी बेर भई

वारि बेगुमान न करिये सजनी साहेब को तो डरिये या विलंबित लयीतील पारंपारिक बंदिशी आजही प्रचलित आहेत. तसेच “गोरे मुखसो मोरे मन भाई, बिरजमे धूम मचायो शाम, जा जा रे अपने मंदरवा या मध्य लयीतील बंदिशी खूपच गोड वाटतात.

रागदारी संगीतात आज आपल्या माहितीप्रमाणे बंदिशींचे दोन भाग असतात. पुर्वार्ध म्हणजे स्थाई आणि उत्तरार्ध म्हणजे अंतरा! परंतु १७/१८व्या शतकांत बंदिशींचे चार भागांत सादरीकरण होत असे. १) स्थाई २) अंतरा ३) संचारी ४) आभोग. या भीमपलासि रागांतही अशा प्रकारच्या बर्‍याच बंदिशी आढळतात. त्या प्रामुख्याने चौताल, आडाचौताल, धमार या तालांत बंदिस्त असतात.

रागदारी बरोबरच भजन, अभंग ह्या गीतप्रकारांसाठी हा राग विशेष उचित वाटतो.

माणिक वर्माजींचे अमृताहुनी गोड नाम तुझे देवा, विजय पताका श्रीरामांची झळकते अंबरी ही प्रसिद्ध भक्तीगीते भीमपलास रागांतीलच आहेत.संत कान्होपात्रेचा अभंग अवघाची संसार सुखाचा करीन हाही भीमपलासच!

भक्तीरसाचा परिपोष करणारा असा हा राग अतिशय सुमधूर आहे. संगीतांतील विविध घराणी उदाहरणार्थ किशोरीबाईंचे जयपूर अत्री घराणे, भिमसेनजींचे किराणा, जसराजचींचे मेवाती आपापल्या नियमांनुसार जेव्हा राग प्रदर्शन करतात तेव्हा सुरांची क्षमता रसिकांच्या लक्षांत येते. कसेही असले तरी संगीत ही एक दैवी शक्ति आहे आणि त्याचा योग्य तो परिणाम मानवी मनावर झाल्याशिवाय रहात नाही.

 

©  सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (46) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता 

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

(फल सहित वर्ण धर्म का विषय)

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥

जिससे जग परिव्याप्त है, जिससे सहज प्रवृति

उसकी पूजा स्वकर्म से, मिलती है समृद्धि।।46।।

 

भावार्थ :  जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌व्याप्त है (जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके (जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना ‘कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना’ है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है॥46॥

He from  whom  all  the  beings  have  evolved  and  by  whom  all  this  is  pervaded, worshipping Him with his own duty, man attains perfection.

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares